Thursday, 1 January 2026

बजट में आयकर और जीएसटी पर क्रांतिकारी निर्णय की अपेक्षा



आज से एक माह बाद केन्द्र सरकार आगामी वित्तीय वर्ष के लिए बजट पेश करेगी। प्रशासनिक स्तर पर तो इसकी तैयारियां काफी पहले शुरू हो जाती हैं किंतु ऐसे नीतिगत निर्णयों के बारे में प्रधानमंत्री सहित नीति आयोग के सदस्य और विभिन्न क्षेत्रों के आर्थिक विशेषज्ञ  विमर्श करते हैं जिनका अर्थव्यवस्था पर  दूरगामी असर होता है। वैसे तो  पी. वी. नरसिम्हा राव के शासनकाल से ही भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने लगा था जिसे बाद में अटलबिहारी वाजपेयी और फिर डॉ. मनमोहन सिंह ने भी जारी रखा। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही भारत को बड़े देशों के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया। आत्मनिर्भर भारत के  नारे का विपक्ष चाहे जितना उपहास करे किंतु  संपन्न देशों की कोई भी बैठक भारत  के बिना पूरी नहीं होती। वैश्वीकरण की शुरुआत  में विकसित देशों के  लिए भारत केवल बड़ा उपभोक्ता बाजार था। इसीलिए  ये आशंका थी कि विश्व व्यापार संगठन के साथ जुड़ने से हमारी आत्मनिर्भरता नष्ट हो जाएगी। और ऐसा हुआ भी जब विदेशी  उत्पाद भारतीय बाजारों में छा गए। इससे कई घरेलू उद्योग बंद हो गए। लेकिन मोदी सरकार ने भारत को  उपभोक्ता  की छवि से उबारकर एक बहुमुखी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए कदम उठाए। जिनमें  स्वदेशी की भावना से प्रेरित होकर निर्यातक बनने का उत्साह था। हालांकि आज भी हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं बन सके किंतु  सरकार आम भारतीय का मनोबल ऊंचा करने में सफल रही तो उसका कारण सही नीतियां और उन पर समयबद्ध अमल करने की प्रतिबद्धता है। कोरोना जैसी विषम परिस्थिति में भी जनता के स्वास्थ्य और उदर पोषण संबंधी व्यवस्था ने देश को अराजकता से बचा लिया। लाभार्थी योजनाओं के जरिए  वंचित वर्ग के  जीवन स्तर को उठाने के साथ ही  छोटी -  छोटी जरूरतें पूरी करने के लिए नगद राशि जैसी योजनाओं को शुरू करना बड़ी चुनौती थी। लेकिन सरकार ने ये साबित किया कि व्यवस्था में जो छिद्र हैं उन्हें भर दिया जाए तो आम जनता को भ्रष्टाचार से  बचाते हुए भी लाभान्वित किया जा सकता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि कुछ अपवाद छोड़  दें तो  केंद्र सरकार में  बड़े फैसले लेकर  उन्हें जमीन पर उतारने की इच्छाशक्ति है। गत वर्ष के  बजट में आयकर छूट की सीमा 12 लाख तक बढ़ाने और उसके बाद जीएसटी की दरों में कमी तथा बीमा क्षेत्र को उससे मुक्त करने जैसे साहसिक कदम उठाना निश्चित रूप से बढ़ते आत्मविश्वास का प्रमाण है। इसी तरह निःशुल्क चिकित्सा हेतु 5 लाख रु. की आयुष्मान  योजना का लाभ 70 वर्ष के हो चुके सभी वरिष्ट नागरिकों को  प्रदान करने का निर्णय भी जनहित में ही है। इनसे साबित हो गया कि सरकार का आर्थिक प्रबंधन बेहतर हुआ जिसके कारण वह जनहित  में बड़े निर्णय करने में सक्षम है। भारत का दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने से ये उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि आयकर को पूरी तरह समाप्त कर ऐसी वैकल्पिक कर प्रणाली लागू की जाए जिससे काले धन नामक वायरस से देश को मुक्ति मिले तथा हर व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा कमाई करने प्रेरित हो ताकि उसका जीवन स्तर सुधरने के साथ ही देश भी मजबूती से खड़ा हो सके। प्रमाणित सत्य है कि करों का जाल जितना छोटा होगा लोगों का आर्थिक व्यवहार उतना ही साफ - सुथरा होता है। इसी तरह जीएसटी में भी ज्यादा से ज्यादा 5 और 12 प्रतिशत की दो दरें ही रहें जिससे  उपभोक्ता और उत्पादक दोनों को लाभ होने के साथ ही व्यवस्था संबंधी जटिलता खत्म हो जिसका परिणाम भ्रष्टाचार में कमी के रूप में देखने मिलेगा। प्रधानमंत्री द्वारा दो दिन पहले ली गई बैठक में हुए विचार - विमर्श का विवरण तो अज्ञात है किंतु सरकार यदि चाहे तो आयकर और जीएसटी के ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन कर सकती है। अर्थव्यवस्था की मजबूती और विश्व में सबसे ज्यादा विकास दर से बड़े फैसलों की जमीन तैयार है। इनके अलावा पेट्रोल - डीजल को जीएसटी में शामिल करना भी जनता को भी राहत पहुंचाने वाला होगा। वैसे भी अनेक राज्यों के विधानसभा चुनाव सामने होने से प्रधानमंत्री  राहत का पिटारा खोले बिना नहीं रहेंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 31 December 2025

प्रदूषित पेय जल से मौतें : इंदौर की स्वच्छ छवि कलंकित


भारत द्वारा जापान को पीछे छोड़ विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना गौरव का विषय है। जिस गति से हम बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि जल्द ही जर्मनी से भी आगे निकलकर भारत तीसरे स्थान पर आ जाएगा और तब केवल अमेरिका और चीन ही हमसे आगे होंगे। इस वर्ष जो रफ्तार है उसके आधार पर दुनिया भर की प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियों का अनुमान  है कि भारत  औसतन 6.5 फीसदी की दर से विकास करते हुए  दुनिया में सबसे तेज गति से  बढ़ रही अर्थव्यवस्था होने का श्रेय अपने नाम बनाए  रखेगा। निश्चित रूप से ये उपलब्धि सुखद एहसास कराती है। भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा में जो वृद्धि बीते एक दशक में हुई उसके पीछे विकास दर की तेज रफ्तार ही है। लेकिन इस गौरवशाली उपलब्धि के बावजूद ये खबर शर्मिंदा करती है कि लगातार देश के सबसे स्वच्छ शहर का पुरस्कार जीतने वाले  इंदौर  के एक आवासीय इलाके में दूषित पेयजल आपूर्ति के कारण हजारों लोग बीमार हो गए और 8 की मृत्यु भी हो गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार वहां की पाइप लाइन खराब होने के बावजूद बदली नहीं गई जबकि चार महीने पहले उसकी निविदा जारी हो चुकी थी किंतु नगर निगम की निकम्मी नौकरशाही ने उन्हें खोलने का कष्ट नहीं उठाया। अब हजारों लोग दूषित पानी पीकर बीमार हुए और मौतें भी हो गईं तब जाकर भ्रष्ट व्यवस्था की कुंभकर्णी नींद खुली और निविदाएं खोली गईं। बीते कई दिनों से गंदा पानी नलों में आने की शिकायत के बाद भी नगर निगम के हुक्मरान लापरवाह बने रहे। यदि दूषित जल से लोगों की जान नहीं जाती तब मामले पर लीपापोती कर दबा दिया जाता किंतु समाचार माध्यमों ने जब पर्दाफाश किया तब प्रशासनिक अमला हरकत में आया।  हालांकि  स्वास्थ्य विभाग की मानें तो एक भी मौत नहीं हुई जबकि इंदौर के एकछत्र नेता और प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने ही 2 - 3 लोगों के मरने की बात मानी है। स्मरणीय है वे यहां के महापौर भी रह चुके हैं। इंदौर प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी कहलाता है। स्वच्छता  सर्वेक्षण में अनेक वर्षों से देश का सबसे अग्रणी शहर होने के कारण पूरे देश में इसकी सकारात्मक छवि बनी थी । लेकिन प्रदूषित पेय जल के कारण हजारों लोगों के बीमार होने और कुछ की जान चली जाने की घटना ने उस छवि को बट्टा लगा। दिया। इंदौर के महापौर पद पर आसीन पुष्यमित्र  भार्गव काफी लोकप्रिय और कार्यकुशल माने जाते हैं ।  और तो और वहां के प्रभारी मंत्री  प्रदेश के मुख्यमंत्री ही हैं। उसके बाद भी  क्षतिग्रस्त पाइपलाइन की निविदा जारी होने के बावजूद महीनों तक उसके बारे में फैसला न लिया जाना आपराधिक उदासीनता के अलावा और कुछ नहीं है। जिन अधिकारियों के कारण ये दर्दनाक स्थिति उत्पन्न हुई उन्हें इतनी कड़ी सजा मिलनी चाहिए जिससे  पूरे प्रदेश के स्थानीय निकायों में बैठी नौकरशाही दहशत में आए। जहां एक तरफ भारत अंतरिक्ष की ऊंचाई नापने का कारनामा कर रहा है वहीं हम दूसरी तरफ अपनी जनता को पीने योग्य साफ पानी उपलब्ध करवाने में नाकाम साबित हों तो ये डूब मरने वाली बात है। यद्यपि  प्रदूषित पेय जल केवल इंदौर नहीं अपितु ज्यादातर शहरों की समस्या है। इसके कारण सामान्य  तौर पर लोगों को  आंत्रशोध और पीलिया जैसी बीमारियां होने की खबरें आया करती थीं किंतु इंदौर नगरनिगम की लापरवाही ने निर्दोष लोगों को मौत के मुंह में धकेल दिया जो कि बेहद चिंता और डर पैदा करने वाला है। इसकी जांच भी चूंकि सरकारी अमला ही करेगा इसलिए उसमें अपनी बिरादरी के लोगों को बचाने का भरपूर प्रयास होना तय है। वैसे  भी इंदौर जैसे महत्वपूर्ण शहर की नगर निगम में पदस्थ बड़े अधिकारी भी सत्ता प्रतिष्ठान के चहेते ही होंगे। बावजूद  इसके प्रदेश  के सबसे बड़े शहर में अशुद्ध पेय जल से लोगों के मरने की स्थिति बन जाए तब दुख के साथ ही गुस्सा भी आता है। लेकिन  सवाल वही है कि लोग अपना गुस्सा उतारें भी तो किस पर क्योंकि नेताओं और नौकरशाहों के बीच अघोषित गठबंधन के आगे सब लाचार हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 30 December 2025

खालिदा की मौत के बाद बांग्लादेश फिर अनिश्चितता के साये में



ऐसे समय जब बांग्लादेश में नए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है तब पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन वहां की राजनीति में खालीपन छोड़ने के  साथ ही अनिश्चितता को बढ़ावा दे सकता है।  गत दिवस ही उन्होंने अपना नामांकन भरा था।  स्मरणीय है  दस वर्षों तक  प्रधानमंत्री रहीं खालिदा के पति जिया उर रहमान  शेख मुजीब की हत्या के बाद पहले सेनाध्यक्ष और फिर राष्ट्रपति निर्वाचित हुए किंतु उनकी भी हत्या कर दी गई जिसके बाद  बीएनपी ( बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) की कमान खालिदा जिया ने संभाली । जब शेख हसीना सत्ता में आईं तब खालिदा को भ्रष्टाचार के आरोप में दस वर्ष की सजा सुनाए गई। गत वर्ष हुए तख्ता पलट के बाद ही वे जेल से बाहर आईं । तभी से ये कयास लगाए जा रहे थे कि वे फिर से देश की सत्ता संभालेंगी क्योंकि हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे भी हसीना के देश छोड़ने के बाद उनकी पार्टी पूरी तरह बिखराव का शिकार हो चुकी है। इसीलिए बीएनपी के लिए रास्ता साफ नजर आ रहा था और खालिदा  की सत्ता में वापसी भी सुनिश्चित थी। कुछ दिन पहले ही जबसे उनके बेटे तारिक रहमान 17 वर्ष के निर्वासन उपरान्त देश लौटे तबसे माना जाने लगा कि वे बीएनपी का भविष्य हैं। वैसे भी बेगम जिया का स्वास्थ्य जिस तेजी से बिगड़ रहा था उसे देखते हुए तारिक उत्तराधिकारी के तौर पर उभर रहे थे। और जब चुनाव नामांकन के दौरान ही उनकी माँ चल बसीं तब सहानुभूति की लहर पर सवार होकर वे बांग्लादेश के नए निर्वाचित प्रधानमंत्री बन सकते हैं। लेकिन  इस देश की तासीर को देखते हुए कुछ भी पक्के तौर पर कह पाना कठिन है क्योंकि जिन युवाओं ने शेख हसीना के विरुद्ध जनांदोलन किया उन्होंने सीएनपी नामक पार्टी बनाकर कट्टरपंथी जमायत ए इस्लामी से गठजोड़ कर लिया जिस पर हसीना सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा था । यूनुस ने सत्ता में आते ही उसे हटाकर कट्टरपंथी ताकतों का हौसला बढ़ाया। सीएनपी  के पक्ष में युवाओं का  झुकाव देखते हुए ये गठबंधन बीएनपी की राह में रोड़ा अटकाए बिना नहीं रहेगा। हाल ही में युवाओं के नेता हादी की हत्या के बाद हुए हिंसक आंदोलन के बाद ये आशंका भी है कि यूनुस किसी न किसी बहाने चुनाव टालते रहेंगे जिससे सत्ता की कमान उनके हाथ से न निकले। अब जबकि खालिदा का निधन हो चुका है तब सभी की निगाहें उनके पुत्र तारिक पर जमी हैं। फिलहाल बांग्लादेश में कद्दावर राजनेताओं का अभाव होने से राजनीति का  दूसरा धड़ा कट्टरपंथी जमायत के अलावा ऐसे युवाओं के हाथ में आ गया है जिनकी कोई स्पष्ट सोच नहीं है। ऐसे में तारिक  प्रधानमंत्री बनने में सफल होंगे ये अनिश्चित है। हालांकि इस समय देश में उनकी पार्टी ही राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद है लेकिन 17 वर्षों तक देश से बाहर रहने के कारण वे जनता से अपना जुड़ाव किस हद तक स्थापित कर पाएंगे ये बड़ा सवाल है। रही बात भारत की तो ये सर्वविदित है कि चाहे तारिक सत्ता संभालें या किसी अन्य की किस्मत जोर मारे लेकिन ये तय है कि बांग्लादेश में इस समय भारत विरोधी तत्वों का बोलबाला है। खालिदा भी भारत के  प्रति शत्रुता का भाव रखती थीं । इस प्रकार समूचा बांग्लादेश  वर्तमान में भारत विरोधी ताकतों के हाथ में है। अवामी लीग मुकाबले से बाहर है और हिन्दू समुदाय आतंक  के साये में है। ऐसे में चुनाव के बाद भी स्थिरता लौटेगी इसमें संदेह है। सबसे बड़ा  सवाल ये है कि क्या यूनुस हाथ आई सत्ता इतनी आसानी से छोड़ देंगे ? और ये भी कि शेख हसीना का तख्ता पलटने वाले युवाओं के नेता क्या तारिक को आसानी से अपना नेता स्वीकार कर लेंगे क्योंकि जिस भ्रष्टाचार के कारण हसीना को सत्ता से उतरने बाध्य किया गया वैसे ही तो खालिदा और उनकी पार्टी पर लगे थे और देश छोड़ने से पहले तारिक भी भ्रष्टाचार से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार हुए थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 29 December 2025

दिग्विजय के बयानों से कांग्रेस की अंतर्कलह उजागर


म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में क्रमशः भोपाल और राजगढ़ से बुरी तरह हार चुके हैं। फिलहाल वे राज्यसभा में हैं जिसका कार्यकाल 2026 में खत्म होने जा रहा है। 2020 के राज्यसभा चुनाव के पहले उनके और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हुई खींचतान के कारण कांग्रेस विधायक दल में फूट पड़ने से उनके गुट के 22 विधायक बगावत कर भाजपा में आ गए जिससे कमलनाथ सरकार गिर गई। यद्यपि सिंधिया परिवार और दिग्विजय के बीच अहं की लड़ाई पुरानी है। लेकिन 2018 में जब कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला तब  ज्योतिरादित्य को उम्मीद थी कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जायेगा। राहुल गाँधी से नजदीकी  उनके आत्मविश्वास का आधार था। लेकिन दिग्विजय ने कमलनाथ का साथ देकर उनकी ताजपोशी करवा दी। उसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री सिंधिया अपनी परंपरागत सीट गुना से हार गए। तब उन्होंने राज्यसभा के लिए हाथ - पांव मारना शुरू किया। लेकिन यहाँ भी श्री सिंह उनके रास्ते में रोड़ा अटकाने लगे तो उन्होंने अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए भाजपा का दामन पकड़ा और केन्द्र सरकार में मंत्री बन गए। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जबरदस्त सफलता हासिल की।  2024 के लोकसभा चुनाव में तो म. प्र की सभी सीटें कांग्रेस हार गई। यहाँ तक कि कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ तक को नहीं जिता पाए। इसके बाद कांग्रेस हाईकमान की नींद टूटी जिसका प्रमाण कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाये जाने से मिला। नेता प्रतिपक्ष सहित दोनों पदों पर की गई नियुक्तियों में श्री नाथ और श्री सिंह की पसंद का ध्यान नहीं रखे जाने से ये संकेत गया कि अब प्रदेश  कांग्रेस को दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के  वर्चस्व से आजाद कराने की शुरुआत हो चुकी है। श्री नाथ ने  संगठन में राष्ट्रीय स्तर का कोई पद लेना चाहा किंतु अब तक उनकी दाल नहीं गली। दूसरी तरफ दिग्विजय भी गाँधी परिवार के चहेतों की सूची से धीरे - धीरे बाहर होने लगे।स्मरणीय  है श्री नाथ और उनके पुत्र नकुल के भाजपा में शामिल होने की खबरें कई बार उड़ने के बाद शांत हो गईं। इधर दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह एक बार फिर कांग्रेस से बाहर आकर उसके नेतृत्व पर निशाना साध रहे हैं। जिस पर दिग्विजय कुछ नहीं कहते। इसी तरह उनके विधायक पुत्र जयवर्धन हिन्दू राष्ट्र के समर्थक बागेश्वर धाम के मुखिया धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आयोजनों में शिरकत करने लगे जो बिना पिता की सहमति के संभव नहीं था। राजनीति के जानकार इससे चौंके जरूर  किंतु दिग्विजय सिंह के भाजपा विरोधी बयानों के कारण किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका। लेकिन पिछले कुछ दिनों में दो बातें ऐसी हुईं जिनके कारण कांग्रेस के भीतर खलबली मची। पहली ये कि एक टीवी चैनल पर दिग्विजय ने रा.स्व.संघ को देश विरोधी मानने से इंकार करते हुए कहा कि अपनी स्थापना से लेकर शताब्दी पूरी करने तक उसने कभी भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी। उसके प्रचारकों के मन में भी हिन्दू राष्ट्र की भावना कूट - कूटकर भरी है। इसके बाद गत सप्ताह उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पुराना फोटो जारी किया जिसमें कुर्सी पर बैठे लालकृष्ण आडवाणी के सामने जमीन पर नरेंद्र मोदी बैठे दिखाई दे रहे हैं। इसके साथ टिप्पणी की कि  जिस तरह रा.स्व.संघ के जमीनी स्तर के स्वयंसेवक और जनसंघ के कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में बैठकर राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री बनते हैं, यही इस संगठन की ताकत है , जय सिया राम। उनकी उक्त टिप्पणी ने हलचल मचा दी। कांग्रेस में इसे लेकर तरह - तरह के कयास लगने लगे। कुछ ने इसे दबाव बनाने की कोशिश कहा क्योंकि अगले साल श्री सिंह की राज्यसभा सदस्यता समाप्त होने वाली है और म.प्र में कांग्रेस केवल एक ही सीट जीत सकती है। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक और स्थापना दिवस के पहले आई उक्त पोस्ट ने कांग्रेस हाईकमान को  परेशान कर दिया क्योंकि भाजपा के बहाने उन्होंने अपनी पार्टी को ही निशाना बनाया। पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे शशि थरूर और सलमान खुर्शीद जैसे नेता जहाँ उस पोस्ट के पक्ष में दिखे वहीं राहुल सहित अनेक नेताओं को उनकी हरकत नागवार गुजरी। जिसके बाद दिग्विजय ने लीपापोती वाला बयान देकर खुद को बचाने की कोशिश की किंतु जितना नुकसान होना था वह हो चुका। म.प्र में उनके कारण ही कांग्रेस 22 साल पहले सत्ता से ऐसी हटी कि अब तो उसकी वापसी असंभव लगने लगी। अपने हिन्दू विरोधी बयानों से वे समय - समय पर कांग्रेस की जड़ों में मठा डालने का काम करते रहे हैं। उनके ताजा बयान पार्टी के भीतर चल रही उथलपुथल को उजागर करने वाले हैं। ऐसा लगता है गाँधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा भी खत्म हो रही है। बड़ी बात नहीं जल्द ही वे भी असंतुष्टों के साथ खड़े नजर आयें और म.प्र की तरह से ही राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस का बंटाधार करने जुट जाएं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 27 December 2025

सोना - चांदी के महत्व को भारत ने सदियों पहले जान लिया था


वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन दिनों डॉलर, यूरो, येन और युआन सब महत्वहीन होकर रह गए हैं। पूरी दुनिया सोने और चांदी की खरीदी में जुटी है। इसका कारण प्रथम दृष्ट्या तो यूक्रेन -रूस और इसरायल - हमास युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों को माना गया क्योंकि जिस तरह से तनाव बढ़ रहा था उससे तीसरे विश्व युद्ध की आशंका बलवती होने लगी थी। हालांकि इसरायल और हमास  के बीच तो फिलहाल जंग रुकी है लेकिन रूस और यूक्रेन में युद्धविराम की संभावनाएं अनिश्चितता में फंसी होने से पूरा विश्व अस्त- व्यस्त है। और उस पर भी 2025 की शुरुआत में दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प की सनक भरी हेकड़ी ने उथलपुथल मचाकर रख दी। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को थामने के लिए उन्होंने विभिन्न देशों पर अनाप - शनाप टैरिफ थोपने के अलावा अमेरिकी वीजा के लिए कड़ी शर्तें तो लगाई हीं , अप्रवासियों को अमानुषिक तरीकों से बाहर निकालने का अभियान छेड़ दिया। चीन और भारत जैसे दो बड़े देशों ने उनकी धौंस में आने से इंकार करते हुए अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने का जो दुस्साहस किया उसकी प्रतिक्रियास्वरूप ट्रम्प की बौखलाहट बढ़ती गई तथा वे टैरिफ की दरें बढ़ाने जैसी मूर्खता करते गए। लेकिन उनके टैरिफ आतंक के सामने घुटने टेकने के बजाय चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका जैसी ऊपर उठती अर्थव्यस्था वाले देशों ने अमेरिकी डॉलर की चौधराहट तोड़ने का बीड़ा उठाते हुए यूरो जैसी  वैकल्पिक साझा मुद्रा प्रारंभ करने की पहल कर डाली। रूस भी उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों से उबरने के लिए डॉलर विरोधी इस मुहिम में शामिल हो गया। इसका असर यूरोपीय यूनियन में शामिल देशों पर भी हुआ और उन्होंने भी अमेरिकी दादागिरी से आजाद होने के लिए हाथ - पाँव मारना शुरू कर दिया। लेकिन ये बात भी सही है कि डॉलर की पकड़ को ढीला करना आसान नहीं है। यूरोप के विकसित कहे जाने वाले देशों में कुछ को छोड़ शेष इन दिनों मुस्लिम  शरणार्थियों द्वारा उत्पन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं। जनसंख्या संतुलन बिगड़ने की वजह से उनका  समूचा आर्थिक नियोजन गड़बड़ा गया है। रूस के अलग - थलग पड़ जाने से यूरोप को कच्चे तेल और गैस के अलावा खाद्यान्न की किल्लत से जूझना पड़ रहा है। कुल मिलाकर वैश्विक परिदृश्य में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति है। इसका मनोवैज्ञानिक असर अविश्वास के रूप में होने से प्रचलित मुद्राओं की साख का संकट मंडराने लगा। भले ही शीतयुद्ध के हालात नहीं हैं किंतु पूरी दुनिया इस समय चिंता के माहौल में जी रही है। सोना और चांदी दुनिया की सबसे पुरानी उन धातुओं में से हैं जो किसी भी मुद्रा पर भारी पड़ती हैं और जिनकी स्वीकार्यता दुनिया के सभी हिस्सों में एक जैसी है। किसी देश की मुद्रा का विनिमय मूल्य उसके पास रखे  स्वर्ण भंडार से ही तय होता है। ज्ञान - विज्ञान में  कल्पनातीत तरक्की के बावजूद सोने और चांदी का महत्व लेश मात्र भी कम नहीं हुआ। भारत ने तो इनके सर्वकालिक महत्व को सदियों पूर्व समझ लिया था जिसकी वजह से उसे  सोने की चिड़िया जैसा विशेषण प्राप्त हुआ। भले ही हम सदियों तक विदेशी शक्तियों के गुलाम रहे किंतु भारत में सोना और चांदी ही नहीं अपितु अन्य धातुओं में निवेश की परिपाटी भी कायम रही। आज भले ही अमेरिका और चीन के सरकारी  स्वर्ण भंडार दुनिया में सर्वाधिक हों किंतु भारत की जनता के निजी आधिपत्य वाले स्वर्ण को मिलाया जाए तो वह दोनों से ज्यादा निकलेगा। बीते एक वर्ष से सोने - चांदी की कीमतें जिस आश्चर्यजनक तरीके से उछाल मार रही हैं उसने भारतीय आर्थिक सोच को पुनर्स्थापित कर दिया। भारत भले ही पूर्ण विकसित देशों से पीछे हो किंतु आज भी वह सोने का सबसे बड़ा आयातक है तो उसका कारण धातुओं  के निवेश में निहित सुरक्षा है। गत दिवस  खबर  आई कि सोने और चांदी के साथ भी तांबा जैसी धातु की मांग में अचानक तेजी आने से उसके दाम भी चढ़ने लगे । उसके अलावा प्लेटिनम आदि भी महंगे हो गए। हालांकि चांदी की महंगाई को उसके औद्योगिक उपयोग से जोड़कर देखा जा रहा है किंतु अधिकांश देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर सोने की खरीदी कागजी मुद्रा के प्रति बढ़ते अविश्वास का संकेत है। दुनिया इस बात को समझ चुकी है कि विषम हालातों में सोना ही आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि ये दौड़ कहां जाकर ठहरेगी कहना कठिन है । लेकिन फिलहाल जो देखने मिल रहा है उसने आर्थिक विश्लेषकों को भारतीय अर्थव्यवस्था के इस मौलिक सिद्धांत में विश्वास के लिए बाध्य कर दिया है कि वैज्ञानिक प्रगति से आई चकाचौंध अस्थायी और क्षणभंगुर  है जबकि सोना और चांदी की चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी। ईश्वर न करे यदि विश्वयुद्ध हुआ तब जिस देश के पास जितना सोना - चांदी होगा वह उतनी ही सुविधाजनक और सुरक्षित स्थिति में रहेगा। इसीलिए  इन दोनों की कीमतें आये दिन आसमान छू रही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 26 December 2025

भारतीय फिल्मों में सच्चाई दिखाने के दौर की शुरुआत अच्छा संकेत


इन दिनों धुरंधर नामक एक फिल्म की सर्वत्र चर्चा है।   चूंकि इसने ब्लॉक बस्टर होने का स्तर छू लिया इसलिए व्यवसायिक सिनेमा की दृष्टि से ये सफलतम फिल्मों की श्रेणी में आकर खड़ी हो गई । यद्यपि ये आम मुंबैया फॉर्मूला फिल्मों से अलग हटकर कथानक पर आधारित है जिसमें आतंकवाद, राजनीति, माफिया, जासूसी और सबसे ऊपर राष्ट्रवाद है। शुरुआत में फिल्म ने रफ्तार नहीं पकड़ी तब लगा कि वह दर्शकों द्वारा नापसंद कर दी गई किंतु एक सप्ताह के बाद वह नये कीर्तिमान बनाने लगी । कहने को तो फिल्म में अनेक नामी अभिनेता हैं किंतु खालिस मनोरंजन फिल्म न होने से इसकी सफलता पर संदेह के बादल मंडरा रहे थे। लेकिन दर्शकों ने इसके प्रति जो उत्साह दिखाया वह भारतीय फिल्म उद्योग में नये युग का सूत्रपात माना जा सकता है जिसमें केवल दिखावटी देशभक्ति की बजाय असली समस्याओं को उजागर कर लोगों को उनके प्रति जागरूक करने का मकसद है। बीते कुछ वर्षों में कश्मीर, केरल और बंगाल को लेकर कुछ ऐसी फिल्में बनाई गईं जिनमें उन सच्चाइयों को दर्शाया गया है जिन्हें देश की जनता से छिपा लिया गया। इसी तरह कुछ ऐतिहासिक और राजनीतिक हस्तियों पर बनी फिल्में भी दर्शकों द्वारा सराही गईं। इसीलिए उनके प्रदर्शित होते ही सिने जगत के चौधरियों के पेट में मरोड़ शुरू हो गया जो केवल नृत्य - संगीत, रोमांस और एक्शन को ही फिल्म की सफलता का आधार समझते रहे। आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता का सहारा लेना भी आम होता जा रहा था। ओ. टी. टी नामक माध्यम ने तो नंगेपन की हदें पार कर डालीं।  कभी - कभी तो लगता है मानों फिल्म उद्योग के पास अच्छे पटकथा और संवाद  लेखकों का बड़ा अभाव हो चला है। ऐसे वातावरण में देश से जुड़े मुद्दों पर फिल्में बनाने का प्रयास साहसिक भी है और सराहनीय भी। पहले ऐसे विषयों पर फिल्म बनाने में  आर्थिक जोखिम होने से उनमें पैसा लगाने वाले नहीं मिलते थे। लेकिन  अब फिल्म उद्योग को ये समझ में आने लगा है कि दर्शक विशुद्ध मनोरंजन और हल्की - फुलकी पारिवारिक फिल्मों के अलावा ऐसी  फिल्मों को भी टिकिट खरीदकर देखने में भरपूर रुचि लेने लगा है। भले ही ये कहा जाए कि इनके निर्माण के पीछे मौजूदा केंद्रीय सत्ता की भूमिका है किंतु जो फिल्में मनोरंजन के साथ ही लोगों को देश के सामने खड़े खतरों से अवगत कराने के साथ ही राष्ट्रवादी भावना का संचार करती हैं , उन्हें हर दृष्टि से प्रोत्साहित किया जाना जरूरी है। उस लिहाज से धुरंधर ने फिल्म निर्माण के साथ ही दर्शकों की बदलती सोच का जो संकेत दिया उससे  वस्तुवादी धरातल वाली फिल्मों का रास्ता खुल गया। कहते हैं उसके निर्माता ने फिल्म का अगला भाग भी तैयार करके रख लिया है जिसे कुछ माह बाद प्रदर्शित किया जाएगा। धुरंधर फिल्म के कथानक को सांप्रदायिक बताने वालों को कोई महत्व नहीं मिलना भी हवा का रुख बदलने का इशारा है। कुछ फिल्मी दिग्गजों को तो इस फिल्म की आलोचना करने के बाद पलटी मारने मजबूर होना पड़ा। इसका असर केवल भारत में ही होता तब वह सामान्य बात होती क्योंकि अतीत में भी दर्जनों ऐसी फिल्में बनाई जा चुकी हैं जिनके कारण देशभक्ति की भावना का संचार हुआ।  चीन और पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाइयों पर भी अनेक फिल्में बनीं जो सफल भी रहीं। आतंकवाद को आधार बनाकर भी फिल्में बनाई गईं किंतु बीते कुछ सालों के भीतर कुछ ऐसी फिल्मों को दर्शकों ने जमकर सराहा जिनमें वास्तविकता को साहसिक तरीके से फिल्माया गया। इसीलिए इनकी प्रतिक्रिया देश की सीमाओं से परे भी हुई। धुरंधर के कुछ चरित्रों को लेकर पाकिस्तान में जिस तरह से बवाल मचा उससे लगा कि फिल्म का कथानक तैयार करने में काफी मेहनत और शोध हुआ। भारत में दुनिया की सबसे अधिक फिल्में बनती हैं किंतु अभी भी हमारे फिल्म उद्योग को वैश्विक स्तर पर खास सम्मान नहीं मिलता क्योंकि वे  सच्चाई से दूर रहती हैं। आतंकवाद के विषय पर बनी कुछ फिल्मों में कहानी को ऐसा मोड़ दिया गया जिससे निंदा करने के बजाय उसके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित हुई। लेकिन अब ऐसा लगता है भारतीय फिल्म निर्माता ढर्रे से निकलकर जमीनी सच्चाई से दर्शकों को अवगत करवाने का साहस दिखा रहे हैं। इसके पीछे बड़ा कारण देश के राजनीतिक परिदृश्य में आया बदलाव भी है। इसके अलावा राष्ट्रवाद का उभार भी फिल्म निर्माताओं को अपना रवैया बदलने प्रेरित कर रहा है। धुरंधर की सफलता ने फिल्म उद्योग के  स्थापित छत्रपों के वर्चस्व को जिस प्रकार से चोट पहुंचाई उसे एक नये दौर की शुरुआत कहा जा सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 25 December 2025

वरना साँस का संकट पूरे देश को घेर लेगा


बीते कुछ दिनों से पश्चिमी उ.प्र से , हरियाणा और राजस्थान तक फैली अरावली पर्वतमाला को खनन माफिया से होने वाले नुकसान से बचाने हेतु हो रहा आंदोलन चर्चा का विषय बना हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय के एक ताजा फैसले के कारण ऐतिहासिक अरावली के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। न सिर्फ पर्यावरण प्रेमी अपितु इस क्षेत्र में रहने वाले आम नागरिक के मन में भी अरावली को खनन माफिया के हवाले किये जाने के फैसले से गुस्सा है। यद्यपि केंद्र सरकार ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तत्काल प्रतिबंधात्मक कदम उठाये हैं परंतु  ऊंचाई के आधार पर  पहाड़ की परिभाषा तय करने के बाद अरावली में उत्खनन का रास्ता साफ होने से इस अंचल के रहवासियों में चिंता और गुस्से की लहर दौड़ पड़ी। इसकी रोषपूर्ण प्रतिक्रिया समूचे देश में होने से केंद्र सरकार भी हरकत में आई और उसने कुछ कदम उठाये। हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि इनसे  अरावली को बचाने में सफलता मिलेगी या नहीं किंतु इतना तो हुआ कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोग मुखर हुए। अरावली की नैसर्गिक संरचना को नष्ट करने से दिल्ली, उ.प्र और अन्य निकटवर्ती राज्यों में राजस्थान के मरुस्थलों से आने वाली आँधियों के जरिये धूल उड़कर फैलने का खतरा जो बताया जा रहा है वह निराधार नहीं है। ऐसा होने पर खेतों  के अलावा पेड़ - पौधों की सेहत भी बिगड़ेगी। उल्लेखनीय है खनन माफिया की धन कमाने की वासना के कारण देहरादून के आसपास की प्राकृतिक संरचना बुरी तरह बिगड़ चुकी है। समूचे गढवाल अंचल में भी पहाड़ों के साथ किये गए निर्मम व्यवहार का दुष्प्रभाव जल्दी - जल्दी दिखाई देने लगा है। इसे लेकर चिंता तो खूब व्यक्त की जाती है लेकिन जो किया जाना चाहिए वह नहीं होने से हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। इसके अलावा हिमालय के बाकी हिस्सों में भी मानवीय हस्तक्षेप के कारण प्रकृति का कोप समय - समय पर प्रकट होता रहता है। इस साल बरसात के मौसम में जितने भूस्खलन हिमालय के विभिन्न हिस्सों में हुए वे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्व संकेत हैं। विकास की अंधी दौड़ में  प्रकृति और पर्यावरण से छेड़छाड़ कितनी महंगी पड़ती है ये देश की राजधानी दिल्ली और उसके हिस्से बन बन चुके नोएडा तथा ग़ाज़ियाबाद में रहने वालों से पूछा जा सकता है। कहने को दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय महानगर है। शहरी विकास की सभी योजनाएं वहाँ लागू हैं। पूरी सरकार वहाँ रहती है। संसद और सर्वोच्च न्यायालय है। देश - विदेश से आवागमन की भरपूर सुविधाएं हैं।ढेर सारे  पांच सितारा होटल हैं। लेकिन एन.सी.आर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में रहने वाले शुद्ध हवा में सांस लेने को तरस रहे हैं। संसद से सर्वोच्च न्यायालय तक में इसकी चर्चा होने के बाद भी कोई समाधान नजर नहीं आता। जो कदम उठाये भी जाते हैं वे अपर्याप्त साबित होने से लोगों की मुश्किलें बजाय खत्म होने के और बढ़ती जा रही हैं। सरकारें बदलने के बावजूद दिल्ली की दुर्दशा दूर नहीं हो रही। इससे स्पष्ट है कि प्रकृति से लड़कर पर्यावरण का संरक्षण नहीं किया जा  सकता। इसके बाद भी अरावली के सीने पर जेसीबी चढ़ाना जानबूझकर अपने विनाश को न्यौता देना है। हालांकि कुछ लोग ये प्रचारित कर रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की गलत व्याख्या की जा रही है। लेकिन ये कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं होगा कि समूचे देश में खनन व्यवसाय में लगे तत्वों ने नेताओं और नौकरशाहों के संरक्षण में प्रकृति और पर्यावरण के साथ जो अत्याचार किया वह अक्षम्य अपराध ही नहीं अपितु भावी पीढ़ी के जीवन को संकट में डालने का कारण बनेगा। गत दिवस दिल्ली उच्च न्यायालय ने घरों  के भीतर हवा को साँस लेने लायक बनाने लगाए जा रहे एयर प्यूरीफायर पर 18 फीसदी जीएसटी होने पर ऐतराज जताया किंतु सरकार जीएसटी पूरी तरह घटा  दे तब भी घर के भीतर की हवा भले ही साफ हो जाए लेकिन लोग घरों में ही कैद नहीं रह सकते। विद्यार्थियों के अलावा नौकरपेशा वर्ग को बाहर जाना ही पड़ता है। इस बारे में चीन की राजधानी बीजिंग का उदाहरण दिया जा रहा है जो एक दशक पूर्व तक दुनिया का  सबसे प्रदूषित शहर  था किंतु अब स्थिति पूरी तरह बदल गई और वहाँ का पर्यावरण सुधर गया। दिल्ली की हवा को साँस लेने लायक बनाने के लिए बीजिंग मॉडल को अपनाया जा सकता है। लेकिन केवल दिल्ली ही क्यों साँस लेने हेतु शुद्ध हवा प्रत्येक देशवासी का अधिकार है। इसलिए जरूरी हो गया है कि पर्यावरण की मौजूदा स्थिति में जरूरी सुधार हेतु युद्ध स्तरीय प्रयास किये जाएं वरना साँस का संकट पूरे देश को घेर लेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी