Wednesday, 9 October 2024

राहुल की राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता फिर सवालों के घेरे में


लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गाँधी का हौसला  सातवें आसमान पर चढ़ गया था। लोकसभा में दिये भाषणों के आधार पर  प्रशंसक उन्हें नरेंद्र मोदी का विकल्प बताने लगे। खुद श्री गाँधी  प्रधानमंत्री पर जिस तरह से कटाक्ष करने लगे उससे ऐसा लगने लगा जैसे नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद देश वे ही चलाएंगे। मोदी जी का सीना अब 56 इंच का नहीं रहा, वे  मुझसे नजर नहीं मिला सकते, भाजपा के हिंदुत्व को जनता ने नकार दिया, आप हिन्दू नहीं हो, हम जातिगत जन गणना करवाकर रहेंगे जैसी टिप्पणियों से राहुल ये साबित करने में जुटे हुए थे कि अब वे पप्पू वाली छवि से बाहर निकलकर एक परिपक्व  व्यक्ति बन गए हैं। लेकिन उनके कतिपय बयानों से स्पष्ट हो गया कि उनमें गंभीरता नहीं आई। बजट बनाने वाले अधिकारियों के अलावा किसी मिस इंडिया के दलित या ओबीसी न होने जैसे बयान देकर उन्होंने  प्रमाणित कर दिया कि वे रट्टू तोते जैसे हैं जो कुछ बातों को ही दोहराया करते हैं। अपनी पिछली अमेरिका यात्रा के दौरान भी वे जातिगत आरक्षण का मुद्दा उठाकर मजाक का पात्र बन गए ।  गत दिवस जम्मू - कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के जो चुनाव परिणाम आये उनमें कांग्रेस का प्रदर्शन इस बात का प्रमाण  है कि राहुल को लेकर कांग्रेस ने जो उम्मीदें पाल रखी हैं वे पूरी नहीं हो सकेंगी। जम्मू - कश्मीर में पार्टी की सीटें पिछले चुनाव की तुलना में आधी रह गईं। मतदान के कुछ दिन पहले ही उमर अब्दुल्ला ने श्री गाँधी को इस बात के लिए लताड़ा कि उनको बजाय घाटी के जम्मू  के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में सक्रिय होना चाहिए , जहाँ कांग्रेस का काम ही शुरू नहीं हुआ।   उनकी बात सही निकली क्योंकि पार्टी दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सकी। यदि नेशनल कांफ्रेंस से गठबंधन नहीं हुआ होता तब शायद उसकी दशा पीडीपी से भी बदतर हो सकती थी। हरियाणा में तो कांग्रेस की जीत का अनुमान हर कोई लगा रहा था। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से लेकर एग्जिट पोल तक भाजपा के प्रति मतदाताओं की नाराजगी बताते हुए कांग्रेस की बड़ी जीत की भविष्यवाणी कर रहे थे। लोकसभा चुनाव का शानदार प्रदर्शन पार्टी की उम्मीदों का आधार था। लेकिन नतीजे पूरी तरह उलट गए। सीटें और मत प्रतिशत बढ़ने के बाद भी कांग्रेस बहुमत से दूर रह गई। राहुल ने हरियाणा में भी प्रचार किया किंतु वहाँ भी बचकानेपन से बाज नहीं आये । जलेबी की फैक्ट्री वाला बयान देकर खुद की तो हंसी उड़वाई ही, पार्टी का भी नुकसान किया। पार्टी के सबसे बड़े नेता होने के नाते उनका दायित्व था कि इस राज्य के जमीनी हालात का अध्ययन करते लेकिन वे भाजपा और प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाने में लगे रहे और अंत में खुद मजाक का पात्र बन बैठे। दूसरी तरफ भाजपा ने लोकसभा चुनाव में आशाजनक सफलता नहीं मिलने के बाद बिना निराश हुए अगले मोर्चों पर तैयारी शुरू कर दी। वह जानती थी कि जम्मू - कश्मीर में उसको बहुमत नहीं मिलेगा किंतु उसने 2014 की अपेक्षा अपनी सीटें भी बढ़ाईं  और मत प्रतिशत में भी सबसे आगे रही। हरियाणा में लोकसभा की 5 सीटें गंवाने के बाद भी पार्टी ने बेहतर संगठन क्षमता का प्रदर्शन किया। कांग्रेस हवा में उड़ती रही जबकि भाजपा ने जमीन पर रहकर मतदाता के साथ संवाद कायम किया जिसका लाभ उसे मिला।  चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की प्रतिक्रिया में न गंभीरता नजर आई और न ही गरिमा। जम्मू  - कश्मीर में भाजपा को पटकने की शेखी बघारने वाले पार्टी प्रवक्ता ये बताने से बचते रहे  कि वहाँ कांग्रेस का प्रदर्शन इतना दयनीय क्यों रहा? हरियाणा की हार को अप्रत्याशित और अस्वीकार्य बताकर पार्टी ने जो खिसियाहट दिखाई गई उससे ये साफ हो गया कि लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों का खुमार अभी तक बना हुआ है। ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ने के साथ ही चुनाव आयोग पर आरोप लगाने का घिसा - पिटा तरीका अपनाकर कांग्रेस ने साबित किया कि उसे जनादेश  का सम्मान करना नहीं आता। लोकसभा चुनाव के बाद उसके जो प्रवक्ता एग्जिट पोल करने वालों पर आग बबूला हो रहे थे वे ही कल उनके गलत होने पर आंसू बहाते दिखे। हरियाणा  की हार ने कांग्रेस  में आये अहंकार को जमीन दिखा दी। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव) की प्रवक्ता ने उसको नसीहत देते हुए कहा कि वह सीधे मुकाबले में भाजपा के सामने नहीं टिकती। संजय राउत ने तो यहाँ तक कह दिया कि कांग्रेस महाराष्ट्र में अकेले लड़ने की इच्छुक हो तो स्पष्ट करे। उ.प्र में होने जा रहे 10 विधानसभा उपचुनावों में सपा से आधी टिकिटें मांगने का उसका दबाव भी कमजोर पड़ जायेगा। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि इन चुनावों ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके से भाजपा को उबार दिया। मोदी मैजिक का असर भी दो राज्यों  में साफ नजर आया । लेकिन दूसरी तरफ राहुल गाँधी की राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 October 2024

जम्मू - कश्मीर में अपेक्षित नतीजे किंतु हरियाणा ने पूरे देश को चौंका दिया


हरियाणा और जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव की मतगणना में दोपहर 1.30 बजे तक आये रुझानों से स्पष्ट हो गया है कि जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस आसानी से बहुमत हासिल करने जा रहे हैं। इससे किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ क्योंकि वहाँ भाजपा केवल जम्मू क्षेत्र में प्रभावशाली है । कश्मीर घाटी में उसे एक भी सीट भी मिल गई तो वह असंभव के संभव होने जैसा होगा। लेकिन जम्मू की 43 सीटों में उसे अपेक्षा से कम सीटें मिलना  उसके लिए  झटका है।  बहरहाल ये शुभ संकेत है कि अलगाववाद से प्रभावित इस राज्य की राजनीति  में अब्दुल्ला परिवार की सियासी जमींदारी पहले जैसी नहीं रही। नेशनल कांफ्रेंस अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत नहीं लाती दिख रही। उसकी  सहयोगी कांग्रेस भी दहाई का आंकड़ा छूने के लिए संघर्ष कर रही है। चुनाव प्रचार में फारुख अब्दुल्ला ने धारा 370 की वापसी का मुद्दा जमकर उछाला था। वहीं कांग्रेस  इस सम्बन्ध में कुछ भी कहने से बचती रही। सरकार बनाने के बाद  नेशनल कांफ्रेंस के लिए इस संवेदनशील विषय को उठाना कठिन होगा क्योंकि देश के बाकी हिस्सों की जनभावनाओं का ध्यान रखते हुए कांग्रेस  अलगाववाद समर्थक किसी भी नीति से बचने का रास्ता अखत्यार करेगी जो अब्दुल्ला परिवार की साख को नुकसान पहुंचाने वाला होगा। भाजपा लगभग 30 सीटें जीतने के कगार पर है। नियमानुसार 5 विधायक मनोनीत होंगे जिनको सदन में मताधिकार प्राप्त होगा। जाहिर है वे भाजपा समर्थक रहेंगे। वही। वहीं 8 निर्दलीय जीत रहे हैं।  पीडीपी मात्र 2 सीटों पर आगे है। इस प्रकार भाजपा प्रमुख विपक्षी दल के रूप में स्थापित हो गई जो राज्य की राजनीति में दूरगामी असर डालने वाला होगा। जाहिर है मुख्यमंत्री तो उमर अब्दुल्ला ही बनेंगे किंतु  उनके लिए केंद्र सरकार से टकराव लेना नुकसान का कारण बन सकता है। ये देखते हुए फारुख, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से निकटता स्थापित कर नया खेल रच सकते हैं। यदि ये नहीं होता तब भी विधानसभा और उसके बाहर सरकार को विपक्ष के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।  कश्मीर घाटी की राजनीतिक वजनदारी घटाने में भी भाजपा निश्चित रूप से सफल होती दिख रही है।
       दूसरे जिस राज्य के परिणाम आ रहे हैं वह है हरियाणा। यहाँ सारे विश्लेषक और एग्जिट पोल कांग्रेस की इकतरफा जीत की भविष्यवाणी कर चुके थे। चुनाव के पहले ही भाजपा विरोधी पूरा तबका ये महौल बनाने में जुटा था कि कांग्रेस की लहर चलेगी। पूर्व चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव को तो  कांग्रेस की सुनामी नजर आ रही थी। परिणाम आने के पहले ही भूपिंदर हुड्डा,  शैलजा और रणदीप सुरुजेवाला मुख्यमंत्री बनने की कवायद में जुट गए। उनकी उम्मीदों के पीछे बेशक चुनाव पूर्व सर्वे और  एग्जिट पोल के निष्कर्ष थे। किसान आंदोलन, अग्निवीर और पहलवानों के मुद्दे पर भाजपा विरोधी मतदाता जिस तरह आक्रामकता के साथ मुखर था उससे भी ये एहसास मजबूत हुआ कि भाजपा तिकड़ी नहीं बना सकेगी।। लोकसभा चुनाव में उसके हाथ से आधी सीटें ही नहीं खिसकीं बल्कि मत प्रतिशत में भी भारी गिरावट आई। इन सब कारणों से उसके समर्थक मतदाता भी निराश थे। तमाम नेता पार्टी छोड़ गए। अशोक तंवर ने तो मतदान के ठीक पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया। राहुल गाँधी पूरे आत्मविश्वास से प्रधानमंत्री पर हमला करते रहे। मतदाताओं को जी भरकर प्रलोभन दिये गए। राज्य में सबसे प्रभावशाली जाट समुदाय की भाजपा से नाराजगी को भी बढ़ा - चढ़ाकर पेश किया जाता रहा। आज सुबह मतों  की गिनती शुरू होते ही कांग्रेस तेजी से बहुमत हासिल करती दिखी किंतु कुछ देर बाद ही देखते - देखते भाजपा बहुमत के आंकड़े से आगे निकल गई । इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उसकी सरकार आसानी से लौट रही है। पिछली सरकार को टेका लगाने वाले दुष्यंत चौटाला बुरी तरह परास्त हो चुके हैं। चौटाला परिवार के अन्य  छत्रप भी धराशायी होते दिख रहे हैं। सबसे बड़ी बात जाट समुदाय के राजनीतिक प्रभुत्व को इस चुनाव में चोट पहुंची। 2019 के विधानसभा चुनाव में 40 सीटों पर सिमट गई भाजपा इस बार अपने दम पर 50 के करीब है। वह भी बिना जाट नेतृत्व के और लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बावजूद। हालांकि कांग्रेस भी पिछले चुनाव की तुलना में आगे बढ़ी है किंतु  उसके हिस्से में विपक्ष की जिम्मेदारी ही आई है। निर्दलीय बड़ी संख्या में खड़े हुए किंतु जनता ने उन्हें नकार दिया। आम आदमी पार्टी भी कुछ हासिल न कर सकी जबकि यह अरविंद केजरीवाल का गृहराज्य है। सही बात ये है कि गैर जाट जातियों के ध्रुवीकरण ने भाजपा का काम आसान कर दिया। हरियाणा के नतीजों से  लोकसभा चुनाव में  कांग्रेस को मिले आत्मविश्वास में कमी आयेगी। वहीं ये अवधारणा कमजोर होगी कि मोदी कार्ड राज्यों में नहीं चलता। महाराष्ट्र में अब उद्धव ठाकरे और शरद पवार कांग्रेस पर हावी होंगे । वहीं झारखण्ड में भाजपा की संभावना बढ़ गई हैं। हिंदुत्व के विरुद्ध किये जा रहे दुष्प्रचार को भी हरियाणा के मतदाताओं ने ठेंगा दिखा दिया। इंडिया गठबंधन में भी टूटन बढ़ सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 7 October 2024

एग्जिट पोल के आंकड़े भाजपा के लिए चिंता का विषय

लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल के निष्कर्ष गलत निकलने के बाद सर्वे करने वाली एजेंसियों के साथ - साथ उनके प्रायोजक टीवी चैनलों की भी जबरदस्त किरकिरी हुई थी।  400 पार के नारे को सही बताने वाले एग्जिट पोल विपक्ष के निशाने पर आ गए। उन पर आरोप लगा कि उन्होंने शेयर बाजार को उठाने के लिए भ्रामक आंकड़े पेश किये जिनमें मोदी सरकार प्रचंड बहुमत के साथ  लौटती दिखाई गई। उससे उत्साहित होकर निवेशकों ने जमकर शेयरोंं की खरीदी कर डाली । हालांकि सरकार तो वापस आई किंतु  भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे रहने की वजह से वह सहयोगी दलों का सहारा लेने मजबूर हो गई। नतीजा शेयर बाजार के धड़ाम से गिरने के रूप में सामने आया। इसके चलते उसमें  पूंजी लगाने वालों को भारी नुकसान हुआ जिसका ठीकरा विपक्ष ने एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों के साथ ही टीवी चैनलों पर फोड़ा। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल  पर प्रतिबंध लगाए जाने की माँग भी उठी। यद्यपि सरकार का गठन होते ही शेयर बाजार चढ़ने लगा और बीते सप्ताह अपने सर्वोच्च स्तर तक जा पहुंचा।  इसी दौरान जम्मू कश्मीर और हरियाणा विधान सभा के चुनाव संपन्न हुए जिनके एग्जिट पोल 5 अक्टूबर की शाम जारी किये गये । लोकसभा चुनाव में भद्द पिटने के बाद भी टीवी चैनलों ने हमेशा की तरह न सिर्फ एग्जिट पोल के निष्कर्ष दिखाये बल्कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को बिठाकर चर्चा भी करवाई। चूंकि नतीजे दोनों राज्यों में भाजपा को पिछड़ते बता रहे थे लिहाजा जो विपक्ष लोकसभा चुनाव के बाद एग्जिट पोल के परिणामों को सिरे से नकार रहा था वही इन निष्कर्षों को पूरी तरह प्रामाणिक मानकर खुश नजर आया। वहीं दूसरी तरफ भाजपा वालों को ये  जमीनी सच्चाई से कोसों दूर प्रतीत हुए। भले ही  सभी पोल सीटों की संख्या को लेकर एकमत नहीं हों लेकिन सब का ये जरूर कहना था कि भाजपा दोनों राज्यों में सत्ता से बाहर रहेगी। जम्मू कश्मीर में  नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की  सरकार बनने की संभावना प्रबल है वहीं हरियाणा में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत हासिल करने जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी उक्त एग्जिट पोल को मान्य कर रहे हैं। हालांकि भाजपा को लगता है कि हरियाणा के परिणाम गत वर्ष संपन्न छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की कहानी दोहरायेंगे । जहाँ सभी सर्वेक्षण कांग्रेस सरकार के दोबारा सत्ता में आने की भविष्यवाणी कर रहे थे किंतु जब परिणाम आये तो भाजपा को स्पष्ट बहुमत  मिला। जहाँ तक बात जम्मू कश्मीर की है तो वहाँ जम्मू और कश्मीर घाटी में अलग - अलग माहौल है। जम्मू अंचल की 43 सीटों  में से भाजपा को यदि कम से कम  35  नहीं मिलतीं तब वह सत्ता की दौड़ से बाहर हो जाएंगी क्योंकि घाटी में उसका कोई वजूद नहीं है। उसकी उम्मीद केवल इस बात पर टिकी है कि घाटी में नेशनल काँफ्रेंस और पीडीपी को कम सीटें मिलें। कुछ एग्जिट पोल में भी  निर्दलीयों के बड़ी संख्या में जीतने का अनुमान लगाया गया है। उल्लेखनीय है लोकसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती दोनों हार गए थे। उसके बाद घाटी में कुछ नये चेहरे उभरकर सामने आये। देखने वाली बात ये होगी कि त्रिशंकु की स्थिति में ये किसके साथ जायेंगे क्योंकि घाटी में धारा 370 की वापसी पर सभी एकमत हैं। वहाँ सारी 47 सीटें नेशनल काँफ्रेंस  जीत जाए ये नामुमकिन है। इसी तरह जम्मू की अधिकांश सीटों पर लड़ने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत अच्छा होने की उम्मीद नहीं है। मतदान के कुछ दिन पूर्व ही उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना भी की थी कि उसने जम्मू क्षेत्र में काम ही शुरू नहीं किया। इस राज्य में राजनीतिक अनिश्चितता बने रहने की संभावना अभी भी है। लेकिन हरियाणा में माहौल भाजपा विरोधी बनाने में विपक्ष काफी हद तक सफल हो गया था। लोकसभा चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री बदलने का दांव भी कारगर नहीं रहा और  कांग्रेस आधी सीटें जीत गई। हालांकि इस बार  भाजपा ने आखिर तक काफी जोर लगाया किंतु  जिस तरह उ.प्र में यादव, दलित और मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण ने उसको लोकसभा में स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया ठीक वैसे ही समीकरण हरियाणा में जाट, दलित और मुस्लिम बनाते दिखे। यदि भाजपा सवर्ण और ओबीसी मतों को थोक के भाव अपने झोली में डालने के साथ ही जाट समुदाय  की एकजुटता में सेंध  लगाने में सफल नहीं हो सकी तो फिर उसकी तिकड़ी बनना नामुमकिन होगा। कल दोपहर तक दोनों राज्यों की तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी। यदि एग्जिट पोल सही साबित हुए तब भाजपा के लिए महाराष्ट्र और झारखण्ड की लड़ाई बेहद कठिन हो जाएगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 October 2024

भारत में भी नेपाल जैसा गृहयुद्ध छेड़ना चाहते हैं नक्सली मानसिकता के पोषक


छत्तीसगढ़ वह राज्य  है जिसकी सीमाएं  म.प्र , उ.प्र, महाराष्ट्र, झारखंड, उड़ीसा, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश से मिलती हैं। ये भी संयोग है कि इन सीमावर्ती इलाकों में भी आदिवासी बाहुल्य है और इसीलिए ये नक्सली आतंक के गढ़  हैं। एक जमाने में म.प्र के चंबल और बुंदेलखंड अंचल में सक्रिय डाकू बड़ी वारदात करने के बाद उ.प्र और राजस्थान भाग जाते थे। उसी रणनीति को नक्सलियों ने अपनाया । उक्त किसी भी राज्य में हिंसक घटना को अंजाम देने के बाद वे पड़ोसी राज्य में जाकर छिप जाते हैं। उनके कार्यक्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा घने वनों से घिरा होने से  छिपने में सहूलियत होती है। ये बात भी सही है कि जिस तरह से डाकुओं को समाज के एक वर्ग के साथ ही पुलिस में बैठे कतिपय लोगों का संरक्षण मिलता था ठीक वही स्थिति नक्सलियों के साथ भी है। कुछ लोग भयवश भी उनका साथ देते हैं वहीं पुलिस और प्रशासन में बैठे लोगों के अपने स्वार्थ हैं।  ये बात भी गौरतलब है कि नक्सलियों के कार्यक्षेत्र का अधिकांश इलाका खनन गतिविधियों वाला है । खनन व्यवसायियों से जबरिया वसूली उनकी आय का स्रोत माना जाता है। उसके अतिरिक्त अनेक बड़े कारोबारी अपनी सुरक्षा के लिये नक्सलियों को धन देते हैं। उनकी कार्यप्रणाली चूंकि हिंसा से प्रेरित है इसलिए माओवादी विचारधारा  के नाम पर  नृशंस हत्याएँ कर वे अपने आतंक का साम्राज्य कायम कर सके । लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद नक्सलियों के सफाये का जो अभियान शुरू किया गया उसके परिणामस्वरूप वे पहले जैसे ताकतवर नहीं रहे। उनके सशस्त्र गिरोहों का खात्मा किये जाने के साथ ही शहरी क्षेत्रों में बैठे  सरपरस्तों पर नकेल कसे जाने के कारण उनकी जबरदस्त घेराबंदी संभव हो सकी। उन्हीं की भाषा में जवाब देने की शैली अपनाये जाने के अच्छे परिणाम देखने मिल रहे हैं। गत दिवस छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों ने 30 से अधिक नक्सलियों को मार गिराया और बड़ी मात्रा में  हथियार तथा गोला - बारूद भी बरामद किया। कुछ माह पहले भी लगभग दो दर्जन मार गिराए गए थे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के राज में नक्सलियों को प्रश्रय मिलने के आरोप लगा करते थे। कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल सहित पार्टी के अनेक नेताओं की नक्सलियों द्वारा हत्या किये जाने में भी एक पूर्व मुख्यमंत्री का हाथ बताया जाता था जो अब दुनिया में नहीं हैं। अन्य पड़ोसी राज्यों में भी कुछ राजनीतिक दल चुनाव के दौरान नक्सलियों की मदद लेते रहे हैं। वामपंथी पार्टियों को तो उनका खुला समर्थन रहता ही है। लेकिन जैसे - जैसे वामपंथी राजनीति का प्रभाव कम होता जा रहा है वैसे - वैसे नक्सलियों का ढांचा भी कमजोर पड़ने लगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2026 तक भारत को नक्सली आतंक से मुक्त करने का जो संकल्प लिया वह सत्य प्रतीत होने लगा है। सुरक्षा बलों के प्रयासों से नक्सल प्रभावित इलाकों के  निवासियों में भी साहस का संचार होने लगा है जो अपनी और परिवार की प्राण रक्षा के लिए उनके इशारों पर नाचते थे। बड़ी संख्या में नक्सलियों के चंगुल में फंसे युवाओं ने आत्म समर्पण कर मुख्य धारा में शामिल होने की बुद्धिमत्ता भी दिखाई। वर्तमान में झारखंड और तेलंगाना छोड़कर छत्तीसगढ़ और उसके पड़ोसी राज्य उ.प्र , म.प्र , महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में भाजपा अथवा उसके सहयोगियों की सरकारों से नक्सलियों को  समर्थन और सहानुभूति प्राप्त नहीं होने से भी उनकी पकड़ कमजोर हो रही है। लेकिन जंगलों से सफाया होने के बाद समाज के भीतर घुसे बैठे नक्सली मानसिकता के सफ़ेदपोशों का पर्दाफाश होना भी जरूरी है। ये लोग प्रशासन, शिक्षा, कला, साहित्य और पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में  बैठकर नक्सली विचारधारा  का प्रचार - प्रसार करते हैं। इनकी कार्यशैली व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना भड़काने पर केंद्रित है। स्वयंसेवी संगठनों के जरिये भी ये अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। इनके विरुद्ध जाँच एजेंसियां कारवाई करती तो हैं किंतु साक्ष्य नहीं मिलने से वे बच जाते हैं। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए। नक्सलवादी कहने को सामाजिक विषमता और शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए हथियार उठाते हैं लेकिन उनका असली उद्देश्य  भारत में खूनी क्रांति के रास्ते पर चलकर नेपाल जैसी चीन समर्थित माओवादी सरकार बनाना है । इसके लिए ये देश हित के विरुद्ध कार्य करने वाली हर ताकत के साथ हाथ मिलाने तैयार रहते हैं। नेपाल की तरह ही भारत में गृहयुद्ध भड़काने की साजिश  भी नक्सली विचारधारा का पोषण करने वाले रचते रहते हैं। बीते कुछ वर्षों में जे .एन .यू जैसे कुछ शिक्षण संस्थानों सहित सरकार विरोधी आंदोलनों में नक्सली मानसिकता वाले  चेहरे नजर आना उसी साजिश का हिस्सा है। सरकार को आस्तीन में छिपे इन सांपों का विष दंत तोड़ना होगा। समाज में जो राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी वर्ग है उसे भी इन तत्वों से वैचारिक स्तर पर निपटना चाहिए। भारतीय समाज में रक्तरंजित क्रांति को सामाजिक स्वीकृति कभी नहीं मिली। यही वजह है कि लेनिन और माओ के विचार तमाम प्रयासों के बाद भी मुख्यधारा में समाहित नहीं हो सके।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 October 2024

इजरायल और ईरान सीधे भिड़े तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जायेगी


पश्चिम एशिया में एक बार फिर महायुद्ध की आशंका  बढ़ने लगी है। जब तक बात इजरायल और गाज़ा पर काबिज हमास के बीच विवाद की थी तब तक तो गनीमत रही किंतु धीरे - धीरे लड़ाई का दायरा लेबनान और यमन तक बढ़ने के बाद  अब ईरान तक फैलने के कगार पर है । सर्वविदित है कि हमास और हिज़बुल्लाह जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों को अस्त्र, शस्त्र और धन ईरान ही उपलब्ध करवाता है।  अरब देशों के बीच अमेरिका का खुलकर विरोध करने वाला ईरान ही है। उसके पास परमाणु बम होने के कारण ही अमेरिका उसके प्रति द्वेष भाव रखता है। शाह पहलवी के हटने के बाद जब अयातुल्ला खोमैनी ईरान की सत्ता पर काबिज हुए तो पूरा माहौल बदल गया। शाह के दौर की आधुनिकता  पलक झपकते लुप्त होने लगी । खोमैनी के शासन में ईरान पूरी तरह कट्टर इस्लामिक देश बन गया। अपार तेल संपदा के बल पर वह अमेरिका को चुनौती देने का दुस्साहस करने से भी बाज नहीं आता जिनके कारण उसने ईरान पर जबरदस्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। परिणास्वरूप वह रूस की तरफ झुक गया। गत वर्ष हमास द्वारा इजरायल पर अचानक किये गए हमले के पीछे भी ईरान ही था। बीच - बीच में उसके और इजरायल के बीच भी मिसाइलों का आदान - प्रदान होता रहा किंतु सीधे युद्ध की स्थिति नहीं बनी। लेकिन बीते कुछ दिनों में हालात उसी ओर बढ़ रहे हैं।  गत सप्ताह ईरान ने सैकड़ों मिसाइलें इजरायल पर बरसाकर आग में घी डाल दिया जिससे  इजरायल को भी ईरान पर आक्रमण का वाजिब बहाना मिल गया। वह जिस तरह से आक्रामक है उससे लगता है अमेरिका ने उसे पूरी शह दे रखी है। लेकिन इस समूचे घटनाक्रम में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली तो ये कि ईरान का सरपरस्त रूस खुद यूक्रेन के साथ ऐसे युद्ध में फंसा हुआ है जिसका अंत समझ में नहीं आ रहा। यूक्रेन की पीठ पर  अमेरिका का पूरा - पूरा हाथ होने से वह रूस जैसी महाशक्ति का मुकाबला कर रहा है। दूसरी उल्लेखनीय बात ये है कि अरब के इस्लामिक देशों के बीच पहले जैसी एकता नहीं रही। ईरान और ईराक के बीच  एक दशक तक चले युद्ध ने इसकी शुरुआत की थी। फिर ईराक द्वारा कुवैत पर कब्जा किये जाने के बाद अमेरिका ने जो सैन्य कारवाई की उसने भी इस अंचल के शक्ति संतुलन को उलट -  पुलट दिया। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफ़ी जैसे जो  घोर अमेरिका विरोधी राष्ट्राध्यक्ष  थे उन दोनों को अमेरिका ने दुनिया से ही हटा दिया। एक और बात जो इस दौरान देखने मिल रही है वह है सऊदी अरब और इजरायल में बढ़ती नजदीकी। भले ही पश्चिम एशिया के इस्लामिक देशों पर  सऊदी अरब की चौधराहट पहले जैसी नहीं रही किंतु अपनी बेशुमार तेल संपदा और संपन्नता के कारण वही ऐसा देश है जो अमेरिका के साथ बराबरी से बैठता है। चूंकि उसने भी इजरायल का विरोध बंद कर दिया वहीं  अन्य अरबी देशों में एक भी कद्दावर नेता नहीं बचा जो सबको इजरायल के विरुद्ध लामबंद कर सके। जहाँ तक बात फिलीस्तीनियों की है तो यासर अराफात के बाद  उनका कोई प्रभावशाली नेतृत्व है नहीं। हमास और हिजबुल्लाह जैसे आतँकवादी संगठनों ने उनकी लड़ाई अपने हाथ में लेकर उसकी गंभीरता खत्म कर दी। अराफात की छवि भी  शुरू में तो आतँकवादी की ही थी किंतु जीवन के उत्तरार्ध में वे वैश्विक स्तर के नेता बनकर उभरे जिसे तीसरे विश्व के देशों का समर्थन और सहयोग मिला। इजरायल के साथ हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद तो उनकी प्रशंसा होने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि पश्चिम एशिया में शान्ति का सूर्योदय हो चुका है लेकिन उनके निधन के बाद स्थितियाँ कुत्ते की पूँछ की तरह फिर से पुराने स्वरूप में लौट आईं। इजरायल पूरी तरह सही है और उसका हर कदम न्यायोचित है यह मान लेना अनुचित होगा किंतु वर्तमान तनाव हमास के हमले से शुरू हुआ और हिजबुल्लाह के कूदने से उसमें और वृद्धि हो गई। रही - सही कसर ईरान पूरी किये दे रहा है। ये बात पूर्णतः सत्य है कि जिस तरह हमास और हिजबुल्लाह बिना ईरान के संरक्षण के इजरायल से नहीं टकरा सकते वैसे ही इजरायल भी बिना अमेरिका की सहमति और सहयोग से एक साथ कई मोर्चे नहीं खोल सकता। इजरायल के जो तेवर हैं वे किसी बड़ी घटना का संकेत जरूर दे रहे हैं। अमेरिका ईरान को झुकाने का जो अवसर बरसों से तलाश रहा था वह उसे अनायास मिल गया है साथ ही रूस के यूक्रेन में उलझे रहने से फिलहाल किसी बड़े प्रतिरोध की संभावना भी नहीं है। लेकिन  इजरायल और ईरान सीधे भिड़े तो इससे पूरी दुनिया हिल उठेगी। कोरोना के बाद यूक्रेन संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचाया उससे वह धीरे - धीरे उबरने की स्थिति में आ ही रही थी की ये संकट आ गया। चिंता का विषय ये है कि जिनको इसे रोकना चाहिए वे ही उसे भड़का रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 October 2024

धर्मनिरपेक्षता का पालन केवल हिंदुओं की जिम्मेदारी नहीं


म.प्र के बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चित रहते हैं। भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में वे लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। बिहार के बोधगया में दिया उनका वह ताजा  बयान चर्चा के साथ ही विवाद में भी घिर गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हिन्दू अपने धर्मगुरुओं को अपमानित करने में आगे - आगे रहते हैं जबकि मुसलमान कभी मौलवियों के विरुद्ध कुछ नहीं बोलते। उन्होंने इस बात पर भी ऐतराज जताया कि  हवस के पुजारी जैसी टिप्पणी आम तौर पर सुनाई देती है लेकिन हवस का मौलवी या पादरी नहीं कहा जाता। उनका कहना है कि हिंदुओं के दिमाग में इस तरह के शब्द प्रायोजित तरीके से भरे गए हैं। उनके इस बयान पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की आपत्ति आने पर उनका कहना है कि पुजारी हिन्दू धर्म में अत्यंत सम्मानित होता है और उनके बयान का उद्देश्य हिंदुओं को जगाना था। उनकी उक्त  टिप्पणियों से राजनीतिक हल्कों में भी  हलचल है। लेकिन बिना पूर्वाग्रह के सोचा जाए तो श्री शास्त्री की बातों में काफी वजनदारी है। उनमें सांप्रदायिकता खोजने वाले निश्चित रूप से बिलबिला रहे होंगे किंतु यक्ष प्रश्न ये है कि इस तरह की टिप्पणियों का केंद्र  सनातन धर्म और उससे जुड़े चरित्र ही क्यों होते हैं? भारतीय फिल्मों में भी पंडित और पुजारी सामान्यतः  उपहास का पात्र होता है या उसे चरित्रहीन बताया जाता है। इसके विपरीत मौलवी और पादरियों को ज्यादातर दयावान , परोपकारी और सहृदय दिखाने का चलन है। बागेश्वर धाम प्रमुख का ये कहना बिल्कुल सही है कि हिंदुओं में अपने धर्म से जुड़े सम्माननीय व्यक्तित्वों के अपमान को चुपचाप देखने की प्रवृत्ति है जबकि मुस्लिम समाज अपने धर्म गुरुओं के विरुद्ध एक बात भी न कहता और न सुनता है। ये आरोप भी सच्चाई के काफी करीब है कि हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता को ढोने का दायित्व केवल हिंदुओं के कंधों पर है। सहिष्णुता और सर्व धर्म सद्भाव की भावना भी उन्हीं से अपेक्षित है। वैसे ये बात बिल्कुल जायज है कि बहुसंख्यक होने से हिंदुओं का फर्ज है कि वे  अल्पसंख्यक समुदाय पर अपनी मर्जी न थोपें परंतु उसी के साथ  ही अल्पसंख्यकों को भी चाहिए कि वे हिंदुओं की  भावनाओं का सम्मान करें और बजाय  टकराव के रास्ते पर चलने के उनके साथ समन्वय स्थापित करें। हमारा देश  बहुधर्मी है जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध , पारसी और ईसाई सभी  रहते हैं। इनमें हिंदुओं की संख्या 82 प्रतिशत है। ऐसे में इसे भले ही सरकारी तौर पर  हिन्दू राष्ट्र घोषित न किया गया हो किंतु बागेश्वर धाम प्रमुख द्वारा भारत को हिन्दू राष्ट्र कहे जाने पर कांग्रेस के वरिष्ट नेता कमलनाथ ने भी ये कहकर उनका समर्थन किया था कि 80 फीसदी से ज्यादा हिन्दू जिस देश में रहते हों उसे हिन्दू राष्ट्र नहीं तो और क्या कहेंगे ? रही बात धर्मनिरपेक्षता की तो वामपंथी विचारधारा से ओतप्रोत सुप्रसिद्ध शायर जावेद अख्तर को दिये एक साक्षात्कार में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने दो टूक कहा था कि भारत संविधान के कारण धर्म निरपेक्ष नहीं है बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं। वे एक पुस्तक या ईश्वर से बंधे नहीं हैं। हिन्दू धर्म की सोच इतनी उदार है कि वह नास्तिक व्यक्ति को भी अपने भीतर समाहित कर लेती है। इसके उलट मुस्लिम बहुल देशों में धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। ज्यादा दूर क्यों जाएं हमारे पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्ला देश को ही देखें तो वहाँ रहने वाले हिंदुओं और ईसाइयों  की  दयनीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इंडोनेशिया ही संभवतः अपवाद होगा जो मुस्लिम बहुल होने के बावजूद भारतीय संस्कृति से अपना जुड़ाव बनाये हुए है। समूचे अरब जगत में एक भी मुस्लिम बहुल देश सिवाय इस्लाम के अन्य किसी धर्म को प्रोत्साहित नहीं करता। हमारे देश में रहने वाले गैर हिंदुओं को प्राप्त धार्मिक आजादी पर किसी को आपत्ति नहीं है किंतु इसके चलते हिंदुओं के धार्मिक रीति रिवाजों और  व्यक्तित्वों का अपमान किया जाना धर्मनिरपेक्षता के खोखलेपन को उजागर करता है। ये बात पूरी तरह सच है कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने हिंदुओं के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर किया है। आजादी के बाद गंगा - जमुनी संस्कृति का जो स्वांग रचा गया उसने भी बहुत नुकसान पहुंचाया। ऐसे में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने जो मुद्दा छेड़ा उस पर हिन्दू समाज  तो मंथन करे ही  किंतु उनकी बात का विरोध कर रहे लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का पालन अकेले  बहुसंख्यक समुदाय की जिम्मेदारी ही नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 October 2024

राज्य माता का दर्जा देने मात्र से गाय पालने के प्रति उत्साह नहीं जाग सकता

 

चुनाव से पहले सत्ता में बैठे लोगों द्वारा लोक लुभावन घोषणाएं करना एक परिपाटी है । इसी के चलते महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने म.प्र की लाड़ली बहना की नकल करते हुए लड़की बहिन योजना प्रारंभ की जिसमें प्रति माह 1500 रु. दिये जा रहे हैं। इस योजना का असर भी दिखाई देने लगा है । और भी ऐसे ऐलान राज्य सरकार की तरफ से किये जा रहे हैं जो मतदाता को आकर्षित कर सकें। इसी क्रम में गत दिवस देशी गाय को राज्य माता का दर्जा देने के  साथ ही उसे पालने पर प्रतिदिन 50 रु. अनुदान देने की घोषणा भी की गई। देशी नस्ल की गायों को पालने के लिए राज्य सरकार की ओर से की गई पहल सतही तौर पर तो काफी अच्छी प्रतीत होती है। लेकिन गो पालन को प्रोत्साहित करने की सरकारी योजनाओं का जो हश्र अन्य राज्यों में हुआ उसे देखते हुए महाराष्ट्र सरकार की इस घोषणा से देशी गाय पालने के लिए लोगों को आकर्षित करने का उद्देश्य पूरा होने पर संदेह करना गलत नहीं होगा। म.प्र सहित अनेक राज्यों ने गोशालाओं हेतु अनुदान देने की नीति बना रखी है किंतु उनमें गायों की दुर्दशा  किसी से छिपी नहीं है। भोपाल के निकट एक गोशाला में तो सैकड़ों गायें मर गईं। सरकार उनके रखरखाव और भरण - पोषण हेतु जो अनुदान देती है वह भी किसी मजाक से कम नहीं। पहले  शहरों के निकट पर्याप्त  खुली जगह होती थीं उनमें  गाय - भैंस को चरने भेजा जाता था। शहरों के असीमित विस्तार ने वह सुविधा  छीन ली जिससे गाय के लिए आहार का खर्च भी बढ़ गया। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि दुग्ध व्यवसाय में भैंस का उपयोग ज्यादा होने से भी गाय पालने से लोग बचने लगे। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले कृषि के साथ गाय पालना आम था। कुछ लोग भैंस भी रखते थे किंतु जब तक बैलों से खेती होती रही तब तक गाय का पालन अनिवार्यता थी क्योंकि बछड़ा ही आगे चलकर बैल बनता था। हालाँकि खेती में मशीनों का उपयोग बढ़ने के बाद भी  ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरों में रहने वाले हिन्दू भी गाय के प्रति श्रद्धा रखते हैं । ज्यादातर घरों में गाय की रोटी आज भी बनती है। उसको माँ कहा जाता है। गो हत्या को पाप की श्रेणी में माना गया है। बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं का  सम्मान करते हुए देश के 28 में से 20 राज्यों में गो वध प्रतिबंधित है। हालाँकि प. बंगाल सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में उस पर रोक नहीं है और वहाँ गोमांस खाया भी जाता है। भारत में हिंदुओं के अलावा जैन, सिख बौद्ध और पारसी भी गोमांस से परहेज करते हैं। गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग भी धर्म गुरुओं द्वारा उठाई जाती रही किंतु उस पर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। कुल मिलाकर गोपाल ( श्रीकृष्ण) की आराधना करने वाले देश में गाय के प्रति श्रद्धा के बावजूद उपेक्षा भाव बढ़ता गया जिससे धीरे - धीरे उसके पालन के प्रति रुचि भी घट गई। इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है शहरों और राजमार्गों पर बैठे गायों के झुंड। जो लोग गाय रखे हुए हैं वे भी दूध निकालने  के बाद उसे छोड़ देते हैं । जो गाय दूध देना बंद कर देती हैं वे भी बेसहारा हो जाती हैं । इसीलिए प्रति माह देश भर में हजारों गायें राजमार्गों पर ट्रकों से कुचलकर मारी जाती हैं जिनका शव वहीं सड़ता रहता है। ये सब देखते हुए महाराष्ट्र सरकार द्वारा देशी गाय को राज्य माता का दर्जा देना उसके पालन के प्रति लोगों में उत्साह का सृजन कर सकेगा ये कहना मुश्किल है। और फिर 50 रु. प्रतिदिन का अनुदान भी ऊँट के मुँह में जीरा समान ही है। वैसे गाय के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास हर दृष्टि से स्वागत योग्य हैं। गाय का दूध औषधि तुल्य माना जाता है। भैंस की तुलना में उसका रखरखाव भी कम खर्चीला है किंतु वह व्यवसायिक दृष्टि से फायदेमंद नहीं मानी जाती। इसीलिए अधिकतर डेरियों में भैंसे ही होती हैं। वैसे कुछ बड़े शहरों में गाय के दूध और उससे बने घी आदि की अच्छी कीमत मिलती है किंतु ग्रामीण इलाकों और मध्यम श्रेणी के शहरों में लोगों की क्रय शक्ति उतनी नहीं होती। गुजरात जैसे राज्य में अमूल ने दुग्ध उत्पादकों को जिस तरह आर्थिक संबल प्रदान किया वह व्यवस्था  मार्गदर्शक का काम कर सकती है। सही बात ये है कि अर्थ प्रधान इस युग में आस्था पर व्यवसायिकता हावी है। जिस प्रकार हिन्दी को राजभाषा बनाये जाने के बाद भी वह अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को कम नहीं कर पा रही क्योंकि रोजगार प्राप्ति में वह उसके जितनी सहायक नहीं है। उसी तरह गाय को राज्य माता क्या राष्ट्र माता का  दर्जा दे दिया जाए तब भी उसके पालन के प्रति रुचि तब तक नहीं बढ़ेगी जब तक वह आर्थिक तौर पर  लाभदायी न हो। और भला 50 रु. रोजाना के अनुदान के लिए कौन गाय पालेगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी