Tuesday, 30 September 2025

कांग्रेस की फजीहत कर दी चिदंबरम के खुलासे ने



ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्धविराम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी लगातार ये आरोप लगाते रहे  हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में आकर उन्होंने लड़ाई रोकी। असल में  खुद होकर ट्रम्प ने ही ये शिगूफा छेड़ा  और बीसियों बार वे इसे दोहरा भी चुके हैं। हाल ही में संरासंघ की महासभा को संबोधित करते हुए भी उन्होंने वही डींग हाँकी । हालांकि भारत सरकार अधिकृत तौर पर  कह चुकी है कि उनका दावा असत्य है और युद्धविराम पाकिस्तान के अनुरोध  के बाद स्वीकार किया गया। संसद में भी विदेश मंत्री जयशंकर  ने इसी आशय का बयान दिया। प्रधानमंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया कि आवश्यकता पड़ने पर ऑपरेशन सिंदूर जारी रहेगा। श्री गाँधी के अलावा अन्य विपक्षी नेता भी श्री मोदी को युद्धविराम के मुद्दे पर घेरते रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा कहती आई  है कि मोदी  सरकार ने तो पहलगाम हमले के जवाब में पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा। लेकिन 2008 में 26 नवम्बर को मुंबई के होटल ताजमहल पर हुए आतँकवादी हमले के बाद उस समय की मनमोहन सरकार ने वैसा साहस नहीं दिखाया।  कांग्रेस आज तक इस बारे में कोई समुचित स्पष्टीकरण नहीं दे सकी। लेकिन उसके लिए मुसीबत खड़ी कर दी उसके  दिग्गज नेता और पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम के खुलासे ने, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि मुंबई आतंकी हमले के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार ने भारी अंतर्राष्ट्रीय दबाव  के कारण पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई नहीं की । श्री चिदंबरम के मुताबिक वे  बदला लेना चाहते थे लेकिन सरकार राजी नहीं हुई। एक चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि मैं गृहमंत्री उस दिन बना जब आतंकवादियों को मार दिया गया । वह रविवार का दिन था, जब मुझे प्रधानमंत्री ने बुलाकर कहा  कि आपको वित्त से गृह गृह मंत्री बनाया जा रहा है। उस वक्त मेरे मन में आया कि बदला लेना चाहिए। मैंने प्रधानमंत्री और बाकी  लोगों से इस मामले पर चर्चा की थी, लेकिन निष्कर्ष यह निकला  था कि हमें  सीधे प्रतिक्रिया की जगह कूटनीतिक तरीका अपनाना चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय  अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस, मेरे पद संभालने के दो-तीन दिन बाद मुझसे और प्रधानमंत्री से मिलने आई थीं  और उन्होंने कहा था कि प्रतिक्रिया नहीं दें। इस खुलासे ने भाजपा को कांग्रेस और राहुल  पर आक्रामक होने का अवसर दे दिया। श्री चिदंबरम कांग्रेस में प्रथम पंक्ति के नेता हैं। महत्वपूर्ण मंत्रालय उन्होंने संभाले हैं। उनके द्वारा उस आतँकवादी घटना के बाद मनमोहन सरकार द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध सख्त कारवाई नहीं करने के पीछे अमेरिका की विदेश मंत्री का  दबाव बताये जाने से कांग्रेस के सामने शर्म से नजरें झुकाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा। अपने ही वरिष्ट नेता द्वारा मनमोहन सरकार की पोल खोलना जिसमें वे खुद ही गृह मंत्री रहे, निश्चित रूप से बड़ी बात है। प्रधानमंत्री पर ट्रम्प के दबाव में युद्धविराम करने का आरोप राहुल अब किस मुँह से लगाएंगे ये बड़ा सवाल है। श्री चिदंबरम के खुलासे ने भाजपा को ऐसा हथियार दे दिया  जिसका  सामना  करने में कांग्रेस को पसीने आ जाएंगे। उसकी अपनी  सरकार में  गृह मंत्री  रहे व्यक्ति के सार्वजनिक बयान को  गलत बताना उसके लिए असंभव होगा। राजनीति से इतर  देखें तो मनमोहन सरकार का अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान पर सैन्य कारवाई नहीं करना देश के साथ धोख़ा ही कहा जाएगा। कूटनीतिक विकल्प अपनाए जाने की जो सलाह अमेरिकी विदेश मंत्री ने डॉ. मनमोहन सिंह को दी वैसी ही माउंटबेटन ने 1948 में नेहरू जी को कश्मीर के मामले में दी  थी जिसे मानकर वे कबायली हमले का जवाब देकर पूरे  कश्मीर पर कब्जा करने के बजाय राष्ट्र संघ चले गए जिससे  मसला आज तक उलझा हुआ है। मनमोहन सिंह का  अर्थशास्त्रीय ज्ञान निश्चित तौर पर प्रशंसनीय था किंतु  उनमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी। उसका कारण गाँधी परिवार का दबाव ही माना जाता है। वे तो इस दुनिया में नहीं रहे किंतु उनके गृह मंत्री द्वारा जो बातें मुंबई में हुए आतँकवादी हमले के सम्बन्ध में उजागर की गईं उनके बाद कांग्रेस ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाने लायक नहीं बची। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 29 September 2025

इस जीत ने ऑपरेशन सिंदूर जारी रहने का एहसास करवा दिया


क्रिकेट का एशिया कप शुरू होने पर भारत और पाकिस्तान के लीग मैच के पहले बड़ी संख्या में लोगों ने गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा कि इससे पहलगाम में शहीद हुए लोगों के परिजनों को दुख होगा। पानी और खून एक साथ नहीं बहने की बात भी याद दिलाई गई। क्रिकेट नियंत्रण मंडल में गृह मंत्री अमित शाह के बेटे की मौजूदगी का हवाला देते हुए कटाक्ष किये गए कि पैसे की लालच में भारतीय टीम को पाकिस्तान से खेलने की शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। लेकिन इन सभी प्रतिक्रियाओं के कारण जब दोनों के बीच पहला मैच खेला गया तब दुबई के स्टेडियम में भारतीय दर्शक भी नाममात्र के थे। देश में भी टीवी पर लोगों ने मैच देखने से परहेज किया । और तो और भारतीय टीम के जीतने के बाद सड़कों पर उतरकर जश्न मनाने वाले मंजर भी नहीं दिखे। लेकिन ये खबर आने पर क्रिकेट प्रेमियों को संतोष हुआ कि भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव ने पाकिस्तानी कप्तान से हाथ नहीं मिलाया। दूसरी खबर जिसने इस प्रतियोगिता के प्रति रुचि बढ़ाई वह थी उस मैच के दौरान एक पाकिस्तानी खिलाड़ी द्वारा विमान गिरने का इशारा कर भारतीयों को चिढ़ाने का काम किया। उसका आशय ऑपरेशन सिंदूर में भारत के लड़ाकू विमान गिराए जाने से था। उस दृश्य को देखने के बाद भारत में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के विरुद्ध परंपरागत प्रतिद्वंदिता की भावना जागृत हो गई। कुछ लोगों ने ये भी कहा कि यदि मैच नहीं खेलते तो ये न देखना पड़ता। लेकिन बात यहीं नहीं रुकी और आखिर में प्रतियोगिता के फ़ायनल में भी दोनों टीमें पहुँच गईं। ऐसे में ये तंज भी सुनाई देने लगे कि यदि हमारी टीम एशिया कप जीत भी गई तब उसे पाकिस्तान क्रिकेट नियंत्रण मंडल के अध्यक्ष  मोहसिन नकवी से ट्राफी लेना पड़ेगी जो वहाँ के गृह मंत्री भी हैं और एशिया क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष भी। लेकिन भारतीय टीम  ने इस बारे में पहले ही कह दिया था कि वह नकवी से विजेता ट्राफी नहीं लेगी। इसीलिए कल हुए फायनल मुकाबले को लेकर भारत में पहले जैसा रोमांच लौटने लगा। इसमें दो राय नहीं कि मुकाबला काफी कड़ा और नजदीकी था। पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए अच्छी शुरुआत की लेकिन एक बार जो विकेट गिरना शुरु हुआ तो भारतीय गेंदबाज हावी होते चले गए और 146 रनों पर पारी समेट दी। जवाब में भारत की शुरुआत बेहद खराब थी। प्रतियोगिता के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बने अभिषेक शर्मा के साथ ही शुभमन गिल और कप्तान सूर्यकुमार सस्ते में चलते बने किंतु उसके बाद तिलक वर्मा , संजू सैमसन और  शिवम दुबे की साझेदारियों ने भारत को जीत के करीब पहुंचा दिया । जिसे तिलक की नाबाद पारी ने संभव बना दिया। इसके बाद भारतीय टीम ने नकवी से ट्राफी लेने से इंकार कर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उपजी राष्ट्रीय भावना को उभार दिया। उधर नकवी भी अड़ गए कि विजेता टीम को वही एशिया कप सौंपेंगे। घंटे भर गतिरोध रहने के बाद भी जब भारतीय टीम नहीं मानी तब खिसियाए नकवी ट्राफी के अलावा भारतीय  खिलाड़ियों को दिये जाने वाले मेडल लेकर चलते बने। उधर सूर्यकुमार ने टीम के साथ मैदान में आकर जीत का उत्सव मनाते हुए भारतीय दर्शकों को हर्षित किया जो इस मैच को देखने बड़ी संख्या में पहुंचे थे। इधर देश में भी मैच को लेकर उत्सुकता बढ़ चली थी और जब आधी रात के समय रिंकू सिंह ने विजयी चौका लगाया तो वाकई ऑपरेशन सिंदूर वाला जोश छा गया। मैच के बाद सूर्यकुमार ने सधे शब्दों में पत्रकारों से बात की और प्रतियोगिता में मिली अपनी पूरी राशि भारतीय सेना को देने की घोषणा की जिसे सुनकर लोग भावुक हो उठे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी बधाई में ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र कर पाकिस्तान के जले पर नमक छिड़क दिया। हालांकि पुरस्कार समारोह का बहिष्कार करने पर पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड भारतीय टीम के विरुद्ध अनुशासन तोड़ने की शिकायत आईसीसी में कर सकता है किंतु उसके अध्यक्ष भी भारत के जय शाह ही हैं। और फिर भारत के बिना आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की कल्पना उसी तरह नहीं की जा सकती जैसे कभी वेस्ट इंडीज के साथ था। खेल में हार जीत  चला करती है किंतु पाकिस्तान टीम चूंकि सदैव विद्वेष का भाव रखती है लिहाजा उसके साथ ऐसा व्यवहार ही उचित है। नकवी से ट्राफी नहीं लेकर सूर्यकुमार ने जो साहस दिखाया उससे पूरे देश में खुशी है। इस जीत ने ऑपरेशन सिंदूर के जारी रहने का एहसास करवा दिया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 27 September 2025

वांगचुक की गिरफ्तारी पूरी तरह सही कदम



लद्दाख की राजधानी लेह में हुई हिंसा के बाद पूर्ण राज्य सहित अन्य मांगों के लिए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सोनम वांगचुक को गत दिवस राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया। वे कल दोपहर 2.30 बजे एक पत्रकार वार्ता करने वाले थे किंतु उसके पूर्व ही उनकी गिरफ्तारी हो गई। लद्दाख़ में बीते तीन दिन से कर्फ्यू लगा हुआ है साथ ही इंटरनेट सेवाएं भी बंद है। स्मरणीय है आंदोलन के हिंसक होने के बाद बजाय हिंसा करने वालों को रोकने के वांगचुक लेह छोड़कर अपने गाँव जाकर बैठ गए। हालांकि उन्होंने हिंसा की निंदा करते हुए ये सफाई भी दी कि जिन लोगों ने लेह में उपद्रव मचाया वे उनके लिए अनजान थे। ऐसा कहने के पीछे उनका उद्देश्य अपने आप को दूध का धुला साबित करना था किंतु लगे हाथ वे ये धमकी देने से बाज नहीं आये कि उनकी गिरफ्तारी हुई तो  हालात और बिगड़ेंगे। इस समूचे घटनाक्रम  का कारण  केन्द्र सरकार द्वारा आंदोलनकारियों से बातचीत हेतु 6 अक्टूबर की तारीख तय करना बताया जा रहा है किंतु इस तथ्य पर पर्दा डाल दिया गया कि सरकार  26 सितंबर को ही बातचीत करने तैयार हो गई थी। इसके बाद भी अचानक हिंसा और आगजनी से साफ हो गया कि कुछ लोग नहीं चाहते थे कि शांतिपूर्ण समाधान निकले। सबसे बड़ी बात ये है कि इस विवाद में वे ताकतें बिना देर किये कूद पड़ीं जिन्हें आंदोलनजीवी कहा जाता है। जेएनयू, अलीगढ़  , जादवपुर और उस्मानिया विवि, किसान आंदोलन, शाहीन बाग जैसे आंदोलनों का समर्थन करने वाला तबका जिस तत्परता से वांगचुक के पक्ष में मुखर हुआ वह देखकर कहा जा सकता है कि लेह में जो कुछ भी हुआ उसकी पटकथा पहले से तैयार थी। नेपाल में युवाओं द्वारा हिंसा के जोर पर किये सत्ता परिवर्तन के बाद भारत में तमाम विपक्षी नेताओं सहित आंदोलनजीवियों के समूहों द्वारा भारत में भी वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी। वांगचुक ने भी नेपाल के जेन जी आंदोलन का जिक्र करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को चुनौती देने का दुस्साहस किया किंतु जब  हिंसा की आग में उनके ही हाथ जलने लगे तब  मुकर गए। बाद में  एक पत्रकार ने जब उक्त बयान के सबूत दिखाये तो उनकी बोलती बंद हो गई।  एक  बात  साफ तौर पर नजर आ रही है कि जो लोग जम्मू - कश्मीर में अलगाववादी ताकतों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए अफज़ल गुरु की फांसी  पर छाती पीटते रहे वही चेहरे आज वांगचुक को महात्मा गाँधी का अवतार साबित करने में जुटे हुए हैं। उनके एनजीओ को मिली विदेशी आर्थिक सहायता की जाँच पर भी उंगलियाँ उठाई जा रही हैं। वांगचुक ने भी उनको गिरफ्तार किये जाने के विरुद्ध केंद्र सरकार को उसी तरह धमकाने का प्रयास किया जैसा धारा 370 हटाये जाने के पहले फारुख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती करते थे। ऐसे में  केन्द्र सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करने का जो कदम उठाया वह पूरी तरह सही और जरूरी था। लद्दाख कोई साधारण इलाका नहीं है। चीन और पाकिस्तान दोनों की सीमाएं इसके करीब होने से सुरक्षा संबंधी चिंता सदैव बनी रहती है।  विचारणीय बात ये भी है कि बीते कुछ सालों में लद्दाख़ में बौद्ध बाहुल्य पहले जैसा नहीं रहा और कश्मीरी मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी। ऐसे में वांगचुक के आंदोलन में  मुस्लिम घुसपैठ से भी इंकार नहीं किया जा सकता। यदि वे पाक - साफ होते तो गाँधी जी की तरह अनशन तोड़ने के बाद हिंसा ग्रस्त इलाकों में शांति मार्च निकालते और उपद्रवियों की पहचान कर उन्हें पुलिस के हवाले करवाते परंतु वे केन्द्र सरकार को ही कटघरे में खड़ा करने की जुर्रत कर बैठे। जाहिर है ऐसे व्यक्ति को खुला छोड़ना घातक होता। उनको मिलने वाले विदेशी धन की जाँच के साथ  साथ ही विदेश यात्राओं के दौरान वे किन - किन भारत विरोधी लोगों से मिले इसका ब्यौरा भी सार्वजनिक हो जिससे पता चले कि पर्यावरण संरक्षण और शिक्षा क्षेत्र में किये जा रहे उनके कार्यों के पीछे का सच क्या है? उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में काफी कुछ प्रचारित हो रहा है किंतु एक सम्वेदनशील सीमावर्ती राज्य  में उपद्रव मचाकर देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने की कोशिश करने वाले के हौसले पस्त करना जरूरी है। भारत में बांग्ला देश और नेपाल जैसे सत्ता परिवर्तन  का मंसूबा पालन वालों को किसी भी प्रकार की रियायत देना बुद्धिमत्ता  नहीं होगी। वांगचुक ने लद्दाख़ में  पर्यावरण और शिक्षा के लिए जो किया वह अपनी जगह है । यदि उनकी महत्वाकांक्षा राजनीति में आने की है तो उन्हें खुलकर उसमें हाथ आजमाना चाहिये किंतु इसके लिए वे एक शांत सीमावर्ती इलाके में हिंसा की आग भड़काकर अपना दबदबा साबित करना चाहें तो फिर उनके साथ जो हुआ वही देशहित में है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 26 September 2025

मुआवजे से मौत का मातम कम नहीं किया जा सकता


नवरात्रि का पर्व भारत में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा - आराधना से समूचा वातावरण धर्ममय हो जाता है। जिस तरह महाराष्ट्र से शुरू होकर सार्वजनिक गणेशोत्सव देश भर में फैल गया उसी तरह बंगाल की तरह ही दुर्गा पूजा भी भव्य रूप में देश के बड़े हिस्से में आयोजित होती है। देवी प्रतिमाओं के पंडाल जन आकर्षण का केन्द्र बनते हैं। उनकी साज - सज्जा पर काफी खर्च होता है। झांकियां लगाई जाती हैं। देवी जागरण जैसे आयोजन भी होने लगे हैं। बीते कुछ दशकों से दुर्गा पूजा के साथ ही नवरात्रि पर गरबा के आयोजनों की धूम रहती है। आम जनता सपरिवार दुर्गा प्रतिमाओं के दर्शन हेतु निकलती है जिससे यह पर्व विराट रूप ले लेता है। लेकिन इस दौरान कुछ हादसे ऐसे हो जाते हैं जो हर्षोल्लास के वातावरण को शोक में बदल देते हैं। म.प्र के जबलपुर नगर में भी बीते  दिनों दुर्गा पंडालों में बिजली के करेंट से तीन लोग जान से हाथ धो बैठे जिनमें दो मासूम बच्चे भी थे।  कटे और खुले हुए  तारों के कारण पंडाल में लगे लोहे के खम्बे में करेंट प्रवाहित हो गया जिसे छूने वाले दो बच्चे और एक अन्य व्यक्ति मौत का शिकार हो गया। जाँच में बिजली विभाग ने पंडाल लगाने वाले पर अवैध कनेक्शन लेकर बिजली चोरी का आरोप लगा दिया।  हालांकि आयोजकों  द्वारा  अस्थायी कनेक्शन लेने का दावा भी किया जा रहा है किंतु वह केवल रस्म अदायगी थी और चोरी की बिजली से पंडाल रोशन था। जिस बिजली ठेकेदार अथवा डेकोरेटर ने उक्त पंडालों में विद्युत साज - सज्जा की उसकी  लापरवाही  तीन मानवीय ज़िंदगी निगल गई। उसके बाद बिजली महकमा जागा। दो दर्जन जाँच दल गठित कर दिये गए जो शहर भर के दुर्गा पंडालों में जाकर देखेंगे कि जो बिजली फ़िटिंग हुई वह नियमानुसार और सुरक्षा मानकों के अनुरूप है अथवा नहीं? दोषपूर्ण होने पर सम्बंधित ठेकेदार को उसे दुरुस्त करने कहा जायेगा अन्यथा बिजली काट दी जाएगी। सवाल ये उठता है कि ये कवायद पंडाल बनते ही क्यों नहीं की गई ?  सार्वजनिक आयोजनों में चोरी की बिजली का इस्तेमाल हमारे देश में आम बात है। पुलिस - प्रशासन, बिजली विभाग सहित क्षेत्रीय नेताओं को भी इसकी जानकारी होती है। लेकिन उससे बड़ा अपराध है घटिया  बिजली फ़िटिंग । जिस ठेकेदार अथवा डेकोरेटर के जिम्मे वह काम होता है वह तारों की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखता। उनके जोड़ खुले रहते हैं। पहले पंडालों में बाँस और बल्लियों का उपयोग होने से करेंट फैलने की संभावना कम होती थी किंतु आजकल लोहे के ढांचे खड़े होने से उसका खतरा बढ़ गया  है।  साथ ही प्लास्टिक  और थर्मोकोल भी काफी उपयोग होने लगा है जो बेहद ज्वलनशील होते हैं। समय - समय पर ऐसे आयोजनों में घटिया बिजली फ़िटिंग के कारण अग्निकांड के समाचार आते हैं जिनमें धनहानि के साथ ही जनहानि भी होती है। दुर्भाग्य से जिन  विभागों पर ऐसी अनियमितताओं को रोकने की जिम्मेदारी है वे दुर्घटना होने के बाद ही मुस्तैदी दिखाते हैं। जबलपुर की उक्त घटनाओं, को ही लें तो बिजली विभाग के लोगों ने जिन पंडालों को अस्थायी कनेक्शन दिये उनमें हुई बिजली फिटिंग की जांच क्यों नहीं की, इसका उत्तर मिलना चाहिए। जिला प्रशासन का भी दायित्व है कि जिन दुर्गा समितियों को पंडाल लगाने हेतु अनुमति दी गई उनके द्वारा अस्थायी कनेक्शन संबंधी जानकारी लेता जिससे चोरी की बिजली जलाने वाले पकड़े जाते। कुल मिलाकर इन छोटी सी कही जाने वाली घटनाओं का कारण महज लापरवाही ही है जिसमें आयोजक, ठेकेदार, बिजली विभाग और प्रशासन सभी की भूमिका है। साधारण दुर्घटना होती तब वह छोटी सी खबर मानकर भुला दी जाती। लेकिन तीन इंसानों की जान लेने वाली इस लापरवाही को कागजी जांच में उलझाकर उपेक्षित कर देना गंभीर अपराध है जिसके  सभी जिम्मेदारों को दंडित किया जाना चाहिए। साथ ही ऐसे हादसे आगे न हों इसके बारे में पूरी सतर्कता का पुख्ता इंतजाम जरूरी है क्योंकि दो - चार लाख रु. के  मुआवजे से मौत का मातम कम नहीं किया जा सकता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 25 September 2025

लद्दाख़ में हुई हिंसा बड़ी चिंता का विषय


बौद्ध  बाहुल्य  शांतिप्रिय लद्दाख़ की राजधानी लेह में गत दिवस हुई हिंसा और आगजनी की घटनाओं के बाद भले ही पूर्ण राज्य के लिए आंदोलन कर रहे  सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक  अनशन समाप्त कर अपने गाँव चले गए किंतु जाते - जाते उनका  ये कहना रहस्य खड़े कर गया कि कि कुछ अज्ञात युवाओं ने वह सब किया । पूर्ण राज्य के दर्जे के अलावा अन्य मांगों को लेकर केंद्र ने  चर्चा के लिए शीर्ष निकाय, लेह (एबीएल) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के साथ 6 अक्टूबर को उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक पहले ही निर्धारित कर दी थी। वार्ता को स्थगित करने का अनुरोध मिलने पर, 25-26 सितंबर को अनौपचारिक चर्चाओं का एक दौर निर्धारित किया गया था। एबीएल के सह अध्यक्ष चेरिंग दोरजय लकरूक का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह सोनम वांगचुक के अनशन स्थल पर घोषणा कर रहे हैं कि एक प्रतिनिधिमंडल 26 सितंबर को बातचीत के लिए दिल्ली जा रहा है।ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सरकार के साथ बातचीत तय थी, तो फिर  हिंसा क्यों भड़की जिसमें 4 लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हैं।भाजपा दफ्तर के साथ ही अनेक सरकारी प्रतिष्ठान फूंक दिये गए।इस बारे में केंद्र सरकार के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि  सोनम वांगचुक, जो लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा देने जैसी मांगों को लेकर आमरण अनशन कर रहे थे, लंबे समय से लद्दाख में अरब स्प्रिंग-शैली के विरोध प्रदर्शन की इच्छा जता रहे थे और उन्होंने नेपाल में जेन जी के विरोध प्रदर्शनों का भी ज़िक्र किया था। ये देखते हुए शक की सुई उन्हीं पर आकर ठहर रही है। गत वर्ष भी वांगचुक पद यात्रा करते हुए दिल्ली गए थे जहाँ प्रधानमंत्री ने उनकी मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया था। इस दौरान लद्दाख़ और कारगिल के उक्त संगठनों के साथ केंद्र ने बातचीत का समय तय किया। लगता है लद्दाख़ के कुछ राजनीतिक दलों सहित वांगचुक चाहते थे कि वार्ता में उन्हें भी शामिल किया जाए। कल जो घटना हुई उसके पीछे इसीलिए किसी षडयंत्र का संदेह मजबूत हो रहा है। सबसे अधिक चिंता का विषय ये है कि लद्दाख़ और कारगिल की भौगोलिक स्थिति बेहद सम्वेदनशील है। चीन और पाकिस्तान दोनों इस क्षेत्र पर निगाहें गड़ाए हुए हैं। कारगिल तो मुस्लिम बहुल इलाका है लेकिन जम्मू - कश्मीर का हिस्सा होने के बाद भी लद्दाख़ बौद्ध बहुल है। वहाँ के मूल निवासी शांतिप्रिय है। इसके पहले लद्दाख़ में पहले कभी इस प्रकार की स्थितियाँ नहीं देखने मिली। वांगचुक की छवि हालांकि एक पर्यावरण प्रेमी के रूप में रही किंतु  लद्दाख़ और कारगिल को जम्मू - कश्मीर से अलग कर वहाँ के लिए प्रशासनिक काउंसिल बना दी गई। धारा 370 हटने के बाद इस क्षेत्र को जब अलग हैसियत मिली तब यहाँ बुनियादी सुविधाओं का जबरदस्त विकास हुआ। जिसकी वजह से कभी मुख्यधारा से कटा यह इलाका आज देशी - विदेशी पर्यटकों से भरा पड़ा रहता है। यहाँ के जनजातीय समाज को देखते हुए आरक्षण भी 80 फीसदी करने के अलावा महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दे दिया गया। इसके बाद भी जब केंद्र से आज ही वार्ता होने का निर्णय हो गया तब अचानक तनाव उत्पन्न कर लेह को आग के हवाले करना निश्चित तौर पर इस सीमावर्ती इलाके की सुरक्षा को खतरे में डालने का प्रयास ही था। वांगचुक का एक चित्र भी प्रसारित हो रहा है जिसमें वे बांग्लादेश की सरकार के सलाहकार मो. युनुस के साथ गलबहियाँ करते नजर आ रहे हैं। उन्हें मिलने वाली विदेशी सहायता पर भी अंगुलिया उठ रही हैं। गत दिवस जो कुछ भी हुआ उसके पीछे किसी साजिश से इंकार नहीं किया जा सकता। नेपाल में जेन जी के विरोध प्रदर्शन का जिक्र वांगचुक द्वारा किये जाने से भी उन पर संदेह बढ़ रहा है। जम्मू - कश्मीर के साथ रहते लद्दाख़ पिछड़ेपन का शिकार रहा।  बीते कुछ सालों में वहाँ विकास की रोशनी पहुँचने लगी है। लेकिन वांगचुक ने वहाँ अलगाववाद के बीज बोना शुरू कर दिया। वे किसी राजनीतिक दल के मोहरे हैं या कोई विदेशी शक्ति उनको आगे रखकर देश की सुरक्षा को खतरे में डालना चाह रही है ये जाँच का विषय है। केंद्र सरकार को चाहिये वह गत दिवस हुई हिंसा को गंभीरता से ले और दोषी तत्वों के विरुद्ध कड़े कदम उठाये। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 24 September 2025

12 लाख तक आयकर छूट और जीएसटी में कमी का असर दिखने लगा


जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। 22 सितंबर को जैसे ही जीएसटी की नई दरें लागू हुईं बाजार में जमकर खरीददारी हुई। चार पहिया वाहनों की बिक्री ने पिछले सभी  कीर्तिमान ध्वस्त कर दिये । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस भारतीय अर्थव्यवस्था का मृत बताकर  मजाक उड़ाया था उसने न सिर्फ अपने जीवित रहने अपितु शक्तिशाली होने का भी प्रमाण ऊँची आवाज में दे दिया। बाजार से जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार उपभोक्ताओं ने जीएसटी की दरों में किये गए बदलावों का खुलकर स्वागत करते हुए खरीददारी के रूप में अपना उत्साह प्रदर्शित किया। यह  उन आलोचकों को करारा जवाब है जिन्होंने  प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से किये गए वायदे के पूरा होने में संदेह व्यक्त किया था। इस साल के केंद्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा 12 लाख कर दी गई थी । लिहाजा मध्यमवर्ग के पास बचत के लिए अतिरिक्त पैसा आया। उस पर जीएसटी की दरों में किये गए सुधारों ने सोने पे सुहागा वाली कहावत चरितार्थ कर दी। यही वजह है कि ट्रम्प द्वारा छोड़े  गए टैरिफ रूपी तीरों के बाद भी अर्थव्यवस्था के पाँव मजबूती से टिके हुए हैं। विदेशी निवेशकों ने जब शेयर बाजार से अपना धन वापस निकाला तब घरेलू  निवेशकों ने अपनी पूंजी से उस झटके को बेअसर कर दिया। ट्रम्प की हरकतें  लगातार जारी हैं। और वे रोजाना कुछ न कुछ ऐसा कर जाते हैं जिससे भारत हताश  होकर घुटना टेक हो जाए। लेकिन सरकार ने साफ कर दिया कि भारत  टैरिफ के दबाव से बचने के लिए अपनी जनता के हितों को नजरंदाज नहीं करेगा। ट्रम्प अमेरिका के कृषि और दुग्ध उत्पादों के लिए भारत के बाजार खोलने के लिए टैरिफ को हथियार बना रहे थे जिसे सरकार ने कोई महत्व नहीं दिया । हालांकि  50 फीसदी टैरिफ लगने से  भारत के निर्यात पर असर हुआ है  जिससे उद्योग - व्यापार जगत के माथे पर पसीने की बूंदें झलकने लगी थीं किंतु जीएसटी में हुए  बदलाव से व्यापार जगत की चिंताएं काफी हद तक दूर हो गईं। पहले दिन ही जिस तरह की खरीददारी हुई उसने टैरिफ के दबाव को काफी हद तक घटा दिया। वह भी तब जब महीने के अंतिम सप्ताह में नौकरपेशा मध्यम वर्ग का हाथ तंग रहता है। 22 सितंबर को बाजार में जो रौनक नजर आई उसके बाद आर्थिक विशेषज्ञ भी ये मान रहे हैं कि अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में जब वेतन हाथ आएगा तब दीपावली सीजन की खरीदी और भी उत्साह से होगी। आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार को विफल बताने वाले आलोचक ये जानकर हैरान होंगे  कि ट्रम्प के ही देश की अनेक प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियों ने मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत की विकास दर के 7 फीसदी रहने की ताजा भविष्यवाणी कर दी है। इसके जो कारण बताये गए  उनमें पहली तिमाही के उत्साहवर्धक नतीजों के अलावा, आयकर छूट की सीमा में बड़ी वृद्धि और उसके बाद जीएसटी की दरों में किया गया बदलाव हैं। इन सबका समन्वित परिणाम ही बाजार में आ रही उछाल के रूप में  नजर आया। अच्छा मानसून भी अर्थव्यवस्था में मज़बूती के संकेत दे रहा है। यदि बाजार में मांग बढ़ेगी तो निश्चित तौर पर उत्पादन इकाइयों को  भी काम मिलेगा जिसका परिणाम रोजगार के अवसर बढ़ने के रूप में सामने आयेगा। कुल मिलाकर बीते छह माह में हुए दो आर्थिक सुधारों ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में गतिशीलता बने रहने की सम्भावनाएँ बढ़ा दी हैं। 12 लाख तक की आय  कर मुक्त किये जाने के बाद जीएसटी की दरों में हुए बदलाव का असर पूरी तरह आने में कुछ समय तो लगेगा । देखने वाली बात ये भी है कि दरें कम होने का प्रभाव जीएसटी की मासिक वसूली पर कितना होगा। हालांकि वित्तीय विशेषज्ञ मानकर चल रहे हैं कि बिक्री बढ़ने से जल्द ही, पुराना आंकड़ा लौट आयेगा जो बुनियादी ढांचे सहित अन्य विकास कार्यों और जन कल्याण की योजनाओं के निर्बाध संचालन के लिए अत्यावश्यक है। फिलहाल तो चारों तरफ से सकारात्मक संकेत ही मिल रहे हैं जिनसे लगता है देश का मनोबल काफी ऊंचा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 September 2025

प्रतिभा पलायन रोकने ठोस योजना जरूरी


अमेरिका के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा वीजा नियमों में बदलाव से भारत की आई.टी कंपनियों के साथ ही उच्च शिक्षित युवाओं में चिंता व्याप्त है। कर्ज लेकर अमेरिका पढ़ने गए उन विद्यार्थियों के सामने भी संकट आ गया जिन्होंने वहीं काम करने या बसने का सपना देखा था। हालांकि जो भारतीय पहले से H-1B वीजा धारक हैं उनके लिए नियम पूर्ववत रहेंगे किंतु 21 सितंबर के बाद से जो नये आवेदन आयेंगे उन्हें 1 लाख डॉलर ( भारतीय 88 लाख रु.) का भुगतान करना होगा। अभी यह वीजा तीन साल के लिए मिलता है जिसे छह वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। लेकिन नये आवेदनों के लिए उक्त वीजा नवीनीकरण के समय दोबारा भुगतान नहीं करना होगा।  इस फैसले से भारत ही नहीं अमेरिका में भी हड़कंप है क्योंकि उसकी आई. टी कंपनियों में भारतीय पेशेवरों की भरमार है। सिलिकान वैली नामक आई. टी के गढ़ में तो लघु भारत प्रतीत होता है। यही वजह है कि ट्रम्प को 24 घंटों में ही यह स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि पुराने H-1B वीजा धारकों को नये शुल्क से मुक्त रखा जाएगा और वे पहले की तरह अमेरिका से बाहर जाकर बेरोकटोक वापस लौट सकते हैं। इस नये नियम के लागू होने से अमेरिका की आई. टी कंपनियां ही नहीं बल्कि नासा जैसा अंतरिक्ष संस्थान भी परेशानी महसूस करने लगा जिसमें भारतीय इंजीनियर और वैज्ञानिक महत्वपूर्ण पदों पर हैं। अमेरिका के वित्तीय संस्थानों में भी भारतीय विशेषज्ञ सेवाएं दे रहे हैं। नये वीजा नियमों का परिणाम ये होगा कि अमेरिका में कुशल और मेधावी युवाओं का प्रवेश तेजी से घटेगा जिसका  खामियाजा  एक - दो वर्षों बाद नजर आने लगेगा। हालांकि ट्रम्प के इस  कदम का उद्देश्य अमेरिकी युवाओं की बेरोजगारी दूर करने के अलावा भारतीय कंपनियों द्वारा भेजे गए इंजीनियरों एवं अन्य कर्मियों को अमेरिकी मानकों से कम वेतन देने से पैदा विसंगति दूर करना भी है। आज खबर आ रही है कि ट्रम्प बाहर से आने वाले नये डॉक्टरों के लिए वीजा शुल्क में कमी करते हुए उसे आधा करने जा रहे हैं क्योंकि 88 लाख रु. का भारी - भरकम शुल्क देकर अमेरिका में नौकरी करने की हिम्मत कम ही दिखा सकेंगे। सही बात ये है कि अमेरिका की स्वास्थ्य सेवाओं में भारतीय चिकित्सकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यदि उनमें से आधे वहाँ से लौट आएं तो स्थिति पूरी तरह बिगड़ जाएगी।  वैसे ट्रम्प के हालिया सभी निर्णयों के पीछे अमेरिका के नागरिकों के हितों का संरक्षण करना है। लेकिन ऐसा करते हुए वे उन जमीनी सच्चाइयों को नजरंदाज करते जा रहे हैं जो अमेरिका के साथ अभिन्न तौर पर जुड़ी हैं। उनके सनकीपन की प्रतिक्रिया स्वरूप चीन सहित अनेक देशों ने अपने वीजा नियमों में ढील देते हुए भारत के प्रतिभाशाली युवाओं के लिए अपने द्वार खोलने के संकेत दे दिये हैं। लेकिन ट्रम्प के फैसलों के परिप्रेक्ष्य  में  भारत से प्रतिभा पलायन को लेकर होने वाला विमर्श एक बार फिर प्रासंगिक हो चला है। सरकार और समाज दोनों को इस बारे में खुलकर सोचना चाहिए कि वे कौन से कारण हैं जिनके कारण भारत के मेधावी युवा अमेरिका या अन्य किसी विकसित देश में जाकर काम करने और फिर वहीं बस जाने के लिए लालायित रहते हैं। हालांकि बीते कुछ समय से इस प्रवृत्ति में कतिपय बदलाव देखने मिले हैं। हजारों युवा पेशेवरों ने  विदेशों से नौकरी छोड़कर भारत में काम जमाया और सफलता पूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। इस सोच का विकास जरूरी है जिसमें सरकार और समाज को एक साथ प्रयास करने होंगे।  अभिभावकों को भी अपने बच्चों को इस बात के लिए प्रेरित करना चाहिए कि वे अपनी प्रतिभा का उपयोग अपने देश के लिए करें। इस बारे में तरह - तरह की शिकायतें सुनने मिल जाएंगी लेकिन प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना भी तो हमारा ही दायित्व है।  यदि मदारियों और सपेरों का देश होने के कलंक को धोकर भारत  विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बन सकता है तब अपने मेधावी युवाओं के कौशल और प्रतिभा का समुचित उपयोग करने का रास्ता भी तैयार करना समय की मांग है। भारतीय आज वैश्विक समुदाय बन चुके हैं ।  दुनिया के हर कोने में उनकी  उपस्थिति दिखाई देती है। लेकिन  हमारी प्रतिभाएं अन्य देशों के विकास में योगदान दें क्योंकि उन्हें स्वदेश में काम करने लायक परिस्थितियाँ और अवसर नहीं मिलते तो ये गंभीर चिंता का विषय है। केन्द्र सरकार को चाहिए वह प्रतिभा पलायन रोकने के लिए  ठोस और दूरगामी प्रभाव वाली योजना शुरू करे जिसमें विदेश से लौटकर आने वालों को प्रोत्साहित किया जावे। ट्रम्प के वीजा संबंधी फैसले को भी आपदा में अवसर मानकर देश में ही वैसा माहौल और कार्य संस्कृति विकसित करनी होगी जिसके आकर्षण में हमारी प्रतिभाएं विदेश चली जाती हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी