Wednesday, 3 December 2025

कांग्रेस हायकमान से न पार्टी संभल रही है और न ही गठबंधन

कर्नाटक में सिद्धारमैया मुख्यमंत्री रहेंगे या उनकी जगह डी. के. शिवकुमार को कांग्रेस गद्दीनशीन करेगी , ये सवाल बीते कुछ दिनों से राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। इसके पीछे वजह वह समझौता है जिसके अंतर्गत ढाई साल बाद सिद्धारमैया को हटाकर मुख्यमंत्री पद उपमुख्यमंत्री शिवकुमार को मिलना था। जैसे ही उक्त अवधि पूरी हुई शिवकुमार के समर्थक विधायकों ने दिल्ली में डेरा डालकर  हायकमान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। उल्लेखनीय है शिवकुमार कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं जिनका कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें हटाकर नया अध्यक्ष नियुक्त करने का साहस नहीं बटोर पा रहा। सर्वविदित है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाने में उनका काफी योगदान था। वे देश के सबसे धनी राजनेताओं में गिने जाते हैं।  भले ही इन दिनों उनकी और सिद्धारमैया की एक साथ नाश्ता करने की तस्वीरें समाचार माध्यमों में प्रकाशित हो रही हों और शिवकुमार उनके साथ मतभेदों का खंडन करते रहे हों किंतु दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे खुद भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे किंतु सिद्धारमैया बाजी मार ले गए। शिवकुमार भी मनमसोस कर रह गए। तब ढाई साल बाद उनकी ताजपोशी का वायदा कर उनको मना लिया गया। लेकिन वे मौका निकालकर मुख्यमंत्री को  परेशान करते रहे। हाल ही में उन्होंने रास्वसंघ की प्रार्थना नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे पढ़कर सबको चकित कर दिया क्योंकि उसी समय संघ के शताब्दी वर्ष आयोजन चल रहे थे। राजनीतिक पंडितों ने इसे शिवकुमार की बगावत का संकेत मानकर उनकी और भाजपा की नजदीकी का अंदाज लगाना शुरू कर दिया। हालांकि अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और शिवकुमार ने राहुल गाँधी या श्री खरगे के सामने   मुख्यमंत्री पद का दावा भी खुलकर नहीं रखा ।  लेकिन वे बिना कुछ कहे  अपने पांसे फेंकते जा रहे हैं। कर्नाटक की राजनीति क्या मोड़ लेगी ये कहना फिलहाल मुश्किल है क्योंकि सिद्धारमैया भी राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं जिन्होंने खरगे जी और शिवकुमार जैसे दिग्गजों को पीछे धकेलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली थी । ऐसा लगता है कांग्रेस हायकमान संसद के शीतकालीन सत्र के बाद ही इस विवाद को सुलझाने का प्रयास करेगी। अभी तक भाजपा ने शिवकुमार को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। राज्य में भाजपा का नेतृत्व उनके साथ सरकार बनाने को लेकर असमंजस में हैं क्योंकि पार्टी उनको भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में घेरती रही है। स्मरणीय है मनी लाउंड्रिंग के आरोप में उन्हें जेल में भी रहना पड़ा था। लेकिन भाजपा हायकमान की मौजूदा नीति किसी भी तरह कांग्रेस को कमजोर करने की है। ऐसे में  कांग्रेस से कर्नाटक की सत्ता छीन लेने का कोई मौका वह नहीं गँवाना चाहेगी। वैसे भी देवगौड़ा परिवार की जनता दल (एस) के साथ भाजपा का गठजोड़ है जो अनेक आरोपों में घिरा है। कर्नाटक के अलावा भाजपा ने झारखंड पर भी निगाहें गड़ा दी हैं। मुख्यमंत्री  हेमंत सोरेन की कुछ भाजपा नेताओं से हुई मुलाकात के बाद इस बात की अटकलें तेज हो गई हैं कि हेमंत इंडिया गठबंधन को अलविदा कहकर एनडीए की गोद में बैठने का मन बना चुके हैं जिसका बड़ा कारण चुनावी वायदे पूरे करने में आ रही धन की कमी है। बिहार विधानसभा चुनाव में हेमंत कुछ आदिवासी सीटें झामुमो के लिए  मांग रहे थे किंतु राहुल गाँधी और तेजस्वी  ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया जिसके कारण वे नाराज हैं।  भाजपा हायकमान मौके की तलाश कर ही रहा था। हेमंत के पिता शिबू सोरेन की मृत्यु पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार से हेमंत के पास पहुँचकर सांत्वना प्रदान की उसके बाद से ही झारखंड की सियासत में बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी। बिहार चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को ये लगने लगा है कि फिलहाल कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं है। इसलिए गठबंधन के प्रति उनका मोह भंग होने लगा है। यदि भाजपा ने हेमंत को तोड़ लिया  तब विपक्ष का एक और किला ढह जाएगा जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अन्य दलों पर पड़ना तय है। उमर अब्दुल्ला के हालिया बयान भी इंडिया गठबंधन से अलगाव का संकेत दे रहे हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस  हायकमान से न तो पार्टी संभल रही है और न ही गठबंधन। ऐसे में आने वाले कुछ महीने कांग्रेस के लिए काफी संकट भरे होंगे। बड़ी बात नहीं उसके भीतर ही कोई बड़ा विवाद खड़ा हो जाए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 2 December 2025

संसद में हंगामा कर अपना ही नुकसान कर रहा विपक्ष


सद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के पहले लोकसभाध्यक्ष द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सदन सुचारु रूप से चलाने के लिए आम सहमति बनी थी। प्रत्येक सत्र के पूर्व आयोजित होने वाली सर्वदलीय बैठक में ऐसा ही दिखाई देता है। और फिर  सदन के भीतर वही सब होता है जो मौजूदा सत्र में लगातार दूसरे दिन देखने मिला। विपक्ष मतदाता सूचियों के  एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण) पर तुरंत चर्चा की मांग पर अड़ा है जबकि सरकार का कहना है वह चर्चा हेतु तैयार है किंतु कब होगी इसके लिए दबाव स्वीकार नहीं है। हंगामे के कारण सदन स्थगित हो रहा है। वैसे भी ये सत्र काफी छोटा होता है। ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि विपक्ष  उपलब्ध समय का सदुपयोग करते हुए सरकार को घेरने की रणनीति बनाये। लेकिन विपक्ष की अगुआई कर रही कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चलने आमादा है। वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा लगाकर वह जिस मुद्दे को गर्माना चाह रही है उसकी हवा बिहार में निकल गई। राहुल गाँधी ने पूरे राज्य में यात्रा निकालकर एस. आई. आर के विरोध में जनमत बनाने का भरपूर प्रयास किया किंतु चुनाव में सबसे बुरी हालत कांग्रेस की ही हुई। वेसोचते थे कि बिहार में 40 लाख से ज्यादा नाम मतदाता सूचियों से कटने के बाद लाखों लोग सड़कों पर उतर आयेंगे । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। मतदान निर्विघ्न संपन्न होने के बाद सरकार बनने तक की समूची प्रक्रिया सुचारु रूप से संपन्न हो गई। जिन राज्यों में एस. आई. आर चल रहा है वहाँ  भी किसी बड़े विरोध की खबर नहीं आ रही। यहाँ तक कि प. बंगाल में ममता बैनर्जी के पुरजोर ऐतराज के बावजूद पुनरीक्षण जारी है।  मोदी विरोधी पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि वोट चोरी का मुद्दा कोई असर नहीं छोड़ सका क्योंकि इससे आम जनता को कोई नुकसान नहीं हो रहा। सर्वोच्च न्यायालय तक ने इसे रोकने से इंकार करते हुए चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करना जरूरी नहीं समझा। साथ ही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को जरूरी बता दिया। बेहतर होता विपक्षी नेता अपने कार्यकर्ताओं को इस कार्य में सहयोग करने का  निर्देश देते जिससे कि बाद में शिकायत की गुंजाइश न रहे। लेकिन ऐसा करने के बजाय देशव्यापी विरोध करने का फैसला किया गया जो नाकामयाब ही रहा। ये देखते हुए विपक्ष संसद में ऐसे मुद्दे उठाये जिनका जनता से सीधा सरोकार हो।  जनता से जुड़े ऐसे तमाम विषय हैं जिन पर विपक्ष की सक्रियता अपेक्षित है।  सरकार की जो विफलताएं हैं उन्हें उजागर करना विपक्ष का दायित्व है। संसद का सत्र इसके लिए सबसे सही अवसर होता है। लेकिन बीते अनेक वर्षों से देखने मिल रहा है कि विपक्ष किसी विशेष मुद्दे को पकड़कर पूरे सत्र में हंगामा करता रहता है। दूसरी ओर सरकार अपने सभी विधायी कार्य संसद से बिना बहस के मंजूर करवा लेती है। राहुल सहित अन्य विपक्षी नेताओं को ये बात समझनी चाहिए कि संसद  में हंगामा करने के कारण वे जन समर्थन खो रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद 6 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से चार पर एनडीए की बड़ी जीत हुई। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में कांग्रेस के साथ ही इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों को मतदाताओं ने जिस बुरी तरह ठुकराया वह इस बात का प्रमाण है कि वे जनता का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं हो पा रहे।  लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे जिम्मेदार ओहदे पर आने के बाद श्री गाँधी से जिस गंभीरता और दायित्वबोध की अपेक्षा थी वे उसे पूरा नहीं कर पा रहे। इसीलिये चुनावी हार का ठीकरा उनके सिर पर फूटना स्वाभविक भी है और सही भी। बिहार चुनाव में हुई फजीहत के बाद कांग्रेस ने जिस सतही ढंग से समीक्षा की उसके कारण उनकी नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने को लेकर चल रही खींचतान को रोकने में पार्टी हायकमान जिस तरह असहाय नजर आ रहा है उसके लिए भी श्री गाँधी की लापरवाही  जिम्मेदार है। वे खुद तो कोई निर्णय करते नहीं और दूसरा कोई करे ये भी उन्हें नागवार गुजरता है। इन्हीं वजहों से वे कांग्रेस पर बोझ बन चुके हैं। वोट चोरी के मुद्दे पर अभी तक उन्होंने जितने भी खुलासे किये उन्हें भले ही किसी बम का नाम दिया गया किंतु वे सब फुस्स निकले। लोकतंत्र में जनता की नब्ज और मिजाज को जानने वाला दल और नेता ही सफल होता है। भाजपा और नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके को गंभीरता से लेते हुए अपनी कमियाँ दूर कर विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया। वहीं राहुल और उनके सलाहकार 99 सीटों के फेर में फंसकर रह गए जिसका नतीजा कांग्रेस को  लगातार पराजयों के रूप में देखने मिला। उम्मीद थी कि बिहार चुनाव में हुई शर्मनाक हार से सबक लेते हुए श्री गाँधी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करेंगे किंतु संसद के मौजूदा सत्र की शुरुआत में ही उनका रवैया देखकर लग गया कि उन्होंने गलतियों को सुधारने की बजाय दोहराते जाने की कसम खा ली है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 December 2025

नक्सली आतंक आखिरी साँसें ले रहा

 केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक नक्सली आतंक के खात्मे का संकल्प लिया तब विपक्ष ने इसे  बड़बोलापन माना। लेकिन सरकार की चेतावनी के बाद भी नक्सलियों ने हथियार डालने से इंकार किया तब सुरक्षा बलों ने उनको घेरकर मारने का अभियान शुरू किया। छत्तीसगढ़, म.प्र, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के बड़े इलाकों में नक्सली आतंक के कारण जनजीवन त्रस्त हो चुका था। भोले - भाले आदिवासियों को धमकाकर हिंसा के अंधे रास्ते पर धकेलने का जो षडयंत्र चीन के इशारे पर सत्तर के दशक में प. बंगाल की नक्सलबाड़ी नामक स्थान में रचा गया वह योजनाबद्ध तरीके से अनेक राज्यों में फैलता गया। इसकी विशेषता ये रही कि घने जंगलों से घिरे आदिवासी बहुल क्षेत्रों को नक्सलियों ने अपना निशाना बनाया जो विकास की मुख्य धारा से कटे हुए थे। वहाँ सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव की वजह से गरीब आदिवासियों को भड़काने में चीन परस्त वामपंथी सफल हो गए। दूसरी खास बात ये रही कि नक्सलियों की ज्यादातर मौजूदगी खनिज संपदा संपन्न इलाकों में रही जो इनकी आय का स्रोत भी बन गए। नक्सलियों के पास आधुनिक हथियार और सैन्य प्रशिक्षण के पीछे भी चीन का हाथ सर्वविदित है। इनकी विचारधारा साम्यवादी क्रांति से प्रभावित है इसलिए संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास नहीं है। हालांकि साम्यवादी पार्टियां चुनाव लड़कर विधानसभा  और संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रही हैं। प. बंगाल , त्रिपुरा और केरल में तो वे सत्ता में भी रहीं। हालांकि अब उनकी पकड़ केवल केरल में ही बची है। देश के अन्य हिस्सों में श्रमिक संगठनों के जरिये जो साम्यवादी प्रभाव दिखता था वह भी उदारीकरण के बाद निर्मित परिस्थितियों में कमजोर होता गया। लेकिन शिक्षा, साहित्य, कला, पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में बैठे वामपंथी इस विचारधारा के पोषक बने रहे। कांग्रेस के शासन में इनको खूब महत्व मिलता रहा। इसी वर्ग को शहरी नक्सली कहा जाता है जो जंगलों में बैठे सशस्त्र नक्सलियों या माओवादियों को नैतिक समर्थन देता है। हाल ही में खूंखार नक्सली सरगना हिडमा को सुरक्षा बलों द्वारा मार गिराए जाने के बाद दिल्ली में जेएनयू नामक वामपंथियों के गढ़ के छात्रों द्वारा प्रदूषण के विरुद्ध  प्रदर्शन में अचानक  नारे लगने लगे कि हर घर से हिडमा निकलेगा। ऐसे ही नारे आतंकवादी अफजल गुरु की फांसी के बाद सुनाई दिये थे। हिडमा की मौत पर वरिष्ट  कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी जो बयानबाजी की वह भी बहुत कुछ कह गई। लेकिन इस सबसे प्रभावित हुए बिना श्री शाह ने नक्सलियों को हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित करने का प्रयास जारी रखा जिसके अनुकूल परिणाम भी आने लगे। नक्सलियों के परिवारजनों से अपील जारी करवाने का भी असर दिखा। जिन माओवादियों ने हथियार रखकर आत्मसमर्पण किया उनके पुनर्वास और कौशल विकास हेतु प्रशिक्षण का प्रबंध किये जाने से बड़ी संख्या में नक्सली मुख्य धारा में लौटने लगे। इसमें दो मत नहीं हैं कि इस आतंक को राजनीति और पुलिस का संरक्षण भी मिलता रहा। वामपंथी विचारधारा में रचे- बसे अनेक वरिष्ट नौकरशाह भी नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। इसीलिए आत्मसमर्पण का सिलसिला जारी रहने के बावजूद बड़े माओवादी नेता  मुख्यधारा में आने से इंकार करते रहे। लेकिन अचानक वातावरण  बदलने लगा। सुरक्षा बलों द्वारा बड़ी संख्या में उन माओवादी दिग्गजों का काम तमाम किया जाने लगा जिन पर करोड़ों रु. के इनाम थे। हिडमा इनमें सबसे बड़ा नाम है। इस सबसे वामपंथी दलों में घबराहट फैली जिसका प्रमाण उनके बयान उस बयान से मिला जिसमें नक्सलियों को मारने के अभियान को रोककर उनसे बातचीत करने की मांग सरकार से की गई। उसके कुछ दिनों बाद माओवादियों ने सरकार को खबर भेजी कि वे बातचीत हेतु राजी हैं किंतु गृहमंत्री श्री शाह ने दो  टूक कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से साम्यवादी विचारधारा का प्रचार करने में कोई ऐतराज नहीं है किंतु हथियारों के जोर पर इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। उनकी सख्त प्रतिक्रिया का असर लगातार हो रहे आत्मसमर्पण के रूप में देखने मिल रहा है।  यही स्थिति जारी रही तो बड़ी बात नहीं 31 मार्च 2026 के पूर्व ही माओवादियों के हौसले पस्त हो जाएं।  ध्यान देने लायक बात ये है कि जो नक्सली अपने विरोधी की नृशंस हत्या करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते वे अपनी जान खतरे में पड़ते ही हथियार डालने को दौड़े आ रहे हैं। दरअसल खूनी क्रांति के लिए बंदूक उठाकर जंगलों में फैले ये नक्सली कालांतर में अपराधी बन गए। आदिवसियों के हितों की रक्षा और जल, जंगल और जमीन के संरक्षक बनने  का इनका दावा महज दिखावा था। यही वजह है कि जैसे ही केंद्र सरकार ने उंगली टेढ़ी की तो इनकी कमर टूटने को आ गई। इस उपलब्धि का सबसे बड़ा लाभ नक्सल पीड़ित इलाकों में विकास की शुरुआत से होगी जिसमें वे रुकावट बने हुए थे। गृहमंत्री श्री शाह की प्रशंसा करनी होगी जो अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लगातार आकर सुरक्षा बलों का मार्गदर्शन करते रहे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 November 2025

10 फीसदी जीडीपी के लिए जीएसटी जैसे अन्य करों का बोझ भी कम हो


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  द्वारा की गई टैरिफ वृद्धि के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडराने की आशंका उत्पन्न हो गई थी। इसका असर शेयर बाजार पर भी नजर आने लगा। विदेशी निवेशक भी अपना धन निकालने लगे जिससे  उद्योग - व्यापार जगत में घबराहट फैलने लगी।  निर्यातकों को अपना भविष्य अंधकारमय दिखने लगा। रूस से तेल एवं अन्य चीजें न खरीदने के अमेरिकी दबाव को भारत द्वारा नजरंदाज करने से भन्नाये ट्रम्प नई - नई धमकी देने लगे। लेकिन भारत सरकार ने नये - नये बाजार खोजकर निर्यातकों को राहत देने का जो प्रयास किया उसके अनुकूल परिणाम देखने मिले। जब ट्रम्प को ये लगा कि भारत  व्यापार संधि में अमेरिका द्वारा लगाई जा रही शर्तों को मानने राजी नहीं हो रहा तब उन्होंने कुछ चीजों पर टैरिफ का बोझ कम करने की चाल चली किंतु डेरी उत्पादों सहित अनेक अमेरिकी वस्तुओं के  आयात पर भारत के साफ इंकार के कारण अभी तक नया  समझौता अंतिम रूप नहीं ले सका।   हालांकि जैसी खबर है अमेरिकी दबाव में रिलायंस सहित कुछ निजी कंपनियों ने रूसी तेल की खरीदी में कमी कर दी किंतु सरकारी स्तर पर यथास्थिति बनी हुई है। इस सबके बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4 दिसंबर को  भारत  आ रहे हैं। इस दौरान वे रक्षा सौदों के अलावा अन्य व्यापार समझौते भी करेंगे जिसमें तेल भी शामिल है। साथ ही भारतीय उपभोक्ता वस्तुओं के लिए रूसी बाजार खोलने सहित भारतीय प्रतिभाओं के लिए रूस के दरवाजे खोलने  का ऐलान भी करेंगे। पिछले कुछ दिनों से भारत के शेयर बाजार में रिकार्ड उछाल का कारण  भारत - अमेरिका व्यापार समझौते और यूक्रेन - रूस के बीच युद्ध विराम की संभावनाओं के अलावा पुतिन के भारत आने की पुष्टि होना भी है। लेकिन गत दिवस अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थिति की खबर आने के बाद ये स्पष्ट हो गया कि अमेरिकी दबाव का सफलतापूर्वक सामना करने में भारत सफल हो गया। मौजूदा वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी ( सकल घरेलू उत्पादन) की दर ने 8.2 प्रतिशत का आंकड़ा छूकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। इस वर्ष भारत की जीडीपी के जो अनुमान लगाए जा रहे हैं उनमें वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर उतार - चढ़ाव की आशंका व्यक्त की जा रही थी। अमेरिकी दबाव के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ने की आशंका भी जताई जाने लगी थी। लेकिन भारत सरकार ने जीएसटी सुधारों को लागू कर तमाम प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने की जो बुद्धिमत्ता दिखाई उसके चमत्कारिक परिणाम देखने मिले। हालांकि नई जीएसटी दरें दशहरा - दीपावली के पहले लागू होने का लाभ  उपभोक्ताओं को तो मिला ही, उद्योग - व्यापार जगत भी उससे लाभान्वित हुआ। इसके अलावा निर्यातकों को भी इस सुधार से राहत मिली। इन सबका समन्वित परिणाम ही जीडीपी में आई जबरदस्त उछाल के रूप में देखने मिला। हालांकि इस दर को बनाये रखना बड़ी चुनौती होगी क्योंकि आने वाले कुछ महीनों में वैश्विक समीकरण तेजी से बदलेंगे। रूस - यूक्रेन युद्ध रुकने के बाद यदि पुतिन और ट्रम्प करीब आये तब शीतयुद्ध के जो हालात बीते दो - तीन सालों में बने उनसे उत्पन्न तनाव कम होना संभव है और तब भारत को अपनी महत्वपूर्ण स्थिति बनाये रखने के बारे में सतर्क रहना होगा। ट्रम्प द्वारा शुरू किये गए टैरिफ युद्ध के कारण भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील और द. अफ्रीका ने ब्रिक्स जैसे मंच को ताकतवर बनाकर अमेरिकी प्रभुत्व को कमजोर करने की जो रणनीति बनाई वह अब तक कारगर साबित हुई है।  लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था में वृद्धि की रफ्तार इन सभी में अधिक होने से पूरी दुनिया की नजरें हम पर लगी हैं। लगभग सभी बड़े देश भारत के साथ व्यापार बढ़ाने उत्सुक हैं। वहीं प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी उत्पादन इकाइयाँ यहाँ लगाने को इच्छुक हैं। वित्तीय वर्ष 2025 - 26 की दूसरी तिमाही में जीडीपी का आंकड़ा उत्साह बढ़ाने वाला है। यदि केंद्र सरकार जीएसटी की तरह से ही अन्य करों के बोझ में भी कमी करे तो विकास की गति 10 फीसदी तक पहुँच सकती है जो 2047 में भारत को विकसित देश बनाने में सहायक साबित होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 28 November 2025

नीति और नेतृत्व दोनों के संकट से जूझ रही कांग्रेस


कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। आजादी के बाद तीन दशक तक वह  केन्द्र में सत्तारूढ़ रही। उसके बाद भी उसके नेतृत्व में सरकारें बनती रहीं। हालांकि 1984 के चुनाव के बाद उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु अन्य दलों के सहयोग से पहले पी. वी. नरसिम्हा राव और फिर डाॅ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उसकी सरकार चली। बीच - बीच में  कांग्रेस ने चंद्रशेखर, एच. डी. देवगौड़ा और इंदर कुमार गुजराल को भी प्रधानमंत्री बनवाया किंतु फिर बहाना बनाकर उन्हें हटवा भी दिया। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने से कांग्रेस को जबरदस्त झटका लगा। 1977 में भी कांग्रेस  उत्तर भारत में सफाये के बाद भी दक्षिण में लोकसभा की 154 सीटें जीत गई किंतु 2014 में तो 44 पर सिमट गई। वहीं 2019 में बमुश्किल 50 का आंकड़ा पार कर पाई। हालांकि 2024 में 99 सांसद जीतने के कारण राहुल गाँधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गए। यद्यपि ये उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना ये कि भाजपा 300 से उतरकर 240 पर आ गई जिससे नरेंद्र मोदी को नीतीश कुमार और चंद्रा बाबू नायडू रूपी बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा । बहरहाल जैसे - तैसे मोदी सरकार बन तो गई किंतु  राहुल के आक्रामक तेवरों से ऐसा लगने लगा जैसे वे इस सरकार को जल्द गिरवाने में सफल हो जाएंगे। नीतीश और नायडू के भी इधर - उधर होने की आशंका हर समय राजनीतिक माहौल में तैरती रही। लोकसभा चुनाव के झटके के बाद  भाजपा की चिंता बढ़ गई क्योंकि कुछ महीनों बाद हरियाणा, जम्मू - कश्मीर और उसके बाद महाराष्ट्र और झारखंड तथा  2025 में दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव रूपी चुनौती सामने थी। जम्मू - कश्मीर में 370 हटने के बाद विधानसभा का पहला चुनाव निश्चित तौर पर अग्निपरीक्षा थी। वहीं हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव का खराब प्रदर्शन प्रधानमंत्री और उनके चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की परेशानी बढ़ाने वाला था। दिल्ली में भाजपा को अरविंद केजरीवाल से दो विधानसभा चुनाव बुरी तरह हार चुकी थी जबकि बिहार में नीतीश उसके लिए अबूझ पहेली बने हुए थे। दूसरी तरफ कांग्रेस सतही तौर पर भारी नजर आ रही थी। राहुल के अलावा इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य दल भी उत्साह से भरे हुए थे। इस सबसे लगता था कांग्रेस के अच्छे दिन ज्यादा दूर नहीं हैं और श्री मोदी के विकल्प स्वरूप श्री गाँधी की स्वीकार्यता उठान पर है। लेकिन उक्त सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव  के बाद राजनीतिक स्थिति का आकलन करें तो भाजपा जहाँ लोकसभा चुनाव के बाद उत्पन्न हताशा से उबरकर विजय रथ पर सवार है वहीं कांग्रेस की साख और धाक लगातार गिरती गई। बिहार में मिली शर्मनाक पराजय के बाद तो ऐसा लगने लगा है मानो कांग्रेस  सोचने समझने की शक्ति ही खो चुकी है। इसका प्रमाण कर्नाटक की उसकी सरकार में चल रहा अंतर्द्वंद है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विरुद्ध उपमुख्यमंत्री डी. शिवकुमार सहित गृहमंत्री खुलकर मैदान में हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे इसी राज्य से होने के बाद भी ये कहकर अपनी दयनीय स्थिति उजागर कर  रहे हैं कि नेतृत्व का विवाद श्री गाँधी की उपस्थिति में सुलझाया जाएगा। लेकिन सवाल ये है कि इतने गम्भीर मसले पर पार्टी नेतृत्व द्वारा निर्णय करने में देर क्यों लगाई जा रही है ? ऐसी ही देरी पार्टी ने राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रहे झगड़े को निपटाने में लगाई थी जिसका दुष्परिणाम सामने है।? उसके पहले पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह की रस्साकाशी को समय पर नहीं रोकने के कारण राज्य में कांग्रेस की सत्ता और संगठन दोनों का नुकसान हुआ। और आम आदमी पार्टी के पैर जम गए। आगामी वर्ष भी पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा ने जहाँ बिहार से फुर्सत होते ही नये मुकाबलों के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी है जबकि कांग्रेस अभी तक पराजय के जमीनी कारणों का पता करने के बजाय वोट चोरी के आरोप से ही चिपकी हुई है। सोनिया गाँधी अस्वस्थ होने की वजह  से सक्रिय नहीं हैं। वहीं महासचिव होने के बाद भी प्रियंका वाड्रा की भूमिका समझ से परे है। कभी - कभी लगता है बीते डेढ़ साल में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन ने उनका उत्साह ठंडा कर दिया है। राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस के भीतर गाँधी परिवार के विरुद्ध जो असंतोष धधक रहा है वह ज्वालमुखी की तरह कभी भी फूट सकता है। प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव परिणाम के बाद भाजपा मुख्यालय में आयोजित समारोह में कांग्रेस के विभाजन का जो संकेत दिया वह चौंकाने वाला था किंतु दो सप्ताह बाद के हालात उसी दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। सही बात ये है कि आज कांग्रेस नीति और नेतृत्व दोनों ही दृष्टि से बेहद कमजोर नजर आ रही है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले चुनावी मुकाबलों में भी पराजय उसका पीछा नहीं छोड़ेगी । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 November 2025

