Tuesday, 17 September 2024

हिंदुत्व के कमजोर होने का दुष्प्रचार देश विरोधी ताकतों का हौसला बढ़ा रहा


लोकसभा चुनाव के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया  जा रहा  है कि हिंदुत्व अब राजनीति का केंद्र बिंदु नहीं रहा। इसके उलट  समूचा राजनीतिक विमर्श  जाति और अल्पसंख्यकों पर सीमित हो गया है। राहुल गाँधी तो जातिगत जनगणना का मुद्दा देश की सीमा से निकालकर अमेरिका तक ले गए । उ.प्र में भाजपा की सीटें कम होने को इस तरह पेश किया जा  रहा है मानो केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया। फ़ैज़ाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा की पराजय पर राम मंदिर तक का मज़ाक बनाया जा रहा है।  इस प्रचार का असर मुस्लिम समुदाय पर सबसे ज्यादा देखा जा सकता है जिसको ये लगने लगा है कि  जैसा  श्री गाँधी बोलते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद कमजोर हो गए हैं और उनकी सरकार जल्द गिर जायेगी। यद्यपि  राजनेता इस तरह की शिगूफेबाजी करते ही रहते हैं । भाजपा भी अवसर मिलते ही श्री गाँधी को कठघरे में खड़ा करने का कोई अवसर नहीं गंवाती किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने से उत्साहित होकर जिस तरह की बयानबाजी वे कर रहे हैं उससे कुछ लोगों को ये लगने लगा है मानो उन्हें कुछ भी करने की स्वच्छंदता मिल गई हो। रेल की पटरियों पर पत्थर और लोहे की सलाखें रखने जैसी हरकतें जिस तेजी से बढ़ीं वे उसी स्वच्छंदता का परिचायक हैं। वक्फ बोर्ड  संशोधन को लेकर भी मुस्लिम समुदाय के मध्य बेहद भड़काऊ गतिविधियां देखने मिल रही हैं। जम्मू कश्मीर में धारा 370 की वापसी की डींग विधानसभा चुनाव में हाँकी जा रही है जबकि उस बारे में कुछ भी करना केंद्र के अधिकार क्षेत्र में है। राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बाद भी बाबरी मस्जिद को दोबारा बनाने जैसी बातें उछालकर देश का माहौल खराब करने का कुचक्र रचा जा रहा है। सबसे अधिक चिंता का विषय है हिन्दू धर्म स्थलों और धार्मिक आयोजनों पर पथराव और हमले होना। राजस्थान और गुजरात  से इसकी शुरुआत होने के बाद म.प्र में मुस्लिम समुदाय ने थाने पर हमला कर दिया। जब मुख्य अपराधी के अवैध निर्माण पर बुलडोजर चला तो यहाँ से लेकर दिल्ली तक आसमान सिर पर उठा लिया गया। वरिष्ट कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और जीतू पटवारी थाने पर हमले की निंदा करने के बजाय आरोपी के पक्ष में खड़े हो गए।  इस तरह की राजनीतिक शैली का ही परिणाम है कि गत दिवस म.प्र के तीन शहरों में मिलादुन्नबी जुलूस में शामिल लोगों द्वारा हिन्दू धर्मस्थलों पर पथराव के अलावा आपत्तिजनक गतिविधियां की गईं। लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण की रोटी खाने वाले नेता मुँह में दही जमाये बैठे हैं। इस प्रकार की घटनाओं को श्री गाँधी जैसे विपक्षी नेताओं का दुष्प्रचार ही प्रोत्साहन देता है  ।  आज मोदी सरकार ने अपने तीसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे कर लिए। प्रधानमंत्री इस दौरान पूरी तरह सक्रिय नजर आये। अपनी विकास संबंधी कार्ययोजना को वे जारी रखे हुए हैं। विदेशी मोर्चे पर भी उनका प्रभावशाली प्रदर्शन जारी है। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में ठोस कदम उठाने से भी वे पीछे नहीं हट रहे। सहयोगी दलों के साथ भाजपा का अच्छा समन्वय होने से केंद्र सरकार के स्थायित्व पर लगाई गई अटकलें हवा - हवाई साबित हुईं जो विपक्ष को विचलित कर रही हैं। अमेरिका यात्रा में श्री गाँधी की गैर जिम्मेदार बयानबाजी से ये लगने लगा है कि लोकसभा की 99 सीटें जीतकर कांग्रेस जिस प्रकार मदमस्त हुई थी  वह नशा उतरने लगा है। लेकिन समाज के एक वर्ग विशेष में जो ज़हर चुनाव के दौरान और बाद में बोया उसके चलते देश को कमजोर करने वाली ताकतें सिर उठाने से बाज नहीं आ रहीं। म.प्र के तीन शहरों  में मिलादुन्नबी  जुलूस के दौरान जिस तरह का उपद्रव मुस्लिम समुदाय की ओर से हुआ  उसकी प्रतिक्रिया भी यदि वैसी ही हो जाती तब पूरा प्रदेश अशांत हो जाता। इसलिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को चाहिए कि लोकसभा चुनाव के परिणाम को हिंदुत्व की भावना कमजोर होने के रूप में देखने की गलती न करें। उदाहरण के लिए हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में  बनी मस्ज़िद में किये गए अवैध निर्माण के विरुद्ध  हिन्दू  संगठन एकजुट होकर मैदान में उतर आये। पहले तो मौलवी  बात को घुमाते रहे और प्रदेश की कांग्रेस सरकार भी   उन्हें संरक्षण देती रही किंतु जब हिन्दू समुदाय का दबाव बढ़ा तब जाकर उसे तोड़ने की कारवाई करनी पड़ी। इससे उत्साहित हिन्दू संगठनों ने पूरे हिमाचल में अवैध रूप से बने मुस्लिम धर्मस्थलों के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी है। इसका असर पूरे देश में होने की चर्चा सुनाई देने लगी है। बेहतर होगा विपक्षी नेताओं की शह पर उन्माद में आ रहे मुस्लिम इस बात को समझें कि उनको मोहरा बनाया जा रहा है। हिंदुत्व का आभामंडल  फीका पड़ने की खुशफहमी जिनके मन में है वे उसे जितनी जल्दी निकाल दें उतना अच्छा । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 September 2024

आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की छवि पहले जैसी नहीं रही


दिल्ली के मुख्यमंत्री ने गत दिवस ऐलान कर दिया कि वे मंगलवार को अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे और जनता की अदालत से निर्दोष साबित होने के बाद ही गद्दी पर आसीन होंगे। उन्होंने ये घोषणा भी कर दी कि पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया भी कोई पद नहीं लेंगे। नया मुख्यमंत्री कौन होगा इस पर रहस्य बनाकर रखा गया है। जिन नामों की चर्चा हो रही है उनमें श्री सिसौदिया ही ऐसे  हैं जिनको  विकल्प माना जाता रहा है किंतु  अरविंद केजरीवाल की  राजनीतिक शैली पूरी तरह से आत्मकेंद्रित है जिसमें संगठन और सत्ता दोनों पर एकाधिकार बनाये रखा जाता है। इसीलिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने की घोषणा के साथ ही उन्होंने अपने सबसे निकटस्थ श्री सिसौदिया का रास्ता भी रोक दिया।  अब सवाल उठता है कि  जब उन्होंने जेल जाने के बाद भी इस्तीफ़ा नहीं दिया तब जमानत मिलने के बाद अचानक सत्ता त्याग करने का भाव उनके मन में कहाँ से आ गया ? और इसका सीधा - सीधा जवाब ये है कि अदालत द्वारा कार्यालय नहीं जाने और किसी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करने से रोक दिये जाने से आगामी विधानसभा चुनाव के पूर्व वे न तो नीतिगत निर्णय ले सकेंगे और न ही लोक - लुभावन घोषणाओं को लागू कर सकेंगे। ऐसे में किसी जनाधारविहीन व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाकर वे चुनाव तक शराब घोटाले से धूमिल हुई छवि को सुधारने का प्रयास करेंगे । उनकी चिंता का बड़ा कारण ये भी है कि लोकसभा चुनाव के पहले न चाहते हुए भी उन्हें जिस इंडिया गठबंधन में शामिल होना पड़ा उससे भी  नाता टूट चुका है। जिसके चलते हरियाणा में  कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन नहीं हुआ। दरअसल श्री केजरीवाल को इस बात की चिंता सताने लगी है कि लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें भाजपा ने जीत लीं। हालांकि 2014 और 2019 में भी ऐसा हो चुका है लेकिन तब कांग्रेस भी अलग से लड़ी थी ।  2024 के मुकाबले में  दोनों मिलकर लड़ने के बाद भी भाजपा के वर्चस्व को नहीं तोड़ सके जबकि विधानसभा और दिल्ली नगर निगम में आम आदमी पार्टी का कब्जा है। यही बात श्री केजरीवाल को चिंतित कर  रही है। पंजाब में भी विधानसभा चुनाव की ऐतिहासिक जीत को वे लोकसभा चुनाव में नहीं दोहरा सके। इसमें दो मत नहीं हैं कि दिल्ली का गढ़ अब पार्टी के लिए उतना मजबूत नहीं रहा। पिछले नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी के 134 पार्षद जीते जबकि भाजपा ने 106 सीटें जीतकर उसे कड़ी टक्कर दी।   हाल ही में निगम के 12 ज़ोन समितियों के चुनाव में भाजपा ने  7 ज़ोन में जीत हासिल कर निगम के वित्तीय प्रबंधन का नियंत्रण हासिल कर लिया।  श्री केजरीवाल  को ये बात अच्छी तरह समझ आ गई थी कि शराब घोटाले का निपटारा जल्द होने वाला नहीं है। ऐसे में उन्हें आये दिन अदालत में हाजरी देनी पड़ सकती है। और बड़ी बात नहीं दोबारा जेल जाना पड़े। ये भी सत्य है कि उनके और श्री सिसौदिया के जेल चले जाने से दिल्ली सरकार का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ। कैबिनेट की बैठकें नहीं होने से नीतिगत निर्णय लंबित होते गए। इसका असर विकास कार्यों पर भी पड़ा। जिन मोहल्ला क्लीनिक और शालाओं के कारण दिल्ली सरकार की जमकर तारीफ होती थी उनकी दशा भी खराब होने लगी। सबसे बड़ा नुकसान हुआ शराब नीति के लागू किये जाने से बढ़ी शराबखोरी से। दरअसल शराब सस्ती होने से दिल्ली में शराब की खपत में बेतहाशा वृद्धि हुई जिसका दुष्परिणाम सामाजिक वातावरण पर पड़ा। लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत में शराब नीति के विरोध में बना जनमत भी सहायक साबित हुआ। ये सब देखते हुए श्री केजरीवाल के सामने पद त्यागने के सिवाय और कुछ रास्ता था भी नहीं। जमानत पर बाहर आने के बाद भी उनकी स्थिति दाँत और नाखून विहीन शेर सरीखी थी। यद्यपि सत्ता से प्रत्यक्ष तौर पर हटने के बाद भी सरकार तो वे ही चलाएंगे और ऐसे किसी व्यक्ति को गद्दी पर बिठाएंगे जो भविष्य में चंपई सोरेन न बन जाए।  जल्दी चुनाव करवाने की उनकी योजना भी फ़िलहाल कारगर होती नहीं लगती। इसलिए अब वे कुर्सी में उलझे रहने के बजाय जनता के बीच जाकर छवि को हुए नुकसान की भरपाई करने का प्रयास करेंगे। उसमें उन्हें कितनी सफलता मिलेगी ये तो समय बताएगा किंतु जिस तरह पार्टी विथ डिफरेंस का भाजपाई दावा अपनी चमक खो बैठा ठीक वैसे ही आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की जो छवि भ्रष्टाचार विरोधी की बनी थी उसमें जबरदस्त कमी आई है। जिन भ्रष्ट नेताओं की सूची श्री केजरीवाल जारी किया करते थे उनके ही साथ उन्होंने गठबंधन कर लिया। दिल्ली शराब घोटाले की शिकायत कांग्रेस ने ही की थी और जब श्री सिसौदिया और श्री केजरीवाल गिरफ्तार हुए तो उसने उसका स्वागत भी किया। आज ही दिल्ली के वरिष्ट कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने उन पर हमला बोला है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 September 2024

अदालत ने केजरीवाल को पंख कटी चिड़िया बना दिया

आम आदमी पार्टी में उत्सव का माहौल है। उसके सबसे बड़े  नेता अरविंद केजरीवाल को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली शराब घोटाले में जमानत जो दे दी। दो न्यायाधीशों में से एक ने उनकी गिरफ्तारी को  पूरी तरह वैध माना जबकि दूसरे ने ईडी द्वारा की गई  गिरफ्तारी पर  जमानत मिलने के पहले ही सीबीआई  द्वारा  गिरफ्तारी  को अनुचित मानते हुए उसे पिंजरे में बंद तोते की छवि से बाहर निकलने की समझाइश दे डाली। बस फिर क्या था श्री केजरीवाल को विजेता के तौर पर पेश किया जाने लगा। वे भी महाबली के अंदाज में खुद को पेश करते नजर आये। पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने इसे न्याय की जीत बताते हुए  अपने पुराने आरोप दोहराए। सर्वोच्च न्यायालय ने उनको रिहा तो कर दिया किंतु  जमानत की शर्तों के अनुसार वे  न तो मुख्यमंत्री कार्यालय जा सकेंगे और न ही किसी फाइल पर हस्ताक्षर करने की अनुमति उन्हें रहेगी। संदर्भित प्रकरण के बारे में टिप्पणी करने और  गवाहों से मिलने  पर भी रोक लगा दी गई है। साथ  ही 10 लाख रु. का बॉन्ड भी भरना होगा। भाजपा द्वारा उनसे  पद छोड़ने  की मांग किया जाना तो नितांत स्वाभाविक है किंतु कांग्रेस ने भी आम आदमी पार्टी द्वारा मनाई जा रही खुशी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने श्री केजरीवाल को दोषमुक्त नहीं किया केवल जमानत दी है। पार्टी प्रवक्ता आलोक शर्मा ने  अनुसार अभी आरोप पत्र दाखिल है और ऐसे में जमानत को क्लीन चिट नहीं माना जा सकता। यद्यपि कांग्रेस  अपनी प्रतिक्रिया को यहीं तक सीमित रखते हुए उनसे त्यागपत्र मांगने  से बची जिसका कारण संभवतः हरियाणा विधानसभा के चुनाव हैं जिनमें राहुल गाँधी की इच्छा के बावजूद दोनों पार्टियों में गठबंधन नहीं हो सका। चूंकि श्री केजरीवाल अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक होंगे इसलिए कांग्रेस उन्हें ज्यादा नाराज नहीं करना चाहती क्योंकि आम आदमी पार्टी द्वारा उम्मीदवार उतारे जाने से भाजपा विरोधी मतों में विभाजन से कांग्रेस को नुकसान होने का खतरा बढ़ गया है । कुछ राजनीतिक विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि श्री केजरीवाल को जमानत मिलने के पीछे भी केंद्र सरकार का नर्म रवैया रहा। उसे लगने लगा था कि  मामले के निपटारे में लंबा समय लगेगा। चूंकि मनीष सिसौदिया , संजय सिंह और के. कविता सहित एक अन्य आरोपी जमानत पा चुके थे अतः श्री केजरीवाल को जेल में रखने का औचित्य नहीं बचा था। लेकिन  जेल रूपी पिंजरे से  बाहर आने के बाद भी उनकी स्थिति पंख कटी चिड़िया जैसी है । जिस मुख्यमन्त्री को अपने कार्यालय जाने की अनुमति न हो और न ही वह किसी फाइल पर हस्ताक्षर कर सकता हो उसका पद पर बना रहना मजाक ही है। लेकिन श्री केजरीवाल का रवैया समझ से परे है। उनमें यदि जरा भी स्वाभिमान होता तो वे अदालत में मांग रखते कि जमानत पर रिहा होने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में उनके दायित्वों का  निर्वहन करने का अधिकार मिले। लेकिन वे जेल से बाहर आने के लिए इतने आतुर थे कि  सभी शर्तों को सिर झुकाकर मान लिया। दिल्ली में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होंगे। सवाल ये है कि क्या तब तक वहाँ की सरकार ऐसे मुख्यमंत्री के मातहत चलेगी जो शासन चलाने से वंचित कर दिया गया हो। स्वतंत्रता के बाद ये पहला अवसर है जब कोई मुख्यमंत्री जेल जाने के बाद भी गद्दी नहीं छोड़ रहा और अधिकार विहीन होने के बाद भी पद पर बना हुआ है। सही बात तो ये है कि श्री केजरीवाल ने पार्टी के भीतर वैकल्पिक नेतृत्व की गुंजाइश छोड़ी ही नहीं। बीच में तो उन्होंने पार्टी और सरकार चलाने का जिम्मा अनौपचारिक तौर पर अपनी पत्नी को सौंप दिया था जो जेल में उनसे मिलकर निर्देश लाती थीं। हालांकि जेल जाने के बाद लंबे समय तक मनीष सिसौदिया और सत्येंद्र जैन ने भी मंत्री पद नहीं छोड़ा था किंतु बाद में उनसे तो त्यागपत्र दिलवा दिया गया किंतु श्री केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करने का खतरा मोल नहीं लिया। हरियाणा विधानसभा चुनाव में पार्टी की ओर से जारी स्टार प्रचारकों की सूची में उनके बाद दूसरे स्थान पर उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल का नाम होना काफी कुछ कह जाता है। इस प्रकार श्री केजरीवाल जमानत पर बाहर आकर भी अदालत द्वारा  मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने से रोक दिये गए जो उनके गाल पर तमाचे से कम नहीं है। आम आदमी पार्टी चाहे कुछ भी कहे किंतु निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ने ईडी और सीबीआई द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र को रद्द करने से इंकार कर दिया। ऐसे में  जमानत पर जेल से बाहर आये श्री केजरीवाल अपनी पार्टी के नेता भले हों किंतु बतौर मुख्यमंत्री उनकी शक्तियां छीन ली गईं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 September 2024

राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथ का एकमात्र चेहरा थे सीताराम


मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी के निधन से वामपंथी राजनीति का एक मजबूत स्तंभ ढह गया। स्व. सीताराम एक मेधावी छात्र रहे और दिल्ली के प्रसिद्ध जेएनयू से  स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित की । छात्र जीवन से ही उनका झुकाव साम्यवादी  विचारधारा के प्रति हो गया था। स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़कर वे जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे। साम्यवादी राजनीति के  सीपीएम धड़े से संबद्ध होने के कारण आपातकाल में जेल भी गए। उल्लेखनीय है सीपीआई नामक साम्यवादी पार्टी ने इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का समर्थन किया था। बाद में श्री येचुरी  सीपीएम के महासचिव भी बने जो  पार्टी संगठन में सबसे बड़ा पद होता है। पार्टी ने उन्हें प. बंगाल से राज्यसभा में  भेजा जहाँ प्रभावशाली प्रदर्शन के आधार पर उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद भी चुना गया। सांसद और पार्टी महासचिव न रहने के बाद भी वे राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा विरोधी खेमे को एकजुट करने में लगे रहते थे। यद्यपि वामपंथी विचारधारा का प्रभाव धीरे - धीरे  लुप्त होने लगा किंतु श्री येचुरी अपनी सक्रियता के कारण विपक्षी राजनीति के एक महत्वपूर्ण रणनीतिकार बने रहे। प. बंगाल में वामपंथी सत्ता के पराभव के बाद केवल केरल में  ही साम्यवादी सरकार बच रही है। लेकिन एक विरोधाभास जो देखने मिलता है वह है उक्त दोनों राज्यों में सीपीएम और कांग्रेस के बीच का रिश्ता। प. बंगाल में जहाँ वामपंथी और कांग्रेस ममता बनर्जी के विरुद्ध एकजुट हैं वहीं केरल में  एक दूसरे के विरोध में हैं। इसकी वजह ये रही कि स्व. येचुरी जहाँ भाजपा के विरोध में कांग्रेस सहित शेष विपक्ष से निकटता के पैरोकार रहे वहीं सीपीएम के एक और कद्दावर नेता प्रकाश कारत अपनी कट्टरवादी सोच के चलते एकला चलो की सोच रखते थे। प. बंगाल में ज्योति बसु , सोमनाथ चटर्जी और बुद्धदेव भट्टाचार्य का दौर समाप्त होने के बाद वहाँ स्व. येचुरी का प्रभाव बढ़ा जबकि श्री कारत के चलते केरल में वामपंथी मोर्चा कांग्रेस और भाजपा दोनों को राजनीतिक दुश्मन समझता है। हालिया लोकसभा चुनाव में प. बंगाल में वामपंथी और कांग्रेस एकजुट होकर ममता बनर्जी के विरुद्ध लड़े। वहीं केरल में वामपंथियों और कांग्रेस में मुकाबला हुआ। यहाँ तक कि वायनाड सीट पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध सीपीआई दिग्गज डी. राजा की पत्नी खड़ी हो गईं। वामपंथी मोर्चे ने श्री गाँधी से इस सीट से न लड़ने का आग्रह भी किया। ये सब तब हुआ जब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस, वामपंथी और ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन में शामिल होकर भाजपा को रोकने एकजुट थे। वामपंथी विचारधारा के प्रति घटते रुझान का कारण यही विरोधाभासी नीति थी किंतु ये भी सही है कि राष्ट्रीय राजनीति में उसकी उपस्थिति जिस एक शख्स के कारण बनी हुई थी वह सीताराम येचुरी ही थे। उनके महत्व का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेपाल में माओवादी सत्ता काबिज हो जाने के बाद जब वहाँ के वामपंथी नेताओं में आपसी मतभेद उभरे तब मध्यस्थता के लिए स्व. येचुरी को बुलाया गया। इसका कारण उनकी समझ और राजनीतिक अनुभव ही था। उनके साथ असहमति रखने वाले श्री कारत का मानना रहा कि भाजपा के अंध विरोध में कांग्रेस और सपा तथा राजद जैसे जातिवादी दलों के पिछलग्गू बने रहने से वामपंथी आंदोलन कमजोर हो रहा है। जेएनयू के अध्यक्ष रहे चर्चित वामपंथी छात्र नेता कन्हैया कुमार का कांग्रेस में जाना इसका उदाहरण बन गया। लेकिन स्व. येचुरी को वामपंथी कट्टरता की बजाय भाजपा के विरोध में विपक्ष का एकीकरण ज्यादा पसंद था। दरअसल वे इस बात को भाँप चुके थे कि वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में कभी नहीं लौट सकेंगे। केरल के अलावा चंद विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति में ही उनका प्रभाव शेष रह गया है। प. बंगाल में अब वह स्थानीय निकाय जीतने योग्य भी नहीं बचे। लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतना तो दूर रहा।  प. बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बनने के बाद  केरल में भी भाजपा जिस तेजी से तीसरी राजनीतिक ताकत बन रही है उसे देखते हुए वामपंथी राजनीति का भविष्य अंधकारमय लगता है। बावजूद इसके अपनी संपर्क शैली और लचीले स्वभाव के कारण स्व. येचुरी  एक महत्वपूर्ण शख्सियत बने रहे। उन्होंने युवावस्था में वामपंथ का उभार भी देखा और प्रौढ़ावस्था में उसके  ढलान पर जाने के भी  साक्षी बने। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि दिल्ली की राजनीतिक बिरादरी में वे वामपंथ के अकेले चेहरे थे। उनका न रहना  साम्यवादी विचारधारा की बड़ी क्षति है क्योंकि उनका कोई विकल्प फ़िलहाल नजर नहीं आता।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 September 2024

12 वर्ष तक के सभी बच्चों को आयुष्मान योजना में शामिल किया जाए

लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 70 साल और उससे अधिक के सभी बुजुर्गों को आयुष्मान योजना के अंतर्गत प्रति वर्ष 5 लाख रु. तक का चिकित्सा बीमा  निःशुल्क  देने का जो वायदा किया था उसे गत दिवस केंद्र सरकार ने पूरा कर दिया। अब तक गरीब वर्ग को ही यह सुविधा थी किंतु इस योजना के अंतर्गत किसी भी  आय वर्ग के बुजुर्ग को एक साल में 5 लाख तक का इलाज निःशुल्क करवाने की  व्यवस्था की गई है। जिन गरीब बुजुर्गों के पास पहले से आयुष्मान कार्ड हैं उन्हें 5 लाख रु. का अतिरिक्त बीमा नई योजना में मिलेगा और जो  अपने साधनों से चिकित्सा बीमा करवाते आ रहे हैं वे भी लाभान्वित होंगे। इस प्रकार हर व्यक्ति 70 वर्ष का होते ही आयुष्मान योजना के अंतर्गत आ गया फिर चाहे वह धनकुबेर रतन टाटा हों या फिर रोज कमाने, रोज खाने वाला श्रमिक। पहले उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी सरकार तीसरी पारी के पहले बजट में ही चुनावी वायदे को पूरा कर देगी किंतु उस समय तत्संबंधी घोषणा नहीं की गई। अब जबकि कुछ ही दिनों में हरियाणा और जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं तब उक्त ऐलान को भाजपा का चुनावी दाँव भी कहा जा सकता है। लेकिन केंद्र सरकार ने आर्थिक स्थिति रूपी विभाजन रेखा को दूर करते हुए चूंकि केवल 70 वर्ष की आयु को आधार बनाया है इसलिए देश भर के वृद्ध जन इससे राहत महसूस कर रहे होंगे। भारत में औसत आयु  निरंतर वृद्धि की ओर है । इसके साथ ही एक नई समस्या बुजुर्गों के अकेलपन की भी उठ खड़ी हुई है। संयुक्त परिवारों के टूटने से भी माता - पिता को वृद्धावस्था में एकाकीपन झेलने मजबूर होना पड़ रहा है। कामकाज के लिए अपना गाँव या शहर छोड़कर बाहर जाने का सिलसिला तो बहुत पुराना है किंतु अब तो बड़ी संख्या में युवा शिक्षा हेतु भी दूसरे शहर तो क्या विदेश तक जाने लगे हैं और फिर वहीं नौकरी कर बस जाते हैं। इन सब वजहों से अकेले रह रहे बुजुर्गों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। और जब वे बीमार पड़ते हैं तब इलाज हेतु तत्काल पैसे की व्यवस्था के अलावा भागदौड़ उनका हौसला तोड़ देती है। हर किसी के पास घर में इतनी नगदी भी नहीं होती जितनी निजी अस्पताल में भर्ती होते ही जमा करवानी पड़ती है। जिन सेवा निवृत शासकीय कर्मचारियों को निःशुल्क इलाज की सुविधा है , उनके अलावा जो बुजुर्ग निजी तौर पर चिकित्सा बीमा करवाकर रखते हैं वे तो आकस्मिक स्थिति उत्पन्न होने पर निश्चिंत होकर अस्पताल जाकर भर्ती हो जाते हैं किंतु निम्न और मध्यम आय वर्ग में बहुत बड़ी संख्या उन बुजुर्गों की है जिनके पास चिकित्सा संबंधी किसी भी प्रकार का सुरक्षा चक्र नहीं है। केंद्र सरकार की ताजा घोषणा से उनको बहुत बड़ी मानसिक शांति प्राप्त हुई है।  इसका कितना लाभ भाजपा को आने वाले चुनावों में मिलेगा ये बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी ये कि केंद्र सरकार ने देश भर के बुजुर्गों को पारिवारिक भावना का एहसास करवाया है। लेकिन इस  बात की निगरानी सरकारी तौर पर रखी जानी चाहिए कि निजी अस्पताल वाले इन बुजुर्गों को परेशान न करें। कोरोना के दौरान ये देखने मिला था कि निःशुल्क चिकित्सा सुविधा प्राप्त शासकीय कर्मचारियों के अलावा चिकित्सा बीमा धारकों को अग्रिम भुगतान किये बिना निजी अस्पतालों में भर्ती करने से इंकार कर दिया गया। ये शिकायत बाद में भी आती रही। इसका कारण सरकार द्वारा अस्पतालों को समय पर भुगतान नहीं किया जाना रहा। लेकिन ये भी सच है कि देश भर में अनेक निजी अस्पतालों के लिये आयुष्मान योजना रुपये छापने की मशीन बन गई। बड़े पैमाने पर फर्जीबाड़े  सामने आने के बाद इसकी उपयोगिता और सार्थकता पर सवाल भी उठे।  अब चूंकि  70 साल के हो चुके  समस्त  बुजुर्गों को आयुष्मान योजना में शामिल कर लिया गया है तब स्थानीय प्रशासन को ये सतर्कता रखनी होगी कि किसी भी वृद्ध को इलाज से वंचित न होना पड़े। आयुष्मान योजना निश्चित रूप से स्वस्थ भारत की कल्पना को साकार करने की दिशा में क्रांतिकारी कदम थी। उसमें प्रत्येक आय वर्ग के वृद्धों को शामिल करने से केंद्र सरकार की संवेदनशीलता का पता चलता है किंतु  इसे एक पायदान और ऊपर ले जाते हुए कम से कम 12 वर्ष तक के  सभी बच्चों को भी इसके अंतर्गत लाना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि बच्चों का इलाज भी महंगा होता जा रहा है।  विकसित भारत के लिए देश के भविष्य को स्वस्थ रखना बेहद जरूरी है। वैसे तो शिक्षा और स्वास्थ्य पूरी तरह से सरकार का दायित्व होना चाहिए किंतु जब तक ऐसा नहीं होता तब तक जिस तरह वृद्ध जनों के प्रति केंद्र  सरकार ने अपनी संवेदनशीलता दिखाई वैसी ही नई पीढ़ी के नौनिहालों हेतु भी सामने आनी चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 September 2024

विदेशों में आरक्षण और जातिगत जनगणना की चर्चा से बचना चाहिए


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इन दिनों अमेरिका में हैं। लोकसभा में  नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद इस देश की उनकी यह पहली यात्रा है। लोकसभा चुनाव में 2014 और 2019 की अपेक्षा अधिक सफलता मिलने से उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा हुआ है। आक्रामक शैली में दिये जा रहे बयान इसका प्रमाण हैं। हालांकि वे जो कुछ भारत में बोलते हैं ज्यादातर वही बातें अमेरिका में उनके द्वारा कही जा रही हैं किंतु कुछ मुद्दों पर वे आपत्तिजनक बातें बोल गए जिन पर देश के भीतर विपरीत प्रतिक्रिया हो रही है।  वॉशिंगटन के निकट वर्जीनिया में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि लड़ाई इस बात की है कि क्या एक सिख को भारत में पगड़ी या कड़ा पहनने का अधिकार है या नहीं? या एक सिख के रूप में वह गुरुद्वारा जा सकते हैं या नहीं? लड़ाई इसी बात के लिए है और यह सिर्फ उनके लिए ही नहीं बल्कि सभी धर्मों के लिए है। इस बयान से ये आशय निकलता है मानों भारत में सिखों को पगड़ी और कड़ा पहिनने से रोका जा रहा हो। उनका यह बयान अमेरिका, कैनेडा और ब्रिटेन में कार्यरत खालिस्तान समर्थक संगठनों का हौसला बुलंद करने वाला है। इसके अलावा उन्होंने लोकसभा चुनाव पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि यदि ईमानदारी से होते तो एनडीए को 246 सीटों से ज्यादा नहीं मिलतीं। उनका ये कहना भी  अपरिपक्वता को दर्शाता है कि 2014 के बाद भारत ऐसे दौर में पहुँच गया है जहाँ लोकतंत्र की नींव पर हमला हो रहा है। लेकिन जो सबसे खतरनाक बात वे पूरे दौरे में दोहराते रहे वह है आरक्षण और जातिगत जनगणना पर उनकी वही टिप्पणियां जो वे देश में करते आये हैं। उन्होंने दलित, आदिवासी और पिछड़ों के प्रति निष्पक्ष न होने की बात करते हुए सरकारी और अन्य क्षेत्रों के साथ ही मीडिया में भी उनकी हिस्सेदारी का शिगूफा छोड़ दिया जो चौंकाने वाला है। उल्लेखनीय है कुछ दिनों पहले प्रयागराज में दिये  अपने भाषण में उन्होंने दलित और आदिवासी समाज से किसी के मिस इंडिया न बनने जैसा बचकाना मुद्दा उठाया था। जहाँ तक जातिगत जनगणना का प्रश्न है तो उनका कहना है कि इसके जरिये जो आंकड़े मिलेंगे उनके आधार पर  विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी तय करने की नीति बनाई जावेगी। इसके लिए उन्होंने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक करने की बात भी कही। लेकिन आज तक श्री गाँधी ये स्पष्ट नहीं कर सके कि जिन्हें वे 90 फीसदी बताते हैं उनके बीच हिस्सेदारी का बंटवारा कैसे होगा? जातिगत जनगणना में क्या मुसलमान भी आयेंगे जिनके बीच हिंदुओं से अधिक जातियाँ हैं ।  धर्म परिवर्तन  कर ईसाई बने दलितों की क्या स्थिति रहेगी क्योंकि उस धर्म में तो जाति है ही नहीं। राहुल द्वारा मीडिया में हिस्सेदारी की जो चर्चा छेड़ी वह भी बेतुकी है क्योंकि आज तक चाहे पत्रकारिता हो या फिल्में और टीवी, उनमें कभी जाति का सवाल उठा ही नहीं। हिन्दी फिल्मों के तीन बड़े नायक मुस्लिम हैं। उनकी फ़िल्मों को मिलने वाली सफलता के पीछे  हिन्दू दर्शक ज्यादा होते हैं। स्व. मो. रफी की जयंती पर मुस्लिम तो शायद ही कुछ करते हों किंतु हिन्दू आगे - आगे नजर आते हैं। टीवी धारावाहिकों के कलाकारों की जाति और धर्म कभी मुद्दा नहीं बना। महाभारत में अर्जुन की भूमिका मुस्लिम ने निभाई थी। इसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में जातिगत प्रतिनिधित्व जैसी बात कभी सोचने में भी नहीं आई। दलित जातियों पर हुए अत्याचारों पर पत्रकार सदैव मुखर रहे। आरक्षण को लेकर श्री गाँधी द्वारा जो कुछ कहा जा रहा है उसके पीछे की राजनीति किसी से छिपी नहीं है। लेकिन वे भूल रहे हैं कि इस तरह के मुद्दों पर लंबे समय तक राजनीति नहीं की जा सकती वरना मायावती, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव अपने इर्द - गिर्द ऊँची जातियों के लोगों को न रखते। उल्लेखनीय है लोकसभा के लिए चुन जाने के बाद  उ.प्र विधानसभा में  अपने स्थान पर नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए अखिलेश ने एक ब्राह्मण विधायक को चुना। यदि श्री गाँधी इस पर आपत्ति करते तब लगता कि उनके मन में वंचित वर्ग के लिए हमदर्दी है। कुल मिलाकर ये लगता है वे बजाय दूरगामी सोच के तात्कालिक लाभ की नीति पर चल रहे हैं जो उनके और कांग्रेस के लिए तो खतरनाक है ही देर सवेर इंडिया गठबंधन के लिए भी मुसीबत पैदा करेगा। देश के जिन राज्यों में भी पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति होती है उनमें से ज्यादातर में कांग्रेस घुटनों के बल पर है। राहुल जिस रास्ते पर चल रहे हैं वह भटकाव भरा तो है ही, उसमें गड्ढे भी बहुत हैं। अमेरिका में जहाँ जाति और धर्म किसी को अवसर देने के आधार नहीं होते वहाँ इस तरह की बातें करने का कोई लाभ नहीं। भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने ये पूछने का दुस्साहस नहीं किया कि उनमें कितने दलित, आदिवासी या पिछड़े हैं क्योंकि उनको पता है कि  विदेशों में कार्यरत भारतीय योग्यता के बल पर गए न कि आरक्षण के। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी भारत में योग्य लोगों को ही रोजगार देती हैं। ये सब देखते हुए जातिगत जनगणना और आरक्षण जैसे मुद्दे विदेशों में उठाने से बचना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 September 2024

जीवन और चिकित्सा बीमा पर जीएसटी हटाने काउंसिल की विशेष बैठक जल्द हो

जीएसटी काउंसिल की गत दिवस हुई बैठक के पहले ये उम्मीद जताई जा रही थी कि उसमें जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर लगने वाले जीएसटी को खत्म कर दिया जाएगा। इसका कारण न तो केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मन में उत्पन्न करुणा थी और न ही गैर भाजपा शासित राज्यों के वित्त मंत्रियों की ओर से आया दबाव। दरअसल ये उम्मीद जगाई केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी द्वारा श्रीमती सीतारमण को लिखे उस पत्र ने जिसमें उन्होंने जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर लगने वाले जीएसटी को हटाये जाने का अनुरोध किया था। चूंकि उन्होंने उस पत्र को सार्वजनिक कर दिया इसलिए पूरे देश में वह चर्चा का विषय बन गया। और कोई मंत्री होता तब शायद श्रीमती सीतारमण उसके पत्र को नजरंदाज भी कर देतीं किंतु चूंकि श्री गडकरी न केवल वरिष्ट अपितु बेहद लोकप्रिय मंत्री हैं लिहाजा उनके सुझाव पर जीएसटी काउंसिल में चर्चा हुई। उस सुझाव का विरोध करने का साहस किसी भी राज्य के वित्त मंत्री में नहीं था क्योंकि वैसा करने पर उसकी छवि जनता की निगाह में खलनायक की बन जाती । बैठक के पहले से ही समाचार माध्यमों में श्री गडकरी के सुझाव को माने जाने सम्बन्धी खबरें भी आने लगीं जिसकी सुखद प्रतिक्रिया भी हुई। लेकिन बैठक खत्म होने के बाद जब उसका विवरण आया तो ये जानकर सारा उत्साह ठंडा हो गया कि सभी सदस्य जीवन एवं स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी घटाने तो सहमत हो गए किंतु वह कितना कम हो इसका निर्णय अगली बैठक में होगा जो संभवतः नवम्बर में होगी। वित्तीय मामलों में जल्दबाजी से कोई फैसला लेना आसान नहीं होता क्योंकि उसके दूरगामी परिणाम होते हैं। जीएसटी केंद्र और राज्य सरकारों की आय का बड़ा या यूँ कहें कि मुख्य स्रोत है। ऐसे में उससे होने वाली आवक को कोई सरकार नहीं खोना चाहती। लेकिन लोककल्याणकारी शासन व्यवस्था में सरकार का लक्ष्य केवल धनोपार्जन न होकर जनहित होता है। जीएसटी जब लागू हुआ था तब यह आश्वासन दिया गया था कि पूरे देश में करों की दर एक समान होगी।  साथ ही ये भी कहा गया कि दरों के स्तर कम होंगे। वैसे आदर्श व्यवस्था तो यह होती कि विलासिता की वस्तुओं को छोड़कर बाकी वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी की एक ही दर 8 या अधिकतम 12  प्रतिशत रहती किंतु ऐसा न करते हुए उसमें प्रयोग होते रहे। सालों बीत जाने के बाद भी आज तक उसकी व्यवस्था में स्थायित्व नहीं आया जिसके चलते आये दिन कोई न कोई नया आदेश आता रहता है। पेट्रोल और डीजल को जीएसटी से मुक्त रखने की मांग लगातार होने के बावजूद जीएसटी काउंसिल का एक भी सदस्य इस पर सहमत नहीं है जिससे ये लगता है कि जनता का तेल निकालने में सभी पार्टियों के बीच संगामित्ती है। भाजपा विरोधी जो पार्टियां पेट्रोल - डीजल के दाम ज्यादा होने पर केंद्र सरकार को कठघरे  में खड़ा करती हैं उनके द्वारा शासित राज्यों ने भी जीएसटी काउंसिल में कभी इस मुद्दे को नहीं उठाया । गत दिवस हुई बैठक में यदि केन्द्रीय वित्त मंत्री जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी खत्म करने या कम करने का पूरा प्रस्ताव बनाकर लातीं तब शायद उसके स्वीकृत होने में कोई अड़चन नहीं आती किंतु लगता है श्री गडकरी के पत्र के कारण बैठक में वह विषय उठाकर रस्म अदायगी कर ली गई और फैसले को नवम्बर तक टरका दिया गया। ये भी हो सकता है श्री गडकरी को इसका श्रेय न मिले इसलिए ऐसा किया गया। यूँ तो कल की बैठक में अनेक चीजों और सेवाओं पर जीएसटी की दरें कम या ज्यादा की गईं जिनमें कैंसर की दवाओं पर 12 से घटाकर 5 प्रतिशत जीएसटी लगाने का निर्णय भी है। लेकिन सही मायनों में तो कैंसर सदृश बीमारी के उपचार से जुड़ी किसी भी चीज पर जीएसटी लगना ही नहीं चाहिए ।  हो सकता है ऐसा न करने के पीछे कोई बड़ी मजबूरी  हो किंतु शिक्षा और चिकित्सा से जुड़ी चीजों और सेवाओं पर कम से कम कर होना अपेक्षित है। यदि जीएसटी काउंसिल के सदस्यों के मन में जरा भी मानवीयता है तो उन्हें विशेष बैठक बुलाकर जीवन और चिकित्सा बीमा को जीएसटी मुक्त कर देना चाहिए क्योंकि ये आम आदमी को सीधे प्रभावित करते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी