Monday, 11 November 2024

राजनीतिक दलों की डिस्काउंट सेल बनकर रह गये चुनाव


महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए दोनों पक्षों ने अपने घोषणापत्र जारी कर दिये। इनकी जो मुख्य बातें समाचार माध्यमों के जरिये प्रचारित हुईं उनमें महिलाओं और युवाओं को हर माह निश्चित धनराशि के अलावा मुफ्त स्वास्थ्य बीमा , सस्ती या मुफ्त बिजली तथा आधी कीमत पर रसोई गैस सिलेंडर शामिल हैं। किसानों के कर्ज माफी का वायदा भी घोषणापत्र का हिस्सा है। कोई पार्टी इसे वचन पत्र कह रही है तो किसी ने उसे गारंटी का नाम देकर अपनी विश्वसनीयता साबित करने का प्रयास किया है। सत्ता में आते ही लाखों सरकारी नौकरियों का आश्वासन देकर बेरोजगारों को लुभाने का दांव भी चला गया है।  ये चुनावी वायदे भारतीय राजनीति की पहिचान बन चुके हैं। इसलिए इन पर किसी को आश्चर्य नहीं होता।  सर्वोच्च न्यायालय इस पर रोक लगाने में असमर्थता व्यक्त करते हुए गेंद चुनाव आयोग के पाले में सरका चुका है जबकि आयोग को इस बारे में ध्यान देने की फुरसत ही नहीं है। यही वजह है कि हर चुनाव में वायदों की रकम बढती जा रही है। मुफ्त शिक्षा,  चिकित्सा और कानून व्यवस्था किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। इसके साथ ही बिजली, पानी, सड़क जैसे कार्य भी सरकार के कर्तव्यों में हैं। ये बात सच है कि हर किसी को नौकरी देना किसी भी सरकार के लिये असंभव है किन्तु रोजगार के अवसर उत्पन्न हों इसके लिये अनुकूल नीतियाँ और वातावरण बनाने की जिम्मेदारी तो हुक्मरानों की होती है। राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिये तरह - तरह के वायदे मतदाताओं से करते हैं। ये चलन केवल भारत में ही हो ऐसा नहीं है। हाल ही में संपन्न अमेरिका के  चुनाव में भी ये देखने मिला। और जब सत्ता बदलती है तब उसका बड़ा कारण सरकार द्वारा मतदाताओं से चुनाव के समय किये गए वायदे पूरे न किये जाना ही होता है। हालांकि भारत में अब जाति और धार्मिक  ध्रुवीकरण भी चुनावों को काफी हद तक प्रभावित करते हैं जिसका उदाहरण पिछले लोकसभा चुनाव में  उ.प्र जैसे राज्य में देखने मिला। लेकिन ये भी सही है कि नगद राशि जैसे वायदे चुनावी बाजी पलटाने में कारगर साबित हुए हैं। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की गारंटियाँ उसे सत्ता दिलवाने में कामयाब रहीं वहीं म.प्र में भाजपा ने लाड़ली  बहना  योजना लागू कर सत्ता विरोधी रुझान को बेअसर कर दिखाया। उसके बाद से हुए हर चुनाव में मुफ्त में दी जाने वाली सुविधाओं की होड़ सी लग गई है। एक दल जितने का वायदा करता है दूसरा उससे बढ़कर देने का वायदा उछाल देता है। महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने म.प्र की लाड़ली बहना जैसी योजना कुछ महीने पहले शुरू कर महिलाओं को अपने पाले में आकर्षित करने का जो दांव चला उससे प्रतिद्वंदी महा विकास अग़ाड़ी की बढ़त पर असर पड़ने लगा। आरक्षण न मिलने से नाराज  जो मराठा मतदाता सरकार के विरोध में बताये जा रहे थे अब उनमें महिलाओं का झुकाव सरकार के पक्ष में होने के संकेत मिलने लगे। इसीलिये विपक्ष भी महिलाओं को उक्त योजना से अधिक देने का वायदा कर बैठा। झारखंड में भी ज्यादा से ज्यादा मुफ्त बांटने की प्रतिद्वंदिता है। ये सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये  कोई नहीं बता सकता क्योंकि किसी भी राजनीतिक  दल को अपने चंदे से तो वायदे पूरे करने नहीं पड़ते। सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी तो की वायदे करने वालों से ये भी पूछा जाना चाहिए कि उनको पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन कैसे जुटायेंगे किंतु उसकी बात बुद्धि विलास में उलझकर रह गई। वास्तविकता ये है कि भाजपा शासित  हो या अन्य किसी दल द्वारा शासित राज्य, सभी मुफ्त योजनाओं को जारी रखने के लिये हर माह रिजर्व बैंक से कर्ज लेते जा रहे हैं जिसकी अदायगी भी अंततः जनता पर करों का बोझ बढ़ाकर ही की जाएगी। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की सरकारों के सामने तो जबरदस्त आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार ने भी जो मुफ्त योजनाएं चला रखी हैं उनके कारण ही वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल के दाम कम होने पर भी भारत में पेट्रोल - डीजल की कीमतें कम नहीं की जा रहीं। समय आ गया है जब मुफ्त योजनाओं का लालच देकर मतदाताओं को लुभाने के इस तरीके पर गंभीरता से चिंतन होना चाहिए क्योंकि मौजूदा स्थिति में उसको  लालच देकर खरीदने जैसा जो खेल चल रहा है उसने चुनाव को बाजार बनाकर रख दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 November 2024

दबावों के आगे बिना झुके जारी रहेगा ये सफर


35  वर्ष पूर्व  9 नवम्बर 1989 को मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का  प्रकाशन जबलपुर से प्रारंभ  हुआ था | उस दौर में मंडल और मंदिर जैसे मुद्दों के कारण राजनीतिक माहौल बेहद गर्म था। अतृप्त महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की खातिर समाज को जातियों में बाँटने के प्रयासों के साथ ही सिद्धांतविहीन गठबंधनों के जरिए नए चेहरों को स्थापित करने के प्रयास आकार ले रहे थे । अविश्वास  और अस्थिरता सर्वत्र व्याप्त थी। ऐसे में संस्कारधानी जबलपुर में जब एक नए सांध्य दैनिक का प्रादुर्भाव हुआ तब उसके लिए अपनी जगह बनाना सरल नहीं था | लेकिन शीघ्र  ही मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों का प्रिय बन गया। उसकी निर्भीकता ने उसे  हर वर्ग में  लोकप्रिय बना दिया। पत्रकारिता के प्रति  अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में पाठकों का समर्थन हमारा संबल बना।  35 वर्ष  के इस सफ़र में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने  दायित्वबोध से कभी मुँह नहीं फेरा। स्वस्थ पत्रकारिता के रास्ते पर हम जिस आत्मविश्वास से चलते रहे  उसने  हमें  जो पहिचान दी , उसे बनाए रखने के लिए हम सदैव जागरूक रहे। ये सर्वविदित है कि इसके लिए हमें न जाने कितनी मुसीबतों  और  विरोध का सामना करना पड़ा | बीते वर्षों में टेक्नालॉजी में हुए ताबड़तोड़ उन्नयन के कारण लघु और मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों के समक्ष संसाधनों का जबरदस्त संकट आ खड़ा हुआ है | इसके अलावा डिजिटल माध्यम ने गलाकाट प्रतिस्पर्धा को जन्म  दे दिया  । इस सबके  बावजूद मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस निरंतर आगे बढ़ता गया । हमारे असंख्य पाठकों और प्रशंसकों का विश्वास  हमारी शक्ति का स्रोत है । बिना किसी अतिरिक्त अपेक्षा के  सहयोग देने वाले विज्ञापनदाताओं की सहयोगात्मक भावना  हमारा संबल है | पत्रकारिता के जो आदर्श हमारी पितृ पीढी़ ने निर्धारित किये उनका निष्ठापूर्वक पालन करना हमारा संकल्प है। मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस को पाठकों द्वारा , जिसे पढ़े बिना शाम अधूरी है , जैसा जो  विशेषण प्रदान किया गया उसे  जीवंत रखने हम हर पल प्रतिबद्ध हैं | मौजूदा समय बेहद चुनौतीपूर्ण है | देश के भीतर  राजनीतिक  उथलपुथल है | संघीय ढांचे के साथ ही सामाजिक समरसता को कमजोर करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। भारत के विश्व की महाशक्ति बनने जैसी उपलब्धि एक वर्ग विशेष को बर्दाश्त नहीं हो रही। व्यवस्था के प्रति विद्रोह को भड़काकर अराजक स्थितियाँ उत्पन्न करने का प्रयास चल रहा है। हमेशा से विदेशी शक्तियों के इशारे पर नाचने वाले भारत की प्राचीनता और मौलिकता पर ही सवाल खड़े करने से बाज नहीं आ रहे। इन परिस्थितियों में समाचार माध्यमों का दायित्व और बढ़ जाता है क्योंकि जन साधारण तक सही जानकारी पहुंचाना उनका कार्य है। लेकिन उनको अपनी विश्वसनीयता और छवि बचाए रखने के प्रति गंभीर रहना होगा | जिस प्रकार से उन पर आरोपों  की बौछार की जा रही है वह भी प्रायोजित है जिससे  उनकी आवाज बंद की  जा सके।  यद्यपि  इसके लिए पत्रकार बने  धंधेबाज किस्म के लोग भी कसूरवार  हैं | हम विश्वास दिलाते हैं कि मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों के विश्वास और पत्रकारिता की प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रखने  पूरी ईमानदारी और साहस के साथ खड़ा रहेगा  |  35 साल के इस सफर में हमने हर तरह के दबावों का सामना किया किंतु उनके आगे झुके नहीं। आगे भी हमारी ये शैली  जारी रहेगी । सकारात्मक पत्रकारिता के प्रसार हेतु हम पूरी प्रतिबद्धता के साथ डटे रहेंगे इस आश्वासन के साथ आप सभी के अमूल्य सहयोग हेतु विनम्र आभार। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 November 2024

370 की वापसी : कांग्रेस ने अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली


जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव में सभी क्षेत्रीय दलों ने धारा 370 की वापसी और पूर्ण राज्य का  का मुद्दा उठाकर घाटी के मतदाताओं को गोलबंद करने का दांव चला था। इसका सर्वाधिक लाभ मिला नेशनल काँफ्रेंस को । यद्यपि उसकी  साझेदार कांग्रेस ने हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में नुकसान के भय से पूर्ण राज्य का समर्थन करने के बाद भी 370 पर मौन साधे रखा। चुनाव के बाद नेशनल काँफ़्रेंस के उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए किंतु कांग्रेस सरकार में शामिल नहीं हुई। तब  ये माना गया कि वह 370  को लेकर किसी भी विवाद से बचना चाह रही है। वहीं मुख्यमंत्री बनते ही उमर ने  पूर्ण राज्य  की मांग  में तो देर नहीं लगाई किंतु  370 की वापसी को ये कहते हुए ठंडे बस्ते में डाल दिया कि वे केंद्र से समन्वय बनाकर चलना चाहते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि फिलहाल 370 की वापसी संभव नहीं  लिहाजा वे सत्ता परिवर्तन तक प्रतीक्षा करेंगे। इस पर पीडीपी  ने उन पर हमला बोलते हुए घाटी के मतदाताओं को धोख़ा देने का आरोप लगाया। हालांकि मुख्यमंत्री ने उस पर  ध्यान नहीं दिया और तो और विधानसभा में पीडीपी द्वारा 370 की वापसी संबंधी प्रस्ताव लाने की बात कहने पर  बरसते हुए कहा कि वह मेरी सरकार के लिए खतरा पैदा करना चाह रही है। उनका आशय केंद्र सरकार की संभावित नाराजगी को लेकर था। उससे लगा कि वे वाकई 370 पर केंद्र सरकार से भिड़ना नहीं चाहते। लेकिन अपने दादा शेख अब्दुल्ला और पिता फारुख के पद चिन्हों पर चलते हुए उन्होंने भी दोगलापन दिखाने में संकोच नहीं किया। कहाँ तो वे  370  पर पीडीपी को आड़े हाथ ले रहे थे और कहाँ पलटी मारते हुए अपने ही उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी से  370 की वापसी का प्रस्ताव पेश करवा दिया जिसमें उल्लिखित है कि यह विधानसभा विशेष दर्जे और संवैधानिक गारंटी के महत्व की पुष्टि करती है।विशेष राज्य के दर्जे को एकतरफा तरीके से हटाए जाने पर चिंता के साथ प्रस्ताव में कहा गया है कि  विधानसभा इस बात पर जोर देती है कि बहाली की किसी भी प्रक्रिया में राष्ट्रीय एकता और जम्मू-कश्मीर के लोगों की वैध आकांक्षाओं  की रक्षा होनी चाहिए। प्रस्ताव पेश होते ही भाजपा विधायकों ने प्रस्ताव की प्रतियाँ फाड़ते हुए हंगामा शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि वह  सदन की कार्यसूची में नहीं था किंतु अध्यक्ष ने  उसे ध्वनि मत से पारित घोषित कर दिया। भाजपा अध्यक्ष पर उक्त कारवाई को निरस्त करने का दबाव बना रही है किंतु वे राजी नहीं हैं। इस प्रकार उमर की वह बात गलत निकली कि वे 370 की वापसी पर केंद्र से टकराव नहीं लेंगे । यदि पीडीपी या अन्य क्षेत्रीय विधायक द्वारा उक्त प्रस्ताव पेश किया जाता तब बात अलग थी। नेशनल काँफ्रेंस का भी कोई विधायक वैसा करता तब उसकी निजी राय  कहकर भी मुख्यमंत्री पल्ला झाड़ सकते थे परंतु उपमुख्यमंत्री द्वारा प्रस्ताव पेश करना इस बात का प्रमाण है कि उसे  उनका समर्थन था। लेकिन इस विवाद का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि जो कांग्रेस पूरे चुनाव में धारा 370 पर  बोलने से कतराती रही और अपने घोषणापत्र में भी इस मुद्दे को शामिल करने से परहेज किया , उसने भी 370 की वापसी के प्रस्ताव को समर्थन देकर अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली। जहाँ तक बात उमर और उनकी पार्टी के अलावा  घाटी के अन्य  दलों की  है तो उनका देश विरोधी रवैया किसी से छिपा नहीं है।  विशेष तौर पर अब्दुल्ला परिवार का दोगलापन ही कश्मीर समस्या को उलझाने का सबसे बड़ा दोषी है। उक्त प्रस्ताव के जरिये उमर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सांप का बच्चा ज़हरीला ही होता है। लेकिन कांग्रेस के इस षडयंत्र में भागीदार हो जाने से  लग गया कि शेख अब्दुल्ला के जमाने से धोख़ा खाते आने के बाद भी  इस पार्टी के कर्ताधर्ता गाँधी परिवार को अक्ल नहीं आई। उसे ये समझना चाहिए कि धारा 370 से केवल अब्दुल्ला परिवार को ही फायदा मिला। राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस आज भी इसी परिवार की मोहताज है। हालिया चुनाव में भी उसे घाटी में महज 1 सीट मिलना काफी कुछ कह गया। जम्मू अंचल में भी उसका प्रदर्शन बेहद निरशाजनक रहा। धारा 370 की वापसी का प्रस्ताव अब्दुल्ला परिवार के राजनीतिक अस्तित्व के लिए तो जरूरी हो सकता है लेकिन कांग्रेस की कौन सी नस इस परिवार ने दबा रखी है ये रहस्यमय है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 7 November 2024

ट्रम्प की जीत भारत के लिए फायदेमंद


अमेरिका  दुनिया को किस प्रकार प्रभावित करता है उसका अंदाज वहाँ के राष्ट्रपति चुनाव में पूरे विश्व की रुचि  देखकर लग जाता है। लोकतांत्रिक देश तो फ्रांस और ब्रिटेन भी हैं किंतु वहाँ हुए चुनाव की उतनी चर्चा नहीं हुई। दरअसल अमेरिका न केवल आर्थिक और सैन्य महाशक्ति है अपितु वह  दुनिया के राजनीतिक  संतुलन को भी प्रभावित करने में सक्षम है। यही वजह है कि उसके राष्ट्रपति की वजनदारी से कोई इंकार नहीं कर सकता। गत दिवस संपन्न चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दोबारा चुना जाना इसलिए महत्वपूर्ण बन गया क्योंकि 2020 में जो बाइडेन से परास्त होने के बाद उन पर तरह - तरह के आरोप लगे। यहाँ तक कि उन्हें जेल भेजे जाने की संभावना भी व्यक्त की जाने लगी थी। लेकिन तमाम विवादों के बावजूद उन्होंने सबको चौंकाते हुए रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल की  और फिर बड़े ही आक्रामक तरीके से लड़कर जीत हासिल की। आम तौर पर अमेरिका में राष्ट्रपति को उसकी पार्टी लगातर दूसरी मर्तबा भी चुनाव में उतारती है क्योंकि  उसे  अधिकतम दो कार्यकाल ही मिल सकते हैं। ट्रम्प को भी वह अवसर दिया गया किंतु वे हार गए। बढ़ती आयु को देखते हुए  लगा था कि उनकी राजनीतिक यात्रा का पूर्ण विराम हो गया किंतु चौतरफा घेराबन्दी से  विचलित हुए बिना उन्होंने अपनी वापसी हेतु प्रयास किया और  चार साल बाद एक बार फिर अमेरिका के सत्ता सूत्र संभालने जा रहे हैं। चुनाव अभियान की शुरुआत में डेमोक्रेट प्रत्याशी और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के साथ हुई बहस में ऐसा लगा था कि ट्रम्प उनके सामने टिक नहीं पाएंगे किंतु एक जनसभा में उन पर गोली चलने के बाद से उनके प्रति रुझान बढ़ा और फिर वे लगातार अपने प्रतिद्वंदी के बराबर आते गए तथा अंततः बाजी उनके हाथ लग गई। ट्रम्प की जीत में उनकी जीवटता की बड़ी भूमिका रही वरना अपेक्षाकृत कम आयु की हैरिस को हराना कठिन था। इस चुनाव ने अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में महिलाओं की पराजय का सिलसिला जारी रखा। इस बारे में रोचक तथ्य ये है कि ये दूसरा  अवसर है जब राष्ट्रपति चुनाव में  महिला उम्मीदवार मैदान में उतरी। 2016 में पहली बार हिलेरी क्लिंटन को ये अवसर मिला जबकि इस चुनाव में कमला हैरिस ने मोर्चा संभाला। संयोगवश दोनों हार गईं और दोनों को हराने का श्रेय ट्रम्प को ही मिला। हिलेरी  बराक ओबामा के प्रशासन में विदेश सचिव रहीं। वहीं  हैरिस भी निवर्तमान राष्ट्रपति बाइडेन के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति बनीं। इस बार उनकी विजय की संभावना काफी बताई जा रही थीं किंतु ट्रम्प ने आखिरी क्षणों में चुनाव अपने पक्ष में कर लिया। वे उन राज्यों में भी जीते जो डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक रहे। ऐसा लगता है अमेरिकी मतदाता यूक्रेन को युद्ध हेतु मदद देने की बाइडेन की नीति से नाराज हो उठे जो अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बोझ बनती जा रही है। ट्रम्प ने युद्ध रुकवाने का जो  वायदा किया वह कारगर रहा। इसके अलावा उन्होंने अमेरिकी युवकों के रोजगार को सुरक्षित करने का आश्वासन देकर  जीत की राह बनाई। लेकिन आखिरी दिनों में उन्होंने अमेरिका में बसे भारतीय मूल के हिंदुओं को लुभाने का दांव चलते हुए बांग्ला देश में पर हो रहे अत्याचारों का विरोध कर हैरिस को पिछले पाँवों पर धकेल दिया जो इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचती रहीं। शुरुआत में  भारतीय मूल की होने के कारण कमला को भारतीय समुदाय का समर्थन सुनिश्चित माना जा रहा था लेकिन ट्रम्प ने आखिरी दौर में ताबड़तोड़ हमले कर डाले जिनकी वजह से पांसा उनके पक्ष में गिर गया। ये बात भी सही है कि बतौर राष्ट्रपति बाइडेन अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सके। ट्रम्प ने अमेरिका प्रथम का नारा उछालकर राष्ट्रवाद को जिस तरह प्राथमिकता दी उसकी वजह से भारत  में उनके चुनाव पर सबकी नजरें थीं। वामपंथियों के अलावा कांग्रेस सहित विपक्ष को को जहाँ कमला हैरिस में अनुकूलता नजर आ रही थी वहीं भाजपा  ट्रम्प की जीत चाह रही थी। इसके पीछे ट्रम्प और नरेंद्र मोदी के निजी सम्बन्ध बताये जाते हैं। लेकिन मोदी विरोधी लॉबी ये प्रचार करने में जुट गई है कि ट्रम्प के दोबारा सत्ता में आने के बाद भारतीय विद्यार्थियों और पेशेवरों को परेशानी हो जायेगी। इसके अलावा वे भारतीय सामान पर ज्यादा ड्यूटी लगाकर दबाव बनाएंगे। ये आशंकाएँ निराधार नहीं हैं क्योंकि ट्रम्प की पहली प्राथमिकता अपने देश और उसके लोगों की भलाई होगी किंतु दूसरी तरफ ये भी सही है कि वैश्विक राजनीति में  भारत इस स्थिति में आ गया है कि उसे उपेक्षित करना किसी  भी महाशक्ति के लिए आसान नहीं रह गया। यूक्रेन और रूस की जंग के अलावा पश्चिम एशिया में  इसराइल की अनेक देशों से हो रही लड़ाई में भारत सरकार ने जिस कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया उसके कारण ट्रम्प और पुतिन तो क्या जिनपिंग तक भारत के महत्व को स्वीकार करने बाध्य हैं। ट्रम्प के सत्ता में लौटने के बाद चीन भी दबाव में है। वहीं बांग्ला देश की सत्ता में बैठे भारत विरोधी तत्वों में भी घबराहट है जिन्हें  बाइडेन का समर्थन बताया जा रहा था। ट्रम्प की जीत में एलन मस्क जैसे धनकुबेर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नव निर्वाचित राष्ट्रपति खुद भी व्यवसायी हैं और भारत में भी उनके अनेक औद्योगिक घरानों से निकट संबंध हैं। ये सब देखते हुए भारत - अमेरिका संबंध और मजबूत होने की उम्मीद की जा सकती है। आगामी वर्ष क्वाड की बैठक में भारत आने की बात कहकर उन्होंने इसका संकेत भी दे दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 November 2024

मुफ्तखोरी के वायदों ने राजनीतिक दलों की सैद्धांतिक पहिचान नष्ट कर दी


हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार द्वारा  मुफ्त योजनाओं की समीक्षा किये जाने संबंधी बयान  पर नसीहत दी थी कि वायदे वही करें जो पूरे किये जा सकें। उनकी टिप्पणी पर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि वह झूठे वायदे करती है। पलटवार कांग्रेस की तरफ से भी हुआ। चूँकि महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव का प्रचार जोरों पर है इसलिए सभी पार्टियों में वायदों की प्रतिस्पर्धा चल रही है। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा  है मुफ्त दी जाने वाली सुविधाओं की जिनमें प्रतिमाह महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के बैंक  खाते में नगद राशि जमा करने के अलावा, सस्ता रसोई गैस सिलेंडर और मुफ्त बिजली जैसे वायदे हैं। सबसे रोचक बात बात ये है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समय - समय पर मुफ्त उपहारों की योजनाओं का विरोध किये जाने के बावजूद उनकी अपनी पार्टी भाजपा ही चुनाव वाले राज्यों में खैरात बाँटने में किसी से पीछे नहीं है। कांग्रेस को  कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में मुफ्तखोरी  पर आधारित वायदों के कारण बहुमत मिल गया था इसलिए अब वह उन्हें गारंटी का नाम देकर हर चुनाव में दोहराने लगी है। हालांकि लोकसभा चुनाव में उसके खटाखट वाले वायदे पर जनता ने भरोसा नहीं किया। ऐसा ही हरियाणा में  भी देखने मिला जहाँ सतह पर सत्ता विरोधी माहौल साफ नजर आने के बावजूद भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने में सफल हो गई। लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड में कांग्रेस अभी भी अपनी गारंटियों के बल पर वैतरणी पार करना चाह रही है। पार्टी नेतृत्व को न जाने ये बात क्यों समझ नहीं आ रही कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसकी सरकारें अनाप - शनाप मुफ्त योजनाएं और कार्यक्रम चलाने के बाद भी सत्ता से बाहर हो गई। इसी तरह भाजपा को भी आज तक ये  बात हजम नहीं हो रही कि उ.प्र में अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे मुद्दे होने के बाद भी उसकी लोकसभा सीटों में जबरदस्त कमी आ गई। इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि मुफ्त उपहार वाली रणनीति हर चुनाव  में कारगर हो जाए ये जरूरी नहीं है। इसी तरह जो मतदाता मुफ्त योजनाओं, का भरपूर लाभ ले रहे हैं वे उसके प्रति कृतज्ञता स्वरूप सत्तारूढ़  पार्टी को एक बार सत्ता में लाएं ये भी  जरूरी नहीं। पिछले  लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय  भाजपा को हराने के लिए पूरी तरह गोलबंद  हो गया। अनेक राज्यों में दलितों ने भी भाजपा के विरुद्ध मोर्चेबंदी की जबकि उक्त दोनों वर्ग मोदी सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं का जमकर लाभ  उठा रहे हैं। इतना सब देखने के बाद भी न कांग्रेस को अक्ल आई और न ही भाजपा को। लगातार तीन बार दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें हारने के बावजूद अरविंद केजरीवाल  के दिमाग में इतनी छोटी सी बात नहीं आई कि हर चुनाव का अपना गणित होता है। दिल्ली से सटे हरियाणा में आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनाव में मुफ्त बिजली  , पानी  जैसे उन्हीं वायदों के साथ मैदान में उतरी जिनके बल पर वह दिल्ली की सत्ता में बनी हुई है। लेकिन हरियाणवी मतदाताओं ने केजरीवाल जी के 90 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत जप्त करवा दी। ये सब देखकर लगता है कि राजनीतिक दलों के पास मुद्दों का अकाल पड़ गया है। वैचारिक आधार तो वैसे भी नहीं बचा। टिकिट की लालच में दूसरी पार्टी छोड़कर आये दलबदलू को उपकृत करने में कोई भी दल पीछे नहीं है। इसके चलते उसके अपने पुराने कार्यकर्ता भले नाराज हो जाएं किंतु उसकी चिंता नहीं की जाती। महाराष्ट्र में अजीत पवार को साथ लेने से भाजपा के प्रतिबद्ध समर्थकों में निराशा है। दूसरी तरफ बालासाहेब ठाकरे के कारण शिवसेना के साथ जुड़े मतदाताओं का बड़ा वर्ग इस बात को नहीं पचा पा रहा कि उद्धव ठाकरे ने उन  शरद पवार और कांग्रेस से हाथ मिला लिया जो मुस्लिम परस्ती के लिए बदनाम हैं। सैद्धांतिक पहिचान खत्म हो जाने के कारण ही राजनीतिक दल मुफ्तखोरी के वायदों के साथ चुनाव में उतरने लगे हैं। मतदाताओं की स्थिति उस उपभोक्ता जैसी हो गई है जो किसी भी चीज की गुणवत्ता की बजाय उसकी कम कीमत को महत्व देता है। दुःख और चिंता का विषय ये है कि न तो सत्ता और न ही विपक्ष में बैठे लोगों को इस बात की फिक्र है कि राजगद्दी हासिल करने के लिए वे जिस बेरहमी से खजाना लुटाने पर आमादा हैं वह देश को आर्थिक दिवालियेपन की ओर ले जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 November 2024

भारत में तो संभव नहीं किंतु कैनेडा में जरूर बन जायेगा खालिस्तान


कैनेडा में हिन्दू मंदिरों पर खालिस्तानी उग्रवादियों द्वारा हमला और हिन्दू धर्मावलम्बियों के साथ हिंसा की घटना से दोनों देशों के बीच पहले से खराब चल रहे रिश्तों में और खटास आ गई है। जो समाचार मिल रहे हैं उनके मुताबिक पुलिस बजाय उग्रवादियों को  रोकने के तमाशबीन बनी रही। हालांकि  कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हमले की निंदा की किंतु उसके लिए उनके भारत विरोधी रवैये को ही जिम्मेदार माना जाएगा। एक खालिस्तानी उग्रवादी निज्जर की हत्या के लिए भारत सरकार पर आधारहीन आरोप लगाने वाले ट्रूडो की हरकतें  किसी राष्ट्रप्रमुख से कतई अपेक्षित नहीं है । आरोप लगाते - लगाते ट्रूडो सरकार भारतीय गृह मंत्री अमित शाह को भी कठघरे में खड़ा करने का दुस्साहस कर बैठी।  दो देशों के बीच  विवाद की स्थिति में कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग होता है। राष्ट्र प्रमुख एक दूसरे से सीधे बातचीत भी कर लेते हैं। लेकिन ट्रूडो का आचरण किसी तानाशाह सरीखा है । अपने देश के नागरिक की हत्या की जाँच करना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु निज्जर को मारने में भारत सरकार और कैनेडा में पदस्थ राजनयिक शामिल थे, इसका ठोस प्रमाण दिये बिना ट्रूडो ने जो गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी की  वह चौंकाने वाली है क्योंकि  दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत रहे। सबसे बड़ी बात भारतीय मूल के लाखों लोगों का वहाँ कई पीढ़ियों से बसा होना है जिसमें सिखों की संख्या बेशक ज्यादा है जिन्होंने  अपना धार्मिक और राजनीतिक प्रभाव काफी बढ़ाया है। गुरुद्वारों की विशाल संख्या और कैनेडा  सरकार में सिखों का दबदबा गैर सिख भारतीय मूल के लोगों की तुलना में ज्यादा है। 80 और 90 के दशक में जब भारत में खालिस्तानी आतंकवाद चरम पर था तभी से अनेक खालिस्तानी संगठन वहाँ से भारत विरोधी गतिविधियों और दुष्प्रचार में लगे रहे। अपने को अति लोकतांत्रिक दिखाने के फेर में कैनेडा सरकार उनकी  हरकतों को उपेक्षित करती रही। परिणामस्वरूप वह  खालिस्तानी मानसिकता की शरण स्थली बन गया। लोकतांत्रिक देशों में वोट बैंक के लालच में अक्सर अवांछित तत्वों को फलने - फूलने का अवसर दिया जाता है। भारत में भी बांग्ला देश के लाखों घुसपैठियों को पहले वामपंथियों और फिर ममता बैनर्जी सदृश राजनेताओं ने जिस तरह सिर पर बिठा लिया वही काम कैनेडा के शासकों द्वारा खालिस्तानी उग्रवादियों को छूट देकर  किया जाता रहा है। हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हुए ताजा हमलों के बाद कैनेडा वासी हिन्दू भी संगठित होने लगे हैं। ऐसे में भारतीय मूल के दो समुदायों के बीच संघर्ष  की आशंका बढ़ रही है जिसकी चिंगारी अमेरिका  और ब्रिटेन तक फैल सकती हैं। स्मरणीय है अमेरिका में बैठा पन्नू नामक खालिस्तान समर्थक भारतीय विमानों में बम रखने जैसी धमकी  खुले आम दे रहा है। वहीं ब्रिटेन के तमाम गुरुद्वारों में जरनैल सिंह भिंडरवाले के बड़े पोस्टर प्रदर्शित किये गए हैं। वहाँ भी सिख उग्रवादियों द्वारा हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले की वारदातें हो चुकी हैं। यहाँ तक कि भारतीय दूतावास पर तिरंगे के स्थान पर खालिस्तानी झंडा लगाने की हरकत भी की गई। हो सकता है उक्त देशों की सरकार में बैठे कुछ लोगों को भारत विरोधी  खालिस्तानी उग्रवादियों की गतिविधियां रास आ रही हों किंतु वे याद रखें  कि  जिन सांपों को वे दूध पिला रहे हैं वही उनको  डसेंगे। जिन - जिन देशों ने अपने यहाँ  उग्रवादियों को पनाह दी उन सबको  खामियाजा भोगना पड़ा।  यदि कैनेडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो चुनाव जीतने के लिए उनको संरक्षण देने से बाज नहीं आये तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि भारत में तो खालिस्तान कभी नहीं बन सकता किंतु कैनेडा में अवश्य उसकी कल्पना साकार हो जाएगी । कैनेडा की प्रगति में भारतीय मूल के अप्रवासियों की महती भूमिका रही है। यदि खालिस्तानी  इसी तरह आतंक फैलाते रहे तो उसकी छवि खराब होना तय है जिसका प्रभाव  अर्थव्यवस्था के अलावा वहाँ की आंतरिक सुरक्षा पर पड़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन भारत में जो देशभक्त सिख समुदाय  है उसको भी चाहिए कि कैनेडा के खालिस्तान समर्थक सिखों की हरकतों का खुलकर विरोध करे क्योंकि इससे पूरे समुदाय की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचता है। 


- रवींद्र वाजपेयी

जहरीली होती हवा : जनता उदासीन और नेता मौन



दीपावली के पूर्व से ही देश की राजधानी दिल्ली में हालात गंभीर हैं। लोगों को सांस लेने में कठिनाई होने लगी  है।  शुद्ध हवा के लिये सुबह सैर पर निकलने वालों के फेफड़ों में जहर समाने लगा है। अस्थमा  से ग्रसित लोगों के लिए ऐसी स्थितियां जानलेवा  हो सकती हैं। घरों में तो वायु शुद्ध करने वाले उपकरण लगाए जा सकते हैं किंतु बाहर निकलने पर प्रदूषित  सांस ही लेनी पड़ती है। और फिर जो लोग झुग्गियों में रहते हैं उनकी तकलीफ का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश का दिल कहे जाने वाले  महानगर पर दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहर होने का कलंक लग ही चुका है। वहाँ यमुना नदी में फैक्ट्रियों से निकले प्रदूषित जल और रसायनों के कारण झाग तैरता दिखता है जिसमें छठ पूजा की जाएगी। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यमुना को स्वच्छ रखने की समय सीमा कई बार घोषित की किंतु कुछ नहीं हुआ। पंजाब से आने वाले पराली के  धुएं के अलावा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषण  दिल्ली के वायुमंडल को जहरीला बनाता है। वाहनों के धुएं को रोकने  सीएनजी और बैटरी चलित वाहनों  को बढ़ावा दिया गया। 10 वर्ष पुरानी गाड़ियों को सड़क से बाहर करने का नियम भी लागू हुआ। मेट्रो ट्रेन चलने के बाद कुछ उम्मीद जागी थी। लेकिन बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या के कारण आगे पाट - पीछे सपाट की स्थिति बनती रही है।  सर्वोच्च न्यायालय , केंद्र और राज्य सरकार के अलावा तमाम स्वयंसेवी संगठन पर्यावरण सुधारने में लगे हैं ।  लेकिन नतीजा शून्य है। उल्टे स्थितियां खराब हो रही हैं। पहले दिल्ली सरकार पंजाब को कोसती थी जहां के किसान फसल कटने के बाद खेतों में आग लगा  दिया करते हैं। लेकिन अब तो उस राज्य में भी आप आदमी पार्टी की ही सरकार है। ऐसे में दोनों को मिलकर रास्ता निकालना चाहिए था । यद्यपि ये स्थिति पूरे देश की है। चंडीगढ़ जैसे  शहर ही अपवाद हैं वरना क्या मुंबई और क्या कोलकाता , सभी में हालात चिंताजनक हैं। दो दशक पहले तक बेंगुलुरु का मौसम बेहद सुहावना हुआ करता था किंतु सायबर सिटी बनने  के साथ ही वह भी प्रदूषित हो गया। दुर्भाग्य से पर्यावरण संरक्षण का अभियान दिखावा होकर रह गया है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी  पर्यावरण संरक्षण  पर गंभीर नहीं है। दूसरी तरफ  ये भी सही है कि जनता भी इस मुद्दे पर उदासीन है। इसका प्रमाण है कि  कि आज तक एक भी चुनाव  प्रदूषण दूर करने के नाम पर नहीं हुआ। इसी महीने  जिन 2 राज्यों में विधानसभा चुनाव  हैं वहां भी मुफ्तखोरी  से मतदाता को आकर्षित करने  की प्रतिस्पर्धा चल रही है ।  नगदी  , सस्ती गैस, मुफ्त बिजली , सायकिल आदि  चुनावी वायदों में है । लेकिन पर्यावरण संरक्षण  प्रमुख विषय नहीं है।  जनता की रुचि न होने से नेता भी इस तरफ ध्यान नहीं देते।  औद्योगिकीकरण और आबादी , प्रदूषण का बड़ा कारण है।  सुविधाभोगी जीवन शैली भी पर्यावरण को क्षति पहुंचाती है। ये विडंबना ही है कि आजादी मिले 77 साल से ज्यादा बीत गए किंतु लोगों को शुद्ध पीने का पानी नसीब न होने से बोतल बन्द पानी का कारोबार फल रहा है । सवाल ये है कि क्या विकास के बदले आम जनता को जहरीली हवा और प्रदूषित जल ही नसीब होगा ? दिल्ली में देश और प्रदेश दोनों की सरकार के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय है। देश में प्रदूषण नियंत्रण करने के लिए जिम्मेदार शीर्ष सरकारी एजेंसियों के मुख्यालय भी वहीं हैं किंतु जब वे सब मिलकर उस महानगर के पर्यावरण को ही नहीं सुधार पा रहे तब देश के बाकी हिस्सों में क्या होता होगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। 

-रवीन्द्र वाजपेयी