Saturday, 24 January 2026

कालेधन की समस्या का इलाज आयकर ख़त्म करना ही है



मोदी सरकार के आगामी  बजट को लेकर अनुमानों का दौर जारी है। रविवार होने के बाद भी 1 फरवरी को ही बजट पेश होगा। सरकार महीनों पहले से इसकी तैयारी करती है । अर्थशास्त्रियों से  सुझाव लेने  के अतिरिक्त उद्योग-व्यापार से  जुड़े संगठनों की अपेक्षाएं जानने का प्रयास भी किया जाता है।  कर्मचारी वर्ग और बैंकों  में जमा राशि के ब्याज पर निर्भर बुजुर्ग भी अपने दृष्टिकोण से बजट से उम्मीद लगाते हैं। वित्त मंत्री खुद भी बजट  को लोकप्रिय बनाने विभिन्न वर्गों से राय लेने  का प्रयास करते हैं। हालांकि शायद ही कभी सभी वर्ग संतुष्ट हुए हों। व्यवहारिक रूप से ये संभव भी नहीं होता। हालांकि गत वर्ष के बजट में आयकर की छूट 12 लाख तक  किए जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ क्योंकि इससे मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और व्यवसायी  वर्ग को बड़ी राहत मिली । ये कहना भी गलत नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता के पीछे इसी छूट का बड़ा योगदान रहा। कोरोना  के कारण अर्थव्यवस्था में आए ठहराव से देश उबर चुका है। विकास दर में लगातार  वृद्धि से उत्साहित होकर ही  सरकार ने जीएसटी की दरों में सुधार जैसा साहसिक निर्णय लिया। हालांकि इससे जीएसटी के मासिक संग्रह में कमी आई किंतु उसके बाद भी जीडीपी की रफ्तार यथावत होने से भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी  अर्थव्यवस्था  बनने के बाद तीसरे स्थान  की ओर अग्रसर है। फिलहाल केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी ही हमसे आगे हैं।  इन्हीं सब कारणों से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ नामक हमलों के सामने भारत नहीं झुका। हाल ही में स्विटजरलैंड के दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन के दौरान यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की जो घोषणा की उससे भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास की पुष्टि हो गई। इस संधि को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है जिसने  ट्रम्प को भी चिंता में डाल दिया है । लेकिन  वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है उसके  कारण आर्थिक नीतियों में भी उसी अनुरूप परिवर्तन जरूरी है। हाल ही की घटनाओं के कारण भारत से विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा है। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने से भी आर्थिक अनिश्चितता व्याप्त है।  प्रतिवर्ष हजारों धनवान लोग भारत छोड़ विदेशों में बस रहे हैं जिसका कारण करों का बढ़ता बोझ और जटिलता है। इस विसंगति को रोकने के लिए  विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा समय - समय पर सुझाव दिया जाता रहा कि आयकर को पूरी तरह समाप्त करने के साथ ही जीएसटी की केवल एक ही दर 5 फीसदी  की रखी जाए।  इस सलाह पर यदि  बजट में अमल कर लिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका पूरी दुनिया में बज उठेगा। उल्लेखनीय है बढ़ते करों के कारण ब्रिटेन से बड़ी संख्या में धनकुबेर दुबई जैसी जगह पर आकर बस रहे हैं।  सर्वेक्षण किया जाए तो भारत के भी हजारों लोगों द्वारा दुबई सहित  अन्य देशों में ठिकाना बनाने की बात सामने आ जाएगी। ये बात तो साधारण सोच रखने वाला भी जानता है कि करों की अधिक दरें कालेधन रूपी समानांतर अर्थव्यवस्था की जनक हैं। अर्थक्रांति नामक एक अध्ययन दल ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में आयकर खत्म कर ट्रांजेक्शन टैक्स  लगाने का सुझाव सरकार के सामने रखा था जिसमें 100 रु. को ही सबसे बड़ा नोट रखने की बात थी। कहते हैं 2016 की नोटबंदी आंशिक तौर पर उसी से प्रेरित थी किंतु सरकार ने 500 और 2000 रु. के नोट जारी कर गलती कर दी। जल्द ही 2000 रु. का नोट कालेधन जमा करने का जरिया बन गया और इसीलिए उसे भी बंद किया गया। देश में जो भ्रष्टाचार है उसकी मुख्य जड़ आयकर के अलावा जीएसटी की अधिक दरें हैं । जीएसटी में तो और सुधार करने का आश्वासन सरकार ने दिया भी किंतु आयकर के बारे में क्रांतिकारी फैसला लेना प्रतीक्षित है। वैसे भी आयकर से मिलने वाला राजस्व इतना नहीं कि उसे बंद करने से अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। उल्टे काला धन मुख्यधारा में आ जाने से अर्थव्यवस्था में मजबूती और पारदर्शिता आ जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था सुधरी है किंतु कालेधन की समस्या यथावत है। ऐसे में अपेक्षा की जा सकती है कि गत वर्ष 12 लाख तक की छूट देने से आगे बढ़कर आगामी बजट में आयकर संबंधी ऐसा कोई निर्णय लिया जाए जिससे कि देश का धन बाहर जाना बंद हो और कर चोरी की बजाय लोग ज्यादा से ज्यादा कमाने के प्रति उत्साहित हों।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


कालेधन की समस्या का इलाज आयकर ख़त्म करना ही है


मोदी सरकार के आगामी  बजट को लेकर अनुमानों का दौर जारी है। रविवार होने के बाद भी 1 फरवरी को ही बजट पेश होगा। सरकार महीनों पहले से इसकी तैयारी करती है । अर्थशास्त्रियों से  सुझाव लेने  के अतिरिक्त उद्योग-व्यापार से  जुड़े संगठनों की अपेक्षाएं जानने का प्रयास भी किया जाता है।  कर्मचारी वर्ग और बैंकों  में जमा राशि के ब्याज पर निर्भर बुजुर्ग भी अपने दृष्टिकोण से बजट से उम्मीद लगाते हैं। वित्त मंत्री खुद भी बजट  को लोकप्रिय बनाने विभिन्न वर्गों से राय लेने  का प्रयास करते हैं। हालांकि शायद ही कभी सभी वर्ग संतुष्ट हुए हों। व्यवहारिक रूप से ये संभव भी नहीं होता। हालांकि गत वर्ष के बजट में आयकर की छूट 12 लाख तक  किए जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ क्योंकि इससे मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और व्यवसायी  वर्ग को बड़ी राहत मिली । ये कहना भी गलत नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता के पीछे इसी छूट का बड़ा योगदान रहा। कोरोना  के कारण अर्थव्यवस्था में आए ठहराव से देश उबर चुका है। विकास दर में लगातार  वृद्धि से उत्साहित होकर ही  सरकार ने जीएसटी की दरों में सुधार जैसा साहसिक निर्णय लिया। हालांकि इससे जीएसटी के मासिक संग्रह में कमी आई किंतु उसके बाद भी जीडीपी की रफ्तार यथावत होने से भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी  अर्थव्यवस्था  बनने के बाद तीसरे स्थान  की ओर अग्रसर है। फिलहाल केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी ही हमसे आगे हैं।  इन्हीं सब कारणों से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ नामक हमलों के सामने भारत नहीं झुका। हाल ही में स्विटजरलैंड के दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन के दौरान यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की जो घोषणा की उससे भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास की पुष्टि हो गई। इस संधि को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है जिसने  ट्रम्प को भी चिंता में डाल दिया है । लेकिन  वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है उसके  कारण आर्थिक नीतियों में भी उसी अनुरूप परिवर्तन जरूरी है। हाल ही की घटनाओं के कारण भारत से विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा है। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने से भी आर्थिक अनिश्चितता व्याप्त है।  प्रतिवर्ष हजारों धनवान लोग भारत छोड़ विदेशों में बस रहे हैं जिसका कारण करों का बढ़ता बोझ और जटिलता है। इस विसंगति को रोकने के लिए  विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा समय - समय पर सुझाव दिया जाता रहा कि आयकर को पूरी तरह समाप्त करने के साथ ही जीएसटी की केवल एक ही दर 5 फीसदी  की रखी जाए।  इस सलाह पर यदि  बजट में अमल कर लिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका पूरी दुनिया में बज उठेगा। उल्लेखनीय है बढ़ते करों के कारण ब्रिटेन से बड़ी संख्या में धनकुबेर दुबई जैसी जगह पर आकर बस रहे हैं।  सर्वेक्षण किया जाए तो भारत के भी हजारों लोगों द्वारा दुबई सहित  अन्य देशों में ठिकाना बनाने की बात सामने आ जाएगी। ये बात तो साधारण सोच रखने वाला भी जानता है कि करों की अधिक दरें कालेधन रूपी समानांतर अर्थव्यवस्था की जनक हैं। अर्थक्रांति नामक एक अध्ययन दल ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में आयकर खत्म कर ट्रांजेक्शन टैक्स  लगाने का सुझाव सरकार के सामने रखा था जिसमें 100 रु. को ही सबसे बड़ा नोट रखने की बात थी। कहते हैं 2016 की नोटबंदी आंशिक तौर पर उसी से प्रेरित थी किंतु सरकार ने 500 और 2000 रु. के नोट जारी कर गलती कर दी। जल्द ही 2000 रु. का नोट कालेधन जमा करने का जरिया बन गया और इसीलिए उसे भी बंद किया गया। देश में जो भ्रष्टाचार है उसकी मुख्य जड़ आयकर के अलावा जीएसटी की अधिक दरें हैं । जीएसटी में तो और सुधार करने का आश्वासन सरकार ने दिया भी किंतु आयकर के बारे में क्रांतिकारी फैसला लेना प्रतीक्षित है। वैसे भी आयकर से मिलने वाला राजस्व इतना नहीं कि उसे बंद करने से अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। उल्टे काला धन मुख्यधारा में आ जाने से अर्थव्यवस्था में मजबूती और पारदर्शिता आ जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था सुधरी है किंतु कालेधन की समस्या यथावत है। ऐसे में अपेक्षा की जा सकती है कि गत वर्ष 12 लाख तक की छूट देने से आगे बढ़कर आगामी बजट में आयकर संबंधी ऐसा कोई निर्णय लिया जाए जिससे कि देश का धन बाहर जाना बंद हो और कर चोरी की बजाय लोग ज्यादा से ज्यादा कमाने के प्रति उत्साहित हों।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 January 2026

यूरोपीय यूनियन - भारत व्यापार संधि की खबर से ट्रम्प ढीले पड़े


दावोस में विश्व आर्थिक फोरम की बैठक के पहले ग्रीनलैंड के मामले में यूरोपीय देशों से नाराज डोनाल्ड ट्रम्प की अकड़ कम हो गई। ग्रीनलैंड पर कब्जे की उनकी पेशकश का जिन यूरोपीय देशों ने विरोध किया  उन सभी पर 10 प्रतिशत टैरिफ थोपने के फैसले से भी वे पीछे हटते दिख रहे हैं। ट्रम्प के  अनुसार उन्होंने ग्रीनलैंड के भविष्य का खाका तैयार किया है इसलिए अब वे  हमला कर उस पर कब्जा नहीं करेंगे। उनके इस ऐलान के पहले ये लग रहा था कि ग्रीनलैंड के बारे में भी वे वेनेजुएला जैसा ही कुछ करेंगे। लेकिन दावोस पहुंचते ही  उनका निर्णय पूरी तरह उलट गया। ऐसे में वहां उपस्थित हर किसी के मन में ये सवाल उठ खड़ा हुआ कि सैन्य शक्ति के बल पर ग्रीनलैंड को हड़पने की धमकी दे रहे ट्रम्प का नजरिया एकाएक कैसे बदल गया? विश्व राजनीति के जानकारों के लिए उनका इस तरह पलटी मार जाना चौंकाने वाला था। हालांकि बीते एक साल में उन्होंने जितनी बार कदम आगे बढ़ाकर पीछे खींचे उसे देखते हुए ग्रीनलैंड को लेकर उनके रवैये में आए बदलाव में नया कुछ भी नहीं है । और ये कहना भी मुश्किल है कि वे इस पर कितने समय तक कायम रहेंगे । लेकिन दूसरी तरफ देखें तो ट्रम्प की ऐंठ में कमी की एक वजह  दावोस में अनेक देशों के नेताओं द्वारा दिए गए भाषण भी थे जिनमें उनकी आलोचना करते हुए उसका समुचित उत्तर देने की हिम्मत दिखाई गई। फ्रांस के राष्ट्रपति ने तो ट्रम्प की हरकतों को गुंडागर्दी तक कह दिया। यूरोप के कुछ छोटे देशों के प्रतिनिधियों ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसलों पर जो तीखी प्रतिक्रिया दीं उनसे भी ट्रम्प चौकन्ने हो गए। उन्हें इस बात का अंदेशा हो गया कि ग्रीनलैंड पर हमलावर रुख से इस सम्मेलन में उन्हें यूरोपीय देशों का प्रखर विरोध झेलना पड़ सकता है। उस किरकिरी से बचने के लिए ही उन्होंने अपने रुख में नर्मी का प्रदर्शन किया। लेकिन एक बात जिसके कारण ट्रम्प की अकड़ में कमी दिखाई दी वह है यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा सम्मेलन के तुरंत बाद भारत जाकर मुक्त व्यापार संधि करने की घोषणा , जिसे उन्होंने मदर ऑफ ऑल डील्स कहकर सनसनी मचा दी। उनके मुताबिक इस संधि से विश्व की बहुत बड़ी आबादी लाभान्वित होगी। इस ऐलान से ट्रम्प परेशान हो उठे क्योंकि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार संधि होने पर यूरोप और भारत दोनों उनके टैरिफ नामक अस्त्र से भयमुक्त हो जाएंगे और अमेरिका की साख और धाक दोनों को जबरदस्त धक्का पहुंचेगा। ट्रम्प इस बात को भांप गए कि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार संधि से दोनों  एक दूसरे के बाजार में आसानी से पहुंच बना सकेंगे। परिणामस्वरूप दोनों के पास निर्यात के लिए विशाल उपभोक्ता बाजार होगा। इस संधि के हो जाने से भारत अमेरिकी टैरिफ के दबाव से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा क्योंकि 27 देशों में उसके  लिए कारोबार के दरवाजे खुल जाएंगे। भारत और यूरोप की व्यापार भागीदारी अमेरिका की परेशानी की वजह बन सकती है और टैरिफ रूपी ट्रम्प की मनमानी चल नहीं पाएगी।  उल्लेखनीय है ग्रीनलैंड पर ट्रंप की धमकियों की वजह से यूरोपीय  यूनियन ने अमेरिका के साथ व्यापार संधि को अस्थायी तौर पर रोक दिया था । इसके  कारण अमेरिका को बड़ा नुकसान होने की आशंका बढ़ गई क्योंकि इस संधि से अमेरिकी निर्यातकों को यूरोप में जीरो टैरिफ पर  सामान बेचने का मौका मिलता।  इसके रुक जाने से अमेरिका में  महंगाई और बेरोगजारी बढ़ सकती है। वास्तविकता ये  है कि अमेरिका पहले से ही चीन के साथ व्यापार  विवाद में फंसा होने से यूरोप के साथ टकराव से बचना चाह रहा है। इन्हीं सब वजहों से ट्रम्प  ने ग्रीनलैंड पर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। ट्रम्प समझ चुके हैं कि टैरिफ की वजह से दुनिया भर के देश उनके खिलाफ खड़े हो रहे हैं। उन्हें ये अंदाज भी नहीं था कि जो यूरोपीय देश कल तक अमेरिका की दया पर निर्भर थे वे भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि जैसा साहस दिखाकर अमेरिका को ठेंगा दिखा देंगे। वे जानते हैं कि अमेरिका की समूची संपन्नता उसके व्यापार पर निर्भर है। इसलिए जब उनको लगा कि अमेरिका की रीढ़ पर प्रहार होने लगा तब उन्होंने ग्रीनलैंड पर लचीला रुख दिखाना शुरू कर दिया। हालांकि बीते एक वर्ष में उनकी कार्यशैली इतनी अविश्वनीय रही है कि उन पर सहसा विश्वास नहीं होता किंतु यूरोपीय यूनियन ने जो चतुराई दिखाई उससे ये कहावत चरितार्थ हो गई कि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 January 2026

अफसरशाही खराब कर रही म.प्र सरकार की छवि


म.प्र में भाजपा सरकार के पास  भारी - भरकम बहुमत है। पार्टी का संगठन भी बेहद मजबूत है। तीसरी  शक्ति न होने से कांग्रेस के साथ सीधा मुकाबला  है । लेकिन विपक्ष के  पास सक्षम नेतृत्व नहीं होने से वह सरकार की वैसी घेराबंदी नहीं कर पा रहा जैसी जनता अपेक्षा करती है। यही वजह है कि 2003 से मात्र 15 महीने छोड़कर भाजपा लगातार प्रदेश की सत्ता पर काबिज है। 2023 के चुनाव के पहले राजनीतिक विश्लेषक दावा कर रहे थे कि भाजपा को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा किंतु तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना के  कारण वह बड़े बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। लेकिन पार्टी हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद  डॉ. मोहन यादव को सौंपकर सभी को चौंका दिया।  भाजपा ने अन्य राज्यों में भी इसी तरह नए चेहरों को सत्ता सौंपकर वैकल्पिक नेतृत्व विकसित करने की कार्ययोजना को आगे बढ़ाया। म.प्र में इसका सुपरिणाम कुछ महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में देखने मिला जब भाजपा ने प्रदेश की सभी 29 सीटों पर जीत हासिल कर कीर्तिमान स्थापित किया। उल्लेखनीय है 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा  छिंदवाड़ा में कमलनाथ के किले को नहीं ढहा सकी किंतु डॉ. यादव के नाम वह उपलब्धि भी दर्ज हो गई जब श्री नाथ के सांसद पुत्र नकुल नाथ भी हार गए। इस जीत से मुख्यमंत्री का कद आलाकमान की नजर में और ऊंचा हो गया। अन्य  राज्यों के चुनावों में उनको बतौर स्टार प्रचारक भेजा गया । धीरे - धीरे सत्ता पर उनकी पकड़ दिखने लगी। अपने पूर्ववर्ती शिवराज सिंह की शैली को अपनाते  हुए उन्होंने भी भोपाल स्थित सचिवालय  से सरकार चलाने की बजाय पूरे प्रदेश का भ्रमण करते हुए अपनी पहचान बनाने में सफलता हासिल की। लेकिन पिछले कुछ समय में ही ऐसी घटनाएं हो गईं जिनके चलते प्रदेश सरकार कठघरे में खड़े होने मजबूर हो गई। इनमें सर्वाधिक चर्चित रही इंदौर में दूषित पेयजल से हुईं मौतें जिनकी वजह से म.प्र देश भर में बदनाम हुआ। दूसरी जिस घटना से मोहन सरकार पर हमले हो रहे हैं वह है राजधानी भोपाल में नगर  निगम के कसाईखाने में अवैध रूप से बड़े पैमाने पर गायों का काटा जाना। जबकि नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। तीसरी बात मोहन सरकार के लिए मुसीबत खड़ी करने वाली है मंत्री विजय शाह द्वारा एक मुस्लिम महिला सैन्य अधिकारी के बारे में की गई टिप्पणी से उठा विवाद । सर्वोच्च न्यायालय ने श्री शाह के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश देकर मुख्यमंत्री को परेशानी में डाल दिया क्योंकि उनके द्वारा आदिवासी कार्ड खेले जाने की आशंका के कारण ही अब तक उन्हें बचाया जाता रहा । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रवैये के बाद मुख्यमंत्री कब तक उन्हें अभयदान देते रहेंगे ये बड़ा सवाल है। इंदौर में दूषित पेयजल से हुईं दर्जनों मौतों के साथ ही भोपाल में गायों को काटे जाने जैसी घटनाओं से जुड़ी जो जानकारियां आईं उनसे ये एहसास हो रहा है कि राजनीतिक नेतृत्व पर नौकरशाही भारी पड़ रही है। मुख्यमंत्री के विदेश में होने के दौरान मुख्य सचिव द्वारा  जिला स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों की आभासी बैठक में भ्रष्टाचार को लेकर जो कुछ कहा गया वह इस आरोप की पुष्टि करने पर्याप्त है कि सरकार की अफसरशाही पर पकड़ ढीली पड़ रही है। इन्दौर में हुई मौतों के बाद महापौर ने साफ किया कि पाइप लाइन सुधार संबंधी टेंडर प्रक्रिया को अधिकारियों ने महीनों रोके रखा। भोपाल में भी महापौर  अधिकारियों पर लापरवाही का आरोप लगा रही हैं। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि इंदौर और भोपाल सहित प्रदेश के सभी बड़े शहरों में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर बैठे ज्यादातर अधिकारी  स्थानीय नेताओं के  अलावा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों तक को भाव नहीं देते। वैसे शिवराज सिंह के जमाने से ही नौकरशाही के जरिए सरकार चलाने की शैली विकसित हो चुकी थी जिसे डॉ. यादव भी जारी रखे हुए हैं। प्रदेश के अनेक प्राधिकरण, निगम , मंडल अफसरों द्वारा नियंत्रित हैं। भाजपा के नेता कई सालों से इनमें नियुक्ति का इंतजार करते थक गए। अनेक मर्तबा तो संभावित सूची तक प्रसारित हो गई किंतु हुआ कुछ नहीं। यहां तक कि जनसंपर्क विभाग की तमाम समितियों में भी पत्रकारों की जगह अफसरशाही को ही बिठा दिया गया है। शासन द्वारा दिए जाने वाले सम्मान और पुरस्कार भी ठंडे बस्ते में डाल दिए गए क्योंकि अधिकारी नहीं चाहते। मुख्यमंत्री पद पर दो वर्ष पूर्ण करने के बाद डॉ. यादव को चाहिए वे अफसरशाही पर लगाम कसें वरना इंदौर और भोपाल जैसे हादसे उनकी मेहनत पर पानी फेरते रहेंगे। उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये नौकरशाह किसी के सगे नहीं होते। आज यदि डॉ. यादव और उनके मंत्री सत्ता में हैं तो अफसरशाही की बजाय उन कार्यकर्ताओं की बदौलत जो चुनाव  में अपना पसीना बहाकर पार्टी को जीत के रास्ते पर ले जाते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 January 2026

ट्रम्प की हरकतों के कारण यूरोप भी अमेरिकी प्रभुत्व से बाहर आ रहा


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प वैश्विक अर्थव्यवस्था को तबाह करने के बाद दुनिया के भूगोल को बदलने का पागलपन कर रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठवाकर न्यूयॉर्क  की जेल में डालने के बाद ट्रम्प ने  ग्रीनलैंड पर जबरन कब्जा करने की धमकी दे डाली। जिन यूरोपीय देशों ने  इसके विरुद्ध आवाज उठाई उन पर ट्रम्प ने बढ़ा हुआ टैरिफ थोप दिया। उनकी ऊलजलूल हरकतों और बेहद गैरजिम्मेदाराना फैसलों की विश्वस्तर पर तीखी आलोचना हो रही है। फ्रांस के राष्ट्रपति ने तो उसे गुंडागर्दी बता दिया। पश्चिमी यूरोप के अधिकांश देश दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से  नाटो संधि के अंतर्गत अमेरिका के संरक्षण में थे। लेकिन ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर  दावा ठोकने से स्थिति उल्टी हो गई । और अब तक अमेरिका के झण्डे तले खड़े रहने वाले तमाम यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य टुकड़ियां तैनात करने जैसा अभूतपूर्व कदम उठा लिया। डेनमार्क  ने जिन तीखे शब्दों में ट्रम्प की धमकियों का जवाब दिया उनसे लग गया कि अमेरिका का रुतबा ढलान पर है। स्विट्जरलैंड के दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक फोरम के सम्मेलन में अनेक देशों के नेताओं ने ट्रम्प की धौंस की आलोचना करते हुए अमेरिका की दादागिरी खत्म करने के लिए जो एकजुटता  दिखाई वह  एक नई वैश्विक व्यवस्था शुरू करने की शुरुआत है। यूरोपियन यूनियन की अध्यक्ष जर्मनी की उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने तो ये कहकर तहलका मचा दिया कि दावोस सम्मेलन के बाद वे भारत जा रही हैं जिसके साथ मुक्त व्यापार संधि की जाएगी जिसे उन्होंने मदर ऑफ ऑल डील्स जैसा विशेषण देखकर अमेरिका को खुली चुनौती दे डाली।  गणतंत्र दिवस के अगले दिन भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच वैसी ही मुक्त व्यापार संधि होने जा रही है जैसी ब्रिटेन सहित अनेक देशों के साथ भारत कर चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति का ताजा पागलपन अमेरिका के नक्शे में ग्रीनलैंड के अलावा वेनेजुएला और कैनेडा को भी दर्शाने के रूप में सामने आया। अपने सोशल मीडिया हैंडल पर वे इन देशों को अमेरिकी ध्वज के तले दिखा रहे हैं। उनके इस कदम से समूचा यूरोप ही नहीं अपितु लैटिन अमेरिका के वे देश भी चिंतित  हैं जिन्हें ट्रम्प चाहे जब धमकाते रहे हैं। उनकी घटिया हरकतों को देखकर लगने लगा है कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है क्योंकि अमेरिका जैसे उन्नत देश के राष्ट्रपति से इतने निम्नस्तरीय व्यवहार की अपेक्षा किसी को नहीं थी। गत वर्ष उनके दोबारा निर्वाचित होने पर ये उम्मीद थी कि प्रथम कार्यकाल के अनुभव के आधार पर वे न सिर्फ अपने देश अपितु पूरी दुनिया की बेहतरी के लिए काम करते हुए रूस - यूक्रेन के अलावा इजरायल - हमास के बीच चली आ रही लंबी लड़ाई रुकवाने के लिए सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करेंगे। हालांकि इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम हो गया किंतु गाजा पर कब्जे की जो योजना ट्रम्प ने बनाई उसमें शांति स्थापित करने के बजाय उस क्षेत्र का व्यावसायिक दोहन करने का इरादा साफ झलकता है। भारत - पाकिस्तान के बीच हुए संक्षिप्त युद्ध को रुकवाने संबंधी उनके फर्जी दावों से  साबित हो गया कि उन्हें न अपनी गरिमा का ध्यान है न ही अमेरिका की प्रतिष्ठा का। नोबल शांति पुरस्कार के लिए जिस प्रकार उन्होंने लार टपकाई उससे उनकी छवि एक विदूषक की बन गई। इन सब वजहों से ट्रम्प दुनिया के सबसे विवादास्पद ही नहीं अपितु हास्यास्पद राष्ट्रध्यक्ष बन गए  हैं। दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक फोरम के सम्मेलन में  उन पर जो टिप्पणियां और कटाक्ष हुए उनसे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दुनिया अमेरिका की चौधराहट को और ज्यादा ढोने तैयार नहीं है। यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत आकर मदर ऑफ ऑल डील करने जैसी घोषणा यूरोप का अमेरिकी प्रभुत्व से निकलने का साफ संकेत है। कभी - कभी तो लगता है ट्रम्प के इस कार्यकाल में अमेरिका पूरी दुनिया के लिए अछूत होकर रह जाएगा। वैसे भी अब आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक तौर पर उसका एकछत्र दबदबा नहीं रहा। रूस , चीन  और भारत जैसे देश उसके प्रभुत्व को चुनौती देने में सक्षम हैं। और अब तो यूरोप ने भी उससे अपना पिंड छुड़ा रहा है। संभावनाओं के देश के रूप में प्रतिष्ठित अमेरिका को ट्रम्प की अधकचरी मानसिकता ने समस्याओं के देश में  परिवर्तित कर दिया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 20 January 2026

मुसलमानों को जागीर समझने वाली पार्टियों के लिए खतरे की घंटी


महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में भाजपा को मिली सफलता जहां चर्चा में है वहीं कांग्रेस , सपा ,शरद पवार और उद्धव ठाकरे के प्रति मुस्लिम मतदाताओं की अरुचि ने राज्य की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया है।  सबसे चौंकाने वाली बात रही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ए.आई.एम.आई.एम को मिली सफलता। हालांकि इसका प्रभाव पूरे राज्य में दिखाई नहीं दिया किंतु मुंबई में उसे राज ठाकरे की मनसे से अधिक सीटें मिलना साधारण बात नहीं है। औरंगाबाद , मालेगांव और भिवंडी में ओवैसी का जादू  चलने के अलावा अन्य  मुस्लिम बहुल इलाकों में भी ए.आई.एम.आई.एम के पार्षदों की  जीत मुस्लिम मतदाताओं के रुख में आ रहे बदलाव  का प्रमाण है। यद्यपि इसकी बानगी बिहार विधानसभा के पिछले दो चुनावों में मिल चुकी थी जहां मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में ओवैसी के उम्मीदवारों ने राजद और कांग्रेस का खेल बिगाड़ा। हालांकि ए.आई.एम.आई.एम ने उ.प्र और प. बंगाल में भी हाथ आजमाया किंतु वहां सफलता नहीं मिलने के बावजूद ओवैसी मुस्लिम समुदाय के बीच एक प्रभावशाली नेता के तौर पर पहचान बनाने में कामयाब हो गए। उन पर भाजपा की बी टीम होने का आरोप भी लगता रहा है। इसका सीधा - सीधा कारण यही है कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार को मिलने वाले मत भाजपा विरोधी  पार्टियों का नुकसान करते हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि मुस्लिम समाज चुनावों के समय भावनाओं में बहने की बजाय रणनीतिक सोच के साथ मतदान करता है। अभी तक के चलन के मुताबिक मुसलमान एकजुट होकर ऐसे प्रत्याशी को समर्थन देते आए हैं जो भाजपा को हरा सके। एक जमाने में कांग्रेस उनकी एकमात्र पसंद हुआ करती थी किंतु 1990 से राजनीतिक परिदृश्य तेजी  से बदला और कांग्रेस कमजोर होने लगी तब मुस्लिम समाज ने ऐसे विकल्प तलाशे जो भाजपा को रोकने में सक्षम हों। लालू प्रसाद, मुलायम सिंह , मायावती और ममता बैनर्जी सहित अन्य क्षेत्रीय दलों को भी भाजपा विरोधी भावना के वशीभूत होकर मुस्लिमों का एकमुश्त समर्थन मिलता रहा। लेकिन बीते कुछ सालों में हैदराबाद से निकली ए.आई.एम.आई.एम नामक पार्टी के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने मुसलमानों के बीच ये प्रचार करना शुरू किया कि वे जिन पार्टियों को अब तक समर्थन देते आए उन्होंने उनकी दशा सुधारने में कोई खास योगदान नहीं दिया। साथ ही इस बात को भी जोर - शोर से उठाया कि मुसलमान कब तक ऐसी पार्टियों के पिछलग्गू बने रहेंगे जो उन्हें बंधुआ मानती हैं। ओवैसी अपने भाषणों में अक्सर ये कहते सुने गए कि मुसलमानों को यदि राजनीति  की मुख्यधारा में आना है तो उनको अपना स्वतंत्र नेतृत्व विकसित करना होगा। जाहिर है वे उन्हें ए.आई.एम.आई.एम के झण्डे तले आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जो उनकी निजी पार्टी है। उनके पिता हैदराबाद की जिस सीट से लगातार लोकसभा पहुंचते रहे वह अब उनके कब्जे में है। उनके भाई तेलंगाना में विधायक हैं और बेहद भड़काऊ बयानों के लिए कुख्यात हैं। तेलंगाना के बाहर महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों को छोड़ ए.आई.एम.आई.एम का कोई प्रभाव नहीं था किन्तु बिहार में कुछ विधायकों के जीतने से ओवैसी को लगा कि वे हैदराबाद से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर के मुस्लिम नेता बन सकते हैं। उनकी खासियत ये है कि वे इंग्लैंड से बैरिस्टर की उपाधि लेकर आए हैं। हैदराबाद में अनेक शिक्षण संस्थान और अस्पताल चलाते हैं। ये कहना गलत न होगा कि आज के परिदृश्य में वे  सबसे सुशिक्षित मुस्लिम नेता हैं। और इसीलिए वे मुस्लिम युवाओं को प्रभावित करने में सफल हो रहे हैं। महाराष्ट्र की ताजा सफलता के बाद ओवैसी प. बंगाल में भी हाथ आजमाए बिना नहीं रहेंगे जहां 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। ध्यान देने योग्य बात ये है कि मुसलमानों ने आजादी के आंदोलन के दौरान गांधीजी के नेतृत्व को तभी तक मान्य किया जब तक उन्हें जिन्ना के रूप में अपना नेता नहीं मिला। जिन्ना भी उच्च शिक्षित व्यक्ति थे। पाकिस्तान के निर्माण में  भी मुल्ला - मौलवियों से ज्यादा अलीगढ़ मुस्लिम वि. वि से जुड़े शिक्षाशास्त्रियों की भूमिका रही। ओवैसी भी उसी इतिहास को दोहराने का प्रयास कर रहे हैं। भले ही वे अलग देश जैसी बात न करते हों किंतु बाबरी ढांचे को शहीद बताकर उसे दोबारा खड़ा करने जैसी डींग हांककर  मुस्लिम समुदाय के बीच सूरमा बनने की कोशिश करने से नहीं चूकते। बिहार और महाराष्ट्र  से मिले संकेत  बता रहे हैं कि मुसलमानों में कांग्रेस ,राजद और समाजवादी पार्टी के अलावा उन पार्टियों के प्रति आकर्षण घटने लगा है जो मुस्लिम तुष्टीकरण में आगे रहीं । ये बदलाव यदि जोर पकड़ गया तब राष्ट्रीय राजनीति की दिशा ही बदल जाएगी। मुसलमानों को अपनी जागीर समझने वाले राजनीतिक दलों के लिए ये खतरे की घंटी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 19 January 2026

आगामी चुनावी मुकाबले तय करेंगे कांग्रेस का भविष्य


महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के  चुनावों  के बाद भाजपा का हौसला बुलंद है। लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद पार्टी जिस तेजी से उबरी वह उसके नेतृत्व और संगठन की कुशलता का प्रमाण है। बिहार की  जीत के बाद उसने बजाय बिना देर किए  प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल के लिए व्यूह रचना  शुरू कर दी। फिलहाल  असम में ही उसकी सरकार है। ताजा आकलन में वहां भाजपा की वापसी संभव है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की छवि भी  योगी आदित्यनाथ जैसी बन जाने से मतदाताओं का जो सामाजिक ध्रुवीकरण हुआ उससे भाजपा फायदे में है। वहीं प. बंगाल में ममता बैनर्जी के क़िले को ध्वस्त करने के उसके इरादे बेहद मजबूत हैं। 2021 में भी भाजपा जबरदस्त उत्साह में थी लेकिन ममता को नंदीग्राम  सीट पर हराने के बाद भी वह सत्ता से वंचित रही। यद्यपि  3 से बढ़कर 73 विधायकों तक पहुंचने से मुख्य विपक्षी दल बन गई।  कांग्रेस और वामदलों का पूरी तरह सफाया होने से ममता और भाजपा सीधे मुकाबले में हैं। इस बार भाजपा और भी आक्रामक है किंतु 2021 के बाद ममता भी शांत नहीं बैठीं।  2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बहुत ही लचर रहा। इसीलिए कहा  जाता है कि बांग्लादेश की घटनाओं की प्रतिक्रियास्वरूप हिंदुत्व के उभार के बावजूद 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के  बल पर ममता वापसी करेंगी। फिर भी भाजपा ने प. बंगाल में खुद को एक विकल्प के तौर पर स्थापित कर लिया। जहां तक बात तमिलनाडु की है तो शहरों में तो लोग पार्टी को जानने लगे किंतु गांवों में  उसका प्रभाव नहीं है। इसीलिए वह गठबंधन करने में जुटी है ताकि सम्मानजनक स्थिति में आ सके। पुडुचेरी छोटा सा राज्य है जहां साझा सरकार में वह हिस्सेदार है। लेकिन वहां के समीकरणों के बारे में कुछ भी कहना कठिन है। रही बात केरल की तो रा.स्व.संघ की जड़ें मजबूत होने से भाजपा वहां तीसरी ताकत बन चुकी है। लोकसभा के एकमात्र सांसद  सुरेश  गोपी के  अलावा राज्यसभा सदस्य जॉर्ज कुरियन को केंद्र में मंत्री बनाकर पार्टी ने केरल में अपनी  उपस्थिति दर्ज की है।  जिसका प्रमाण राजधानी तिरुवनंतपुरम की नगरनिगम उसका महापौर बनना है।  राज्य में मुस्लिम वर्चस्व  से भयभीत ईसाई समुदाय भी भाजपा की ओर आकृष्ट हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ए. के. एंटोनी के बेटे अनिल एंटोनी के भाजपा में शामिल होने से इसके संकेत मिलने लगे थे। आगामी चुनाव में पार्टी को उम्मीद है कि वह विधानसभा में दहाई का आंकड़ा छू लेगी। इसके अलावा अनेक सीटों पर उसके द्वारा हासिल किए जाने वाले मत कांग्रेस और वामपंथी मोर्चे की हार - जीत को प्रभावित करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल का दौरे शुरू भी कर दिए हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की प्रमुख विरोधी कांग्रेस लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को जारी नहीं रख पाई। उसके बाद जितने राज्यों में  विधानसभा चुनाव हुए  उनमें पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। इंडिया गठबंधन में भी लोकसभा चुनाव के बाद बिखराव आया जिसकी शुरुआत हरियाणा से हुई। हालांकि महाराष्ट्र में  महा विकास आघाड़ी नामक गठबंधन में तमाम पार्टियों ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा किंतु लोकसभा के प्रदर्शन को दोहराने में कामयाबी नहीं मिली जबकि भाजपा ने एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के साथ मिलकर ऐतिहासिक सफलता हासिल कर ली। इस चुनाव में भी कांग्रेस के  हाथ निराशा लगी। उसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने एकला चलो की नीति अपनाई वहीं ममता बैनर्जी और अखिलेश यादव ने आम आदमी पार्टी का समर्थन किया।  यहां भी बाजी भाजपा ने मारी। जबकि कांग्रेस  दयनीय स्थिति से नहीं उबर सकी और लगातार तीसरी बार उसके खाते में शून्य आया। उसके बाद हुए बिहार चुनाव में राहुल गांधी वोट चोरी का ढोल पीटते हुए उतरे। लेकिन तेजस्वी यादव से गठबंधन के बाद भी  सामंजस्य नहीं बैठने से परिणाम निराशाजनक रहा। कांग्रेस खुद भी डूबी और लालू परिवार की राजनीति पर भी ग्रहण लग गया। महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय के हालिया चुनावों में भी कांग्रेस विपक्षी गठबंधन नहीं बना सकी। जिसका लाभ भाजपा को मिला। मुंबई इसका उदाहरण है। कुछ  महीनों बाद होने वाले मुकाबलों में कांग्रेस केवल असम और केरल में  ही दौड़ में है। प. बंगाल में वह पूरी तरह से हाशिए पर  है वहीं तमिलनाडु में  द्रमुक के साथ गठजोड़ नहीं हुआ तब उसके लिए  संकट खड़ा हो जाएगा। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस पूरी तरह लापरवाह हो गई। 99 सीटों पर मिली जीत के कारण उसने विपक्षी गठबंधन के सहयोगियों को उपेक्षित करना शुरू कर दिया । लेकिन जब अकेले लड़कर वह बुरी तरह हारने लगी तब विपक्षी दल भी उससे कतराने लगे हैं। ऐसे में यदि असम और केरल में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी तो फिर उसका ग्राफ और गिर जाएगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी