Wednesday, 1 January 2025

हर हाल में साथ रहे मध्यम वर्ग की उपेक्षा उचित नहीं


21 वीं सदी का 25 वां साल आज से शुरू हो रहा है। बीते 24 वर्षों का सफर बेहद उतार -  चढ़ाव भरा रहा। देश नये - नये अनुभवों से गुजरा। जिनमें सुखद और दुखद दोनों रहे। कोरोना जैसी महामारी के सामने समूची  मानवता असहाय खड़ी नजर आई।  बड़ी आर्थिक महाशक्तियाँ भी उस संकट का सामना करने में विफल नजर आईं। जिन देशों की स्वास्थ्य सेवाएं वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठतम मानी जाती थीं उनमें लाशों के ढेर लग गए। लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। ऐसे में भारत ने  एक अभूतपूर्व ऊर्जा के साथ उस संकट का मुकाबला सफलतापूर्वक किया। 140 करोड़ लोगों का निःशुल्क टीकाकरण  साधारण कार्य नहीं था । यही नहीं तो  दुनिया भर ने हमारे यहाँ बने टीके हासिल किये। अनेक गरीब देशों को करोड़ों टीके मुफ़्त देकर भारत ने उनकी सद्भावना अर्जित की। घरेलू मोर्चे पर 80 करोड़ लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न देकर अराजकता की स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी। जरूरतमंदों के खाते में नकद राशि पहुँचाई गई। जब सब कुछ बंद था तब भारत के किसानों ने रिकार्ड उत्पादन कर देश को  मुसीबत में फंसने से बचाया। औद्योगिक उत्पादन भी  होता रहा जिससे जरूरी चीजों की आपूर्ति नहीं रुकी। हालांकि सब कुछ अच्छा हुआ, ऐसा नहीं है। कुछ विफलताएं भी देखने मिलीं किंतु कोरोना संकट  में एक नये भारत का उदय हुआ जो आत्मविश्वास से भरा है और जिसमें आत्मनिर्भर होने की लगन हिलोरें मार रही है। विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का गौरव  हमारे साथ जुड़ा है। संकट के समय भी जनता ने अनुशासन का परिचय देते हुए दायित्वबोध  प्रदर्शित किया। चुनाव प्रक्रिया के जरिये प्रजातंत्र में  अखंड विश्वास व्यक्त  करते हुए भारत की जनता ने विश्व के समक्ष उदाहरण पेश किया। इन्हीं सबसे हमारी प्रतिष्ठा विश्व मंचों पर बढ़ी है। कोरोना के बाद रूस -  यूक्रेन और इजरायल - फिलीस्तीन संघर्ष में भारत की भूमिका ने कूटनीतिक जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। देश के भीतर राजनीतिक स्थिरता होने से आर्थिक मोर्चे पर भी बड़े फैसले हो रहे हैं। भारत दुनिया भर के निवेशकों  को आकर्षित करने में सफल हो रहा है। लोगों का जीवन स्तर निरंतर उठ रहा है। आयुष्मान योजना का विस्तार होने से सभी वर्गों के बुजुर्गों को निःशुल्क चिकित्सा का लाभ मिलना एक क्रांतिकारी कदम है। राजमार्गों सहित अधो - संरचना के अन्य प्रकल्पों पर तेजी से हो रहे काम विकास के जीवंत प्रतीक हैं। बड़े उद्योगों के अलावा लाखों स्टार्ट अप देश में उद्यमशीलता और स्व - रोजगार की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रमाण हैं। देश रक्षा सामग्री का आयात करने के साथ ही निर्यात भी कर रहा है। उच्च शिक्षा के नये केंद्र खुल रहे हैं। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम वैश्विक  प्रतिस्पर्धा में मुस्तैदी से खड़ा है। लेकिन अभी  बड़े - बड़े लक्ष्य हमें प्राप्त करना है। अनेक क्षेत्रों में अभी विकास की जरूरत है। भ्रष्टाचार लाइलाज  होता जा रहा है। चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाने को लुटाने की जो होड़ राजनीतिक दलों में मची है वह आर्थिक नियोजन पर भारी पड़े बिना नहीं रहेगी। इस पर चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को ही बंदिश लगानी होगी क्योंकि राजनीतिक दलों से कोई अपेक्षा  फिजूल है। लेकिन एक बात और जिस पर आगामी बजट के पहले विमर्श होना चाहिए  वह है देश के विशाल मध्यम वर्ग के हितों का संरक्षण। ये वह तबका है जो समूची अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखता है। यदि दुनिया भर के लिए भारत  एक बड़े बाजार के तौर पर उभरा है तो उसका श्रेय इसी वर्ग को है। विदेशों में बसे ज्यादातर  भारतीय मध्यम वर्ग के ही हैं जिनका  भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इस वर्ग को बजट में  कोई खास रियायत नहीं दी जाती। आयकर की व्यवस्था में बेशक उल्लेखनीय सुधार हुआ है किंतु उसके बोझ में जितनी कमी होनी चाहिए थी उतनी नहीं होने से मध्यम वर्ग में असंतोष है। उसके मन में ये भावना  घर बना चुकी है कि उद्योगपतियों के लिए तो केंद्र और राज्य सरकारें लाल कालीन बिछाती हैं वहीं गरीबों पर सौगातों की बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही। लेकिन मध्यमवर्ग कर चुकाते - चुकाते परेशान है। ये देखते हुए केंद्र सरकार से अपेक्षा है आगामी बजट में आयकर छूट की सीमा में वृद्धि के साथ ही जीएसटी की दरें घटाई जाएं। इस बारे में ये बात समझने वाली है कि करों की कम दरें लोगों की क्रय शक्ति में जो वृद्धि करती हैं उसका लाभ अंततः सरकारी खजाने को ही होता है। मौजूदा केंद्र सरकार जिस भाजपा के नेतृत्व में चल रही है उसका जनाधार आज भले सभी वर्गों में फैल गया हो किंतु शुरुआत में  मध्यम वर्ग  ही उसका समर्थक रहा है। ऐसे में जब भाजपा के अच्छे दिन आये तब उसे चाहिए उस मध्यम वर्ग को उपेक्षित न करे  जिसने हर हाल में उसका साथ दिया।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 31 December 2024

दिल्ली चुनाव : घबराहट में है आम आदमी पार्टी

    

    चूंकि  कांग्रेस , भाजपा और क्षेत्रीय दल भी इस फार्मूले को अपनाकर चुनाव जीतने की कोशिश करते हैं इसलिए आम आदमी पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले जिस तरह से सौगातें बाँटने में जुटी है उसमें कुछ भी नया  नहीं लगता। लेकिन इससे  अरविंद केजरीवाल की घबराहट जरूर सामने आ गई है। जो यू ट्यूबर पत्रकार अभी तक उनके गुणगान किया करते थे वे भी कहने लगे हैं कि आगामी चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए बेहद कठिन है। इसका एक कारण 10 साल के बाद स्वाभाविक  रूप से उत्पन्न होने वाली सत्ता विरोधी भावना है और दूसरा श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया सहित कुछ मंत्रियों के विरुद्ध  भ्रष्टाचार के प्रक्ररण दर्ज होना है। लेकिन तीसरी और सबसे बड़ी वजह है उनकी सरकार द्वारा किये गए तमाम वायदे पूरे न होना। मुफ्त बिजली और पानी  ने श्री केजरीवाल को दो बार विशाल बहुमत दिलवाया। सरकारी शालाओं के स्तर में सुधार और मोहल्ला क्लीनिक जैसे कार्यों से पहले कार्यकाल में आम आदमी पार्टी सरकार ने जो साख कमाई उसके कारण ही उसे न सिर्फ दूसरा कार्यकाल मिला बल्कि नगर निगम भी उसके कब्जे में आ गई। दिल्ली की हवा ने पंजाब में भी असर दिखाया और वहाँ भी इस पार्टी ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर सरकार बना ली। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि विधानसभा में मिली इकतरफा जीत के बावजूद आम आदमी पार्टी दिल्ली में लगातार दो लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारी। 2014 में तो वह नई नवेली थी किंतु 2019 में दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बावजूद उसकी लुटिया डूब गई और वह सातों सीटों पर पटकनी खा गई। 2024 में उसने कांग्रेस से समझौता करते हुए सीटों का बंटवारा किया किंतु नतीजा वही रहा। यहाँ तक कि पंजाब में भी उसे उम्मीद के मुताबिक लोकसभा सीटें नहीं मिलना ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि जनता उसे राष्ट्रीय राजनीति के योग्य नहीं  मानती जो श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं को बड़ा झटका है। उन्हें उम्मीद रही कि जेल भेजे जाने से उनके प्रति सहानुभूति का सैलाब उमड़ पड़ेगा किंतु जनता ने लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बुरी तरह हराकर उस पर तुषारापात कर दिया। उनके पद छोड़ने और आतिशी मर्लेना को अपनी जगह बिठाने के फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि श्री केजरीवाल का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा गया है। उनके अनेक निकट साथी पार्टी छोड़ चुके हैं। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद पार्टी के भीतर विरोध की जो आवाजें उठीं वे भी इस बात का संकेत हैं कि उनके दबदबे में कमी आई है। यद्यपि उनके समर्थक मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली के मतदाता उन्हें तीसरी बार सत्ता सौंपेंगे किंतु  राजनीतिक विश्लेषक ये कहने में संकोच नहीं कर रहे कि इस बार कांग्रेस जिस तरह जोर आजमाइश कर रही है उससे आम आदमी पार्टी के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। स्मरणीय है  लोकसभा चुनाव के बाद ही पार्टी ने दिल्ली के दंगल में अकेले उतरने का ऐलान कर कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया था। हरियाणा चुनाव में दोनों अलग - अलग लड़े और सत्ता भाजपा के हाथ चली गई। दिल्ली में कांग्रेस उसी का बदला लेने आमादा है। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि 2015 में आम आदमी पार्टी को मिली सफलता कांग्रेस के मतों में सेंध लगने की वजह से थी। हालांकि मध्यमवर्गीय मतदाता भाजपा के भी छिटके किंतु कांग्रेस तो शून्य की शर्मनाक स्थिति तक पहुँच गई। अल्पसंख्यकों और गऱीबों का वोट बैंक खिसक जाने से उसकी स्थिति दिल्ली में दयनीय होकर रह गई किंतु इस बार वह जो दमखम दिखा रही है उसके कारण वह जीते न जीते किंतु आम आदमी पार्टी की राह में रुकावट अवश्य पैदा कर सकती है। दूसरी ओर हरियाणा और महाराष्ट्र में जीतने के बाद भाजपा लोकसभा चुनाव के झटके से उबर चुकी है। इन्हीं सब कारणों से आम आदमी पार्टी सौगातों का पिटारा खोलने में जुट गई है। महिलाओं और बुजुर्गो के बाद उसकी ओर से मंदिरों के पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों को 18 हजार प्रति माह देने का वायदा कर दिया गया। लेकिन पिछले कार्यकाल में मौलवियों को स्वीकृत मासिक राशि का भुगतान 17 महीनों से नहीं होने और महिलाओं को दी जाने वाली राशि का वायदा पंजाब में पूरा न होने से पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। म.प्र और महाराष्ट्र में भाजपा ने महिलाओं को हर महीने राशि देकर मुकाबला अपने पक्ष कर लिया किंतु श्री केजरीवाल को ये सब देर से याद आया। ऊपर से दिल्ली सरकार के विभागों ने उनके वायदों के विरुद्ध विज्ञापन देकर उनकी किरकिरी करवा दी। ऐसे में आम आदमी पार्टी जिस तरह बदहवासी में नई घोषणाएं करती जा रही है वह उसकी घबराहट का संकेत है। और ये भी कि वह अपनी उपलब्धियों को लेकर खुद भी आश्वस्त नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 December 2024

मौत पर सियासत अशोभनीय : स्मारक संबंधी स्थायी नीति जरूरी

किसी की मृत्यु पर दलगत राजनीति से जुड़े मतभेदों  का उठना शोभा नहीं देता। दुर्भाग्य से हमारे देश की राजनीति में वह मर्यादा टूटने से सौजन्यता, सद्भावना और संवेदनशीलता जैसे शब्द अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। यही वजह है कि शोक के अवसर पर भी राजनीतिक नफे - नुकसान का बही खाता खोल दिया जाता है। दिवंगत  हस्ती की चिता सुलगने के पहले ही नफरत की आग भड़कने लगती है। इसके लिये किसी एक व्यक्ति या दल को कसूरवार ठहराना तो अन्याय होगा क्योंकि निष्पक्ष आकलन करें तो समूची राजनीतिक बिरादरी  इसके लिए जिम्मेदार है। हाँ, किसी का दोष अधिक और किसी का कम हो सकता है। ताजा संदर्भ पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह का अंतिम संस्कार  राजघाट परिसर में करने की बजाय निगम बोध घाट में किये जाने से उत्पन्न विवाद है। अंत्येष्टि की पूर्व रात्रि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर  दाह संस्कार राजघाट में किये जाने का अनुरोध किया ताकि उनका स्मारक भी वहीं बन सके। इस पर सरकार ने  सूचित किया कि स्मारक हेतु स्थान आवंटन में समय लगेगा । साथ ही आश्वासन भी दिया गया कि शीघ्र ही इसकी प्रक्रिया पूर्ण कर न्यास गठित करने के बाद  उनका भव्य स्मारक बनवाया जाएगा। लेकिन कांग्रेस इससे संतुष्ट नहीं हुई। इसके बाद अंत्येष्टि में बदइंतजामी की शिकायतें की गईं। जवाब में भाजपा ने भी कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया। और तो और उनके पार्थिव शरीर को  लोगों के  दर्शनार्थ कांग्रेस मुख्यालय तक में नहीं रखने दिया। आरोप तो ये भी है कि डाॅ. सिंह उनकी अंत्येष्टि में जाने के इच्छुक थे किंतु उनको रोक दिया गया। इस सबके बीच पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी का एक बयान चर्चा में है जिसमें उन्होंने  अपने  पिता की मृत्यु के बाद  कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर श्रद्धांजलि न दिये जाने की आलोचना की थी। डाॅ. सिंह के अंतिम  संस्कार संबंधी विवाद में आम आदमी पार्टी भी कूद पड़ी और दिल्ली विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सिखों के अपमान का मुद्दा छेड़ दिया। इन सब विवादों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो ये बात सामने आये बिना नहीं रहेगी कि राजनीतिक पार्टियां किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु का राजनीतिकरण करने में भी संकोच नहीं करतीं। कांग्रेस की ओर से इस बात का प्रचार किया गया कि राहुल गाँधी डाॅ. सिंह की मृत्यु पर उनके परिजनों के साथ रहे और उनके पार्थिव शरीर को कंधा भी दिया। अब भाजपा ने कटाक्ष किया है कि गत दिवस उनकी अस्थियाँ यमुना में प्रवाहित किये जाने के समय न तो श्री गाँधी तथा उनके परिवार का कोई सदस्य उपस्थित था और न ही अन्य कोई कांग्रेस जन । आज खबर आ गई कि केंद्र सरकार ने डाॅ. सिंह के स्मारक हेतु स्थान चयन हेतु कारवाई प्रारंभ कर दी है और जल्द ही उसके लिए न्यास का गठन कर दिया जाएगा। इतनी जल्दी हरकत में आने के पीछे भी राजनीति है क्योंकि भाजपा भी दिल्ली विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए किसी सिख नेता की मौत पर राजनीतिक विद्वेष के आरोप से बचना चाह रही है। इन विवादों के साथ ही  राजधानी दिल्ली  में दिवंगत राष्ट्रीय नेताओं के स्मारक  हेतु स्थान की उपलब्धता का मुद्दा गर्माने लगा है। ये जानकारी भी आई है कि डाॅ. सिंह के प्रधानमंत्री काल में  ही राजघाट परिसर में नया स्मारक बनाने पर रोक लगाई गई थी। धीरे - धीरे और भी बातें सामने आयेंगी किंतु सवाल ये है कि जिन नेताओं के स्मारक दिल्ली में बने हैं उन पर उन्हीं की पार्टी के लोग कितनी बार जाते हैं ? महात्मा गाँधी की समाधि भी सरकारी कर्मकांड का अनिवार्य हिस्सा है। यदि इन स्मारकों के रखरखाव का जिम्मा उस पार्टी को दे दिया जाए जिसके लिए वे  जीवन पर भर खपते रहे तब उनकी कैसी दुर्गति होगी इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। ये सब देखते हुए ऐसे मामलों में कोई स्थायी नीति बनना जरूरी है। देश के लिए योगदान देने वाली विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से भावी पीढ़ी को अवगत करवाने के लिए उनसे जुड़ी स्मृतियाँ अक्षुण्ण रखना आवश्यक है किंतु कई एकड़ जमीन घेरकर ईंट - पत्थरों से बने बेजान स्मारक इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते। इसी तरह जिन बंगलों में वे रहे उनको स्मारक बनाने की परिपाटी भी लोकतांत्रिक समाज में अटपटी लगती है। बेहतर हो उन विभूतियों की स्मृति को सम्मान के साथ सुरक्षित रखते हुए कुछ ऐसा किया जाए जिससे उनके प्रति श्रद्धा  का भाव किसी दल विशेष तक सीमित न रहकर पूरे समाज में  कायम  रहे। आश्चर्य है जो नेतागण भगवान राम के मंदिर निर्माण को फिजूलखर्ची बताकर उतनी राशि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने की वकालत करते हैं वे ऐसे स्मारकों पर होने वाले खर्च पर खामोश हो जाते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 28 December 2024

मनमोहन को लाने वाले राव साहब को भी भुलाया नहीं जा सकता


परसों रात जैसे ही पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के निधन की  खबर आई उनके बारे में जो विचार सुनने और पढ़ने मिले उनमें अधिकतर उनकी प्रशंसा से भरे हुए थे। यद्यपि किसी दिवंगत व्यक्ति की आलोचना से लोग बचते हैं। लेकिन घोर विरोधी भी जब तारीफों के पुल बांधे तो फिर ये बात माननी होती है कि दुनिया से गए व्यक्ति  ने अपनी ज़िंदगी में कुछ अच्छे कार्य करने के अलावा किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया होगा। स्व. डाॅ. सिंह  बतौर नौकरशाह ऐसे पदों पर रहे जिनमें नीतियों को बनाने और लागू करने का काम था इसलिए उनका आम जनता से प्रत्यक्ष संपर्क नहीं था। लेकिन उनके पास  देश - विदेश में कार्य करने का व्यापक अनुभव था। दूसरी तरफ  स्व. पी. वी. नरसिम्हा राव हालांकि पूरी तरह राजनेता थे किंतु वे भी काफी अध्ययनशील थे। उन्हें भी राज्य और केन्द्र सरकार में काम का पर्याप्त अनुभव हो चुका था। प्रधानमंत्री बनने के पहले तक किसी ने उनको कांग्रेस की आर्थिक नीतियों से असहमत होते हुए नहीं सुना था। जब वे प्रधानमंत्री बने उस समय गाँधी परिवार राजनीतिक तौर पर काफी कमजोर था।  सोनिया गाँधी को राजनीति में रुचि थी नहीं और राहुल - प्रियंका की उम्र भी इतनी नहीं थी कि राजनीतिक विरासत संभाल पाते। ऐसे में आर्थिक नीतियों को पं. नेहरू और इंदिरा गाँधी के समाजवादी मॉडल के बजाय दुनिया के बदलते वातावरण के अनुरूप ढालने का अवसर तो था किंतु कांग्रेस में ऐसा कोई शख्स नहीं था जो उनकी सोच को अमल में ला सके।  प्रणव मुखर्जी जैसे अनुभवी व्यक्ति को वरिष्ट होने से  निर्देशित करना कठिन था। दूसरे थे पी. चिदंबरम किन्तु उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएँ भी आगे जाकर खतरा हो सकती थीं। लिहाजा राव साहब ने डाॅ. सिंह जैसे नौकरशाह को चुना जो सरकार के आदेश का पालन करने का अभ्यस्थ होता है। स्मरणीय है योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहते उनके एक प्रस्तुतीकरण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने योजना आयोग को जोकरों का समूह कह दिया था। बताते हैं डाॅ. सिंह उससे क्षुब्ध होकर त्यागपत्र देने का मन बना बैठे थे किंतु एक निकटस्थ   के समझाने पर अपमान सहकर भी शान्त रहे। उनकी वह बात राव साहब को याद रही। प्रणव दा और श्री चिदंबरम को कांग्रेस की परंपरागत आर्थिक नीतियों को पूरी तरह उलट- पुलट करने के लिए राजी करना मुश्किल होता। ये सब सोचकर ही स्व. राव ने डाॅ. सिंह को वित्त मंत्री बनाकर पर्याप्त छूट देते हुए आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया का शुभारंभ किया जिससे पहली बार कांग्रेस नेहरू - गाँधी प्रभाव से मुक्त नजर  आई। डाॅ. सिंह चूंकि विशुद्ध नौकरशाह थे इसलिए उन्होंने पेशेवर कार्यशैली अपनाते हुए अर्थव्यवस्था को वैश्विक माहौल के अनुरूप ढालने का दुस्साहस किया। वरना उसके पूर्व तक  सरकार की आर्थिक नीतियाँ समाजवाद और साम्यवाद का मिश्रण थीं तथा  शासन के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था पसंद की जाती थी। ऐसे में राव साहब और मनमोहन की जोड़ी को खुलकर खेलने का अवसर मिला । नेहरू युग में  सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा दिया गया। इंदिरा जी ने उस नीति को और सख्त किया। बैंक, बीमा, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण जैसे कदम उठाये गए। ये भी  कहा जाने लगा कि भारत की आर्थिक नीतियां साम्यवाद से प्रभावित हो चली थीं।  इंदिरा जी पूरी तरह सोवियत संघ के साथ जुड़ चुकी थीं। उनके सलाहकारों में साम्यवादी मानसिकता के लोग भरे थे।  राव साहब के सामने ये चुनौती थी कि वे अपनी सरकार को उस  ढर्रे से कैसे निकालें ? और इस काम में उनको साथ मिला डाॅ. मनमोहन सिंह का जो राजनीतिक हसरतों से परे केवल अपने काम  से ही वास्ता रखते थे ।  और सिवाय प्रधानमंत्री के उनकी जवाबदेही किसी के प्रति नहीं थी। परसों रात से डाॅ. सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का बखान जोर - शोर से हो रहा है। सोनिया जी ने उन्हें मार्गदर्शक और राहुल ने  अपना गुरु कहकर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की किंतु उनकी पीठ पर यदि राव साहब का हाथ न होता तब ये देश उदारीकरण की बजाय राष्ट्रीयकरण के मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पाता। उस दृष्टि से राव साहब और मनमोहन सिंह जी को उन साहसियों के रूप में याद किया जाना चाहिए जिन्होंने देश को नेहरू - इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों से मुक्ति दिलवाकर उसमें नया आत्मविश्वास भरा। डाॅ. सिंह को तो गाँधी परिवार ने उपकृत किया जिसके वे सुपात्र थे किंतु राव साहब को मरने के बाद भी अपमानित करने का काम हुआ। उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय तक नहीं लाने दिया गया और परिजनों को उनका अंतिम संस्कार दिल्ली की बजाय हैदराबाद में करने बाध्य किया गया। ये बात इसलिए इसलिए प्रासंगिक हो उठी क्योंकि कल रात कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार से डाॅ. सिंह के अन्येष्टि स्थल पर ही उनका स्मारक बनाने की मांग कर डाली। ऐसी कोई मांग राव साहब के लिए कभी हुई हो ये शायद ही कोई बता सकेगा। आखिर वे भी तो पूर्व प्रधानमंत्री थे जिन्होंने डाॅ. मनमोहन सिंह की प्रतिभा को पहिचान दिलाई।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 December 2024

21 वीं सदी की दिशा तय करने के लिए देश उनका आभारी रहेगा


यह दुखद संयोग  है कि 25 दिसंबर को देश ने भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 100 वीं जयंती मनाई और उसकी अगली तारीख को ही पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह को खो दिया। 92 वर्षीय डाॅ. सिंह प्रख्यात अर्थशास्त्री होने के साथ ही कुशल नौकरशाह भी थे। केंब्रिज और आक्सफोर्ड जैसे विश्वप्रसिद्ध संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने  के बाद केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गवर्नर के दायित्व का निर्वहन उन्होंने सफलतापूर्वक  किया। जब स्व. पी. वी नरसिम्हा राव ने उन्हें वित्तमंत्री बनाया तब लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि वे राजनीति से दूर थे। उस दौर में देश गम्भीर आर्थिक संकट में था। यहाँ तक कि रिजर्व बैंक को सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा का प्रबन्ध करना पड़ा अन्यथा  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी छवि को जबरदस्त झटका लगता। डाॅ. सिंह ने उस कठिन समय में आर्थिक सुधारों को लागू करने  का साहस दिखाया जिसको कांग्रेस में भी पूरा समर्थन नहीं था।  राव सरकार अल्पमत में होने से अनेक दलों का दबाव झेल रही थी किंतु वे रुके नहीं।  धीरे - धीरे  आर्थिक सुधारों को सर्वदलीय स्वीकृति प्राप्त हुई। इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये था कि 2004 में जब डाॅ. सिंह प्रधानमंत्री बने तब उनकी अल्पमत सरकार को वामपंथी दलों ने भी समर्थन दिया। सभी पार्टियों की राज्य सरकारों ने आर्थिक सुधारों को अपनाते हुए उद्योगपतियों के सामने लाल कालीन बिछाने की जो संस्कृति अपनाई उसके प्रणेता डाॅ. सिंह ही थे। लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि वे प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार नहीं थे। 2004 में आश्चर्यजनक चुनाव परिणाम आए। कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सत्ता की हकदार बनी और सोनिया गाँधी को संसदीय दल का नेता चुना गया। लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर  डाॅ. सिंह की ताजपोशी करवा दी। वह सब क्यों और कैसे हुआ ये आज भी रहस्य है। डाॅ. सिंह जिन राव साहब की पसंद थे उनसे गाँधी परिवार की चिढ़ किसी से छिपी नहीं थी। लेकिन राव साहब के  करीबी रहे मनमोहन जी को श्रीमती गाँधी ने इसलिए चुना क्योंकि वे प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री नहीं देखना चाहती थीं जो हर दृष्टि से योग्य थे। ये बात भी कुछ किताबों के जरिये प्रकाश में आई कि भाजपा द्वारा विदेशी महिला को प्रधानमंत्री बनाये जाने के विरोध  के चलते गाँधी परिवार के भीतर भी ये चर्चा चली कि सोनिया जी पीछे हट जाएं और किसी ऐसे व्यक्ति को गद्दी सौंपी जाए जो समय आने पर राहुल गाँधी के लिए सिंहासन छोड़ दे।  लिहाजा डाॅ. सिंह को चुना गया। ये भी कुछ लेखकों ने लिखा कि परिवार राजीव गाँधी की मौत के सदमे से उबर नहीं पाया था। राहुल ने माँ को ये डर दिखाकर रोका कि सत्ता में बैठना उनके लिए जानलेवा हो सकता था। बहरहाल मनमोहन जी की प्रतिभा और अनुभव को देखते हुए उनके चयन को सर्वत्र सराहा गया। लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि गाँधी परिवार ने सत्ता का नियंत्रण अपने पास ही रखा ।  पहला कार्यकाल पूरा होने के पहले अमेरिका के साथ परमाणु संधि के मुद्दे पर वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। लेकिन 2009 के चुनाव में भाजपा द्वारा समुचित  चुनौती पेश न किये जाने के कारण कांग्रेस ज्यादा सीटें लेकर आई और मनमोहन  जी दोबारा प्रधानमंत्री बनाये गए। उनकी विद्वता, सौम्यता और  ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं था। उन्होंने जनहित में अनेक बड़े फैसले भी लिए किंतु दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों से उनकी सरकार घिरती  चली गई। घपलों - घोटालों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा था। यद्यपि वे निजी तौर पर बेदाग थे किंतु बतौर प्रधानमंत्री बदनामी के छींटे उनके दामन पर पड़ते गए। सही बात तो ये है कि उनको स्वतंत्र होकर काम करने का अवसर ही नहीं दिया गया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण  था उनकी सरकार द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु  भेजे गए अध्यादेश के प्रारूप को भरी पत्रकार वार्ता में राहुल द्वारा फाड़ दिया जाना। उस समय डाॅ. सिंह विदेश में थे। ऐसा लगा कि संभवतः वे लौटकर त्यागपत्र दे देंगे किंतु उस अपमान को भी वे चुपचाप सहन कर गए । 2014 आते - आते वे एक लाचार प्रधानमंत्री के रूप में रह गए थे। न सत्ता पर उनका नियंत्रण था और न ही संगठन पर। जननेता न वे पहले थे न बाद में बन सके। एक बार लोकसभा चुनाव लड़कर हारे और फिर जीवन भर राज्यसभा में रहे। प्रधानमंत्री के रूप में उनको सम्मान तो हासिल था किंतु शक्तियाँ नहीं। उनकी सरलता, सज्जनता और गैर राजनीतिक स्वभाव उनके राजनीतिक प्रभुत्व के आड़े आता गया। पूर्ववर्ती दोनों प्रधानमंत्री क्रमशः राव साहब और अटल जी भी अपनी सौम्यता, अनुभव और समावेशी स्वभाव के कारण सबसे प्रशंसा प्राप्त करते रहे किंतु उनमें जो निर्णय लेने की क्षमता और दृढ़ता थी उसके कारण वे दबावों का सामना करने में सफल रहे। डाॅ. सिंह इस मोर्चे पर कमजोर साबित हुए और उनकी यही कमी उनकी योग्यता , दक्षता और अनुभव पर भारी पड़ गई। यद्यपि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं रहा। उनके हिस्से में आई बदनामी दूसरों के काले कारनामों का परिणाम थी। दरअसल अपनी  प्रतिभा और ज्ञान के चलते वे एक विश्व धरोहर थे। आज देश की जो आर्थिक स्थिति है उसकी नींव उनके द्वारा ही रखी गई थी। 21 वीं सदी के भारत की दिशा तय करने के लिए उन्होंने जो कुछ किया उसके लिए देश उनका आभारी रहेगा।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 December 2024

बांग्लादेश की आर्थिक नाकेबंदी करना जरूरी


बांग्लादेश में मुस्लिम धर्मांधता अपने चरम पर है। शेख हसीना का तख्ता पलट किए जाने के बाद  बनी अंतरिम सरकार ने ग़ैर मुस्लिमों पर अत्याचार की छूट दे रखी है।  सबसे ज्यादा दमन हिंदुओं का किया जा रहा है। उनके अलावा जैन और ईसाई समुदाय को भी  प्रताड़ित किये जाने की खबरें लगातार आ रही हैं। ताजा घटना क्रिसमस पर ईसाइयों के घर जलाने की है। बांग्लादेश की काम चलाऊ सरकार  अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आश्वासन तो देती रहती है किंतु मुस्लिम समुदाय की गुंडागर्दी को  पूरी तरह संरक्षण दिया जा रहा है। हिंदुओं पर जिस तरह का अमानुषिक अत्याचार नई सत्ता आने के बाद शुरू हुए उसके अनेक वीडियो पूरी दुनिया में प्रसारित हो चुके हैं। लूटपाट, आगजनी आम हो गई है। लेकिन महिलाओं के साथ जिस तरह का राक्षसी व्यवहार देखने में आया वह इस्लामिक कट्टरता का सबसे घृणित चेहरा है। दुख की बात ये है कि भारत के मुस्लिम मुल्ला - मौलवी इस हैवानियत के विरुद्ध जुबान खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। मुस्लिम देशों के जो संगठन कश्मीर घाटी में अल्पसंख्यकों पर कथित जुल्मों पर गला फाड़ते हैं वे भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे अत्याचार पर मौन धारण किये हुए हैं। इस बारे में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि बांग्लादेश की नई सरकार उस पाकिस्तान से गलबहियां करने में जुटी है जिसके जुल्मों से त्रस्त होकर इस देश का निर्माण हुआ जिसमें भारत का बड़ा योगदान  है। बांग्लादेश की सत्ता में बैठे लोगों के साथ ही जनता भी इस सच्चाई को झुठला नहीं सकती कि पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण भारतीय सेना के युद्ध कौशल का नतीजा था वरना  ये इलाका आज भी पश्चिमी पाकिस्तान का गुलाम बना रहकर अत्याचार का ज़हर पीने को मजबूर रहता। 1971 में अस्तित्व में आने के कुछ सालों तक तो इस नये देश का व्यवहार  भारत के प्रति काफी सौजन्यता पूर्ण रहा किंतु देश के संस्थापक शेख मुजीब की हत्या के बाद उत्पन्न स्थितियों में रिश्ते खराब होते गए। शेख हसीना के कार्यकाल को उस दृष्टि से काफी अच्छा कहा जायेगा जब राजनयिक के साथ ही व्यावसायिक संबंध भी काफी अच्छे रहे। लेकिन बीते कुछ महीने कई सालों पर भारी पड़ गए। दरअसल बांग्लादेश के नये सत्ताधीश भारत से  केवल इस बात पर नाराज नहीं हैं कि उसने शेख़ हसीना को पनाह दे रखी है, बल्कि इसकी असली वजह उसका मुस्लिम कट्टरपंथी होना है। ये बात पूरी तरह सही है कि इस देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ भेदभाव  शुरू से ही होता आया है। लेकिन सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग हिंदुओं का है और पाकिस्तान का निर्माण भी हिंदुओं से नफरत के आधार पर हुआ था। इसलिए उससे अलग होने के बाद भी बांग्लादेश में हिन्दू विरोध की भावना को पुनः जोर पकड़ने में ज्यादा समय नहीं लगा।  इस तथ्य को भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान के निर्माण की मुहिम बंगाल से ही हुई थी। आजादी मिलने के समय  बंगाल में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं का जो कत्ले आम हुआ वह भी सर्वविदित है। वर्तमान में बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर लगता है विभाजन के समय से उत्पन्न नफरत आज भी बांग्लादेश के मुसलमानों में विद्यमान है। लेकिन क्रिसमस के दिन ईसाई समुदाय पर गुस्सा उतारकर वहाँ के मुस्लिम गुंडों ने दिखा दिया कि इस देश में मानवता पूरी तरह खत्म हो चुकी है। भारत के लिए ये चिंता का विषय है क्योंकि वहाँ हिंदुओं पर किये जा रहे जुल्मों के पीछे भारत के प्रति दुर्भावना ही है। अब तक भारत ने जो धैर्य दिखाया वह कूटनीतिक तौर पर सही है क्योंकि किसी देश के अंदरूनी मामले में सीधे हस्तक्षेप करना सही नहीं होता। शेख हसीना को लेकर भी हमारे सामने व्यवहारिक और कूटनीतिक मुश्किलें हैं । भारत ने उन्हें अब तक औपचारिक रूप से शरण भी नहीं दी । उधर बांग्लादेश उन्हें वापस करने की मांग कर चुका है। वहाँ रह रहे हिंदुओं की सुरक्षा भी नाजुक मुद्दा है। यद्यपि भारत ने अघोषित तौर पर बांग्लादेश को दी जाने बहुत सी चीजों की आपूर्ति कम करते हुए दबाव बनाया है किंतु अब समय आ गया है जब इस देश पर दबाव और बढ़ाया जाए। इसका सबसे अच्छा तरीका है आर्थिक नाकेबन्दी की जाए। कुछ वर्षों पहले नेपाल ने भी जब सीमा विवाद पैदा कर भारत विरोधी रुख दिखाया तब इसी कदम से उसकी ऐंठ कम हुई थी। उसके बाद मालदीव में आई चीन समर्थक सरकार ने भी भारत को आँखें दिखाना शुरू किया तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सांकेतिक कदम ने ही उसके पर्यटन उद्योग की कमर तोड़ दी जिससे घबराकर वहाँ के नये शासक दौड़े - दौड़े दिल्ली आये और रिश्ते सुधारने की दुहाई देने लगे। बांग्लादेश का मसला हालांकि ज्यादा पेचीदा है किंतु उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि भारत के जरा से प्रतिरोध के सामने टिक नहीं सकेगा। अगले महीने की 20 तारीख को अमेरिका में बांग्लादेश की नई सरकार को संरक्षण देने वाले राष्ट्रपति अलग हो जाएंगे और भारत समर्थक डोनाल्ड ट्रम्प व्हाइट हाउस में पहुंचेंगे। संभवतः भारत उसी की प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन उसके पहले किसी बड़े कदम की तैयारी कर लेनी चाहिए । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 December 2024

केन - बेतवा लिंक परियोजना की शुरुआत अटल जी को सार्थक श्रद्धांजलि है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा म.प्र के खजुराहो में केन - बेतवा लिंक परियोजना का शिलान्यास किया जाना एक ऐतिहासिक अवसर है। 44 हजार करोड़ रु. की इस परियोजना का 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। उ.प्र और मध्यप्रदेश की दो नदियों को जोड़ने वाली इस परियोजना के पूरे होने पर 11 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित हो सकेगी वहीं 113 मेगावाट पन बिजली और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा जिसका लाभ अकेले म.प्र के खाते में आयेगा। सबसे बड़ी बात बुंदेलखंड के बड़े इलाके में जल की किल्लत दूर होने से वहाँ आर्थिक विकास के दरवाजे खुल सकेंगे और लोगों के पलायन को भी रोका जा सकेगा। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में म.प्र और राजस्थान के  मुख्यमंत्रियों ने पार्वती - क़ाली सिंध और चम्बल लिंक परियोजना सम्बन्धी समझौता हस्ताक्षरित किया। नदियों को जोड़ने की कल्पना सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा संजोई गई थी। देश में विश्वस्तरीय राजमार्गों के अलावा प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना भी अटल जी की दूरदर्शिता का ही सुपरिणाम है। शुरू - शुरू में सड़कों के विकास को धन की बरबादी और ऑटोमोबाइल उद्योग को लाभ पहुंचाने वाला बताया गया। इसी तरह नदियों को आपस में जोड़ने की परिकल्पना का भी मखौल बनाया गया। दुर्भाग्य से 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार चली गई और उसके बाद आई डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार ने नदियों को जोड़ने में तो कोई रुचि ही नहीं ली वहीं राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों के विकास की गति भी बेहद धीमी कर दी। वह सरकार पूरे 10 साल चली। यदि उस दौरान उक्त दोनों प्रकल्पों पर प्राथमिकता के आधार पर काम किया गया होता तो आज देश की स्थिति कहीं बेहतर होती। ये संतोष का विषय है कि केन - बेतवा लिंक परियोजना की शुरुआत  प्रधानमंत्री श्री मोदी आज स्व. अटल जी की 100 वीं जयंती के दिन कर रहे हैं। निश्चित रूप से ये उनके प्रति  सार्थक श्रद्धांजलि है। इस संदर्भ में ये बात भी विचारणीय है कि इस तरह के महत्वपूर्ण प्रकल्पों को अमल में लाने के मामले में भी राजनीति होती है। मसलन 2004 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद आई केंद्र सरकार यदि नदियों को जोड़ने जैसी परियोजनाओं पर ध्यान देती तो निश्चित रूप से देश के बड़े हिस्से को सूखे और बाढ़ जैसी विपदाओं से बचाया जा सकता था। ये विडंबना ही है कि आज तक विभिन्न राज्यों के बीच नदियों के जल का बंटवारा विवाद का विषय बना हुआ है। इसके लिए हुए आंदोलनों में जन और धन दोनों की हानि हुई। दक्षिण में कावेरी और उत्तर में यमुना नदी के जल को लेकर पड़ोसी राज्यों के बीच चली आ रही खींचातानी ये दर्शाती है कि समस्याओं के समाधान  के प्रति हमारे यहाँ कितनी लापरवाही बरती जाती है। केन - बेतवा लिंक परियोजना उस दृष्टि से बहुत बड़ी सौगात है जो उ.प्र और म.प्र के अत्यंत पिछड़े इलाकों को विकास के पथ पर आगे ले जाने में सहायक होगी। केंद्र सरकार ने 44 हजार करोड़ के इस प्रकल्प में 90 प्रतिशत योगदान स्वीकृत कर निश्चित रूप से सराहनीय कदम उठाया है। दोनों राज्यों में फैला बुंदेलखंड अंचल अपने गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ प्राकृतिक संपदा भी बेशुमार है। लेकिन आजादी के बाद इस इलाके की समुचित देखभाल नहीं होने से ये प्रगति की दौड़ में पीछे रह गया किंतु बीते कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय के कारण बुंदेलखंड में भी विकास की उम्मीद नजर आने लगी है। प्रधानमंत्री चूंकि स्वयं ही देश में अधो संरचना के विकास में रुचि लेते हैं इसीलिए उनके 10 वर्षीय शासनकाल में   राज मार्गों, फ्लाई ओवर, नदियों पर पुल, सीमांत क्षेत्रों में सड़क और रेल सेवा , हवाई अड्डे, बंदरगाह आदि का निर्माण रिकार्ड संख्या में हुआ। पहले की सरकारें धन की कमी का रोना रोती रहीं जबकि मोदी सरकार ने आर्थिक संसाधन जुटाकर देश को विकसित करने का जो  बीड़ा उठाया उसका ही सुपरिणाम केन - बेतवा लिंक परियोजना के शिलान्यास के रूप में देखने मिल रहा है। इस महत्वपूर्ण प्रकल्प को मूर्त रूप देने के लिए प्रधानमंत्री श्री मोदी के साथ ही प्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव भी बधाई के हकदार हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इस तरह की अन्य लंबित परियोजनाएं भी जल्द ही शुरू की जाएंगी जिससे जल संसाधनों का समुचित उपयोग हो सके। 


- रवीन्द्र वाजपेयी