Tuesday, 3 September 2024

मालदीव की तरह बांग्ला देश को भी रास्ते पर लाना जरूरी है


मालदीव में नई सरकार बनने के बाद उसने भारत से पंगा लेना शुरू कर दिया। राष्ट्रपति मुइज्जू ने चुनाव प्रचार में ही  कह दिया था कि जो भारतीय सैनिक वहाँ थे उनको वापस जाना होगा। भारतीय हैलीकाप्टरों के संचालन के लिए जो सैनिक टुकड़ी थी वह उनको बर्दाश्त नहीं थी। उनकी सरकार ने  भारतीय हितों  के विरुद्ध खुलकर बोलना शुरू कर दिया। इसका कारण मुइज्जू का चीन  समर्थक होना था। इस छोटे से टापू नुमा देश का इस तरह से आँखे तरेरना चौंकाने वाला था। हालांकि वह भारत का कुछ बिगाड़ सकने में सक्षम नहीं है किंतु पहले श्रीलंका और फिर मालदीव के चीन के प्रभावक्षेत्र में आ जाने से मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवालिया निशान लगने लगे , क्योंकि जो देश महाशक्ति बनने की राह पर हो उसके  छोटे - छोटे पड़ोसी देश भी उसके प्रभाव में न हों ये बात कुछ जमती नहीं।  पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार से भी हमारे रिश्ते सामान्य नहीं हैं। श्रीलंका में चीन ने अनेक बड़े प्रकल्पों का निर्माण कर 90 साल तक उनके उपयोग का  अनुबंध कर लिया।  हालांकि जब श्रीलंका में कंगाली के हालात बने तब भारत ने  उसकी हर संभव सहायता करते हुए संबंधों को पुनः मजबूत किया। उसके बाद मालदीव भी चीन की शह पर ऐंठने लगा। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप के समुद्रतट पर बैठकर उसके सौंदर्य की प्रशंसा कर मालदीव की रीढ़ पर जबरदस्त प्रहार किया। उनकी सांकेतिक कूटनीति रंग लाई। भारत से  सैलानियों ने वहाँ जाना रद्द कर दिया।  इससे मालदीव के  पर्यटन व्यवसाय  पर बुरा असर पड़ने लगा। मुइज्जू सरकार तो अपराधबोध के कारण कुछ बोलने में हिचकी किंतु वहाँ पर्यटन उद्योग से जुड़े लोग दौड़े - दौडे़ भारत की पर्यटन एजेंसियों के पास आकर गिड़गिड़ाने लगे। उधर केंद्र सरकार के इशारे पर लक्षद्वीप में  निवेश करने वाले उमड़ पड़े। थोड़े दिनों में ही मालदीव की अकड़ कम होने लगी। पहले तो मुइज्जू ने  भारत से अच्छे रिश्तों का बखान करना शुरू किया और फिर मौका मिलते ही दिल्ली आकर भारतीय नेताओं की मिजाजपुर्सी में लगे रहे।  श्रीलंका भी काफी कुछ रास्ते पर लौट आया है । नेपाल अपनी राजनीतिक अनिश्चितता में फंसा होने से फिलहाल ठण्डा है। वहीं म्यांमार के साथ झगड़ा केवल अवैध घुसपैठ को लेकर है। रही बात पाकिस्तान की तो वह अपने घरेलू मामलों में इतना उलझ गया है कि भारत से सीधे लड़ने की स्थिति उसकी है नहीं। चीन भी समझ गया है कि सैनिक मोर्चे पर भारत को दबाना असंभव होगा। बच रहा बांग्ला देश जिससे विगत 15 सालों में भारत के रिश्ते हर स्तर पर सबसे अच्छे दौर में थे। लेकिन अचानक  हालात उलट पुलट हो गए। शेख हसीना को सत्ता छोड़ भागकर भारत आना पड़ा। उनके स्थान पर जो अंतरिम सरकार बनी उसमें बैठे लोग ऐलानिया भारत विरोधी हैं। वहाँ रह रहे हिंदुओं को जिस प्रकार  से हमलों और लूटपाट का शिकार होना पड़ा उसके कारण भारत के सामने दोहरा संकट उपस्थित हो गया। सीमा पार से शरणार्थियों के आगमन को रोकने के अलावा वहाँ  रहने वाले हिंदुओं की सुरक्षा की चिंता करना भी जरूरी है। शेख हसीना को शरण देने के बारे में भी अब तक सरकार कुछ तय नहीं कर सकी। बांग्ला देश उनको दिल्ली में पनाह दिये जाने से नाराज है । ऐसे में कूटनीतिक, आर्थिक और मानवीय तीन मोर्चों पर भारत को निपटना पड़ रहा है। चूंकि बांग्ला देश में हालात सामान्य होने के संकेत मिलने लगे हैं और वैश्विक दबाव के कारण  हिंदुओं पर हमले भी कम होने लगे हैं इसलिए अब जरूरी है ढाका में बैठे नये हुक्मरानों से दो टूक  पूछा जावे कि उनको भारत से रिश्ते रखने हैं या नहीं और रखने हैं तो कैसे ? क्योंकि वहाँ हुआ सत्ता पलट चीन की बजाय अमेरिका के इशारे पर हुआ है। भारत को वहाँ की अंतरिम सरकार को  समझाना होगा कि यदि हम चीन के दबाव में नहीं आते और अमेरिका की नाराजगी के बाद भी यूक्रेन युद्ध में रूस का विरोध करने से बचे तब बांग्ला देश से डरने का सवाल ही नहीं  उठता। श्रीलंका और मालदीव  के बारे में भारतीय कूटनीति असरकारी साबित हुई है। आर्थिक नाकाबंदी ने नेपाल की अक्ल भी ठिकाने लगा दी। पाकिस्तान इस बात के लिए परेशान है कि भारत के साथ बातचीत शुरू हो। हालांकि बांग्ला देश के सुर भी कुछ नरम हुए हैं लेकिन वहाँ के कुछ नेता ज़हर बुझे तीर छोड़ने से बाज नहीं आते। ऐसे में कुछ न कुछ ऐसा किया जाना जरूरी है जिससे अंतरिम सरकार को ये चेतावनी  मिले कि भारत से रिश्ते बिगाड़ने पर उनका हर मोर्चे पर नुकसान होना तय है। हालांकि किसी देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप उचित नहीं होता किंतु इस देश का तो जन्म ही भारत के खुले हस्तक्षेप से हुआ था। आज फिर यदि वहाँ की स्थिति हमारे हितों के विरुद्ध हो तो इतिहास  द्वारा अपने आप को  दोहराए जाने की कहावत को चरितार्थ करने में संकोच नहीं करना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 September 2024

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका से की गई अपेक्षाओं का कोई असर नहीं होने वाला


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का ये कहना पूरी तरह सही है कि ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब न्यायालय जाने से हिचकते हैं क्योंकि उनके मन में ये बात बैठ गई है कि अदालत जाने के बाद उनका जीवन तनाव पूर्ण हो जायेगा। जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र  में बोलते हुए उन्होंने कहा कि दुष्कर्म जैसे अपराधों में जब दशकों तक न्याय नहीं होता तो लोगों में ये अवधारणा प्रबल होती है कि  न्यायपालिका में  संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है। उन्होंने सुनवाई टालते रहने की प्रवृत्ति को समाप्त करने की अपेक्षा भी व्यक्त की। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भी इसी आशय के विचार व्यक्त कर चुके थे। देश की दो सबसे बड़ी संवैधानिक हस्तियों द्वारा कही गई उक्त बातों में कुछ भी नया नहीं है क्योंकि आम नागरिक के मन में न्यायपालिका की ऐसी ही छवि बन चुकी है। हाल ही में कुछ चर्चित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालतों को फटकार लगाते हुए कहा गया था कि वे अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए मामला ऊपरी अदालतों के लिए छोड़ देते हैं। मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ तो इस बारे में खुलकर बोलते आ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय पर भी ये तोहमत लगती रही है कि कुछ दिग्गज अधिवक्ताओं को वहाँ विशेष महत्व मिलता है। राजनेता और धनवान लोग उन अधिवताओं की मोटी फीस चुकाकर अपने पक्ष के मामले में तो जल्द  सुनवाई करवा लेते हैं वहीं  विरुद्ध चल रहे प्रकरणों में पेशियाँ बढ़वाकर न्याय प्रक्रिया को विलंबित करते हैं। इससे न्यायपालिका की छवि को तो बट्टा लग ही रहा है न्यायाधीशों के प्रति भी आम जनता के मन में जो सम्मान का भाव था उसमें कमी आ रही है। वकीलों की बढ़ती फीस भी न्याय प्राप्ति में बड़ी बाधा है। दीवानी प्रकरणों के निपटारे की कोई समय सीमा नहीं है और फौजदारी में जमानत हासिल करने के लिए  मुँह मांगी फीस चुकाना हर किसी के बस में नहीं। किसी वी. आई. पी की गिरफ्तारी में निचली अदालत से जमानत रद्द होते ही ऊपरी अदालत में फौरन तारीख मिल जाती है जबकि साधारण व्यक्ति को महीनों इंतजार करना होता है। यही वजह है कि कानून के रास्ते  पर चलने वाले साधारण नागरिक की न्यायपालिका में आस्था कम हो रही है वहीं कानून तोड़ने का दुस्साहस करने वालों के मन में उसके प्रति खौफ बचा ही नहीं । इस स्थिति के लिए वकील ज्यादा जिम्मेदार हैं या न्यायाधीश इस पर बहस हो सकती है किंतु कुछ हद तक दोनों की जिम्मेदारी बनती है। बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के लिए मृत्यदंड का प्रावधान होने के बाद भी वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। प. बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार दुष्कर्म के विरुद्ध कोई नया कानून विधानसभा में लाने जा रही है । विपक्षी दल भाजपा ने भी उसको समर्थन देने की घोषणा कर दी। इसके पहले ममता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बलात्कार पर मृत्युदंड   देने संबंधी कानून बनाने की मांग भी की थी। लेकिन इस तरह की कोशिशें भी महज दिखावा है जो दुष्कर्म की हर बड़ी वारदात के बाद किया जाता है। कोलकाता में हाल ही में एक महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद हत्या  देश भर में चर्चा का विषय बन गई। उसे लेकर वैसा ही गुस्सा फूट पडा जैसा बरसों पहले दिल्ली में निर्भया काण्ड के बाद देखने मिला था। उस काण्ड के बाद  बलात्कार के मामलों में निचली अदालतों ने बिजली जैसी फुर्ती से निपटारे किये। कुछ में तो  एक महीने के भीतर ही मृत्यदंड तक दे दिया गया। लेकिन वह उत्साह  क्षणिक ही था। न तो दुष्कर्म  रुके और न ही अदालतों की वह तेजी बरकरार रही। ये देखते हुए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका को जो नसीहत दी गई वह भी उस सम्मेलन में उपस्थित  प्रतिनिधियों के एक कान से घुसने के बाद दूसरे से निकल गई होगी। कोलकाता कांड से राज्य सरकार की छवि पर लगे धब्बे  प्रस्तावित कानून के पारित होने पर भी नहीं साफ होने वाले। सही बात तो ये है कि जनता को सस्ता और जल्द न्याय दिलवाने के प्रति सबंधित कोई भी पक्ष ईमानदार नहीं है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों अपने आप में मस्त हैं। उन्हें न्याय व्यवस्था में कमी और खामी तभी नजर आती है जब उससे उनका कोई अहित हो रहा हो। जहाँ तक बात जनता  की है तो उसकी तकलीफ सुनने की फुर्सत किसी के पास नहीं। इस आधार पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका से की गई अपेक्षाएं कुछ दिन के बुद्धिविलास के उपरांत हवा - हवाई होकर रह जाएंगी क्योंकि पहले भी ऐसा होता रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 31 August 2024

पानी : ज्यादा बरसे तो मुसीबत और कम बरसे तो आफत


भारत में मानसून की अवधि सामान्यतः 15 जून से 15 सितम्बर तक मानी जाती है। दक्षिण पश्चिम मानसून 1 जून को केरल में दस्तक देता है ।शुरुआती अनिश्चितता के बाद जुलाई तक पूरा देश बरसाती फुहारों से नहा उठता है। हालांकि सभी जगह एक सी बरसात नहीं होती। कई बार तो  जिन दक्षिणी राज्यों से मानसून आगे बढ़ता है वहीं सूखा पड़ जाता है जबकि गुजरात और राजस्थान जैसे कम वर्षा वाले राज्यों में अति वृष्टि होती है। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने से वैसे भी ऋतु चक्र की गति और दिशा गड़बड़ाती जा रही है। चूंकि हमारा देश कृषि प्रधान है इसलिए वर्षा जल की उपयोगिता और अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है। बिजली की उपलब्धता ने खेतों में सिंचाई के लिए जल का उपयोग बढ़ा दिया है। इसके कारण भूजल का स्तर साल दर साल गिरता जा रहा है। वर्षा जल के संग्रहण के लिए किये जाने वाले प्रयास भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में बने पुराने तालाब उपेक्षा का शिकार होकर दम तोड़ते जा रहे हैं। वहीं नये बनाये जा रहे सरोवर भ्रष्टाचार का शिकार हैं। बढ़ती आबादी और औद्योगिकीकरण से भी जल की आवश्यकता निरंतर बढ़ती जा रही है। लेकिन मानसून से होने वाली बरसात का इससे कोई सामंजस्य नहीं है। उसकी चाल भी निर्धारित न होकर अप्रत्याशित होती जा रही है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जहां पानी की नितांत आवश्यकता है वहाँ बादल बिन बरसे लौट जाते हैं किंतु जिन क्षेत्रों में जररूत के मुताबिक बारिश हो चुकी है वहाँ बाढ़ की विभीषिका है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मौसम विभाग द्वारा उपग्रहों से प्राप्त सूचना के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणी ज्यादातर गलत निकलती है। इससे अलग हटकर एक नई समस्या  हर वर्ष सामने आने लगी है। ज्यादा बरसात में तो फिर भी ठीक किंतु ज्यादातर शहरों में थोड़ी सी बरसात में ही सड़कों पर पानी भर जाता है। देश के लगभग सभी महानगर इस समस्या से जूझ रहे  हैं। इसका कारण बेतरतीब बसाहट के साथ स्थानीय निकायों में व्याप्त  कामचोरी और भ्रष्टाचार है। इन दिनों गुजरात के सूरत , राजकोट और बड़ोदा में बाढ़ का पानी घरों की छत तक जा पहुंचा है। दिल्ली, राजस्थान भी जलप्लावन से हलाकान हैं। नदियों के किनारे बसे शहरों में भी हालात कभी भी खराब हो जाते हैं। भारी बारिश के चलते बांधों से छोड़ा जाने वाला पानी मुसीबत बन जाता है। कहने का आशय ये है कि हमारे देश में पानी कम बरसे तो मुसीबत और ज्यादा बरसे तो आफत वाली स्थिति है। इसका कारण जल प्रबंधन के समुचित उपाय न किये जाने के अलावा शहरों का अनियोजित विकास है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो या व्यवसायिक राजधानी मुंबई, सभी में थोड़ी देर की  बरसात जनजीवन को अस्त- व्यस्त कर देती है। आई टी हब के तौर पर विकसित बेंगुलुरु और गुरुग्राम देखने में कितने भी भव्य दिखें किंतु बरसात के मौसम में वहाँ की सड़कें  नालों की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। चंडीगढ़ जैसे व्यवस्थित कहे जाने वाले नगर में भी कुछ घंटों की बरसात समस्या बन जाती है। हर साल देश भर में  कहीं अनावृष्टि तो कहीं अतिवृष्टि से संकट उत्पन्न होता है ।  लेकिन वर्षाकाल खत्म होते ही रात गई, बात गई वाली मानसिकता के चलते सब भुला दिया जाता है। बड़ी नदियों पर बांध बनाकर वर्षा जल को संग्रहित करने की सोच गलत नहीं थी किंतु ज्यादा बरसात में उनके गेट खोले जाने पर निचले क्षेत्रों में होने वाला जलप्लावन चिंताजनक हालात पैदा कर देता है। आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में कहने को तो काफी प्रगति हुई किंतु जिन आपदाओं को समय रहते रोका जा सकता है उनसे बचाव न कर पाना ये साबित करता है कि गलतियों से सबक लेने की बुद्धिमत्ता का विकास करने में हमारा तंत्र विफल रहा है। हालांकि जनता भी इस मामले में काफी हद तक जिम्मेदार है। जल के दुरुपयोग को रोकने के साथ वर्षा जल का संग्रहण करने के प्रति दायित्व बोध का अभाव  इस समस्या को बढ़ाने वाला है। शहरों में अवैध निर्माण के कारण जल निकासी में अवरोध उत्पन्न होता है। जल की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की फिजूलखर्ची रोकने के अलावा वर्षा जल को जमा करने के प्रयासों ने कई जगह मरुभूमि में भी हरी सब्जियों के उत्पादन जैसा चमत्कार किया है। इसी तरह जल निकासी में रुकावट दूर हो जाए तो शहरों में आने वाली बाढ़ से काफी हद तक मुक्ति पाई जा सकती है। मौसम निश्चित रूप से टेढ़ी चाल चलने लगा है। उस पर मनुष्य का बस नहीं किंतु जो हमारे हाथ में है यदि उसके प्रति भी उदासीन रहा जाए तो फिर प्रकृति को दोष देना कहाँ तक उचित है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 30 August 2024

चुनाव खर्च के ब्यौरे पर विश्वास करना कठिन


विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को सौंपे गए विवरण के अनुसार लोकसभा चुनाव में  पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों को मोटी रकम  दी। कांग्रेस और भाजपा तो राष्ट्रीय पार्टी हैं किंतु आम आदमी पार्टी द्वारा भी अपने उम्मीदवारों को 60 - 60 लाख रु. दिया जाना चौंकाता है। आयोग ने लोकसभा चुनाव में खर्च की सीमा 90 लाख रु. तय की थी। इसीलिए हर प्रत्याशी ने इससे कम ही खर्च किया क्योंकि निर्धारित राशि से अधिक खर्च करने वाले के जीतने पर भी उसका चुनाव चुनाव रद्द हो जाता है। हारने पर भी कुछ वर्षों तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लग जाती है। कुछ प्रत्याशी ऐसे भी हैं जो सक्षम होने से पार्टी से पैसा नहीं लेते। निर्दलीय उम्मीदवारों को स्वयं के या चंदे के पैसे से चुनाव लड़ना पड़ता है। नामांकन के दिन से ही खर्चों का आकलन होने लगता है। इस समूची कवायद का उद्देश्य चुनावी खर्च को सीमित करना है। टी. एन. शेषन के कार्यकाल में चुनाव प्रचार के परंपरागत तौर - तरीकों में काफी बदलाव किये गए थे। बैनर - पोस्टर सीमित हो गए। रात 10 बजे के बाद सभाएं प्रतिबंधित हो गईं। बिना अनुमति दीवारें पोतने पर रोक लगी। चुनाव कार्यालय से स्वीकृति लिए बगैर वाहन का उपयोग वर्जित हो गया। प्रकाशित प्रचार सामग्री पर  मुद्रण संख्या का उल्लेख अनिवार्य कर दिया गया। प्रत्याशी द्वारा  कराये जाने वाले नाश्ते तक की दरें तय कर दी गईं। कभी - कभी तो लगता है चुनाव आयोग ज्यादती कर रहा है। नगदी राशि के लाने , ले जाने में पुलिस द्वारा की जाने वाली तलाशी से व्यापारी वर्ग भी त्रस्त हो जाता है। भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात सरकारी मशीनरी चुनाव आचार संहिता लगते ही निरंकुशता की हद तक सख्त हो जाती है। इन सबका लाभ निःसंदेह हुआ है किंतु जहाँ तक बात चुनाव में खर्च कम करने की है तो वह नहीं हो सका। लोकसभा और विधानसभा चुनाव हेतु व्यय की जो उच्चतम सीमा निर्धारित की गई  उसके भीतर चुनाव लड़ने वाले वे प्रत्याशी ही होते हैं जो केवल नाम के लिए मैदान में उतरते हैं। जिन कुछ  सीटों पर बड़ी पार्टियां भी सांकेतिक चुनाव लड़ती हैं वहां उनका खर्च कम होता है। वरना कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा पानी की तरह पैसा बहाने के उदाहरण आम हैं। अनेक उद्योगपति राज्यसभा की सदस्यता हासिल करने करोड़ों लुटा देते हैं। विधायकों की बोली किस तरह लगती है  ये सर्वविदित है। लोकसभा और विधानसभा तो बड़ी बात है लेकिन नगर निगम  पार्षद के चुनाव  में कुछ लोग बेतहाशा खर्च कर देते हैं। अब वे कार्यकर्ता भी नहीं रहे जो विचारधारा के लिए तन, मन और धन तीनों झोंक देते थे। साइकिल पर प्रचार तो वे भी नहीं करते जिनका चुनाव चिन्ह ही साइकिल है। चौपहिया वाहनों का उपयोग आम हो गया है। और तो और छुटभैये नेता तक हेलीकाप्टरों में मंडराते देखे जा सकते हैं। विमानों का उपयोग भी सामान्य हो चला  है। ये सब देखते हुए चुनाव आयोग द्वारा तय सीमा में चुनाव लड़ पाना अविश्वसनीय प्रतीत होता है। इस आधार पर चुनावी खर्च के  ब्यौरे को कसम खाकर झूठ बोलने का सबसे बड़ा उदाहरण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं  होगी। जनसेवा या विचारधारा से प्रेरित होकर राजनीति करने वाले समय के साथ लुप्त होते जा रहे हैं क्योंकि उनके लिए चुनाव जीतना आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा है। राज्यसभा भी जिस वर्ग के लिए बनाई गई थी वह उसमें नजर नहीं आता। इन्हीं सब कारणों से चुनाव उस तबके के बस के बाहर होते जा रहे हैं जिसके मन में विशुद्ध सेवाभाव है। इसके लिए राजनीतिक पार्टियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो उम्मीदवारी तय करते समय जीतने की क्षमता को प्राथमिकता देती हैं। सरकार बनाने के लिए  बहुमत की आवश्यकता ने इस चलन को मज़बूरी बना दिया है किंतु फिर राज्यसभा और विधानपरिषदों में निःस्वार्थ समाजसेवियों , कलाकारों, खिलाड़ियों, शिक्षाशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों को ज्यादा से ज्यादा स्थान दिये जाना चाहिए। आजादी के बाद प्रारंभिक वर्षों में ऐसा हुआ भी किंतु धीरे - धीरे उच्च सदन की गरिमा के साथ भी खिलवाड़ होने लगा। राजनीति में अच्छे लोगों के आने की बात तो खूब कही जाती है किंतु उनके लिए कितनी जगह है? अच्छा तो ये हो कि चुनाव खर्च की सीमा घटाई जावे। चुनाव प्रचार के प्रचलित तरीके और बदले जाएं। चुनाव जितना कम खर्चीला होगा उसमें जनभागीदारी उतनी ही बढ़ेगी। करोड़ों रु. के प्रचार और चुनाव आयोग के अथक प्रयासों के बावजूद मतदान का प्रतिशत कम रहना चिंता के साथ चिंतन का भी विषय है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 August 2024

ममता गृहयुद्ध की भाषा बोल रहीं


प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  संघर्षशील राजनेत्री हैं। वाम मोर्चा सरकार की तानाशाही के विरुद्ध उन्होंने जो लड़ाई लड़ी उसी का नतीजा है कि अपने इस मजबूत गढ़ में वामपंथी पार्टियां लगभग अस्तित्वहीन हो चुकी हैं। और उनके साथ रहने से कांग्रेस भी घुटनों पर आ गई । लेकिन सुश्री बैनर्जी ने भी वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये जिनके बल पर वामपंथियों ने लगभग चार दशक राज किया। मसलन बांग्ला देश से आये घुसपैठियों को मतदान का अधिकार देना, असमाजिक तत्वों के जरिये विरोधियों को आतंकित करना,  प्रशासन पर तृणमूल का वर्चस्व कायम करना आदि। ममता ने कांग्रेस इसलिए छोड़ी थी क्योंकि वह वामपंथियों के अत्याचार पर उदासीन थी। इसलिए उम्मीद थी वे उन बुराइयों से मुक्ति दिलाएंगी । लेकिन ममता ने भी मुस्लिम तुष्टीकरण , राजनीतिक हिंसा, असामाजिक तत्वों को संरक्षण और भ्रष्टाचार को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बना लिया। यद्यपि समाज के निचले हिस्से में उनका जनाधार है किंतु राज्य की 30 फीसदी मुस्लिम आबादी का एकमुश्त समर्थन उनकी चुनावी सफलता का सबसे बड़ा कारण है।  चुनावी हिंसा की जितनी घटनाएं प. बंगाल में होती हैं उतनी अन्य कहीं नहीं।  उनके तुनुकमिजाज  स्वभाव के चलते  विपक्षी दल भी उनसे छड़कते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस या अन्य किसी दल के लिए एक सीट तक नहीं छोड़ी। यहाँ तक कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के विरुद्ध  क्रिकेटर युसुफ पठान को उतारकर उन्हें हरवा दिया। उनके बढ़ते गुस्से का एक कारण ये भी है कि जिन राहुल गाँधी को वे पूरी तरह तिरस्कृत करती थीं वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनकर राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण शख्सियत बन बैठे। कांग्रेस और सपा को तृणमूल से अधिक सीटें मिलने से इंडिया गठबंधन में भी उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं मिल रही। गलत नीतियों के कारण वे चारों तरफ से घिरती जा रही हैं।  संदेशखाली की घटना से राज्य सरकार की जबरदस्त बदनामी हुई थी किंतु हाल ही में एक महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद नृशंस हत्या की वारदात ने ममता की साख और धाक मिट्टी में मिला दी। उक्त प्रकरण में प्राथमिकी दर्ज करवाने में हुए विलम्ब और उसके पहले ही पोस्ट मार्टम करवाने की वजह से उत्पन्न शंकाओं ने उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। घटनास्थल पर सबूत मिटाने के जो सुनियोजित प्रयास हुए उन्होंने भी कई सवाल खड़े कर दिये। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जाँच सीबीआई को सौंपे जाने का भी ममता सरकार विरोध करती रही। लेकिन ये प्रकरण दूसरा निर्भया कांड बनकर पूरे देश में चर्चित हो गया। सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रुख की वजह से कोई भी विपक्षी दल सुश्री बैनर्जी के बचाव में आगे नहीं आ रहा। गत दिवस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो प्रतिक्रिया दी उसके बाद प. बंगाल सरकार के पास मुँह छिपाने की जगह नहीं बची। और उसी की बौखलाहट में ममता ने धमकी दे डाली कि यदि प. बंगाल में आग लगी तो असम, बिहार और उ.प्र भी नहीं बचेंगे । आग दिल्ली तक जाएगी तथा मोदी सरकार गिर जाएगी। उनके इस बयान से तो लगता है मानों प. बंगाल कोई अलग देश हो जो अपने भीतरी मामलों में हस्तक्षेप के विरुद्ध धमका रहा हो। कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने भी भारत में बांग्ला देश जैसे हालात उत्पन्न होने की बात कही थी। सुश्री बैनर्जी ने भले ही उनके शब्दों को न दोहराया हो किंतु गत दिवस भाजपा द्वारा आयोजित प. बंगाल बंद को मिली सफलता से संभवतः उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।  उन्होंने गत दिवस जिस प्रकार की धमकी दी वह संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा ली गई शपथ का खुला उल्लंघन है । यदि एक राज्य का मुख्यमंत्री दूसरे राज्यों में आग लगने और केंद्र सरकार गिराने जैसी धमकी देगा तो यह गृहयुद्ध  की ओर कदम बढ़ाने जैसा है। दरअसल जबसे बांग्ला देश में तख्ता पलट हुआ है तभी से कुछ लोग भारत में भी वैसा ही  देखने के लिए लालायित नजर आते हैं। ममता भी उसी बिरादरी में शामिल हो गई हैं। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनाव के पहले धमकी दी थी कि  यदि भाजपा सत्ता में लौटी तो देश में आग लग जायेगी। नरेंद्र मोदी  तीसरी बार सत्ता में आ गए किंतु कहीं पत्ता तक नहीं खड़का। अब ममता भी वैसी ही डींग हांक रही हैं तो उसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय को धमकाना भी हो सकता है। बेहतर हो न्यायपालिका उनकी बात का संज्ञान लेते हुए  पूछे कि  दूसरे राज्यों  सहित दिल्ली तक आग पहुँचने और मोदी सरकार के गिरने जैसी बात क्या देश की अखंडता के लिए खतरा नहीं है और इसके बाद उन्हें सत्ता में रहने का क्या अधिकार  है ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 28 August 2024

जम्मू कश्मीर: धारा 370 और अलग झंडे की बहाली पर कांग्रेस अपना रुख साफ करे


जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस और नेकां ( नेशनल  काँफ्रेंस ) के बीच गठजोड़ पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। दोनों के बीच सीटों का जो बंटवारा  हुआ उसके अनुसार नेकां 51 और कांग्रेस 32 सीटें लड़ेगी । इसका मतलब ये हुआ कि कांग्रेस ने इस राज्य में छोटे भाई की भूमिका स्वीकार कर ली है। चुनाव के ऐलान के पहले ये उम्मीद थी कि कश्मीर घाटी में असर रखने वाली तमाम पार्टियां मिलकर संयुक्त मोर्चा बना लेंगी। सबसे ज्यादा उम्मीद नेकां और पीडीपी के साथ आने की थी लेकिन अचानक नेकां के वरिष्ट नेता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला ने अकेले लड़ने की घोषणा कर डाली। इससे भाजपा को काफी राहत मिल गई। क्योंकि घाटी में उसका जनाधार कम होने से उसके लिए एक भी सीट जीत पाना मुश्किल है। परिसीमन के बाद जम्मू के हिन्दू बहुल अंचल में विधानसभा सीटें बढ़ जाने से उसको अपने लिए अच्छी संभावनाएं लग रही हैं। लेकिन घाटी में कोई गठबंधन नहीं होने से कांग्रेस  काफी चिंतित थी क्योंकि उसके पास भी गुलाम नबी आजाद के निकल जाने के बाद इस राज्य में अब कोई ऐसा नेता नहीं बचा जिसके नाम पर वह 10 सीटें भी जीत सके। इसीलिए राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ श्रीनगर पहुंचे और अब्दुल्ला परिवार से मिलकर गठबंधन की पेशकश की। इसके बाद नेकां और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। ये गठबंधन  ऊपरी तौर पर काफी ताकतवर नजर आता है। हालांकि लोकसभा चुनाव में नेकां के दूसरे सबसे बड़े नेता उमर अब्दुल्ला एक ऐसे व्यक्ति से बुरी तरह हार गए जो जेल में बंद है। इसी तरह पीडीपी प्रमुख मेहबूबा मुफ्ती भी लंबे अंतर से शिकस्त खा गईं। इससे ये लगा कि घाटी में अब्दुल्ला और मुफ्ती खानदान का आभामंडल फीका पड़ने लगा है। आम कश्मीरी भी  इतना तो बोलता ही है कि उक्त दोनों परिवारों ने कश्मीर को जमकर लूटा और कश्मीरियों को बदहाली में रहने मजबूर कर दिया। बावजूद इसके  धारा 370 उनके लिए नाक का सवाल है। अन्यथा उसके हटने के बाद  घाटी में जो शांति आई उसकी हर कोई तारीफ करता है। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद फारूक को भी ये लगने लगा कि अब घाटी में उनके परिवार का वह प्रभाव नहीं रहा जो पहले हुआ करता था। यही कारण रहा कि जैसे ही राहुल और खरगे जी आये नेकां ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने पर रजामंदी दे दी। हालांकि घाटी में कुछ छोटी - छोटी पार्टियां ऐसी हैं जो एक - दो सीटों पर प्रभावशाली हैं किंतु नेकां और कांग्रेस गठबंधन एक बड़ी ताकत के तौर पर मैदान में हैं। लेकिन इस गठबंधन से कांग्रेस के लिए एक ऐसी मुश्किल पैदा हो गई जिसका सामना करना उसके लिए मुश्किल होगा। और वह है 370 को लेकर नेकां का रवैया। उल्लेखनीय है अब्दुल्ला पिता - पुत्र कह चुके हैं कि यदि सत्ता में आये तो 370 को बहाल करने संबंधी प्रस्ताव विधानसभा में लाएंगे । और तो और जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा भी दोबारा फहराने की प्रथा वापस लायेंगे। 370 की बहाली और राज्य के अलग झंडे की बात का समर्थन यदि कांग्रेस करती है तो वह उसके लिए आत्मघाती होगा। जम्मू अंचल में तो इन वायदों से उसे नुकसान होना तय है ही किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र में भी  समस्या पैदा हुए बिना नहीं रहेगी। स्मरणीय है धारा 370 को हटाने का अनेक कांग्रेसी नेताओं द्वारा  स्वागत किया गया था। बाद में पार्टी ने भी अधिकृत तौर पर निर्णय की प्रक्रिया पर आपत्ति व्यक्त की थी किंतु मोदी सरकार के उस निर्णय के पक्ष में जबरदस्त जनमत होने से पार्टी विरोध करने का साहस न जुटा सकी। 370 हटने के बाद राज्य आतंकवाद और अलगाववाद से पूरी तरह मुक्त हो गया ये कहना तो सही नहीं है किंतु उसमें जो कमी आई उसने घाटी में व्याप्त भय के माहौल को काफी हद तक घटाया है। इसका प्रमाण पर्यटकों की संख्या में रिकार्ड तोड़ वृद्धि है। दूसरी तरफ विकास कार्यों में भी तेजी आई है। हालांकि इसकी वजह से घाटी में भाजपा को सफलता मिलेगी ये उम्मीद करना जल्दबाजी होगी किंतु कांग्रेस के लिए 370 और राज्य के अलग झंडे  की वापसी के वायदे का समर्थन करना बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। अभी तक उसने ये स्पष्ट नहीं किया कि वह नेकां के उक्त वायदों का समर्थन करती है या नहीं किंतु जल्द उसे अपनी स्थिति साफ करनी होगी । वरना उसको  कश्मीर के बाहर भी जवाब देना मुश्किल हो जायेगा। विशेष रूप से ये मुद्दा श्री गाँधी के लिए परेशान करने वाला बनेगा क्योंकि नेकां से गठबंधन करने वही गए थे। 


- रवीन्द्र  वाजपेयी

Tuesday, 27 August 2024

नई भर्ती वालों को उपकृत करने से भाजपा में पनप रहा असंतोष



कल जम्मू कश्मीर विधानसभा के लिए भाजपा द्वारा   प्रत्याशियों की पहली सूची जारी होते ही हंगामा हो गया। इसके बाद फौरन वह सूची रद्द की गई और कुछ देर बाद संशोधित सूची जारी हुई। पहली सूची में जिन वरिष्ट नेताओं के नाम कटे उनमें से कुछ को उम्मीदवार बना दिया गया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुछ दिनों पहले पार्टी में आये लोगों को टिकिट देने से उन लोगों के मन खट्टे हो जाते हैं जो बरसों से पार्टी की सेवा करते आये हैं और वह भी विपरीत परिस्थितियों में। हालांकि  इस तरह के हंगामे सभी दलों में होने लगे हैं । लेकिन भाजपा अपने को अनुशासित कार्यकर्ताओं की पार्टी  कहते नहीं थकती । इसलिए उसके भीतर इस तरह की घटनाएं हैरत पैदा करती हैं।  जम्मू कश्मीर में गत दिवस जो हुआ वह चुनाव वाले  अन्य राज्यों में भी हो सकता है। इसका एक कारण भाजपा में टिकिटार्थियों की बढती संख्या  भी है। जनसंघ के ज़माने में उम्मीदवार ढूँढे जाते थे क्योंकि हारने के लिए लड़ना पड़ता था। वहीं भाजपा बनने के बाद पार्टी को सत्ता मिलने लगी जिस वजह से हर सीट पर चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन बीते कुछ समय से  कार्यकर्ताओं के साथ ही उसके परंपरागत समर्थकों तक में इस बात को लेकर नाराजगी  है कि तपे - तपाये कैडर  को किनारे रखकर दूसरे दलों से  नये - नये आये लोगों को टिकिट दे दिया जाता है। हालांकि क्षेत्रीय दलों के उभरने से कांग्रेस और भाजपा दोनों को नई भर्ती वाले नेताओं को उपकृत करना जरूरी हो गया है। लेकिन कुछ ऐसे मामले हैं जिनमें एक दिन पहले आये व्यक्ति को राज्यसभा की टिकिट दे दी गई। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण इसके ताजा उदाहरण हैं। ऐसा ही हरियाणा में  किया गया जब हाल ही में पार्टी में आईं किरण चौधरी को भी राज्यसभा उम्मीदवारी दे दी गई। हालांकि ऐसे निर्णय चुनाव में लाभ उठाने के लिए ही किये जाते हैं लेकिन हर बार वे सफल होंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। महाराष्ट्र में श्री चव्हाण को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बावजूद उनके प्रभाव वाले इलाकों में भी भाजपा के हाथ पराजय ही आई। श्रीमती चौधरी भी हरियाणा में भाजपा को अपेक्षित सफलता दिलवा सकेंगी इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। ताजा चर्चा झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के भाजपा में आने को लेकर चल पड़ी है। झारखण्ड में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 31 जनवरी को  ईडी द्वारा गिरफ्तार किये जाने पर जब हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया तब चंपई सोरेन को उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाया गया किंतु जुलाई में जमानत पर रिहा होते ही हेमंत उन्हें हटाकर हटाकर मुख्यमंत्री बन बैठे। चंपई को गद्दी छोड़ना नागवार गुजरा और वे पार्टी छोड़ने की बात करने लगे। सुना है इसके पीछे भी भाजपा ही है। असम के मुख्यमंत्री  के मुताबिक वे 30 तारीख को भाजपा में आ जाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो क्या भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करेगी ये सवाल उठना स्वाभविक है। चूंकि चंपई  मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के कारण झामुमो छोड़कर आएंगे इसलिए वे उससे कम क्यों चाहेंगे ? लेकिन खबर ये है कि जो विधायक उनके साथ थे वे भी हेमंत के पास लौट गए। ऐसे में वे भाजपा का कितना फ़ायदा चुनाव में करवाएंगे ये अनिश्चित है। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना तोड़कर भाजपा के साथ आये एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर अपने पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का अवमूल्यन कर दिया। कुछ समय बाद एनसीपी के अजीत पवार भी सत्ता की खातिर साथ आ गए और उपमुख्यमंत्री बन बैठे। लेकिन लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में भाजपा को जबरदस्त नुकसान हुआ। पार्टी को ये समझना चाहिए कि इस तरह के नेताओं के साथ आने से पार्टी की छवि भी खराब हुई है। बिहार में नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश में चंद्रा बाबू नायडू के साथ गठबंधन का लाभ इसलिए हुआ क्योंकि वहाँ किसी तरह की तोड़ फोड़ नहीं हुई। ये देखते हुए भाजपा नेतृत्व को नई भर्ती के बारे में बेहद सावधान और सतर्क रहना चाहिए। जम्मू कश्मीर, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में उसका अपना संगठन है जिसमें अनुभवी और प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की विशाल संख्या है। बाहर से आने वालों पर रोक भले न लगे किंतु उन्हें सीधे टिकिट दे देना बुद्धिमत्ता नहीं है। ऐसा करने का नुकसान उठाने के बाद भी यदि भाजपा इस परिपाटी को जारी रखेगी तब उसे लोकसभा चुनाव जैसे नतीजों के लिए तैयार रहना होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी