Saturday, 31 January 2026

हामिद अंसारी की नजर में महमूद गजनवी विदेशी नहीं भारतीय था


पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक हालिया साक्षात्कार में महमूद गजनवी को विदेशी मानने से इंकार करते हुए उसे भारतीय लुटेरा बता दिया। इसके पहले भी वे अनेक विवादास्पद बयान देकर अपनी किरकिरी करवा चुके हैं। गाजीपुर (उ.प्र) के जिस प्रसिद्ध अंसारी परिवार से वे जुड़े हैं संयोगवश कुख्यात माफिया मुख्तार अंसारी भी उसी से था। हालांकि इस परिवार का इतिहास काफी समृद्ध रहा किंतु अब इसकी प्रतिष्ठा धूल - धूसरित हो चुकी है। मुख्तार के कारनामों ने तो खानदान के नाम पर कालिख पोती ही लेकिन देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठने  वाले हामिद अंसारी भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सवाल ये है कि गजनवी को भारतीय लुटेरा बताने जैसा अपना शोध उन्होंने उपराष्ट्रपति रहते उजागर क्यों नहीं किया? विदेश सेवा में रहते हुए विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हामिद अंसारी को जब लगा कि अब उन्हें कोई सरकारी पद मिलने की संभावना नहीं बची तब उन्हें देश में मुसलमान असुरक्षित नजर आने लगे।    प्रसिद्ध पत्रकार प्रदीप सिंह का आरोप है कि अंसारी ने ईरान में भारत के दूत रहने के दौरान  वहां कार्यरत रॉ के एक अधिकारी की जानकारी ईरान की गुप्तचर एजेंसी सवाक को दे दी थी । उसके बाद उस अधिकारी का अपहरण कर लिया गया था किंतु उसे छुड़ाने के लिए अंसारी ने कोई प्रयास नहीं किया। 2017 में देश की गुप्तचर एजेंसी रॉ के अनेक पूर्व अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि हामिद  अंसारी के कार्यकाल की जांच कराई जावे। एक पाकिस्तानी  पत्रकार ने तो ये कहकर सनसनी मचा दी थी कि वह उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के आमंत्रण पर भारत आया और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई .एस.आई के लिये महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं। इस पर अपना पल्ला झाड़ते हुए अंसारी ने सफ़ाई दी कि विदेशी पत्रकारों को सरकार के कहने पर  आमंत्रित किया जाता था। इन सबसे ये स्पष्ट होता है कि उनको देश ने जो सम्मान दिया वे उसके पात्र नहीं थे। महमूद गजनवी को विदेशी नहीं मानने की उनकी सोच उनकी दूषित और  क्षुद्र मानसिकता का प्रमाण है। उनकी मानें तो गजनवी को राजनीतिक सुविधा के लिए विदेशी लुटेरा कहा जाता है। इतिहास साक्षी है कि भारत पर 17 बार हमला करने वाले गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को भी लूटा था। वह एक क्रूर व्यक्ति था जिसने सनातन धर्म के अनेक पवित्र स्थलों को ध्वस्त किया। अंसारी  उसे भारतीय लुटेरा बताकर क्या साबित करना चाहते हैं ये तो वही जानें किंतु गनीमत है उन्होंने  उसे लुटेरा तो माना।  दरअसल अंसारी की बातें उन वामपंथी इतिहासकारों की सोच से प्रभावित हैं जो अकबर को धर्मनिरपेक्ष मानते तथा औरंगजेब की शान में कसीदे पढ़ते है। अब देखना ये है कि राहुल गांधी , ममता बैनर्जी, अखिलेश यादव जैसे नेता महमूद गजनवी को भारतीय लुटेरा बताए जाने पर हामिद अंसारी की निंदा करते हैं या मुस्लिम तुष्टीकरण की खातिर उनकी हाँ में हाँ मिलाएंगे। असदुद्दीन ओवैसी की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित है।  गौरतलब है कि अंसारी ने ये कहने से परहेज किया कि महमूद गजनवी धर्मांध मुसलमान था और उसने हिन्दू मंदिरों और जनता को ही निशाना बनाया। बड़ी बात नहीं भविष्य में वे महमूद गजनवी को धर्म निरपेक्ष और पृथ्वीराज चौहान को कट्टरपंथी बताने लग जाएं। आश्चर्य नहीं होगा यदि उनके भीतर छिपा इतिहासकार ये भी  बताने लगे कि महमूद गजनवी तो पर्यटक के रूप में आया था किंतु यहां  के लोगों ने उसे परेशान किया  जिसके कारण उसने लूटपाट की। देश के उपराष्ट्रपति रह चुके हामिद अंसारी द्वारा इस प्रकार की बयानबाजी इतिहास को झुठलाने के साथ ही विदेशी आक्रांताओं को निर्दोष साबित करने का घिनौना प्रयास है। वे कांग्रेस पार्टी के कृपापात्र रहे हैं। ऐसे में उससे ये अपेक्षा करना गलत नहीं है कि वह पूर्व उपराष्ट्रपति के इस विचार की निंदा करे। महमूद गजनवी को भारतीय लुटेरा कहकर भ्रम पैदा करने का प्रयास बेहद खतरनाक है। यदि इसका विरोध नहीं किया जाता तो वह दिन दूर नहीं जब चंगेज खां और नादिर शाह की तारीफ के पुल भी बांधे जाने लगेंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 30 January 2026

पवार परिवार के प्रभुत्व पर खतरे के बादल


महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की हवाई दुघर्टना में हुई मौत के बाद ये सवाल एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है कि राज्य की राजनीति पर अचानक उत्पन्न इस परिस्थिति का क्या असर पड़ेगा। अजीत रिकॉर्ड 6 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। 2024 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी एनसीपी को जबरदस्त सफलता मिली और 41 विधायकों के साथ वे कद्दावर नेता के तौर  पर उभरे। यह सफलता इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण थी क्योंकि उन्होंने  चाचा शरद पवार से बगावत कर पार्टी पर कब्जा किया था। हालांकि अजीत का  उत्थान चाचा की छत्रछाया में ही हुआ किंतु  उत्तराधिकार संबंधी मतभेद के चलते दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई। अजीत के  मन में मुख्यमंत्री नहीं बन पाने के साथ ही ये मलाल भी था कि चाचा ने अपनी इकलौती बेटी सुप्रिया सुले को राजनीतिक वारिस बनाया जबकि वे शुरुआत से ही उनके दाहिने हाथ बने हुए थे । अजीत का चाचा से मतभेद केवल सियासी विरासत का था जिसके लिए वे परिवार की एकता तोड़ने में भी नहीं हिचकिचाए। दरअसल वृद्धावस्था और बीमारी के चलते शरद पवार पूरी तरह कमजोर हो चले थे जिससे उनकी राजनीतिक जमीन पर अजीत ने काफी कुछ कब्जा कर लिया था। हालांकि हाल ही में संपन्न स्थानीय निकायों के चुनावों में चाचा - भतीजे  दोबारा करीब आए और दोनों की पार्टियों के एकीकरण की चर्चाएं भी होने लगीं किंतु उसके पहले ही अजीत को मौत ले गई। जहां तक बात भाजपा से गठबंधन कर सत्ता हासिल कर एनसीपी तोड़ने की थी तो अजीत ने ये हुनर चाचा से ही सीखा था जिन्होंने अपने राजनीतिक गुरु बसंत दादा पाटिल की सरकार गिरवाकर मुख्यमंत्री पद कब्जाया था। सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा कर कांग्रेस तोड़कर एनसीपी बनाने वाले शरद पवार  अवसरवाद के जीते जागते प्रतीक हैं। इसीलिए कांग्रेस से बगावत के बाद उसके साथ सत्ता में भागीदारी करने में भी उन्हें संकोच नहीं हुआ। अजीत भी यही सब देखते हुए राजनीति के मैदान में आगे बढ़े थे । लिहाजा  अपने राजनीतिक गुरु और परिवार के मुखिया  को धोखा देने में उन्हें संकोच नहीं हुआ। भ्रष्टाचार के जरिए आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने का हुनर भी अजीत ने शरद पवार से ही सीखा था। ये भी कहा जाता है कि भाजपा की शरण में आने के पीछे उनका मकसद भ्रष्टाचार के आरोपों से अपने दामन पर लगे दागों को ही धोना था। इसीलिए उनके साथ आने  से भाजपा की छवि पर भी आंच आई थी ।  लेकिन उन सभी विवादों पर अचानक पर्दा पड़ गया। जीवन के आखिरी पड़ाव पर खड़े शरद पवार के पास अब न तो इतना समय है और न ही शक्ति कि वे  परिवार के प्रभुत्व को बारामती और उसके निकटवर्ती इलाकों में बनाए रख सकें। उनकी बेटी सुप्रिया भले ही लोकसभा सदस्य हों किंतु उनका अपना जनाधार न के बराबर है। ऐसे में अजीत की असमय मृत्यु ने पवार परिवार के प्रभाव के अंत की शुरुआत कर दी है। अजीत के दोनों बेटों पर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते  उनकी ताजपोशी कठिन है। इसलिए उनकी पत्नी और राज्यसभा सदस्य सुनेत्रा को फडणवीस सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाने की चर्चा है। हालांकि कुछ समय तक भले ही वे सहानुभूति हासिल करती रहें किन्तु पति की मौत के बाद उनके लिए पार्टी चलाते रहना कठिन है। यदि एनसीपी के दोनों धड़े मिल भी जाएं तब भी पवार परिवार के वे पुराने दिन  शायद ही लौट पाएंगे। इस शून्य को कौन भरेगा ये बड़ा सवाल है क्योंकि शरद पवार के सामने परिवार के दबदबे को बनाए रखने के साथ ही अपनी बेटी सुप्रिया के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने की चिंता भी है। ऐसे में वे भी भाजपा के निकट जाने का निर्णय ले सकते हैं क्योंकि अब सेकुलर राजनीति का झण्डा उठाने की क्षमता न उनमें बची और न ही परिवार में। वैसे भी परिवारवादी पार्टियों के साथ यही विडंबना जुड़ी होती है कि  उसका सबसे मजबूत स्तंभ कमजोर होने अथवा गिरने के बाद पूरा ढांचा धराशायी हो जाता है। राजनीतिक विश्लेषक अजीत की मृत्यु के बाद फडणवीस सरकार पर एकनाथ शिंदे का दबाव बढ़ जाने की आशंका जता रहे हैं लेकिन यदि सुनेत्रा उपमुख्यमंत्री बन गईं तब भाजपा देर सवेर उनकी पार्टी को भी अपने में मिलाने का प्रयास करेगी। कुल मिलाकर  पवार परिवार का राजनीतिक भविष्य अनिश्चितता में फंस गया है। शरद पवार के लिए ये स्थिति बेहद पीड़ादायक है क्योंकि भतीजे की बगावत के बाद भी परिवार की जो वजनदारी बनी हुई थी वह एक झटके में खत्म होने को आ गई।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 January 2026

यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच संधि से अमेरिकी प्रभुत्व को धक्का



गणतंत्र दिवस के दूसरे दिन यूरोपीय यूनियन के साथ हुई मुक्त व्यापार संधि एक ऐतिहासिक कदम है जिसने विश्व के व्यापार संतुलन को एक नई दिशा दे दी। 27 देशों का विकसित बाजार जहां भारत को मिलने जा रहा है वहीं यूरोप से आने वाली चीजें सस्ती होने से भारतीय उपभोक्ताओं सहित उद्योगों को भी लाभ होगा। इस बारे में अनेक वर्षों से बातचीत चल रही थी लेकिन नतीजे पर नहीं पहुंचने की वजह से  निर्णय लंबित रहा। शायद अभी भी वह निर्णायक बिंदु पर न आई होती लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने टैरिफ के नाम पर जिस गुंडागर्दी  का परिचय दिया उसके बाद से पूरी दुनिया में हड़कंप मचा हुआ है। दूसरे महायुद्ध के बाद से ही कुछ को छोड़कर ज्यादातर यूरोपीय देश अमेरिका पर निर्भर थे। सोवियत संघ के बिखरने के बाद तो यूरोप के जो साम्यवादी देश थे वे भी अपनी सुरक्षा के साथ ही आर्थिक मामलों में अमेरिका के प्रभाव में आने बाध्य हो गए। लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच शुरू हुई जंग के बाद अमेरिका का दोगला रवैया यूरोपीय देशों के लिए समस्या बन गया। जब तक जो बाइडेन राष्ट्रपति रहे तब तक तो फिर  भी ठीक था परंतु गत वर्ष ट्रम्प के सत्ता संभालते ही अमेरिकी नीतियां तेजी से बदलने लगीं। स्थिति यहां तक आ गई कि ट्रम्प ने अपने यूरोपीय सहयोगियों को ये संकेत दे दिया कि वे अमेरिका के भरोसे न रहें क्योंकि आगे से वह उनको खैरात में कुछ नहीं देगा। यूक्रेन के साथ भी ट्रम्प ने जो धोखाधड़ी की उसकी वजह से अमेरिका की विश्वसनीयता मिट्टी में मिलती चली गई। यूरोपीय देशों पर टैरिफ बढ़ाने के अलावा उनको दिए जा रहे  सुरक्षा कवच के बदले भुगतान का दबाव बनाया जाने लगा। भले ही ब्रिटेन , फ्रांस और जर्मनी जैसे उन्नत देश अमेरिकी दबाव को एक सीमा तक सहन करने में सक्षम हों किंतु बाकी सबकी हालत ऐसी नहीं होने से घबराहट फैल गई। दरअसल यूक्रेन पर रूसी हमले का जब यूरोपीय देशों ने विरोध किया तब राष्ट्रपति पुतिन ने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए  पड़ोसी देशों की जमीनों पर कब्जा जमाने का इरादा व्यक्त कर सनसनी फैला दी। हालांकि रूस खुद यूक्रेन के साथ उलझा होने से नए मोर्चे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा सका किंतु यूरोपीय देशों की चिंता तब और बढ़ गई जब अमेरिका दोगलेपन पर उतर आया। चूंकि चीन से भी यूरोपीय देश भयभीत रहते हैं ऐसे में उन्हें ऐसे किसी सहारे की जरूरत थी जिसका रूस और चीन दोनों के साथ संवाद कायम हो। और तब उन्हें भारत ही दिखाई दिया । इसका संकेत तब मिल गया जब इटली की प्रधानमंत्री ने भारत से अनुरोध किया कि वह अपने कूटनीतिक प्रभाव से उनके और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच संवाद स्थापित करवा दे। दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन में यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा अमेरिका के दबावों के प्रतिकार स्वरूप भारत के साथ होने  वाली मुक्त व्यापार संधि को मदर ऑफ ऑल ट्रीटी कहकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की दिशा बदलने का संकेत दे दिया था। अब  तक तो अमेरिका ने इस संधि को संभव नहीं होने दिया किंतु ट्रम्प के सनकीपन से त्रस्त यूरोप ने अंततः भारत  का दामन थामने का फैसला किया । इस संधि के प्रभाव में आते ही  यूरोप के लिए विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ने के दरवाजे खुल गए हैं। साथ ही भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में कमी आने से होने वाले नुकसान की भरपाई भी संभव हो गई। इस तरह 2 अरब जनसंख्या से जुड़ी इस संधि ने अमेरिकी प्रभुत्व के अंत की शुरुआत कर दी है। यूरोपीय देशों का भारत के साथ जुड़ाव होने में दोनों का लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गहरा विश्वास होने के साथ ही खुला सामाजिक वातावरण भी बड़ा कारण है। चीन और रूस दोनों में यूरोपीय देशों को उतनी व्यावसायिक संभावनाएं नहीं दिखीं जितनी भारत में हैं। लिहाजा यूरोपीय यूनियन ने 18 सालों से लटकी इस संधि को अंजाम तक पहुंचा दिया। इसका जमीनी असर तो कुछ दिनों बाद नजर आएगा किंतु इससे दोनों पक्षों ने  मिलकर ट्रम्प टैरिफ के गुब्बारे की हवा निकाल दी। अमेरिका पर इसका कितना असर होता है इसके लिए प्रतीक्षा करनी होगी किंतु ऊंचे टैरिफ से बढ़ी महंगाई से अमेरिकी जनता की बढ़ती नाराजगी से वहां ट्रम्प का विरोध भी बढ़ेगा। शायद यही वजह है कि ग्रीनलैंड पर हमले की उनकी योजना ठंडी पड़ने लगी है। हो सकता है अब अमेरिका भारत से भी व्यापार संधि कर ले किंतु यूरोपीय यूनियन के साथ हुई इस संधि ने अमेरिका को ये तो बता ही दिया कि दुनिया उसके बिना भी चल सकती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 28 January 2026

शंकराचार्य पद का विवाद सनातन धर्म के लिए अशुभ संकेत


प्रयागराज के माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पद पर नियुक्ति का विवाद नए सिरे से गहरा गया। स्नान करने से रोके जाने पर वे भड़क उठे ।  प्रशासन द्वारा व्यवस्था के नाम पर की गई कड़ाई उन्हें अपमानजनक लगी। राज्य सरकार ने उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांग लिया,  वहीं संत समाज भी उनके पक्ष - विपक्ष में बंट गया। अविमुक्तेश्वरानंद जी के अनुयायियों को भी मेला प्रशासन और उ.प्र  सरकार द्वारा उनके साथ किया गया व्यवहार नागवार गुजरा। सोशल मीडिया पर एक तरफ जहां उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त करने वाले सक्रिय नजर आए तो दूसरी तरफ़ स्वामी जी की बखिया उधेड़ने वालों की भी बड़ी संख्या सामने आई। सबसे बड़ी बात ये रही कि चारों शंकराचार्यों तक में अविमुक्तेश्वरानंद जी की शंकराचार्य पद पर हुई नियुक्ति को लेकर मतैक्य नहीं दिखा। ये बात भी बाहर निकलकर आई कि न्यायालयीन रोक के कारण अखाड़ा परिषद द्वारा उनका पट्टाभिषेक नहीं होने  से उनकी नियुक्ति की पुष्टि नहीं हो सकी। यहां तक भी बात ठीक थी किंतु फ़िर अविमुक्तेश्वरानंद जी की बारे में अन्य धर्माचार्यों द्वारा की गई आलोचनात्मक टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में उन्होंने जो कटाक्ष किए उनकी वजह से सनातन धर्म में अखंड आस्था रखने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को दुख हुआ। अविमुक्तेश्वरानंद जी के गुरु ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद जी दो पीठों के शंकराचार्य थे। उनकी नियुक्ति भी विवाद में  घिरी रही। और अंत में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद उन्हें मान्यता मिली। कहा जाता है वे अपनी वसीयत में बद्रिकाश्रम पीठ के लिए अविमुक्तेश्वरानंद जी और द्वारिकापुरी के लिए स्वामी सदानंद जी को उत्तराधिकारी बना गए थे ।  द्वारिकापुरी के शंकराचार्य पद को लेकर तो विवाद नहीं हुआ किंतु अविमुक्तेश्वरानंद जी की नियुक्ति पर आपत्तियां दर्ज की गईं। जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी ने भी इस नियुक्ति को गलत बता दिया जो  सबसे वरिष्ट हैं। चूंकि मामला न्यायालय के विचाराधीन है लिहाजा उसके वैधानिक पक्ष पर कुछ भी कहना उचित नहीं होगा किंतु ऐसे प्रकरण न्यायालय में जाने से सनातन धर्म का सम्मान कम होता है। शंकराचार्य का पद इस धर्म के अनुयायियों के लिए सर्वोच्च श्रद्धा का पात्र होता है। धर्म के बारे में उनके निर्देश अंतिम माने जाते हैं। आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों का उद्देश्य सनातन धर्म को संगठित और व्यवस्थित करना था। कालान्तर में अनेक उप पीठों का उदय हुआ और अब तो जगद्गुरु की उपाधि थोक के भाव बंटने  लगी है। महामंडलेश्वर की पदवी तो ऐसे - ऐसे लोगों को दी जा रही है जिनका सनातन परम्पराओं से कोई संबंध नहीं है। शंकराचार्यों का ये प्राथमिक दायित्व है कि वे सनातन से जुड़ी मर्यादाओं और नियमों के पालन  हेतु समाज की प्रेरित करें। ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योंकि इन दिनों सनातन धर्म के विरुद्ध कुछ शक्तियां संगठित होकर दुष्प्रचार करने में जुटी हुई हैं। इसमें विदेशी हाथ होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के बेटे ने तो सनातन धर्म की  तुलना डेंगू और करोना से करते हुए उसे नष्ट करने की बात सार्वजनिक तौर पर कही जिसका समर्थन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी किया। ये दोनों क्रमशः तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार में मंत्री भी हैं। आजकल जातिवाद के नाम पर भी सनातन धर्म के भीतर दीवारें खड़ी करने का अभियान विभिन्न राजनेताओं द्वारा जारी है। ऐसे में जरूरी है कि चार पीठों के शंकराचार्यों के बीच परस्पर सहयोग , सामंजस्य और सम्मान का भाव हो। इनके अलावा जो उप पीठें हैं उनके बारे में भी स्थिति स्पष्ट होना चाहिए जिससे  लोगों के मन में व्याप्त भ्रम दूर हो।  थोक के भाव जो जगद्गुरु नियुक्त किए जा रहे हैं उनकी भूमिका भी स्पष्ट हो ताकि उन्हें अपेक्षित सम्मान प्राप्त हो सके। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन्हें सनातन धर्म का सर्वोच्च धर्माचार्य माना जाता हो उनकी नियुक्ति का मामला धार्मिक मंचों से बाहर निकलकर अदालत में जाए जहां  उनको अपनी सत्यता साबित करने के लिए शपथपत्र देना पड़े। अविमुक्तेश्वरानंद जी का ये कहना सही है कि शंकराचार्य कौन है , ये राष्ट्रपति तक तय नहीं कर सकते ।लेकिन सनातन धर्म के सर्वोच्च पद की नियुक्ति का फैसला सर्वोच्च न्यायालय से हो , ये भी अटपटा लगता है। ऐसे विवादों के चलते ही लोगों के  मन में ये अवधारणा गहराई तक फैल गई है कि जो धर्मगुरु अपने ही मतभेद नहीं सुलझा पा रहे वे समाज को एकजुट रहने की प्रेरणा किस अधिकार से देंगे?


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 January 2026

आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का प्रतीक है


     अभूतपूर्व वैश्विक उथल - पुथल के बीच भारत आज अपना 77 वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। स्वाधीनता तो 15 अगस्त 1947 को मिल गई थी किंतु सही मायने में 26 जनवरी 1950 को देश ब्रिटिश दासता से मुक्त हुआ जब भारत ने अपना संविधान लागू कर एक संप्रभु गणराज्य के तौर पर खुद को विश्व पटल पर स्थापित किया।
    आज राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष सुश्री उर्सुला वॉन डेर लेयेन की उपस्थिति ने पूरी दुनिया को संकेत दे दिया कि आज का भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए फैसले लेने में स्वतंत्र है। उल्लेखनीय है सुश्री लेयेन कल भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि हस्ताक्षरित करने वाली हैं जिसे उन्होंने मदर ऑफ ऑल डील्स कहकर पूरी दुनिया में हलचल मचा दी। बीते दो दशक से इस संधि पर वार्ताओं का दौर चल रहा था। संभवतः कतिपय कूटनीतिक और आर्थिक मजबूरियों के कारण बात अटकी रही ।
   बीते एक साल में दबाव की कूटनीति के अंतर्गत अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत को घेरने का भी हरसंभव प्रयास किंतु उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी। ट्रम्प को लगता था कि टैरिफ नामक उनकी धौंस के आगे भारत घुटनाटेक हो जाएगा किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में अपनी स्वतंत्र नीति लागू करते हुए पूरी दुनिया में संभावनाएं ढूंढ़ी जिसका परिणाम अनेक देशों के बाद यूरोपीय यूनियन के साथ होने जा रही मुक्त व्यापार संधि है।
     गत वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के  अंतर्गत पाकिस्तान  स्थित आतंकवादियों के अड्डे तो तबाह किए ही उसके बेहद संवेदनशील ठिकानों पर भी सटीक निशाने साधे। उस युद्ध से ट्रम्प चिढ़ गए क्योंकि पाकिस्तान में छिपाकर रखे गए अमेरिकी परमाणु अस्त्रों के जखीरे के निकट तक भारतीय मिसाइलों ने धमाके कर डाले। उसी के बाद से अमेरिका पाकिस्तान के प्रति नर्म होकर भारत को दबाने में जुट गया। ट्रम्प ने युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटने का भरसक प्रयास किया किन्तु भारत ने जब उनके दावे की पुष्टि से इंकार किया तब उन्होंने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर 50 फीसदी  टैरिफ लगाकर अपनी खीझ निकाली।

   लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि अपने हितों की रक्षा करने के लिए वह अपना रास्ता खुद चुन सकता है। इस नीति के कारण वैश्विक मंचों पर हमारी गणना एक ऐसे देश के तौर पर होने लगी जो अमेरिका  जैसी विश्व शक्ति के दबाव को भी ठुकराने का माद्दा रखता है। 
       इसीलिए आज का गणतंत्र दिवस कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे समय जब पूरी दुनिया अस्थिरता और अनिश्चितता से जूझ रही है तब भारत ने राजनीतिक स्थिरता के साथ ही आर्थिक और सामरिक क्षेत्र में जो दृढ़ता दिखाई उसकी वजह से वैश्विक समस्याओं को सुलझाने के लिए पूरा विश्व हमारी ओर निहार रहा है। जो यूरोप कभी अपनी नस्लीय श्रेष्ठता के अहंकार में डूबकर भारत को सपेरों और मदारियों का देश समझकर उसका मजाक उड़ाता था आज वही अमेरिकी आतंक से बचने भारत के पास आने मजबूर है। रूस , चीन , द. अफ्रीका , ऑस्ट्रेलिया , न्यूजीलैंड सहित लैटिन अमेरिकी देशों तक में भारत के साथ कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत करने का भाव जाग उठा है।

    लेकिन हमारे घर  में ही कुछ तबके हैं जो देश की बढ़ती शक्ति और महत्व को स्वीकार करने के बजाय लोगों का मनोबल गिराने के काम में जुटे हैं। निहित राजनीतिक स्वार्थों की खातिर ये वर्ग सेना के पराक्रम पर संदेह करने की हद तक जाने में भी संकोच नहीं करता। लोकतंत्र के भविष्य और चुनाव प्रक्रिया को लेकर जो दुष्प्रचार किया  जाता है उसके पीछे जनता को  भड़काकर बांग्लादेश और नेपाल जैसी आग में भारत को  झुलसाने का षडयंत्र ही है। विदेशों में बैठी भारत विरोधी ताकतें इस षडयंत्र को बढ़ावा देने तत्पर रहती हैं। लेकिन जनता ने लगातार इसे विफल कर लोकतंत्र और संविधान द्वारा संचालित निर्वाचन प्रणाली में अपना विश्वास व्यक्त दोहराया है।
       बीते एक दशक में भारत ने हर क्षेत्र में ऊंची छलांगें लगाई हैं। इस कारण हर देशवासी का मन आत्मविश्वास से भरा हुआ है। कोरोना के बाद जब दुनिया भर की  बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हिल उठीं तब हमारी अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ते हुए पूरी दुनिया का हौसला बढ़ा रही है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का प्रतीक  है। हमारे अड़ोस - पड़ोस में जब अराजकता व्याप्त है तब जीवंत लोकतंत्र के कारण देश की छवि एक परिपक्व देश के तौर पर स्थापित हो चुकी है।

     हर्षोल्लास के इस अवसर पर हमें इस बात का भी आत्मावलोकन करना चाहिए कि देश को मजबूत बनाने में हमारी भूमिका क्या है क्योंकि गणतंत्र तभी सार्थक होता है जब उसमें प्रत्येक नागरिक का सकारात्मक योगदान हो।  यह राष्ट्रीय पर्व हमारे दायित्वबोध को जाग्रत करे इसी अपेक्षा और अनुरोध के साथ गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 January 2026

कालेधन की समस्या का इलाज आयकर ख़त्म करना ही है



मोदी सरकार के आगामी  बजट को लेकर अनुमानों का दौर जारी है। रविवार होने के बाद भी 1 फरवरी को ही बजट पेश होगा। सरकार महीनों पहले से इसकी तैयारी करती है । अर्थशास्त्रियों से  सुझाव लेने  के अतिरिक्त उद्योग-व्यापार से  जुड़े संगठनों की अपेक्षाएं जानने का प्रयास भी किया जाता है।  कर्मचारी वर्ग और बैंकों  में जमा राशि के ब्याज पर निर्भर बुजुर्ग भी अपने दृष्टिकोण से बजट से उम्मीद लगाते हैं। वित्त मंत्री खुद भी बजट  को लोकप्रिय बनाने विभिन्न वर्गों से राय लेने  का प्रयास करते हैं। हालांकि शायद ही कभी सभी वर्ग संतुष्ट हुए हों। व्यवहारिक रूप से ये संभव भी नहीं होता। हालांकि गत वर्ष के बजट में आयकर की छूट 12 लाख तक  किए जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ क्योंकि इससे मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और व्यवसायी  वर्ग को बड़ी राहत मिली । ये कहना भी गलत नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता के पीछे इसी छूट का बड़ा योगदान रहा। कोरोना  के कारण अर्थव्यवस्था में आए ठहराव से देश उबर चुका है। विकास दर में लगातार  वृद्धि से उत्साहित होकर ही  सरकार ने जीएसटी की दरों में सुधार जैसा साहसिक निर्णय लिया। हालांकि इससे जीएसटी के मासिक संग्रह में कमी आई किंतु उसके बाद भी जीडीपी की रफ्तार यथावत होने से भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी  अर्थव्यवस्था  बनने के बाद तीसरे स्थान  की ओर अग्रसर है। फिलहाल केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी ही हमसे आगे हैं।  इन्हीं सब कारणों से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ नामक हमलों के सामने भारत नहीं झुका। हाल ही में स्विटजरलैंड के दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन के दौरान यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की जो घोषणा की उससे भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास की पुष्टि हो गई। इस संधि को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है जिसने  ट्रम्प को भी चिंता में डाल दिया है । लेकिन  वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है उसके  कारण आर्थिक नीतियों में भी उसी अनुरूप परिवर्तन जरूरी है। हाल ही की घटनाओं के कारण भारत से विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा है। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने से भी आर्थिक अनिश्चितता व्याप्त है।  प्रतिवर्ष हजारों धनवान लोग भारत छोड़ विदेशों में बस रहे हैं जिसका कारण करों का बढ़ता बोझ और जटिलता है। इस विसंगति को रोकने के लिए  विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा समय - समय पर सुझाव दिया जाता रहा कि आयकर को पूरी तरह समाप्त करने के साथ ही जीएसटी की केवल एक ही दर 5 फीसदी  की रखी जाए।  इस सलाह पर यदि  बजट में अमल कर लिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका पूरी दुनिया में बज उठेगा। उल्लेखनीय है बढ़ते करों के कारण ब्रिटेन से बड़ी संख्या में धनकुबेर दुबई जैसी जगह पर आकर बस रहे हैं।  सर्वेक्षण किया जाए तो भारत के भी हजारों लोगों द्वारा दुबई सहित  अन्य देशों में ठिकाना बनाने की बात सामने आ जाएगी। ये बात तो साधारण सोच रखने वाला भी जानता है कि करों की अधिक दरें कालेधन रूपी समानांतर अर्थव्यवस्था की जनक हैं। अर्थक्रांति नामक एक अध्ययन दल ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में आयकर खत्म कर ट्रांजेक्शन टैक्स  लगाने का सुझाव सरकार के सामने रखा था जिसमें 100 रु. को ही सबसे बड़ा नोट रखने की बात थी। कहते हैं 2016 की नोटबंदी आंशिक तौर पर उसी से प्रेरित थी किंतु सरकार ने 500 और 2000 रु. के नोट जारी कर गलती कर दी। जल्द ही 2000 रु. का नोट कालेधन जमा करने का जरिया बन गया और इसीलिए उसे भी बंद किया गया। देश में जो भ्रष्टाचार है उसकी मुख्य जड़ आयकर के अलावा जीएसटी की अधिक दरें हैं । जीएसटी में तो और सुधार करने का आश्वासन सरकार ने दिया भी किंतु आयकर के बारे में क्रांतिकारी फैसला लेना प्रतीक्षित है। वैसे भी आयकर से मिलने वाला राजस्व इतना नहीं कि उसे बंद करने से अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। उल्टे काला धन मुख्यधारा में आ जाने से अर्थव्यवस्था में मजबूती और पारदर्शिता आ जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था सुधरी है किंतु कालेधन की समस्या यथावत है। ऐसे में अपेक्षा की जा सकती है कि गत वर्ष 12 लाख तक की छूट देने से आगे बढ़कर आगामी बजट में आयकर संबंधी ऐसा कोई निर्णय लिया जाए जिससे कि देश का धन बाहर जाना बंद हो और कर चोरी की बजाय लोग ज्यादा से ज्यादा कमाने के प्रति उत्साहित हों।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


कालेधन की समस्या का इलाज आयकर ख़त्म करना ही है


मोदी सरकार के आगामी  बजट को लेकर अनुमानों का दौर जारी है। रविवार होने के बाद भी 1 फरवरी को ही बजट पेश होगा। सरकार महीनों पहले से इसकी तैयारी करती है । अर्थशास्त्रियों से  सुझाव लेने  के अतिरिक्त उद्योग-व्यापार से  जुड़े संगठनों की अपेक्षाएं जानने का प्रयास भी किया जाता है।  कर्मचारी वर्ग और बैंकों  में जमा राशि के ब्याज पर निर्भर बुजुर्ग भी अपने दृष्टिकोण से बजट से उम्मीद लगाते हैं। वित्त मंत्री खुद भी बजट  को लोकप्रिय बनाने विभिन्न वर्गों से राय लेने  का प्रयास करते हैं। हालांकि शायद ही कभी सभी वर्ग संतुष्ट हुए हों। व्यवहारिक रूप से ये संभव भी नहीं होता। हालांकि गत वर्ष के बजट में आयकर की छूट 12 लाख तक  किए जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ क्योंकि इससे मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और व्यवसायी  वर्ग को बड़ी राहत मिली । ये कहना भी गलत नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता के पीछे इसी छूट का बड़ा योगदान रहा। कोरोना  के कारण अर्थव्यवस्था में आए ठहराव से देश उबर चुका है। विकास दर में लगातार  वृद्धि से उत्साहित होकर ही  सरकार ने जीएसटी की दरों में सुधार जैसा साहसिक निर्णय लिया। हालांकि इससे जीएसटी के मासिक संग्रह में कमी आई किंतु उसके बाद भी जीडीपी की रफ्तार यथावत होने से भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी  अर्थव्यवस्था  बनने के बाद तीसरे स्थान  की ओर अग्रसर है। फिलहाल केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी ही हमसे आगे हैं।  इन्हीं सब कारणों से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ नामक हमलों के सामने भारत नहीं झुका। हाल ही में स्विटजरलैंड के दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन के दौरान यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की जो घोषणा की उससे भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास की पुष्टि हो गई। इस संधि को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है जिसने  ट्रम्प को भी चिंता में डाल दिया है । लेकिन  वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है उसके  कारण आर्थिक नीतियों में भी उसी अनुरूप परिवर्तन जरूरी है। हाल ही की घटनाओं के कारण भारत से विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा है। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने से भी आर्थिक अनिश्चितता व्याप्त है।  प्रतिवर्ष हजारों धनवान लोग भारत छोड़ विदेशों में बस रहे हैं जिसका कारण करों का बढ़ता बोझ और जटिलता है। इस विसंगति को रोकने के लिए  विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा समय - समय पर सुझाव दिया जाता रहा कि आयकर को पूरी तरह समाप्त करने के साथ ही जीएसटी की केवल एक ही दर 5 फीसदी  की रखी जाए।  इस सलाह पर यदि  बजट में अमल कर लिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका पूरी दुनिया में बज उठेगा। उल्लेखनीय है बढ़ते करों के कारण ब्रिटेन से बड़ी संख्या में धनकुबेर दुबई जैसी जगह पर आकर बस रहे हैं।  सर्वेक्षण किया जाए तो भारत के भी हजारों लोगों द्वारा दुबई सहित  अन्य देशों में ठिकाना बनाने की बात सामने आ जाएगी। ये बात तो साधारण सोच रखने वाला भी जानता है कि करों की अधिक दरें कालेधन रूपी समानांतर अर्थव्यवस्था की जनक हैं। अर्थक्रांति नामक एक अध्ययन दल ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में आयकर खत्म कर ट्रांजेक्शन टैक्स  लगाने का सुझाव सरकार के सामने रखा था जिसमें 100 रु. को ही सबसे बड़ा नोट रखने की बात थी। कहते हैं 2016 की नोटबंदी आंशिक तौर पर उसी से प्रेरित थी किंतु सरकार ने 500 और 2000 रु. के नोट जारी कर गलती कर दी। जल्द ही 2000 रु. का नोट कालेधन जमा करने का जरिया बन गया और इसीलिए उसे भी बंद किया गया। देश में जो भ्रष्टाचार है उसकी मुख्य जड़ आयकर के अलावा जीएसटी की अधिक दरें हैं । जीएसटी में तो और सुधार करने का आश्वासन सरकार ने दिया भी किंतु आयकर के बारे में क्रांतिकारी फैसला लेना प्रतीक्षित है। वैसे भी आयकर से मिलने वाला राजस्व इतना नहीं कि उसे बंद करने से अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। उल्टे काला धन मुख्यधारा में आ जाने से अर्थव्यवस्था में मजबूती और पारदर्शिता आ जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था सुधरी है किंतु कालेधन की समस्या यथावत है। ऐसे में अपेक्षा की जा सकती है कि गत वर्ष 12 लाख तक की छूट देने से आगे बढ़कर आगामी बजट में आयकर संबंधी ऐसा कोई निर्णय लिया जाए जिससे कि देश का धन बाहर जाना बंद हो और कर चोरी की बजाय लोग ज्यादा से ज्यादा कमाने के प्रति उत्साहित हों।


- रवीन्द्र वाजपेयी