Friday, 25 October 2024

सैनिक भले ही पीछे हटा ले लेकिन चीन पर भरोसा करना आत्मघाती होगा


इसे दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे वार्ताओं के दौर का फलितार्थ कहें या रूस में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच होने वाली बातचीत के पहले रिश्तों में आई कड़वाहट दूर करने की कूटनीतिक पहल, ये तय कर पाना मुश्किल है। असल में  चीनियों के चेहरे की जो  बनावट है उसके कारण उनके मनोभाव पढ़ पाना बेहद कठिन होता है। ताजा समझौते के अनुसार दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख़ के डेमचोक और देपसांग इलाके से अपने सैनिक पीछे हटाना शुरू कर दिया है। इसके अंतर्गत टेंट, शेड और सैन्य वाहन आदि हटाने की कारवाई हो रही है। 2020 में  गलवान घाटी में हुई फौजी झड़प के बाद पूरे लद्दाख़ क्षेत्र में युद्ध की स्थिति बनी हुई थी। भारत ने समूचे क्षेत्र में वायुसेना के साथ मिसाइलों की भी तैनाती कर दी। इसके अलावा बड़े पैमाने पर सड़कें और पुल वगैरह विकसित कर दिये गए। इसका प्रभाव ये हुआ कि चीन की तरफ से की जाने वाली घुसपैठ नियंत्रित हो गई। गलवान में हुई झड़प में भारत के एक कर्नल की शहादत हो गई थी। लेकिन जवाबी कारवाई में चीन के सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए जिसे वह छिपाता रहा। चूंकि उस समय कोरोना का प्रकोप था इसलिए चीन को लगा कि उस निर्जन इलाके में वह अपना कब्जा जमा लेगा। दरअसल सीमा का निर्धारण नहीं होने की वजह से लद्दाख़ के बड़े इलाके में दोनों देशों की सेनाएं गश्त करती रहती हैं। अतीत में हुए समझौते के अंतर्गत  तनाव की स्थिति में किसी भी ओर  से गोली नहीं चलाई जाएगी। गलवान घाटी में हुई झड़प में दोनों पक्षों ने एक दूसरे  के साथ हाथापाई की। बंदूकों को लाठी की तरह इस्तेमाल तो किया किंतु गोली न चलाने के करार का उल्लंघन नहीं हुआ। उसके बाद से दोनों  के बीच सैन्य स्तर की बातचीत जारी रही और अनेक क्षेत्रों से सैनिक पीछे हटा लिए गए। ताजा समझौते के बाद 2020 वाली स्थिति बहाल होगी और दोनों देश निर्जन इलाके में बारी - बारी से पेट्रोलिंग कर सकेंगे जिसके पहले दूसरे पक्ष को सूचित करना होगा। जिनपिंग और श्री मोदी के बीच रूस में हुई बातचीत का ब्यौरा तो सामने नहीं आया किंतु ऐसा लगता है वह दुआ - सलाम तक सीमित रही। ये भी कहा जा सकता है कि ब्रिक्स सम्मेलन को सफल साबित करने के लिए रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने दोनों नेताओं की बातचीत के लिए जमीन तैयार की हो क्योंकि इससे अमेरिका की चिंता बढ़ेगी। वैसे भी वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका भारत के प्रति जिस तरह का दोहरा रवैया दिखा रहा है उसमें  हमारे लिए भी कूटनीतिक स्तर पर पैंतरेबाजी करनी जरूरी है। विशेष रूप से बांग्लादेश में हुए सत्ता पलट में अमेरिका की भूमिका में भारत का विरोध साफ झलकता है। लेकिन समस्या ये है कि चीन से भी किसी सदाशयता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वह हमारा जन्मजात शत्रु है। उसके साथ चला आ रहा सीमा विवाद लाइलाज मर्ज बन गया है। भारत के पड़ोसी देशों को उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया है। नेपाल, मालदीव और श्रीलंका में वामपंथी सत्ता आने के बाद बांग्लादेश में भी भारत विरोधी सरकार बन गई। पाकिस्तान से तो हमारी जन्मजात शत्रुता है। अरुणाचल और सिक्किम के साथ ही चीन की नजर भूटान पर भी है। ये बात तो पूरी तरह सही है कि वह भारत के साथ  सीधे युद्ध से बचता रहा है।   गलवान घाटी में किये दुस्साहस का उसे जो जवाब मिला उसके बाद वह समझ गया कि भारत अब 1962 वाला  देश नहीं है। उसके पास हर वो सैन्य क्षमता है जिससे वह चीन को माकूल जवाब दे सकता है। चीन के पास बड़ी सेना जरूर है किंतु सीमाओं की  भौगोलिक स्थिति देखते हुए भारतीय सेना भारी पड़ती है। सही बात ये है कि उसकी फितरत अपने पड़ोसियों को परेशान करने की है ।  इसलिए ये मान लेना भूल होगी कि पूर्वी लद्दाख़ से सैनिक हटाने के बाद उसकी नीयत बदल जाएगी। हालांकि भारत भी इस बात को जान गया है और इसीलिए गलवान विवाद के बाद से ही उसने कड़ा रुख अपनाया। सैन्य स्तर पर हमारी तैयारियां देखकर ही वह बातचीत के लिए रजामंद हुआ और  जिस तरह की ऐंठ दिखाता था उसमें कमी आई। लेकिन विवादित क्षेत्रों से दोनों देशों के सैनिकों के पीछे हटने के  बाद भी भारत को चौकन्ना रहना होगा क्योंकि चीन और धोखेबाजी एक दूसरे के पर्याय हैं। उसके  द्वारा जो नरमी समय - समय पर दिखाई जाती है उसके पीछे भारत के साथ उसका व्यापार है। इसीलिए वह सीधी टक्कर से भले बचता हो किंतु अप्रत्यक्ष रूप से वह भारत विरोधी गतिविधियों को संरक्षण देने में तनिक भी संकोच नहीं करता। संरासंघ में पाकिस्तान का समर्थन इसका प्रमाण है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 24 October 2024

ब्रिक्स संगठन अमेरिकी प्रभुत्व के लिए बड़ी चुनौती

सरे महायुद्ध के बाद  दुनिया दो धड़ों में बंट गई थी। एक का नेतृत्व अमेरिका तो दूसरे का सोवियत संघ के पास था। इनसे अलग  गुट निरपेक्ष देशों का भी एक संगठन बना जिसमें भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया और इंडोनेशिया आदि थे। हालांकि इनका झुकाव कुछ - कुछ सोवियत संघ की तरफ दिखाई देता था। चीन लंबे समय तक विश्व बिरादरी से अलग - थलग रहा। लेकिन 1972 में सं.रा.संघ में प्रवेश  और सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने के बाद संतुलन बदलने लगा। अमेरिका और सोवियत संघ का दबदबा मुख्य रूप से परमाणु शक्ति संपन्न होने के साथ ही अंतरिक्ष के क्षेत्र में  बढ़ते कदम थे। लेकिन चीन ने जल्द ही अपनी उपस्थिति एक महाशक्ति के तौर पर महसूस करवा दी। माओ युग में बने लौह आवरण से बाहर निकलकर उसने अपने दरवाजे पूंजी निवेशकों के लिए खोल दिये।  1991 में सोवियत संघ बिखर गया और उसके मुख्य घटक रूस की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय होने का लाभ चीन को मिला। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि 21 वीं सदी के पहले दो दशक चीन के नाम लिखे जा सकते हैं। लेकिन इस  दौरान रूस ने फिर पाँव जमाये और अमेरिका को चुनौती देने के लिए कूटनीतिक पहल की। ब्रिक्स नामक संगठन उसी का परिणाम है जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। यद्यपि इस संगठन के गठन के पीछे शीतयुद्ध जैसी कोई भावना नहीं थी किंतु उसमें शामिल सभी देश वैश्विक अर्थव्यस्था में तेजी से उभर रहे थे। उदारीकरण की जो बयार 20 वीं सदी के अंतिम दौर में बही उसने साम्यवाद को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। यहाँ तक कि चीन  उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादन का गढ़ बन गया जिन्हें वह अमेरिकी पूंजीवाद का एजेंट मानकर त्याज्य समझता था। इसी के साथ बीते दो दशकों में भारत भी दुनिया की महाशक्ति के रूप में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गया । ये अवधारणा भी प्रबल होने लगी कि वह जल्द ही चीन को पीछे छोड़ सकता है। कोरोना के बाद दुनिया में आये बदलाव ने ब्रिक्स जैसे संगठन का महत्व बढ़ा  दिया। हालांकि जी -8 और जी-20 आदि भी वैश्विक परिदृश्य को प्रभावित करते हैं किंतु  उनमें शामिल ज्यादातार देश अमेरिकी प्रभाव वाले हैं। वहीं ब्रिक्स की खास बात ये है कि इसके मुख्य सदस्य रूस, चीन और भारत अमेरिका के दबाव से बाहर हैं और आर्थिक, सामरिक और तकनीकी दृष्टि से पश्चिम के संपन्न देशों से टक्कर ले रहे हैं। यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध ने एक बार फिर पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। इसके बाद इजरायल और हमास के बीच शुरू हुई जंग का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। इन दोनों युद्धों का रोचक पहलू ये है कि यूक्रेन - रूस के बीच चल रही लड़ाई में चीन और भारत ने तटस्थ रुख अपनाकर एक तरह से अमेरिका को ठेंगा दिखा दिया जिसने रूस पर प्रतिबंध लगवा दिये। वहीं इजरायल और हमास के झगड़े में रूस और चीन इजरायल विरोधी हैं किंतु भारत उसके साथ खड़ा है। बावजूद उसके ब्रिक्स में ये तीनों एकजुट हैं। रूस में संपन्न ब्रिक्स की हालिया बैठक मौजूदा हालात में बेहद महत्वपूर्ण रही। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात  हुई वह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ब्रिक्स देशों की साझा मुद्रा शुरू करना। हालांकि ये बहुत ही चुनौती भरा कदम होगा क्योंकि यूरोपीय यूनियन के देशों द्वारा संचालित यूरो नामक मुद्रा भी डॉलर के दबदबे को कम नहीं कर सकी। ये भी सही है कि मौजूदा स्थिति में रूस को ऐसी मुद्रा की ज्यादा जरूरत है किंतु चीन,भारत , दक्षिण अफ्रीका और  ब्राज़ील भी इससे जुड़ेंगे तो उसकी वजनदारी दुनिया के मुद्रा बाजार में बढ़ जाएगी। भारत की  इस संगठन में सक्रिय भूमिका निश्चित रूप से अमेरिका को रास नहीं आ रही किंतु बीते कुछ समय से वह जिस तरह से भारत को दबाने का प्रयास कर रहा है उसे देखते हुए दूसरे विकल्प खुले रखना जरूरी है। रूस में ब्रिक्स का जो सम्मेलन संपन्न हुआ उसका समय बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि एक तो दुनिया में दो बड़ी लड़ाईयां लंबे समय से चल रही हैं दूसरा अमेरिका में अगले माह राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं जिसके बाद इजरायल और ईरान के बीच सीधी जंग होने की आशंका है। ब्रिक्स बैठक में नरेंद्र मोदी और  जिनपिंग के बीच हुई वार्ता से हालांकि  कुछ बड़ा फायदा तो नहीं हुआ किंतु कूटनीति कब कौन सी करवट ले ले ये कहना मुश्किल है। फिर भी भारत के लिए ये अच्छा है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उसे सम्मानजनक स्थान प्राप्त होने लगा है। रूस और चीन के साथ ब्रिक्स में उसकी भागीदारी के बावजूद अमेरिका उसे रोकने की हिम्मत नहीं कर पा रहा जो साधारण बात नहीं है। राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कूटनीति का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करने के लिए भारत सरकार प्रशंसा की हकदार है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 23 October 2024

विचारधारा छोड़ चुनाव जीतने वाली मशीन बन रहीं राजनीतिक पार्टियां

हाराष्ट्र और झारखंड  विधानसभा चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों की  सूची जारी की जा रही  है । प्रत्याशियों के बारे में मतदाताओं की पसंद - नापसंद तो मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगी लेकिन सूची सार्वजनिक होते ही जिस प्रकार से विरोध और असंतोष देखने मिलता है वह राजनीति के गिरते स्तर का परिचायक है। बड़े नेताओं के मुर्दाबाद के नारे और पुतला दहन , पार्टी दफ्तरों का घेराव और आत्मदाह का प्रयास तक होता है। जिन नेताओं को लोग अपना रहनुमा मानते हैं वे ही टिकिट कटने पर  खलनायक हो जाते हैं । दशकों तक  पार्टी की विचारधारा को धर्मशास्त्रों की तरह पूजने वाले उसे एक झटके में रद्दी की टोकरी में फेंकने से परहेज नहीं करते। नीतिगत निष्ठा , आदर्श सब क्षण भर में बदल  जाते हैं। इसके पीछे यदि नीतिगत मतभेद हो तो बात समझ आती  है किंतु मौजूदा राजनीति  पूरी तरह स्वार्थ केंद्रित हो चली है। नीतियां और नेता भी तभी तक सुहाते हैं जब तक वे स्वार्थों की पूर्ति करते रहें।  अधिकतर लोगों का एकमात्र लक्ष्य चुनाव की टिकिट प्राप्त करना  रह गया है। केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने कुछ साल पहले राजस्थान विधानसभा में आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि राजनीति में काम करने वालों की महत्वाकांक्षाओं का कोई अंत नहीं  है। विधायक बनने के बाद मंत्री और मंत्री बन जाने के बाद मुख्यमंत्री बन जाने के लिए हाथ - पांव मारे जाते हैं । उस आयोजन में मंच पर कांग्रेस के नेता भी मौजूद थे। हास - परिहास में गहरी और गंभीर बात कह जाने वाले श्री गड़करी  ऐसे राजनेता  हैं जिनको विरोधी भी पसंद करते हैं । बावजूद इसके कि वे रास्वसंघ और भाजपा की विचारधारा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। लेकिन  उनकी अपनी पार्टी में ही  ऐसे लोग लुप्त  होते जा रहे हैं जो निःस्वार्थ भाव से विचारधारा की सेवा करते हों। जहाँ तक  बात कांग्रेस की  है तो  उसमें एक ही परिवार के प्रति  निष्ठा के कारण  विचारधारा नामक तत्व विलुप्त हो चुका है। वहीं देश भर में फैले जो दर्जनों  क्षेत्रीय दल हैं वे किसी नेता या परिवार की जागीर जैसे हैं जिनका उद्देश्य केवल निहित स्वार्थ साधने के लिए सौदेबाजी और अवसरवादी गठबंधन करना  है। वामपंथी दल इस बुराई से दूर माने जाते थे किंतु राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर सिमटने के कारण वे भी बेमेल गठबंधन करने मजबूर लगे हैं। भाजपा के अंध विरोध में  नकारात्मक राजनीति का शिकार होने से युवा पीढ़ी उनसे विमुख होती जा रही है । जिन  राज्यों की राजनीति  दो ध्रुवीय है उनमें  नेतागिरी के इच्छुक व्यक्ति  मुख्य पार्टियों में संभावनाएं तलाशते हैं।  आजकल सेवा निवृत्त नौकरशाहों को भी राजनीति का चस्का लग गया  है। जिंदगी भर अफसरी करने के बाद सांसद और विधायक बन जाने की योजना के साथ ऐसे लोग  किसी नेता के कृपा पात्र बनकर लालबत्ती हासिल कर लेते हैं। लेकिन ज्योंही  लगता है कि स्वार्थ सिद्ध नहीं हो रहा , पाला बदलने में देर नहीं करते। दरअसल ऐसे लोगों की न तो विचारधारा में रुचि होती है और न ही वे जमीनी कार्यकर्ता बनकर काम करना पसंद करते हैं। लेकिन उनकी वजह से बरसों तक दरी - फट्टा उठाने वाले कार्यकर्ता के मन में भी महत्वाकांक्षा उछाल मारने लगती हैं । और जब लगता है कि उसके योगदान की  कद्र नहीं हो रही तब वह दबाव की राजनीति पर उतारू हो जाता है। हरियाणा और जम्मू - कश्मीर  के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों को इसका सामना करना पड़ा। झारखण्ड में भी  टिकिट कटते ही पार्टी बदलने का सिलसिला जारी है। क्षेत्रीय दलों का तो खैर कोई ईमान - धर्म नहीं है किंतु राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते भाजपा और कांग्रेस को इस सबसे सबक लेना चाहिए। अन्यथा भविष्य में वे केवल चुनाव लड़ने वाली मशीन बनकर रह जाएंगी जिसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं होगा । वैसे भी चुनाव जीतने  के लिए पार्टी की नीतियां और कार्यक्रम आकर्षण खो चुके हैं । इसीलिए मुफ्त उपहारों का लालच देकर चुनाव रूपी वैतरणी पार करने  की कोशिश होने लगी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

 

Tuesday, 22 October 2024

आबादी बढ़ाने की होड़ में उ.प्र और बिहार भी शामिल हो गए तो


दो दक्षिण भारतीय  राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जनसंख्या बढ़ाने के लिए जो बयान दिये वे यदि राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। शुरुआत की आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू ने  नव विवाहित महिलाओं से अधिक बच्चे पैदा करने का आग्रह करते हुए जिससे कि युवा आबादी बढ़ सके। उनका मानना है कि युवा दंपत्तियों के बीच एक संतान की सोच बढ़ने से जिस अनुपात में वृद्ध बढ़ रहे हैं उसकी तुलना में युवाओं की वृद्धि दर घट रही है। परिणामस्वरूप भविष्य में  भारत उस जनसांख्यिकीय लाभ से वंचित हो जाएगा जो आज उसकी  बड़ी ताकत है। उन्होंने स्थानीय निकाय चुनाव में दो से अधिक बच्चों वालों को ही चुनाव लड़ने की पात्रता संबंधी कानून बनाये जाने की बात भी  कही। उनके बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन का बयान आ गया कि नव विवाहित 16 बच्चे पैदा करें। उन्होंने तमिल परंपरा का हवाला देते हुए  कि पहले बुजुर्ग नवविवाहित जोड़ों से कहते थे कि तुम 16 संतानें प्राप्त करो और समृद्ध जीवन जियो, तो इसका मतलब 16 संतानें नहीं बल्कि 16 प्रकार की संपत्ति थी, जिनसे आशय गाय, घर, पत्नी, संतान, शिक्षा, जिज्ञासा, ज्ञान, अनुशासन, भूमि, जल, आयु, वाहन, सोना, संपत्ति, फसल और प्रशंसा से था। लेकिन अब कोई भी  16 प्रकार की संपत्ति प्राप्त करने का आशीर्वाद नहीं दे रहा है, बल्कि केवल पर्याप्त संतान होने और समृद्ध जीवन जीने का आशीर्वाद दे रहा है। उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारी जनसंख्या  घटने का असर आगामी परिसीमन में  तमिलनाडु की लोकसभा की सीटें घटने के रूप में देखने मिलेगा।स्मरणीय है  2029 तक  महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के प्रावधान के कारण  लोकसभा की सीटों को बढ़ाया जाना है। इसके तत्काल बाद तमिलनाडु से ये आवाज उठी कि ऐसा होने पर उत्तर भारतीय राज्यों का संसद में वर्चस्व और बढ़ जायेगा क्योंकि अधिक आबादी के कारण उनकी लोकसभा सीटों में और वृद्धि हो जायेगी। कहा भी जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से जाता है। यही वजह है कि अधिकतर प्रधानमंत्री उ. प्र से बने। दक्षिण के हिस्से राष्ट्रपति तो ढेर सारे आये किंतु   प्रधानमंत्री मात्र दो ही मिले।  मौजूदा प्रधानमंत्री भी  हालांकि हैं तो गुजरात के किंतु 2014 से लोकसभा में वे वाराणसी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। तमिलनाडु दक्षिण का एकमात्र राज्य है जहाँ उत्तर भारत और हिन्दी के प्रति शत्रुता का भाव खुलकर व्यक्त किया जाता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा तो हिन्दी थोपे जाने के विरोध में देश से अलग होने जैसा  बयान भी दे चुके हैं। श्रीलंका में लिट्टे ने जब तमिल  देश का संघर्ष छेड़ा तब द्रमुक ने उसका समर्थन किया था। तमिलनाडु से ही हमेशा ये आवाज सुनाई देती रही है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़  दक्षिण के हैं जबकि उत्तर भारत में आर्य विदेशों से आकर बसे। इस दावे के पीछे भी मूलतः भारत को दक्षिण और उत्तर में बांटने का षडयंत्र ही है। कुछ समय पहले स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने सनातन के विरुद्ध जो निम्नस्तरीय बयान दिया था वह भी दरअसल उत्तर भारतीयों को अपमानित करने के लिए ही था। अधिक संतान उत्पन्न करने संबंधी बयान संयोग से  दो दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की ओर से आया किंतु जहाँ श्री नायडू ने देश की चिंता की वहीं स्टालिन को तमिलनाडु की लोकसभा सीटें घटने की चिंता सता रही है। असल में द्रविड़ राजनीति प्रारंभ से ही हिन्दू  और उत्तर भारत की विरोधी रही है। लेकिन स्टालिन ने जनसंख्या बढ़ाने के लिए लोकसभा सीटों के घटने का जो आधार बताया यदि वैसी ही सोच उ.प्र और बिहार में भी विकसित होने लगे तब देश में जनसंख्या विस्फोट अनियंत्रित हो जायेगा। चंद्राबाबू की छवि विकास करने वाले शासक की रही है इसलिए उन्होंने जनसंख्या बढ़ाने का जो कारण बताया वह उनकी रचनात्मक सोच का परिचायक है वहीं स्टालिन की बात में क्षेत्रीयता की बू आती है। वैसे जबसे राहुल गाँधी जाति आधारित जनगणना और जाति की संख्या के आधार पर हिस्सेदारी की बात करने लगे हैं तबसे समाज के उस वर्ग में भी ज्यादा संतान पैदा करने का विचार हिलोरें मारने लगा है जो  जातिगत आरक्षण के चलते अवसरों से वंचित हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 21 October 2024

प्रवासी मजदूरों की हत्या के जरिये कश्मीरी पंडितों को डराने का षडयंत्र


जम्मू - कश्मीर में नई सरकार का गठन हो गया। उम्मीद के मुताबिक  अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी के उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए। वे पहले भी इस पद पर रह चुके हैं। उनके पिता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला ने लंबे समय तक इस राज्य की सत्ता संभाली और उन्हीं के राज में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ। यद्यपि कश्मीर घाटी की राजनीति के दो प्रमुख स्तंभ रहे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की ओर से सदैव ये कहा जाता रहा कि बिना पंडितों के कश्मीर अधूरा है लेकिन  सच्चाई यही है कि घाटी के सभी नेताओं की राजनीति पूरी तरह हिन्दू विरोधी रही है। वैसे तो उमर के दादा  शेख अब्दुल्ला के  समय से ही अनेक हिन्दू नेता नेशनल काँफ्रेंस में रहे किंतु किसी को भी उभरने का अवसर नहीं दिया गया। मुख्यमंत्री  पद पर भी हमेशा मुस्लिम ही बैठा। इसका कारण कश्मीर घाटी में विधानसभा की ज्यादा सीटें होना भी था। धारा 370 हटने के बाद हुए परिसीमन में जम्मू क्षेत्र में 43 सीटें हो गईं वहीं घाटी में 47। इस चुनाव में ये संभावना भी व्यक्त की जाने लगी थी कि भाजपा को यदि जम्मू क्षेत्र में भारी सफलता मिली और त्रिशंकु विधानसभा बनी तब  पहली बार हिन्दू मुख्यमंत्री बन सकता है। इस बात की घाटी में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और वहाँ मुसलमानों ने नेशनल काँफ्रेंस को ऐतिहासिक जीत दिलवाकर भाजपा का रास्ता रोक दिया। उसके विपरीत जम्मू के अनेक हिन्दू बहुल क्षेत्रों में नेशनल काँफ्रेंस , कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के विधायक जीत गए। ये भी उल्लेखनीय है कि नेशनल काँफ्रेंस का पूरा चुनाव अभियान पूर्ण राज्य का दर्जा और धारा 370 की बहाली पर केंद्रित रहा। पीडीपी भी इन्हीं बातों पर जोर देती रही। लेकिन कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास जैसे मुद्दों पर न अब्दुल्ला परिवार ने जोर दिया और न ही मुफ्ती ने। ये बात भी स्वीकार करनी होगी कि केंद्र सरकार ने धारा 370 हटाने के साथ ही जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित बनाकर अपने अधीन तो कर लिया किंतु  कश्मीरी पंडितों की वापसी की स्थितियाँ नहीं बन सकीं। जब भी लगा कि माहौल सुधरने को है तभी आतंकवादियों ने  बचे - खुचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दहशत फैला दी। ये बात तो सही है कि घाटी में आतंकवाद  पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित है किंतु बिना स्थानीय समर्थन और संरक्षण के उसका जारी रहना असंभव है। बुरहान वानी जैसे लोगों को महानायक बनाने वाले नेताओं ने ही आतंकवाद को घाटी में कुटीर उद्योग बना दिया। विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता उमर अब्दुल्ला के हाथ में आते ही ये उम्मीद लगाई जाने लगी थी कि अब घाटी का माहौल पूरी तरह शांत हो जाएगा। लेकिन  बीते एक सप्ताह में आतंकवादियों ने दो अलग - अलग घटनाओं में अन्य राज्यों से आकर घाटी में मजदूरी कर रहे श्रमिकों को गोलियों से भून डाला। पहली वारदात शोपिया में घटित हुई जहाँ बिहार के दो श्रमिकों की हत्या हुई और उसके बाद गत दिवस खबर आई कि मुख्यमंत्री उमर के  निर्वाचन क्षेत्र गांदरबल में तीन श्रमिकों को मौत के घाट उतार दिया गया जो अन्य किसी राज्य के थे। ये दोनों वारदातें इस बात का संकेत हैं कि राज्य की सत्ता चुनी हुई सरकार के हाथ में आते ही देश विरोधी ताकतों का हौसला बुलंद होने लगा। हालांकि उपराज्यपाल के शासन में भी आतंकवादियों की गतिविधियाँ पूरी तरह नहीं रुकीं किंतु तब केंद्र के शासन के विरुद्ध नाराजगी का बहाना बनाकर उसके औचित्य को ठहराया जाता रहा। लेकिन  सत्ता कश्मीर घाटी के मुस्लिम नेता के हाथों में आने के फौरन बाद  अन्य राज्य से आकर पेट पालने वाले गरीब मजदूरों की अकारण हत्या के जरिये कश्मीरी पंडितों को चेतावनी दे दी गई कि वे घाटी में लौटने का इरादा  त्याग दें । अन्यथा उनको एक बार फिर 1990 जैसी त्रासदी झेलनी होगी। अभी जम्मू कश्मीर केंद्र शासित राज्य ही है। उमर सरकार ने पूर्ण राज्य संबंधी प्रस्ताव पारित कर उपराज्यपाल के जरिये केंद्र सरकार को भेजने की औपचारिकता पूरी कर दी है। केंद्र  यद्यपि 370 की बहाली से तो स्पष्ट तौर पर इंकार कर चुका है किंतु पूर्ण राज्य  पर सहमत  है। लेकिन इस मामले में  जल्दबाजी करने से बचना चाहिए क्योंकि भले ही  उमर ने फिलहाल 370 की बहाली का मुद्दा पृष्ठभूमि में रख दिया हो लेकिन पूर्ण राज्य का दर्जा मिलते ही  वे अपने असली रंग में आ जाएंगे। अब्दुल्ला खानदान का इतिहास भारत विरोधी हरकतों से भरा पड़ा है। इसलिए उमर सरकार पर पैनी नजर रखना होगी। ये इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये सरकार  उन्हीं फारुख के इशारों पर चलेगी जिनके कारण कश्मीरी पंडितों को दर्दनाक हालात में अपना घर -  द्वार छोड़कर भागना पड़ा था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 19 October 2024

आम आदमी पार्टी : हरियाणा के नतीजों ने होश ठिकाने लगा दिये

जरात विधानसभा के पिछले चुनाव के बाद जब आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला तब संसद से सड़क तक उसके नेता ये कहते हुए जश्न मनाते दिखे कि महज 10 साल के भीतर इस दल ने ये उपलब्धि हासिल कर ली। दिल्ली के बाद पंजाब में सरकार बनाकर वह पहली ऐसी पार्टी बन गई जिसने एक केंद्र शासित राज्य  में अपना प्रभुत्व कायम करने के बाद किसी पूर्ण राज्य में सरकार बनाई और वह भी प्रचंड बहुमत के साथ। हालांकि वह अनेक राज्यों में हाथ - पाँव मारती रही किंतु गुजरात में 5 विधायकों के अलावा उसे अन्य कहीं उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। गोवा में 2 विधायकों के अलावा उसका एक विधायक हाल ही में जम्मू - कश्मीर में भी चुना गया।  लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जबकि वह विपक्षी गठबंधन इंडिया का हिस्सा थी। दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने के बावजूद  उसका सफ़ाया हो गया। पंजाब में उसने अकेले लड़ने का निर्णय करते हुए दावा किया कि वह सभी 13 सीटें जीतकर विधानसभा का प्रदर्शन दोहरायेगी किंतु  3 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। चुनाव परिणाम आते ही आम आदमी पार्टी ने ये घोषणा कर दी कि आगे वह  एकला चलो की नीति पर चलेगी। इसके पीछे दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव हैं जिनमें वह अपना एकाधिकार बनाये रखना चाहेगी। ये भी सही है कि दिल्ली के कांग्रेस नेता आम आदमी पार्टी को फूटी आँखों नहीं देखना चाहते। जिस शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया को जेल जाना पड़ा और अंततः श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा उसकी शिकायत कांग्रेस ने ही उपराज्यपाल से की थी। उक्त नेताओं के गिरफ्तार होने पर भी प्रदेश कांग्रेस द्वारा खुशी व्यक्त की गई। फिर भी हरियाणा विधानसभा के हालिया चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से गठजोड़ का भरसक प्रयास किया जिसे राहुल गाँधी का भी समर्थन मिला किंतु प्रादेशिक नेताओं विशेष रूप से भूपिंदर सिंह हुड्डा को चूंकि कांग्रेस की लहर का गुमान हो चला था लिहाजा उन्होंने गठबंधन से साफ इंकार कर दिया। इससे क्षुब्ध होकर श्री केजरीवाल ने 90 में से 88 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिये। उनको ये आत्मविश्वास था कि  गृह प्रदेश होने के कारण उनकी पार्टी को सम्मानजनक सीटें मिल जाएंगी। वहीं त्रिशंकु की स्थिति में सत्ता का रिमोट कंट्रोल उनके पास होगा। लेकिन परिणाम ने सबको चौंका दिया। सारी अटकलें और अनुमान धरे रह गए और भाजपा ने लगातार तीसरी बार सरकार बनाकर  रिकार्ड कायम कर दिया वहीं कांग्रेस भी 37 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनने में सफल हो गई। लेकिन आम आदमी पार्टी के हिस्से में सभी उम्मीदवारों की जमानत जप्त होने की बदनामी ही आई।  हरियाणा में हुई फजीहत से भन्नाई आम आदमी पार्टी के जले पर नमक छिड़क दिया दिल्ली कांग्रेस के नेताओं ने उसका मजाक उड़ाकर। इसीलिए उसके तत्काल बाद आम आदमी पार्टी का बयान दिल्ली विधानसभा का चुनाव अकेले लड़ने के बारे में आ गया। साथ ही उसने कांग्रेस के अहंकार पर भी तंज कसा। इस प्रतिक्रिया से ये अंदाज लगने लगा कि श्री केजरीवाल अपनी पार्टी की अलग पहिचान बनाने के लिए महाराष्ट्र और झारखंड में अकेले उतरेंगे। लेकिन पार्टी की ओर से इसके विपरीत ये बयान आ गया कि वह उक्त राज्यों के चुनाव से दूर रहेगी और अपना पूरा ध्यान दिल्ली पर केंद्रित करेगी। इस प्रकार ये स्पष्ट हो गया कि हरियाणा की हार ने श्री केजरीवाल की असीमित महत्वाकांक्षाओं को धक्का पहुंचाया है। थोक के भाव हुई जमानत जप्ती के कारण वे महाराष्ट्र और झारखंड के मुकाबले में शामिल होने की हिम्मत ही नहीं कर सके। वैसे इस फैसले से  लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी को अब जाकर ये समझ में आया कि एक दो राज्यों में मिले मतों के आधार पर भले ही  उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल गया किंतु राष्ट्रीय पार्टी होना इतना आसान नहीं है। आम आदमी पार्टी यदि दिल्ली में मिली सफलता से अति उत्साहित होकर पैर फैलाने की जल्दबाजी न करती तब शायद उसका दामन दाग़दार न हुआ होता। प्रधानमंत्री और भाजपा से बेवजह टकराने की जिद में श्री केजरीवाल को उन नेताओं के साथ मंच पर खड़ा होने मजबूर होना पड़ा जिन्हें वे सबसे भ्रष्ट की सूची में रखते थे। ये देखते हुए उसके लिए यही बेहतर होगा कि वह धैर्य पूर्वक आगे बढ़े। बिना मजबूत संगठन और स्पष्ट विचारधारा के राष्ट्रीय स्तर पर फैलाव करना आसान नहीं होता। आज की स्थिति में पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार तेजी से अलोकप्रिय होती जा रही है वहीं दिल्ली में भी उसकी साख और धाक दोनों में कमी आई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 18 October 2024

प्रतिमा की आँखों से पट्टी हटाने मात्र से कानून का अंधापन दूर नहीं होगा


सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ आगामी 10 नवम्बर को सेवानिवृत होने जा रहे हैं।  उनके 2 वर्ष के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक महत्वपूर्ण फैसले सुनाए। गत दिवस भी बांग्ला देश से आये घुसपैठियों के सम्बन्ध में भी एक साहसिक निर्णय सुनाया गया। उल्लेखनीय है श्री चंद्रचूड़ के स्वर्गीय पिता सर्वोच्च न्यायालय में सर्वाधिक लंबे समय तक मुख्य न्यायाधीश रहे थे। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि न्यायपालिका में वंशवाद की जो परंपरा चली आ रही है वे भी उससे लाभान्वित हुए होंगे किंतु उनकी शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता को देखते हुए उक्त अवधारणा गलत प्रतीत होती है। श्री चंद्रचूड़ ने अपने पिता द्वारा अतीत में दिये फैसले को उलटने तक का उदाहरण पेश किया था। अनेक मामलों में उनका सरकार से टकराव भी देखने मिला। इलेक्टोरल बाँड प्रकरण इसका प्रमाण है। लेकिन उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की कार्य पद्धति में सुधार के जो प्रयास किये वे प्रशंसनीय हैं। हालांकि उनका कितना असर हुआ इसका आकलन तो भविष्य में ही हो सकेगा किंतु  राष्ट्रीय महत्व के  सम - सामयिक मुद्दों पर वे जिस बेबाकी से अपने विचार व्यक्त करते रहे वह प्रभावित करने वाला है। अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में गत दिवस उनके एक और कार्य ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। न्यायालयों में आँख पर पट्टी बांधे , एक हाथ में तराजू और दूसरे में तलवार लिये न्याय की देवी की जो प्रतिमा देखने मिलती है वह मिस्र और ग्रीक से होते हुए अंग्रेजों के जमाने में भारत आई और इसे जन - जन में पहचान दिलवाने में फिल्मों की भी भूमिका रही। इस प्रतिमा का प्रतीकात्मक संदेश ये है कि न्याय की अपनी आँखें नहीं होतीं वह साक्ष्य पर आधारित व्यवस्था है जो उसके समक्ष खड़े व्यक्ति को न देख पाने के कारण उससे प्रभावित नहीं होती। उसके हाथ में तराजू से आशय न्याय के समक्ष सब समान हैं और तलवार इस बात का संकेत है कि अपराधी को दंड मिलकर रहेगा। इसी प्रतिमा के कारण अंधा कानून जैसे कटाक्ष प्रचलित हुए। गत दिवस ये समाचार आया कि श्री चंद्रचूड़ ने न्याय देवी की एक नई प्रतिमा बनवाकर सर्वोच्च न्यायालय के  पुस्तकालय भवन के  सामने  रखवाई है जिसकी आँखों में पट्टी नहीं  बंधी और  हाथों में तराजू के अलावा संविधान है। वैसे  ये प्रतिमा गत वर्ष ही लगा दी गई थी किंतु  उसकी खबर अब जाकर सार्वजनिक हुई। आँखों में पट्टी बांधे हुए न्याय की देवी की प्रतिमा देखने के आदी हो चुके लोगों को श्री चंद्रचूड़ की इस परिकल्पना में निहित सदाशयता कितनी पसंद आयेगी ये फ़िलहाल कहना कठिन है । लेकिन इस समाचार के प्रसारित होते ही  टिप्पणियाँ आने लगीं कि क्या न्याय देवी की प्रतिमा की आँखों से पट्टी हटने मात्र से न्याय व्यवस्था उन तमाम आरोपों से बरी हो सकेगी जो उस पर आये दिन लगते हैं। अंधा कानून जैसा शब्द सही मायनों में समाज के उस बड़े वर्ग के गुस्से की अभिव्यक्ति  है जो न्यायपालिका की देहलीज पर बड़ी उम्मीद लिए जाता है किंतु वहाँ के क्रियाकलापों को देखकर उसका मन खिन्न हो उठता है। पेशियाँ बढ़ना  , वकीलों की मोटी फीस , प्रकरणों के विशाल ढेर के मुकाबले  न्यायाधीशों की बेहद कम संख्या और न्यायपालिका में घुस गया भ्रष्टाचार का वायरस इस पवित्र पेशे की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाने वाला है। न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए  प्रचलित कालेजियम व्यवस्था को जारी रखने की अकड़ ने भी न्यायपालिका के प्रति सम्मान को घटाया । ये देखते हुए श्री चंद्रचूड़ यदि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को मान्यता देने का साहस दिखाते तब वह न्याय व्यवस्था  में सुधार की दिशा में उनका ऐतिहासिक योगदान होता। लोकतंत्र के जो तीन स्थापित स्तंभ हैं उनमें न्यायपालिका ही है जो विधायिका और कार्यपालिका दोनों के निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार रखती है। संसद के पास भले ही कानून बनाने का अधिकार होने से उसको सर्वोच्च माना जाता है किंतु जब बात कानून के राज की आती है तब न्यायपालिका का फैसला ही मान्य होता है। अपवादस्वरूप जब भी किसी सत्ताधीश ने न्यायपालिका से टकराने का दुस्साहस किया तो जनता ने उसे सजा दी। स्व. इंदिरा गाँधी और स्व. राजीव गाँधी इसके उदाहरण हैं। संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन के प्रस्ताव को रद्द किये जाने के बाद यदि संसद चाहती तो अपनी सर्वोच्चता का प्रदर्शन कर सकती थी किंतु उसने न्यायपालिका का लिहाज किया। बेहतर होता श्री चंद्रचूड़ ऐसा कुछ कर जाएं जो न्याय व्यवस्था में विश्वास को पुनर्स्थापित कर सके। न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटवाने की उनकी पहल निश्चित रूप से स्वागत योग्य है किंतु मात्र इतना कर देने से कानून के अंधेपन को लेकर जनमानस में व्याप्त अवधारणा दूर नहीं होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी