Monday, 8 December 2025

बालाघाट में नक्सलियों का आत्म समर्पण शुभ संकेत



म.प्र  के बालाघाट में 12 नक्सलियों का आत्म समर्पण शुभ संकेत है। हाल ही में इसी जिले में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में एक युवा पुलिस इंस्पेक्टर जान से हाथ धो बैठा था।  खनिज संपदा से संपन्न बालाघाट जिला नक्सलियों की गतिविधियों का बहुत पुराना गढ़ रहा है  अतीत में उनके द्वारा कई नेताओं की भी हत्या  की जा चुकी है । समीपवर्ती कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में भी उनकी आवाजाही रही। सर्वविदित है नक्सलियों की गतिविधियाँ मुख्य रूप से खनिज और वन्य संपदा संपन्न क्षेत्रों में ही देखी जाती हैं। इसके अलावा वे राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाते रहे हैं जिससे कि एक में वारदात कर दूसरे में भाग सकें। बालाघाट जिले की सीमाएं भी छत्तीससगढ़ और महाराष्ट्र से मिलती हैं। इसीलिए म.प्र का यह जिला उनको रास आता रहा। इसके अलावा निकटवर्ती मंडला  भी आदिवासी बहुल और वन्य संपदा संपन्न होने से नक्सलियों की पसंद बना रहा किंतु उनका आतंक ज्यादातर बालाघाट जिले में ही है। इसमें भी दो राय नहीं है कि जिस तरह चंबल संभाग में डकैत समस्या को समाज और शासन - प्रशासन से जुड़े कुछ तबके खाद -पानी देते थे लगभग वही स्थिति नक्सलियों के साथ भी है। उनके मुखबिर पुलिस की गतिविधियों की जानकारी उन तक पहुंचाते रहे हैं। इसी तरह खनिज व्यवसायियों से की जाने वाली वसूली भी बिचौलियों के जरिये ही होती है। यद्यपि बालाघाट में नक्सलियों का जाल छत्तीसगढ़ जैसा बड़ा और मजबूत तो नहीं बन पाया किंतु उनका आतंक पूरी तरह महसूस किया जा सकता था। म.प्र में नक्सली आतंक से निपटने के लिए पुलिस विभाग ने विशेष व्यवस्था कर रखी थी। इसीलिए बीते कुछ वर्षों में प्रदेश में कोई बड़ी वारदात तो नहीं कर सके किंतु उनका डर लोगों के मन - मस्तिष्क पर हावी था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक नक्सल समस्या के खात्मे का जो संकल्प लिया गया उसके कारण बीते कुछ महीनों से विभिन्न राज्यों में सक्रिय नक्सली गुटों में जो दहशत है उसका प्रमाण बड़ी संख्या में उनके हथियार डालने से मिल रहा है। हिडमा नामक बड़े नक्सली के अलावा अन्य के मारे जाने से नक्सलवादियों के संगठन कमजोर होने लगे हैं। यही वजह है कि आये दिन नक्सलियों द्वारा हथियार डालकर मुख्य धारा में शामिल होने के समाचार मिल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी नक्सलियों द्वारा लगातार आत्म समर्पण किये जाने से लगता है केंद्र सरकार द्वारा तय की गई समय सीमा के भीतर ही उनके आतंक से देश को मुक्ति मिल जायेगी। यदि ऐसा हुआ तो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बना हुआ बड़ा खतरा समाप्त होने के साथ ही आदिवासी बहुल देश के बड़े हिस्से में विकास की गंगा बहने का शुभारंभ भी सकेगा। ये बात सही है कि यदि शासन चाह ले तो आतंकी और अपराधी की कमर तो़ड़ना असम्भव नहीं होता। डाकू समस्या का उन्मूलन भी तभी हो सका जब दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ प्रयास किये गए। जब म.प्र, उ.प्र और राजस्थान में फैले डाकुओं को लगा कि उनके लिए जान बचाना कठिन है तब उन्होंने हथियार रखकर समाज के साथ जुड़ने की अकलमंदी दिखाई। लेकिन उनमें और नक्सलियों में सबसे बड़ा बुनियादी फर्क ये है कि डकैतों की कोई  विचारधारा नहीं थी। वे सामाजिक शोषण  , अत्याचार अथवा सामान्य अपराधी मानसिकता से ग्रसित होकर हथियार उठाते थे। लेकिन नक्सलियों की पीठ पर चीन पोषित माओवादी विचारधारा का हाथ है जिसका उद्देश्य भारत में खूनी क्रांति के जरिये साम्यवादी शासन व्यवस्था कायम करना है। आदिवासियों का उत्थान और वन संपदा के संरक्षण जैसे उनके नारे महज दिखावा हैं। ये बात प्रमाणित हो चुकी है कि अपने को गरीबों और शोषितों का मसीहा कहने वाले नक्सली उनके सबसे बड़े दुश्मन साबित हुए जिन्होंने उनके विकास के रास्ते अवरुद्ध कर दिये। यदि नक्सली आतंक न होता तब प. बंगाल,बिहार, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और म.प्र. के आदिवासी इलाकों में विकास का सूर्योदय हो चुका होता। उस दृष्टि से श्री शाह ने जो दृढ़ संकल्प लिया वह राष्ट्रहित के साथ आदिवासियों के जीवन को संवारने की दिशा में बड़ा कदम है। बालाघाट में हुए नक्सली आत्म समर्पण के लिए  म.प्र की मोहन  यादव सरकार भी बधाई की पात्र है। उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले कुछ महीनों में म.प्र भी नक्सली आतंक से मुक्त हो जाएगा।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 December 2025

लूट खसोट करने वाली एयरलाइनों पर भी कारवाई होना चाहिए


देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो की सेवाएं अवरुद्ध हो जाने से  लाखों यात्रियों को अकल्पनीय  मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानियों से गुजरना पड़ा । हजारों उड़ानें रद्द होने से जो अफरातफरी मची उसके दृश्य और समाचारों ने हर जिम्मेदार व्यक्ति को चिंता में डाल दिया। इस संकट के लिए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन नामक नये नियम को जिम्मेदार बताया जा रहा है जिसके तहत विमान चालक पायलटों को अवकाश और आराम की व्यवस्था है। ये नियम 1 नवंबर से लागू है जिसे बाकी एयरलाइनों ने तो लागू कर लिया किंतु सबसे अधिक विमान और उड़ानों की संख्या चूंकि इंडिगो की है लिहाजा उसे पायलटों  की कमी से जूझना पड़ा जिसका परिणाम उड़ानें रद्द होने के तौर पर दिखाई देने लगा। नवंबर माह से शुरू संकट दिसंबर आते - आते  भीषण रूप ले बैठा और फिर जो हुआ वह देश में हवाई सेवाओं के इतिहास का सबसे खराब अनुभव है। इससे यात्रियों को हुई दिक्कतों की जानकारी तो सर्वविदित है किंतु संकट के इस दौर में बाकी एयरलाइनों ने जो लूट - खसोट की उसे न रोक पाना भी कम असफलता नहीं है। यात्रियों की मजबूरी का लाभ उठाकर दस - बीस गुना किराया वसूलना मानवीयता और नैतिकता के सर्वथा विरुद्ध है। सरकार ने नियम पालन में विफल रहने के लिए इंडिगो पर कार्रवाई करने की जो बात कही वह पूरी तरह उचित है। फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन नामक व्यवस्था लागू करने के लिए फरवरी तक की  मोहलत यात्रियों को हुई परेशानी दूर करने के लिए मजबूरी में दी गई किंतु इस अभूतपूर्व संकट के समय जिन एयरलाइनों ने किराये के नाम पर यात्रियों की जेब पर डाका डालने जैसा टुच्चापन दिखाया उनके विरुद्ध भी सख्त कदम उठाये जाने चाहिए जिससे यात्रियों की जरूरतों का लाभ उठाकर मनमाना किराये की लूटमार रोकी जा सके। इंडिगो ही नहीं अन्य एयरलाइनों में भी पायलटों से निर्धारित नियमों से अधिक काम लिया जाता है। ज्यादा कमाई के लालच में निर्धारित क्षमता से अधिक फेरे लगाने के कारण पायलटों की कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ता है। इसी वजह से आये दिन हादसे होते - होते बचते हैं जिनमें यात्रियों की जान के लिए जोखिम उत्पन्न होता है। विमान के पायलट का काम बेहद महत्वपूर्ण होता है। उसकी जरा सी गलती से सैकड़ों यात्रियों की ज़िंदगी खत्म हो सकती है। इसीलिए ये आवश्यक है कि उससे जरूरत से अधिक काम न लिया जाए क्योंकि वह आम कर्मचारी नहीं है। बहरहाल इंडिगो कांड के बाद उड्डयन संबंधी नियमों का कड़ाई से पालन करवाने की अचूक व्यवस्था के अलावा किरायों की अधिकतम सीमा भी तय होना चाहिए क्योंकि जब उपभोक्ताओं की मजबूरी का लाभ उठाकर कालाबाजारी करने वाला आम व्यवसायी कानून की नजर में अपराधी है तब एयरलाइनों  को ऐसा करने की खुली छूट देने का औचित्य क्या है ? इस बारे में ये बात ध्यान देने योग्य है कि अब हवाई यात्रा केवल धनाड्य वर्ग और नेताओं तक सीमित नहीं रही अपितु मध्यमवर्ग में इसका उपयोग करने का चलन बढ़ा है। इसे देखते हुए एयरलाइनों ने हवाई यात्रा को सस्ता बनाने के लिए आरामदेह सीटें हटाकर साधारण सीटें लगाने के अलावा खान - पान तक पर पाबंदी लगा दी। पानी तक मांगने पर प्रदान किया जाता है। लेकिन किरायों को लेकर होने वाली लूट - खसोट बढ़ती जा रही है। अनेक बार सर्वोच्च न्यायालय तक इस बारे में ऐतराज दर्ज करवा चुका है किंतु इस गोरखधंधे पर रोक लगने के बजाय वह बढ़ता ही जा रहा है। इंडिगो की सेवाएं रुक जाने से जो यात्री अग्रिम भुगतान करने के बावजूद यात्रा से वंचित हो गये उनके पैसे तत्काल लौटाने का दबाव जिस प्रकार सरकार बना रही है उसी तरह उन एयरलाइनों को भी लूटा गया अतिरिक्त किराया लौटाने मजबूर किया जाए जिन्होंने  बेहद असंवेदनशील रवैया दिखाकर यात्रियों का शोषण किया। इसके अलावा देश में बढ़ते उड्डयन व्यवसाय को देखते हुए बड़े पैमाने पर पायलट तैयार करने की कार्ययोजना भी बनाई जाए।  उल्लेखनीय है  अनेक एयरलाइन विदेशी पायलटों की सेवाएं ले रही हैं। इंडिगो को फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन संबंधी नये नियम लागू करने के लिए कुछ महीनों की छूट दिये जाने का कारण भी पायलटों की कमी ही है जिसे दूर करने में कई माह लग जाएंगे। बीते कुछ दिनों में जो पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न हुई उसके लिए जिम्मेदार लोगों को समुचित दंड मिलना जरूरी है। इंडिगो देश की सबसे बड़ी एयरलाइन होने के साथ ही समयबद्धता के लिए भी जानी जाती है। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि वह नियम कानूनों से ऊपर है। उसे भी समय रहते सरकार द्वारा लागू नये नियम का पालन निर्धारित समय सीमा में करना चाहिए था जिसमें असफल रहकर उसने लाखों यात्रियों को हलाकान कर डाला। इस संकट से सरकार को भी सबक लेना चाहिए जिससे ऐसी स्थिति दोबारा न उत्पन्न हो क्योंकि इससे देश की प्रतिष्ठा पर भी आंच आई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 December 2025

भारत और रूस दोनों को एक दूसरे की जरूरत है


रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक राजनीति में उथलपुथल मची हुई है। यूक्रेन और रूस के बीच चले आ रहे युद्ध ने पूरी दुनिया को दो धड़ों में बाँट दिया है। हालांकि सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने साम्यवादी विचारधारा पर आधारित सामाजिक आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को तिलांजलि दे दी। इसकी वजह से अमेरिका और यूरोप के साथ उसके व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते काफी सुधरे।  इसका एक कारण ये भी है कि सोवियत संघ का विखंडन अमेरिका की दूरगामी योजना का ही हिस्सा था। विश्व व्यापार संगठन के प्रादुर्भाव के बाद अर्थव्यवस्था का जो वैश्वीकरण हुआ उसने पूरी दुनिया को बड़े बाजार में तब्दील कर दिया। रूस ही नहीं बल्कि साम्यवाद की कट्टरता के पक्षधर चीन तक ने  उदारवादी आर्थिक नीतियों को अंगीकार कर लिया। इसमें दो मत नहीं  कि बीते तीन दशक में चीन  दोध्रुवीय दुनिया की व्यवस्था को बदलकर अमेरिका तथा रूस की टक्कर में आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक शक्ति बन  बैठा। उसके साथ ही भारत ने भी  विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का बीड़ा उठाते हुए सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का गौरव हासिल कर लिया जिससे दुनिया के ताकतवर देशों के किसी भी जमावड़े में भारत की मौजूदगी अनिवार्य बन गई है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी खुद को स्थापित किया और यही वजह है कि सभी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वे प्रभाव छोड़ देते हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा इसका प्रमाण है। यूक्रेन युद्ध के पहले से ही दोनों के बीच काफी मधुर संबंध विकसित हो चुके थे। इसीलिए  उस युद्ध के शुरू होने के बाद  भारत ने अमेरिकी दबाव को दरकिनार करते हुए तटस्थता का रास्ता चुना। यद्यपि परोक्ष रूप से ये नीति रूस का समर्थन थी क्योंकि अमेरिका सहित समूचे यूरोप ने  पर कठोर प्रतिबंध लगाकर उसके साथ व्यापारिक रिश्ते खत्म कर दिये ।  इसका उद्देश्य रूस की आर्थिक कमर तोड़ना था ताकि वह युद्ध को लंबा न खींच सके। लेकिन तब भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदकर उसे जबरदस्त सहारा दिया। हालांकि उस खरीद से हमको  भी बड़ा लाभ हुआ क्योंकि रूस ने भारत को रूपये में भुगतान की सुविधा प्रदान की। लेकिन इसकी वजह से भारत को अमेरिकी नाराजगी झेलनी पड़ी । डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनते ही टैरिफ नामक हथियार का प्रयोग करते हुए रूस से व्यापारिक रिश्ते तोड़ने का दबाव बनाया। लेकिन श्री मोदी ने उसके सामने झुकने से इंकार करते हुए रूस से रिश्ते और मजबूत करने का संकेत दिया। ट्रम्प को यह नागवार गुजरा और वे भारत को परेशान करने नये - नये तरीके अपनाने लगे। लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। दूसरी तरफ  पुतिन  भारत के प्रति अपना दोस्ताना जाहिर करने में आगे - आगे रहे। चीन में हुई एस.सी.ओ ( शंघाई सहयोग संगठन) की बैठक में उन्होंने श्री मोदी को अपनी कार में बिठाकर पूरी दुनिया को संदेश दे दिया। गत दिवस उनके नई दिल्ली आगमन पर श्री मोदी ने भी उनको अपने वाहन में बिठाकर ट्रम्प को बता दिया कि भारत उनकी धौंस से अप्रभावित है। पुतिन की इस यात्रा में रक्षा क्षेत्र में बड़े सौदों के अलावा काफी ऐसे समझौते हो रहे हैं जिनसे द्विपक्षीय व्यापार में और वृद्धि होगी। एक दूसरे के सैन्य क्षेत्र का उपयोग करने के बारे में जो सहमति बनने की खबर है वह इस उपमहाद्वीप के शक्ति संतुलन को गहराई तक प्रभावित करेगी। पुतिन की इस यात्रा को विश्व मीडिया ने जिस तरह बढ़ - चढ़कर प्रचारित किया उससे इसका महत्व  साबित हो गया है। रूसी राष्ट्रपति ने नई दिल्ली आकर श्री मोदी के बारे में जो कुछ कहा उससे डोनाल्ड ट्रम्प निश्चित तौर पर भन्नाए होंगे किंतु भारत ने सदैव इस बात पर जोर दिया है कि वह अपने हितों को ध्यान रखकर ही अपनी विदेश और व्यापार नीतियां तय करेगा और किसी का दबाव उसे स्वीकार नहीं है। श्री मोदी और पुतिन के बीच की आपसी समझ का दिन ब दिन  मजबूत होना दोनों के लिए शुभ संकेत है। सबसे बड़ी बात  ये है कि अमेरिका भारत विरोधी रुख पर आमादा है तो रूस जैसी महाशक्ति खुलकर हमारे साथ है। पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका जहाँ खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आया वहीं चीन ने दबी जुबान ही सही किंतु उसके प्रति हमदर्दी दिखाई । इन दोनों महाशक्तियों द्वारा भारत के जन्मजात दुश्मन की पीठ पर हाथ रखने के बाद भी भारत विचलित नहीं हुआ तो उसका बड़ा कारण रूस का ठोस समर्थन ही था। इस यात्रा से श्री मोदी और पुतिन की नजदीकी और बढ़ेगी। इस संबंध में ये बात ध्यान रखने वाली है कि जितनी जरुरत आज भारत को रूस के समर्थन, सहयोग और संरक्षण की है उतनी ही रूस को भी भारत का साथ आवश्यक है। महाशक्ति होने के बाद भी पुतिन विश्व समुदाय में अकेले पड़ते जा रहे थे किंतु श्री मोदी जैसे दिग्गज नेता के साथ  जुगलबंदी से उन्हें हाशिये पर धकेलने की अमेरिकी कूटनीति अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पा रही। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 4 December 2025

मुख्य न्यायाधीश द्वारा घुसपैठिये को शरणार्थी मानने से इंकार

देश के मुख्य न्यायाधीश श्री  सूर्यकांत द्वारा विगत दिनों रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर जो टिप्पणी की गई वह उस लोगों के गाल पर जोरदार तमाचा है जो मानवीय आधार पर उन्हें शरण देने की वकालत किया करते हैं। मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ के समक्ष जब एक  याचिकाकर्ता की वकील ने रोहिंग्या मुस्लिमों को शरणार्थी कहा तब  मुख्य न्यायाधीश ने पूछा- भारत सरकार का कौन-सा आदेश है जो उन्हें शरणार्थी घोषित करता है ।अगर उनके पास भारत में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है और वे घुसपैठिए हैं, तो क्या हम लाल कालीन बिछाकर उनका स्वागत करें? उक्त याचिका में 3 रोहिंग्या घुसपैठियों की गिरफ्तारी के बाद उनके निर्वासन के लिए कानूनी प्रक्रिया के पालन की मांग की गई थी। इस पर श्री सूर्यकांत ने तीखे शब्दों में कहा कि सुरंग खोदकर या बाड़ काटकर अवैध रूप से भारत में दाखिल होने के बाद वे कहते हैं कि अब  भारत के कानूनों के मुताबिक  उन्हें भोजन , आवास का स्थान और  बच्चों को शिक्षा मिलना चाहिए। वे  यहाँ तक बोल गए  कि देश में पहले से करोड़ों गरीब  हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश द्वारा  घुसपैठियों को शरणार्थी मानकर भारत के नागरिकों जैसी सुविधाओं देने पर ऐतराज जताये जाने के बाद  सवाल उठ खड़ा होता है कि उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखने की वकालत करने वाले क्या अपना नजरिया बदलेंगे या देश पर बोझ बने घुसपैठियों की आवभगत करते रहेंगे जो  आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा बने हुए हैं। श्री सूर्यकांत के इस सवाल के निहितार्थ को समझा जाना चाहिए कि क्या हम उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत करें ? देश में इन दिनों मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है। इसके जरिये उन मतदाताओं के नाम तो अलग किये ही जा रहे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जिनके नाम एक से अधिक स्थानों की सूचियों में दर्ज हैं। लेकिन इससे भी बढ़कर यह अभियान उन लोगों को मताधिकार से वंचित करने पर केंद्रित है जिन्होंने व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार का लाभ उठाकर आधार कार्ड जैसा दस्तावेज बनवाकर   मुफ्त राशन, चिकित्सा , रसोई गैस और आवास जैसी शासकीय  योजनाओं का लाभ उठाने की पात्रता तो हासिल कर ही ली किंतु उससे भी बढ़कर मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाकर निर्वाचन प्रक्रिया में भी हिस्सेदार बन बैठे। देश में इस अभियान का विरोध करने वाले राजनीतिक दल और उनके नेतागण आरोप लगा रहे हैं कि  पुनरीक्षण का असली उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटना है । लेकिन जिस बिहार से इस कार्य की शुरुआत हुई, वहाँ विधानसभा चुनाव के पहले 40 लाख से अधिक नाम काटे गए किंतु इक्का - दुक्का मुसलमान ने ही शिकायत की होगी । जाहिर है अवैध रूप से बसे विदेशी भी उन लोगों में शामिल होंगे जिनका नाम अलग हुआ। फिलहाल मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर सबसे ज्यादा विवाद प. बंगाल में है । पहले वामपंथी और फिर ममता बैनर्जी के शासनकाल में यहाँ  मुस्लिम आबादी जिस तेजी से बढ़ी उसका कारण घुसपैठिये ही हैं। प्रसिद्ध टीवी पत्रकार राजीव रंजन ने हालिया दौरे के बाद अपने साक्षात्कार में खुलकर कहा कि प. बंगाल में मुस्लिम आबादी 40 फीसदी हो चुकी है जो  राजनीतिक संतुलन को अपनी मर्जी से बनाने -  बिगाड़ने की ताकत रखती है। उन्होंने कुछ जिलों का जिक्र करते हुए बताया कि पूरे रास्ते भर  जितनी भी दुकानें नजर आईं वे सभी मुस्लिमों की थीं । उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बांग्लादेश की सीमा से सटे जिलों में तो मुस्लिम आबादी शत प्रतिशत  हो गई है।  धार्मिक ध्रुवीकरण का उदाहरण देते हुए श्री रंजन ने स्पष्ट किया कि  राज्य की बहरामपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी 1999 से जीत रहे थे। लेकिन 2024 के चुनाव में ममता बैनर्जी ने गुजरात के क्रिकेटर यूसुफ  पठान को लड़वाकर उन्हें  हरवा दिया। मुस्लिम बहुल सीट के मतदाताओं ने अधीर रंजन के साथ 25 साल का रिश्ता एक झटके में महज इसलिये तोड़ दिया क्योंकि उनके मुकाबले  मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा था जिसका बहरामपुर तो क्या प. बंगाल तक से कोई जुड़ाव नहींं है। वस्तुतः मुख्य न्यायाधीश की दो टूक टिप्पणी ने नागरिकता रजिस्टर की जरूरत को भी नये सिरे से प्रासंगिक बना दिया है। देश में जितनी कल्याणकारी योजनाएं केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं उनका लाभ बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक को मिले ये न्यायोचित है किंतु घुसपैठिये उसका लाभ उठाकर हमारा शोषण करें ये  किसी भी कोण से स्वीकार्य नहीं हो सकता। मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत बधाई के पात्र हैं जिन्होंने अवैध  घुसपैठियों को शरणार्थी मानकर देश के नागरिकों के समकक्ष  सुविधाएं देने जैसी देश विरोधी मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 December 2025

कांग्रेस हायकमान से न पार्टी संभल रही है और न ही गठबंधन

कर्नाटक में सिद्धारमैया मुख्यमंत्री रहेंगे या उनकी जगह डी. के. शिवकुमार को कांग्रेस गद्दीनशीन करेगी , ये सवाल बीते कुछ दिनों से राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। इसके पीछे वजह वह समझौता है जिसके अंतर्गत ढाई साल बाद सिद्धारमैया को हटाकर मुख्यमंत्री पद उपमुख्यमंत्री शिवकुमार को मिलना था। जैसे ही उक्त अवधि पूरी हुई शिवकुमार के समर्थक विधायकों ने दिल्ली में डेरा डालकर  हायकमान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। उल्लेखनीय है शिवकुमार कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं जिनका कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें हटाकर नया अध्यक्ष नियुक्त करने का साहस नहीं बटोर पा रहा। सर्वविदित है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाने में उनका काफी योगदान था। वे देश के सबसे धनी राजनेताओं में गिने जाते हैं।  भले ही इन दिनों उनकी और सिद्धारमैया की एक साथ नाश्ता करने की तस्वीरें समाचार माध्यमों में प्रकाशित हो रही हों और शिवकुमार उनके साथ मतभेदों का खंडन करते रहे हों किंतु दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे खुद भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे किंतु सिद्धारमैया बाजी मार ले गए। शिवकुमार भी मनमसोस कर रह गए। तब ढाई साल बाद उनकी ताजपोशी का वायदा कर उनको मना लिया गया। लेकिन वे मौका निकालकर मुख्यमंत्री को  परेशान करते रहे। हाल ही में उन्होंने रास्वसंघ की प्रार्थना नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे पढ़कर सबको चकित कर दिया क्योंकि उसी समय संघ के शताब्दी वर्ष आयोजन चल रहे थे। राजनीतिक पंडितों ने इसे शिवकुमार की बगावत का संकेत मानकर उनकी और भाजपा की नजदीकी का अंदाज लगाना शुरू कर दिया। हालांकि अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और शिवकुमार ने राहुल गाँधी या श्री खरगे के सामने   मुख्यमंत्री पद का दावा भी खुलकर नहीं रखा ।  लेकिन वे बिना कुछ कहे  अपने पांसे फेंकते जा रहे हैं। कर्नाटक की राजनीति क्या मोड़ लेगी ये कहना फिलहाल मुश्किल है क्योंकि सिद्धारमैया भी राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं जिन्होंने खरगे जी और शिवकुमार जैसे दिग्गजों को पीछे धकेलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली थी । ऐसा लगता है कांग्रेस हायकमान संसद के शीतकालीन सत्र के बाद ही इस विवाद को सुलझाने का प्रयास करेगी। अभी तक भाजपा ने शिवकुमार को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। राज्य में भाजपा का नेतृत्व उनके साथ सरकार बनाने को लेकर असमंजस में हैं क्योंकि पार्टी उनको भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में घेरती रही है। स्मरणीय है मनी लाउंड्रिंग के आरोप में उन्हें जेल में भी रहना पड़ा था। लेकिन भाजपा हायकमान की मौजूदा नीति किसी भी तरह कांग्रेस को कमजोर करने की है। ऐसे में  कांग्रेस से कर्नाटक की सत्ता छीन लेने का कोई मौका वह नहीं गँवाना चाहेगी। वैसे भी देवगौड़ा परिवार की जनता दल (एस) के साथ भाजपा का गठजोड़ है जो अनेक आरोपों में घिरा है। कर्नाटक के अलावा भाजपा ने झारखंड पर भी निगाहें गड़ा दी हैं। मुख्यमंत्री  हेमंत सोरेन की कुछ भाजपा नेताओं से हुई मुलाकात के बाद इस बात की अटकलें तेज हो गई हैं कि हेमंत इंडिया गठबंधन को अलविदा कहकर एनडीए की गोद में बैठने का मन बना चुके हैं जिसका बड़ा कारण चुनावी वायदे पूरे करने में आ रही धन की कमी है। बिहार विधानसभा चुनाव में हेमंत कुछ आदिवासी सीटें झामुमो के लिए  मांग रहे थे किंतु राहुल गाँधी और तेजस्वी  ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया जिसके कारण वे नाराज हैं।  भाजपा हायकमान मौके की तलाश कर ही रहा था। हेमंत के पिता शिबू सोरेन की मृत्यु पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार से हेमंत के पास पहुँचकर सांत्वना प्रदान की उसके बाद से ही झारखंड की सियासत में बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी। बिहार चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को ये लगने लगा है कि फिलहाल कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं है। इसलिए गठबंधन के प्रति उनका मोह भंग होने लगा है। यदि भाजपा ने हेमंत को तोड़ लिया  तब विपक्ष का एक और किला ढह जाएगा जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अन्य दलों पर पड़ना तय है। उमर अब्दुल्ला के हालिया बयान भी इंडिया गठबंधन से अलगाव का संकेत दे रहे हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस  हायकमान से न तो पार्टी संभल रही है और न ही गठबंधन। ऐसे में आने वाले कुछ महीने कांग्रेस के लिए काफी संकट भरे होंगे। बड़ी बात नहीं उसके भीतर ही कोई बड़ा विवाद खड़ा हो जाए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 2 December 2025

संसद में हंगामा कर अपना ही नुकसान कर रहा विपक्ष


सद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के पहले लोकसभाध्यक्ष द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सदन सुचारु रूप से चलाने के लिए आम सहमति बनी थी। प्रत्येक सत्र के पूर्व आयोजित होने वाली सर्वदलीय बैठक में ऐसा ही दिखाई देता है। और फिर  सदन के भीतर वही सब होता है जो मौजूदा सत्र में लगातार दूसरे दिन देखने मिला। विपक्ष मतदाता सूचियों के  एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण) पर तुरंत चर्चा की मांग पर अड़ा है जबकि सरकार का कहना है वह चर्चा हेतु तैयार है किंतु कब होगी इसके लिए दबाव स्वीकार नहीं है। हंगामे के कारण सदन स्थगित हो रहा है। वैसे भी ये सत्र काफी छोटा होता है। ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि विपक्ष  उपलब्ध समय का सदुपयोग करते हुए सरकार को घेरने की रणनीति बनाये। लेकिन विपक्ष की अगुआई कर रही कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चलने आमादा है। वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा लगाकर वह जिस मुद्दे को गर्माना चाह रही है उसकी हवा बिहार में निकल गई। राहुल गाँधी ने पूरे राज्य में यात्रा निकालकर एस. आई. आर के विरोध में जनमत बनाने का भरपूर प्रयास किया किंतु चुनाव में सबसे बुरी हालत कांग्रेस की ही हुई। वेसोचते थे कि बिहार में 40 लाख से ज्यादा नाम मतदाता सूचियों से कटने के बाद लाखों लोग सड़कों पर उतर आयेंगे । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। मतदान निर्विघ्न संपन्न होने के बाद सरकार बनने तक की समूची प्रक्रिया सुचारु रूप से संपन्न हो गई। जिन राज्यों में एस. आई. आर चल रहा है वहाँ  भी किसी बड़े विरोध की खबर नहीं आ रही। यहाँ तक कि प. बंगाल में ममता बैनर्जी के पुरजोर ऐतराज के बावजूद पुनरीक्षण जारी है।  मोदी विरोधी पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि वोट चोरी का मुद्दा कोई असर नहीं छोड़ सका क्योंकि इससे आम जनता को कोई नुकसान नहीं हो रहा। सर्वोच्च न्यायालय तक ने इसे रोकने से इंकार करते हुए चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करना जरूरी नहीं समझा। साथ ही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को जरूरी बता दिया। बेहतर होता विपक्षी नेता अपने कार्यकर्ताओं को इस कार्य में सहयोग करने का  निर्देश देते जिससे कि बाद में शिकायत की गुंजाइश न रहे। लेकिन ऐसा करने के बजाय देशव्यापी विरोध करने का फैसला किया गया जो नाकामयाब ही रहा। ये देखते हुए विपक्ष संसद में ऐसे मुद्दे उठाये जिनका जनता से सीधा सरोकार हो।  जनता से जुड़े ऐसे तमाम विषय हैं जिन पर विपक्ष की सक्रियता अपेक्षित है।  सरकार की जो विफलताएं हैं उन्हें उजागर करना विपक्ष का दायित्व है। संसद का सत्र इसके लिए सबसे सही अवसर होता है। लेकिन बीते अनेक वर्षों से देखने मिल रहा है कि विपक्ष किसी विशेष मुद्दे को पकड़कर पूरे सत्र में हंगामा करता रहता है। दूसरी ओर सरकार अपने सभी विधायी कार्य संसद से बिना बहस के मंजूर करवा लेती है। राहुल सहित अन्य विपक्षी नेताओं को ये बात समझनी चाहिए कि संसद  में हंगामा करने के कारण वे जन समर्थन खो रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद 6 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से चार पर एनडीए की बड़ी जीत हुई। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में कांग्रेस के साथ ही इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों को मतदाताओं ने जिस बुरी तरह ठुकराया वह इस बात का प्रमाण है कि वे जनता का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं हो पा रहे।  लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे जिम्मेदार ओहदे पर आने के बाद श्री गाँधी से जिस गंभीरता और दायित्वबोध की अपेक्षा थी वे उसे पूरा नहीं कर पा रहे। इसीलिये चुनावी हार का ठीकरा उनके सिर पर फूटना स्वाभविक भी है और सही भी। बिहार चुनाव में हुई फजीहत के बाद कांग्रेस ने जिस सतही ढंग से समीक्षा की उसके कारण उनकी नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने को लेकर चल रही खींचतान को रोकने में पार्टी हायकमान जिस तरह असहाय नजर आ रहा है उसके लिए भी श्री गाँधी की लापरवाही  जिम्मेदार है। वे खुद तो कोई निर्णय करते नहीं और दूसरा कोई करे ये भी उन्हें नागवार गुजरता है। इन्हीं वजहों से वे कांग्रेस पर बोझ बन चुके हैं। वोट चोरी के मुद्दे पर अभी तक उन्होंने जितने भी खुलासे किये उन्हें भले ही किसी बम का नाम दिया गया किंतु वे सब फुस्स निकले। लोकतंत्र में जनता की नब्ज और मिजाज को जानने वाला दल और नेता ही सफल होता है। भाजपा और नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके को गंभीरता से लेते हुए अपनी कमियाँ दूर कर विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया। वहीं राहुल और उनके सलाहकार 99 सीटों के फेर में फंसकर रह गए जिसका नतीजा कांग्रेस को  लगातार पराजयों के रूप में देखने मिला। उम्मीद थी कि बिहार चुनाव में हुई शर्मनाक हार से सबक लेते हुए श्री गाँधी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करेंगे किंतु संसद के मौजूदा सत्र की शुरुआत में ही उनका रवैया देखकर लग गया कि उन्होंने गलतियों को सुधारने की बजाय दोहराते जाने की कसम खा ली है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 December 2025

नक्सली आतंक आखिरी साँसें ले रहा

 केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक नक्सली आतंक के खात्मे का संकल्प लिया तब विपक्ष ने इसे  बड़बोलापन माना। लेकिन सरकार की चेतावनी के बाद भी नक्सलियों ने हथियार डालने से इंकार किया तब सुरक्षा बलों ने उनको घेरकर मारने का अभियान शुरू किया। छत्तीसगढ़, म.