Wednesday, 25 September 2024
शेयर बाजार की उछाल के बीच छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा जरूरी
Tuesday, 24 September 2024
ओवैसी के बयान ने खोल दी वक्फ की पोल
वक्फ संशोधन विधेयक भले ही अभी जेपीसी के पास विचारार्थ हो किंतु उ.प्र के कौशाम्बी जिले में ग्राम सभा की 96 बीघा भूमि उससे वापस लेकर ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का एस. डी. एम का फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है। यह प्रकरण 1946 से लंबित था। वक्फ बोर्ड का दावा था कि अलाउद्दीन खिलजी के जमाने में बतौर माफीनामा वह भूमि मिली थी । सरकारी रिकार्ड में भी वह वक्फ संपत्ति दर्शाई गई थी किंतु 2 साल पहले यह खुलासा हुआ कि वह ग्राम सभा की भूमि है और उसके बाद अदालती आदेश पर उसे वापस ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दिया गया। इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट राज्य शासन द्वारा मंगवाकर अवैध तौर पर हड़पी गई जमीनें एवं अन्य संपत्तियाँ वापस लेने की मुहिम शुरू किये जाने की खबर से वक्फ बोर्ड में घबराहट है। कौशाम्बी जैसे मामले पूरे प्रदेश में होने की आशंका जताई जा रही है। राज्य की पिछली गैर भाजपा सरकारों में मुस्लिम वोट बैंक के लालच में वक्फ के अवैध कब्जों वाली संपत्तियों को छीनने का साहस ही नहीं हुआ । लिहाजा सार्वजनिक भूमि को वक्फ का बताकर अवैध कब्जे होते रहे। वक्फ संशोधन का विरोध करने के साथ ही मुस्लिम समुदाय द्वारा देश भर में हिंदुओं के धर्मस्थल के अलावा सरकारी इमारतों तक को वक्फ संपत्ति बताकर खाली करने का दबाव बनाया जा रहा है। इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हिन्दू समाज में देखने मिल रही है। इसी के चलते उ.प्र की योगी सरकार कौशाम्बी प्रकरण को आधार बनाकर पूरे राज्य में वक्फ के कब्जे वाली संपत्तियों की वैधानिकता जाँचने जा रही है। मुस्लिम समाज इससे भन्नाया हुआ है। उसकी हमदर्द सामजवादी पार्टी तथा कांग्रेस के पेट में भी मरोड़ होने लगा है क्योंकि वक्फ संशोधन के पक्ष में वे हिन्दू भी खड़े नजर आ रहे हैं जिन्होंने गत लोकसभा चुनाव में भाजपा के विरोध में मतदान किया था। दरअसल जबसे हिंदुओं के संज्ञान में ये बात आई कि वक्फ जिस संपत्ति पर अपना दावा कर दे वह बिना किसी लागलपेट के उसकी हो जायेगी, तबसे उनके बीच भय व्याप्त है। विशेष रूप से मंदिरों जैसे धार्मिक स्थलों पर वक्फ के दावों की आशंका चिंता बढ़ा रही है। लेकिन कुछ दिनों पहले मुस्लिम समाज के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के भाषण का एक वीडियो तेजी से प्रसारित हुआ जिसमें वे मुसलमानों को वक्फ संशोधन का विरोध करने हेतु प्रेरित करने के साथ ही ये भी बोल गए कि उक्त विधेयक पारित होने पर वक्फ के हाथ से बड़े पैमाने पर संपत्तियाँ निकल जाएंगी। इसके बाद उन्होंने वह राज खोल दिया जिसके कारण मुस्लिम समाज इस संशोधन से भड़का हुआ है। ओवैसी ने खुले मंच से मुसलमानों को आगाह किया कि उ.प्र में वक्फ के आधिपत्य में जो 1.21 लाख संपत्तियाँ हैं उनमें से 1.12 लाख के वैधानिक दस्तावेज नहीं हैं। इसलिए वक्फ संशोधन कानून में बदला तो बिना दस्तावेज वाली संपत्तियाँ उसके हाथ से छिन जाएंगी। ओवैसी के इस बयान ने वक्फ के नाम पर देश भर में किये गए अवैध कब्जों की पोल खोलकर रख दी। लेकिन उ.प्र के कौशाम्बी में ग्राम सभा की 96 बीघा भूमि वक्फ से छीने जाने के बाद से योगी सरकार जिस तरह वक्फ के फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करने सक्रिय हुई वह अन्य राज्यों के लिए एक सबक है। यदि भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा शासित राज्यों में भी वक्फ द्वारा बिना वैधानिक दस्तावेजों के कब्जा की गई जमीनों एवं अन्य संपत्तियों को वापस लेने का अभियान छेड़ दिया गया तब गैर भाजपा राज्य सरकारें भी वैसा करने बाध्य होंगी। इस प्रकार संदर्भित संशोधन पारित होने के पहले ही वक्फ के कर्ताधर्ताओं में हड़कंप मचा हुआ है। इस बारे में ये बात भी ध्यान देने वाली है कि भले ही मौलवियों के दबाव में मुस्लिम समुदाय इस संशोधन का विरोध कर रहा हो किंतु एक वर्ग ऐसा है जो वक्फ संपत्ति पर समाज के कुछ लोगों द्वारा कब्जा कर उसका लाभ लेने से नाराज हैं। ये आरोप भी लग रहा है कि वक्फ बोर्ड के कब्जे वाली संपत्तियों का समुचित रखरखाव न होने से उनसे अपेक्षित आय नहीं होती और समाज के जरूरतमंद लोगों के कल्याण के कार्यक्रम अधर में अटक जाते हैं। ये चर्चा भी है कि वक्फ की अनेक संपत्तियों से होने वाली कमाई कुछ प्रभावशाली लोगों की जेब में चली जाती है। इस तरह की शिकायतें हिंदुओं सहित अन्य धर्मों के न्यासों में भी हैं किंतु वक्फ के पास सेना और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीनें हैं। इसलिए उसमें होने वाले घोटाले भी बड़े ही होंगे। ओवैसी ने तो केवल उ.प्र का खुलासा किया है। बाकी राज्यों में भी यही स्थिति हो तो अचरज नहीं होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 23 September 2024
रेल पटरियों पर अवरोध जनता को भयभीत करने का षडयंत्र
कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी, दिल्ली में किसानों का धरना, जेएनयू, जामिया मिलिया, जादवपुर, उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि में छात्र आंदोलन, दिल्ली के शाहीन बाग का धरना आदि को व्यवस्था विरोधी प्रयोग कहा गया। उनका एकमात्र निहित उद्देश्य केंद्र में बैठी मोदी सरकार को अस्थिर करना था। किसान आंदोलन की आड़ लेकर पंजाब में नये सिरे से सिर उठाने वाला खालिस्तानी आंदोलन उसकी अगली पायदान बना। इसे कैनेडा, अमेरिका और ब्रिटेन में बैठे अलगाववादी संगठनों का समर्थन मिलना अपने आप में काफी कुछ कह देता है। नागरिकता संशोधन जैसे कानूनों का भी जिस प्रकार संगठित विरोध हुआ वह किसी सुनियोजित षडयंत्र का हिस्सा ही था। उसी की पुनरावृत्ति वक्फ संशोधन को लेकर सामने आई है। देश में एक वर्ग ऐसा है जो राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत होते देख जल - भुन रहा है। यहाँ तक कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार और भारत विरोधी भावनाओं के भड़कने से भी ये तबका मन ही मन प्रसन्न है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से कुछ लोग इस बात का प्रचार करने में जुटे हुए हैं कि हिंदुत्व भारतीय राजनीति में प्रासंगिक हो गया है और जनता पर उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। इस अवधारणा को मीडिया का एक संगठित समूह जमकर हवा दे रहा है। यही वजह है कि श्री मोदी से परेशान राष्ट्रविरोधी शक्तियों का हौसला बुलंद हो रहा है। जिसका ताजा प्रमाण है रेल पटरियों पर पत्थर, लोहे की सलाखें और गैस के सिलेंडर रखकर गाड़ियों को दुर्घटनाग्रस्त करने की कोशिशों में अचानक वृद्धि होना। गत दिवस म.प्र में सेना से जुड़ी एक रेलगाड़ी की पटरी पर विस्फोटक रखे पाए गए। पहली बार जब ऐसी खबर आई तब लगा कि ये किसी सिरफिरे की करतूत है किंतु बीते कुछ दिनों में जिस तेजी से रेल पटरियों पर दुर्घटना करवाने वाला सामान रखा जा रहा है उसके बाद अब ये बात निःसंकोच कही जा सकती है कि इसके पीछे देश विरोधी किसी बड़ी कार्ययोजना का हाथ है। पूरे देश में फैली हजारों कि. मी लंबी रेल पटरियों की कदम - कदम पर निगरानी संभव नहीं है। इसी का लाभ विघटनकारी ताकतें उठा रही हैं। उनका उद्देश्य आम जनता के मन में भय उत्पन्न करने के साथ सरकार के बारे में अविश्वास उत्पन्न करना ही है। ये बात सर्वविदित है कि रेल भारत में आवागमन का सबसे सस्ता, सुलभ और सुरक्षित साधन है। प्रतिदिन करोड़ों यात्री इसके जरिये सफ़र करते हैं। समय - समय पर दुर्घटनाएं होने के बाद भी रेल यात्रा की उपयोगिता और आवश्यकता से कोई असहमत नहीं हो सकता। एक बड़े वर्ग के लिए तो इसका उपयोग करना मजबूरी भी है। इसी तरह मालगाड़ी सामान ढोने के लिए सबसे आसान माध्यम है। रेलवे को यात्री गाड़ियों के परिचालन से होने वाली आर्थिक क्षति की भरपाई माल ढुलाई के व्यवसाय से ही होती है। निजी क्षेत्र के अलावा सेना के सामान की आवाजाही के लिए मालगाड़ी सबसे अधिक उपयोग में आती है। ये देखते हुए रेलवे का निर्बाध परिचालन सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में है। इसलिए उसमें अवरोध उत्पन्न करने का श्रंखलाबद्ध प्रयास हर दृष्टि से देश विरोधी गतिविधि कहा जाएगा। इससे जुड़े कुछ लोग पकड़े जाने के बाद भी अब तक इसे संचालित करने वाले गिरोह का पर्दाफाश नहीं हो सका। लेकिन सतही तौर पर ये प्रतीत होता है कि कश्मीर घाटी में युवकों को पैसे देकर सुरक्षा बलों पर पत्थर फिकवाने जैसी योजना रेल पटरियों पर अवरोध उत्पन्न करने की हरकत से मेल खाती है। इसे अंजाम देने वाली ताकतें पर्दे के पीछे रहकर नौजवानों को कुछ रुपयों का लालच देकर लोगों की जान से खेलने के साथ ही राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुँचाने का षडयंत्र रच रही हैं। ये बहुत ही गंभीर स्थिति है जिससे निपटने के लिए बेहद सतर्कता रखनी चाहिए। इसे कुछ खुराफाती दिमागों की उपज कहकर उपेक्षित करना बड़ी भूल होगी। इसके जरिये देश विरोधी तत्व जनता को भयभीत करने के साथ ही सरकार को कमजोर साबित करने का जो कुचक्र रच रहे हैं उसके पीछे वही सब है जो लोकसभा चुनाव के पहले देश ने देखा और उसके बाद वही हरकतें रूप बदलकर सामने आ रही हैं। ये भी गौरतलब है कि जब भी कहीं चुनाव होते हैं तब - तब देश को अस्थिर करने वाले पूरी ताकत से सक्रिय हो जाते हैं। वर्तमान में भी कुछ राज्यों के चुनाव होने से उनकी हरकतों में वृद्धि हुई है। सरकार तो अपने स्तर पर सक्रिय है ही किंतु जनता को भी सतर्क रहना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Saturday, 21 September 2024
वक्फ संशोधन पर मौलवियों की तुलना में हिन्दू धर्माचार्य उदासीन रहे
कराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने बयानों के लिए चर्चित रहते हैं। राम मंदिर सहित अनेक मुद्दों पर वे मोदी सरकार की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। हालांकि अपने को प्रधानमंत्री का शुभचिंतक बताते हुए दावा करते हैं कि वे जो आलोचना करते हैं वह उनके भले के लिए होती है। गत दिवस उन्होंने मांग की कि हिंदुओं के धर्मस्थलों का प्रबंधन धर्मगुरुओं को सौंपा जाना चाहिए। अन्य शंकराचार्यों से मिलकर इस बारे में कानूनी कारवाई के संकेत भी उन्होंने दिये। तिरुपति देवस्थानम के लड्डुओं में पशु चर्बी युक्त घी का उपयोग होने के खुलासे पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए शंकराचार्य जी ने कहा कि अब बद्रीनाथ मंदिर में भी सीधी भरती किये जाने से इस तरह की गड़बड़ियों की आशंका बढ़ रही है। आज़ादी के 77 वर्ष बाद भी हिंदुओं के प्रमुख धर्मस्थलों का प्रशासनिक नियंत्रण सरकारी नौकरशाहों के हाथ में होने पर उन्होंने रोष जताया। हिन्दू हितों के संरक्षण में शंकराचायों की भूमिका आलोचनाओं के घेरे में रहती है। सोशल मीडिया पर आने वाली प्रतिक्रियाएं इसका प्रमाण हैं। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों के विरुद्ध उनकी उदासीनता तीखी आलोचनाओं का शिकार हुई। हिंदुओं में इस बात पर काफी गुस्सा है कि फिलिस्तीन में रहने वाले मुसलमानों के पक्ष में तो मुस्लिम धर्मगुरुओं के बयान खुलकर आते हैं। असदुद्दीन ओवैसी नामक सांसद ने तो लोकसभा में सदस्यता की शपथ लेते समय फिलिस्तीन समर्थक नारा लगा दिया। हाल ही में मुस्लिम त्योहारों पर निकले जुलूसों में भी फिलिस्तीन के प्रति हमदर्दी जताते बैनर - पोस्टर देखे गए। उसकी तुलना में हमारे शंकराचार्य हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों के बारे में उतने मुखर नहीं हैं , यह अवधारणा दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। ये भी सुनने में आता है कि बड़े - बड़े धर्मगुरु और कथावाचक आम हिंदू से कटते जा रहे हैं और धन तथा ग्लैमर के प्रति उनका झुकाव बढ़ता देखा जा सकता है। कुछ समय पूर्व देश के एक प्रसिद्ध उद्योगपति के पुत्र के विवाह में दो शंकराचार्यों सहित आध्यात्मिक जगत की ज्यादातर बड़ी हस्तियां मौजूद थीं। एक कथाकार तो आस्ट्रेलिया में प्रवचन के बीच से आये क्योंकि मेजबान ने उन्हें लाने के लिए विशेष विमान भेजा। हालांकि उक्त विवाह में राजनीति, उद्योग, मनोरंजन, और खेल जगत के हजारों नामी - गिरामी लोग शरीक हुए किन्तु शंकराचार्य सदृश विभूतियों की उपस्थिति पर समाज में आम प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही। इसका कारण ये माना जा सकता है कि वे साधारण जन के लिए सहज उपलब्ध नहीं हैं। कथावाचक और प्रवचनकर्ता तो फिल्मी सितारों की तरह महंगे हो गए हैं। वे श्रृद्धालुओं को तो त्याग और सादगी का उपदेश देते हैं किंतु खुद के लिए पाँच सितारा सुविधाएं और मोटी राशि मांगते हैं। धर्म के नाम पर इसी व्यापार के कारण धर्मगुरुओं के प्रति सम्मान में कमी आई है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने हिंदुओं के प्रमुख धर्मस्थलों का प्रबंध धर्मगुरुओं को सौंपने का जो मुद्दा छेड़ा वह सामयिक और आवश्यक है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आजादी के बाद केवल हिंदुओं के धर्मिक और निजी मामलों में सरकारी दखल बढ़ा। देश में मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय के जितने भी धार्मिक स्थल हैं उनमें से कितनों का प्रशासनिक नियंत्रण शासन के हाथों में है ये शोध का विषय है । जबकि सनातन से जुड़े मामलों में स्थिति पूरी तरह से उलटी है। हालांकि इसके लिए कुछ हद तक हिंदुओं के धर्मगुरुओं को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है जो अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में अपने समकक्ष को तुच्छ समझते हैं। दशकों पहले दक्षिण के एक शंकराचार्य को तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने निजी खुन्नस के चलते जेल में डाल दिया। अन्य किसी धर्म की दिग्गज हस्ती के साथ वह हुआ होता तो देश भर में बवाल हो जाता। लेकिन शेष शंकराचार्य गण केवल निंदा करते रहे। एकता के इसी अभाव के कारण सनातन धर्म के प्रति ज्यादातर राजनीतिक जमात अपेक्षा भाव रखती है। यदि किसी मुद्दे पर सभी प्रमुख धर्माचार्य एक साथ आवाज बुलंद करें तो सत्ता में बैठे लोगों को सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। उनसे किसी राजनीतिक दल के समर्थन अथवा विरोध की अपेक्षा भले न की जाए किंतु वक्फ बोर्ड संशोधन के विरोध में मुस्लिम मुल्ला - मौलवी जिस तरह खुलकर मैदान में उतरे उसकी तुलना में शंकराचार्य सहित अनगिनत महामंडलेश्वरों ने क्या किया, ये बड़ा सवाल है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 20 September 2024
तिरुपति के लड्डू ही नहीं मिलावट किसी भी खाद्य पदार्थ में अपराध
देश के सर्वाधिक प्रसिद्ध धर्मस्थलों में आंध्र प्रदेश स्थित तिरुपति देवस्थानम अग्रणी है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर देश का सबसे संपन्न धार्मिक संस्थान है। इसकी एक और प्रसिद्धि है इसमें प्रसाद के तौर पर मिलने वाला लड्डू। इसकी कीमत और आकार घटने - बढ़ने की चर्चा संसद तक में होती है। दुनिया भर से सनातन धर्म के अनुयायी यहाँ दर्शनों हेतु आते हैं। चढ़ोत्री में केवल नगदी ही नहीं वरन सोने - चाँदी और जवाहरात भी होते हैं। तिरूपति देवस्थानम द्वारा अनेक जनकल्याणकारी प्रकल्पों का भी संचालन होता है। बड़े - बड़े उद्योगपति , फिल्मी सितारे और राजनेता तिरुपति के प्रति आस्था रखते हैं। लेकिन इन दिनों इसकी चर्चा जिस वजह से है उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू ने आरोप लगाया है कि तिरुपति देवस्थानम में प्रसाद का जो लड्डू मिलता है उसमें मिलावटी घी का उपयोग किया जाता रहा। यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी लेकिन ये जानकर करोड़ों भक्तों को धक्का लगा कि मिलावटी घी में मछली के तेल के अलावा गाय और सुअर जैसे पशुओं की चर्बी तक थी। शिकायत आते ही तिरुपति प्रशासन द्वारा घी की जाँच हेतु उसके नमूनों को प्रयोगशाला में भेजा गया जिनकी रिपोर्ट में मिलावट की पुष्टि हो गई। हालांकि इस रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर संदेह किया जा रहा है किंतु मामला तब ज्यादा विवादित हो गया जब राज्य के मुख्यमंत्री श्री नायडू ने पिछली सरकार के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी को इसके लिए कसूरवार ठहराते हुए आरोप लगा दिया कि उनके शासनकाल में तिरुपति में पशुओं की चर्बीयुक्त घी से बने लड्डू बनवाये गए। ये आरोप भी लगाया गया कि श्री रेड्डी ने हिंदुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र के प्रशासनिक अधिकारी के पद पर ईसाई धर्मावलंबी को नियुक्त किया। उल्लेखनीय है जगन मोहन भी ईसाई हैं। श्री नायडू ने आश्वस्त किया कि अब तिरुपति में बनाये जा रहे प्रसाद के लड्डुओं के लिए गैर मिलावटी शुद्ध घी उपलब्ध करवाया जा रहा है। मामला चूंकि धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है इसलिये उसकी चर्चा सर्वत्र हो गई। आलोचना और चिंता युक्त प्रतिक्रियाएं भी देखने मिल रही हैं। सोशल मीडिया में तो ऐसी खबरों पर सबसे अधिक सक्रियता नजर आती है। हालांकि श्री नायडू द्वारा लगाए आरोपों की सत्यता पर संदेह जताने वाले भी कम नहीं हैं क्योंकि वे राजनीतिक व्यक्ति हैं और कठघरे में खड़ा किया जा रहा नेता उनका प्रतिद्वंदी। श्री रेड्डी जब मुख्यमंत्री थे तब चंद्रा बाबू को जेल जाना पड़ा था। ऐसे में यदि वे प्रतिशोधवश उनको घेरने का दाँव चल रहे हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इस प्रकरण को केवल तिरुपति के लड्डुओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता क्योंकि मिलावट हमारे देश का चरित्र बन गई है। किसी धर्मस्थल में बनने वाले प्रसाद की शुद्धता और पवित्रता बरकरार रखना नितांत आवश्यक है किंतु देश में रहने वाले करोड़ों नागरिकों को शुद्ध खाद्य सामग्री उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है। उस दृष्टि से ये कहना गलत न होगा कि सरकार द्वारा मिलावट रोकने के लिए की गई व्यवस्था पूरी तरह विफल और बिकी हुई है। तिरुपति की खबर आते ही सोशल मीडिया पर घी की कीमत और गुणवत्ता को लेकर जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें से अधिकांश में ये स्वीकार किया गया कि जिस कीमत पर विभिन्न ब्रांड का घी बाजार में उपलब्ध है उतने में शुद्धता संभव नहीं। इसी तरह खाद्य तेल, मसाले आदि में भी मिलावट किसी से छिपी नहीं है। उन्हें लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए प्रयुक्त रासायनिक चीजें भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। डेरियों से आने वाले खुले दूध की शुद्धता तो सदैव संदिग्ध रही है। भैंसों को जो इंजेक्शन लगाए जाते हैं उनका दुष्प्रभाव भी उपभोक्ता पर पड़ता है। ये कहना गलत नहीं है कि चाहे स्थानीय हो या बड़े ब्रांड द्वारा बनाये गए खाद्य उत्पाद , सभी में मिलावट या नुकसानदेह चीजों का उपयोग हो रहा है। उपभोक्ता आंदोलन भी कुछ एन.जी.ओ के प्रचार तक सिमटकर रह गया है। सरकार के जिस विभाग पर इस समस्या को दूर करने का दायित्व है उसकी कार्यप्रणाली में ही बेईमानी मिली हुई है तो फिर जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ को कैसे रोका जा सकेगा, ये गंभीर प्रश्न है। मिलावट के लिए कठोर दंड का प्रावधान है लेकिन जिस बड़े पैमाने पर उसका कारोबार चल रहा है उसे देखते हुए दंडित किये जाने वालों की संख्या नगण्य है। हमारे देश में छोटी - छोटी बातों पर चका जाम कर दिया जाता है। धरना और घेराव भी आम बात है। लेकिन मिलावट के विरुद्ध कोई जनांदोलन शायद ही कभी सुनने में आया हो। किसी एक मामले के उजागर होने पर कुछ दिन चर्चा होने के बाद फिर सब भुला दिया जाता है। तिरूपति से उठे प्रकरण में चूंकि राजनेता शामिल हैं इसलिए हो सकता है बात किसी परिणाम तक पहुंचे वरना तो मिलावट को रोक पाने के तमाम प्रयासों की स्थिति वैसी ही है जैसी वाराणसी में गंगा शुद्धि हेतु चलाये गए अभियान की।
- रवीन्द्र वाजपेयी