Tuesday, 25 November 2025

घुसपैठियों में मची भगदड़ से ममता घबराहट में



मतदाता सूचियों के सघन विशेष पुनरीक्षण (एस.आई आर) के विरोध में आसमान सिर पर उठाने वाली प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को जब लगा कि वे इस प्रक्रिया को नहीं रोक पाएंगी तब वे ठंडी पड़ गईं । उनकी तरफ से तृणमूल कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं की टोलियां तैयार करने का ऐलान भी हुआ था जिन्हें  घर - घर जाकर मतदाताओं की जाँच कर रहे बीएलओ के साथ रहकर देखना है कि किसी का नाम गलत तरीके से तो नहीं काटा जा रहा। उन्होंने ये प्रयास भी किया कि इस काम में प्रदेश के सरकारी कर्मचारी असहयोग करें। शुरुआत में ऐसा लगा भी परंतु चुनाव आयोग की सख्ती के कारण वह दाँव भी असफल हो गया। चूंकि मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण 12 राज्यों में एक साथ चल रहा है इसलिए सुश्री बैनर्जी का ये आरोप निराधार साबित हुआ कि केंद्र सरकार उनके राज्य को निशाना बना रही है। उल्लेखनीय है आगामी वर्ष प. बंगाल सहित अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं इसलिए ममता की बेचैनी बढ़ गई। हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों  का पुनरीक्षण करते हुए जब 65 लाख नाम अलग किये तब विपक्षी दलों ने उसे लोकतंत्र विरोधी कदम बताते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर विपक्षी दलों के समर्थकों के नाम सूचियों से अलग करवा रहा है। राहुल गाँधी ने इसे वोट चोरी जैसा नाम देते हुए बिहार में वोट अधिकार यात्रा तक निकाली। हालांकि चुनाव आयोग ने काटे गए नामों को दोबारा जोड़ने का समुचित अवसर प्रदान किया जिसका लाभ लेकर लाखों नये मतदाताओं ने भी  अपना पंजीयन करवाया। हालांकि 40 लाख से ज्यादा नाम सूचियों से अलग हुए। यदि विपक्ष के आरोप सही होते तब मतदाता सूचियों का प्रारूप प्रकाशित होने पर  बड़ी संख्या में शिकायतें आयोग को मिलतीं। श्री गाँधी को लगता था  मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण के विरोध में बिहार की जनता सड़कों पर उतर आयेगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पूरा चुनाव शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो गया। एक भी मतदान केंद्र पर दोबारा मतदान की नौबत नहीं आई जो बिहार के लिए नया अनुभव था। मतदान का प्रतिशत  बढ़ने से तमाम आशंकाएँ निर्मूल साबित हुईं।  नीतीश सरकार की वापसी  प्रचंड बहुमत के साथ हुई जिसके बाद ये सुनने में भी आया कि जनता इसके विरुद्ध सड़कों पर उतर आयेगी और विपक्ष के चुने विधायक त्यागपत्र दे देंगे किंतु नई सरकार का शपथ ग्रहण निर्विघ्न संपन्न हो गया। मंत्रीमंडल को लेकर भी कोई विवाद सामने नहीं आया। इस प्रकार वोट चोरी और मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने का मुद्दा फुस्स होकर रह गया। ममता बैनर्जी को उम्मीद थी कि बिहार में एनडीए को जनता सत्ता से बाहर कर देगी जिसके बाद प. बंगाल में चुनाव आयोग मतदाता सूचियों की सघन जाँच के काम में ढील डाल देगा किंतु उनकी आशाओं पर तुषारापात हो गया। बिहार की जनता ने वोट चोरी के मुद्दे को रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दिया वहीं मतदाता सूचियों से लाखों नाम कट जाने के बाद भी कोई आसमान नहीं फटा।  मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की आहट मात्र से प. बंगाल के अवैध घुसपैठियों में जो भगदड़ दिखाई दे रही है उससे ममता की घबराहट की वजह स्पष्ट हो गई। जैसी कि खबरें आ रही हैं उसके अनुसार राज्य के विभिन्न इलाकों में रह रहे लोग बड़ी संख्या में रहस्यमय तरीके से घरों में ताला बंद कर गायब हो गए। बांग्लादेश की सीमा पर भी लोगों का हुजूम नजर आ रहा है जो वापस जाना चाह रहा है। असल में मतदाता सूचियों की सघन जाँच के शुरू होते ही अवैध रूप से मतदाता बन बैठे घुसपैठियों में ये भय समा गया है कि दस्तावेजों के अभाव में उनकी असलियत सामने आ जाने पर वे कानून के शिकंजे में फंस जाएंगे। जाहिर है ये वर्ग ममता का  प्रबल समर्थक है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस की सहायता से ही उन्हें घुसपैठिया होने के बाद भी भारत में सभी सुविधाओं के साथ रहने की छूट प्राप्त है। प. बंगाल में एस. आई .आर के विरोध में जनता को आंदोलित करने की योजना भी सफल नहीं हुई। बड़ी बात नहीं बिहार जैसे ही यहाँ भी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से अलग हो जाएं। इसका राजनीतिक लाभ या हानि किस पार्टी को होगी ये बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी ये कि चुनाव आयोग की इस पहल से राज्य में अवैध रूप से आकर बस गए बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों का पर्दाफाश हो जायेगा जो देश के दूरगामी हित में है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 November 2025

यही हाल रहा तो कांग्रेस की हार का सिलसिला जारी रहेगा


लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस में जो उत्साह लौटा था वह बीते डेढ़ साल में ठंडा हो गया। इस दौरान जम्मू - कश्मीर , हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन इतना निराशाजनक रहा कि इंडिया गठबंधन के घटक तक उससे कन्नी काटने लगे। जम्मू - कश्मीर के चुनाव में नेशनल काँफ्रेंस ने कांग्रेस को जम्मू अंचल में सीटें दी गईं ताकि वह हिन्दू बहुल क्षेत्रों में भाजपा को रोक सके किंतु राहुल गाँधी घाटी में प्रचार करते रहे जिस पर  उमर अब्दुल्ला ने नाराजगी भी व्यक्त की। जम्मू में भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली जबकि कांग्रेस कुछ खास नहीं कर सकी। उसी के साथ ही हरियाणा चुनाव में भी कांग्रेस का प्रदर्शन दयनीय रहा। सपा और आम आदमी पार्टी उससे सीटें मांगते रहे किंतु वह  अकेले लड़कर औंधे मुँह गिरी। उस पर  सपा के अलावा उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना ने भी राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाये। हालांकि महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में कांग्रेस के लिए अपनी साख बचाने का मौका था। झारखंड में तो हेमंत सोरेन भाजपा को रोकने में सफल रहे किंतु महाराष्ट्र में विपक्ष को जबरदस्त पराजय मिली जहाँ लोकसभा चुनाव में एनडीए को बड़ा धक्का लगा था । 48 में से 30 सीटें विपक्ष ले गया जिनमें  कांग्रेस को 13 मिलीं जबकि 2019 में वह 1 पर सिमट गई थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में  महायुति सरकार भारी बहुमत से लौटी। भाजपा तो अकेले ही बहुमत के बेहद नजदीक पहुँच गई ।  वहीं कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया और महज 16 विधायकों तक सीमित होकर रह गई। उद्धव ठाकरे तक उससे अधिक सीटें ले आये। महाराष्ट्र के चुनाव ने लोकसभा चुनाव के बाद बने माहौल को पूरी तरह उलट दिया। हालांकि इसकी शुरुआत हरियाणा से हो चुकी थी। इन नतीजों से कांग्रेस और राहुल गाँधी की साख और धाक दोनों को काफी नुकसान पहुंचा जिससे इंडिया गठबंधन में उनका दबदबा कमजोर पड़ गया। कुछ महीनों बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव आ गए जहाँ पिछले दो चुनावों में कांग्रेस शून्य पर ही अटकी रही। हालांकि लोकसभा में उसने आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन किया किंतु भाजपा सभी 7 सीटें जीत गई। इसके बाद से ही दोनों में दूरियाँ बढ़ीं क्योंकि पंजाब में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचाया  जिसका बदला उसने हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जड़ों में मठा डालकर ले लिया। इसीलिए  दिल्ली में दोनों एक दूसरे के विरुद्ध उतरे। लेकिन इंडिया गठबंधन के दो प्रमुख सदस्य ममता बैनर्जी और अखिलेश यादव ने कांग्रेस के बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन कर राहुल गाँधी को नजरंदाज कर दिया। हरियाणा और महाराष्ट्र की हार से बौखलाए श्री गाँधी ने दिल्ली में खुद मैदान संभाला और मुस्लिम क्षेत्रों से प्रचार की शुरूआत की। लेकिन यहाँ भी वे बुरी तरह असफल रहे और कांग्रेस लगातार तीसरी मर्तबा शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं भाजपा ने हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद दिल्ली में भी धमाकेदार जीत दर्ज की। भाजपा के लिए यह  जीत हौसला बढ़ाने वाली साबित हुई वहीं आम आदमी पार्टी की महत्वाकांक्षाओं को इससे बड़ा धक्का लगा किंतु कांग्रेस  तो मुँह दिखाने लायक नहीं बची। होना तो ये चाहिए था कि इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाकर भाजपा का विजय रथ रोकने की रणनीति बनाई जाती किंतु राहुल लग गए वोट चोरी का ढोल बजाने में । उन्हें लगता था कि चुनाव आयोग को घेरकर वे बिहार विधानसभा चुनाव में लोकसभा जैसा करिश्मा कर ले जाएंगे किंतु उनकी अपरिपक्वता ने वहाँ भी कांग्रेस को तो डुबोया ही  तेजस्वी यादव का भविष्य भी मटियामेट कर दिया। कांग्रेस दहाई के आंकड़े तक  नहीं पहुँच सकी।  दरअसल कांग्रेस की इस दुरावस्था के लिए श्री गाँधी की पार्ट टाइम राजनीतिक शैली जिम्मेदार है। अपने नेतृत्व में कांग्रेस की हार का कीर्तिमान स्थापित करने के बाद भी वे गलतियों को  दोहराने  पर आमादा हैं। पार्टी संगठन दिन ब दिन कमजोर होता जा रहा है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपना राज्य कर्नाटक ही नहीं संभाल पा रहे जहाँ कांग्रेस सरकार अपने अंतर्विरोधों के कारण खतरे में है। अगले वर्ष होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाना तो दूर पार्टी पिछली पराजयों के कारण तक नहीं ढूंढ़ सकी। यही हाल रहा तो अगले साल भी कांग्रेस शर्मिंदगी झेलने मजबूर रहेगी। जहाँ  तक बात राहुल की है तो उनका क्या , जब मर्जी विदेश चले जाएंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 22 November 2025

बिहार के बाद प. बंगाल पर टिकी भाजपा की नजरें



बिहार में नीतीश सरकार की धमाकेदार वापसी के बाद भाजपा ने  प. बंगाल में ममता बैनर्जी का किला ढहाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। 2021 के चुनाव में भाजपा अपने विधायकों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि करते हुए 3 से 73 तक पहुँचने के कारण मुख्य विपक्षी दल बनने की हैसियत में आ गयी। वहीं  कांग्रेस और वामपंथियों का पूरी तरह सफाया हो गया। लंबे समय तक वामपंथियों का अभेद्य दुर्ग बने रहे प. बंगाल में  पाँव जमाना भाजपा के लिए सपना जैसा था जबकि उसके पितृ पुरुष डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यहीं के थे। भारत विभाजन की विभीषिका को जितना पंजाब और सिंध ने झेला उतना ही बंगाल ने भी। कोलकाता समेत समूचे बंगाल में हिंदुओं का जिस बेरहमी से नरसंहार हुआ उसने आजादी की खुशियों को मातम में बदल दिया। लेकिन उसके बाद भी इस राज्य में हिंदुवादी राजनीति को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और पूरे देश की तरह से ही बंगाल में भी कांग्रेस का वर्चस्व कायम रहा । लेकिन 1977 की जनता लहर में वहाँ ज्योति बसु के नेतृत्व में सीपीएम सरकार बनी। वे 2000 तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य आये किंतु  वे वामपंथियों के किले को बचाकर नहीं रख पाए और 2011 में ममता बैनर्जी ने अपना झंडा फहरा दिया। कांग्रेस में रहते हुए भी वे वामपंथियों से लड़ती रहीं किंतु पार्टी नेतृत्व से अपेक्षित सहयोग न मिलने से क्षुब्ध होकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनाई और 10 वर्ष के सतत संघर्ष के बाद वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका। लोगों को उम्मीद थी कि वे मार्क्सवादी सत्ता के दौरान पनपी अराजकता से निजात दिलवाने के साथ ही बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए प्रभावी कदम उठाएंगी। लेकिन धीरे - धीरे ममता ने भी  वही तौर - तरीके अपनाये जिनके लिए वामपंथी सरकार की आलोचना करते हुए वे संघर्ष करती रहीं। राज्य के तमाम असामाजिक तत्वों ने रातों - रात मार्क्सवादी चोला उतारकर तृणमूल का झंडा थाम लिया। बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के बजाय ममता सरकार ने उन्हें मतदाता बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का दाँव चला। बाद में म्यांमार से भागकर रोहिंग्या मुस्लिम भी प. बंगाल में बसते चले गये। वामपंथियों की तरह ममता सरकार को भी इन घुसपैठियों में अपना वोट बैंक नजर आने लगा । इसकी वजह से प. बंगाल का जनसंख्या संतुलन तेजी से बदला। ममता के लिए ये घुसपैठिये चुनाव जिताने वाला ब्रह्मास्त्र बन गए। राजनीतिक गुंडागर्दी को भी उन्होंने अपना प्रमुख हथियार बनाते हुए कांग्रेस और वामपंथियों को धीरे - धीरे हाशिये पर धकेल दिया। लेकिन 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनते ही भाजपा ने न सिर्फ प. बंगाल वरन समूचे पूर्वी और उत्तर पूर्वी राज्यों में अपने विस्तार की कार्य योजना बनाई जिसका परिणाम अरुणाचल, असम, त्रिपुरा, मणिपुर और उड़ीसा में उसकी सरकारें बन जाने के रूप में सामने है। लेकिन प. बंगाल अभी भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है।  2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव  के बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में उसे अच्छी सफलता मिली। यहाँ तक कि ममता  विधानसभा चुनाव हार गईं  । यद्यपि उन्हें विशाल बहुमत मिला और तीसरी बार सत्ता में आने के बाद उन्होंने भाजपा को रोकने के लिए हरसंभव प्रयास शुरू किये जिसके कारण पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को काफी नुकसान हुआ। लेकिन उसके बाद से भाजपा ने प. बंगाल को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा । ममता सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर कर उसकी साख गिराने में तो उसे सफलता मिल गई लेकिन चुनाव जीतने के लिये घुसपैठियों को मतदाता सूचियों से बाहर करना जरूरी है। अब एस. आई. आर (मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण) के जरिये इस बाधा को दूर करने का बीड़ा भी उठा लिया गया है। चुनाव आयोग के इस कदम से ममता सरकार घबराई हुई है। उसने इस प्रक्रिया को रोकने के भरसक प्रयास किये किंतु सफल नहीं हुई। बिहार में मतदाता सूचियों की जाँच के कारण बड़ी संख्या में मतदाता बाहर हो गए। प. बंगाल में भी ऐसी ही उम्मीद है। बड़ी संख्या में घुसपैठियों के भागने से लगता है तीर सही निशाने पर बैठा है। बिहार की जीत के समारोह में प्रधानमंत्री द्वारा गंगा के बिहार  से प. बंगाल जाने जैसी जो टिप्पणी की उसका निहितार्थ राजनीति के जानकार समझ रहे हैं। भाजपा की चुनावी मशीनरी राज्य में सक्रिय होने की खबरें आने के बाद ममता सतर्क हो उठी हैं किंतु 2026 के मुकाबले के लिये भाजपा की तैयारियों से लगता है मुकाबला जोरदार होगा क्योंकि हिंदुत्व की हवा इस राज्य में भी महसूस होने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 21 November 2025

परिवारवाद : नीतीश खुद तो दूर किंतु सहयोगियों के आगे मजबूर

हार चुनाव में एनडीए की ओर से दो मुद्दे जोरदारी से उठाये गए थे। इनमें पहला जंगल राज और दूसरा था परिवारवाद ।  इन दोनों का निशाना लालू प्रसाद यादव ही थे क्योंकि उनके शासन काल में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण सर्वत्र अराजकता फैल गई थी। इसके अलावा सामाजिक न्याय के जिस मुद्दे पर लालू सत्ता में आये वह धीरे - धीरे उनके परिवार के उत्थान पर केंद्रित हो गया। परिणामस्वरूप राजद नामक उनकी पार्टी परिवार की निजी संपत्ति में परिवर्तित होकर रह गई। नीतीश कुमार के 20 वर्षीय शासन में बिहार में रामराज्य आ गया हो ये कहना तो अतिशयोक्ति होगी किंतु कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार हुआ ।  वहीं सामाजिक कल्याण की अनेक योजनाएं भी प्रारंभ हुईं जिनका केंद्र महिलाएं होने से नीतीश के प्रति उनका झुकाव बढ़ता गया। शराबबंदी जैसे निर्णयों से भी उनकी  सकारात्मक छवि निर्मित हुई। लेकिन सबसे बड़ी बात जिसके लिए नीतीश की प्रशंसा सभी करते हैं वह है अपने आपको परिवारवाद से परे रखना। उनकी पत्नी काफी पहले दिवंगत हो चुकी थीं। उनके इकलौते पुत्र निशांत कुमार राजनीति से दूर रहने की वजह से सार्वजनिक तौर पर बहुत कम नजर आते हैं। चुनाव के दौरान शायद ही किसी ने उनको किसी रैली या सभा में देखा हो। चुनाव परिणाम के बाद जरूर वे पिता को चरण छूकर बधाई देते दिखे । दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव का पूरा कुनबा ही उनकी पार्टी पर हावी रहा है। स्व. रामविलास पासवान के बेटे चिराग ने भी पिता की पार्टी लोक जनशक्ति पूरी तरह से हथिया ली और चाचा पारस को किनारे लगा दिया।  एनडीए के एक और घटक के मुखिया जीतन राम मांझी ने भी अपने परिवार को ही स्थापित किया। उनकी बहू और समधिन जीतकर विधायक भी बन गईं । हालाँकि भाजपा में भी बहुत से विधायक पारिवारिक विरासत के कारण आगे आ सके और कुछ मंत्री भी बने किंतु पार्टी पर किसी एक नेता या परिवार का कब्जा नहीं होने से वह परिवारवाद के आरोप से बच जाती है। एनडीए का एक और घटक राष्ट्रीय लोक मोर्चा है जिसके सर्वेसर्वा उपेंद्र कुशवाहा अपनी जातीय प्रभाव के चलते बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण बने रहते हैं। हालाँकि वे अपनी सुविधानुसार यहाँ - वहाँ होते रहते हैं। इस बार उनकी पार्टी को अच्छी सफलता मिल गई तथा श्रीमती कुशवाहा भी विधानसभा में आ गईं। उसके बाद खबर उड़ी कि वे पार्टी कोटे से मंत्री बनेंगी क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों में ये चलन आम हो चुका है। लेकिन जब  शपथ ग्रहण हुआ तब मंत्रियों में एक ऐसे युवा को देखकर सभी चौंक गये जो विधानसभा और विधान परिषद दोनों का सदस्य नहीं है। फिर पता चला कि दीपक प्रकाश नामक ये व्यक्ति कुशवाहा जी  के साहेबजादे हैं। चूंकि घटक दल  गठबंधन की जरूरत  होते हैं इसलिए उनके नखरे उठाना बड़ी पार्टियों के लिए मजबूरी बन चुकी है। 2020 में चिराग ने जदयू को दर्जनों सीटें हरवा दी थीं किंतु इस बार मन मारकर नीतीश को उन्हें गठबंधन में शामिल करना पड़ा। उपेंद्र के साथ भी वही स्थिति है। इसीलिए खुद परिवारवाद  से परहेज करने वाले नीतीश को सहयोगियों के परिजनों को मंत्री बनाना पड़ा जिनमें जीतन राम के बेटे भी हैं जो पिछली सरकार में भी थे और विधान परिषद सदस्य हैं। स्मरण रहे बिहार में विधानसभा के दो सदन होने से कई मंत्री उच्च सदन से भी बनते हैं। खुद नीतीश कुमार भी विधान परिषद में ही हैं। एक सप्ताह पूर्व जो नई विधानसभा चुनकर आई उसमें विभिन्न दलों के ऐसे दर्जनों विधायक हैं जिन्हें राजनीति विरासत में प्राप्त हुई। लेकिन उपेंद्र ने  जिस प्रकार अपने बेटे को मंत्री बनाया वह तो लोकतंत्र का मजाक है। संविधान के अनुसार अब उन्हें छह माह में किसी सदन का सदस्य बनना होगा और वे बन भी जाएंगे किंतु फ़िलहाल तो उनकी ताजपोशी उसी परिवारवाद का उदाहरण है जिसके लिए लालू परिवार की आलोचना की जाती है। आश्चर्य तो तब होता है जब भाजपा भी चुपचाप गठबंधन राजनीति की इस मजबूरी को जरूरी मानकर ढोने को राजी हो जाती है। जाति के नाम पर बने तमाम छोटे दलों के मुखिया अपनी जाति के नाम पर अपने परिवार का उत्थान किस तरह कर रहे हैं बिहार का नया मंत्रीमंडल इसका उदाहरण है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 November 2025

खैरात बाँटने के सिलसिले को कभी न कभी तो रोकना पड़ेगा


नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। उनके साथ ही दो दर्जन से ज्यादा मंत्रियों ने भी पद और गोपनीयता की शपथ ली । कुछ पद भावी समीकरणों की वजह से खाली रखे गए जो स्वाभाविक ही है। इस बार नीतीश की पार्टी के विधायकों की संख्या पूर्वापेक्षा काफी बढ़ने से उनका मनोबल  ऊँचा होना लाजमी है। मंत्रीमंडल में भाजपा के विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उसके पास सर्वाधिक सीटें हैं। दो उपमुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष पद भी उसी के खाते में जाने की संभावना है। चूंकि एनडीए के पास पर्याप्त बहुमत है इसलिए सरकार के स्थायित्व पर किसी तरह का खतरा नहीं है । बिहार के हित में भी यही होगा कि  सरकार पूरे पाँच वर्ष निर्विघ्न चले। विपक्ष चूंकि काफी कमजोर है इसलिए उसकी तरफ से किसी तोड़फोड़ की आशंका भी नजर नहीं आती। लेकिन इस सबके साथ ही जो  बात इस चुनाव के बाद समूचे राजनीतिक विमर्श का विषय बन गई वह है सरकार द्वारा संचालित वे योजनाएं जिनमें जनता के खाते में सीधे नगदी जमा की जाती है। यद्यपि इसकी शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी। वृद्धावस्था और निराश्रित पेंशन तो बहुत  पुरानी है। म.प्र में शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना शुरू की जिसमें बेटी के जन्म पर एक लाख रु. उसके नाम से सावधि जमा कर दिये जाते हैं। छात्र - छात्राओं को साइकिलें, टैबलेट , लैपटॉप, गणवेश, पुस्तकें, बस्ता, फीस माफी, छात्र वृत्ति जैसी योजनाएं भी कालांतर में प्रारंभ हुईं। नीतीश  कुमार ने 20 साल पहले जिन  स्कूली छात्राओं को साइकिलें दीं वे माँ बनने के बाद भी उनकी समर्थक हैं। हालाँकि महिलाओं के उनके प्रति झुकाव में शराब बंदी का भी बड़ा योगदान है किंतु माना जा रहा है कि हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में नीतीश सरकार ने जीविका दीदी नामक योजना के नाम पर डेढ़ करोड़ महिलाओं के खाते में जो दस हजार जमा करवाये उसने चुनाव को इकतरफा बना दिया। वैसे  ये फार्मूला आजमाने वाले वे पहले मुख्यमंत्री नहीं हैं। बीते कुछ सालों में म.प्र, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में सरकार  चुनाव के पहले महिलाओं के खातों में नगद राशि जमा करने के बाद सत्ता में लौटी। हालाँकि खजाना खोलकर मुफ्त खैरात बांटने के बाद भी छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकार सत्ता गँवा बैठी। लेकिन चुनाव जीतने के लिए खजाना खाली करने का जो मंत्र राजनेताओं ने सीख लिया उसके दूरगामी दुष्परिणामों को लेकर हर जिम्मेदार व्यक्ति चिंता व्यक्त कर रहा है। निजी चर्चाओं में नेतागण भी  स्वीकार करते हैं कि भविष्य में नगदी बाँटने के इस तरीके से  सरकारों पर कर्ज का बोझ इतना बढ़ जाएगा जिसकी अदायगी करने में वे सक्षम नहीं रहेंगी। हालाँकि सभी पार्टियां इस मामले में एक जैसी हैं। कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में महिलाओं को नगद राशि के अलावा कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का वायदा कर भाजपा से सत्ता तो छीन ली परंतु अब इन राज्यों में वेतन बाँटने तक में सरकार को पसीना आ रहा है। मुफ्त बिजली के कारण लगभग सभी राज्यों के बिजली बोर्ड कंगाल हो गए वहीं मुफ्त पट्टों के वितरण ने सरकारी जमीन की लूटपाट का रास्ता खोल दिया। खैरात बाँटकर चुनाव जीतने का चलन हालाँकि  कई दशकों से चला आ रहा है लेकिन अब इसका स्वरूप जिस  तरह बड़ा होता जा रहा है वह बड़े खतरे का संकेत है। बिहार चुनाव में नीतीश द्वारा खेले गए  दस हजार रूपी दाँव की काट के रूप में तेजस्वी यादव ने चुनाव जीतने पर महिलाओं को तीस हजार देने का वायदा कर दिया। यदि वे जीतते तब उसमें उसी वायदे का योगदान होता। लेकिन  राज्य सरकार के खजाने पर तीन गुना बोझ पड़ता। अगले साल प. बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार के परिणाम से उत्साहित इन  राज्यों के मुख्यमंत्री भी नीतीश जैसी ही दरियादिली दिखाएं तो उन्हें कौन रोकेगा ? हालाँकि दिल्ली में केजरीवाल सरकार मुफ्त  बिजली, पानी  , शिक्षा और इलाज देने के बाद भी सत्ता से बाहर आ गई जिसके अन्य कारण भी हैं किंतु आम आदमी पार्टी सत्ता में आई ही मुफ्त उपहारों के वायदों के कारण थी । भले ही देश की अर्थव्यवस्था कितनी भी सुदृढ हो लेकिन जिस तरह बड़े से बड़े बर्तन में एक छेद करने पर उसमें भरा पानी रिसते - रिसते खत्म हो जाएगा उसी तरह सरकार का खजाना चाहे कितना भी भरा हो यदि उसे अनुत्पादक कार्यों में लुटाया जाता रहा तो देश में निकम्मों की संख्या बढ़ती चली जायेगी जिसका अनुभव होने भी लगा है। चुनाव आयोग को इस दिशा में पहल करना चाहिए। हालाँकि राजनीतिक पार्टियां इस बारे में किसी भी प्रकार की रोक को शायद ही स्वीकार करेंगी । लेकिन खैरात बांटने के इस सिलसिले को कभी न कभी तो विराम देना ही पड़ेगा। वरना विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था की रफ्तार का धीमा पड़ना सुनिश्चित है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 November 2025

नीतीश की ताजपोशी के बाद भी भाजपा फायदे में


बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ये चर्चा आम थी कि नीतीश कुमार की राजनीतिक पारी खत्म होने जा  रही है। उन्हें बीमार और थका हुआ बताने  के साथ ही ये प्रचार भी  किया जाता रहा कि एनडीए का बहुमत आने पर भी भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनायेगी। इस बारे में महाराष्ट्र का उदाहरण दिया गया जहाँ एकनाथ शिंदे को हटाकर  भाजपा ने देवेंद्र फड़नवीस की ताजपोशी करवा दी। 2020 में  भाजपा को जदयू से काफी ज्यादा सीटें मिलने पर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बनाये गए। हालाँकि 2022 में उन्होंने भाजपा को झटका देकर लालू प्रसाद यादव की राजद के साथ मिलकर सरकार बना ली और लोकसभा चुनाव में  नरेंद्र मोदी के विरुद्ध इंडिया गठबंधन की  रचना में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन भी किया। दरअसल नीतीश को इस बात की खुन्नस थी कि विधानसभा चुनाव में भाजपा की शह पर  चिराग पासवान ने जदयू के विरुद्ध प्रत्याशी खड़े किये जिससे जदयू के विधायकों की संख्या घट जाने ने से वे भाजपा की कृपा पर निर्भर हो गए। लेकिन जल्द ही  लालू परिवार की हरकतों से परेशान होकर उन्होंने भाजपा के साथ लौटकर  इंडिया गठबंधन को जबरदस्त झटका दे दिया जिसका असर लोकसभा में एनडीए की वापसी के तौर पर दिखाई दिया। लेकिन भाजपा स्पष्ट बहुमत से पीछे रह गई और उसे नीतीश और चंद्रबाबू नायडू के समर्थन से सरकार बनाना पड़ी। इस कारण नीतीश भाजपा की मजबूरी बन गए। बावजूद इसके बिहार के संदर्भ में तरह - तरह की बातें चलती रहीं। यहाँ तक हवा उड़ाई गई कि चुनाव के बाद नीतीश फिर खेला करेंगे जिससे मोदी सरकार खतरे में पड़ जाएगी। इन चर्चाओं के कारण बिहार में तेजस्वी यादव  की संभावनाएं उज्ज्वल मानी जाने लगीं। विभिन्न सर्वे उन्हें मुख्यमंत्री की दौड़ में नीतीश से आगे बता रहे थे। मतदान के बाद हुए अनेक एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत मिलने के बाद भी तेजस्वी की लोकप्रियता नीतीश से अधिक बताई गई। लेकिन जब नतीजे आये तब सारे अनुमान और आशंकाएँ ध्वस्त हो गए। एनडीए को ऐतिहसिक बहुमत मिलने के साथ ही भाजपा और जदयू ने अपने सहयोगियों के साथ भारी सफलता हासिल की। हालाँकि भाजपा  सबसे बड़ी पार्टी बनने में कामयाब रही वहीं नीतीश भी 2020 से दोगुनी सीटें जीतकर अच्छी स्थिति में तो आ गए किंतु  लालू एंड कंपनी के साथ जाने का खतरा उठाना उनके लिए कठिन हो गया। भाजपा ने भी चुनाव के दौरान किया वायदा निभाते हुए उन्हें बिहार की बागडोर सौंप दी। कल नीतीश शपथ लेंगे जिसमें प्रधानमंत्री सहित एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल होंगे जिससे इस गठबंधन की मजबूती उजागर होगी। उल्लेखनीय है आगामी वर्ष प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में  विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार के परिणामों ने भाजपा के हौसले बुलंद कर दिये हैं । इसीलिए  उसने प.बंगाल और तमिलनाडु में अपनी रणनीति पर  काम करना शुरू कर दिया है। बिहार के परिणामों के बाद राजनीतिक क्षेत्रों में  चर्चा  है कि प. बंगाल, असम और तमिलनाडु में बिहार के प्रवासी काफी बड़ी संख्या में हैं जिनको अपने पक्ष में लाने के लिए भाजपा, नीतीश का उपयोग करेगी। बिहार में एनडीए की धमाकेदार जीत के बाद नीतीश की वजनदारी न सिर्फ अपने राज्य अपितु अन्य राज्यों में फैले बिहारी प्रवासियों के बीच भी बढ़ गई है। चूंकि जदयू अन्य राज्यों में नहीं है, इसलिए नीतीश को भी भाजपा के लिए प्रचार करने में कोई परेशानी नहीं होगी। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में शानदार सफलता के बाद भाजपा की चुनावी मशीनरी और सूक्ष्म प्रबंधन की  विरोधी भी तारीफ कर रहे हैं। जो पत्रकार दिन रात श्री मोदी और अमित शाह के विरुद्ध ज़हर उगला करते थे वे भी ये कहने को बाध्य हो गए हैं कि वे प्रयासों की पराकाष्ठा से  विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सफलता सुनिश्चित कर लेते हैं। नीतीश को भी ये बात समझ में आ चुकी है कि बिना भाजपा के उनका गुजारा संभव नहीं है। बिहार में लालू युग का अवसान होने के साथ ही भाजपा ही भविष्य की राजनीतिक शक्ति है।  वैसे भी ये नीतीश की आखिरी पारी है और सम्मानजनक रिटायरमेंट के लिए भाजपा से जुड़े रहना उनके लिए जरूरी होगा। उनको मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने बेहद चतुराई दिखाई है। उसके पास नीतीश की टक्कर का कोई नेता है नहीं और चिराग पासवान को एक सीमा से आगे वह जाने नहीं देगी।  इस जीत का सबसे अधिक लाभ भाजपा को हुआ क्योंकि बिहार जैसे जाति में जकड़े राज्य में राष्ट्रवादी राजनीति का बढ़ता वर्चस्व राष्ट्रीय परिदृश्य को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। इस चुनाव के बाद लालू और उनका परिवार तो सन्निपात की स्थिति में है ही कांग्रेस भी झटके से उबर नहीं पा रही । 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 November 2025

न वैसे नेता रहे और न ही श्रोता


     समय के साथ सभी चीजें बदलती हैं। इसलिए चुनाव भी नए रंग और नए रूप में नजर आने लगे हैं। सघन जनसंपर्क अब औपचारिकता में बदल गया है। मतदाताओं की बढ़ती संख्या और निर्वाचन क्षेत्र के फैलाव ने प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसीलिए घर - घर जाकर दरवाजा खटखटाने वाले प्रचार की जगह अब हाईटेक संचार माध्यमों ने ले ली है। मोबाइल पर धड़ाधड़ संदेश आते हैं , प्रत्याशी का रिकॉर्डेड अनुरोध भी सुनाई देता है। सोशल मीडिया के सभी मंच चुनावी प्रचार से भरे हैं । बड़े  नेताओं के तामझाम भरे रोड शो होने लगे हैं। कुछ विशिष्ट हस्तियों के नाम पर भीड़ जमा करने का तरीका भी अपनाया जाने लगा है किंतु इस सबके बीच देर रात तक चलने वाली छोटी - बड़ी सभाएं अतीत बन चुकी हैं जिनमें विभिन्न दलों के नेता घंटों अपनी विचारधारा का बखान करते हुए मतदाताओं से समर्थन की अपील करते थे।

      वे नेता  हेलीकॉप्टर और चार्टर्ड विमानों से नहीं अपितु रेल या सड़क मार्ग से आते। उनके आने में  देर होने पर भी जनता उनको सुनने घंटों प्रतीक्षा करती रहती थी। नुक्कड़ सभाओं में प्रादेशिक या स्थानीय नेतागण अपनी पार्टी का पक्ष रखते थे। आज की तरह रैलियों में शामियाना और कुर्सियां नहीं लगती थीं । आगे बिछी कुछ दरियों पर पहले से आए श्रोता कब्जा जमा लेते और पीछे हजारों श्रोता खड़े -खड़े भाषण सुनते थे। प्रधानमंत्री के अलावा अनेक ऐसे राष्ट्रीय नेता भी थे जो भले सांसद - विधायक न रहे हों किंतु जनता उनको सुनने बेताब रहा करती थी। सबसे बड़ी बात ये थी कि उन नेताओं को सुनने के लिए वे लोग भी आते जो उनकी विचारधारा से सहमत नहीं होते थे । नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से प्रादेशिक नेता छोटे - छोटे श्रोता समूह से मुखातिब होते और लोग भी धैर्यपूर्वक उन्हें सुनते थे।

      समय बीतने के साथ चुनाव महंगे होते जा रहे हैं। चुनाव आयोग ने बीते कुछ दशकों में उनका रंग - रूप पूरी तरह बदल दिया। खर्च कम करने के लिए किए गए उपाय कितने सफल हुए ये बड़ा सवाल है क्योंकि धन का उपयोग पहले से कई गुना बढ़ गया है। रात 10 बजे सभाएं बंद कर दी जाती हैं। आयोग एक - एक कुर्सी और वाहन का हिसाब रखता है। चाय , समोसे तक का खर्च जोड़ा जाने लगा है। अखबारी विज्ञापन के अलावा सोशल मीडिया पर भी  हेट, फेक और पेड समाचार पर 24 घंटे निगाह रखी जाने लगी है। वृद्ध और निःशक्त मतदाताओं को घर पर मतदान की सुविधा भी शुरू हो गई है। मतदाता सूचियां बनाने और मतपर्चियां घर - घर भेजने का सरकारी इंतजाम  मत प्रतिशत बढ़ाने में  सहायक हुआ है। लेकिन चुनावी सभाओं का  असली आनंद  लुप्त हो गया है। न वैसे ओजस्वी वक्ता रहे और न ही प्रतिबद्ध श्रोता। इसका मुख्य कारण ये भी है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल और उनके नेता सत्ता में रह चुके हैं। ऐसे में वे केवल अपने विरोधी की आलोचना कर जनता को प्रभावित नहीं कर सकते। उन्हें सरकार में रहते हुए जनहित में किए गए कामों का हिसाब भी देना होता है।  वह पीढ़ी भी धीरे - धीरे समाप्त होती जा रही है जो किसी पार्टी  या नेता की अंधभक्त होती थी। नेहरू जी ,  डा.लोहिया और अटल जी जैसे जननेताओं के विरोधी भी उनके प्रति सम्मान का भाव रखते थे। धीरे - धीरे नेताओं का स्तर गिरने लगा जिसके परिणामस्वरूप राजनीति के प्रति समाज में व्याप्त आदर भाव में  भी कमी आती गई। आज देश में शायद ही कोई नेता बचा हो जिसको सुनने स्वस्फूर्त जनता उमड़ पड़ती हो। गांव और कस्बों में हेलीकॉप्टर देखने जरूर लोग जमा हो जाते हैं किंतु नेताओं को सुनने का लालच खत्म होने लगा है। और हो भी क्यों न , बीते 75 साल से भाषण सुनती आई जनता जब देखती है कि साधारण परिस्थिति का व्यक्ति तो चुनाव जीतने के बाद अपार धन संपत्ति अर्जित कर लेता है किंतु उसकी अपनी  दशा नहीं बदलती तब उसके मन में गुस्सा जागता है। और इसी गुस्से ने नेताओं के प्रति असम्मानजनक संबोधनों को जन्म दिया ।

      जो राजनीति समाज को दिशा देती थी वह खुद ही दिशाहीन हो चली है । इसी तरह जिन नेताओं को जनता अपना पथ प्रदर्शक माना करती थी वे खुद भटकाव का शिकार  हैं। ये स्थिति अच्छी नहीं है जिसका प्रमाण राजनीति से अच्छे  लोगों का दूर होते जाना है। हालांकि सभी पार्टियों और नेताओं को कठघरे में खड़ा करना न्यायोचित नहीं होगा किंतु अधिकांश की साख में कमी आई है , जो लोकतंत्र के लिए शुभ  संकेत नहीं है। चूंकि हमारा समाज काफी धैर्यवान है इसलिए अपनी उपेक्षा और बदहाली पर उत्तेजित नहीं होता। हर चुनाव के बाद लोकतंत्र की मजबूती और मतदाताओं की समझदारी का बखान तो खूब होता है किंतु  अधिक मतदान और चुनाव के निर्विघ्न संपन्न हो जाने को ही सफलता और संतोष का पैमाना माना लेना सच्चाई से आंखें चुराने जैसा है।

      भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भले हो किंतु वह अपनी नैसर्गिक खूबसूरती खोता जा रहा है। कृत्रिमता , बाजारवाद और नीतिगत भटकाव उसकी पहिचान बन चुके हैं। चुनावों के  लगातार महंगे होने से भी उनकी गंभीरता और गरिमा में कमी आई है। नेताओं के आकर्षण में कमी आने का ही सबूत है कि पहले उनको देखने - सुनने जनसैलाब उमड़ा करता था किंतु अब वही नेता रोड शो के माध्यम से खुद को दिखाते नजर आते हैं।


आलेख:- रवीन्द्र वाजपेयी