केवल दिल्ली ही नहीं अपितु पूरे देश की हवा प्रदूषित है


देश  के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा दिल्ली में वायु प्रदूषण पर की गई यह टिप्पणी समाचार पत्रों में प्रथम पेज की खबर बन गई कि उन्हें शाम 55 मिनिट की सैर (वॉक) करने में तकलीफ होने लगी।  दिल्ली की हवा में प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर पहुँचने का हवाला देते हुए अदालत की कार्रवाई में ऑनलाइन भाग लेने की अनुमति मांगे जाने पर मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपनी आपबीती बताते हुए अधिवक्ता की बात से सहमति व्यक्त की। वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी वैसी ही मांग रखी तब श्री सूर्यकांत ने कहा कि राजधानी में वायु प्रदूषण से लोगों को सांस लेने में जो दिक्कत हो रही है उसके मद्देनजर वे बार एसोसियेशनों और न्यायाधीशों से चर्चा उपरांत अदालत की कार्रवाई ऑनलाइन मोड पर करने के बारे में जल्द निर्णय लेंगे। उल्लेखनीय है राष्ट्रीय राजधानी प्रतिवर्ष की तरह सर्दियाँ आते ही वायु प्रदूषण की गिरफ्त में आ जाती है। इस कारण एयर क्वालिटी का स्तर बहुत नीचे चला जाता है जिससे बाहर निकलने वालों को तो समस्या होती ही है घर में भी एयर प्यूरीफायर उपकरण लगाने पड़ते हैं। मुख्य न्यायाधीश भले ही सर्वोच्च और उच्च न्यायालय में अधिवक्ताओं को ऑनलाइन शामिल होने की सुविधा प्रदान कर दें किंतु निचली अदालतों में ऐसा करना संभव नहीं होगा। और उससे भी बड़ी बात ये है कि दिल्ली में रह रहे लोग क्या केवल अदालती कार्य के लिए घरों से बाहर निकलते हैं ? लाखों शासकीय और अशासकीय कर्मचारियों के अलावा बड़ी संख्या में प्रतिदिन बाहर से लोग सरकारी या निजी कार्य से दिल्ली आते हैं। यह महानगर व्यापार का भी बड़ा केंद्र है। उद्योग और निर्माण कार्यों में मजदूरी करने वाले तो रहते ही बेहद प्रदूषित जगहों पर हैं। उनके लिए घर पर बैठकर पेट पालन सम्भव नहीं। फिर स्कूल -  कालेज जाने वाले छोटे -  बड़े बच्चों के लिए भी बाहर निकलना मजबूरी है। कुल मिलाकर मुद्दा ये है कि हर साल उठने वाली इस समस्या का स्थायी समाधान खोजे बिना सभी तात्कालिक उपायों में उलझकर रह जाते हैं। दिल्ली चूँकि देश की राजधानी है इसलिए वहाँ होने वाली हर छोटी - बड़ी घटना सुर्खियां बन जाती है। जबकि वायु प्रदूषण  राष्ट्रीय समस्या में बन चुका है। छोटे  शहर तक इसकी चपेट में आ चुके हैं। इसका एक कारण किसानों द्वारा खेतों में फसल कटाई के बाद पराली जलाने से उत्पन्न धुएँ को बताया जाता है। अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने पंजाब और हरियाणा के किसानों को दिल्ली के वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार बताया। उनके राज में ऑड - ईवन नामक प्रयोग करके भी देखा गया जिसके अंतर्गत एक दिन सम और एक  दिन विषम नम्बर के वाहन चले। लोगों से पूल बनाकर एक ही वाहन से आने - जाने की अपील भी की गई। लेकिन वह सफल नहीं हुआ।  पंजाब में भी आम आदमी की सरकार बन जाने के बाद अब श्री केजरीवाल पराली की चर्चा नहीं करते।  दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनाव में यमुना की स्वच्छता एक बड़े मुद्दे के बतौर पर चर्चा में रही ।  भाजपा ने केजरीवाल सरकार को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा किया कि वह 10 साल में यमुना को स्वच्छ करने का वायदा पूरा नहीं कर सकी। चूंकि राजधानी में बड़ी संख्या में बसे उ.प्र और बिहार के लोग यमुना के बेहद दूषित जल में छठ पूजा करते थे इसलिए उन्होंने भाजपा के आरोप का संज्ञान लिया। सत्ता में आने के बाद भाजपा ने यमुना को स्वच्छ बनाने का अभियान शुरू किया जिसके परिणामस्वरूप इस बार छठ पर यमुना में झाग की बजाय साफ जल दिखाई दिया। लेकिन ले - देकर बात वही है कि राजधानी होने से सारा ध्यान दिल्ली तक ही सीमित रह जाता है जबकि कमोबेश, पूरे देश में पर्यावरण और प्रदूषण की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को बाहर टहलने पर वायु प्रदूषण ने परेशान किया और अधिवक्ताओं को अदालत आते - जाते साँस लेने में तकलीफ होने लगी तो अदालत की कार्रवाई ऑन लाइन किये जाने पर विचार होने लगा किंतु इतने बड़े देश के बारे में सोचें तब इस तरह की व्यवस्थाओं से समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता। दिल्ली में सीएनजी वाहन और मेट्रो ट्रेन चलने के बाद वाहनों से निकलने वाले धुएं से होने वाला प्रदूषण कुछ कम होने की जो उम्मीद थी वह वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण धूमिल हो गई। एक विशेषज्ञ के अनुसार राजधानी में बड़े पैमाने पर चल रहे निर्माण कार्य भी वायु प्रदूषण बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं। ताजा खबरों के अनुसार मुंबई में भी ये समस्या दस्तक देने लगी है। ऐसे में इस बात की आवश्यकता है कि वायु प्रदूषण को रोकने के लिए किये जाने वाले उपायों को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ लागू किया जाए। राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन जैसा कोई अभियान देश भर में प्रारंभ करते हुए जनता की भागीदारी से प्रदूषण मुक्त भारत का संकल्प लेना होगा। भले ही ये काम कठिन लगता हो किंतु एक बार लोगों को इसका लाभ समझ में आ गया तो बड़ी बात नहीं आगामी कुछ वर्षों के भीतर ही भारत में हर नागरिक को जहरीली हवा में सांस लेने से मुक्ति मिल सकेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 26 November 2025

ट्रम्प का शांति प्रस्ताव अमेरिका के दोगलेपन का परिचायक



डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि  वे  अनेक युद्ध रुकवा चुके हैं। हालांकि उनकी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता क्योंकि शांति स्थापना के उनके प्रयास धमकी भरे होते हैं। आर्थिक प्रतिबंध थोपकर वे पूरी दुनिया को अपनी मर्जी से हाँकना चाहते हैं । उनकी ताजा मुहिम यूक्रेन और रूस के बीच  युद्ध को रोकने की है। वैसे तो इसकी शुरुआत फरवरी  2022 में हुई किंतु रूस द्वारा 2014 में क्रीमिया नामक यूक्रेनी बंदरगाह पर बलात कब्जा करने के बाद से ही दोनों के बीच तनाव बना हुआ था। इस लड़ाई में कसूर किसका है ये तय कर पाना कठिन है क्योंकि एक तरफ तो रूसी राष्ट्रपति पुतिन की विस्तारवादी सोच है दूसरी ओर यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की की कूटनीतिक अपरिपक्वता ने स्थिति को इतना बिगाड़ दिया। दरअसल रूस द्वारा  क्रीमिया पर कब्जा करने का वैसा विरोध नहीं हुआ जैसा जरूरी था। वैसे रूस ये दुस्साहस कभी नहीं करता यदि सोवियत संघ से आजाद होने के बाद 1996 में यूक्रेन ने अपने सभी परमाणु हथियार रूस को न सौंपे होते जिसके बदले उसे आर्थिक मुआवजे के अलावा सुरक्षा का आश्वासन भी मिला। बाद में वह परमाणु अप्रसार संधि में भी शामिल हो गया। लेकिन क्रीमिया पर रूस  के कब्जे  बाद उसे अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी और तब उसने अमेरिकी प्रभुत्व वाले नाटो नामक संगठन की सदस्यता के लिए कदम बढ़ाये। ऐसा होने पर अमेरिकी फ़ौजें तथा मिसाइलें यूक्रेन - रूस सीमा पर तैनात हो जातीं। पुतिन को ये किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं था। उधर क्रीमिया हाथ से निकलने के बाद यूक्रेन कोई खतरा उठाने से बच रहा था । उसकी चिंता तब और बढ़ गई जब रूस ने उसके कुछ सीमावर्ती राज्यों पर दावा किया जहाँ रूसी भाषी लोग रहते हैं। इसके पहले कि  उसे नाटो की सदस्यता हासिल होती पुतिन ने अपनी फ़ौजें यूक्रेन में प्रविष्ट करवा दीं। हालांकि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के अलावा यूरोप के तमाम देशों ने यूक्रेन को आर्थिक और सामरिक सहायता देकर मुकाबले में तो खड़ा कर दिया किंतु रूस जैसी महाशक्ति से उधार के पैसे और खैरात के हथियारों से  जीत पाना लगभग असंभव था और वही हुआ। बीते 45 महीनों  में यूक्रेन ने बेशक बहादुरी दिखाई और बीच - बीच में रूस पर घातक हमले कर काफी नुकसान भी पहुंचाया किंतु रूस ने जो कहर बरपाया उसने यूक्रेन को तबाह कर दिया।  आज यदि युद्ध रुक  जाए तब भी इस खूबसूरत देश को पुरानी स्थिति में लौटने में कई दशक लग जाएंगे। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये है कि उसके लिए आर्थिक संसाधन कहां से आयेंगे ? हालांकि जंग रोकना जितना यूक्रेन के लिए जरूरी है उतना  रूस के लिए भी क्योंकि ट्रम्प द्वारा उसके  साथ व्यापार करने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर भी अनाप - शनाप टैरिफ थोप दिये गए । इस लड़ाई से वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता में फंस गई है। वहीं कूटनीतिक मोर्चे पर भी शीत युद्ध वाला माहौल नजर आने लगा जिससे कई मर्तबा विश्व युद्ध  के आसार भी नजर आये। लेकिन ट्रम्प ने जो ताजा शांति प्रस्ताव रखा है उसे यूक्रेन यदि स्वीकार कर लेता है तब वह हर दृष्टि से नुकसान में रहेगा। रूस द्वारा कब्जाई अपनी 20 फीसदी भूमि उसे सौंपने के साथ ही क्रीमिया पर उसके आधिपत्य को मान्यता देने के लिए सहमत होना जेलेंस्की क्या किसी के लिए भी जहर का घूँट पीने जैसा होगा। इसके अलावा सेना की सीमित संख्या, लंबी दूरी तक मार करने वाले अस्त्रों पर प्रतिबंध, नाटो की सदस्यता लेने पर रोक सहित जो प्रावधान ट्रम्प के शांति प्रस्ताव में हैं उन्हें सतही तौर पर देखने पर तो लगता है जैसे उनका प्रारूप उन्होंने पुतिन के साथ बैठकर बनाया हो। ट्रम्प जिस तरह जेलेंस्की पर उक्त शर्तों को स्वीकार करने का दबाव बना रहे हैं वह भी अजीबोगरीब है क्योंकि ऐसी बातें बैठकर तय होती हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति शुरू से कहते आ रहे हैं कि अमेरिका उन्हें और पुतिन को आमने - सामने बिठाये।  ट्रम्प शांति को जिस तरह थोपना चाह रहे हैं उससे यूरोपीय देशों में भी हड़कंप है। उन्हें चिंता है यूक्रेन का बड़ा हिस्सा हड़पने में सफल होने के बाद पुतिन अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करेंगे। इसीलिए ज्यादातर यूरोपीय देश इस शांति प्रस्ताव के विरोध में खड़े होकर यूक्रेन को हरसंभव सहायता देते रहने का आश्वासन दे रहे हैं। चौंकाने वाली बात ये भी है कि ट्रम्प की इस पहल पर रूस ने किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया अब तक नहीं दी। इससे लगता है अमेरिकी राष्ट्रपति जबरन श्रेय लूटने में लगे हैं। सही बात तो ये है कि यूक्रेन की दयनीय और जेलेंस्की की हास्यास्पद स्थिति बनाने में सबसे अधिक कसूर अमेरिका का ही है जिसने यूक्रेन को पहले तो रूस से भिड़ने के लिए उकसा दिया और जब वह बुरी तरह फंस गया तब बजाय सहारा देने के उसे दुत्कारने लगा। उसके इस आचरण पर उसके पूर्व विदेशमंत्री हेनरी किसिंजर का ये कथन सटीक बैठता है कि अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक है।

- रवीन्द्र वाजपेयी