प्र, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के बड़े इलाकों में नक्सली आतंक के कारण जनजीवन त्रस्त हो चुका था। भोले - भाले आदिवासियों को धमकाकर हिंसा के अंधे रास्ते पर धकेलने का जो षडयंत्र चीन के इशारे पर सत्तर के दशक में प. बंगाल की नक्सलबाड़ी नामक स्थान में रचा गया वह योजनाबद्ध तरीके से अनेक राज्यों में फैलता गया। इसकी विशेषता ये रही कि घने जंगलों से घिरे आदिवासी बहुल क्षेत्रों को नक्सलियों ने अपना निशाना बनाया जो विकास की मुख्य धारा से कटे हुए थे। वहाँ सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव की वजह से गरीब आदिवासियों को भड़काने में चीन परस्त वामपंथी सफल हो गए। दूसरी खास बात ये रही कि नक्सलियों की ज्यादातर मौजूदगी खनिज संपदा संपन्न इलाकों में रही जो इनकी आय का स्रोत भी बन गए। नक्सलियों के पास आधुनिक हथियार और सैन्य प्रशिक्षण के पीछे भी चीन का हाथ सर्वविदित है। इनकी विचारधारा साम्यवादी क्रांति से प्रभावित है इसलिए संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास नहीं है। हालांकि साम्यवादी पार्टियां चुनाव लड़कर विधानसभा  और संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रही हैं। प. बंगाल , त्रिपुरा और केरल में तो वे सत्ता में भी रहीं। हालांकि अब उनकी पकड़ केवल केरल में ही बची है। देश के अन्य हिस्सों में श्रमिक संगठनों के जरिये जो साम्यवादी प्रभाव दिखता था वह भी उदारीकरण के बाद निर्मित परिस्थितियों में कमजोर होता गया। लेकिन शिक्षा, साहित्य, कला, पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में बैठे वामपंथी इस विचारधारा के पोषक बने रहे। कांग्रेस के शासन में इनको खूब महत्व मिलता रहा। इसी वर्ग को शहरी नक्सली कहा जाता है जो जंगलों में बैठे सशस्त्र नक्सलियों या माओवादियों को नैतिक समर्थन देता है। हाल ही में खूंखार नक्सली सरगना हिडमा को सुरक्षा बलों द्वारा मार गिराए जाने के बाद दिल्ली में जेएनयू नामक वामपंथियों के गढ़ के छात्रों द्वारा प्रदूषण के विरुद्ध  प्रदर्शन में अचानक  नारे लगने लगे कि हर घर से हिडमा निकलेगा। ऐसे ही नारे आतंकवादी अफजल गुरु की फांसी के बाद सुनाई दिये थे। हिडमा की मौत पर वरिष्ट  कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी जो बयानबाजी की वह भी बहुत कुछ कह गई। लेकिन इस सबसे प्रभावित हुए बिना श्री शाह ने नक्सलियों को हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित करने का प्रयास जारी रखा जिसके अनुकूल परिणाम भी आने लगे। नक्सलियों के परिवारजनों से अपील जारी करवाने का भी असर दिखा। जिन माओवादियों ने हथियार रखकर आत्मसमर्पण किया उनके पुनर्वास और कौशल विकास हेतु प्रशिक्षण का प्रबंध किये जाने से बड़ी संख्या में नक्सली मुख्य धारा में लौटने लगे। इसमें दो मत नहीं हैं कि इस आतंक को राजनीति और पुलिस का संरक्षण भी मिलता रहा। वामपंथी विचारधारा में रचे- बसे अनेक वरिष्ट नौकरशाह भी नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। इसीलिए आत्मसमर्पण का सिलसिला जारी रहने के बावजूद बड़े माओवादी नेता  मुख्यधारा में आने से इंकार करते रहे। लेकिन अचानक वातावरण  बदलने लगा। सुरक्षा बलों द्वारा बड़ी संख्या में उन माओवादी दिग्गजों का काम तमाम किया जाने लगा जिन पर करोड़ों रु. के इनाम थे। हिडमा इनमें सबसे बड़ा नाम है। इस सबसे वामपंथी दलों में घबराहट फैली जिसका प्रमाण उनके बयान उस बयान से मिला जिसमें नक्सलियों को मारने के अभियान को रोककर उनसे बातचीत करने की मांग सरकार से की गई। उसके कुछ दिनों बाद माओवादियों ने सरकार को खबर भेजी कि वे बातचीत हेतु राजी हैं किंतु गृहमंत्री श्री शाह ने दो  टूक कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से साम्यवादी विचारधारा का प्रचार करने में कोई ऐतराज नहीं है किंतु हथियारों के जोर पर इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। उनकी सख्त प्रतिक्रिया का असर लगातार हो रहे आत्मसमर्पण के रूप में देखने मिल रहा है।  यही स्थिति जारी रही तो बड़ी बात नहीं 31 मार्च 2026 के पूर्व ही माओवादियों के हौसले पस्त हो जाएं।  ध्यान देने लायक बात ये है कि जो नक्सली अपने विरोधी की नृशंस हत्या करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते वे अपनी जान खतरे में पड़ते ही हथियार डालने को दौड़े आ रहे हैं। दरअसल खूनी क्रांति के लिए बंदूक उठाकर जंगलों में फैले ये नक्सली कालांतर में अपराधी बन गए। आदिवसियों के हितों की रक्षा और जल, जंगल और जमीन के संरक्षक बनने  का इनका दावा महज दिखावा था। यही वजह है कि जैसे ही केंद्र सरकार ने उंगली टेढ़ी की तो इनकी कमर टूटने को आ गई। इस उपलब्धि का सबसे बड़ा लाभ नक्सल पीड़ित इलाकों में विकास की शुरुआत से होगी जिसमें वे रुकावट बने हुए थे। गृहमंत्री श्री शाह की प्रशंसा करनी होगी जो अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लगातार आकर सुरक्षा बलों का मार्गदर्शन करते रहे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी