Thursday, 17 October 2024

धारा 370 बहाल करने की मांग से दूर भाग रही कांग्रेस



जम्मू - कश्मीर में सरकार का गठन हो गया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू क्षेत्र से सुरेंद्र चौधरी  को उपमुख्यमंत्री बनाये जाने के साथ ही निर्दलीय रमेश शर्मा को भी मंत्री बनाया  है। तीन मुस्लिम विधायक भी मंत्री बने। 90 सदस्यों वाली विधानसभा में  10 मंत्री बनाये जा सकते हैं। अभी 4 स्थान रिक्त हैं।   हालांकि राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा भी उमर की ताजपोशी में शामिल हुए किंतु सरकार में कांग्रेस की गैर मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया। विधानसभा चुनाव के पूर्व हुए  गठबंधन में नेशनल काँफ्रेंस को 51 और काँग्रेस को 32 सीटें मिली थीं। नतीजों में नेशनल काँफ्रेंस ने तो 42 सीटें जीतकर अपना वर्चस्व दिखा दिया जबकि कांग्रेस केवल 6 सीटें जीत पाई। उसमें भी 5 कश्मीर घाटी में थीं ।  जम्मू क्षेत्र में उसे नेशनल काँफ्रेंस ने भाजपा के हिन्दू वोट बैंक में सेंध लगाने का जिम्मा सौंपा किंतु उसे मात्र एक सीट मिली। बाकी की 5 नेशनल काँफ्रेंस के प्रभाव क्षेत्र में  मिलीं। इस कारण कांग्रेस की वजनदारी गठबंधन में कम हो गई। यदि वह 10 सीटें जीत लेती तब  उपमुख्यमंत्री पद उसकी झोली में आता। उमर अब्दुल्ला को कुछ निर्दलीय और आम आदमी पार्टी के अकेले विधायक का समर्थन मिलने से उनके सामने बहुमत की समस्या नहीं रही । लेकिन इसके अलावा भी कांग्रेस के सरकार से बाहर रहने का एक अन्य कारण राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल हरियाणा के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस को दहशत में डाल दिया है। लोकसभा चुनाव में हिन्दू मतों के बिखराव ने उसका हौसला मजबूत कर दिया था। फ़ैज़ाबाद सीट पर भाजपा की हार को वह जरूरत से ज्यादा प्रचारित कर रही थी। लेकिन हरियाणा में भाजपा ने जिस तरह से समीकरण अपने पक्ष में किये उसके बाद कांग्रेस को महाराष्ट्र में  खतरा नजर आने लगा। उसके रणनीतिकारों को ये लगने लगा कि मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप से उसे बचना होगा वरना वहाँ हिंदुओं का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में  होते देर नहीं लगेगी। ऐसे में जम्मू कश्मीर सरकार का हिस्सा बनने पर वह धारा 370 की वापसी जैसे मुद्दे पर अपनी सहमति देने मजबूर हो जाती। उल्लेखनीय है विधानसभा चुनाव के दौरान नेशनल कांफ्रेंस ने तो धारा 370 की बहाली के साथ ही जम्मू - कश्मीर को पूर्ण राज्य बनाये जाने का मुद्दा अपने घोषणापत्र में शामिल किया और उस पर ही पूरे अभियान को केंद्रित रखा। वहीं  कांग्रेस ने पूर्ण राज्य के दर्जे की बात तो उठाई  किंतु 370 की बहाली पर मौन साधे रही। यदि  हरियाणा में वह सरकार बना ले जाती तब शायद इस विषय पर कांग्रेस भी नेशनल काँफ्रेंस के सुर में सुर मिलाती नजर आती किंतु नतीजा उल्टा आने के बाद लोकसभा चुनाव के बाद पैदा हुआ उत्साह हवा -  हवाई हो गया। नेशनल काँफ्रेंस तो ये कहती फिर रही है कि जम्मू कश्मीर के मतदाताओं ने केंद्र सरकार द्वारा धारा 370 हटाये जाने के विरुद्ध जनादेश दिया है। लेकिन कांग्रेस केवल इस बात की खुशी जताकर चुप हो गई राज्य की जनता ने भाजपा को पराजित कर दिया। पार्टी के रुख में आया यह बदलाव उसके मन में उत्पन्न डर का परिचायक है। बरखा दत्त जैसी भाजपा विरोधी पत्रकार भी ये लिखने में संकोच नहीं कर रहीं कि जम्मू कश्मीर और हरियाणा में भले स्कोर 1- 1 रहा किंतु हारी तो कांग्रेस ही। यू ट्यूब पर राहुल गाँधी के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे पत्रकार भी हरियाणा की हार और जम्मू  -  कश्मीर में शर्मनाक प्रदर्शन के लिए जिस प्रकार से कांग्रेस नेतृत्व को भला - बुरा कह रहे हैं वह अप्रत्यक्ष तौर पर राहुल की ही आलोचना है। लोकसभा में मिलीं 99 सीटों का पूरा श्रेय कांग्रेस समर्थक प्रचारतंत्र ने चूंकि श्री गाँधी को दे दिया था इसलिए हरियाणा की पराजय को राज्य स्तर पर भले ही भूपिंदर हुड्डा के माथे मढ़ दिया गया किंतु राष्ट्रीय स्तर पर तो उसके लिये राहुल को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। ऐसे में महाराष्ट्र में पार्टी किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने तैयार नहीं दिखती।  उल्लेखनीय है इस मुद्दे पर ठाकरे परिवार भी प्रारंभ से ही भाजपा के साथ खड़ा रहा है।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 16 October 2024

महाराष्ट्र : भाजपा - कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी चुनौती


चुनाव आयोग ने आखिरकार महाराष्ट्र और  झारखण्ड विधानसभा के साथ ही लोकसभा और विधानसभा की कुछ सीटों हेतु उपचुनावों की तारीख घोषित कर दी। जम्मू - कश्मीर और हरियाणा विधान सभा के चुनाव संपन्न होने के बाद से ही उक्त दोनों राज्यों के चुनाव पर पूरे देश की नजरें लगी हुई हैं। लोकसभा चुनाव के बाद से विपक्ष काफी उत्साहित था । उ.प्र के बाद महाराष्ट्र वह राज्य है जिसमें सत्ता होने के बाद भी भाजपा को जबरदस्त झटका लगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार झारखंड में तो भाजपा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित होती दिख रही हैं। चंपई सोरेन के भाजपा में आने से सत्ताधारी झामुमो को जबरदस्त झटका लगा है। जानकार मान रहे हैं कि उनके प्रभाव वाली 14 सीटों  पर भाजपा को लाभ मिल जाएगा । लेकिन महाराष्ट्र में  भाजपा - शिवसेना - एनसीपी गठबंधन को अपनी सरकार बचाने के लिए जबरदस्त संघर्ष करना पड़ेगा। इसकी वजह साफ है। झारखंड में झामुमो केवल हेमंत सोरेन और उनके परिवार पर निर्भर है। चंपई उनके बेहद भरोसेमंद थे तभी जेल जाने के समय उन्होंने तमाम अटकलों के विपरीत अपनी पत्नी की बजाय  उनको मुख्यमंत्री बनाया। जबकि भाजपा के पास वहाँ राज्य स्तरीय मजबूत नेतृत्व है और लोकसभा चुनाव में भी वह 14 में से 8 सीटों पर विजयी हुई। हरियाणा जीतने के बाद उसका हौसला और बुलंद हुआ है। झारखंड के पड़ोसी बिहार, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में भी भाजपा सत्ता में है, ऐसे में उसके लिए इस आदिवासी राज्य में मुकाबला आसान है। लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा को विपक्ष से पहले  अपने सहयोगी दलों से निपटना होगा। राजनीतिक जगत में चल रही चर्चाओं के मुताबिक मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री अजीत पवार क्रमशः अपनी पार्टी शिवसेना और एनसीपी के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें मांगकर उस पर दबाव बना रहे हैं। पार्टी की मजबूरी ये है कि उसे उनके समर्थन की कीमत चुकानी पड़ेगी। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 9 , शिवसेना ने 8 , एनसीपी ने 1 एक सीट जीती थी। ऐसे में मुख्यमंत्री शिंदे भाजपा पर ज्यादा से ज्यादा सीटों का दबाव बनाएंगे तो उसे ठुकरा देना उसके लिए आसान नहीं होगा। इसी तरह अजीत पवार की एनसीपी का भले ही एक सांसद जीता लेकिन शरद पवार के असर वाले इलाकों में वे ही बराबरी से मुकाबला कर सकेंगे। लिहाजा भाजपा को उनके नखरे भी उठाने होंगे। अजीत के कुछ हालिया बयानों से भाजपा आशंकित है कि कहीं चुनाव के समय वे वापस चाचा के चरणों में न गिर जाएं। बारामती सीट पर उनकी बेटी सुप्रिया सुले के विरुद्ध अपनी पत्नी को लड़वाने पर वे खेद व्यक्त कर ही चुके हैं। अजीत के लिए ये चुनाव अस्तित्व की रक्षा करने का अंतिम अवसर है। अपने साथ आये विधायकों को अगर वे टिकिट न दिलवा सके तो वे वापस शरद पवार के पास लौट सकते हैं । भाजपा को उन्हें साथ   रखना जरूरी है क्योंकि उनके महायुति छोड़ देने से भाजपा को मनोवैज्ञानिक तौर पर बड़ा झटका लगेगा। ये भी गौरतलब है कि विपक्ष के पास शरद पवार, उद्धव ठाकरे जैसे बड़े चेहरे हैं। कांग्रेस का भी महाराष्ट्र पुराना गढ़ रहा है। ऐसे में देवेंद्र फड़नवीस, एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के बल पर सरकार बनाने के लिए जरूरी 145 सीटों से अधिक जीतना आसान नहीं होगा। महिलाओं को 1500 रु. प्रति माह देने की योजना जरूर असर दिखा सकती है। इसके अलावा देश भर से आ रही खबरों से  हिन्दू मतदाताओं के एक बार फिर भाजपा के पाले में जाने की संभावना भी बढ़ी है। जहाँ तक बात महा विकास आगाड़ी की है तो हरियाणा चुनाव के बाद कांग्रेस अब दबाव बनाने की स्थिति में नहीं है। नतीजे आते ही शिवसेना उद्धव गुट ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए उससे पूछा कि यदि वह अकेले लड़ना चाहती है तो बताये। पार्टी के मुखपत्र सामना में तो यहाँ तक लिखा गया कि जीती हुई बाजी कैसे हारी जाती है ये कांग्रेस से सीखा जा सकता है। उद्धव गुट के साथ ही शरद पवार भी कांग्रेस के सामने कड़ी शर्तें रखने से बाज नहीं आयेंगे क्योंकि उनके लिए ये चुनाव साख बचाने का अवसर है। अगाड़ी में कांग्रेस की वही स्थिति है जो महायुति में भाजपा की है। हरियाणा हारने के बाद कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र जीतना नितांत आवश्यक हो गया है। दूसरी तरफ भाजपा के लिए भी इस बड़े राज्य में सरकार की वापसी के जरिये लोकसभा चुनाव की हार से उबरने का मौका है। यदि वह ऐसा कर सकी तब वह शरद पवार और उद्धव ठाकरे के राजनीतिक भविष्य को अंधकारमय बना सकेगी। साथ ही शिवसेना और एनसीपी में असली नकली का फैसला भी हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 15 October 2024

बहराइच के दंगे में छिपे हैं भविष्य के खतरे


उ.प्र का बहराइच जिला सांप्रदायिक दंगे की आग में झुलस रहा है। देवी प्रतिमा विसर्जन जुलूस के समय एक मुस्लिम युवक द्वारा माइक का तार निकालने से विवाद शुरू हुआ।  जुलूस पर पथराव होने से प्रतिमा  खंडित हो गई। इससे विवाद और बढ़ा। इसके बाद एक हिन्दू युवक को घर के भीतर ले जाकर गोली मार दी गई। गोली मारने वाले मुस्लिम युवक सहित अन्य उपद्रवियों को गिरफ्तार कर लिया गया किंतु दंगे की आग पूरे जिले में फैल गई। दोनों तरफ से आरोप - प्रत्यारोप चल रहे हैं। राजनीति भी अपनी चिर - परिचित शैली में शुरू हो गई है। दोषियों को दंडित करवाने की कोशिशों के बजाय वोट बैंक की फिक्र में सपा प्रमुख अखिलेश यादव सरकार पर हमला करने में जुट गए हैं। उनके मुँह से
हत्या करने वालों की निंदा का एक शब्द भी नहीं निकला। उल्टे वे भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं। उल्लेखनीय है उ.प्र की 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव होने वाले हैं। उनमें से कुछ में मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है। सपा द्वारा घोषित उम्मीदवारों में दो मुस्लिम भी हैं। हालांकि सपा अध्यक्ष द्वारा उक्त घटना को लेकर जो रवैया प्रदर्शित किया जा रहा है वह नया नहीं है क्योंकि श्री यादव के पिता स्व. मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम तुष्टीकरण में कांग्रेस को भी पीछे छोड़ दिया था।  माय (मुस्लिम - यादव ) नामक गठजोड़  बिहार में भी बना जिसके चलते मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव की दूसरी पीढ़ी भी सत्ता का स्वाद चख सकी। राम मंदिर आंदोलन के कारण मुस्लिम समाज कांग्रेस से दूर होने लगा। इसका फ़ायदा उठाकर सपा ने मुस्लिम वोट बैंक पर नजर जमाई और उसे अपने पाले में खींचने के लिए मुलायम सिंह राम भक्तों पर गोली चलवाने तक में नहीं हिचके। उधर बिहार में लालू ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रोककर खुद को मुस्लिम हितैषी साबित करने का दाँव खेला। इसके जवाब में हिंदुओं का झुकाव भाजपा की तरफ हुआ। इस खेल में सबसे अधिक नुकसान हुआ कांग्रेस का जिसके हाथ से हिन्दू और मुसलमान दोनों खिसक गए। दलित वोट बसपा ने समेट लिए। लंबे समय तक मुस्लिम मतदाता सपा और राजद का  साथ देते रहे। लेकिन बीते लोकसभा चुनाव में अपने धर्मगुरुओं के निर्देशानुसार मुस्लिम उन्होंने  भाजपा को हराने में सक्षम प्रत्याशी को मत देने की रणनीति अपनाई जो उ.प्र में सर्वाधिक कारगर साबित हुई। महाराष्ट्र सहित कुछ और राज्यों में भी इसका असर हुआ जिससे भाजपा लोकसभा में स्पष्ट बहुमत से वंचित रह गई। सबसे बड़ा झटका उसे उ.प्र में ही लगा जहां मोदी - योगी की जुगलबंदी को मुस्लिम गोलबंदी ने ध्वस्त कर दिया। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी में भी बहुत कम मतों से जीते। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी लखनऊ में 70 हजार के मामूली अंतर से जीत सके। कई दशक बाद उ.प्र में भाजपा सपा से पीछे रह गई। हालांकि इसके पीछे दलितों की भूमिका भी रही किंतु मुस्लिम समुदाय के मन में इस बात का एहसास पैदा हो गया कि  भाजपा को 240 सीटों पर रोकने का पराक्रम उसी ने किया। जाहिर है इससे उसका हौसला बुलंद हुआ जिसकी परिणिति देश में हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों पर पथराव के रूप में हुई। सांप्रदायिक विवाद देश में पहले भी होते आये हैं किंतु इस वर्ष गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा पर जिस तरह का उत्पात देखने मिला वह खतरनाक संकेत है। हिन्दू देवी - देवताओं की प्रतिमाओं को ले जाने से रोकना और उन पर पत्थर फेंककर खंडित करने जैसी घटनाएं बड़ी  संख्या में होना ये दर्शाता है कि इसके पीछे शातिर दिमाग काम कर रहे हैं। मुसलमानों की ये शिकायत जायज है कि मस्जिद के सामने जान - बूझकर उत्तेजित करने वाली गतिविधियां होने से विवाद पैदा होते हैं किंतु देवी प्रतिमा के जुलूस को मार्ग बदलने बाध्य करने की जिद करने वालों को रोकने उस समाज के जिम्मेदार लोग सामने क्यों नहीं आते ये बड़ा सवाल है। बहराइच में जिस हिन्दू युवक को मुस्लिमों द्वारा गोली मार दी गई यदि उसने कुछ गलत किया था तो उसे पकड़कर कानून के हवाले करना चाहिए था। लेकिन जैसा कि पिछली पंक्तियों में लिखा गया है लोकसभा चुनाव के बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों में मुस्लिम समाज में जो विजयोन्माद उत्पन्न हुआ उसके कारण अनेक शहरों में सांप्रदायिक तनाव देखने मिल रहा है। विजयादशमी पर रास्वसंघ के पथ संचलन पर पथराव की घटनाएं भी पहली बार हुईं। इस सबके पीछे राजनीतिक दलों की भूमिका भी है जो मुस्लिम समाज को समझाने के बजाय उल्टा भड़काते हैं। उ.प्र से आ रही खबरें निश्चित रूप से चिंतित करने वाली हैं। योगी सरकार के राज में कानून व्यवस्था काफी सुधर गई है। अपराधियों के विरुद्ध सख्ती बरती जाने से जनता राहत महसूस कर रही है। लेकिन वोट बैंक की लालच में अपराधियों को संरक्षण देने की जिस नीति पर सपा जैसे दल चल रहे हैं वह समाज विरोधी है। अशांति फैलाने वाला चाहे हिन्दू हो या  मुसलमान , उसके विरुद्ध कड़ी  कार्रवाई होनी चाहिए। धर्म  के नाम पर किसी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। उ.प्र सरकार को हालात पर पैनी निगाह रखनी होगी क्योंकि जल्द ही वहाँ 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 14 October 2024

जातीय जनगणना और मुस्लिम तुष्टीकरण से कांग्रेस को नुकसान होने लगा



 जम्मू - कश्मीर और हरियाणा के चुनाव नतीजों का तरह- तरह से विश्लेषण हो रहा है। पहले राज्य में तो   कश्मीर घाटी के अलावा जम्मू अंचल की भी कुछ सीटें मुस्लिम बाहुल्य होने से नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की बढ़त साफ  दिखाई दे रही थी।  नेशनल काँफ्रेंस द्वारा धारा 370 की बहाली का जो मुद्दा उठाया गया उसका लाभ उसे मिला। पीडीपी के अलावा जमायत ए इस्लामी, राशिद इंजीनियर और उन जैसे कुछ अन्य अलगाववादी गुटों के उम्मीदवारों  के सफाये से स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम  मतदाताओं ने रणनीतिक मतदान किया। उनको डर था कि त्रिशंकु विधानसभा बनने पर भाजपा उसका लाभ उठा लेगी । दूसरी तरफ जम्मू की हिन्दू बहुल सीटों पर भाजपा के पक्ष में जमकर ध्रुवीकरण हुआ। हालांकि कुछ सीटों पर बागियों ने  खेल बिगाड़ा जिससे  प्रदेश  अध्यक्ष रवीन्द्र रैना चुनाव हार गए। यदि भाजपा 35 सीटें जीत जाती तब सत्ता की चाभी उसके पास होती किंतु घाटी में मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण इतना जबरदस्त था कि उसने भाजपा की उम्मीदों को पूरा होने से रोक दिया। लेकिन ये भी सही है कि घाटी से आ रही खबरों के कारण ही जम्मू के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में भाजपा 29 सीटें जीतकर मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी। जहाँ तक बात हरियाणा की है तो वहाँ मुस्लिम आबादी कुछ सीटों पर निर्णायक स्थिति में होने से  भाजपा के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। चुनाव परिणाम ने इस बात को साबित भी कर दिया। पाँच मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस की इकतरफा जीत हुई। लेकिन उन सीटों से आ रहे संकेतों ने प्रदेश में कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ दिये जो जाट, दलित और मुस्लिम मतदाताओं के एकमुश्त समर्थन की उम्मीद पर सवार होकर अपनी जीत को निश्चित मानकर चल रही थी। लोकसभा चुनाव के बाद से देश भर से आ रही खबरों ने गैर मुस्लिम मतदाताओं को भी भाजपा के पक्ष में खड़ा किया। नूह में हुए दंगों में हिंदुओं की जो पिटाई हुई थी उसकी यादों ने विधानसभा चुनाव में हिन्दू मतदाताओं को भावी खतरों के प्रति आगाह कर दिया। यही वजह रही कि ओबीसी , ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं के अलावा दलितों और जाटों के मत भी भाजपा की तरफ लुढ़क गए। ये बदलाव इतनी खामोशी से हुआ कि चुनाव विश्लेषक और सर्वेक्षण एजेंसियां तक नहीं भांप सकीं। चुनाव परिणाम से भौंचक कांग्रेस पहले तो ईवीएम और चुनाव आयोग पर उंगलियाँ उठाती रही लेकिन धीरे - धीरे उसे समझ में आ गया कि बाजी हाथ से निकल चुकी है। पार्टी के भीतर आरोप - प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरू हो गया। दलित चेहरे के रूप में मुख्यमंत्री पद की दावेदार कु. शैलजा की नाराजगी को भी वजह माना गया किंतु स्वतंत्र विश्लेषकों ने जम्मू - कश्मीर और हरियाणा के चुनाव परिणामों से  निष्कर्ष निकाला कि कांग्रेस द्वारा जातीय जनगणना और मुस्लिम तुष्टीकरण पर जिस तरह जोर दिया उसने एक बार फिर हिन्दू मतदाताओं के ध्रुवीकरण की स्थितियाँ उत्पन्न कर दीं। कश्मीर घाटी में मुस्लिमों के गोलबंद होने की प्रतिक्रिया स्वरूप जम्मू में गैर मुस्लिम मत भाजपा के पक्ष में एकजुट हुए। इसी तरह हरियाणा में भी कांग्रेस द्वारा बनाई गई रणनीति इसलिए विफल साबित हुई क्योंकि उसने जाटों के साथ दलितों और मुस्लिमों के बल पर चुनाव जीतने का ख्वाब देखा। लेकिन यहाँ भी जाति के ऊपर हिंदुत्व भारी पड़ा जिसका प्रमाण जाट बाहुल्य अनेक सीटों पर भाजपा की विजय है। ये भी तब हुआ जब भाजपा ने गैर जाट नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत किया । जबकि कांग्रेस में भूपिंदर सिंह हुड्डा ही चेहरे थे। इससे मुख्यमंत्री पद के अन्य दावेदार कोप भवन में चले गए वहीं गैर जाट मतदाताओं में भी कांग्रेस के प्रति असंतोष बढ़ा। भाजपा को मुख्यमंत्री बदले जाने का लाभ लोकसभा चुनाव में भले न मिला हो किंतु विधानसभा चुनाव में श्री हुड्डा के मुकाबले नायब सिंह को लोगों ने पसंद किया। जम्मू - कश्मीर के  चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति पर उतना असर नहीं पड़ता किंतु हरियाणा  ने पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया। 4 जून के बाद से जो कांग्रेस हवा में उड़ रही थी वह जमीन पर आ गई। राहुल गाँधी द्वारा जाति के मुद्दे को ज्यादा हवा दिये जाने पर भी सवाल उठे। ये भी कहा गया कि वक़्फ़ संशोधन पर कांग्रेस का विरोध हिंदुओं को रास नहीं आ रहा। बीते कुछ महीनों में हिंदुओं के धर्म स्थलों और धार्मिक जुलूसों पर हुए हमलों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा से नाराज जातीय समूहों को उसके तरफ लौटने के लिए प्रेरित किया। इसका संकेत हरियाणा से मिल गया है। इससे महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा के चुनाव में भाजपा का हौसला जहाँ मजबूत हुआ वहीं कांग्रेस विशेष रूप से राहुल गाँधी का दबदबा कम हुआ है। इंडिया गठबंधन के सहयोगी भी अब ऊँची आवाज में बोलने लगे हैं। मोदी - योगी द्वारा बंटोगे तो कटोगे का जो नारा लगाया जा रहा है उसकी चर्चा  हिन्दू समाज में होने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 12 October 2024

सनातन , हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रति बढ़ता समर्थन संघ की उपलब्धि





राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की अलख जगाने के लिए 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में स्व. डाॅ. केशव बलीराम हेडगेवार ने मुट्ठी भर लोगों के साथ जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन की स्थापना की थी वह शताब्दी वर्ष में प्रविष्ट हो गया। स्वाधीनता के 22 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आये इस संगठन का उद्देश्य जाति, भाषा और सांस्कृतिक विविधता के कारण बिखरे हुए हिंदू समाज को संगठित कर एक ऐसा सामाजिक ढांचा खड़ा करना था जिससे जुड़े व्यक्ति के मन में भारत की एकता और इसके प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने का भाव हो और निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें का विचार जिनकी प्रेरणा का स्रोत हो। ये प्रश्न संघ के प्रारम्भ से ही  उठता रहा है कि वह केवल हिंदुओं की ही बात क्यों करता है और जब इस देश में हिंदुओं के अलावा मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन तथा पारसी आदि धर्मों के अनुयायी भी रहते हैं तब वह भारत को हिन्दू राष्ट्र क्यों कहता है ? यद्यपि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था और पाकिस्तान ने अलग होते ही खुद को इस्लामिक देश घोषित कर लिया किंतु भारत ने ऐसा करने के बजाय  सर्व धर्म समभाव के पुरातन विचार को अपनाया और सभी को अपनी आस्था और पूजा पद्धति के अनुरूप धार्मिक क्रिया हेतु स्वतंत्रता प्रदान की।  लेकिन रास्वसंघ द्वारा भारत को हिन्दू राष्ट्र कहने के पीछे उसकी भौगोलिक रचना है जो हिमालय से सिंधु ( समुद्र) फैली है। और इसी आधार पर  इसके दायरे में रहने वाले सभी लोग चाहे वे किसी भी धर्म या संप्रदाय के हों, उनकी राष्ट्रीयता हिमालय और सिंधु के संक्षिप्तीकरण के रूप में हिन्दू ही  है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत के बहुसंख्यक निवासियों द्वारा हजारों वर्ष से जिस धर्म का पालन किया जाता रहा उसका नाम हिन्दू न होकर सनातन है। हिन्दू शब्द तो जैसा ऊपर बताया गया भौगोलिक रचना पर आधारित है और विदेशी आक्रांताओं ने भी  इसी नाम का उपयोग किया । आजादी के दौरान भी ज्यादातर लोग इसे हिंदुस्तान ही कहते थे। और अभिवादन के लिए जय हिन्द ही कहा जाता था। आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को लालकिले की प्राचीर से प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने अपने भाषण की समाप्ति के बाद तीन बार जय हिन्द बोलने की जो परंपरा स्थापित की उसका पालन अब तक के सभी प्रधानमंत्री करते आ रहे हैं। इकबाल ने भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा लिखा।  लेकिन भारत के संविधान की प्रस्तावना में इंडिया जो कि भारत है लिखे जाने के बाद से देश का अधिकारिक नाम भारत हो गया किंतु हिंदुस्तान भी आज तक बोलचाल में है और जय हिन्द भी। संघ का हिन्दू राष्ट्र वस्तुतः धर्म के बजाय राष्ट्रीयता पर आधारित विचार है जिसे वामपंथियों ने मुस्लिम विरोधी प्रचारित करना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें संघ से अपने लिए खतरा नजर आने लगा था। चूँकि पं. नेहरू भी साम्यवादी विचारधारा के प्रति  आकर्षित थे अतः उनका सहारा लेकर कांग्रेस में अनेक वामपंथी घुस आये। धीरे - धीरे वे सत्ता तथा और संगठन के साथ ही शिक्षा और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में भी काबिज होते गए। प्रशासन में भी साम्यवादी चेहरे भरे जाते रहे। इंदिरा गाँधी की सत्ता रहते तक तो कांग्रेस पूरी तरह वामपंथियों की चारागाह बन चुकी थी। इनके कारण ही संघ जैसे देशभक्त संगठन पर प्रतिबंध लगाए गए। गाँधी जी की हत्या से इसका सिलसिला शुरू हुआ जो 1992 में बाबरी ढांचा गिरने तक जारी रहा। हालांकि हर प्रतिबंध के बाद वह और शक्तिशाली होकर उभरा क्योंकि उस पर लगे आरोप साबित नहीं हो सके। संघ ने अपने को राजनीति से दूर रखा किंतु जब भी देश और लोकतंत्र पर खतरा आया उसने आगे आकर संघर्ष किया जिसके परिणाम बेहद सकारात्मक निकले। जब संघ की विचारधारा और हिंदुत्व का भाव समाज में तेजी से फैलने लगे तो वे राजनीतिक शक्तियाँ एकजुट होने लगीं जिन्हें हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र से नफरत है। संघ का अंधा विरोध करने के लिए इन्होंने मुस्लिम परस्ती का दामन थामा। जिसका लाभ लेकर आतंकवाद देश की  एकता और अखंडता के लिए खतरा बन गया। बीते कुछ वर्षों में हिन्दू , हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विरुद्ध एक सुनियोजित षडयंत्र रचा जा रहा है जिसे विदेशी शक्तियों का समर्थन प्राप्त है। देश के अनेक सीमावर्ती राज्यों में देश विरोधी ताकतों का उभार इसका प्रमाण है। संघ द्वारा सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच सामाजिक समरसता कायम करने के जो प्रयास किये गये उनके अनुकूल  परिणाम निकलने से विरोधी ताकतें बौखलाकर बहुसंख्यक समाज में जाति आधारित विभाजन करने का खतरनाक खेल खेलने में जुटी हैं। लोकसभा चुनाव में इसका असर देखने मिल चुका है। उसके बाद से देश में मुस्लिम कट्टरपंथी जिस तेजी से आक्रामक हुए वह भारत में बांग्ला देश जैसे हालात उत्पन्न करने का प्रयास है। ऐसी स्थितियों में हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को मजबूत करना सर्वोच्च प्राथमिकता है जिसे रास्वसंघ ही अमली जामा पहना सकता है। यही कारण है कि ज्यादातर राजनीतिक दल संघ को लेकर विष वमन किया करते हैं। लेकिन अपनी देशभक्ति , अनुशासन और सेवाभाव के कारण उसका विस्तार पूरे देश में हो चुका है। समाज के जिम्मेदार वर्ग  में ये विश्वास तेजी से मजबूत होता जा रहा है कि संघ की शक्ति ही विघटनकारी ताकतों का सामना कर सकती है। संघ का शताब्दि वर्ष में प्रवेश उम्मीदें जगाने वाला है। 99 वर्षों की उसकी गौरवशाली यात्रा विश्व इतिहास में अनोखी है। देश के बाहर भी संघ के स्वयंसेवक देश की साख और धाक जमाने में जुटे हुए हैं। सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघ की प्रभावशाली उपस्थिति उसकी सफलता और स्वीकार्यता का प्रमाण है। महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने 21 सदी भारत की होने की जो भविष्यवाणी की थी , रास्वसंघ उसे  सही साबित करने में जुटा हुआ है। सनातन , हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रति बढ़ता समर्थन संघ की बड़ी उपलब्धि है। शताब्दि वर्ष में उसकी भूमिका पर देश ही नहीं समूचे विश्व की निग़ाह रहेगी। 

आलेख :- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 11 October 2024

उमर को समझ में आ गया कि 370 की वापसी नामुमकिन है

भा चुनाव के दौरान नेशनल काँफ्रेंस के नेता डाॅ.फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर  जम्मू - कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के साथ  धारा 370 की बहाली का मुद्दा गर्माये रहे। घाटी के मतदाताओं पर  इसका असर  नेशनल काँफ्रेंस को वहाँ भारी सफलता मिलने के रूप में  देखने मिला। महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी को घाटी के मतदाताओं ने इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि  उसने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी।  जमायत ए इस्लामी सहित अन्य छोटे दलों और अलगाववाद समर्थक उम्मीदवारों को भी घाटी के लोगों ने समर्थन नहीं दिया जिससे कि ऐसी सरकार बने जो  पूर्ण राज्य और 370 की बहली जैसी मांगें मंजूर करवा सके। हालांकि नेशनल काँफ्रेंस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु उसकी  सहयोगी कांग्रेस को 6 सीटें मिलने से कमी पूरी हो गई। 4 निर्दलीय  भी सरकार के साथ आ गए। भाजपा चूंकि काफी पीछे रह गई इसलिए सरकार को कोई खतरा नहीं है। ऐसे में आशंका होने लगी कि उमर अब्दुल्ला और उनके पिता पूर्ण राज्य और 370 के मुद्दे पर केंद्र के साथ टकराव के रास्ते पर बढ़ेंगे जिससे घाटी में अलगाववाद समर्थक ताकतें  सिर उठाने लगेंगी। उल्लेखनीय है 1990 में फारूख सरकार के कार्यकाल में ही कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने मजबूर होना पड़ा था। गनीमत ये थी कि स्व.जगमोहन राज्यपाल थे वरना एक भी हिन्दू  जीवित न लौटता। हालात को संभालने के बजाय फारुख अपनी ससुराल लंदन चले गए। इस परिवार की खासियत ये है कि ये श्रीनगर में तो अलगाववाद की भाषा  बोलता है वहीं दिल्ली आकर खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताने का नाटक करता है। विधानसभा चुनाव के दौरान पिता - पुत्र पूर्ण राज्य और 370 पर जिस ऊँची आवाज में बोल रहे थे वह परिणाम के बाद धीमी होने लगी। घाटी के मतदाताओं का भावनात्मक दोहन करने के बाद सरकार बनाने के पहले ही उमर अब्दुल्ला ने कहना शुरू कर दिया कि वे लोगों को मूर्ख नहीं बनाएंगे। पूर्ण राज्य का प्रस्ताव तो नये मंत्रीमंडल की पहली बैठक में ही पारित कर उपराज्यपाल के पास भेज दिया जाएगा ताकि वे उसे केंद्र को भेज सकें। लेकिन 370 की बहाली पर  ये कहते हुए कदम पीछे खींच लिए कि जिस भाजपा ने उसे हटाया उससे इस बारे में कोई भी उम्मीद रखना मूर्खता है। इसलिए जब केंद्र में सत्ता परिवर्तन होगा तब इस दिशा में आगे बढ़ेंगे।   वे यह भी बोल गए कि  370 के मुद्दे को राजनीतिक तौर पर जिंदा रखा जाएगा किंतु  जम्मू -  कश्मीर के हितों के लिए  केंद्र से टकराव मोल नहीं लेंगे। दरअसल अब्दुल्ला परिवार समझ चुका है कि 370 की वापसी असंभव है। ऐसे में उसके लिए केंद्र सरकार से पंगा लेना  नुकसान का सौदा होगा। राजनीतिक विश्लेषक तो ये तक कहने लगे कि निर्दलीय विधायकों को खींचकर उमर ने कांग्रेस को झटका दे  दिया। चुनाव के दौरान ही दोनों के बीच खटास आ गई थी। जम्मू क्षेत्र में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें नेशनल कांफ्रेंस ने इस उम्मीद से दी थीं कि वह हिन्दू मतों में सेंध लगाकर भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी। लेकिन राहुल गाँधी  घाटी में ज्यादा प्रचार करते रहे। इससे नाराज होकर  उमर ने उनको जम्मू में सक्रियता बढ़ाने की सलाह के साथ ही ये ताना भी मारा कि मतदान की तारीख़ बेहद नजदीक आने पर भी कांग्रेस मैदान में नजर नहीं आ रही थी। उनकी आशंका सही साबित हुई। कांग्रेस के 6 विधायक घाटी से ही जीतकर आये। जम्मू में वह एक भी सीट हासिल न कर सकी। यदि नेशनल काँफ्रेंस 42 सीटें  नहीं जीतती तो राज्य एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता में फंस सकता था। असल में हरियाणा के नतीजे देखकर अब्दुल्ला परिवार को ये भी लगने लगा है कि कांग्रेस के साथ रहने से केंद्र सरकार से रिश्ते हमेशा खराब रहेंगे। विधानसभा में 29 निर्वाचित और 5 मनोनीत सदस्यों के साथ भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर होगी। पूर्ण राज्य बनने तक राज्य सरकार के अधिकार भी सीमित रहेंगे। और बन जाने पर भी राज्यपाल तो केंद्र द्वारा ही नियुक्त होगा जो राज्य सरकार की हर बात माने जरूरी नहीं। इसीलिए उमर अब्दुल्ला ने 370 की बहाली के लिए केंद्र से दो - दो हाथ करने का इरादा डल झील में डुबो दिया। हालांकि उनका ऐसा करना उनके चुनावी दावों के विपरीत है किंतु वे  370 के मुद्दे पर केंद्र से टकराने के बजाय देश में सत्ता बदलने तक प्रतीक्षा करने की बात कर रहे हैं तो ये उनकी  समझदारी ही कही जाएगी क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार से इस मुद्दे पर किसी रियायत की उम्मीद वे नहीं कर सकते । वहीं कांग्रेस भी  370  हटाने की बात से  दूर ही रहेगी। ये घाटी से आया पहला सकारतमक संकेत है कि वहाँ की नई सरकार के मुखिया समझ गए हैं कि 370 को बहाल करवाना दिन में सपने देखने जैसा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 10 October 2024

रतन टाटा :भारतीय उद्यमशीलता के महान प्रतीक थे


दुर्घटना ग्रसित होने के बाद मैं मुंबई स्थित घर पर आराम कर रहा था। अचानक मोबाइल की घंटी बजी तो स्क्रीन पर रतन टाटा का नाम देखकर चौंका। हैलो कहकर नमस्कार किया तो उधर से आवाज आई मैं तुम्हें देखने आ रहा हूँ  ,  लेकिन तुम्हारा घर ढूढ़ने में परेशानी हो रही है। मुझे अपना पता बताओ। मैंने कहा आप फोन अपने ड्रायवर को दें , मैं उसे समझा देता हूँ। मेरे इतना कहने पर जवाब मिला, ड्रायवर नहीं है कार मैं स्वयं चला रहा हूँ। मेरे लिए ये सुनना कल्पनातीत था। मैंने उन्हें पता समझाया और कुछ देर बाद वे मेरे घर पधारे। और  बताया कि वे अक्सर यूँ ही अकेले निकल जाते हैं। उनकी वह  सरलता मुझे भीतर तक छू गई। उस वाकये का जिक्र मैं हर जगह करता हूँ ताकि लोग सीख सकें कि इंसान सिर्फ दौलत से नहीं बल्कि अपने आचरण  से बड़ा कहलाता  है। उक्त वृतांत केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की जुबानी लाखों लोगों ने सुना होगा। इसी तरह का एक और उदाहरण कुछ साल पहले सुर्खियों में आया जब ये जानकारी मिलने पर कि उनका एक कर्मचारी दो साल से बीमार है स्व. टाटा उसे देखने मुंबई से पुणे गए। ऐसे अनगिनत  प्रेरणादायी प्रसंगों के मुख्य पात्र रतन टाटा कल रात चल बसे। 86 वर्ष की आयु में किसी का जाना अस्वाभाविक नहीं लगता किंतु उन जैसे व्यक्ति का अवसान ऐसा खालीपन छोड़ जाता है जिसको भरना आसान नहीं है। रतन जी देश के सबसे पुराने औद्योगिक घराने के वारिस थे। आजादी के पहले ही टाटा समूह ने भारत के औद्योगिकीकरण की  बुनियाद रख दी थी। उसके अलावा  और भी उद्योगपति थे । कालांतर में  कुछ टाटा से आगे भी निकल गये। लेकिन निःसंकोच कहा जा सकता है कि टाटा समूह ने जो प्रतिष्ठा अर्जित की वह अन्य औद्योगिक घरानों को  नहीं मिल  सकी।  इसका कारण   उसका सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहना है। वैसे तो सभी उद्योगपति  परोपकार के कार्यों हेतु योगदान देते हैं।लेकिन टाटा समूह ने सामाजिक कल्याण के लिए आर्थिक सहयोग देने की जो संस्थागत व्यवस्था की वह सभी के लिए उदाहरण है। जमशेद जी टाटा (जे.आर.डी) के बाद रतन जी  के कंधों पर इस समूह की जिम्मेदारी आई जिसे उन्होंने जिस कुशलता से निभाया वह पूरे विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई। आज 121 देशों में टाटा का कारोबार फैला है।  लम्बे समय तक  समूह के मुखिया रहने के बाद 75 वर्ष के होते ही उन्होंने  अलग होने का फैसला किया और बतौर कार्यकारी अध्यक्ष मार्गदर्शन करने लगे। उनके कार्यकाल में समूह ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को ला खड़ा किया। वे बहुत ही साहसी इंसान थे और इसी के चलते उन्होंने दुनिया की बड़ी - बड़ी कंपनियां खरीदकर समृद्ध भारत की कल्पना को साकार किया।  विवादों से सदैव उन्होंने खुद को दूर रखा। इसीलिए न सिर्फ उद्योग जगत अपितु प्रत्येक क्षेत्र के लोग उनसे मार्गदर्शन लेते थे। देश में स्वरोजगार को विकसित करने हेतु हजारों युवा उद्यमियों को उन्होंने सहायता प्रदान की। भारत विकास की जिस राह पर तेजी से बढ़ रहा है उसमें उनका योगदान अविस्मरणीय रहेगा। भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से अलंकृत किया था ।  राजनीति से वे हमेशा  दूर रहे। बावजूद इसके उनका नाम राष्ट्रपति पद के लिए अनेक बार चर्चा में आया। रतन जी के बारे में ये विख्यात था कि  वे  समूह की किसी भी बैठक में जाते तो  सबसे ज्यादा रुचि इस बात में लेते कि वह कंपनी उस वित्तीय वर्ष में कितना दान करेगी ? दरअसल उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने दान को संस्थागत रूप देकर संस्कार बना दिया। साधारण व्यक्ति से मिलते समय भी वे अहंकार शून्य रहते। यही कारण है  उनके निधन  से  सभी वर्गों के लोग दुखी हैं। टाटा समूह ने  नैतिक मूल्यों  और सामाजिक सरोकारों के प्रति जिस  निःस्वार्थ प्रतिबद्धता को स्थापित किया वह रतन जी के मानवीय दृष्टिकोण का प्रमाण  है। वे उस दौर में जन्मे और बड़े हुए जब पूंजीवाद और समाजवाद के बीच वैचारिक संघर्ष चरम पर था। वहीं  जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने उदारवाद और वैश्वीकरण भी देखा।  व्यवसाय में  अनेक उतार चढ़ाव भी आये।  बहुराष्ट्रीय  कंपनियों  ने भारतीय उद्योगों के लिए संकट भी पैदा किया किंतु स्व. टाटा ने अवसरों के अनुरूप नीति बनाकर  बजाय भयभीत होने के अपने कारोबार को दुनिया भर में फैलाकर भारतीय उद्यमशीलता की धाक जमाई। उन जैसे प्रतिभाशाली और शानदार इंसान सदियों में जन्म लेते हैं। उनकी सफलता और संपन्नता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि उनका कोई विरोधी नहीं था। और ये भी कि 86 वर्ष का वह व्यक्ति देश के करोड़ों युवाओं का प्रिय और प्रेरणास्रोत रहा। उनके बारे में  विख्यात उद्योगपति आनन्द महिंद्रा का ये कहना पूरी तरह सही है कि रतन टाटा को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा क्योंकि महापुरुष कभी नहीं मरते।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी