Saturday, 31 August 2024

पानी : ज्यादा बरसे तो मुसीबत और कम बरसे तो आफत


भारत में मानसून की अवधि सामान्यतः 15 जून से 15 सितम्बर तक मानी जाती है। दक्षिण पश्चिम मानसून 1 जून को केरल में दस्तक देता है ।शुरुआती अनिश्चितता के बाद जुलाई तक पूरा देश बरसाती फुहारों से नहा उठता है। हालांकि सभी जगह एक सी बरसात नहीं होती। कई बार तो  जिन दक्षिणी राज्यों से मानसून आगे बढ़ता है वहीं सूखा पड़ जाता है जबकि गुजरात और राजस्थान जैसे कम वर्षा वाले राज्यों में अति वृष्टि होती है। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने से वैसे भी ऋतु चक्र की गति और दिशा गड़बड़ाती जा रही है। चूंकि हमारा देश कृषि प्रधान है इसलिए वर्षा जल की उपयोगिता और अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है। बिजली की उपलब्धता ने खेतों में सिंचाई के लिए जल का उपयोग बढ़ा दिया है। इसके कारण भूजल का स्तर साल दर साल गिरता जा रहा है। वर्षा जल के संग्रहण के लिए किये जाने वाले प्रयास भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में बने पुराने तालाब उपेक्षा का शिकार होकर दम तोड़ते जा रहे हैं। वहीं नये बनाये जा रहे सरोवर भ्रष्टाचार का शिकार हैं। बढ़ती आबादी और औद्योगिकीकरण से भी जल की आवश्यकता निरंतर बढ़ती जा रही है। लेकिन मानसून से होने वाली बरसात का इससे कोई सामंजस्य नहीं है। उसकी चाल भी निर्धारित न होकर अप्रत्याशित होती जा रही है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जहां पानी की नितांत आवश्यकता है वहाँ बादल बिन बरसे लौट जाते हैं किंतु जिन क्षेत्रों में जररूत के मुताबिक बारिश हो चुकी है वहाँ बाढ़ की विभीषिका है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मौसम विभाग द्वारा उपग्रहों से प्राप्त सूचना के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणी ज्यादातर गलत निकलती है। इससे अलग हटकर एक नई समस्या  हर वर्ष सामने आने लगी है। ज्यादा बरसात में तो फिर भी ठीक किंतु ज्यादातर शहरों में थोड़ी सी बरसात में ही सड़कों पर पानी भर जाता है। देश के लगभग सभी महानगर इस समस्या से जूझ रहे  हैं। इसका कारण बेतरतीब बसाहट के साथ स्थानीय निकायों में व्याप्त  कामचोरी और भ्रष्टाचार है। इन दिनों गुजरात के सूरत , राजकोट और बड़ोदा में बाढ़ का पानी घरों की छत तक जा पहुंचा है। दिल्ली, राजस्थान भी जलप्लावन से हलाकान हैं। नदियों के किनारे बसे शहरों में भी हालात कभी भी खराब हो जाते हैं। भारी बारिश के चलते बांधों से छोड़ा जाने वाला पानी मुसीबत बन जाता है। कहने का आशय ये है कि हमारे देश में पानी कम बरसे तो मुसीबत और ज्यादा बरसे तो आफत वाली स्थिति है। इसका कारण जल प्रबंधन के समुचित उपाय न किये जाने के अलावा शहरों का अनियोजित विकास है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो या व्यवसायिक राजधानी मुंबई, सभी में थोड़ी देर की  बरसात जनजीवन को अस्त- व्यस्त कर देती है। आई टी हब के तौर पर विकसित बेंगुलुरु और गुरुग्राम देखने में कितने भी भव्य दिखें किंतु बरसात के मौसम में वहाँ की सड़कें  नालों की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। चंडीगढ़ जैसे व्यवस्थित कहे जाने वाले नगर में भी कुछ घंटों की बरसात समस्या बन जाती है। हर साल देश भर में  कहीं अनावृष्टि तो कहीं अतिवृष्टि से संकट उत्पन्न होता है ।  लेकिन वर्षाकाल खत्म होते ही रात गई, बात गई वाली मानसिकता के चलते सब भुला दिया जाता है। बड़ी नदियों पर बांध बनाकर वर्षा जल को संग्रहित करने की सोच गलत नहीं थी किंतु ज्यादा बरसात में उनके गेट खोले जाने पर निचले क्षेत्रों में होने वाला जलप्लावन चिंताजनक हालात पैदा कर देता है। आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में कहने को तो काफी प्रगति हुई किंतु जिन आपदाओं को समय रहते रोका जा सकता है उनसे बचाव न कर पाना ये साबित करता है कि गलतियों से सबक लेने की बुद्धिमत्ता का विकास करने में हमारा तंत्र विफल रहा है। हालांकि जनता भी इस मामले में काफी हद तक जिम्मेदार है। जल के दुरुपयोग को रोकने के साथ वर्षा जल का संग्रहण करने के प्रति दायित्व बोध का अभाव  इस समस्या को बढ़ाने वाला है। शहरों में अवैध निर्माण के कारण जल निकासी में अवरोध उत्पन्न होता है। जल की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की फिजूलखर्ची रोकने के अलावा वर्षा जल को जमा करने के प्रयासों ने कई जगह मरुभूमि में भी हरी सब्जियों के उत्पादन जैसा चमत्कार किया है। इसी तरह जल निकासी में रुकावट दूर हो जाए तो शहरों में आने वाली बाढ़ से काफी हद तक मुक्ति पाई जा सकती है। मौसम निश्चित रूप से टेढ़ी चाल चलने लगा है। उस पर मनुष्य का बस नहीं किंतु जो हमारे हाथ में है यदि उसके प्रति भी उदासीन रहा जाए तो फिर प्रकृति को दोष देना कहाँ तक उचित है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 30 August 2024

चुनाव खर्च के ब्यौरे पर विश्वास करना कठिन


विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को सौंपे गए विवरण के अनुसार लोकसभा चुनाव में  पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों को मोटी रकम  दी। कांग्रेस और भाजपा तो राष्ट्रीय पार्टी हैं किंतु आम आदमी पार्टी द्वारा भी अपने उम्मीदवारों को 60 - 60 लाख रु. दिया जाना चौंकाता है। आयोग ने लोकसभा चुनाव में खर्च की सीमा 90 लाख रु. तय की थी। इसीलिए हर प्रत्याशी ने इससे कम ही खर्च किया क्योंकि निर्धारित राशि से अधिक खर्च करने वाले के जीतने पर भी उसका चुनाव चुनाव रद्द हो जाता है। हारने पर भी कुछ वर्षों तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लग जाती है। कुछ प्रत्याशी ऐसे भी हैं जो सक्षम होने से पार्टी से पैसा नहीं लेते। निर्दलीय उम्मीदवारों को स्वयं के या चंदे के पैसे से चुनाव लड़ना पड़ता है। नामांकन के दिन से ही खर्चों का आकलन होने लगता है। इस समूची कवायद का उद्देश्य चुनावी खर्च को सीमित करना है। टी. एन. शेषन के कार्यकाल में चुनाव प्रचार के परंपरागत तौर - तरीकों में काफी बदलाव किये गए थे। बैनर - पोस्टर सीमित हो गए। रात 10 बजे के बाद सभाएं प्रतिबंधित हो गईं। बिना अनुमति दीवारें पोतने पर रोक लगी। चुनाव कार्यालय से स्वीकृति लिए बगैर वाहन का उपयोग वर्जित हो गया। प्रकाशित प्रचार सामग्री पर  मुद्रण संख्या का उल्लेख अनिवार्य कर दिया गया। प्रत्याशी द्वारा  कराये जाने वाले नाश्ते तक की दरें तय कर दी गईं। कभी - कभी तो लगता है चुनाव आयोग ज्यादती कर रहा है। नगदी राशि के लाने , ले जाने में पुलिस द्वारा की जाने वाली तलाशी से व्यापारी वर्ग भी त्रस्त हो जाता है। भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात सरकारी मशीनरी चुनाव आचार संहिता लगते ही निरंकुशता की हद तक सख्त हो जाती है। इन सबका लाभ निःसंदेह हुआ है किंतु जहाँ तक बात चुनाव में खर्च कम करने की है तो वह नहीं हो सका। लोकसभा और विधानसभा चुनाव हेतु व्यय की जो उच्चतम सीमा निर्धारित की गई  उसके भीतर चुनाव लड़ने वाले वे प्रत्याशी ही होते हैं जो केवल नाम के लिए मैदान में उतरते हैं। जिन कुछ  सीटों पर बड़ी पार्टियां भी सांकेतिक चुनाव लड़ती हैं वहां उनका खर्च कम होता है। वरना कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा पानी की तरह पैसा बहाने के उदाहरण आम हैं। अनेक उद्योगपति राज्यसभा की सदस्यता हासिल करने करोड़ों लुटा देते हैं। विधायकों की बोली किस तरह लगती है  ये सर्वविदित है। लोकसभा और विधानसभा तो बड़ी बात है लेकिन नगर निगम  पार्षद के चुनाव  में कुछ लोग बेतहाशा खर्च कर देते हैं। अब वे कार्यकर्ता भी नहीं रहे जो विचारधारा के लिए तन, मन और धन तीनों झोंक देते थे। साइकिल पर प्रचार तो वे भी नहीं करते जिनका चुनाव चिन्ह ही साइकिल है। चौपहिया वाहनों का उपयोग आम हो गया है। और तो और छुटभैये नेता तक हेलीकाप्टरों में मंडराते देखे जा सकते हैं। विमानों का उपयोग भी सामान्य हो चला  है। ये सब देखते हुए चुनाव आयोग द्वारा तय सीमा में चुनाव लड़ पाना अविश्वसनीय प्रतीत होता है। इस आधार पर चुनावी खर्च के  ब्यौरे को कसम खाकर झूठ बोलने का सबसे बड़ा उदाहरण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं  होगी। जनसेवा या विचारधारा से प्रेरित होकर राजनीति करने वाले समय के साथ लुप्त होते जा रहे हैं क्योंकि उनके लिए चुनाव जीतना आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा है। राज्यसभा भी जिस वर्ग के लिए बनाई गई थी वह उसमें नजर नहीं आता। इन्हीं सब कारणों से चुनाव उस तबके के बस के बाहर होते जा रहे हैं जिसके मन में विशुद्ध सेवाभाव है। इसके लिए राजनीतिक पार्टियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो उम्मीदवारी तय करते समय जीतने की क्षमता को प्राथमिकता देती हैं। सरकार बनाने के लिए  बहुमत की आवश्यकता ने इस चलन को मज़बूरी बना दिया है किंतु फिर राज्यसभा और विधानपरिषदों में निःस्वार्थ समाजसेवियों , कलाकारों, खिलाड़ियों, शिक्षाशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों को ज्यादा से ज्यादा स्थान दिये जाना चाहिए। आजादी के बाद प्रारंभिक वर्षों में ऐसा हुआ भी किंतु धीरे - धीरे उच्च सदन की गरिमा के साथ भी खिलवाड़ होने लगा। राजनीति में अच्छे लोगों के आने की बात तो खूब कही जाती है किंतु उनके लिए कितनी जगह है? अच्छा तो ये हो कि चुनाव खर्च की सीमा घटाई जावे। चुनाव प्रचार के प्रचलित तरीके और बदले जाएं। चुनाव जितना कम खर्चीला होगा उसमें जनभागीदारी उतनी ही बढ़ेगी। करोड़ों रु. के प्रचार और चुनाव आयोग के अथक प्रयासों के बावजूद मतदान का प्रतिशत कम रहना चिंता के साथ चिंतन का भी विषय है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 August 2024

ममता गृहयुद्ध की भाषा बोल रहीं


प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  संघर्षशील राजनेत्री हैं। वाम मोर्चा सरकार की तानाशाही के विरुद्ध उन्होंने जो लड़ाई लड़ी उसी का नतीजा है कि अपने इस मजबूत गढ़ में वामपंथी पार्टियां लगभग अस्तित्वहीन हो चुकी हैं। और उनके साथ रहने से कांग्रेस भी घुटनों पर आ गई । लेकिन सुश्री बैनर्जी ने भी वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये जिनके बल पर वामपंथियों ने लगभग चार दशक राज किया। मसलन बांग्ला देश से आये घुसपैठियों को मतदान का अधिकार देना, असमाजिक तत्वों के जरिये विरोधियों को आतंकित करना,  प्रशासन पर तृणमूल का वर्चस्व कायम करना आदि। ममता ने कांग्रेस इसलिए छोड़ी थी क्योंकि वह वामपंथियों के अत्याचार पर उदासीन थी। इसलिए उम्मीद थी वे उन बुराइयों से मुक्ति दिलाएंगी । लेकिन ममता ने भी मुस्लिम तुष्टीकरण , राजनीतिक हिंसा, असामाजिक तत्वों को संरक्षण और भ्रष्टाचार को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बना लिया। यद्यपि समाज के निचले हिस्से में उनका जनाधार है किंतु राज्य की 30 फीसदी मुस्लिम आबादी का एकमुश्त समर्थन उनकी चुनावी सफलता का सबसे बड़ा कारण है।  चुनावी हिंसा की जितनी घटनाएं प. बंगाल में होती हैं उतनी अन्य कहीं नहीं।  उनके तुनुकमिजाज  स्वभाव के चलते  विपक्षी दल भी उनसे छड़कते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस या अन्य किसी दल के लिए एक सीट तक नहीं छोड़ी। यहाँ तक कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के विरुद्ध  क्रिकेटर युसुफ पठान को उतारकर उन्हें हरवा दिया। उनके बढ़ते गुस्से का एक कारण ये भी है कि जिन राहुल गाँधी को वे पूरी तरह तिरस्कृत करती थीं वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनकर राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण शख्सियत बन बैठे। कांग्रेस और सपा को तृणमूल से अधिक सीटें मिलने से इंडिया गठबंधन में भी उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं मिल रही। गलत नीतियों के कारण वे चारों तरफ से घिरती जा रही हैं।  संदेशखाली की घटना से राज्य सरकार की जबरदस्त बदनामी हुई थी किंतु हाल ही में एक महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद नृशंस हत्या की वारदात ने ममता की साख और धाक मिट्टी में मिला दी। उक्त प्रकरण में प्राथमिकी दर्ज करवाने में हुए विलम्ब और उसके पहले ही पोस्ट मार्टम करवाने की वजह से उत्पन्न शंकाओं ने उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। घटनास्थल पर सबूत मिटाने के जो सुनियोजित प्रयास हुए उन्होंने भी कई सवाल खड़े कर दिये। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जाँच सीबीआई को सौंपे जाने का भी ममता सरकार विरोध करती रही। लेकिन ये प्रकरण दूसरा निर्भया कांड बनकर पूरे देश में चर्चित हो गया। सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रुख की वजह से कोई भी विपक्षी दल सुश्री बैनर्जी के बचाव में आगे नहीं आ रहा। गत दिवस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो प्रतिक्रिया दी उसके बाद प. बंगाल सरकार के पास मुँह छिपाने की जगह नहीं बची। और उसी की बौखलाहट में ममता ने धमकी दे डाली कि यदि प. बंगाल में आग लगी तो असम, बिहार और उ.प्र भी नहीं बचेंगे । आग दिल्ली तक जाएगी तथा मोदी सरकार गिर जाएगी। उनके इस बयान से तो लगता है मानों प. बंगाल कोई अलग देश हो जो अपने भीतरी मामलों में हस्तक्षेप के विरुद्ध धमका रहा हो। कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने भी भारत में बांग्ला देश जैसे हालात उत्पन्न होने की बात कही थी। सुश्री बैनर्जी ने भले ही उनके शब्दों को न दोहराया हो किंतु गत दिवस भाजपा द्वारा आयोजित प. बंगाल बंद को मिली सफलता से संभवतः उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।  उन्होंने गत दिवस जिस प्रकार की धमकी दी वह संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा ली गई शपथ का खुला उल्लंघन है । यदि एक राज्य का मुख्यमंत्री दूसरे राज्यों में आग लगने और केंद्र सरकार गिराने जैसी धमकी देगा तो यह गृहयुद्ध  की ओर कदम बढ़ाने जैसा है। दरअसल जबसे बांग्ला देश में तख्ता पलट हुआ है तभी से कुछ लोग भारत में भी वैसा ही  देखने के लिए लालायित नजर आते हैं। ममता भी उसी बिरादरी में शामिल हो गई हैं। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनाव के पहले धमकी दी थी कि  यदि भाजपा सत्ता में लौटी तो देश में आग लग जायेगी। नरेंद्र मोदी  तीसरी बार सत्ता में आ गए किंतु कहीं पत्ता तक नहीं खड़का। अब ममता भी वैसी ही डींग हांक रही हैं तो उसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय को धमकाना भी हो सकता है। बेहतर हो न्यायपालिका उनकी बात का संज्ञान लेते हुए  पूछे कि  दूसरे राज्यों  सहित दिल्ली तक आग पहुँचने और मोदी सरकार के गिरने जैसी बात क्या देश की अखंडता के लिए खतरा नहीं है और इसके बाद उन्हें सत्ता में रहने का क्या अधिकार  है ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 28 August 2024

जम्मू कश्मीर: धारा 370 और अलग झंडे की बहाली पर कांग्रेस अपना रुख साफ करे


जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस और नेकां ( नेशनल  काँफ्रेंस ) के बीच गठजोड़ पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। दोनों के बीच सीटों का जो बंटवारा  हुआ उसके अनुसार नेकां 51 और कांग्रेस 32 सीटें लड़ेगी । इसका मतलब ये हुआ कि कांग्रेस ने इस राज्य में छोटे भाई की भूमिका स्वीकार कर ली है। चुनाव के ऐलान के पहले ये उम्मीद थी कि कश्मीर घाटी में असर रखने वाली तमाम पार्टियां मिलकर संयुक्त मोर्चा बना लेंगी। सबसे ज्यादा उम्मीद नेकां और पीडीपी के साथ आने की थी लेकिन अचानक नेकां के वरिष्ट नेता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला ने अकेले लड़ने की घोषणा कर डाली। इससे भाजपा को काफी राहत मिल गई। क्योंकि घाटी में उसका जनाधार कम होने से उसके लिए एक भी सीट जीत पाना मुश्किल है। परिसीमन के बाद जम्मू के हिन्दू बहुल अंचल में विधानसभा सीटें बढ़ जाने से उसको अपने लिए अच्छी संभावनाएं लग रही हैं। लेकिन घाटी में कोई गठबंधन नहीं होने से कांग्रेस  काफी चिंतित थी क्योंकि उसके पास भी गुलाम नबी आजाद के निकल जाने के बाद इस राज्य में अब कोई ऐसा नेता नहीं बचा जिसके नाम पर वह 10 सीटें भी जीत सके। इसीलिए राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ श्रीनगर पहुंचे और अब्दुल्ला परिवार से मिलकर गठबंधन की पेशकश की। इसके बाद नेकां और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। ये गठबंधन  ऊपरी तौर पर काफी ताकतवर नजर आता है। हालांकि लोकसभा चुनाव में नेकां के दूसरे सबसे बड़े नेता उमर अब्दुल्ला एक ऐसे व्यक्ति से बुरी तरह हार गए जो जेल में बंद है। इसी तरह पीडीपी प्रमुख मेहबूबा मुफ्ती भी लंबे अंतर से शिकस्त खा गईं। इससे ये लगा कि घाटी में अब्दुल्ला और मुफ्ती खानदान का आभामंडल फीका पड़ने लगा है। आम कश्मीरी भी  इतना तो बोलता ही है कि उक्त दोनों परिवारों ने कश्मीर को जमकर लूटा और कश्मीरियों को बदहाली में रहने मजबूर कर दिया। बावजूद इसके  धारा 370 उनके लिए नाक का सवाल है। अन्यथा उसके हटने के बाद  घाटी में जो शांति आई उसकी हर कोई तारीफ करता है। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद फारूक को भी ये लगने लगा कि अब घाटी में उनके परिवार का वह प्रभाव नहीं रहा जो पहले हुआ करता था। यही कारण रहा कि जैसे ही राहुल और खरगे जी आये नेकां ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने पर रजामंदी दे दी। हालांकि घाटी में कुछ छोटी - छोटी पार्टियां ऐसी हैं जो एक - दो सीटों पर प्रभावशाली हैं किंतु नेकां और कांग्रेस गठबंधन एक बड़ी ताकत के तौर पर मैदान में हैं। लेकिन इस गठबंधन से कांग्रेस के लिए एक ऐसी मुश्किल पैदा हो गई जिसका सामना करना उसके लिए मुश्किल होगा। और वह है 370 को लेकर नेकां का रवैया। उल्लेखनीय है अब्दुल्ला पिता - पुत्र कह चुके हैं कि यदि सत्ता में आये तो 370 को बहाल करने संबंधी प्रस्ताव विधानसभा में लाएंगे । और तो और जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा भी दोबारा फहराने की प्रथा वापस लायेंगे। 370 की बहाली और राज्य के अलग झंडे की बात का समर्थन यदि कांग्रेस करती है तो वह उसके लिए आत्मघाती होगा। जम्मू अंचल में तो इन वायदों से उसे नुकसान होना तय है ही किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र में भी  समस्या पैदा हुए बिना नहीं रहेगी। स्मरणीय है धारा 370 को हटाने का अनेक कांग्रेसी नेताओं द्वारा  स्वागत किया गया था। बाद में पार्टी ने भी अधिकृत तौर पर निर्णय की प्रक्रिया पर आपत्ति व्यक्त की थी किंतु मोदी सरकार के उस निर्णय के पक्ष में जबरदस्त जनमत होने से पार्टी विरोध करने का साहस न जुटा सकी। 370 हटने के बाद राज्य आतंकवाद और अलगाववाद से पूरी तरह मुक्त हो गया ये कहना तो सही नहीं है किंतु उसमें जो कमी आई उसने घाटी में व्याप्त भय के माहौल को काफी हद तक घटाया है। इसका प्रमाण पर्यटकों की संख्या में रिकार्ड तोड़ वृद्धि है। दूसरी तरफ विकास कार्यों में भी तेजी आई है। हालांकि इसकी वजह से घाटी में भाजपा को सफलता मिलेगी ये उम्मीद करना जल्दबाजी होगी किंतु कांग्रेस के लिए 370 और राज्य के अलग झंडे  की वापसी के वायदे का समर्थन करना बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। अभी तक उसने ये स्पष्ट नहीं किया कि वह नेकां के उक्त वायदों का समर्थन करती है या नहीं किंतु जल्द उसे अपनी स्थिति साफ करनी होगी । वरना उसको  कश्मीर के बाहर भी जवाब देना मुश्किल हो जायेगा। विशेष रूप से ये मुद्दा श्री गाँधी के लिए परेशान करने वाला बनेगा क्योंकि नेकां से गठबंधन करने वही गए थे। 


- रवीन्द्र  वाजपेयी

Tuesday, 27 August 2024

नई भर्ती वालों को उपकृत करने से भाजपा में पनप रहा असंतोष



कल जम्मू कश्मीर विधानसभा के लिए भाजपा द्वारा   प्रत्याशियों की पहली सूची जारी होते ही हंगामा हो गया। इसके बाद फौरन वह सूची रद्द की गई और कुछ देर बाद संशोधित सूची जारी हुई। पहली सूची में जिन वरिष्ट नेताओं के नाम कटे उनमें से कुछ को उम्मीदवार बना दिया गया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुछ दिनों पहले पार्टी में आये लोगों को टिकिट देने से उन लोगों के मन खट्टे हो जाते हैं जो बरसों से पार्टी की सेवा करते आये हैं और वह भी विपरीत परिस्थितियों में। हालांकि  इस तरह के हंगामे सभी दलों में होने लगे हैं । लेकिन भाजपा अपने को अनुशासित कार्यकर्ताओं की पार्टी  कहते नहीं थकती । इसलिए उसके भीतर इस तरह की घटनाएं हैरत पैदा करती हैं।  जम्मू कश्मीर में गत दिवस जो हुआ वह चुनाव वाले  अन्य राज्यों में भी हो सकता है। इसका एक कारण भाजपा में टिकिटार्थियों की बढती संख्या  भी है। जनसंघ के ज़माने में उम्मीदवार ढूँढे जाते थे क्योंकि हारने के लिए लड़ना पड़ता था। वहीं भाजपा बनने के बाद पार्टी को सत्ता मिलने लगी जिस वजह से हर सीट पर चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन बीते कुछ समय से  कार्यकर्ताओं के साथ ही उसके परंपरागत समर्थकों तक में इस बात को लेकर नाराजगी  है कि तपे - तपाये कैडर  को किनारे रखकर दूसरे दलों से  नये - नये आये लोगों को टिकिट दे दिया जाता है। हालांकि क्षेत्रीय दलों के उभरने से कांग्रेस और भाजपा दोनों को नई भर्ती वाले नेताओं को उपकृत करना जरूरी हो गया है। लेकिन कुछ ऐसे मामले हैं जिनमें एक दिन पहले आये व्यक्ति को राज्यसभा की टिकिट दे दी गई। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण इसके ताजा उदाहरण हैं। ऐसा ही हरियाणा में  किया गया जब हाल ही में पार्टी में आईं किरण चौधरी को भी राज्यसभा उम्मीदवारी दे दी गई। हालांकि ऐसे निर्णय चुनाव में लाभ उठाने के लिए ही किये जाते हैं लेकिन हर बार वे सफल होंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। महाराष्ट्र में श्री चव्हाण को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बावजूद उनके प्रभाव वाले इलाकों में भी भाजपा के हाथ पराजय ही आई। श्रीमती चौधरी भी हरियाणा में भाजपा को अपेक्षित सफलता दिलवा सकेंगी इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। ताजा चर्चा झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के भाजपा में आने को लेकर चल पड़ी है। झारखण्ड में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 31 जनवरी को  ईडी द्वारा गिरफ्तार किये जाने पर जब हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया तब चंपई सोरेन को उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाया गया किंतु जुलाई में जमानत पर रिहा होते ही हेमंत उन्हें हटाकर हटाकर मुख्यमंत्री बन बैठे। चंपई को गद्दी छोड़ना नागवार गुजरा और वे पार्टी छोड़ने की बात करने लगे। सुना है इसके पीछे भी भाजपा ही है। असम के मुख्यमंत्री  के मुताबिक वे 30 तारीख को भाजपा में आ जाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो क्या भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करेगी ये सवाल उठना स्वाभविक है। चूंकि चंपई  मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के कारण झामुमो छोड़कर आएंगे इसलिए वे उससे कम क्यों चाहेंगे ? लेकिन खबर ये है कि जो विधायक उनके साथ थे वे भी हेमंत के पास लौट गए। ऐसे में वे भाजपा का कितना फ़ायदा चुनाव में करवाएंगे ये अनिश्चित है। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना तोड़कर भाजपा के साथ आये एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर अपने पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का अवमूल्यन कर दिया। कुछ समय बाद एनसीपी के अजीत पवार भी सत्ता की खातिर साथ आ गए और उपमुख्यमंत्री बन बैठे। लेकिन लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में भाजपा को जबरदस्त नुकसान हुआ। पार्टी को ये समझना चाहिए कि इस तरह के नेताओं के साथ आने से पार्टी की छवि भी खराब हुई है। बिहार में नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश में चंद्रा बाबू नायडू के साथ गठबंधन का लाभ इसलिए हुआ क्योंकि वहाँ किसी तरह की तोड़ फोड़ नहीं हुई। ये देखते हुए भाजपा नेतृत्व को नई भर्ती के बारे में बेहद सावधान और सतर्क रहना चाहिए। जम्मू कश्मीर, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में उसका अपना संगठन है जिसमें अनुभवी और प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की विशाल संख्या है। बाहर से आने वालों पर रोक भले न लगे किंतु उन्हें सीधे टिकिट दे देना बुद्धिमत्ता नहीं है। ऐसा करने का नुकसान उठाने के बाद भी यदि भाजपा इस परिपाटी को जारी रखेगी तब उसे लोकसभा चुनाव जैसे नतीजों के लिए तैयार रहना होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 August 2024

योजनाएं तो सभी अच्छी लेकिन पैसा कहाँ से लाओगे


लोकसभा चुनाव में मध्यम वर्ग की नाराजगी का खामियाजा झेलने के बाद केंद्र सरकार ने ओ.पी.एस अर्थात पुरानी पेंशन स्कीम फिर शुरू करने के बजाय  बीच का रास्ता निकालते हुए यू .पी.एस (यूनीफाइड पेंशन स्कीम) नामक  योजना केंद्रीय कर्मचारियों के लिए लागू करने की घोषणा की है। इस योजना के अंतर्गत सेवा निवृत्ति के पूर्व अंतिम 12 महीने में प्राप्त मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 50 प्रतिशत बतौर पेंशन हर माह दिया जायेगा। इसके लिए 25 वर्ष की सेवा जरूरी होगी वहीं न्यूनतम पेंशन 10 हजार रु. मासिक अनिवार्यतः देय होगी। 1 अप्रैल 2025 से लागू होने वाली इस योजना में कुछ शर्तों के साथ वे कर्मचारी भी शामिल हो सकेंगे जो वर्तमान में लागू एन .पी .एस (न्यू पेंशन स्कीम) योजना के अंतर्गत हैं। केंद्र सरकार के उक्त निर्णय के बारे में  कर्मचारी जगत की प्रतिक्रिया मिली - जुली है। कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को कदम पीछे खींचना बताते हुए कहा यह विपक्ष के दबाव का परिणाम है। दूसरी तरफ भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर वायदा खिलाफ़ी का आरोप लगाते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में  पुरानी पेंशन योजना लागू करने का आश्वसन देने के बाद वह  पलटी मार गई। ऐसे में  उसे यूपीएस का विरोध करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। कुछ श्रमिक संगठन नई घोषणा से सहमत हैं तो कुछ ने  बाद में  अपनी राय देने कहा है। ये कहना गलत नहीं है कि  कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक होने से मोदी सरकार ने ये फैसला किया।  महाराष्ट्र सरकार ने इस योजना को अपने राज्य में लागू  करने का ऐलान भी कर दिया। इसे देखते हुए भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी  इसको लागू किया जा सकता है  ताकि विपक्षी पार्टियों के शासन वाली राज्य सरकारों पर भी दबाव पड़े। इस योजना का आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को कितना लाभ मिलेगा ये तो परिणाम ही स्पष्ट करेंगे किन्तु इससे पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी गंभीर विषय  है। कांग्रेस के लिए भी ये गले की हड्डी बन गया है क्योंकि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में  वह इसे लागू नहीं कर सकी। लोकसभा चुनाव में इसीलिए वह इसका वायदा नहीं कर सकी। अन्य विपक्षी दल भी  असमंजस में हैं जो  पुरानी पेंशन योजना का राग अलापते रहे। वाजपेयी सरकार द्वारा इसे समाप्त करने के पीछे आर्थिक कारण ही  थे। इसीलिए मनमोहन सरकार के दस वर्षीय कार्यकाल में राहुल गाँधी या अन्य किसी कांग्रेस नेता ने पुरानी पेंशन स्कीम की बात नहीं की। 2014 के बाद 2919 का लोकसभा चुनाव भी हारने के बाद  उन्हेँ इसकी याद आई  और उसे चुनावी वायदों में शामिल कर हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस ने अपनी सरकार भी बना ली किंतु उसको लागू  करने में पसीने छूट गए। भाजपा ने भी इसी बात का उसे उलाहना दिया।  जिस नई पेंशन योजना की केंद्र सरकार ने घोषणा की उससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ से किस प्रकार निपटा जाएगा ये बताने के लिए  कोई तैयार नहीं है। सही बात ये है कि सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं। केंद्रीय सचिवालय से लेकर ग्राम पंचायत तक  में कर्मचारियों की कमी है। अदालतों में न्यायाधीश कम हैं और अस्पतालों में डाक्टर। कंप्युटर आने के बाद अब ए.आई ( रोबोट) और बड़े खतरे का संकेत दे रहा है। आई.ए.एस और आई.पी.एस के अलावा अन्य प्रशासनिक सेवाओं में अधिकारियों की भर्ती हेतु तो नियमित परीक्षा होती और परिणाम घोषित होते हैं। लेकिन निचले स्तर पर खाली पड़े  सरकारी पदों को भरने के  लिए  सरकारें पूरी तरह उदासीन हैं। सरकारी शालाओं और महाविद्यालयों के साथ ही विश्व विद्यालयों तक में अतिथि शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है। इसके पीछे आर्थिक कारण ही हैं। ऐसे मैं यू .पी.एस का बोझ सरकार किस  प्रकार वहन कर पायेगी ये बड़ा सवाल है। चुनावी लाभ हेतु राजनीतिक दलों द्वारा जो मुफ्त उपहारों की बरसात की जा रही है उसकी वजह से राज्य  सरकारों पर कर्ज का भार बढ़ता जा रहा है। इसकी भरपाई नये टैक्स लगाकर की जाती है। सरकारी कर्मचारी  संगठित क्षेत्र के होने से सरकार पर दबाव बनाने की स्थिति में होते हैं। लेकिन जिस तरह से संविदा पर कर्मचारियों को रखे जाने का चलन बढ़ रहा है वह बढ़ते वेतन - भत्तों का ही विपरीत परिणाम है। ये स्थिति अच्छी नहीं है। कुछ लोगों को दिये जा रहे जबरदस्त लाभ का नुकसान संविदा कर्मी भुगत रहे हैं। श्रमिक संगठनो को इस बारे में विचार करते हुए ऐसा कुछ  करना चाहिये जिससे कि समूचे कर्मचारी वर्ग को लाभ हो। कुछ का पेट गले तक भर जाए और बाकी के खाली  रहें ये अन्याय है। सरकार में बैठे लोगों को भी ये सोचना होगा कि केवल चुनाव जीतने के लिए कुछ लोगों को खुश करना आदर्श व्यवस्था नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 August 2024

मोदी की यूक्रेन यात्रा किसी बड़े परिणाम का कारण बन सकती है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना कारण और जरूरत के कोई काम नहीं करते। उनके ज्यादातर निर्णय दूरगामी लक्ष्यों पर केंद्रित होते हैं। हालांकि हर काम में कामयाबी मिली हो ऐसा नहीं है किन्तु वे बिना निराश हुए प्रयास करते रहते हैं। विदेश नीति के क्षेत्र में उनकी सक्रियता इसका प्रमाण है। तीसरी बार स्पष्ट बहुमत के बिना जब उन्होंने सरकार बनाई तब ये कहा गया कि सहयोगियों पर उनकी निर्भरता के चलते वे पहले जैसे मजबूत नहीं रह गए। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी तो इस बात का ढिंढोरा पीटते रहते हैं कि प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास डिग गया है।लोकसभा में विपक्ष अपने संख्याबल में हुई वृद्धि के कारण  सत्ता पक्ष पर हावी दिखा। सहयोगी दलों के दबाव के चलते सरकार को  कुछ कदम पीछे भी खींचने पड़े । लेकिन इस सबके बावजूद श्री मोदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रभावशाली उपस्थिति  बनाये हुए हैं।  इटली में आयोजित जी - 7 सम्मेलन में उनको विशेष रूप से आमंत्रित किया जाना वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते महत्व का संकेत था। लेकिन उस आयोजन में अमेरिका समर्थक देशों का बोलबाला था जो यूक्रेन युद्ध के कारण रूस विरोधी नीति पर चल रहे हैं। उनमें भारत ही  था जिसने उस विवाद में तटस्थ रहने का जोखिम उठाते हुए सर्वप्रथम तो अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखते हुए रूस के हमले की निंदा से दूरी बनाये रखी, वहीं यूक्रेन में फंसे हजारों भारतीय विद्यार्थियों की सकुशल स्वदेश वापसी के अभियान को सफ़लता पूर्वक पूरा किया। इस युद्ध ने दुनिया को शीतयुद्ध वाले दौर में पहुँचा दिया जब ज्यादातर देश अमेरिका और सोवियत संघ नामक दो खेमों में बँटे हुए थे। भारत कहने को तो गुट निरपेक्ष देशों के साथ था किंतु अमेरिका और ब्रिटेन का झुकाव पाकिस्तान की ओर होने से हमको न चाहते हुए भी अघोषित तौर पर ही सही किंतु सोवियत संघ से नजदीकी बढ़ानी पड़ी। सोवियत संघ तो खैर बिखर गया और उसी के साथ उसे बनाने वाले रूस की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। लेकिन राष्ट्रपति पुतिन के  सत्ता में आते ही रूस सामरिक, आर्थिक और कूटनीतिक तौर पर फिर महाशक्ति की श्रेणी में आ गया। हालांकि वैश्वीकरण के बाद आर्थिक नीतियों में हुए बदलाव ने भारत की विदेश नीति को अमेरिका की तरफ झुकाया किंतु श्री मोदी के सत्ता में आने के बाद हमने जिस संतुलन का रास्ता पकड़ा उसके कारण आज भारत के सभी गुटों से अच्छे रिश्ते हैं। परिणामस्वरूप हमारा निर्यात भी बढ़ा। कोरोना काल में  दुनिया के तमाम देशों को वैक्सीन उपलब्ध करवाकर भारत ने जो सम्मान अर्जित किया उसने विदेश नीति के अछूते पहलू को उजागर किया। श्री मोदी हाल ही में रूस गए थे। इस यात्रा से यूक्रेन ही नहीं अमेरिका और उसके पिछलग्गू भी नाराज हुए किंतु रूसी नेतृत्व के समक्ष उन्होंने दो टूक कहा कि युद्ध से कोई मसला नहीं सुलझता। बावजूद इसके राष्ट्रपति पुतिन ने श्री मोदी की जमकर तारीफ की। अमेरिका में इन दिनों राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी है। मौजूदा राष्ट्रपति के मैदान से हटने के बाद नया चेहरा राष्ट्रपति बनेगा। यदि डोनाल्ड ट्रंप लौटे तब विश्व राजनीति में उथलपुथल और बढ़ेगी। इसका असर विश्व अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा जो रूस- यूक्रेन युद्ध से डगमगा चुकी है। ऐसे में श्री मोदी का रूस के बाद यूक्रेन की यात्रा पर जाना बहुत ही सोचा - समझा कूटनीतिक पैंतरा है। हालाँकि ये मान लेना जल्दबाजी है कि इस यात्रा से युद्ध खत्म हो जायेगा और रूस - यूक्रेन के बीच दोस्ताना कायम हो जायेगा किंतु रूस को न हमलावर न कहने के बावजूद यदि श्री मोदी का यूक्रेन में जोरदार स्वागत हुआ तो यह बड़ी बात है। जिन राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारत के प्रधानमंत्री की मास्को यात्रा पर नाराजी दिखाई थी वे ही उनके लिए लाल कालीन बिछाए देखे गए। यूक्रेन में भी श्री मोदी ने युद्ध को समाधान कारक न मानते हुए शांति अपनाने की जो  सलाह दी उससे समूचा विश्व प्रभावित है। इसीलिए कहा जा रहा है कि शायद श्री मोदी दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका में हैं। वरना उनकी मास्को यात्रा के बाद यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंचना महज तफरीह नहीं हो सकती। इजरायल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध के लंबा खिंचने से भी दुनिया परेशान है। ईरान के अमेरिका विरोधी तेवर से तीसरे विश्व युद्ध की पटकथा लिखी जा रही है। ऐसे में यदि रूस और यूक्रेन में सुलह हो सके तो ये पूरे विश्व के लिए राहत की बात होगी।  हो सकता है कि राष्ट्रपति पुतिन ने श्री मोदी को यूक्रेन से बात कर युद्ध बंद करवाने का अनुरोध किया हो क्योंकि लड़ाई के लम्बे खिंचने के बाद भी यूक्रेन के मुकाबले में डटे रहने और मौका मिलते ही पलटवार करने से रूस भी थकने लगा है। उसे डर है कहीं उसकी हालत वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के फंसने जैसी न हो जाए। यदि श्री मोदी वाकई इस युद्ध को रुकवा सके तो वह भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी जिसके बाद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का हमारा दावा और मजबूत हो जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी