Wednesday, 25 September 2024

शेयर बाजार की उछाल के बीच छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा जरूरी



शेयर बाजार के उतार चढ़ाव किसी देश की अर्थव्यवस्था में निवेशकों के भरोसे का पैमाना माना जाता है। वैश्वीकरण के  बाद तो इसमें विदेशी पूंजी का आगमन भी बेरोकटोक होने लगा है। इस बारे में उल्लेखनीय है कि विदेशी निवेशकों का आना अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत होता है। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि अब पूंजी के इस खेल में केवल धनवान लोग ही शामिल नहीं होते अपितु मध्यमवर्गीय निवेशकों का एक बड़ा वर्ग भी शेयर बाजार में हाथ आजमाने लगा है। बचत के परंपरागत तरीके बदल रहे हैं। बैंकों द्वारा जमा राशि पर ब्याज दर घटाए जाने के फलस्वरूप छोटे निवेशकों की शेयर बाजार में रुचि उत्पन्न हुई। इसमें भी अनेक ऐसी योजनाएं निकलीं जिनसे किश्तों में निवेश के बावजूद निश्चित लाभ मिलने का आश्वासन मिलने से बैंकों की बजाय लोग शेयर बाजार और उससे जुड़ी अन्य योजनाओं के प्रति आकर्षित हुए। उसी का परिणाम है कि चंद लोगों तक सीमित यह व्यवसाय समाज में चर्चा का विषय बन गया। शेयर बाजार को सट्टा बाजार भी कहा जाता है क्योंकि निवेशकों द्वारा लगाए गए धन पर इच्छित लाभ न मिलने के अलावा उसके डूबने का खतरा भी रहता है। शेयर बाजार का संचालन करने वाली संस्था सेबी इस बारे में आगाह भी करती रहती है। इसके बाद भी घोटाले होते हैं । बड़ी - बड़ी कंपनियां पलक झपकते डूब जाती हैं। हिंडनबर्ग रिपोर्ट जैसे हादसे भी देखने आये हैं जिन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के अनेक देशों के शेयर बाजारों को धराशायी कर दिया। भारत में भी हर्षद मेहता और यूनिट ट्रस्ट जैसे कांड होने के बाद शेयर बाजार लड़खड़ाया किंतु कुछ समय बाद वह पटरी पर लौट भी आया। भारत में उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद शेयर बाजार आम लोगों के घरों तक जा पहुंचा।  इसीलिए इसे लेकर सरकार को ज्यादा चिंता करनी चाहिए क्योंकि छोटे निवेशक की कमाई डूबना उसकी तबाही का कारण बन जाता है। भारत का शेयर बाजार इन दिनों कीर्तिमान तोड़ने में जुटा हुआ है। गत दिवस उसके सूचकांक  ने 85 हजार का आंकड़ा छू लिया।  लोकसभा चुनाव के पहले शेयर बाजार से आ रहे संकेतों के अनुसार मोदी सरकार की वापसी पर सूचकांक के 1 लाख तक उछलने की  उम्मीद थी। इसलिये जब एग्जिट पोल के नतीजों में ये बताया गया कि श्री मोदी को तीसरी पारी खेलने का मौका मिलने जा रहा है तो शेयर बाजार ने लंबी छलांग लगा दी। लेकिन परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे । भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे रहते ही शेयर बाजार धड़ाम से गिरने लगा। हालांकि बाहरी समर्थन से सरकार तो बन गई किंतु विपक्ष द्वारा उसके स्थायित्व को लेकर भ्रम पैदा करने से निवेशकों में भी डर बना रहा। विदेशी पूंजी के आगमन में भी कमी देखी गई। केंद्र सरकार के बजट में भी ऐसा कुछ नहीं दिखा जो शेयर बाजार को रास आता किंतु कुछ समय बाद से ही उसमें स्थिरता आई और उसके बाद से वह फर्राटे मारने लगा। बीच में जब विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय बाजार में डगमगाया तब भी घरेलू निवेशकों ने उसको सहारा देते हुए सबको चौंका दिया। वर्तमान में जो उछाल है उसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय कारण तो अपनी जगह हैं ही लेकिन छोटी बचत करने वालों का भरोसा बैंकों की बजाय शेयर बाजार में जिस तरह बढ़ा वह वैसे तो शुभ संकेत है किंतु सरकार को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि मध्यमवर्गीय निवेशकों की राशि सुरक्षित रहे। शेयर बाजार पूरी तरह अनिश्चितता का खेल है। जो लोग उसकी बारीकियाँ समझते हैं वे तो हवा का रुख भांपकर सावधान हो जाते हैं किंतु छोटे निवेशकों को इसके बारे में ज्यादा पता नहीं होता। इसलिए उनको नुकसान से बचाना अर्थव्यवस्था के दूरगामी हितों की दृष्टि से जरूरी है क्योंकि  जिस तरह शेयर बाजार की उछाल  लोगों मनोबल बढ़ाती है वहीं उसका अचानक नीचे गिरना देश की प्रतिष्ठा के लिए घातक होता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 September 2024

ओवैसी के बयान ने खोल दी वक्फ की पोल


वक्फ संशोधन विधेयक भले ही अभी जेपीसी के पास विचारार्थ हो किंतु उ.प्र के  कौशाम्बी जिले में ग्राम सभा की 96 बीघा भूमि उससे वापस लेकर ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का एस. डी. एम का फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है। यह प्रकरण 1946 से लंबित था। वक्फ बोर्ड का दावा था कि अलाउद्दीन खिलजी के जमाने में बतौर माफीनामा वह भूमि मिली थी । सरकारी रिकार्ड में भी वह वक्फ संपत्ति दर्शाई गई थी किंतु 2 साल पहले यह खुलासा हुआ कि वह ग्राम सभा की भूमि है और उसके बाद अदालती आदेश पर उसे वापस ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दिया गया। इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट राज्य शासन द्वारा मंगवाकर अवैध तौर पर हड़पी गई जमीनें एवं अन्य संपत्तियाँ वापस लेने की मुहिम शुरू किये जाने की खबर से वक्फ बोर्ड में घबराहट है।  कौशाम्बी जैसे मामले पूरे प्रदेश में होने की आशंका जताई जा रही है। राज्य की पिछली  गैर भाजपा सरकारों  में मुस्लिम वोट बैंक के लालच में वक्फ के अवैध कब्जों वाली संपत्तियों को छीनने का साहस ही नहीं हुआ । लिहाजा सार्वजनिक भूमि को वक्फ का बताकर अवैध कब्जे होते रहे। वक्फ संशोधन का विरोध करने के साथ ही मुस्लिम समुदाय द्वारा देश भर में हिंदुओं के धर्मस्थल के अलावा सरकारी इमारतों तक को वक्फ संपत्ति बताकर खाली करने का दबाव बनाया जा रहा है। इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हिन्दू  समाज में देखने मिल रही है। इसी के चलते उ.प्र की योगी सरकार कौशाम्बी प्रकरण को आधार बनाकर पूरे राज्य में वक्फ के कब्जे वाली संपत्तियों की वैधानिकता जाँचने  जा रही है। मुस्लिम समाज इससे भन्नाया हुआ है। उसकी हमदर्द सामजवादी पार्टी तथा कांग्रेस के पेट में भी मरोड़ होने लगा है क्योंकि वक्फ संशोधन के पक्ष में वे हिन्दू भी खड़े नजर आ रहे हैं जिन्होंने गत  लोकसभा चुनाव में भाजपा के विरोध में मतदान किया था। दरअसल जबसे हिंदुओं  के संज्ञान में ये बात आई कि वक्फ जिस संपत्ति पर अपना दावा कर दे वह बिना किसी लागलपेट के उसकी हो जायेगी, तबसे उनके बीच भय व्याप्त है। विशेष रूप  से मंदिरों जैसे धार्मिक स्थलों पर वक्फ के दावों की आशंका चिंता बढ़ा रही है। लेकिन कुछ दिनों पहले मुस्लिम समाज के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के भाषण का एक वीडियो तेजी से प्रसारित हुआ जिसमें वे मुसलमानों को वक्फ संशोधन का विरोध करने हेतु प्रेरित करने के साथ ही ये भी बोल गए कि उक्त विधेयक पारित होने पर वक्फ के हाथ से बड़े पैमाने पर संपत्तियाँ निकल जाएंगी। इसके बाद उन्होंने वह राज खोल दिया जिसके कारण मुस्लिम समाज इस संशोधन से भड़का हुआ है। ओवैसी ने खुले मंच से मुसलमानों को आगाह किया कि उ.प्र  में वक्फ के आधिपत्य में जो 1.21 लाख संपत्तियाँ हैं उनमें से 1.12 लाख के वैधानिक दस्तावेज नहीं हैं। इसलिए वक्फ संशोधन  कानून में बदला तो बिना दस्तावेज वाली संपत्तियाँ उसके हाथ से छिन जाएंगी। ओवैसी के इस बयान ने वक्फ के नाम पर देश भर में किये गए अवैध कब्जों की पोल खोलकर रख दी। लेकिन उ.प्र के कौशाम्बी में ग्राम सभा की 96 बीघा भूमि वक्फ से छीने जाने के बाद से योगी सरकार जिस तरह वक्फ के फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करने सक्रिय हुई  वह अन्य राज्यों के लिए एक सबक है। यदि भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा शासित राज्यों में भी वक्फ द्वारा बिना वैधानिक दस्तावेजों के कब्जा की गई जमीनों एवं अन्य संपत्तियों को वापस लेने का अभियान छेड़ दिया गया तब गैर भाजपा राज्य सरकारें भी वैसा करने बाध्य होंगी। इस प्रकार संदर्भित संशोधन पारित होने के पहले ही वक्फ के कर्ताधर्ताओं में हड़कंप मचा हुआ है। इस बारे में ये बात भी ध्यान देने वाली है कि भले ही मौलवियों के दबाव में मुस्लिम समुदाय इस संशोधन का विरोध कर रहा हो किंतु एक वर्ग ऐसा है जो वक्फ संपत्ति पर समाज के कुछ  लोगों द्वारा कब्जा कर उसका लाभ लेने से नाराज हैं। ये आरोप भी लग रहा है कि वक्फ बोर्ड के कब्जे वाली संपत्तियों का समुचित रखरखाव न होने से उनसे अपेक्षित आय नहीं होती और समाज के जरूरतमंद लोगों के कल्याण के कार्यक्रम अधर में अटक जाते हैं। ये चर्चा भी  है कि वक्फ की अनेक संपत्तियों से होने वाली कमाई कुछ प्रभावशाली लोगों की जेब में चली जाती है। इस तरह की शिकायतें हिंदुओं सहित अन्य धर्मों के न्यासों में भी हैं किंतु वक्फ के पास सेना और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीनें हैं। इसलिए उसमें होने वाले घोटाले भी बड़े ही होंगे। ओवैसी ने तो केवल उ.प्र का खुलासा किया है। बाकी  राज्यों में  भी यही स्थिति हो तो अचरज नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 September 2024

रेल पटरियों पर अवरोध जनता को भयभीत करने का षडयंत्र


कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी, दिल्ली में किसानों का धरना, जेएनयू, जामिया मिलिया, जादवपुर, उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि में  छात्र आंदोलन, दिल्ली के शाहीन बाग का धरना आदि को व्यवस्था विरोधी प्रयोग कहा गया। उनका एकमात्र निहित उद्देश्य केंद्र में बैठी मोदी सरकार को अस्थिर करना था। किसान आंदोलन की आड़ लेकर पंजाब में नये सिरे से सिर उठाने वाला खालिस्तानी आंदोलन उसकी अगली पायदान बना। इसे कैनेडा, अमेरिका और ब्रिटेन में बैठे अलगाववादी संगठनों का समर्थन मिलना अपने आप में काफी कुछ कह देता है। नागरिकता संशोधन जैसे कानूनों का भी जिस प्रकार संगठित विरोध हुआ वह किसी सुनियोजित षडयंत्र का हिस्सा ही था। उसी की पुनरावृत्ति वक्फ संशोधन को लेकर सामने आई है। देश में एक वर्ग ऐसा है जो राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत होते देख जल - भुन रहा है। यहाँ तक कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार और भारत विरोधी भावनाओं के भड़कने से भी ये तबका मन ही मन प्रसन्न है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से कुछ लोग इस बात का प्रचार करने में जुटे हुए हैं कि हिंदुत्व भारतीय राजनीति में प्रासंगिक हो गया है और जनता पर उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। इस अवधारणा को मीडिया का एक संगठित समूह जमकर हवा दे रहा है। यही वजह है कि श्री मोदी से परेशान  राष्ट्रविरोधी शक्तियों का हौसला बुलंद हो रहा है। जिसका ताजा प्रमाण है रेल पटरियों पर पत्थर, लोहे की सलाखें और गैस के सिलेंडर रखकर गाड़ियों को दुर्घटनाग्रस्त करने की कोशिशों में अचानक वृद्धि होना। गत दिवस म.प्र में सेना से जुड़ी एक रेलगाड़ी की पटरी पर विस्फोटक रखे पाए गए। पहली बार जब ऐसी खबर आई तब लगा कि ये किसी सिरफिरे  की करतूत है किंतु बीते कुछ दिनों में जिस तेजी से रेल पटरियों पर दुर्घटना करवाने वाला सामान रखा जा रहा है उसके बाद अब ये बात निःसंकोच कही जा सकती है कि इसके पीछे देश विरोधी किसी बड़ी कार्ययोजना का हाथ है। पूरे देश में फैली हजारों कि. मी लंबी रेल पटरियों की कदम - कदम पर निगरानी संभव नहीं है। इसी का लाभ विघटनकारी ताकतें उठा रही हैं। उनका उद्देश्य आम जनता के मन में भय उत्पन्न करने के साथ सरकार के बारे में अविश्वास उत्पन्न करना ही है। ये बात सर्वविदित है कि रेल भारत में आवागमन का सबसे सस्ता, सुलभ और सुरक्षित साधन है। प्रतिदिन करोड़ों यात्री इसके जरिये सफ़र करते हैं। समय - समय पर दुर्घटनाएं होने के बाद भी रेल यात्रा की उपयोगिता और आवश्यकता से कोई असहमत नहीं हो सकता। एक बड़े वर्ग के लिए तो इसका उपयोग करना मजबूरी भी है। इसी तरह मालगाड़ी सामान ढोने के लिए सबसे आसान माध्यम है। रेलवे को यात्री गाड़ियों के परिचालन से होने वाली आर्थिक क्षति की भरपाई माल ढुलाई के व्यवसाय से ही होती है। निजी क्षेत्र के अलावा सेना के सामान की आवाजाही के लिए मालगाड़ी सबसे अधिक उपयोग में आती है। ये देखते हुए रेलवे का निर्बाध परिचालन सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में है। इसलिए उसमें अवरोध उत्पन्न करने का श्रंखलाबद्ध प्रयास हर दृष्टि से देश विरोधी गतिविधि कहा जाएगा। इससे जुड़े कुछ लोग पकड़े जाने के बाद भी अब तक इसे संचालित करने वाले गिरोह का पर्दाफाश नहीं हो सका। लेकिन सतही तौर पर ये प्रतीत होता है कि कश्मीर घाटी में युवकों को पैसे देकर सुरक्षा बलों पर पत्थर फिकवाने जैसी योजना रेल पटरियों पर अवरोध उत्पन्न करने की हरकत से मेल खाती है। इसे अंजाम देने वाली ताकतें पर्दे के पीछे रहकर नौजवानों को कुछ रुपयों का लालच देकर लोगों की जान से खेलने के साथ ही राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुँचाने का षडयंत्र रच रही हैं। ये बहुत ही गंभीर स्थिति है जिससे निपटने के लिए बेहद सतर्कता रखनी चाहिए। इसे कुछ खुराफाती दिमागों की उपज कहकर उपेक्षित करना बड़ी भूल होगी। इसके जरिये देश विरोधी तत्व जनता को भयभीत करने के साथ ही सरकार को कमजोर साबित करने का जो कुचक्र रच रहे हैं उसके पीछे वही सब है जो लोकसभा चुनाव के पहले देश ने देखा और उसके बाद वही हरकतें रूप बदलकर सामने आ रही हैं। ये भी गौरतलब है कि जब भी कहीं चुनाव होते हैं तब - तब देश को अस्थिर करने वाले पूरी ताकत से सक्रिय हो जाते हैं। वर्तमान में भी कुछ राज्यों के चुनाव होने से उनकी हरकतों में वृद्धि हुई है। सरकार तो अपने स्तर पर सक्रिय है ही किंतु जनता को भी सतर्क रहना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 September 2024

वक्फ संशोधन पर मौलवियों की तुलना में हिन्दू धर्माचार्य उदासीन रहे

कराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने बयानों के लिए चर्चित रहते हैं। राम  मंदिर  सहित अनेक मुद्दों पर वे मोदी सरकार की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। हालांकि अपने को प्रधानमंत्री का शुभचिंतक बताते हुए दावा करते हैं कि वे जो आलोचना करते हैं वह उनके  भले के लिए होती है। गत दिवस उन्होंने मांग की कि हिंदुओं के धर्मस्थलों का प्रबंधन धर्मगुरुओं को सौंपा जाना चाहिए। अन्य शंकराचार्यों से मिलकर इस बारे में कानूनी कारवाई के संकेत भी उन्होंने दिये। तिरुपति देवस्थानम के लड्डुओं में पशु चर्बी युक्त घी का उपयोग होने के खुलासे पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए शंकराचार्य जी ने कहा कि अब बद्रीनाथ मंदिर में भी सीधी भरती किये जाने से इस तरह की गड़बड़ियों की आशंका बढ़ रही है। आज़ादी के 77 वर्ष बाद भी हिंदुओं के प्रमुख धर्मस्थलों का प्रशासनिक नियंत्रण सरकारी नौकरशाहों के हाथ में होने पर उन्होंने रोष जताया। हिन्दू हितों के संरक्षण में शंकराचायों की भूमिका आलोचनाओं के घेरे में रहती है। सोशल मीडिया पर आने वाली प्रतिक्रियाएं इसका प्रमाण हैं। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों के विरुद्ध उनकी उदासीनता तीखी आलोचनाओं का शिकार हुई। हिंदुओं में इस बात पर काफी गुस्सा है कि फिलिस्तीन में रहने वाले मुसलमानों के पक्ष में तो मुस्लिम धर्मगुरुओं के बयान खुलकर आते हैं। असदुद्दीन ओवैसी नामक सांसद ने तो लोकसभा में सदस्यता की शपथ लेते समय फिलिस्तीन समर्थक नारा लगा दिया। हाल ही में मुस्लिम त्योहारों पर निकले जुलूसों में भी फिलिस्तीन के प्रति हमदर्दी जताते बैनर - पोस्टर देखे गए। उसकी तुलना में हमारे शंकराचार्य हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों के बारे में उतने मुखर नहीं हैं , यह अवधारणा दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। ये भी सुनने में आता है कि बड़े - बड़े धर्मगुरु और कथावाचक आम हिंदू से कटते जा रहे हैं और धन तथा ग्लैमर के प्रति उनका झुकाव बढ़ता देखा जा सकता है। कुछ समय  पूर्व देश के एक प्रसिद्ध उद्योगपति के पुत्र के विवाह में दो शंकराचार्यों सहित आध्यात्मिक जगत की ज्यादातर बड़ी हस्तियां मौजूद थीं। एक कथाकार तो  आस्ट्रेलिया में प्रवचन के बीच से आये क्योंकि मेजबान ने उन्हें लाने के लिए विशेष विमान भेजा। हालांकि उक्त विवाह में राजनीति, उद्योग, मनोरंजन, और खेल जगत के हजारों नामी - गिरामी लोग शरीक हुए किन्तु शंकराचार्य सदृश विभूतियों की  उपस्थिति पर समाज में आम प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही। इसका कारण ये माना जा सकता है कि वे साधारण जन के लिए सहज उपलब्ध नहीं हैं।  कथावाचक और प्रवचनकर्ता तो  फिल्मी सितारों की तरह महंगे हो गए हैं। वे श्रृद्धालुओं को तो त्याग और सादगी का उपदेश देते हैं किंतु खुद के लिए पाँच सितारा सुविधाएं और मोटी राशि मांगते हैं। धर्म के नाम पर  इसी  व्यापार के कारण धर्मगुरुओं के प्रति सम्मान में कमी आई है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने हिंदुओं के प्रमुख धर्मस्थलों का प्रबंध धर्मगुरुओं को सौंपने का जो मुद्दा छेड़ा वह सामयिक और आवश्यक है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आजादी के बाद केवल हिंदुओं के धर्मिक और निजी मामलों में सरकारी दखल बढ़ा। देश में मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय के जितने भी धार्मिक स्थल हैं उनमें से कितनों का प्रशासनिक नियंत्रण शासन के हाथों में है ये शोध का विषय है ।  जबकि सनातन से जुड़े मामलों में स्थिति पूरी तरह से उलटी है। हालांकि इसके लिए कुछ हद तक हिंदुओं के धर्मगुरुओं को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है जो अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में अपने समकक्ष को तुच्छ समझते हैं। दशकों पहले दक्षिण के एक शंकराचार्य को तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने निजी खुन्नस के चलते जेल में डाल दिया। अन्य किसी धर्म की दिग्गज हस्ती के साथ वह हुआ होता तो देश भर में बवाल हो जाता। लेकिन शेष शंकराचार्य गण केवल निंदा करते रहे। एकता के इसी अभाव के कारण सनातन धर्म के प्रति ज्यादातर राजनीतिक जमात अपेक्षा भाव रखती है। यदि किसी मुद्दे पर सभी प्रमुख धर्माचार्य एक साथ आवाज बुलंद करें तो सत्ता में बैठे लोगों को सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। उनसे किसी राजनीतिक दल के समर्थन अथवा विरोध की अपेक्षा भले न की जाए किंतु वक्फ बोर्ड संशोधन के विरोध में  मुस्लिम मुल्ला - मौलवी जिस तरह खुलकर मैदान में उतरे उसकी तुलना में शंकराचार्य सहित अनगिनत महामंडलेश्वरों ने क्या किया, ये बड़ा सवाल है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 20 September 2024

तिरुपति के लड्डू ही नहीं मिलावट किसी भी खाद्य पदार्थ में अपराध



देश के सर्वाधिक प्रसिद्ध  धर्मस्थलों में  आंध्र प्रदेश स्थित तिरुपति देवस्थानम अग्रणी है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर देश का सबसे संपन्न धार्मिक संस्थान है। इसकी एक और प्रसिद्धि है इसमें प्रसाद के तौर पर मिलने वाला लड्डू। इसकी कीमत और आकार घटने - बढ़ने की चर्चा संसद तक में होती है। दुनिया भर से सनातन धर्म के अनुयायी यहाँ दर्शनों हेतु आते हैं। चढ़ोत्री में केवल नगदी ही नहीं वरन सोने - चाँदी और जवाहरात भी होते हैं। तिरूपति देवस्थानम द्वारा अनेक जनकल्याणकारी प्रकल्पों का भी संचालन होता है। बड़े - बड़े उद्योगपति , फिल्मी सितारे और राजनेता तिरुपति के प्रति आस्था रखते हैं। लेकिन इन दिनों इसकी चर्चा जिस वजह से है उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू ने आरोप लगाया है कि तिरुपति देवस्थानम में प्रसाद का जो लड्डू मिलता है उसमें मिलावटी घी का उपयोग किया जाता रहा। यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी लेकिन ये जानकर  करोड़ों भक्तों को धक्का लगा कि मिलावटी घी में मछली के तेल के अलावा गाय और सुअर जैसे पशुओं की चर्बी तक थी। शिकायत आते ही तिरुपति प्रशासन द्वारा घी की जाँच हेतु उसके नमूनों को प्रयोगशाला में भेजा गया जिनकी रिपोर्ट में मिलावट की पुष्टि हो गई। हालांकि इस रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर संदेह किया जा रहा है किंतु मामला तब ज्यादा विवादित हो गया जब राज्य के मुख्यमंत्री श्री नायडू ने पिछली सरकार के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी  को इसके लिए कसूरवार ठहराते हुए आरोप लगा दिया कि उनके शासनकाल में  तिरुपति में  पशुओं की चर्बीयुक्त घी से बने लड्डू  बनवाये गए। ये आरोप भी लगाया गया कि श्री रेड्डी ने हिंदुओं की आस्था के  प्रमुख केंद्र  के प्रशासनिक अधिकारी के पद पर ईसाई धर्मावलंबी को नियुक्त किया। उल्लेखनीय है जगन मोहन भी ईसाई हैं। श्री नायडू ने आश्वस्त किया कि अब तिरुपति में बनाये जा रहे प्रसाद के लड्डुओं के लिए गैर मिलावटी शुद्ध घी उपलब्ध करवाया जा रहा है। मामला चूंकि धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है इसलिये उसकी चर्चा सर्वत्र हो गई। आलोचना और चिंता युक्त प्रतिक्रियाएं भी देखने मिल रही हैं। सोशल मीडिया में तो ऐसी खबरों पर सबसे अधिक सक्रियता नजर आती है। हालांकि श्री नायडू द्वारा लगाए आरोपों  की सत्यता पर संदेह जताने वाले भी कम नहीं हैं क्योंकि वे राजनीतिक व्यक्ति हैं और कठघरे में खड़ा किया जा रहा नेता उनका प्रतिद्वंदी।  श्री रेड्डी जब मुख्यमंत्री थे तब चंद्रा बाबू को जेल जाना पड़ा था। ऐसे में यदि वे प्रतिशोधवश  उनको घेरने का दाँव चल रहे हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इस प्रकरण को केवल तिरुपति के लड्डुओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता  क्योंकि मिलावट हमारे देश का चरित्र बन गई है। किसी धर्मस्थल में बनने वाले प्रसाद की शुद्धता और पवित्रता बरकरार रखना नितांत आवश्यक है किंतु देश में रहने वाले करोड़ों नागरिकों को  शुद्ध खाद्य सामग्री उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है। उस दृष्टि से ये कहना गलत न होगा कि सरकार द्वारा मिलावट रोकने के लिए की गई व्यवस्था पूरी तरह विफल और बिकी हुई है। तिरुपति की खबर आते ही सोशल मीडिया पर घी की कीमत और गुणवत्ता को लेकर जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें से अधिकांश में ये स्वीकार किया गया कि जिस कीमत पर विभिन्न ब्रांड का घी बाजार में उपलब्ध है उतने में शुद्धता संभव नहीं। इसी तरह खाद्य तेल, मसाले आदि में भी मिलावट किसी से छिपी नहीं है। उन्हें लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए प्रयुक्त रासायनिक चीजें भी  स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। डेरियों से आने वाले खुले दूध की शुद्धता तो सदैव संदिग्ध रही है। भैंसों को जो इंजेक्शन लगाए जाते हैं उनका दुष्प्रभाव भी उपभोक्ता पर पड़ता है। ये कहना गलत नहीं है कि  चाहे स्थानीय हो या बड़े ब्रांड द्वारा बनाये गए खाद्य उत्पाद , सभी में मिलावट या नुकसानदेह चीजों का उपयोग हो रहा है। उपभोक्ता आंदोलन भी कुछ एन.जी.ओ के प्रचार तक सिमटकर रह गया है। सरकार के जिस विभाग पर इस समस्या को दूर करने का दायित्व है उसकी कार्यप्रणाली में ही बेईमानी मिली हुई है तो फिर जनता के स्वास्थ्य  से खिलवाड़ को कैसे रोका जा सकेगा, ये गंभीर प्रश्न है। मिलावट के लिए कठोर दंड का प्रावधान है लेकिन जिस बड़े पैमाने पर उसका कारोबार चल रहा है उसे देखते हुए दंडित किये जाने वालों की संख्या नगण्य है। हमारे देश में छोटी - छोटी बातों पर चका जाम कर दिया जाता है। धरना और घेराव भी आम बात है। लेकिन मिलावट के विरुद्ध कोई जनांदोलन शायद ही कभी सुनने में आया हो। किसी एक मामले के उजागर होने पर कुछ दिन चर्चा होने के बाद फिर सब भुला दिया जाता है। तिरूपति से उठे प्रकरण में चूंकि राजनेता शामिल हैं इसलिए हो सकता है बात किसी परिणाम तक पहुंचे वरना तो मिलावट को रोक पाने के तमाम प्रयासों की स्थिति वैसी ही है जैसी वाराणसी में गंगा शुद्धि हेतु चलाये गए अभियान की। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 September 2024

लोकसभा - विधानसभा के एक साथ चुनाव लोकतंत्र और देश दोनों के हित में



गत दिवस केंद्रीय मंत्री परिषद ने एक देश एक चुनाव  के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।  इसे संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किये जाने की संभावना है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा विभिन्न  दलों से राय लेने के उपरांत देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने  के साथ ही उसके 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकायों और  पंचायत चुनाव कराने की अनुशंसा की थी। 32  दल इसके समर्थन में हैं वहीं 15 को ये मंजूर नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अनुसार ऐसा करना संविधान और संघवाद के विरुद्ध होगा । उल्लेखनीय है कि  उक्त फैसले को अमल में लाने के लिए संविधान संशोधन करना होगा जो  सत्ताधारी गठबंधन के लिए आसान नहीं है। ऐसे में  संभव है संसद में विधेयक  पेश करने के बाद उसे वक़्फ़ बोर्ड संशोधन की तरह से ही जेपीसी बनाकर उसके विचारार्थ भेज दिया जाए। लेकिन यह प्रस्ताव राष्ट्रीय विमर्श का विषय अवश्य बनेगा।  संसद द्वारा इसे पारित किये जाने के बाद भी इस व्यवस्था को लागू करने के लिए कुछ  विधानसभाओं का कार्यकाल घटाना पड़ेगा वहीं कुछ का बढ़ाया जायेगा। ईवीएम मशीनों के साथ ही चुनाव कार्य हेतु कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि बड़ी चुनौती होगी। सुरक्षा बलों की तैनाती भी समस्या बनेगी।  कुल मिलाकर इतने बड़े और  विविधता भरे देश में एक साथ चुनाव  सरकार के साथ ही राजनीतिक दलों के लिए भी बेहद कठिन होगा।  लेकिन ऐसा करना चूंकि  देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है अतः इसको स्वीकार करना हर दृष्टि से लाभदायी है। श्री खरगे भले ही एक देश एक चुनाव की बात को संविधान और संघवाद के विरुद्ध बताएं किंतु ऐसा कहते समय वे भूल गए कि 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे। 1971 में इंदिरा गाँधी ने लोकसभा समय पूर्व भंग करवाकर मध्यावधि चुनाव करवाया और तभी से चुनाव की समय सारिणी  गड़बड़ा गई। दरअसल जबसे लोकसभा और विधानसभा चुनाव  अलग - अलग होने लगे तभी से संघवाद कमजोर होता दिखा जिसमें क्षेत्रीय दलों ने और योगदान दिया। इसी का  दुष्परिणाम है कि विरोधी विचारधारा वाली राज्य सरकार  केंद्र की सत्ता को चुनौती देने का दुस्साहस करती है। इसके पीछे चुनाव के दौरान उत्पन्न कटुता ही  है।  केंद्र और राज्यों में अलग - अलग दलों की सरकारें पहले भी रही हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में तो स्थानीय छोटे - छोटे दल शुरू से ही सत्ता के समीकरणों को प्रभावित करते आये हैं। तमिलनाडु में 1967 से क्षेत्रीय दलों का आधिपत्य  बना हुआ है। प. बंगाल में 1977 के बाद  पहले वामपंथी सरकार रही और उसके उपरांत तृणमूल नामक क्षेत्रीय दल की सत्ता है। जिन राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ होते हैं उनमें क्षेत्रीयता की भावना उतनी तेजी से नहीं उभरती। कई बार ऐसा भी हुआ कि एक साथ हुए चुनाव में लोकसभा और विधानसभा में अलग दल को मतदाताओं का समर्थन मिला। लेकिन जब अकेले राज्य के चुनाव होते हैं तो संघवाद को ठेंगा दिखाते हुए केवल स्थानीय मुद्दों पर जोर दिया जाता है। वर्तमान  में केंद्र और राज्यों के बीच रिश्ते जिस हद तक बिगड़े उसमें अलग -  अलग चुनाव  सबसे बड़ा कारण है। उदाहरण के लिए उड़ीसा के विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ होते रहे और दोनों में अलग - अलग पार्टियों के  जीतने के बाद भी केंद्र और राज्य  के रिश्ते मधुर रहे। लेकिन अन्य राज्यों के साथ ऐसा नहीं है। सबसे बड़ी बात पूरे पाँच वर्ष कहीं न कहीं चुनावी कार्यक्रम होने से देश नीतिगत अस्थिरता में फंस जाता है।  केंद्र सरकार को कोई बड़ा निर्णय लेने से पहले चुनावी समीकरणों की चिंता करनी पडती है। क्षेत्रीय दल भी अपनी जीत के लिए ऐसे वायदे कर देते हैं जो  राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होते हैं। केंद्र  द्वारा लागू की गई अनेक नीतियों को राजनीतिक वैमनस्य के चलते राज्यों द्वारा उपेक्षित किया जाता है। चुनावी खर्च चूंकि चंदे से होता है इसलिए राजनीतिक दल चंदा देने वालों को उपकृत करने बाध्य होते हैं। इलेक्टोरल बॉण्ड के जरिये कांग्रेस से अधिक चंदा कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने बटोरा। यदि पूरे देश में एक साथ लोकसभा - विधानसभा चुनाव की व्यवस्था हो सके तो राजनीतिक स्थायित्व कायम हो सकेगा। साथ ही भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक रोक लगाना संभव होगा। सरकार का जो खर्च चुनाव व्यवस्था पर होता है उसमें बचत के अलावा प्रशासनिक मशीनरी की तैनाती से होने वाले कामकाज के  नुकसान को भी रोका जा सकेगा। कुल मिलाकर केंद्रीय मंत्री परिषद ने  जिस प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की वह लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के साथ ही निरंतर चलने वाली सियासी अखाड़ेबाजी पर भी विराम लगायेगा। देशहित इसी में है कि इसका  दलगत मतभेदों से ऊपर उठकर समर्थन किया जाए जिससे चुनाव प्रणाली में आम जनता का विश्वास और बढ़े। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 September 2024

कामचलाऊ मुख्यमंत्री की छवि से निकलना आतिशी के लिए बड़ी चुनौती




आखिरकार दिल्ली के नये मुख्यमंत्री का नाम सामने आ ही गया। अरविंद केजरीवाल के त्यागपत्र के बाद  दिल्ली सरकार में मंत्री रहीं आतिशी उनकी उत्तराधिकारी बनीं। हालांकि आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में जो लोग शामिल हैं उन्हें दरकिनार करते हुए आतिशी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाना चौंकाने वाला निर्णय माना जा रहा है किंतु पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल जिस तरह की राजनीति के लिए जाने जाते हैं उसमें ऐसा होना अस्वाभविक भी नहीं है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के जेल जाने के बाद आतिशी ने दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी दोनों का काम जिस कुशलता से संभाला उसे उनकी पदोन्नति का कारण बताया जा रहा है । अब तक सत्ता और संगठन के खेल में वे काफी अनुभवी भी हो चुकी हैं। सबसे बड़ी बात है उनका स्वयंसेवी संगठन  (एन.जी.ओ) में कार्य करने का अनुभव जो आम आदमी पार्टी की कार्यशैली का आधार है। श्री केजरीवाल के अलावा पार्टी के कुछ अन्य बड़े नेता भी इन्हीं संगठनों से होकर राजनीति से जुड़े। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन  में भी ज्यादातर वही गैर राजनीतिक लोग थे जिनकी रुचि सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने की रही। आतिशी ने भी ऑक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित वि.वि से शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत म.प्र में एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया।  कहा जा रहा है उनके मुख्यमंत्री बनने से  कम से कम दिल्ली विधानसभा चुनाव में तो आधी आबादी इस कदम से आम आदमी पार्टी के पक्ष में झुक ही जायेगी। लेकिन  उनमें सबसे बड़ी कमी ये है कि वे कठपुतली बनी रहकर काम करेंगी । गत दिवस उन्होंने  स्वीकार  भी किया  कि भले ही वे इस कुर्सी पर बैठ जाएं किंतु  मुख्यमंत्री तो श्री केजरीवाल ही रहेंगे। ये बात पूरी तरह सही है कि पार्टी में अनेक नेता ऐसे हैं जो मुख्यमंत्री बनाये जाने योग्य थे किंतु श्री केजरीवाल ने बहुत सोच - समझकर गोटी चली। महिला मुख्यमंत्री के तौर पर वे अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल को भी चुन सकते थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद वे जिस तरह सक्रिय हुईं उससे दिल्ली में भी राबड़ी देवी की पुनरावृत्ति होने की चर्चा आम थी किंतु श्री केजरीवाल को बिहार और दिल्ली के सामाजिक ढांचे का अंतर पता है। इसलिए उन्होंने वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए आतिशी के सिर पर ताज रखा , जिनका रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से उनके पास रहेगा। एक महिला मुख्यमंत्री के रूप में वे जयललिता, मायावती, और ममता बनर्जी की बराबरी कैसे कर सकेंगी , ये बड़ा सवाल है। ऐसे में श्री केजरीवाल का ये आशावाद सफल नहीं हो सकेगा कि आतिशी के जरिये वे देश भर की महिला मतदाताओं को लुभा सकेंगे। इसका एक कारण ये भी है कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के बाद दोबारा दिल्ली की गद्दी संभालने की बात कही जिसका आतिशी ने भी समर्थन किया। इस प्रकार  बतौर मुख्यमंत्री उनकी छवि  कामचलाऊ की ही रहेगी। वैसे भी  श्री केजरीवाल को  मुख्यमंत्री पद जिन हालातों में  छोड़ना पड़ा उनमें त्याग जैसे किसी भाव की बात सोचना निरर्थक है। जमानत पर रिहा होने के बाद उन्होंने गैर भाजपा मुख्यमंत्रियों तक को ये समझाइश दे डाली कि यदि वे गिरफ्तार होते हैं तब त्यागपत्र न दें। उनका ये बयान ही काफी कुछ कह जाता है। सही बात ये है कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी उससे जुड़े जरूरी कार्य नहीं कर पाने के कारण  संवैधानिक संकट बढ़ रहा था। उन्हें डर था कि ऐसे में विधानसभा भंग की जा सकती है और वैसा होने पर राजनीतिक समीकरण उलट - पुलट सकते सकते हैं। इसीलिए जेल से बाहर आते ही उन्होंने पद छोड़ने की घोषणा कर डाली और बिना देर किये आतिशी को उत्तराधिकारी बना दिया। उनका ये सोचना जल्दबाजी होगी  कि उनके त्यागपत्र देने  से हरियाणा विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी पंजाब जैसा करिश्मा दिखाने में सफल हो जायेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में वे वोट कटवा की भूमिका निभा सकते हैं किंतु सत्ता की दौड़ में नहीं हैं। लेकिन कहीं कांग्रेस ने हरियाणा जीत लिया तब वह दिल्ली में आम आदमी पार्टी के वोटों में सेंध लगाने में जरूर सक्षम हो जाएगी।  आने वाले कुछ महीने देश की राजनीति में बड़ी उथलपुथल के रहेंगे जिनमें ये भी तय हो जाएगा कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय विकल्प बनने की कोई संभावना है या नहीं ? 


- रवीन्द्र वाजपेयी