Monday, 26 August 2024

योजनाएं तो सभी अच्छी लेकिन पैसा कहाँ से लाओगे


लोकसभा चुनाव में मध्यम वर्ग की नाराजगी का खामियाजा झेलने के बाद केंद्र सरकार ने ओ.पी.एस अर्थात पुरानी पेंशन स्कीम फिर शुरू करने के बजाय  बीच का रास्ता निकालते हुए यू .पी.एस (यूनीफाइड पेंशन स्कीम) नामक  योजना केंद्रीय कर्मचारियों के लिए लागू करने की घोषणा की है। इस योजना के अंतर्गत सेवा निवृत्ति के पूर्व अंतिम 12 महीने में प्राप्त मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 50 प्रतिशत बतौर पेंशन हर माह दिया जायेगा। इसके लिए 25 वर्ष की सेवा जरूरी होगी वहीं न्यूनतम पेंशन 10 हजार रु. मासिक अनिवार्यतः देय होगी। 1 अप्रैल 2025 से लागू होने वाली इस योजना में कुछ शर्तों के साथ वे कर्मचारी भी शामिल हो सकेंगे जो वर्तमान में लागू एन .पी .एस (न्यू पेंशन स्कीम) योजना के अंतर्गत हैं। केंद्र सरकार के उक्त निर्णय के बारे में  कर्मचारी जगत की प्रतिक्रिया मिली - जुली है। कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को कदम पीछे खींचना बताते हुए कहा यह विपक्ष के दबाव का परिणाम है। दूसरी तरफ भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर वायदा खिलाफ़ी का आरोप लगाते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में  पुरानी पेंशन योजना लागू करने का आश्वसन देने के बाद वह  पलटी मार गई। ऐसे में  उसे यूपीएस का विरोध करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। कुछ श्रमिक संगठन नई घोषणा से सहमत हैं तो कुछ ने  बाद में  अपनी राय देने कहा है। ये कहना गलत नहीं है कि  कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक होने से मोदी सरकार ने ये फैसला किया।  महाराष्ट्र सरकार ने इस योजना को अपने राज्य में लागू  करने का ऐलान भी कर दिया। इसे देखते हुए भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी  इसको लागू किया जा सकता है  ताकि विपक्षी पार्टियों के शासन वाली राज्य सरकारों पर भी दबाव पड़े। इस योजना का आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को कितना लाभ मिलेगा ये तो परिणाम ही स्पष्ट करेंगे किन्तु इससे पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी गंभीर विषय  है। कांग्रेस के लिए भी ये गले की हड्डी बन गया है क्योंकि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में  वह इसे लागू नहीं कर सकी। लोकसभा चुनाव में इसीलिए वह इसका वायदा नहीं कर सकी। अन्य विपक्षी दल भी  असमंजस में हैं जो  पुरानी पेंशन योजना का राग अलापते रहे। वाजपेयी सरकार द्वारा इसे समाप्त करने के पीछे आर्थिक कारण ही  थे। इसीलिए मनमोहन सरकार के दस वर्षीय कार्यकाल में राहुल गाँधी या अन्य किसी कांग्रेस नेता ने पुरानी पेंशन स्कीम की बात नहीं की। 2014 के बाद 2919 का लोकसभा चुनाव भी हारने के बाद  उन्हेँ इसकी याद आई  और उसे चुनावी वायदों में शामिल कर हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस ने अपनी सरकार भी बना ली किंतु उसको लागू  करने में पसीने छूट गए। भाजपा ने भी इसी बात का उसे उलाहना दिया।  जिस नई पेंशन योजना की केंद्र सरकार ने घोषणा की उससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ से किस प्रकार निपटा जाएगा ये बताने के लिए  कोई तैयार नहीं है। सही बात ये है कि सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं। केंद्रीय सचिवालय से लेकर ग्राम पंचायत तक  में कर्मचारियों की कमी है। अदालतों में न्यायाधीश कम हैं और अस्पतालों में डाक्टर। कंप्युटर आने के बाद अब ए.आई ( रोबोट) और बड़े खतरे का संकेत दे रहा है। आई.ए.एस और आई.पी.एस के अलावा अन्य प्रशासनिक सेवाओं में अधिकारियों की भर्ती हेतु तो नियमित परीक्षा होती और परिणाम घोषित होते हैं। लेकिन निचले स्तर पर खाली पड़े  सरकारी पदों को भरने के  लिए  सरकारें पूरी तरह उदासीन हैं। सरकारी शालाओं और महाविद्यालयों के साथ ही विश्व विद्यालयों तक में अतिथि शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है। इसके पीछे आर्थिक कारण ही हैं। ऐसे मैं यू .पी.एस का बोझ सरकार किस  प्रकार वहन कर पायेगी ये बड़ा सवाल है। चुनावी लाभ हेतु राजनीतिक दलों द्वारा जो मुफ्त उपहारों की बरसात की जा रही है उसकी वजह से राज्य  सरकारों पर कर्ज का भार बढ़ता जा रहा है। इसकी भरपाई नये टैक्स लगाकर की जाती है। सरकारी कर्मचारी  संगठित क्षेत्र के होने से सरकार पर दबाव बनाने की स्थिति में होते हैं। लेकिन जिस तरह से संविदा पर कर्मचारियों को रखे जाने का चलन बढ़ रहा है वह बढ़ते वेतन - भत्तों का ही विपरीत परिणाम है। ये स्थिति अच्छी नहीं है। कुछ लोगों को दिये जा रहे जबरदस्त लाभ का नुकसान संविदा कर्मी भुगत रहे हैं। श्रमिक संगठनो को इस बारे में विचार करते हुए ऐसा कुछ  करना चाहिये जिससे कि समूचे कर्मचारी वर्ग को लाभ हो। कुछ का पेट गले तक भर जाए और बाकी के खाली  रहें ये अन्याय है। सरकार में बैठे लोगों को भी ये सोचना होगा कि केवल चुनाव जीतने के लिए कुछ लोगों को खुश करना आदर्श व्यवस्था नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 August 2024

मोदी की यूक्रेन यात्रा किसी बड़े परिणाम का कारण बन सकती है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना कारण और जरूरत के कोई काम नहीं करते। उनके ज्यादातर निर्णय दूरगामी लक्ष्यों पर केंद्रित होते हैं। हालांकि हर काम में कामयाबी मिली हो ऐसा नहीं है किन्तु वे बिना निराश हुए प्रयास करते रहते हैं। विदेश नीति के क्षेत्र में उनकी सक्रियता इसका प्रमाण है। तीसरी बार स्पष्ट बहुमत के बिना जब उन्होंने सरकार बनाई तब ये कहा गया कि सहयोगियों पर उनकी निर्भरता के चलते वे पहले जैसे मजबूत नहीं रह गए। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी तो इस बात का ढिंढोरा पीटते रहते हैं कि प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास डिग गया है।लोकसभा में विपक्ष अपने संख्याबल में हुई वृद्धि के कारण  सत्ता पक्ष पर हावी दिखा। सहयोगी दलों के दबाव के चलते सरकार को  कुछ कदम पीछे भी खींचने पड़े । लेकिन इस सबके बावजूद श्री मोदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रभावशाली उपस्थिति  बनाये हुए हैं।  इटली में आयोजित जी - 7 सम्मेलन में उनको विशेष रूप से आमंत्रित किया जाना वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते महत्व का संकेत था। लेकिन उस आयोजन में अमेरिका समर्थक देशों का बोलबाला था जो यूक्रेन युद्ध के कारण रूस विरोधी नीति पर चल रहे हैं। उनमें भारत ही  था जिसने उस विवाद में तटस्थ रहने का जोखिम उठाते हुए सर्वप्रथम तो अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखते हुए रूस के हमले की निंदा से दूरी बनाये रखी, वहीं यूक्रेन में फंसे हजारों भारतीय विद्यार्थियों की सकुशल स्वदेश वापसी के अभियान को सफ़लता पूर्वक पूरा किया। इस युद्ध ने दुनिया को शीतयुद्ध वाले दौर में पहुँचा दिया जब ज्यादातर देश अमेरिका और सोवियत संघ नामक दो खेमों में बँटे हुए थे। भारत कहने को तो गुट निरपेक्ष देशों के साथ था किंतु अमेरिका और ब्रिटेन का झुकाव पाकिस्तान की ओर होने से हमको न चाहते हुए भी अघोषित तौर पर ही सही किंतु सोवियत संघ से नजदीकी बढ़ानी पड़ी। सोवियत संघ तो खैर बिखर गया और उसी के साथ उसे बनाने वाले रूस की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। लेकिन राष्ट्रपति पुतिन के  सत्ता में आते ही रूस सामरिक, आर्थिक और कूटनीतिक तौर पर फिर महाशक्ति की श्रेणी में आ गया। हालांकि वैश्वीकरण के बाद आर्थिक नीतियों में हुए बदलाव ने भारत की विदेश नीति को अमेरिका की तरफ झुकाया किंतु श्री मोदी के सत्ता में आने के बाद हमने जिस संतुलन का रास्ता पकड़ा उसके कारण आज भारत के सभी गुटों से अच्छे रिश्ते हैं। परिणामस्वरूप हमारा निर्यात भी बढ़ा। कोरोना काल में  दुनिया के तमाम देशों को वैक्सीन उपलब्ध करवाकर भारत ने जो सम्मान अर्जित किया उसने विदेश नीति के अछूते पहलू को उजागर किया। श्री मोदी हाल ही में रूस गए थे। इस यात्रा से यूक्रेन ही नहीं अमेरिका और उसके पिछलग्गू भी नाराज हुए किंतु रूसी नेतृत्व के समक्ष उन्होंने दो टूक कहा कि युद्ध से कोई मसला नहीं सुलझता। बावजूद इसके राष्ट्रपति पुतिन ने श्री मोदी की जमकर तारीफ की। अमेरिका में इन दिनों राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी है। मौजूदा राष्ट्रपति के मैदान से हटने के बाद नया चेहरा राष्ट्रपति बनेगा। यदि डोनाल्ड ट्रंप लौटे तब विश्व राजनीति में उथलपुथल और बढ़ेगी। इसका असर विश्व अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा जो रूस- यूक्रेन युद्ध से डगमगा चुकी है। ऐसे में श्री मोदी का रूस के बाद यूक्रेन की यात्रा पर जाना बहुत ही सोचा - समझा कूटनीतिक पैंतरा है। हालाँकि ये मान लेना जल्दबाजी है कि इस यात्रा से युद्ध खत्म हो जायेगा और रूस - यूक्रेन के बीच दोस्ताना कायम हो जायेगा किंतु रूस को न हमलावर न कहने के बावजूद यदि श्री मोदी का यूक्रेन में जोरदार स्वागत हुआ तो यह बड़ी बात है। जिन राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारत के प्रधानमंत्री की मास्को यात्रा पर नाराजी दिखाई थी वे ही उनके लिए लाल कालीन बिछाए देखे गए। यूक्रेन में भी श्री मोदी ने युद्ध को समाधान कारक न मानते हुए शांति अपनाने की जो  सलाह दी उससे समूचा विश्व प्रभावित है। इसीलिए कहा जा रहा है कि शायद श्री मोदी दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका में हैं। वरना उनकी मास्को यात्रा के बाद यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंचना महज तफरीह नहीं हो सकती। इजरायल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध के लंबा खिंचने से भी दुनिया परेशान है। ईरान के अमेरिका विरोधी तेवर से तीसरे विश्व युद्ध की पटकथा लिखी जा रही है। ऐसे में यदि रूस और यूक्रेन में सुलह हो सके तो ये पूरे विश्व के लिए राहत की बात होगी।  हो सकता है कि राष्ट्रपति पुतिन ने श्री मोदी को यूक्रेन से बात कर युद्ध बंद करवाने का अनुरोध किया हो क्योंकि लड़ाई के लम्बे खिंचने के बाद भी यूक्रेन के मुकाबले में डटे रहने और मौका मिलते ही पलटवार करने से रूस भी थकने लगा है। उसे डर है कहीं उसकी हालत वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के फंसने जैसी न हो जाए। यदि श्री मोदी वाकई इस युद्ध को रुकवा सके तो वह भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी जिसके बाद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का हमारा दावा और मजबूत हो जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 23 August 2024

बलात्कारियों को फांसी के बाद भी दुष्कर्म नहीं रुकना चिंता का विषय


कोलकाता  में एक महिला चिकित्सक के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी नृशंस हत्या  निर्भया कांड से भी वीभत्स है क्योंकि  घटना को अंजाम देने वाले पढ़े - लिखे हैं और उन्हें संरक्षण देने वाले भी जिम्मेदार पदों पर  थे। सर्वोच्च न्यायालय ने Little a as Aa प्रकरण को अपने हाथ में लेकर जाँच सीबीआई को सौंप दी। ये साफ  है कि प. बंगाल की पुलिस ने उस मामले में अव्वल दर्जे की लापरवाही दिखाई। यह उसका निकम्मापन था या राज्य सरकार का दबाव ये कहना जल्दबाजी होगी किन्तु जो बातें सामने आ रही हैं उनसे यह आशंका मजबूत हो रही है कि उक्त कांड  सुनियोजित था। जिस महिला के साथ हैवानियत की गई वह संभवतः किसी अपराध के बारे में जान गई थी। उसका मुँह बन्द करने  उस घटना की साजिश रची गई या फिर यह महज बलात्कार था , ये इस समय कह पाना मुश्किल है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी घटना की जाँच सीबीआई से करवाने कतई राजी न होतीं किंतु सर्वोच्च न्यायालय के कारण वे असहाय होकर रह गईं। उसने भी इस बात पर आश्चर्य और नाराजगी जताई कि मृतका का पोस्टमार्टम पहले किया गया जबकि  प्राथमिकी कई घंटों बाद दर्ज की गई। जिस संस्थान में उक्त वारदात हुई वहाँ के प्राचार्य सहित तमाम लोग हत्या को आत्महत्या प्रचारित करने में लगे रहे। उक्त घटना के बाद देश भर की युवतियों में इसे लेकर गुस्से के साथ भय भी है।  तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी असंतोष के स्वर सुनाई दे रहे हैं। हर मुद्दे पर दहाड़ने वाली मुख्यमंत्री रक्षात्मक  हैं किंतु दिन ब दिन उनकी छवि को बट्टा लग रहा है। राजनीति भी ऐसे अवसरों पर अपनी भूमिका का निर्वहन करती है। भाजपा के साथ ही वामपंथी भी ममता के विरुद्ध हैं।  लेकिन इंडिया गठबंधन में इस घटना का वैसा संगठित विरोध नजर नहीं आ रहा जैसा महाराष्ट्र के बदलापुर में दो अबोध बालिकाओं के साथ हुए अमानुषिक कृत्य पर है। वहाँ की घटना में भी प्राथमिकी देर से दर्ज करवाने का आरोप शिंदे सरकार पर लग रहा है। चूंकि भाजपा भी उसमें भागीदार है लिहाजा उसके दामन पर भी दाग लग रहे है ।  कुल मिलाकर इस प्रकरण में कई बातें एक साथ उठ खड़ी हुई हैं। पहली तो ये कि यह साधारण दुष्कर्म और हत्या नहीं है। दूसरा ये कि  जिस संस्थान में हत्या हुई वहाँ के प्रशासन ने भी  लीपापोती करने का हरसंभव प्रयास किया। पुलिस ने पोस्टमार्टम और प्राथमिकी के समय में जो अंतर रखा वह उसे संदेह के घेरे में लाती है। तीसरा ये कि ममता सरकार ने सीबीआई जाँच से बचने का जो प्रयास किया उससे उसकी मंशा संदिग्ध प्रतीत हो रही है । रही बात महाराष्ट्र के बदलापुर में हुई घटना की तो उसमें भी स्थानीय पुलिस और प्रशासन के साथ ही संबंधित विद्यालय के प्रबंधन की गलती सतह पर तैर रही है। उसकी वजह से देश भर के अभिभावकों में चिंता व्याप्त है क्योंकि इस तरह के मामले अक्सर संस्थान और बच्चियों की पहिचान उजागर होने से बचाने के लिए दबा दिये जाते हैं। जिस व्यक्ति को इस कांड में गिरफ्तार किया गया वह मानसिक रूप से बीमार भी हो सकता है किंतु अबोध बालिकाओं  के साथ इस प्रकार का कुकृत्य करने वाले को तो मृत्युदंड से कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। लेकिन कोलकाता में जिस नृशंस तरीके से महिला चिकित्सक के साथ दुराचार करने के बाद उसकी हत्या की गई वह साधारण अपराध नहीं लगता। लेकिन ये बात  फिर उठ रही है कि ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया बेहद धीमी होने से अपराध करने वालों का खौफ कम हो जाता है। अजमेर में 1992 में हुए  ब्लैकमेलिंग कांड का निपटारा अभी तक पूरी तरह नहीं हो सका क्योंकि एक आरोपी अभी तक फरार है। निर्भया कांड के दोषियों को भी फांसी होने में बरसों लगे। यहाँ तक कि फांसी लगने के कुछ घंटों पहले तक उसे रुकवाने की कोशिशें वकीलों द्वारा की जाती रहीं। संसद भी इस बारे में चिंता व्यक्त कर चुकी है। लेकिन दुष्कर्म की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रहीं। लगभग 100 घटनाएं प्रति दिन होती है। वहीं इससे ज्यादा लोकलाज के फेर में दबी रह जाती हैं। दुःख का विषय ये है कि सामाजिक स्तर पर किसी घटना के बाद गुस्सा तो खूब दिखता है किंतु वह बुलबुले जैसा होता है। कोलकाता में भी खूब प्रदर्शन हो रहे हैं।  पुलिस, प्रशासन और सरकार ऐसे मामलों में कारवाई तो कर सकती है किंतु मानसिकता बदलने का काम तो परिवार और समाज को ही करना होगा। घरों में बेटियों को सावधानी बरतने के साथ ही बेटों को भी लड़कियों के प्रति सम्मान रखने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। इंटरनेट के जरिये परोसी जा रही अश्लील सामग्री हमारे नौनिहालों को यौन अपराधी बना रही है। अभिभावकों को चाहिए  बच्चों को इस बुराई से बचाएं। कोलकाता कांड के बाद देश भर के चिकित्सक हड़ताल पर चले गए। लेकिन ऐसी घटना तो किसी भी महिला के साथ हो सकती है। अपराध होने के बाद अपराधी को दंड मिलना तो स्थापित प्रक्रिया है किंतु इस तरह के अपराध बढ़ते क्यों जा रहे हैं उस कारण को तलाशकर समाधान निकालना जरूरी है। बलात्कारियों को फांसी लगने के बाद भी यदि ऐसा करने वालों में खौफ नहीं है तो स्थिति वाकई गंभीर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 August 2024

आरक्षण हर मर्ज की दवा नहीं : उचित विकल्प की तलाश जरूरी


ट्रेड यूनियन के मित्रों से सुना करता था कि हड़ताल अंतिम अस्त्र  है। फिर बंद नामक उससे बड़ा हथियार ईजाद हुआ । कुछ आंदोलनों में रेल रोककर लोग पटरियों पर बैठे रहे।  शाहीन बाग और किसान आंदोलन में सड़क पर कब्जा करने का तरीका भी देखने मिला , जिसे प्रयोग कहा गया। लेकिन इनसे हासिल क्या हुआ? न पटरियों पर बैठने वाले कुछ प्राप्त कर सके और न ही सड़क घेर कर बैठे लोग। सवाल ये है कि इसके बाद क्या होगा क्योंकि पूरा भारत तो बंद हुआ नहीं। दरअसल ऐसे आंदोलन किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित होते हैं जिनका मुहूर्त चुनाव के इर्द - गिर्द होता है। चुनावी लाभ उठाकर  वे तो सफल हो जाती हैं जबकि आंदोलनकारी खाली हाथ रह जाते हैं। उदाहरण के लिए रेल यातायात ठप्प करने वाले ठंडे होकर बैठ गए, शाहीन बाग की जमातें भी न जाने कहाँ हैं? किसान आंदोलन का भाग - 2 चाहकर भी शुरू नहीं हो सका। कल के बंद को जिन दलों ने समर्थन दिया, यदि वे खुलकर सामने आते तो उसे ज्यादा  सफलता मिल सकती थी किंतु दलितों और आदिवासियों के संगठनों में ही आपसी विश्वास का अभाव है। मायावती को चंद्रशेखर आजाद खटक रहे हैं। कांग्रेस और सपा सहित शेष विपक्षी दल भी जुबानी समर्थन देकर घर बैठे रहे। उनको भी चन्द्रशेखर का उभार खतरे की घण्टी लग रहा है।  आजादी के कई दशकों बाद तक कांग्रेस दलितों की निर्विवाद मसीहा थी किंतु 80 का दशक आते तक कांशीराम ने दलित ध्रुवीकरण का जो प्रयास किया उसका प्रतिफल मायावती को उ.प्र  की सत्ता तक पहुँचाने के रूप में मिला। 2007  में  किसी भी  दल की बैसाखी के बिना इस बड़े राज्य में एक दलित महिला का राजतिलक बड़े सामाजिक परिवर्तन के तौर पर देखा गया  किंतु मायावती भी जल्द ही सत्ता के मायाजाल में उलझ गईं । दलित राजनीति का वह ज्वार जैसे आया वैसे ही लौट गया। एक जमाना वह था जब मायावती केंद्र सरकार को गिराने या बचाने का माद्दा रखती थीं किंतु आज उनके पास न लोकसभा की सीट है न राज्यसभा की। उ.प्र विधानसभा में भी  एकमात्र  बसपा विधायक है। इसका कारण दलितों के उत्थान के नाम पर खुद का उत्थान करने की सोच रही । कांशीराम ने उनको राजनीतिक वारिस बनाया किंतु उन्हें अपने भतीजे के  सिवाय कोई नहीं मिला । जिससे पार्टी नेताओं से खाली होती चली गई। इसी कारण चंद्रशेखर आज़ाद लोकसभा में पहुँचने में सफल हो गये। ये दोनों नेता एक हो जाएं तो उ.प्र में बसपा  फिर ताकतवर हो सकती है किंतु इसकी संभावना न के बराबर है। परिणाम स्वरूप  एक भी ऐसा नेता नहीं बचा जिसकी आवाज पर सारे दलित लामबंद हो जाएं।  यही स्थिति आदिवासियों के बीच है।  समय आ गया है जब दलित/ आदिवासी संख्याबल  पर आत्ममुग्ध होने की बजाय  अपने बीच में से  ऐसा  प्रामाणिक नेतृत्व  विकसित करें जिसकी प्रतिबद्धता अपने  समाज के  पिछड़ेपन को दूर करने के साथ ही उन्हें अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना हो। मायावती ने जो धन स्मारकों पर खर्च किया उतना यदि वे दलित बच्चों की शिक्षा पर कर देतीं तो अब तक उनमें से  सैकड़ों  का भविष्य उज्ज्वल हो जाता। यही हाल ओबीसी नेताओं का भी है।  कल के बंद से एक बार फिर ये बात उजागर हो गई कि दलित समुदाय कुछ राजनीतिक नेताओं का मोहताज है। यदि उसके पास राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर प्रभावशाली नेता होते तो कल का बंद पूरी तरह सफल रहता। जहाँ तक बात केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू न करने का आश्वासन देने की है तो उसके पीछे महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखण्ड विधानसभा के चुनाव हैं। लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद प्रधानमंत्री किसी भी प्रकार का खतरा नहीं लेना चाहते । लेकिन इसका श्रेय चिराग पासवान को मिला जो मोदी सरकार में मंत्री हैं। दलित अस्मिता को लेकर बातें तो बड़ी - बड़ी होती हैं लेकिन ओबीसी में जितने बड़े राजनीतिक छत्रप हैं उतने दलित और आदिवासियों में नहीं। आजादी के बाद बाबू जगजीवनराम दलितों के बड़े नेता थे किंतु प्रशासनिक दक्षता के बावजूद उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए कोई पहल नहीं हुई। सही बात ये है कि दलितों और आदिवासियों को आरक्षण का झुनझुना पकड़ाकर बहलाया जाता रहा है। और उनके कंधों पर सवाल होकर चंद परिवार अपना और अपनी औलादों का विकास करते रहे। आज भी  कमोबेश वही स्थिति है। आरक्षण को हर मर्ज की दवा मानकर ढोने के बजाय उसका ऐसा कोई  ऐसा विकल्प तलाशा जाना चाहिए जिससे इन वर्गों का जीवन स्तर सुधरे और वे विकास की मुख्य धारा में शामिल हो सकें। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 August 2024

क्रीमी लेयर का विरोध करने वाले न्यायाधीश भी दलित ही हैं

एक समय था जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर टिप्पणी से परहेज किया जाता था। यहाँ तक कि संसद के भीतर भी उनकी आलोचना नहीं होती थी। लेकिन समय के साथ वह लिहाज टूटने लगा और अब किसी भी अदालती निर्णय की जमकर आलोचना होने लगी है। इसकी शुरूआत कब हुई, ये पक्के तौर पर कह पाना तो कठिन है किंतु 12 जून 1975 को जब अलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का लोकसभा चुनाव अवैध घोषित किया तब  उनके बेटे संजय गाँधी ने इस बात पर अचरज जताया कि करोड़ों लोगों द्वारा चुने प्रधानमंत्री को एक अदना सा न्यायाधीश कैसे अपदस्थ कर सकता है? अनेक स्थानों पर श्री सिन्हा के पुतले जलाए जाने की खबरें भी आईं। कुछ दिनों बाद आपात्काल लगाकर इंदिरा जी ने जनता को अभिव्यक्ति के अधिकार से भी वंचित कर दिया। अखबारों पर सेंसर लग गया। 19 महीने बाद चुनाव होने पर इंदिरा जी सत्ता से बाहर हो गईं और जनता पार्टी की सरकार बनी किंतु वह महज 27 माह में गिर गई। नये चुनाव हुए जिसमें इंदिरा जी की वापसी हुई। उनके बेटे संजय गाँधी के साथ  युवाओं की जो  टोली संसद और कांग्रेस संगठन में आई वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं की बजाय व्यक्ति केंद्रित राजनीति में विश्वास रखती थी। संसद में होने वाले हंगामे उसी दौर की देन हैं। ये कहना गलत न होगा कि न्यायपालिका की सरे आम आलोचना भी उसी समय से शुरू हुई। इसके लिए संसद के मंच का उपयोग होने लगा क्योंकि वहाँ कही गई किसी भी बात के लिए मानहानि का प्रकरण दर्ज नहीं होता। राजीव गाँधी के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय के शाहबानो को गुजारा भत्ता दिये जाने संबंधी निर्णय को संसद ने पलटकर एक नई शुरुआत कर दी। और उसी के बाद से ये देखने में आने लगा कि जो भी न्यायालायीन फैसला किसी वर्ग विशेष को नापसंद हो तो उसको रद्द करवाने का दबाव बनाया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में  आरक्षण व्यवस्था का लाभ कुछ जाति विशेष तक सीमित रहने पर ऐतराज जताते हुए कोटे के भीतर कोटा तय करने का अधिकार राज्यों को दे दिया। साथ ही अनु. जाति / जनजाति वर्ग में भी क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर करने की बात कही। इस फैसले का आम तौर पर स्वागत हुआ। अनु. जाति / जनजाति में बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो संख्या और राजनीतिक वजनदारी में कम होने से आरक्षण से जुड़े लाभों से वंचित रह गया।  इस वर्ग में सर्वोच्च न्यायालय ने उम्मीद जगाई कि अब उनकी भी बेहतरी होगी । लेकिन आरक्षण के साथ जुड़ी राजनीति एक बार फिर अवरोध बनकर सामने आ खड़ी हुई। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की जमकर आलोचना की जाने लगी। उसे संविधान की भावनाओं के विरुद्ध बताने में भी संकोच नहीं किया गया। भीम आर्मी के नेता सांसद  चंद्र शेखर आजाद ने तो फैसला सुनाने वाले न्यायाधीशों की जाति जानने जैसी बात कह डाली जबकि क्रीमी लेयर वाली टिप्पणी करने वाले न्यायाधीश बी. आर. गवई  खुद दलित वर्ग से आते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा  कि राज्य  को एक नीति लानी चाहिए, ताकि अनु. जाति / जनजाति वर्गों में आरक्षण का लाभ उठाकर समर्थ हो चुके लोगों को इसके दायरे से बाहर किया जा सके। जस्टिस गवई  अगले साल देश के प्रधान न्यायाधीश बनने वाले हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि दलित वर्ग के भीतर ही आरक्षण को लेकर असंतोष है जिसकी अभिव्यक्ति  श्री गवई ने  फैसले के माध्यम से की। बेहतर होता सभी राजनीतिक दल और दलित संगठन उक्त फैसले की मूल भावना को समझते हुए आरक्षण से वंचित वर्ग के कल्याण की बात सोचते किंतु बजाय ऐसा करने के भारत बंद का आव्हान कर डाला गया । विभिन्न विपक्षी दल भी इसके समर्थन में आ गए । इस बंद को कितना जन  समर्थन मिला वह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि इसके आयोजन का कोई औचित्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के एक दलित न्यायाधीश के  बजाय किसी और  न्यायाधीश ने क्रीमी लेयर को आरक्षण न दिये जाने की बात की होती तो उसे दलित विरोधी प्रचारित कर दिया गया होता। उस फैसले की अंतर्निहित भावना को समझे बिना हाय तौबा मचा देना निश्चित रूप से अनुचित है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने आरक्षण को ईमानदार और पारदर्शी बनाने का रास्ता साफ किया तथा दलित/आदिवासियों के बीच उत्पन्न नव सामंतवाद पर चोट की। आज जिन संगठनों ने भारत बंद का आयोजन किया , बेहतर होता वे मायावती , चिराग पासवान, मल्लिकार्जुन खरगे, हेमंत सोरेन जैसे नेताओं से  पूछते कि उनकी राजनीतिक विरासत उनके परिवार तक ही सीमित क्यों है? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 20 August 2024

सीधी नियुक्ति के विरोध में छिपा है राजनीतिक स्वार्थ


केंद्र सरकार ने कुछ प्रशासकीय पदों पर सीधी  नियुक्ति हेतु निजी क्षेत्र के अनुभवी लोगों से आवेदन आमन्त्रित किये हैं। संयुक्त सचिव, संचालक और उपसचिव  हेतु तकरीबन 50  पदों पर  सीधी नियुक्ति किये जाने के लिए दिये विज्ञापन पर राजनीति गर्मा गई है। राहुल गाँधी सहित अनेक  विपक्षी नेताओं का विरोध तो स्वाभविक है किंतु मोदी सरकार में मंत्री चिराग पासवान भी इसके विरोध में आ गए हैं। लेटरल एंट्री नामक इस तरीके से सरकार संघ लोक सेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली परीक्षा के बिना विभिन्न पदों पर भर्ती करती है।  इसमें आरक्षण का प्रावधान नहीं होने से इसका विरोध किया जा रहा है। राहुल का आरोप है कि सीधी नियुक्ति आरक्षण को खत्म करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है जिसके जरिये सरकार  रा .स्व.संघ के लोगों को सरकारी पदों पर बिठाना चाहती है। वहीं चिराग का कहना है कि आरक्षण पर कोई भी किंतु - परंतु स्वीकार्य नहीं है। हो सकता है  भाजपा के भीतर से भी  विरोध में आवाजें उठें। उल्लेखनीय है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में क्रीमी लेयर संबंधी जो फैसला दिया गया उसको लागू होने से रोकने के लिए आरक्षित वर्ग के भाजपा सांसद प्रधानमंत्री से मिले जिसके बाद मंत्रीपरिषद की बैठक में उस निर्णय पर अमल न करने का प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। हालांकि  सीधी नियुक्ति के विवाद में सरकार का बचाव करने के लिए आगे आ रहे कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल  खुद आरक्षित वर्ग से हैं और राजनीति में आने से पहले आई.ए.एस अधिकारी भी रहे हैं। भाजपा का आरोप है कि लेटरल एंट्री की शुरुआत कांग्रेस के कार्यकाल में हुई। जिसके अंतर्गत  डा. मनमोहन सिंह को वित्त सचिव, मोंटेक सिंह अहलूवालिया को योजना आयोग का उपाध्यक्ष और सोनिया गाँधी को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का अध्यक्ष बनाया गया। जबकि कांग्रेस का कहना है ये प्रथा 2018 में मोदी सरकार ने शुरू की। वैसे केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार की भी सीधी नियुक्ति होती रही है। केंद्र सरकार के अनुसार  लेटरल एंट्री के जरिये   नियुक्ति संविदा के तौर पर 3 वर्षों के लिए होती है जिसे 2 साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। इस आधार पर देखें तो केंद्र सरकार के इतने बड़े प्रशासनिक ढांचे में यदि 50 लोग सीधी भर्ती से कुछ वर्षों के लिए शामिल किये जाएं तो इससे आरक्षण के प्रावधान की बहुत ज्यादा अवहेलना होने की संभावना नजर नहीं आती। राहुल और चिराग अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भले ही लेटरल एंट्री प्रथा का विरोध कर रहे हों किंतु उन्हें ये भी सुझाना चाहिए कि निजी क्षेत्र में कार्यरत प्रतिभाओं का उपयोग शासन की कार्य प्रणाली में समयोचित सुधार हेतु किस प्रकार किया जा सकता है? श्री गाँधी और श्री पासवान को इस बात का तो अनुभव होगा ही कि विभिन्न क्षेत्रों के योग्य व्यक्तियों को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया जाता रहा है। वर्तमान केंद्र सरकार में एस. जयशंकर, अश्विनी वैष्णव, हरदीप पुरी जैसे मंत्री गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि से आये और अच्छा काम कर रहे हैं। स्व. राजीव गाँधी ने सैम पित्रोदा को इंटरनेट और मोबाइल सेवा प्रारंभ करने अमेरिका से बुलाकर सरकारी पद दिया। बाद में वे मनमोहन सरकार में भी सलाहकार बनाये गए। और फिर कांग्रेस की विदेश शाखा के अध्यक्ष बन गए। खुद डाॅ. मनमोहन सिंह भी विभिन्न सरकारी पदों पर सीधी नियुक्ति के बाद प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे । उक्त सभी महानुभाव अपनी योग्यता और पेशवर अनुभव के कारण ही सरकार के हिस्से बने। आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद चंद्रा बाबू नायडू ने प्रतिभाशाली लोगों की गणना करवाने की बात कही थी ताकि उनका उपयोग देश के विकास हेतु किया जा सके। संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं के जरिये चयनित सामान्य और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी 60 वर्ष की आयु तक के लिए भर्ती किये जाते हैं जबकि लेटरल एंट्री से नियुक्त व्यक्ति अधिकतम 5 साल के लिए सेवा में रहेगा। इस संबंध में नंदन नीलेकणी का नाम भी लिया जा सकता है जिन्हें आधार कार्ड बनाने वाले महत्वपूर्ण प्रकल्प का  मुखिया बनाया गया जबकि वे निजी क्षेत्र की प्रमुख आई. टी कंपनी इंफोसिस के सह संस्थापक थे। बाद में उन्हें कांग्रेस ने बेंगुलूरु से लोकसभा चुनाव भी लड़ाया किंतु वे हार गए। रा. स्व. संघ के लोगों को सीधी नियुक्ति से सरकारी पदों पर बिठाने का आरोप लगाने से पहले श्री गाँधी को श्री पित्रोदा और श्री नीलेकणी के बारे में सोचना चाहिए था जो कांग्रेस पार्टी से जुड़े। इस सबसे जाहिर है कि लेटरल एंट्री का विरोध विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थ के लिए किया जा रहा है। लोकसभा में श्री गाँधी ने बजट बनाने वाले अधिकारियों में एक भी ओबीसी या अनु. जाति/जनजाति का न होने का मुद्दा छेड़ा तब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनसे पूछा कि राजीव गाँधी ट्रस्ट और फाउंडेशन में आरक्षित वर्ग के कितने न्यासी हैं तो श्री गाँधी ने आज तक उसका उत्तर नहीं दिया। दरअसल लेटरल एंट्री का तरीका सरकारी कामकाज को पेशेवर स्वरूप प्रदान करना है। चूंकि यह व्यवस्था सीमित अवधि के लिए है इसलिए इससे आरक्षण को खतरे जैसी बात बेमानी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 17 August 2024

मो. यूनुस के आश्वासन पर भरोसा करना भारी भूल होगी


बांग्ला देश की अंतरिम सरकार के सलाहकार  मो. यूनुस ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बातचीत करते हुए दोनों देशों के आपसी संबंधों पर चर्चा की। इस दौरान श्री मोदी द्वारा बांग्ला देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा  का मुद्दा छेड़े जाने पर उन्होंने आश्वासन दिया कि उनकी सरकार इस बारे में प्रयासरत है। कुछ दिनों पहले उन्होंने ढाका स्थित ढाकेश्वरी मंदिर जाकर हिंदुओं की हिफाजत का वायदा भी किया था। 5 अगस्त को जैसे ही वहाँ सत्ता परिवर्तन हुआ उसके बाद से ही शेख हसीना के विरोध में आंदोलन कर रहे लोगों का गुस्सा हिंदुओं पर कहर बन कर टूटने लगा।  मंदिरों में तोडफ़ोड़ के अलावा घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूटपाट के साथ ही महिलाओं के साथ बलात्कार की खबरें आने लगीं। इस सबसे डरे हजारों हिन्दू सीमा पर जमा होकर भारत में प्रवेश की कोशिश करने लगे किंतु सुरक्षा बलों ने उनको वापस जाने बाध्य कर दिया । लेकिन जो हिन्दू बांग्ला देश के भीतरी क्षेत्रों में रहते हैं वे अपनी जान माल की सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित हैं। ये भी लग रहा है कि अल्पसंख्यकों  के साथ किये गए अत्याचारों की खबरें और चित्र सारी दुनिया में प्रसारित होने से हुई बदनामी को रोकने के लिए बांग्ला देश की सरकार ने उन खबरों को दबाने के इंतजाम कर दिये। हिंदुओं को भी इस बारे में आगाह किया जा रहा है कि वे बाहरी दुनिया से संपर्क न रखें वरना उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। हिंदुओं द्वारा ढाका में किये गए विशाल प्रदर्शन ने भी विश्व जनमत का ध्यान आकर्षित किया।  मो. यूनुस द्वारा  श्री मोदी को फोन करने के पीछे भी वही दबाव काम कर रहा था। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। बांग्ला देश का भीतरी वातावरण अभी भी हिंदुओं  के लिए अनुकूल नहीं है। इसका पता वहाँ के कट्टरपंथी नेता रब्बानी के उस बयान से मिला कि देश के सभी मंदिर और प्रतिमाएँ गिरा देनी चाहिए। रब्बानी के संगठन का एक प्रतिनिधि अंतरिम सरकार में भी है। रब्बानी बांग्ला देश में मुस्लिमों के कट्टरपंथी संगठन के मुखिया हैं जो हिंदुओं का घोर विरोधी है। इस देश के जन्म में भारत और हिंदुओं के योगदान को पूरी तरह जमीन में गाड़  देने का सुनियोजित प्रयास बांग्ला देश के जन्म के कुछ समय बाद ही शुरू हो गया था। यहाँ तक कि शेख हसीना के राज में भी हिंदुओं और मंदिरों पर हमले होते रहे। बांग्ला देश , भाषा और संस्कृति की दृष्टि से भारत के काफी करीब है। शायद इसी कारण से पूर्वी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिन्दू आबादी रह गई जबकि विभाजन के समय मुस्लिम कट्टरपंथियों ने बड़ी संख्या में उनका कत्ले आम किया था। उम्मीद की जाती थी कि पाकिस्तान के अत्याचारों का सामना करने के बाद अस्तित्व में आया यह देश  हिंदुओं और भारत के प्रति कृतज्ञता का भाव रखेगा किंतु महज 4 साल के बाद ही बांग्ला देश के राष्ट्रपिता शेख मुजीब की हत्या से इस देश की दिशा ही बदल गई और धीरे  - धीरे वह भी पाकिस्तान के रास्ते पर चल पड़ा। इस देश के मौजूदा हालात पूरी तरह से हिन्दू और भारत विरोधी हैं। शेख हसीना को दिल्ली में रहने की अनुमति से भी  कट्टरपंथी भन्नाए हुए हैं। ऐसे में मो. यूनुस द्वारा प्रदत्त आश्वासन पर विश्वास करना भारी भूल होगी क्योंकि बांग्ला देश में हुए राजनीतिक परिवर्तन की जड़ में ही हिन्दू और भारत विरोध है। इसलिए केंद्र सरकार को ढाका के नये हुक्मरानों पर दबाव बनाने के  प्रयास तेज करना होंगे।  सैन्य दृष्टि से कोई कदम उठाना तो गलत होगा किंतु अतीत में जिस प्रकार नेपाल की आर्थिक नाका बंदी की गई थी वैसा ही कदम बांग्ला देश के विरुद्ध उठाया जा सकता है। उल्लेखनीय है भारत यदि उंगली टेढ़ी कर दे तो बांग्ला देश में खाद्यान्न का संकट उत्पन्न हो जायेगा। भारत  को बांग्ला देश सरकार पर इस बात का दबाव बनाना चाहिए कि जिस तरह वह छात्र आंदोलन में हुई मौतों की जाँच करवा रही है वैसी ही जाँच हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों की भी होनी चाहिए तथा जाँच दल में हिन्दू को भी रखा जाए। मो. यूनुस को ये समझाना भी जरूरी है कि बांग्ला देश में रह रहे हिन्दू भले ही उस देश के नागरिक हों किंतु उन पर किये जाने वाले अत्याचारों को भारत अपने ऊपर हमला मानेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी