Saturday, 12 October 2024

सनातन , हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रति बढ़ता समर्थन संघ की उपलब्धि





राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की अलख जगाने के लिए 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में स्व. डाॅ. केशव बलीराम हेडगेवार ने मुट्ठी भर लोगों के साथ जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन की स्थापना की थी वह शताब्दी वर्ष में प्रविष्ट हो गया। स्वाधीनता के 22 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आये इस संगठन का उद्देश्य जाति, भाषा और सांस्कृतिक विविधता के कारण बिखरे हुए हिंदू समाज को संगठित कर एक ऐसा सामाजिक ढांचा खड़ा करना था जिससे जुड़े व्यक्ति के मन में भारत की एकता और इसके प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने का भाव हो और निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें का विचार जिनकी प्रेरणा का स्रोत हो। ये प्रश्न संघ के प्रारम्भ से ही  उठता रहा है कि वह केवल हिंदुओं की ही बात क्यों करता है और जब इस देश में हिंदुओं के अलावा मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन तथा पारसी आदि धर्मों के अनुयायी भी रहते हैं तब वह भारत को हिन्दू राष्ट्र क्यों कहता है ? यद्यपि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था और पाकिस्तान ने अलग होते ही खुद को इस्लामिक देश घोषित कर लिया किंतु भारत ने ऐसा करने के बजाय  सर्व धर्म समभाव के पुरातन विचार को अपनाया और सभी को अपनी आस्था और पूजा पद्धति के अनुरूप धार्मिक क्रिया हेतु स्वतंत्रता प्रदान की।  लेकिन रास्वसंघ द्वारा भारत को हिन्दू राष्ट्र कहने के पीछे उसकी भौगोलिक रचना है जो हिमालय से सिंधु ( समुद्र) फैली है। और इसी आधार पर  इसके दायरे में रहने वाले सभी लोग चाहे वे किसी भी धर्म या संप्रदाय के हों, उनकी राष्ट्रीयता हिमालय और सिंधु के संक्षिप्तीकरण के रूप में हिन्दू ही  है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत के बहुसंख्यक निवासियों द्वारा हजारों वर्ष से जिस धर्म का पालन किया जाता रहा उसका नाम हिन्दू न होकर सनातन है। हिन्दू शब्द तो जैसा ऊपर बताया गया भौगोलिक रचना पर आधारित है और विदेशी आक्रांताओं ने भी  इसी नाम का उपयोग किया । आजादी के दौरान भी ज्यादातर लोग इसे हिंदुस्तान ही कहते थे। और अभिवादन के लिए जय हिन्द ही कहा जाता था। आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को लालकिले की प्राचीर से प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने अपने भाषण की समाप्ति के बाद तीन बार जय हिन्द बोलने की जो परंपरा स्थापित की उसका पालन अब तक के सभी प्रधानमंत्री करते आ रहे हैं। इकबाल ने भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा लिखा।  लेकिन भारत के संविधान की प्रस्तावना में इंडिया जो कि भारत है लिखे जाने के बाद से देश का अधिकारिक नाम भारत हो गया किंतु हिंदुस्तान भी आज तक बोलचाल में है और जय हिन्द भी। संघ का हिन्दू राष्ट्र वस्तुतः धर्म के बजाय राष्ट्रीयता पर आधारित विचार है जिसे वामपंथियों ने मुस्लिम विरोधी प्रचारित करना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें संघ से अपने लिए खतरा नजर आने लगा था। चूँकि पं. नेहरू भी साम्यवादी विचारधारा के प्रति  आकर्षित थे अतः उनका सहारा लेकर कांग्रेस में अनेक वामपंथी घुस आये। धीरे - धीरे वे सत्ता तथा और संगठन के साथ ही शिक्षा और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में भी काबिज होते गए। प्रशासन में भी साम्यवादी चेहरे भरे जाते रहे। इंदिरा गाँधी की सत्ता रहते तक तो कांग्रेस पूरी तरह वामपंथियों की चारागाह बन चुकी थी। इनके कारण ही संघ जैसे देशभक्त संगठन पर प्रतिबंध लगाए गए। गाँधी जी की हत्या से इसका सिलसिला शुरू हुआ जो 1992 में बाबरी ढांचा गिरने तक जारी रहा। हालांकि हर प्रतिबंध के बाद वह और शक्तिशाली होकर उभरा क्योंकि उस पर लगे आरोप साबित नहीं हो सके। संघ ने अपने को राजनीति से दूर रखा किंतु जब भी देश और लोकतंत्र पर खतरा आया उसने आगे आकर संघर्ष किया जिसके परिणाम बेहद सकारात्मक निकले। जब संघ की विचारधारा और हिंदुत्व का भाव समाज में तेजी से फैलने लगे तो वे राजनीतिक शक्तियाँ एकजुट होने लगीं जिन्हें हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र से नफरत है। संघ का अंधा विरोध करने के लिए इन्होंने मुस्लिम परस्ती का दामन थामा। जिसका लाभ लेकर आतंकवाद देश की  एकता और अखंडता के लिए खतरा बन गया। बीते कुछ वर्षों में हिन्दू , हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विरुद्ध एक सुनियोजित षडयंत्र रचा जा रहा है जिसे विदेशी शक्तियों का समर्थन प्राप्त है। देश के अनेक सीमावर्ती राज्यों में देश विरोधी ताकतों का उभार इसका प्रमाण है। संघ द्वारा सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच सामाजिक समरसता कायम करने के जो प्रयास किये गये उनके अनुकूल  परिणाम निकलने से विरोधी ताकतें बौखलाकर बहुसंख्यक समाज में जाति आधारित विभाजन करने का खतरनाक खेल खेलने में जुटी हैं। लोकसभा चुनाव में इसका असर देखने मिल चुका है। उसके बाद से देश में मुस्लिम कट्टरपंथी जिस तेजी से आक्रामक हुए वह भारत में बांग्ला देश जैसे हालात उत्पन्न करने का प्रयास है। ऐसी स्थितियों में हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को मजबूत करना सर्वोच्च प्राथमिकता है जिसे रास्वसंघ ही अमली जामा पहना सकता है। यही कारण है कि ज्यादातर राजनीतिक दल संघ को लेकर विष वमन किया करते हैं। लेकिन अपनी देशभक्ति , अनुशासन और सेवाभाव के कारण उसका विस्तार पूरे देश में हो चुका है। समाज के जिम्मेदार वर्ग  में ये विश्वास तेजी से मजबूत होता जा रहा है कि संघ की शक्ति ही विघटनकारी ताकतों का सामना कर सकती है। संघ का शताब्दि वर्ष में प्रवेश उम्मीदें जगाने वाला है। 99 वर्षों की उसकी गौरवशाली यात्रा विश्व इतिहास में अनोखी है। देश के बाहर भी संघ के स्वयंसेवक देश की साख और धाक जमाने में जुटे हुए हैं। सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघ की प्रभावशाली उपस्थिति उसकी सफलता और स्वीकार्यता का प्रमाण है। महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने 21 सदी भारत की होने की जो भविष्यवाणी की थी , रास्वसंघ उसे  सही साबित करने में जुटा हुआ है। सनातन , हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रति बढ़ता समर्थन संघ की बड़ी उपलब्धि है। शताब्दि वर्ष में उसकी भूमिका पर देश ही नहीं समूचे विश्व की निग़ाह रहेगी। 

आलेख :- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 11 October 2024

उमर को समझ में आ गया कि 370 की वापसी नामुमकिन है

भा चुनाव के दौरान नेशनल काँफ्रेंस के नेता डाॅ.फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर  जम्मू - कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के साथ  धारा 370 की बहाली का मुद्दा गर्माये रहे। घाटी के मतदाताओं पर  इसका असर  नेशनल काँफ्रेंस को वहाँ भारी सफलता मिलने के रूप में  देखने मिला। महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी को घाटी के मतदाताओं ने इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि  उसने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी।  जमायत ए इस्लामी सहित अन्य छोटे दलों और अलगाववाद समर्थक उम्मीदवारों को भी घाटी के लोगों ने समर्थन नहीं दिया जिससे कि ऐसी सरकार बने जो  पूर्ण राज्य और 370 की बहली जैसी मांगें मंजूर करवा सके। हालांकि नेशनल काँफ्रेंस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु उसकी  सहयोगी कांग्रेस को 6 सीटें मिलने से कमी पूरी हो गई। 4 निर्दलीय  भी सरकार के साथ आ गए। भाजपा चूंकि काफी पीछे रह गई इसलिए सरकार को कोई खतरा नहीं है। ऐसे में आशंका होने लगी कि उमर अब्दुल्ला और उनके पिता पूर्ण राज्य और 370 के मुद्दे पर केंद्र के साथ टकराव के रास्ते पर बढ़ेंगे जिससे घाटी में अलगाववाद समर्थक ताकतें  सिर उठाने लगेंगी। उल्लेखनीय है 1990 में फारूख सरकार के कार्यकाल में ही कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने मजबूर होना पड़ा था। गनीमत ये थी कि स्व.जगमोहन राज्यपाल थे वरना एक भी हिन्दू  जीवित न लौटता। हालात को संभालने के बजाय फारुख अपनी ससुराल लंदन चले गए। इस परिवार की खासियत ये है कि ये श्रीनगर में तो अलगाववाद की भाषा  बोलता है वहीं दिल्ली आकर खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताने का नाटक करता है। विधानसभा चुनाव के दौरान पिता - पुत्र पूर्ण राज्य और 370 पर जिस ऊँची आवाज में बोल रहे थे वह परिणाम के बाद धीमी होने लगी। घाटी के मतदाताओं का भावनात्मक दोहन करने के बाद सरकार बनाने के पहले ही उमर अब्दुल्ला ने कहना शुरू कर दिया कि वे लोगों को मूर्ख नहीं बनाएंगे। पूर्ण राज्य का प्रस्ताव तो नये मंत्रीमंडल की पहली बैठक में ही पारित कर उपराज्यपाल के पास भेज दिया जाएगा ताकि वे उसे केंद्र को भेज सकें। लेकिन 370 की बहाली पर  ये कहते हुए कदम पीछे खींच लिए कि जिस भाजपा ने उसे हटाया उससे इस बारे में कोई भी उम्मीद रखना मूर्खता है। इसलिए जब केंद्र में सत्ता परिवर्तन होगा तब इस दिशा में आगे बढ़ेंगे।   वे यह भी बोल गए कि  370 के मुद्दे को राजनीतिक तौर पर जिंदा रखा जाएगा किंतु  जम्मू -  कश्मीर के हितों के लिए  केंद्र से टकराव मोल नहीं लेंगे। दरअसल अब्दुल्ला परिवार समझ चुका है कि 370 की वापसी असंभव है। ऐसे में उसके लिए केंद्र सरकार से पंगा लेना  नुकसान का सौदा होगा। राजनीतिक विश्लेषक तो ये तक कहने लगे कि निर्दलीय विधायकों को खींचकर उमर ने कांग्रेस को झटका दे  दिया। चुनाव के दौरान ही दोनों के बीच खटास आ गई थी। जम्मू क्षेत्र में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें नेशनल कांफ्रेंस ने इस उम्मीद से दी थीं कि वह हिन्दू मतों में सेंध लगाकर भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी। लेकिन राहुल गाँधी  घाटी में ज्यादा प्रचार करते रहे। इससे नाराज होकर  उमर ने उनको जम्मू में सक्रियता बढ़ाने की सलाह के साथ ही ये ताना भी मारा कि मतदान की तारीख़ बेहद नजदीक आने पर भी कांग्रेस मैदान में नजर नहीं आ रही थी। उनकी आशंका सही साबित हुई। कांग्रेस के 6 विधायक घाटी से ही जीतकर आये। जम्मू में वह एक भी सीट हासिल न कर सकी। यदि नेशनल काँफ्रेंस 42 सीटें  नहीं जीतती तो राज्य एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता में फंस सकता था। असल में हरियाणा के नतीजे देखकर अब्दुल्ला परिवार को ये भी लगने लगा है कि कांग्रेस के साथ रहने से केंद्र सरकार से रिश्ते हमेशा खराब रहेंगे। विधानसभा में 29 निर्वाचित और 5 मनोनीत सदस्यों के साथ भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर होगी। पूर्ण राज्य बनने तक राज्य सरकार के अधिकार भी सीमित रहेंगे। और बन जाने पर भी राज्यपाल तो केंद्र द्वारा ही नियुक्त होगा जो राज्य सरकार की हर बात माने जरूरी नहीं। इसीलिए उमर अब्दुल्ला ने 370 की बहाली के लिए केंद्र से दो - दो हाथ करने का इरादा डल झील में डुबो दिया। हालांकि उनका ऐसा करना उनके चुनावी दावों के विपरीत है किंतु वे  370 के मुद्दे पर केंद्र से टकराने के बजाय देश में सत्ता बदलने तक प्रतीक्षा करने की बात कर रहे हैं तो ये उनकी  समझदारी ही कही जाएगी क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार से इस मुद्दे पर किसी रियायत की उम्मीद वे नहीं कर सकते । वहीं कांग्रेस भी  370  हटाने की बात से  दूर ही रहेगी। ये घाटी से आया पहला सकारतमक संकेत है कि वहाँ की नई सरकार के मुखिया समझ गए हैं कि 370 को बहाल करवाना दिन में सपने देखने जैसा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 10 October 2024

रतन टाटा :भारतीय उद्यमशीलता के महान प्रतीक थे


दुर्घटना ग्रसित होने के बाद मैं मुंबई स्थित घर पर आराम कर रहा था। अचानक मोबाइल की घंटी बजी तो स्क्रीन पर रतन टाटा का नाम देखकर चौंका। हैलो कहकर नमस्कार किया तो उधर से आवाज आई मैं तुम्हें देखने आ रहा हूँ  ,  लेकिन तुम्हारा घर ढूढ़ने में परेशानी हो रही है। मुझे अपना पता बताओ। मैंने कहा आप फोन अपने ड्रायवर को दें , मैं उसे समझा देता हूँ। मेरे इतना कहने पर जवाब मिला, ड्रायवर नहीं है कार मैं स्वयं चला रहा हूँ। मेरे लिए ये सुनना कल्पनातीत था। मैंने उन्हें पता समझाया और कुछ देर बाद वे मेरे घर पधारे। और  बताया कि वे अक्सर यूँ ही अकेले निकल जाते हैं। उनकी वह  सरलता मुझे भीतर तक छू गई। उस वाकये का जिक्र मैं हर जगह करता हूँ ताकि लोग सीख सकें कि इंसान सिर्फ दौलत से नहीं बल्कि अपने आचरण  से बड़ा कहलाता  है। उक्त वृतांत केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की जुबानी लाखों लोगों ने सुना होगा। इसी तरह का एक और उदाहरण कुछ साल पहले सुर्खियों में आया जब ये जानकारी मिलने पर कि उनका एक कर्मचारी दो साल से बीमार है स्व. टाटा उसे देखने मुंबई से पुणे गए। ऐसे अनगिनत  प्रेरणादायी प्रसंगों के मुख्य पात्र रतन टाटा कल रात चल बसे। 86 वर्ष की आयु में किसी का जाना अस्वाभाविक नहीं लगता किंतु उन जैसे व्यक्ति का अवसान ऐसा खालीपन छोड़ जाता है जिसको भरना आसान नहीं है। रतन जी देश के सबसे पुराने औद्योगिक घराने के वारिस थे। आजादी के पहले ही टाटा समूह ने भारत के औद्योगिकीकरण की  बुनियाद रख दी थी। उसके अलावा  और भी उद्योगपति थे । कालांतर में  कुछ टाटा से आगे भी निकल गये। लेकिन निःसंकोच कहा जा सकता है कि टाटा समूह ने जो प्रतिष्ठा अर्जित की वह अन्य औद्योगिक घरानों को  नहीं मिल  सकी।  इसका कारण   उसका सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहना है। वैसे तो सभी उद्योगपति  परोपकार के कार्यों हेतु योगदान देते हैं।लेकिन टाटा समूह ने सामाजिक कल्याण के लिए आर्थिक सहयोग देने की जो संस्थागत व्यवस्था की वह सभी के लिए उदाहरण है। जमशेद जी टाटा (जे.आर.डी) के बाद रतन जी  के कंधों पर इस समूह की जिम्मेदारी आई जिसे उन्होंने जिस कुशलता से निभाया वह पूरे विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई। आज 121 देशों में टाटा का कारोबार फैला है।  लम्बे समय तक  समूह के मुखिया रहने के बाद 75 वर्ष के होते ही उन्होंने  अलग होने का फैसला किया और बतौर कार्यकारी अध्यक्ष मार्गदर्शन करने लगे। उनके कार्यकाल में समूह ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को ला खड़ा किया। वे बहुत ही साहसी इंसान थे और इसी के चलते उन्होंने दुनिया की बड़ी - बड़ी कंपनियां खरीदकर समृद्ध भारत की कल्पना को साकार किया।  विवादों से सदैव उन्होंने खुद को दूर रखा। इसीलिए न सिर्फ उद्योग जगत अपितु प्रत्येक क्षेत्र के लोग उनसे मार्गदर्शन लेते थे। देश में स्वरोजगार को विकसित करने हेतु हजारों युवा उद्यमियों को उन्होंने सहायता प्रदान की। भारत विकास की जिस राह पर तेजी से बढ़ रहा है उसमें उनका योगदान अविस्मरणीय रहेगा। भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से अलंकृत किया था ।  राजनीति से वे हमेशा  दूर रहे। बावजूद इसके उनका नाम राष्ट्रपति पद के लिए अनेक बार चर्चा में आया। रतन जी के बारे में ये विख्यात था कि  वे  समूह की किसी भी बैठक में जाते तो  सबसे ज्यादा रुचि इस बात में लेते कि वह कंपनी उस वित्तीय वर्ष में कितना दान करेगी ? दरअसल उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने दान को संस्थागत रूप देकर संस्कार बना दिया। साधारण व्यक्ति से मिलते समय भी वे अहंकार शून्य रहते। यही कारण है  उनके निधन  से  सभी वर्गों के लोग दुखी हैं। टाटा समूह ने  नैतिक मूल्यों  और सामाजिक सरोकारों के प्रति जिस  निःस्वार्थ प्रतिबद्धता को स्थापित किया वह रतन जी के मानवीय दृष्टिकोण का प्रमाण  है। वे उस दौर में जन्मे और बड़े हुए जब पूंजीवाद और समाजवाद के बीच वैचारिक संघर्ष चरम पर था। वहीं  जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने उदारवाद और वैश्वीकरण भी देखा।  व्यवसाय में  अनेक उतार चढ़ाव भी आये।  बहुराष्ट्रीय  कंपनियों  ने भारतीय उद्योगों के लिए संकट भी पैदा किया किंतु स्व. टाटा ने अवसरों के अनुरूप नीति बनाकर  बजाय भयभीत होने के अपने कारोबार को दुनिया भर में फैलाकर भारतीय उद्यमशीलता की धाक जमाई। उन जैसे प्रतिभाशाली और शानदार इंसान सदियों में जन्म लेते हैं। उनकी सफलता और संपन्नता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि उनका कोई विरोधी नहीं था। और ये भी कि 86 वर्ष का वह व्यक्ति देश के करोड़ों युवाओं का प्रिय और प्रेरणास्रोत रहा। उनके बारे में  विख्यात उद्योगपति आनन्द महिंद्रा का ये कहना पूरी तरह सही है कि रतन टाटा को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा क्योंकि महापुरुष कभी नहीं मरते।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 October 2024

राहुल की राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता फिर सवालों के घेरे में


लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गाँधी का हौसला  सातवें आसमान पर चढ़ गया था। लोकसभा में दिये भाषणों के आधार पर  प्रशंसक उन्हें नरेंद्र मोदी का विकल्प बताने लगे। खुद श्री गाँधी  प्रधानमंत्री पर जिस तरह से कटाक्ष करने लगे उससे ऐसा लगने लगा जैसे नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद देश वे ही चलाएंगे। मोदी जी का सीना अब 56 इंच का नहीं रहा, वे  मुझसे नजर नहीं मिला सकते, भाजपा के हिंदुत्व को जनता ने नकार दिया, आप हिन्दू नहीं हो, हम जातिगत जन गणना करवाकर रहेंगे जैसी टिप्पणियों से राहुल ये साबित करने में जुटे हुए थे कि अब वे पप्पू वाली छवि से बाहर निकलकर एक परिपक्व  व्यक्ति बन गए हैं। लेकिन उनके कतिपय बयानों से स्पष्ट हो गया कि उनमें गंभीरता नहीं आई। बजट बनाने वाले अधिकारियों के अलावा किसी मिस इंडिया के दलित या ओबीसी न होने जैसे बयान देकर उन्होंने  प्रमाणित कर दिया कि वे रट्टू तोते जैसे हैं जो कुछ बातों को ही दोहराया करते हैं। अपनी पिछली अमेरिका यात्रा के दौरान भी वे जातिगत आरक्षण का मुद्दा उठाकर मजाक का पात्र बन गए ।  गत दिवस जम्मू - कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के जो चुनाव परिणाम आये उनमें कांग्रेस का प्रदर्शन इस बात का प्रमाण  है कि राहुल को लेकर कांग्रेस ने जो उम्मीदें पाल रखी हैं वे पूरी नहीं हो सकेंगी। जम्मू - कश्मीर में पार्टी की सीटें पिछले चुनाव की तुलना में आधी रह गईं। मतदान के कुछ दिन पहले ही उमर अब्दुल्ला ने श्री गाँधी को इस बात के लिए लताड़ा कि उनको बजाय घाटी के जम्मू  के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में सक्रिय होना चाहिए , जहाँ कांग्रेस का काम ही शुरू नहीं हुआ।   उनकी बात सही निकली क्योंकि पार्टी दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सकी। यदि नेशनल कांफ्रेंस से गठबंधन नहीं हुआ होता तब शायद उसकी दशा पीडीपी से भी बदतर हो सकती थी। हरियाणा में तो कांग्रेस की जीत का अनुमान हर कोई लगा रहा था। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से लेकर एग्जिट पोल तक भाजपा के प्रति मतदाताओं की नाराजगी बताते हुए कांग्रेस की बड़ी जीत की भविष्यवाणी कर रहे थे। लोकसभा चुनाव का शानदार प्रदर्शन पार्टी की उम्मीदों का आधार था। लेकिन नतीजे पूरी तरह उलट गए। सीटें और मत प्रतिशत बढ़ने के बाद भी कांग्रेस बहुमत से दूर रह गई। राहुल ने हरियाणा में भी प्रचार किया किंतु वहाँ भी बचकानेपन से बाज नहीं आये । जलेबी की फैक्ट्री वाला बयान देकर खुद की तो हंसी उड़वाई ही, पार्टी का भी नुकसान किया। पार्टी के सबसे बड़े नेता होने के नाते उनका दायित्व था कि इस राज्य के जमीनी हालात का अध्ययन करते लेकिन वे भाजपा और प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाने में लगे रहे और अंत में खुद मजाक का पात्र बन बैठे। दूसरी तरफ भाजपा ने लोकसभा चुनाव में आशाजनक सफलता नहीं मिलने के बाद बिना निराश हुए अगले मोर्चों पर तैयारी शुरू कर दी। वह जानती थी कि जम्मू - कश्मीर में उसको बहुमत नहीं मिलेगा किंतु उसने 2014 की अपेक्षा अपनी सीटें भी बढ़ाईं  और मत प्रतिशत में भी सबसे आगे रही। हरियाणा में लोकसभा की 5 सीटें गंवाने के बाद भी पार्टी ने बेहतर संगठन क्षमता का प्रदर्शन किया। कांग्रेस हवा में उड़ती रही जबकि भाजपा ने जमीन पर रहकर मतदाता के साथ संवाद कायम किया जिसका लाभ उसे मिला।  चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की प्रतिक्रिया में न गंभीरता नजर आई और न ही गरिमा। जम्मू  - कश्मीर में भाजपा को पटकने की शेखी बघारने वाले पार्टी प्रवक्ता ये बताने से बचते रहे  कि वहाँ कांग्रेस का प्रदर्शन इतना दयनीय क्यों रहा? हरियाणा की हार को अप्रत्याशित और अस्वीकार्य बताकर पार्टी ने जो खिसियाहट दिखाई गई उससे ये साफ हो गया कि लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों का खुमार अभी तक बना हुआ है। ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ने के साथ ही चुनाव आयोग पर आरोप लगाने का घिसा - पिटा तरीका अपनाकर कांग्रेस ने साबित किया कि उसे जनादेश  का सम्मान करना नहीं आता। लोकसभा चुनाव के बाद उसके जो प्रवक्ता एग्जिट पोल करने वालों पर आग बबूला हो रहे थे वे ही कल उनके गलत होने पर आंसू बहाते दिखे। हरियाणा  की हार ने कांग्रेस  में आये अहंकार को जमीन दिखा दी। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव) की प्रवक्ता ने उसको नसीहत देते हुए कहा कि वह सीधे मुकाबले में भाजपा के सामने नहीं टिकती। संजय राउत ने तो यहाँ तक कह दिया कि कांग्रेस महाराष्ट्र में अकेले लड़ने की इच्छुक हो तो स्पष्ट करे। उ.प्र में होने जा रहे 10 विधानसभा उपचुनावों में सपा से आधी टिकिटें मांगने का उसका दबाव भी कमजोर पड़ जायेगा। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि इन चुनावों ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके से भाजपा को उबार दिया। मोदी मैजिक का असर भी दो राज्यों  में साफ नजर आया । लेकिन दूसरी तरफ राहुल गाँधी की राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 October 2024

जम्मू - कश्मीर में अपेक्षित नतीजे किंतु हरियाणा ने पूरे देश को चौंका दिया


हरियाणा और जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव की मतगणना में दोपहर 1.30 बजे तक आये रुझानों से स्पष्ट हो गया है कि जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस आसानी से बहुमत हासिल करने जा रहे हैं। इससे किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ क्योंकि वहाँ भाजपा केवल जम्मू क्षेत्र में प्रभावशाली है । कश्मीर घाटी में उसे एक भी सीट भी मिल गई तो वह असंभव के संभव होने जैसा होगा। लेकिन जम्मू की 43 सीटों में उसे अपेक्षा से कम सीटें मिलना  उसके लिए  झटका है।  बहरहाल ये शुभ संकेत है कि अलगाववाद से प्रभावित इस राज्य की राजनीति  में अब्दुल्ला परिवार की सियासी जमींदारी पहले जैसी नहीं रही। नेशनल कांफ्रेंस अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत नहीं लाती दिख रही। उसकी  सहयोगी कांग्रेस भी दहाई का आंकड़ा छूने के लिए संघर्ष कर रही है। चुनाव प्रचार में फारुख अब्दुल्ला ने धारा 370 की वापसी का मुद्दा जमकर उछाला था। वहीं कांग्रेस  इस सम्बन्ध में कुछ भी कहने से बचती रही। सरकार बनाने के बाद  नेशनल कांफ्रेंस के लिए इस संवेदनशील विषय को उठाना कठिन होगा क्योंकि देश के बाकी हिस्सों की जनभावनाओं का ध्यान रखते हुए कांग्रेस  अलगाववाद समर्थक किसी भी नीति से बचने का रास्ता अखत्यार करेगी जो अब्दुल्ला परिवार की साख को नुकसान पहुंचाने वाला होगा। भाजपा लगभग 30 सीटें जीतने के कगार पर है। नियमानुसार 5 विधायक मनोनीत होंगे जिनको सदन में मताधिकार प्राप्त होगा। जाहिर है वे भाजपा समर्थक रहेंगे। वही। वहीं 8 निर्दलीय जीत रहे हैं।  पीडीपी मात्र 2 सीटों पर आगे है। इस प्रकार भाजपा प्रमुख विपक्षी दल के रूप में स्थापित हो गई जो राज्य की राजनीति में दूरगामी असर डालने वाला होगा। जाहिर है मुख्यमंत्री तो उमर अब्दुल्ला ही बनेंगे किंतु  उनके लिए केंद्र सरकार से टकराव लेना नुकसान का कारण बन सकता है। ये देखते हुए फारुख, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से निकटता स्थापित कर नया खेल रच सकते हैं। यदि ये नहीं होता तब भी विधानसभा और उसके बाहर सरकार को विपक्ष के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।  कश्मीर घाटी की राजनीतिक वजनदारी घटाने में भी भाजपा निश्चित रूप से सफल होती दिख रही है।
       दूसरे जिस राज्य के परिणाम आ रहे हैं वह है हरियाणा। यहाँ सारे विश्लेषक और एग्जिट पोल कांग्रेस की इकतरफा जीत की भविष्यवाणी कर चुके थे। चुनाव के पहले ही भाजपा विरोधी पूरा तबका ये महौल बनाने में जुटा था कि कांग्रेस की लहर चलेगी। पूर्व चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव को तो  कांग्रेस की सुनामी नजर आ रही थी। परिणाम आने के पहले ही भूपिंदर हुड्डा,  शैलजा और रणदीप सुरुजेवाला मुख्यमंत्री बनने की कवायद में जुट गए। उनकी उम्मीदों के पीछे बेशक चुनाव पूर्व सर्वे और  एग्जिट पोल के निष्कर्ष थे। किसान आंदोलन, अग्निवीर और पहलवानों के मुद्दे पर भाजपा विरोधी मतदाता जिस तरह आक्रामकता के साथ मुखर था उससे भी ये एहसास मजबूत हुआ कि भाजपा तिकड़ी नहीं बना सकेगी।। लोकसभा चुनाव में उसके हाथ से आधी सीटें ही नहीं खिसकीं बल्कि मत प्रतिशत में भी भारी गिरावट आई। इन सब कारणों से उसके समर्थक मतदाता भी निराश थे। तमाम नेता पार्टी छोड़ गए। अशोक तंवर ने तो मतदान के ठीक पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया। राहुल गाँधी पूरे आत्मविश्वास से प्रधानमंत्री पर हमला करते रहे। मतदाताओं को जी भरकर प्रलोभन दिये गए। राज्य में सबसे प्रभावशाली जाट समुदाय की भाजपा से नाराजगी को भी बढ़ा - चढ़ाकर पेश किया जाता रहा। आज सुबह मतों  की गिनती शुरू होते ही कांग्रेस तेजी से बहुमत हासिल करती दिखी किंतु कुछ देर बाद ही देखते - देखते भाजपा बहुमत के आंकड़े से आगे निकल गई । इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उसकी सरकार आसानी से लौट रही है। पिछली सरकार को टेका लगाने वाले दुष्यंत चौटाला बुरी तरह परास्त हो चुके हैं। चौटाला परिवार के अन्य  छत्रप भी धराशायी होते दिख रहे हैं। सबसे बड़ी बात जाट समुदाय के राजनीतिक प्रभुत्व को इस चुनाव में चोट पहुंची। 2019 के विधानसभा चुनाव में 40 सीटों पर सिमट गई भाजपा इस बार अपने दम पर 50 के करीब है। वह भी बिना जाट नेतृत्व के और लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बावजूद। हालांकि कांग्रेस भी पिछले चुनाव की तुलना में आगे बढ़ी है किंतु  उसके हिस्से में विपक्ष की जिम्मेदारी ही आई है। निर्दलीय बड़ी संख्या में खड़े हुए किंतु जनता ने उन्हें नकार दिया। आम आदमी पार्टी भी कुछ हासिल न कर सकी जबकि यह अरविंद केजरीवाल का गृहराज्य है। सही बात ये है कि गैर जाट जातियों के ध्रुवीकरण ने भाजपा का काम आसान कर दिया। हरियाणा के नतीजों से  लोकसभा चुनाव में  कांग्रेस को मिले आत्मविश्वास में कमी आयेगी। वहीं ये अवधारणा कमजोर होगी कि मोदी कार्ड राज्यों में नहीं चलता। महाराष्ट्र में अब उद्धव ठाकरे और शरद पवार कांग्रेस पर हावी होंगे । वहीं झारखण्ड में भाजपा की संभावना बढ़ गई हैं। हिंदुत्व के विरुद्ध किये जा रहे दुष्प्रचार को भी हरियाणा के मतदाताओं ने ठेंगा दिखा दिया। इंडिया गठबंधन में भी टूटन बढ़ सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 7 October 2024

एग्जिट पोल के आंकड़े भाजपा के लिए चिंता का विषय

लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल के निष्कर्ष गलत निकलने के बाद सर्वे करने वाली एजेंसियों के साथ - साथ उनके प्रायोजक टीवी चैनलों की भी जबरदस्त किरकिरी हुई थी।  400 पार के नारे को सही बताने वाले एग्जिट पोल विपक्ष के निशाने पर आ गए। उन पर आरोप लगा कि उन्होंने शेयर बाजार को उठाने के लिए भ्रामक आंकड़े पेश किये जिनमें मोदी सरकार प्रचंड बहुमत के साथ  लौटती दिखाई गई। उससे उत्साहित होकर निवेशकों ने जमकर शेयरोंं की खरीदी कर डाली । हालांकि सरकार तो वापस आई किंतु  भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे रहने की वजह से वह सहयोगी दलों का सहारा लेने मजबूर हो गई। नतीजा शेयर बाजार के धड़ाम से गिरने के रूप में सामने आया। इसके चलते उसमें  पूंजी लगाने वालों को भारी नुकसान हुआ जिसका ठीकरा विपक्ष ने एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों के साथ ही टीवी चैनलों पर फोड़ा। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल  पर प्रतिबंध लगाए जाने की माँग भी उठी। यद्यपि सरकार का गठन होते ही शेयर बाजार चढ़ने लगा और बीते सप्ताह अपने सर्वोच्च स्तर तक जा पहुंचा।  इसी दौरान जम्मू कश्मीर और हरियाणा विधान सभा के चुनाव संपन्न हुए जिनके एग्जिट पोल 5 अक्टूबर की शाम जारी किये गये । लोकसभा चुनाव में भद्द पिटने के बाद भी टीवी चैनलों ने हमेशा की तरह न सिर्फ एग्जिट पोल के निष्कर्ष दिखाये बल्कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को बिठाकर चर्चा भी करवाई। चूंकि नतीजे दोनों राज्यों में भाजपा को पिछड़ते बता रहे थे लिहाजा जो विपक्ष लोकसभा चुनाव के बाद एग्जिट पोल के परिणामों को सिरे से नकार रहा था वही इन निष्कर्षों को पूरी तरह प्रामाणिक मानकर खुश नजर आया। वहीं दूसरी तरफ भाजपा वालों को ये  जमीनी सच्चाई से कोसों दूर प्रतीत हुए। भले ही  सभी पोल सीटों की संख्या को लेकर एकमत नहीं हों लेकिन सब का ये जरूर कहना था कि भाजपा दोनों राज्यों में सत्ता से बाहर रहेगी। जम्मू कश्मीर में  नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की  सरकार बनने की संभावना प्रबल है वहीं हरियाणा में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत हासिल करने जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी उक्त एग्जिट पोल को मान्य कर रहे हैं। हालांकि भाजपा को लगता है कि हरियाणा के परिणाम गत वर्ष संपन्न छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की कहानी दोहरायेंगे । जहाँ सभी सर्वेक्षण कांग्रेस सरकार के दोबारा सत्ता में आने की भविष्यवाणी कर रहे थे किंतु जब परिणाम आये तो भाजपा को स्पष्ट बहुमत  मिला। जहाँ तक बात जम्मू कश्मीर की है तो वहाँ जम्मू और कश्मीर घाटी में अलग - अलग माहौल है। जम्मू अंचल की 43 सीटों  में से भाजपा को यदि कम से कम  35  नहीं मिलतीं तब वह सत्ता की दौड़ से बाहर हो जाएंगी क्योंकि घाटी में उसका कोई वजूद नहीं है। उसकी उम्मीद केवल इस बात पर टिकी है कि घाटी में नेशनल काँफ्रेंस और पीडीपी को कम सीटें मिलें। कुछ एग्जिट पोल में भी  निर्दलीयों के बड़ी संख्या में जीतने का अनुमान लगाया गया है। उल्लेखनीय है लोकसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती दोनों हार गए थे। उसके बाद घाटी में कुछ नये चेहरे उभरकर सामने आये। देखने वाली बात ये होगी कि त्रिशंकु की स्थिति में ये किसके साथ जायेंगे क्योंकि घाटी में धारा 370 की वापसी पर सभी एकमत हैं। वहाँ सारी 47 सीटें नेशनल काँफ्रेंस  जीत जाए ये नामुमकिन है। इसी तरह जम्मू की अधिकांश सीटों पर लड़ने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत अच्छा होने की उम्मीद नहीं है। मतदान के कुछ दिन पूर्व ही उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना भी की थी कि उसने जम्मू क्षेत्र में काम ही शुरू नहीं किया। इस राज्य में राजनीतिक अनिश्चितता बने रहने की संभावना अभी भी है। लेकिन हरियाणा में माहौल भाजपा विरोधी बनाने में विपक्ष काफी हद तक सफल हो गया था। लोकसभा चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री बदलने का दांव भी कारगर नहीं रहा और  कांग्रेस आधी सीटें जीत गई। हालांकि इस बार  भाजपा ने आखिर तक काफी जोर लगाया किंतु  जिस तरह उ.प्र में यादव, दलित और मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण ने उसको लोकसभा में स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया ठीक वैसे ही समीकरण हरियाणा में जाट, दलित और मुस्लिम बनाते दिखे। यदि भाजपा सवर्ण और ओबीसी मतों को थोक के भाव अपने झोली में डालने के साथ ही जाट समुदाय  की एकजुटता में सेंध  लगाने में सफल नहीं हो सकी तो फिर उसकी तिकड़ी बनना नामुमकिन होगा। कल दोपहर तक दोनों राज्यों की तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी। यदि एग्जिट पोल सही साबित हुए तब भाजपा के लिए महाराष्ट्र और झारखण्ड की लड़ाई बेहद कठिन हो जाएगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 October 2024

भारत में भी नेपाल जैसा गृहयुद्ध छेड़ना चाहते हैं नक्सली मानसिकता के पोषक


छत्तीसगढ़ वह राज्य  है जिसकी सीमाएं  म.प्र , उ.प्र, महाराष्ट्र, झारखंड, उड़ीसा, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश से मिलती हैं। ये भी संयोग है कि इन सीमावर्ती इलाकों में भी आदिवासी बाहुल्य है और इसीलिए ये नक्सली आतंक के गढ़  हैं। एक जमाने में म.प्र के चंबल और बुंदेलखंड अंचल में सक्रिय डाकू बड़ी वारदात करने के बाद उ.प्र और राजस्थान भाग जाते थे। उसी रणनीति को नक्सलियों ने अपनाया । उक्त किसी भी राज्य में हिंसक घटना को अंजाम देने के बाद वे पड़ोसी राज्य में जाकर छिप जाते हैं। उनके कार्यक्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा घने वनों से घिरा होने से  छिपने में सहूलियत होती है। ये बात भी सही है कि जिस तरह से डाकुओं को समाज के एक वर्ग के साथ ही पुलिस में बैठे कतिपय लोगों का संरक्षण मिलता था ठीक वही स्थिति नक्सलियों के साथ भी है। कुछ लोग भयवश भी उनका साथ देते हैं वहीं पुलिस और प्रशासन में बैठे लोगों के अपने स्वार्थ हैं।  ये बात भी गौरतलब है कि नक्सलियों के कार्यक्षेत्र का अधिकांश इलाका खनन गतिविधियों वाला है । खनन व्यवसायियों से जबरिया वसूली उनकी आय का स्रोत माना जाता है। उसके अतिरिक्त अनेक बड़े कारोबारी अपनी सुरक्षा के लिये नक्सलियों को धन देते हैं। उनकी कार्यप्रणाली चूंकि हिंसा से प्रेरित है इसलिए माओवादी विचारधारा  के नाम पर  नृशंस हत्याएँ कर वे अपने आतंक का साम्राज्य कायम कर सके । लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद नक्सलियों के सफाये का जो अभियान शुरू किया गया उसके परिणामस्वरूप वे पहले जैसे ताकतवर नहीं रहे। उनके सशस्त्र गिरोहों का खात्मा किये जाने के साथ ही शहरी क्षेत्रों में बैठे  सरपरस्तों पर नकेल कसे जाने के कारण उनकी जबरदस्त घेराबंदी संभव हो सकी। उन्हीं की भाषा में जवाब देने की शैली अपनाये जाने के अच्छे परिणाम देखने मिल रहे हैं। गत दिवस छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों ने 30 से अधिक नक्सलियों को मार गिराया और बड़ी मात्रा में  हथियार तथा गोला - बारूद भी बरामद किया। कुछ माह पहले भी लगभग दो दर्जन मार गिराए गए थे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के राज में नक्सलियों को प्रश्रय मिलने के आरोप लगा करते थे। कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल सहित पार्टी के अनेक नेताओं की नक्सलियों द्वारा हत्या किये जाने में भी एक पूर्व मुख्यमंत्री का हाथ बताया जाता था जो अब दुनिया में नहीं हैं। अन्य पड़ोसी राज्यों में भी कुछ राजनीतिक दल चुनाव के दौरान नक्सलियों की मदद लेते रहे हैं। वामपंथी पार्टियों को तो उनका खुला समर्थन रहता ही है। लेकिन जैसे - जैसे वामपंथी राजनीति का प्रभाव कम होता जा रहा है वैसे - वैसे नक्सलियों का ढांचा भी कमजोर पड़ने लगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2026 तक भारत को नक्सली आतंक से मुक्त करने का जो संकल्प लिया वह सत्य प्रतीत होने लगा है। सुरक्षा बलों के प्रयासों से नक्सल प्रभावित इलाकों के  निवासियों में भी साहस का संचार होने लगा है जो अपनी और परिवार की प्राण रक्षा के लिए उनके इशारों पर नाचते थे। बड़ी संख्या में नक्सलियों के चंगुल में फंसे युवाओं ने आत्म समर्पण कर मुख्य धारा में शामिल होने की बुद्धिमत्ता भी दिखाई। वर्तमान में झारखंड और तेलंगाना छोड़कर छत्तीसगढ़ और उसके पड़ोसी राज्य उ.प्र , म.प्र , महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में भाजपा अथवा उसके सहयोगियों की सरकारों से नक्सलियों को  समर्थन और सहानुभूति प्राप्त नहीं होने से भी उनकी पकड़ कमजोर हो रही है। लेकिन जंगलों से सफाया होने के बाद समाज के भीतर घुसे बैठे नक्सली मानसिकता के सफ़ेदपोशों का पर्दाफाश होना भी जरूरी है। ये लोग प्रशासन, शिक्षा, कला, साहित्य और पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में  बैठकर नक्सली विचारधारा  का प्रचार - प्रसार करते हैं। इनकी कार्यशैली व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना भड़काने पर केंद्रित है। स्वयंसेवी संगठनों के जरिये भी ये अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। इनके विरुद्ध जाँच एजेंसियां कारवाई करती तो हैं किंतु साक्ष्य नहीं मिलने से वे बच जाते हैं। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए। नक्सलवादी कहने को सामाजिक विषमता और शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए हथियार उठाते हैं लेकिन उनका असली उद्देश्य  भारत में खूनी क्रांति के रास्ते पर चलकर नेपाल जैसी चीन समर्थित माओवादी सरकार बनाना है । इसके लिए ये देश हित के विरुद्ध कार्य करने वाली हर ताकत के साथ हाथ मिलाने तैयार रहते हैं। नेपाल की तरह ही भारत में गृहयुद्ध भड़काने की साजिश  भी नक्सली विचारधारा का पोषण करने वाले रचते रहते हैं। बीते कुछ वर्षों में जे .एन .यू जैसे कुछ शिक्षण संस्थानों सहित सरकार विरोधी आंदोलनों में नक्सली मानसिकता वाले  चेहरे नजर आना उसी साजिश का हिस्सा है। सरकार को आस्तीन में छिपे इन सांपों का विष दंत तोड़ना होगा। समाज में जो राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी वर्ग है उसे भी इन तत्वों से वैचारिक स्तर पर निपटना चाहिए। भारतीय समाज में रक्तरंजित क्रांति को सामाजिक स्वीकृति कभी नहीं मिली। यही वजह है कि लेनिन और माओ के विचार तमाम प्रयासों के बाद भी मुख्यधारा में समाहित नहीं हो सके।


- रवीन्द्र वाजपेयी