Monday, 3 November 2025

महिला क्रिकेट विश्व कप की जीत भारतीय लड़कियों के लिए प्रेरणादायी


निशानेबाजी, मुक्केबाजी और बैंडमिंटन जैसे खेलों में वैश्विक स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद गत दिवस भारत की महिला क्रिकेट टीम ने विश्व कप मुकाबला जीतकर पूरे देश को आनंदित कर दिया। हालांकि इसके पूर्व भी दो बार हमारी टीम महिला क्रिकेट विश्व कप के अंतिम मुकाबले तक पहुंची किंतु  जीत से वंचित रही। लेकिन इस बार पहले सेमी फाइनल और फिर अंतिम मुकाबले में इस टीम  ने जो प्रदर्शन किया उसके बाद ये सिद्ध हो गया  कि भारत में क्रिकेट की जड़ें काफी मज़बूत हो गई हैं। पुरुषों की टीम तो पहले भी कई बार विश्व कप जीत चुकी है किंतु लड़कियों ने पहली बार देश को गौरवान्वित किया है। पुरुषों की टीम के खिलाड़ियों को तो धन भी खूब मिलता है। उनकी लोकप्रियता फिल्मी सितारों को टक्कर देती है। सचिन तेंदुलकर तो क्रिकेट से सन्यास लेने के बाद भी राष्ट्रीय नायकों की श्रेणी में हैं  जिन्हें आखिरी मैच खेलने वाले दिन ही भारत रत्न जैसा  सर्वोच्च नागरिक  सम्मान  दिया गया। जबकि भारत को कई ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलवाने वाले हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले स्व. दादा ध्यानचंद को आज तक यह सम्मान नहीं मिला। यद्यपि  लंबे समय तक क्रिकेट पर पुरुषों का एकाधिकार रहा लेकिन धीरे - धीरे अन्य खेलों की तरह लड़कियों के लिए भी इस  खेल के दरवाजे खोले गए। शायद पूर्व में ये सोच रही होगी  कि लड़कियों की शारीरिक क्षमता घंटों तक मैदान में डटे रहने लायक नहीं है किंतु ये अवधारणा भी समय के साथ गलत साबित होती गई। फिर सवाल भारत की लड़कियों के दमखम पर भी उठे किंतु   हमारी क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीतकर ये दिखा दिया कि  आधी आबादी भी अब प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के साथ बराबरी से चलने की योग्यता और क्षमता हासिल कर चुकी है। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पत्रकारों को जानकारी देने का दायित्व दो महिला सैन्य अधिकारियों को सौंपकर  भारत ने पूरे विश्व को संदेश दे दिया कि हमारी नारी शक्ति अब चौके - चूल्हे तक ही सीमित न रहकर प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका का निर्वहन करने तत्पर है। आज  महिलाएं भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे रही है। लड़ाकू और यात्री विमानों में वे पायलट की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। बड़ी - बड़ी वित्तीय संस्थाओं का नेतृत्व उनके हाथ में हैं। विदेश और वित्त  जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय में उनका प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है। राष्ट्रपति भवन में भी अनुसूचित जनजाति की महिला विराजमान है। ओलंपिक पदक विजेताओं में भी लड़कियों का नाम दर्ज हो चुका है। राजनीति, शिक्षा, प्रशासन आदि में वे  पूरे आत्मविश्वास के साथ सक्रिय हैं। इन्हीं सबसे पूरी नारी शक्ति का हौसला बुलंद है। यही वजह है कि महिला विश्व कप क्रिकेट में भारतीय टीम के फाइनल में पहुँचने के बाद पूरा देश उनके जीतने की कामना करने लगा। वहीं मैच देखने के प्रति  स्टेडियम जैसा ही उत्साह सर्वत्र दिखाई दिया। जैसे ही टीम को विजय हासिल हुई फटाके फूटने की आवाजों ने ये जता दिया कि खेल प्रेमियों के लिए लड़कियों की जीत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे सितारों से भरी टीम द्वारा अर्जित सफलता। ये हर्ष का विषय है कि खेलों में अब मध्यम और निम्नवर्गीय परिवारों के लड़के - लड़कियां भी बढ़ - चढ़कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगे हैं। कभी ओलंपिक में केवल हॉकी का पदक मिलने की ही उम्मीद होती थी किंतु बीते वर्षों में कुश्ती, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, निशानेबाजी के अलावा भी अन्य खेलों में हमारे खिलाड़ियों ने पदक जीते। सरकार ने खेलो इंडिया कार्यक्रम के जरिये नवोदित प्रतिभाओं को उभरने का अवसर देने का जो बीड़ा उठाया वह स्वागत योग्य है। इसके अलावा देश भर में निजी क्षेत्र की खेल अकादमी बड़ी संख्या में खुलना और उनमें किशोरावस्था के लड़के  - लड़कियों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति इस बात का परिचायक है कि नई पीढ़ी में खेलों में भविष्य बनाने का आकर्षण बढ़ा है। ये भी अच्छी बात है कि खेल और खिलाड़ियों को निजी क्षेत्र द्वारा प्रायोजित किये जाने का चलन लगातार बढ़ रहा है जो पहले सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के  उद्यमों तक ही सीमित था। महिलाओं का क्रिकेट विश्व कप जीतने वाली टीम की प्रत्येक सदस्य बधाई की पात्र है। उनकी इस सफलता से अन्य लड़कियों को भी खेलों के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी इसमें संदेह नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 November 2025

बिहार में महागठबंधन की कमजोर कड़ी है कांग्रेस

आखिर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष   राहुल गाँधी  बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए उतर ही गए। हालांकि वोट अधिकार यात्रा के दौरान उन्होंने तेजस्वी यादव के साथ पूरे राज्य का दौरा कर महागठबंधन की एकता का संदेश दिया था। लेकिन फिर लंबी विदेश यात्रा पर रवाना हो गए जिसको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों ने काफी टिप्पणियां भी कीं। प्रवास से लौटने के उपरांत भी वे बिहार से दूर रहे। जिससे चर्चा होने लगी कि उनके और तेजस्वी के बीच विवाद  है। असल में  कांग्रेस 2020 की तुलना में अधिक सीट चाहती थी किंतु उसका पिछला प्रदर्शन चूंकि निराशाजनक रहा इसलिए  तेजस्वी  उसे कम सीटें देना चाहते थे।  किसी तरह वह मसला सुलझा किंतु उसके बाद भी श्री गाँधी बिहार नहीं आये तो महागठबंधन के टूटने तक की आशंका व्यक्त की जाने लगी और तब कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने पटना जाकर खाई पाटने का काम किया। उसी के बाद राहुल और प्रियंका वाड्रा के बिहार दौरे का कार्यक्रम भी घोषित हो गया। दरअसल जमीन और भर्ती घोटाले में लालू प्रसाद यादव और परिजनों  पर आरोप पत्र तैयार करने का अदालती फैसला आने के बाद तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाये जाने के लिए श्री गाँधी हिचकिचा रहे थे। और इसीलिये  उनसे मिलने के अलावा बिहार आने से भी बचते रहे। श्री गाँधी की चिंता लालू परिवार की भ्रष्ट छवि से कांग्रेस को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर थी। लेकिन तेजस्वी अड़ गए कि उनको चेहरा बनाये बिना  गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी तब जाकर कांग्रेस को झुकना पड़ा। जबकि  वोट अधिकार यात्रा के दौरान श्री गाँधी समूचे परिदृश्य पर हावी बने रहे वहीं तेजस्वी उनके  ड्राइवर की भूमिका में दिखे। उस दौरान राज्य में कांग्रेस के हालात सुधरने की उम्मीदें बढ़ने लगीं परंतु उस अनुकूल वातावरण को बनाये रखने के लिए  जिस सक्रियता की जरूरत थी उसे नजरंदाज करते हुए श्री गाँधी लंबी विदेश यात्रा पर निकल गए । उनके इस रवैये ने कांग्रेस के हाथ से वह बढ़त छीन ली जो वोट अधिकार यात्रा से हासिल हुई थी। आज  महागठबंधन यदि मुकाबले में है तो इसलिए  क्योंकि तेजस्वी उसका चेहरा हैं। कांग्रेस। अभी भी उसकी कमजोर कड़ी है जो राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद  क्षेत्रीय दल  जैसा प्रभाव छोड़ पाने में भी असफल है। ऊपर से श्री गाँधी के बयान रही - सही कसर भी पूरी किये दे रहे हैं। छठ पूजा के लिए यमुना नदी के पानी को स्वच्छ किये जाने का जो काम दिल्ली की भाजपा सरकार ने किया उसकी बिहार वासियों ने दिल खोलकर तारीफ की किंतु श्री गाँधी ने बिहार आकर उसके बारे में जो बातें कहीं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जिस तरह के कटाक्ष किये उसका उल्टा असर हो रहा है। इसी तरह उन्होंने मुकेश अंबानी के बेटे के विवाह समारोह में श्री मोदी के शामिल होने का मुद्दा छेड़कर तेजस्वी के पूरे परिवार को कठघरे में खड़ा कर दिया। उल्लेखनीय है उस विवाह में लालू प्रसाद यादव अपने पूरे परिवार सहित विशेष विमान से गए जो कि अंबानी परिवार द्वारा भेजा गया था। श्री गाँधी के उक्त बयान के बाद लालू परिवार के साथ ही कांग्रेस के तमाम नेताओं के चित्र सोशल मीडिया पर नजर आने लगे जिन्होंने उस विवाह में अंबानी परिवार की मेहमाननवाजी  का लुत्फ़ उठाया था। चुनावी रैलियों में श्री गाँधी जिस प्रकार की बातें बोल रहे हैं उनके कारण महागठबंधन को फ़ायदा कम नुकसान ज्यादा होता लग रहा है। लालू प्रसाद यादव के शासनकाल को बिहार में जंगल राज के रूप में याद किया जाता है। इसीलिये तेजस्वी तक अपने पिता का चित्र अपनी पार्टी की प्रचार सामग्री में उपयोग करने से बच रहे हैं। हालांकि प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी के कारण ये चुनाव त्रिकोणीय माना जाने लगा है। इसी वजह से भविष्यवाणी करने वाले  बेहद सतर्क है किंतु ये सभी मान रहे हैं कि राहुल का मैदान में देर से उतरना और फिर अंबानी - अडानी जैसे पुराने पड़ चुके मुद्दों में ही उलझे रहने से कांग्रेस की संभावनाएं  कमजोर हो रही हैं जिसका खामियाजा  तेजस्वी को होगा। कांग्रेस के लिए गड्ढा खोदने में उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी पीछे नहीं हैं जो बिना वजह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने की मुहिम छेड़कर ऐसा मोर्चा खोल रहे हैं जिस पर कांग्रेस हमेशा से चारों खाने चित्त होती रही है। आज की स्थिति में जब पहले चरण के मतदान हेतु मात्र पाँच दिन रह गए हैं तब जो संकेत आ रहे हैं उनके मुताबिक यदि महागठबंधन जीतता है तो पूरा श्रेय तेजस्वी के खाते में दर्ज होगा और यदि हार नसीब हुई तब उसका ठीकरा कांग्रेस पर फूटेगा जिसकी कमान श्री गाँधी के हाथ में है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 31 October 2025

अपने साथ ही अमेरिका के रौब - रुतबे को भी धरातल पर ले आये ट्रम्प

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब खुद भी अपने बनाये जाल में फंसते नज़र आ रहे हैं। जिस ठसक के साथ उन्होंने अनाप - शनाप टैरिफ थोपे वह कम होने लगी है। कुछ देशों ने तो  उनके सामने मत्था टेककर रहम की गुजारिश कर ली किंतु भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे मुल्कों ने टैरिफ रूपी आतंक का मुकाबला करने का साहस दिखाया।  ट्रम्प को ये अपनी शान के खिलाफ लगा जो दुनिया को अपने इशारों पर नचाने की महत्वाकांक्षा पाल बैठे थे। दूसरी बार  राष्ट्रपति बनने के बाद से ही उन्होंने बचकानी हरकतें शुरू कर दीं। अवैध घुसपैठियों को निकालने की कारवाई तो खैर अपनी जगह ठीक थी किंतु रूस - यूक्रेन युद्ध को लेकर उनका रवैया बेहद गैर जिम्मेदाराना रहा। उसकी वजह से  परंपरागत मित्र यूरोपीय देश भी उससे कटने लगे। अपने पड़ोसी कैनेडा पर वे अमेरिका में विलय जैसा अव्यवहारिक दबाव बनाने से भी बाज नहीं आये। इसी तरह  विदेश व्यापार में घाटे के नाम पर कई गुना  टैरिफ (आयात शुल्क) लगाकर  एक तरह का आर्थिक आपातकाल पूरे विश्व पर थोप दिया। उन्हें चीन और भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने पर भी ऐतराज है तो ब्रिस्क नामक संगठन से भी क्योंकि इसमें  शामिल ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका , अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने के लिए  यूरो की तरह की साझा मुद्रा प्रारम्भ करने की तैयारी में हैं। ट्रम्प कई मर्तबा ब्रिक्स को भंग करने की मांग  करने के अलावा अन्य देशों पर भी वे अपनी मर्जी थोपने पर आमादा हैं। रूस से तो उनकी नाराजगी का औचित्य भी है हालाँकि उसके राष्ट्रपति पुतिन को  अलास्का में बुलाकर उनसे बात भी उन्होंने की किंतु  न तो यूक्रेन के साथ रूस ने लड़ाई बंद की और न ही किसी अन्य दबाव में आया। भारत और चीन से वे इस वजह से खफ़ा हैं क्योंकि वे रूस से कच्चे तेल के अलावा अस्त्र - शस्त्र भी खरीदते हैं जो ट्रम्प के अनुसार पुतिन को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक सहायता देने जैसा है। लेकिन ट्रम्प के दबाव को धता बताते हुए चीन और भारत दोनों ने रूस से खरीदी बंद नहीं की। भारत ने तो खरीदी और बढ़ाने का दुस्साहस कर दिया। इस सबसे भन्नाए ट्रम्प ने 25  और  50 फीसदी टैरिफ लगाकर डराना चाहा किंतु भारत और चीन दोनों ने उसका मुकाबला करने की ठान ली। चीन ने तो जवाबी कार्रवाई में अमेरिका पर  बढ़ा हुआ टैरिफ लगाने के साथ ही रेयर अर्थ जैसे जरूरी पदार्थ का निर्यात रोक दिया। ट्रम्प ने कई बार  भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाकात करनी चाही लेकिन दोनों   टाल गए।  मलेशिया में आयोजित आसियान सम्मेलन में ट्रम्प इसी हसरत से शामिल हुए ताकि श्री मोदी और जिनपिंग से रूबरू बात हो जाए किंतु वहाँ भी दोनों  नहीं गए। हालांकि उसके बाद ट्रम्प और जिनपिंग का दक्षिण कोरिया में मिलना तय हुआ लेकिन वह मुलाकात भी बेहद सतही रही जिसमें जिनपिंग ने तो गहराई दिखाई जबकि ट्रम्प का उतावलापन  सामने आ गया। हालांकि चीन पर बढ़े हुए टैरिफ को कुछ समय के लिए टाल दिया गया वहीं रेयर अर्थ  के निर्यात पर लगी रोक भी चीन ने हटा ली। लेकिन जैसा ढिंढोरा ट्रम्प पीट रहे थे वैसा कुछ भी नहीं हो सका। इस मुलाकात के बाद लौटे ट्रम्प की मुख -  मुद्रा से लगा कि वे दबाव बनाने में कामयाब नहीं रहे। ऐसा ही पुतिन से हुई उनकी मुलाकात के बाद देखने मिला था। ट्रम्प और श्री मोदी की मुलाकात अभी तक नहीं होने के पीछे भारत के यह नीति है कि जब तक अमेरिका के साथ व्यापार संधि संबंधी बातचीत किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती तब तक मुलाकात का औचित्य नहीं है। हालांकि ट्रम्प गाहे - बगाहे  श्री मोदी की प्रशंसा करने से भी बाज नहीं आते जबकि श्री मोदी उनके बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ बोलने से जो परहेज करते हैं वह ट्रम्प को परेशान करने वाला है। सच तो ये है  कि उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा तो मिट्टी में मिलाई ही , अमेरिका जैसी महाशक्ति के रौब - रुतबे को भी धरातल पर पहुंचा दिया। उन्हें लगता था कि टैरिफ रूपी आतंक फैलाकर वे सभी देशों को नत मस्तक करवा लेंगे किंतु उसमें उन्हें निराशा हाथ लगी और इसीलिये अब खुद ही बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिलने लालायित हैं। जिनपिंग से उनकी बातचीत उसी का परिणाम थी जिसमें वे कुछ भी हासिल करने में विफल रहे क्योंकि उनके टैरिफ पर चीन का रेयर अर्थ भारी पड़ गया। भारत भी जिस तरह टैरिफ का प्रतिरोध कर रहा है उससे ट्रम्प दबाव में हैं। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को तबाह करने की आपाधापी में वे अपने ही देश को आर्थिक बदहाली की खाई में धकेल बैठे जहाँ सरकार के पास अपने  कर्मचारियों को वेतन बाँटने तक के पैसे नहीं हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 October 2025

तालिबानी हमलों से पाकिस्तान की चिंता और बढ़ी


इस्लामिक जगत में इन दिनों तुर्किये कुछ ज्यादा ही उछल रहा है। विशेष रूप से भारत के ऐलानिया दुश्मन पाकिस्तान की सरपरस्ती में वह चीन और अमेरिका से भी आगे निकलने के प्रयास में है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये में बने ड्रोन और मिसाइलों का पाकिस्तान ने काफी उपयोग किया किंतु भारत की अचूक रक्षा प्रणाली के सामने उनकी एक नहीं चली। संरासंघ में भी तुर्किये के प्रतिनिधि कश्मीर के मामले में पाकिस्तान की तरफदारी करते रहते हैं। हालांकि भारत के प्रति इस देश के शत्रुता भाव का कोई कारण समझ नहीं आता। लेकिन बीते कुछ समय से वह पूरी तरह से पाकिस्तान समर्थक हो गया है। ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की जो पिटाई हुई उससे वह उबर पाता उसके  पहले ही अफ़ग़ानिस्तान के साथ चले आ रहे सीमा विवाद ने युद्ध का रूप ले लिया। पाकिस्तानी वायुसेना ने अफ़ग़ानिस्तान में घुसकर हमले किये तो अफ़ग़ानिस्तान के तालिबानी लड़ाकों ने जमीनी मोर्चों पर अपनी ताकत दिखाते हुए पाकिस्तान की अनेक चौकियों पर कब्जा करने के साथ ही उसके  सैकड़ों सैनिक मार दिये। तालिबानी हमलों का खौफ इतना ज्यादा है कि पाकिस्तानी सेना के लोग अब अफगानिस्तान की सीमा पर तैनाती से मना कर रहे  हैं। जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपना डेरा उठाया तब तालिबान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते बेहद दोस्ताना दिख रहे थे जबकि भारत के साथ तो बोलचाल भी बंद थी। अमेरिका के  अफगानिस्तान में रहते तक भारतीय कंपनियों के पास बड़े - बड़े ठेके थे जो अधर में लटक गए। चीन भी तालिबानी हुक्मरानों की मिजाजपुर्सी में लगा था। लेकिन अचानक हालात ऐसे बदले कि तालिबानी शासकों की भारत से निकटता बढ़ने लगी।  इसके कारण वहाँ के विकास कार्यों में भारत की हिस्सेदारी बदस्तूर कायम रही और नये काम भी मिले। अफगानिस्तान की खाद्य समस्या को दूर करने के लिए भारत ने बड़ी मात्रा में अनाज भेजा। हाल ही में उसके विदेश मंत्री ने भारत की यात्रा भी की जिसके बाद काबुल में दूतावास संबंधी गतिविधियों  में वृद्धि हुई। विदेश मंत्री ने साफ कह दिया कि उनके देश की धरती का उपयोग भारत के विरुद्ध आतंकवाद के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इसी बीच खबर आई कि जिस बगराम एयर बेस को मांगने  अमेरिका धौंस दे रहा था वह अफगानिस्तान ने भारत को दे दिया। इन सबसे परेशान पाकिस्तान की मदद न अमेरिका कर रहा है और न ही चीन। ऐसे में उसने तुर्किये का सहारा लेकर अफगानिस्तान को ठंडा करने का दांव चला। लेकिन वह भी फुस्स साबित हुआ। तुर्किये ने दोनों देशों के बीच सुलह की जो बैठक अपने यहाँ आयोजित की उसमें पाकिस्तानी नुमाइंदे ने अफगानी प्रतिनिधियों की बहुत खुशामद की लेकिन वे नहीं पसीजे। इसीलिये बाद में बैठक में उपस्थित  पाकिस्तान के मंत्री ने तालिबानों को फिर से गुफाओं में भेजने जैसी धमकी दे डाली जो इस बात का संकेत है कि तुर्किये द्वारा की गई मध्यस्थता विफल हो गई तथा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा विवाद युद्ध की शक्ल में जारी रहेगा। इस्लामिक कट्टरता की प्रबल समर्थक कही जाने वाली  तालिबानी सत्ता का पाकिस्तान से दुश्मनी बढ़ाकर भारत से दोस्ती करना इस क्षेत्र के कूटनीतिक, आर्थिक और सामरिक समीकरणों में बड़े बदलाव का परिचायक है जिससे पाकिस्तान और चीन ही नहीं बल्कि अमेरिका भी हैरान है जो बगराम एयर बेस हथियाकर ईरान और चीन दोनों को अपनी मार में लेना चाहता था। दरअसल भारत और अफगानिस्तान की नजदीकियों से उक्त तीनों देशों के पेट में दर्द होने का बड़ा कारण पाकिस्तान की अखंडता पर मंडराता खतरा है। तालिबानी लड़ाकों के हमलों से भयभीत पाकिस्तान बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर से अपनी सैन्य टुकड़ियों को हटाने मजबूर हो गया है। जबकि इन दोनों इलाकों में  भी उसके विरुद्ध विद्रोह की स्थिति है। शुरू में पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को मुगालता था कि अफ़ग़ानिस्तान के पास संगठित सैन्यबल नहीं है। लेकिन अब तक की जो रिपोर्ट है उसके अनुसार तालिबानी लड़ाके भारी पड़ते दिख रहे हैं। ये जानकारी भी आ रही है कि अफगानिस्तान की पीठ पर भारत ने चूंकि हाथ रख दिया है इसलिए उसके हौसले बुलंद हैं। इसीलिये पाकिस्तान ने तुर्किये को बीच में डालकर तालिबानी लड़ाकों को रोकने का दाँव चला जो नाकामयाब साबित हुआ। इस लड़ाई का अंतिम परिणाम क्या होगा ये फ़िलहाल कहना कठिन है किंतु इतना जरूर है कि अपनी अंदरूनी झंझटों से जूझ रहे पाकिस्तान  को अफगानिस्तान के मोर्चे जो चुनौती मिल रही है उसका सामना करने में उसके पसीने छूट रहे हैं । तालिबानी लड़ाकों की लडाकू क्षमता पाकिस्तान अच्छी तरह जानता है क्योंकि अमेरिका से लड़ने में वह खुद भी उनकी मदद करता रहा है। इसीलिये उसकी समझ में नहीं आ रहा कि उनसे कैसे निपटे? तुर्किये द्वारा की गई कोशिश विफल हो जाने के बाद उसकी चिंता और बढ़ गई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 October 2025

वेतन बढ़ रहा किंतु नौकरियां घट रहीं


सरकारी कर्मचारियों को केंद्र सरकार ने आठवें वेतन आयोग का गठन कर वह खुशखबरी दी जिसका  लंबे समय से इंतजार था। हालांकि आयोग की रिपोर्ट आने में डेढ़ वर्ष लग जाएंगे किंतु नया वेतनमान 1 जनवरी 2026 से प्रभावशील माना जाएगा। सातवें आयोग की सिफारिशें 2016 में लागू हुई थीं। वेतन और भत्तों का निश्चित समयावधि के बाद पुनर्निर्धारण  न्यायोचित है।  लोक प्रशासन को सक्षम, गतिशील और दायित्ववान बनाने के लिए वेतन वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसलिए किसी को भी उक्त फैसले पर ऐतराज नहीं हुआ। नये वेतन आयोग की सिफारिशें केंद्र सरकार के 50 लाख कर्मचारियों के साथ ही लगभग 70 लाख पेंशन भोगियों को तो सीधे तौर पर लाभान्वित करेंगी ही , उसके अलावा विभिन्न राज्य सरकारों के कर्मचारियों को भी  इससे फ़ायदा होगा। 2029 में लोकसभा का चुनाव होगा । ऐसे में केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी । वैसे भी  मोदी सरकार के लिए भी अगला लोकसभा चुनाव कड़ी चुनौती लेकर आयेगा। 2024 में लगे झटके के बाद प्रधानमंत्री जान गए होंगे कि मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग  चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की कितनी क्षमता रखता है । इसीलिये केंद्र सरकार ने बिहार  में मतदान के पहले ही आठवां वेतन आयोग गठित कर सरकारी कर्मचारियों को लुभाने का दाँव चल दिया है। ये बात ध्यान रखने वाली है कि निजी क्षेत्र कितना भी विकसित हो जाए किंतु भारत में आज भी सरकारी नौकरी का आकर्षण बना हुआ है क्योंकि इसमें रोजगार सुरक्षित रहने के साथ ही अनेक ऐसी सुविधाएं मिलती हैं जो निजी क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं। इसीलिये जब कोई राजनीतिक पार्टी रोजगार देने का चुनावी  वायदा करती तो उसका अभिप्राय सरकारी नौकरी से ही होता है। बिहार  चुनाव में महागठबंधन के घोषणापत्र में  हर घर में एक सरकारी नौकरी देने के वायदे की देश भर में चर्चा है। उसके पूरा होने को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं परंतु इससे ये तो स्पष्ट होता ही है कि सरकारी नौकरी भारतीय समाज में सदाबहार बनी हुई  है। यद्यपि पुरानी पेंशन व्यवस्था के समाप्त होने से कुछ आकर्षण कम हुआ है । इसीलिये अब उसकी बहाली भी चुनावी वायदों का हिस्सा बन गई है। तेजस्वी ने भी इसका वायदा किया जिसके बल पर कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में सफलता हासिल की। आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा होते ही  वेतन और भत्तों में संभावित वृद्धि का हिसाब लगना शुरू हो गया। जाहिर है इस खबर ने सरकारी नौकरी की चाहत रखने वालों की उम्मीदें और बढ़ा दी हैं किंतु  ये  बात भी विचारणीय है कि भले ही सरकार के स्थायी कर्मचारियों की तन्ख्वाह और सुविधाएं कितनी भी बढ़ जाएं लेकिन नौकरियां दिन ब दिन घटती जा रही हैं। धीरे - धीरे बहुत से कामों के लिए सरकार निजी क्षेत्र की सेवाएं लेने लगी है। अपने वाहनों की जगह टैक्सी का उपयोग इसका एक उदाहरण है। इसी तरह अस्थायी, दैनिक भोगी और संविदा नियुक्तियों के जरिये कम वेतन और सुविधाएं देकर निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं बल्कि महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक तक नियुक्त किये जा रहे हैं। ऐसे हजारों प्रकरण मिलेंगे जिनमें एक अस्थायी कर्मचारी दशकों की सरकारी सेवा के बाद भी स्थायी नहीं हो सका। सरकार जिस तेजी से अपने उपक्रमों का विनिवेश कर रही है उसके कारण भी शासकीय नौकरियां कम हो रही हैं। इसीलिये सरकार पर रोजगार देने में विफल रहने का आरोप लगा करता है। वैसे  निजी क्षेत्र का विस्तार होने से वह भी रोजगार के अवसर उपलब्ध करवा रहा  है। आई.टी सेक्टर ने देश में   युवाओं का एक नया वर्ग पैदा कर दिया जो उच्च मध्यम वर्गीय के तौर पर अपना जीवन शुरू करता है। उपभोक्ता बाजार की रौनक इसी तबके की वजह से है। लेकिन आठवें वेतन आयोग के गठन की खुशी के बीच इस मुद्दे पर भी विचार होना चाहिए कि क्या हम रोजगार विहीन विकास के शिकंजे में फंस रहे हैं? ए. आई नामक नई विधा से मानवीय रोजगार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। आठवां वेतन आयोग लागू होते ही बेशक सरकारी कर्मचारियों की बल्ले - बल्ले हो जायेगी किंतु नये रोजगारों का सृजन  भी उतना ही जरूरी है अन्यथा वेतन वृद्धि के साथ ही सरकारी नौकरी के अवसर कम होना भविष्य में नई समस्या उत्पन्न करेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 October 2025

नशे का कारोबार करवाने वाले थानेदारों के चेहरे भी सामने लाएं महानिरीक्षक

.प्र में रीवा संभाग के पुलिस महानिरीक्षक गौरव सिंह  राजपूत ने गत दिवस नशे के विरुद्ध प्रहार 2 नामक कार्यक्रम में उपस्थित पुलिसकर्मियों को सख़्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि बिना थानेदारों की जानकारी के नशे  का विक्रय नहीं हो सकता। इसके आगे महानिरीक्षक महोदय यहाँ तक बोल गए कि जो लोग तालाब को गंदा कर रहे हैं उनकी पूरी सूची चार महीनों में बन चुकी है। ऐसे  लोग  समय रहते सुधर जाएं वरना 15 दिन बाद उन्हें परिणाम भोगने होंगे। श्री राजपूत की उक्त चेतावनी एक तरफ तो उनकी स्पष्टवादिता का सबूत है वहीं इस बात की खुली स्वीकारोक्ति भी कि समाज में होने वाले अपराधों को पुलिस का संरक्षण मिला हुआ है और वह चाह ले तो अपराधियों का हौसला पस्त हो जाएगा। महानिरीक्षक ने बिना लाग - लपेट के कहा कि नशीले कफ सिरप गली - मोहल्लों तक फैल गए हैं। ऐसे में थाने के प्रभारी का फर्ज है वह अपने इलाके को नशे से मुक्त कराए।  उन्होंने यदि अपने मातहतों को केवल नशे का धन्धे रोकने के लिए  कहा होता तब वह साधारण बात होती क्योंकि छिंदवाड़ा में कफ सिरप के कारण बड़े पैमाने पर बच्चों की मौत के बाद मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव की सख्त हिदायत  पर  सरकारी तंत्र नींद से जागा और कर्तव्यनिष्ठा का दिखावा करते हुए जगह - जगह छापेमारी की जाने लगी। लेकिन रीवा के पुलिस महानिरीक्षक ने चिकित्सकों और दवा विक्रेताओं से अलग अपने विभाग के वर्दीधारियों को जिस प्रकार कटघरे में खड़ा किया उसके लिए वे अभिनन्दन के हकदार हैं । आम तौर पर देखने मिलता है कि पुलिस या अन्य शासकीय विभाग में पदस्थ उच्च अधिकारी अपने अधीनस्थों के काले - कारनामों पर पर्दा डालते हुए उन्हें बचाते हैं। ऐसा क्यों होता है ये किसी से छिपा नहीं है। उस लिहाज से श्री राजपूत की  साफगोई अनुकरणीय है । उनके कथन से साबित हो जाता है कि  उनके पास  सभी दोषी थानेदारों की कर्मपत्री आ चुकी है जिनकी जानकारी में नशे का व्यापार होता रहा। ऐसे में उन्हें सुधरने के लिए मोहलत देने की बजाय उन पर अभी तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई इस प्रश्न का उत्तर भी महानिरीक्षक जी को देना चाहिए । उल्लेखनीय है रीवा  उपमुख्यमंत्री का गृह जिला है जिनके पास स्वास्थ्य विभाग भी है। ऐसे में श्री राजपूत का ये कहना कि नशीले कफ़ सिरप का कारोबार गली - मोहल्लों तक फैल चुका है केवल पुलिस की ही नहीं अपितु स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर भी निशाना साधता है। यद्यपि ये विश्वास करना कठिन है कि वे नशे के कारोबार को संरक्षण देने वाले उन थानेदारों पर नकेल कसेंगे किंतु उन्होंने जिस प्रकार से अपने मातहतों को हड़काया उसने पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर कालिख  पोत दी। जब महानिरीक्षक जैसा उच्च अधिकारी ये स्वीकार करे कि नशे की बिक्री बिना थानेदार की जानकारी के नहीं हो सकती तब किसी और के कहने की जरूरत ही कहां रहती है ? लेकिन   जिन थानेदारों का काला चिट्ठा आ चुका है उनसे ये अपेक्षा करना निरर्थक है कि वे अपने आपको सुधार लेंगे। अच्छा होता महानिरीक्षक महोदय इन थानेदारों की भी जनता के बीच वैसी ही परेड करवाएं जैसी पुलिस कभी - कभी अपराधियों की करवाती है। आखिरकार जनता को भी उन लोगों के चेहरे देखने का हक है जो अपनी काली कमाई के लालच में लोगों के स्वास्थ्य और ज़िंदगी के दुश्मन बने हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 25 October 2025

भारत को बांग्लादेश और नेपाल बनाने वालों के मंसूबे सफल नहीं होंगे


भारत के दो पड़ोसी  बांग्ला देश और नेपाल में  युवा आक्रोश के परिणाम स्वरूप हुए सत्ता परिवर्तन के बाद एक वर्ग विशेष भारत में भी वैसा ही कुछ होने का सपना देखने लगा। अचानक जेन - जी नामक शब्द चर्चा में आ गया। और युवाओं से जुड़ी किसी भी बात में उसका जिक्र आम हो चला । दुनिया के कुछ अन्य देशों में भी इसी तरह से हुए सत्ता परिवर्तन के बाद  कहा जाने लगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारें चूँकि जन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहीं लिहाजा युवाओं द्वारा बलपूर्वक सत्ता बदलने का दौर शुरू हो गया है। इसकी शुरुआत संभवतः  श्रीलंका से हुई जहां आक्रोशित लोगों की भीड़ राष्ट्रपति भवन में जा घुसी और उसने जो किया वह अराजकता का साक्षात उदाहरण है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित तमाम सत्ताधीश विदेश भाग गए। लगभग ऐसा ही बांग्लादेश में देखने मिला जहाँ से प्रधानमंत्री हसीना भारत आ गईं और एक परिषद ने सत्ता संभाल ली जिसका मुखिया नोबल विजेता मो. युनुस को बनाया गया जो अमेरिका में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे। हाल ही में नेपाल में भी जेन - जी के नेतृत्व में रातों - रात सत्ता बदलने का कारनामा हुआ। हालांकि सत्ताधारी विदेश नहीं गये और सेना  उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गई किंतु मंत्रियों की जमकर  पिटाई के अलावा  कोलंबो तथा ढाका की तरह सरकारी आवासों में घुसकर लूटपाट की गई । इन घटनाओं के बाद भारत में भी ऐसा ही कुछ होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी क्योंकि बेरोजगारी जैसी समस्या तो यहाँ भी है जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित शिक्षित युवा ही है। कोविड के बाद भी बड़ी संख्या में रोजगार छिनने की बात सामने आती रही है। इसके अलावा भी अन्य ऐसी बातें हैं जिनको लेकर युवाओं में चिंता और निराशा होने की बात उठती है। देश में अवसर नहीं होने के कारण प्रतिभाओं का विदेश पलायन भी युवाओं को उद्वेलित करता है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जब वीजा फीस में अनाप शनाप वृद्धि की तब वहाँ  पढ़ने और नौकरी करने वाले भारतीयों के सामने चिंता का पहाड़ खड़ा हो गया। सरकारी नौकरियों के घटने से भी शिक्षित युवाओं में अपने भविष्य को लेकर चिंता व्याप्त है। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए वे लोग अचानक उत्साहित हो उठे  जो निर्वाचन प्रक्रिया के जरिये देश में सत्ता हासिल करने में विफल होते रहे हैं। बांग्लादेश और नेपाल में जो कुछ हुआ उसे भारत में भी साकार करने की बातें होने लगीं। कुछ मुद्दों को छेड़कर व्यापक जनांदोलन खड़ा करने का तानाबना भी बुना जाने लगा। पिछ्ले लोकसभा चुनाव के नतीजों के अलावा कुछ राज्यों में मिली हार की खीझ खुलकर सामने आने लगी। लेकिन ऐसे लोग हमेशा की तरह भारतीय जनमानस को पढ़ने और समझने में नाकामयाब रहे और जन समर्थन नहीं मिलने से निराश भी। सही बात ये है कि बांग्लादेश और नेपाल के युवाओं ने जो उन्माद दिखाया उसने भले ही स्थापित सत्ता को उखाड़ फेंका हो किंतु  उसके बाद समुचित विकल्प नहीं मिलने से देश की हालत आसमान से टपके खजूर पर अटके जैसी होकर रह गई है। लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी बांग्लादेश में चुनाव करवाने की स्थितियाँ नहीं बन पा रहीं। मो. युनुस मूलतः वामपंथी होने से चीन समर्थक हैं किंतु उन्हें देश की बागडोर संभालने का अवसर अमेरिका की कृपा से प्राप्त हुआ। लिहाजा देश चीन और अमेरिका रूपी दो पाटों में पिसने मजबूर है। युवाओं को जिन बातों का लालच देकर तत्कालीन सत्ता के विरुद्ध हिंसक होने उकसाया गया वे सब भुला दी गईं। इसके कारण वहाँ नये सिरे से आक्रोश पनपने की खबरें आने लगीं। नेपाल में हालांकि सेना ने दो दिन में ही हालात संभालकर नई सत्ता बनवा दी लेकिन जिन नेताओं की अगुआई में युवाओं ने सत्ता उलटने का कारनामा कर दिखाया वे खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। नेपाल के घटनाक्रम को भी विदेश से प्रायोजित माना गया किंतु विशेष बात ये रही कि राजशाही को उखाड़ने में जिस युवाशक्ति ने माओवादियों का खुलकर साथ देकर चीन समर्थक सरकार बनवाई वही वामपंथी सत्ताधीशों को सड़कों पर घसीटकर पीटती देखी गई। बांग्लादेश और नेपाल में जेन - जी द्वारा किये गए सत्ता पलट के बाद भी युवाओं की आकांक्षाओं के पूरा होने की कोई संभावना दूर - दराज तक नजर नहीं आने से भारत में वैसा ही कुछ करने का मंसूबा रखने वाले  निश्चित रूप से निराश होंगे। देश के युवाओं ने ये दिखा दिया कि वे अपनी समस्याओं के हल के लिए हिंसा और अराजकता  की बजाय लोकतांत्रिक तौर - तरीकों में ही विश्वास रखते हैं। बिहार चुनाव के पहले  चुनाव व्यवस्था के प्रति अविश्वास की भावना भड़काकर पूरे देश को आंदोलित करने का जो प्रयास किया गया उसे अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिलने से स्पष्ट हो गया कि देश में लोकतंत्र जनता के मन में बसा है और वह सत्ता का चयन के लिए अराजकता की बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही पसंद करती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी