Monday, 9 December 2024

सीरिया के कई हिस्सों में बंटने का अंदेशा : विद्रोही गुट आपस में लड़ते रहेंगे

      सीरिया में बशर असद की सत्ता का पतन होना अरब जगत में एक नये संकट का कारण बनेगा। बीते एक दशक से चल रहे गृहयुद्ध में लाखों लोगों की जान चली गई। साथ ही लाखों को भागकर दूसरे देशों में पनाह लेने लगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि सीरिया के गृहयुद्ध ने जो शरणार्थी समस्या पैदा की उसने यूरोप के अनेक देशों में इस्लामिक कट्टरता के पाँव जमा दिये। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क और ब्रिटेन इसका दंश भोग रहे हैं। ये बात पूरी तरह सही है कि राष्ट्रपति असद एक क्रूर तानाशाह बन चुके थे। उनके पिता ने भी इस देश पर लम्बे समय तक राज किया। इस प्रकार दुनिया के प्राचीनतम देशों में शुमार सीरिया आधी सदी से एक ही परिवार के शिकंजे में था।

       हालांकि असद की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह 13 साल पहले शुरू हुआ किंतु रूस और ईरान ने हर प्रकार से उसकी सहायता की। रूसी सैनिकों के साथ ही वायुसेना भी खुलकर असद की रक्षा करती रही। ऐसी ही भूमिका ईरान की भी रही। दरअसल रूस को डर था कि असद के हटते ही सीरिया के अमेरिकी प्रभाव में चले जाने से पश्चिम  एशिया का शक्ति संतुलन बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। उसका सोचना गलत भी नहीं था।

   गत दिवस राजधानी दमिश्क में विद्रोहियों के घुसते ही असद देश छोड़कर मास्को रवाना हो गए। रूस ने भी उन्हें शरण देना स्वीकार किया है। अमेरिका , फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और तुर्किये आदि ने बिना देर लगाए जिस तरह से सीरिया में सत्ता परिवर्तन का स्वागत किया । उससे स्पष्ट है कि इसके पीछे अमेरिकी लॉबी का हाथ है। इसका समय भी बहुत ही सोच समझकर तय किया गया। चूंकि रूस लंबे समय से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है इसलिए वह पहले की तरह असद के बचाव में सामने नहीं आ सका। हालांकि उसके सैनिक दस्ते अभी भी सीरिया में बने हैं जिनकी सुरक्षित वापसी हेतु उसने विद्रोही नेताओँ से आश्वासन ले लिया है। दूसरी तरफ ईरान भी इसराइल के साथ जंग की दहशत में डूबा हुआ है। लिहाजा  वह भी असद की सहायता करने का साहस न दिखा सका। यदि इनमें से कोई एक देश भी असद की पीठ पर हाथ रखे रहता तो बरसों से चला आ रहा गृहयुद्ध कुछ दिनों में ही अंजाम तक न पहुँचता।

    लेकिन विद्रोहियों के राजधानी दमिश्क  पर काबिज होने और राष्ट्रपति असद के देश छोड़कर रूस में शरण लेने मात्र से सीरिया का संकट हल हो जाएगा, ये मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि जिस गुट ने कुछ दिनों के भीतर ही असद को भागने मजबूर कर दिया उसका भी पूरे देश पर आधिपत्य नहीं है। सीरिया के बड़े हिस्से पर दूसरे गुटों का कब्जा है। वहीं आई.एस.आई.एस नामक संगठन भी कुछ जगहों में जमा बैठा है।

    जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का उद्देश्य सीरिया को असद के शासन से मुक्त करवाना था। उसके लिए उसने जिस विद्रोही गुट को सहायता दी उसका नेता अल कायदा जैसे अमेरिका विरोधी आतंकवादी संगठन से जुड़ा रहा। ऐसे में  कहा जा सकता है कि असद का तख्ता पलट होने के बाद सीरिया के कई टुकड़े हो सकते हैं और यही अमेरिका और उसके समर्थक पश्चिमी देश चाहते हैं।

    अमेरिका जानता है कि सीरिया को यदि टुकड़ों में नहीं बांटा गया तब वहाँ दोबारा उसकी विरोधी ताकतें सत्ता पर हावी हो जाएंगी। इसलिए असद के देश छोड़कर भागने के बाद अब यह देश अनेक विद्रोही गुटों की आपसी लड़ाई में फंसकर रह जाएगा। अरब जगत में युद्ध के हालात बनाये रखना अमेरिका के हित में होने से वह अपनी पसंद के विद्रोही समूह को पालता रहेगा। सीरिया से इसराइल की सीमा भी मिलती है। गोलन हाइट्स नामक इलाके में उसने अपने कदम बढ़ा दिये हैं। गत रात्रि सीरिया में अनेक इस्लामिक कट्टरपंथियों के केंद्रों पर हवाई हमले हुए। उनके पीछे इसराइल ही बताया जा रहा है।

     सच बात ये है कि इसराइल सीरिया में हुए सत्ता परिवर्तन से आशंकित है क्योंकि जिस विद्रोही गुट ने दमिश्क पर अपना परचम फहराया उसकी पृष्ठभूमि  इसराइल विरोधी रही है। अन्य अरबी देश भी ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे सीरिया में अचानक हुए तख्ता पलट पर क्या रुख अख्तियार करें , क्योंकि जिन देशों में राजशाही या लम्बे समय से परिवार की सत्ता चली आ रही है वहाँ के सत्ताधीशों को भी सीरिया के हालातों ने डरा दिया है।

     आने वाले कुछ दिन इस क्षेत्र के लिए काफी संगीन होंगे क्योंकि फिलहाल तो सीरिया आसमान से टपकने के बाद खजूर पर अटेकने वाली स्थिति में फंस गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 December 2024

बांग्ला देश के हालात पर भारत के मुस्लिम धर्मगुरु खामोश क्यों हैं


बांग्ला देश में रह रहे अल्पसंख्यक जबरदस्त तनाव में हैं। कुछ समय पूर्व सत्ता परिवर्तन के बाद से वहाँ भारत विरोधी भावनाएं उफान पर हैं जिनके चलते हिंदुओं के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है। मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट करने पर आमादा हैं। घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूट और आगजनी आम बात है। महिलाओं का अपहरण और बलात्कार बेरोकटोक जारी है। जैन और ईसाई समुदाय भी मुस्लिम गुंडागर्दी का शिकार हो रहा है। सं.रा.संघ ने भी इस पर चिंता व्यक्त की  है। यहाँ तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी बांग्ला देश सरकार को इसे रोकने कहा है । उल्लेखनीय है शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलटने के पीछे बाइडेन का ही हाथ बताया जाता है।  भारत में बांग्ला देश के हिंदुओं के साथ हो रहे अमानुषिक अत्याचारों को लेकर काफी गुस्सा है। हाल ही में हिन्दू संगठनों के आह्वान पर अनेक शहरों में जुलूस निकालकर केंद्र सरकार से प्रभावी कदम उठाने का अनुरोध किया गया। संसद में भी इस मामले में आवाजें उठीं।  लेकिन इस सबके बीच  सबसे चौंकाने वाली बात है भारत में रहने वाले मुसलमानों  की खामोशी। वक्फ संशोधन और संभल की जामा मस्ज़िद में सर्वे के दौरान हुए उपद्रव पर तो पूरे देश के मुस्लिम संगठन और मुल्ला - मौलवीआक्रोशित हैं । लेकिन गंगा - जमुनी संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले मुस्लिम नेताओं ने बांग्ला देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ मुस्लिम गुंडों द्वारा की जा रही हैवानियत पर अपने होंठ सिल रखे हैं। पूरे देश में हिन्दू संगठनों द्वारा निकाली गई रैलियों के समर्थन में शीर्ष मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा बयान देने तक की औपचारिकता का निर्वहन नहीं किया गया। मुस्लिम देशों का जो संगठन भारत में मुस्लिमों की स्थिति पर समय - समय पर चिंता जताता है उसने भी बांग्ला देश में चल रही मुस्लिम धर्मांधता पर टिप्पणी करने से परहेज किया। इन सबकी वजह से ही ये कहने के लिए बाध्य हो जाना पड़ता है भारत के मुस्लिम समुदाय को धर्मनिरपेक्षता केवल अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी लगती है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ जो कुछ होता आया है उसकी किसी मुस्लिम नेता या धर्मगुरु ने निंदा की हो , ये शायद ही किसी ने सुना होगा। ऐसे में यदि राजनीतिक तौर पर हिन्दू ध्रुवीकरण होने लगा तब धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की बात बेमानी हो जाती है। महाराष्ट्र विधानसभा के हालिया चुनाव में बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं के नारे पर तो खूब नाक  सिकोड़ी गई किंतु लोकसभा चुनाव से प्रचलित वोट जिहाद की अपील को अनुचित बताने का साहस सेकुलर जमात नहीं दिखा सकी। भारत में रहने वाले मुसलमान और उनके धर्मगुरुओं को ये नहीं भूलना चाहिये कि 1971 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के मुस्लिमों पर पश्चिमी पाकिस्तान के मुस्लिम फौजियों ने वही अत्याचार किये थे जो आज बांग्ला देश में हिंदुओं पर मुस्लिम कट्टरपंथी कर रहे हैं। उस समय भारतीय सेना ने वहाँ घुसकर पाकिस्तानी फौज को घुटनाटेक करवाया और पाकिस्तान के चंगुल से निकलकर बांग्ला देश अस्तित्व में आया। और कोई देश होता तो उस एहसान को कभी नहीं भुलाता ।  लेकिन मुस्लिम कट्टरता के चलते वहाँ भारत विरोधी बीज अंकुरित होने लगे। वर्तमान स्थिति ये है कि जिस पाकिस्तान ने बांग्ला देश पर अत्याचार की पराकाष्ठा की थी वहाँ के मुस्लिम संगठनों द्वारा उसके साथ मिलकर हिंदुओं का दमन किया जा रहा है।  1971 के संकट के दौरान बांग्ला देश के करोड़ों लोग भारत में बतौर शरणार्थी आये और यहीं के होकर रह गए। उनकी तीसरी पीढ़ी यहाँ बसी हुई है जिनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। यदि बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो  रहे अत्याचार की प्रतिक्रियास्वरूप बांग्ला देशी मुसलमानों के विरुद्ध आक्रोश भड़क जाए तब भी क्या हमारे यहाँ के मुस्लिम संगठन मौन साधे रहेंगे ? आश्चर्य इस बात का है कि शरणार्थी बनकर आये बांग्ला देशियों की औलादें भी उनके मूल देश में हिंदुओं के साथ हो रही हैवानियत पर निर्विकार बनी हुई  हैं जबकि उनके माता - पिता भी ऐसी ही प्रताड़ना के कारण अपना वतन छोड़ने मजबूर हुए थे। बांग्ला देश में चल रही भारत विरोधी मुहिम का उद्देश्य  दरअसल हिंदुओं को देश छोड़ने के लिए मजबूर करना है। ऐसे में बांग्ला देशी शरणार्थियों के नाम मतदाता सूचियों से हटाकर सरकारी योजनाओं  के लाभ से वंचित करने का फैसला सरकार करे तब मुसलमानों को उसका विरोध नहीं करना चाहिये। लोकसभा चुनाव में वोट जिहाद का नारा उछालकर  भाजपा को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर फूले नहीं समा रहे मुस्लिम  धर्मगुरुओं को समझ में आ जाना चाहिए कि बंटेंगे तो कटेंगे का भाव वोट जिहाद की ही प्रतिक्रिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 December 2024

बैंकों द्वारा शुल्कों के रूप में लूट पर लगाम लगाए रिजर्व बैंक

किंग आधुनिक अर्थव्यवस्था की जान है। इसके बिना लेन - देन की कल्पना नहीं की जा सकती। पहले बैंकों का काम केवल जमा राशि पर ब्याज देना और व्यवसायिक ऋणों पर ब्याज वसूलना होता था किंतु 1969 में श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा राष्ट्रीयकरण किये जाने के बाद से उनकी भूमिका बदल गई और वे  सामाजिक दायित्वों से भी जुड़ गए । इसमें दो मत नहीं है कि  उस कदम से बैंकों और आम जनता के बीच की दूरी कम हुई। गरीबों के लिए अनुदान प्राप्त ऋण व्यवस्था निश्चित तौर पर क्रांतिकारी सोच थी। इसके अलावा छोटे - छोटे कस्बों तक में बैंक की शाखाएं खोली गईं। यद्यपि इन योजनाओं के कारण बैंकिंग क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बीज भी अंकुरित होने लगे। लेकिन कोई भी सरकार इस बारे में कदम पीछे खींचने का साहस नहीं कर सकी और इस तरह राष्ट्रीयकृत बैंक सरकारी नीतियों को लागू करने के माध्यम बनते चले गए। इसके बाद जब पी. वी. नरसिम्हा राव की सत्ता आई और डाॅ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बनाये गए तब देश में आर्थिक सुधारों की जो बयार बही उसने बैंकिंग क्षेत्र की तस्वीर बदलकर रख दी। राष्ट्रीयकरण की अवधारणा को किनारे रखते हुए निजी क्षेत्र के बैंकों को लाइसेंस दिये जाने लगे। इसका प्रभाव ऋण वितरण में सरलता के रूप में सामने आया। बैंक और बाजार एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करने में जुट गए। निजी आवश्यकताओं के लिए ऋण की उपलब्धता ने उपभोक्तावाद को जन्म  दिया। लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि व्यवसायिक ऋणों के अलावा वाहन, गृह निर्माण, शिक्षा आदि के लिए भी ऋण सुलभता से मिलने से समाज के मध्यमवर्ग का जीवन स्तर  भी उठने लगा। 10 साल पहले नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही गरीबों के जनधन खाते खोलने की योजना शुरू हुई तब उसे व्यर्थ की उठापटक माना गया क्योंकि बिना एक भी रुपया जमा किये खाता खोलने का औचित्य समझ से परे था । लेकिन जल्द ही जनधन खातों का उद्देश्य स्पष्ट हो गया क्योंकि सरकारी योजनाओं से गरीबों को मिलने वाली आर्थिक सहायता इन खातों में जमा की जाने लगी। डायरेक्ट ट्रांसफर नामक इस प्रणाली ने भ्रष्टाचार को रोकने का चमत्कारिक काम किया। कोरोना काल में ये तरीका बेहद कारगर साबित हुआ। इसमें दो मत नहीं है कि आज भारत का बैंकिंग ढांचा वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से खड़ा हुआ है और ये भी कि अब वह शहरों और कस्बों से निकलकर ग्रामीण अंचलों तक फैल चुका है। सबसे बड़ी बात हुई तकनीक का उपयोग करते हुए बैंकिंग को आसान बनाने का। एटीएम से शुरू होकर बात नेट बैंकिंग तक आ चुकी है। लेकिन इसकी आड़ में बैंकों ने ग्राहकों पर विभिन्न सेवाओं के लिए जो शुल्क थोपना शुरू किया वह अनुचित और असहनीय है। आज ही रिजर्व बैंक ने घोषणा की कि 6.5  फीसदी ब्याज दर जारी रहेगी। इससे ऋणों का  भुगतान करने वालों को मासिक किश्त में वृद्धि नहीं होगी। उद्योग - व्यवसाय भी इससे राहत अनुभव करेंगे। जिसका तत्काल प्रभाव शेयर बाजार में आई उछाल से मिल गया। हालांकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों का अनुमान था कि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कमी करेगा किंतु उसने उसे यथावत ही रखा। लेकिन देश के केन्द्रीय बैंक को ये भी देखना चाहिए कि बैंकों का मुनाफा जिस मात्रा में बढ़ता जा रहा है उसके मद्देनजर उन्हें सेवा एवं अन्य कार्यों हेतु लिए जाने वाले शुल्कों में यथोचित कमी करनी चाहिए। निजी क्षेत्र के बैंक यदि ग्राहकों से अनाप - शनाप शुल्क वसूलते हैं तो बात इसलिए समझ में आती है क्योंकि उनका उद्देश्य किसी भी तरह से लाभ बटोरना है किंतु सरकारी बैंक मुनाफा बढ़ाने के फेर में ग्राहकों पर जबरन का भार बढ़ाएं उसका औचित्य किसी भी दृष्टि  से सिद्ध नहीं किया जा सकता। ये बात गले से नहीं उतरती कि एक तरफ तो सरकार आम आदमी की बेहतरी के लिए बैंकों को माध्यम बना रही है किंतु वे ग्राहकों के साथ निजी सूदखोरों की तरह पेश आते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि संसद और उसके बाहर जनता के हितों  का ढोल पीटने वाले राजनीतिक नेता भी बैंकों द्वारा थोपे जाने वाले जबरिया शुल्कों के बारे में कुछ नहीं बोलते। इसी तरह उपभोक्ताओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन भी  उदासीन हैं। सरकार बैंकों में जो निजी डायरेक्टर नियुक्त करती है उनका दायित्व बैंक के साथ ही ग्राहकों के हितों का संरक्षण भी है किंतु वे उन्हें मिलने वाली सुविधाओं के वजन से दबे रहते हैं। ये सब देखते हुए बैंकों द्वारा लगाए जाने वाले शुल्कों के विरुद्ध भी आंदोलन होना चाहिए। अन्यथा ग्राहकों से की जाने वाली लूट बढ़ती ही जाएगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 December 2024

देश का पश्चिमी हिस्सा भाजपा का गढ़ बना


आखिरकार महाराष्ट्र में अनिश्चितता खत्म हो गई और भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बन रहे हैं। ढाई साल पहले शिवसेना टूटने पर जब उद्धव ठाकरे सरकार का पतन हुआ तब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने  शिवसेना छोड़कर आये एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री और देवेंद्र को उपमुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया जबकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी। और मुख्यमंत्री पद को लेकर ही उसकी उद्धव ठ से खटपट इतनी बढ़ी कि वे  कांग्रेस और शरद पवार की गोद में बैठकर मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन भाजपा शांत नहीं बैठी और उसने पहले शिवसेना में विभाजन करवाकर उद्धव को सत्ता से हटवाकर सरकार बनाई और कुछ समय बाद ही अजीत पवार को भी अपने पाले में खींचकर शरद पवार की राकांपा के भी दो टुकड़े करवा दिये। यद्यपि 2019 के चुनाव के बाद भी अजीत ने सुबह - सुबह देवेंद्र के साथ उपमुख्यमंत्री की शपथ ली किंतु शाम होते तक चाचा शरद पवार ने उनको घर लौटने बाध्य कर दिया। उस कदम से श्री फड़नवीस की काफी किरकिरी भी हुई। उनको सत्ता का लालची और अपरिपक्व तक कहा गया। हालांकि शिंदे सरकार में  उनके और अजीत के उप मुख्यमंत्री होने से महायुति  ने अच्छा काम कर दिखाया। लेकिन लोकसभा  चुनाव में महाराष्ट्र की जनता ने एनडीए की बजाय इंडिया गठबंधन को ज्यादा सीटें देकर  तगड़ा झटका दिया। अजीत  गुट को सबसे  ज्यादा घाटा हुआ परंतु शिंदे की शिवसेना को पर्याप्त सफलता मिली। उस परिणाम से लगा मानो शिंदे सरकार जिस प्रकार बनी उसी तरह चली भी जायेगी। अजीत की पत्नी के बारामती में शरद पवार की बेटी से बुरी तरह पराजित होने के बाद तो ये संभावना व्यक्त की जाने लगी कि पवार परिवार फिर एकजुट हो जायेगा। विधानसभा  के समय अजीत के चाचा की शरण में चले जाने की खबरें लगातार आती रहीं। उनको डर था कि यदि ये चुनाव भी हारे तो  भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। भाजपा से जुड़ने के कारण उनका मुस्लिम वोट बैंक भी छिटक गया। टूट - फूट की आशंका तो शिंदे की पार्टी में भी थी किंतु वैसा कुछ नहीं हुआ। महायुति के तीनों बड़े घटक मिलकर लड़े और भावी मुख्यमंत्री के बारे में किसी भी विवाद को पैदा नहीं होने दिया। दूसरी तरफ महा विकास अगाड़ी में सीटों के बंटवारे के साथ ही मुख्यमंत्री के चेहरे पर खींचातानी बनी रही। चुनाव विश्लेषक लोकसभा चुनाव के परिणाम विधानसभा चुनाव में दोहराए जाने के प्रति आश्वस्त थे। मराठा आरक्षण के मुद्दे को शिंदे सरकार के लिए खतरा बताने के साथ ही विदर्भ में भाजपा के लिए गड्ढा होने के दावे हो रहे थे किंतु सभी आशंकाएँ हवा  - हवाई होकर रह गईं। महायुति को ऐतिहासिक बहुमत हासिल होने से राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई। मुख्यमंत्री शिंदे ने उद्धव ठाकरे से शिवसेना की विरासत पूरी तरह छीन ली। वहीं अजीत ने लोकसभा चुनाव के उलट शानदार प्रदर्शन करते हुए चाचा शरद पवार की राजनीतिक पारी पर पूर्ण विराम लगा दिया। ज्यादातर लोगों ने महायुति की शानदार जीत का श्रेय  लाड़की बहन नामक योजना को दिया किंतु  धीमे स्वर में ही सही लेकिन शरद पवार ने बटेंगे तो कटेंगे के नारे को बाजी पलटने वाला बताते हुए हिंदू ध्रुवीकरण को स्वीकार किया। कुछ लोगों ने एक मुस्लिम धर्मगुरु द्वारा मुस्लिम मतदाताओं से किये गए  वोट जिहाद के आह्वान को महा विकास अगाड़ी की दुर्गति के लिए कसूरवार ठहराया। हार - जीत के कारणों का विश्लेषण सभी अपने - अपने नजरिये से करेंगे किंतु डेढ़ हफ्ते की जद्दोजहद के बाद श्री फड़नवीस के मुख्यमंत्री  और श्री शिंदे और अजीत के उपमुख्यमंत्री बनने के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार और उद्धव ठाकरे का आभामंडल फीका पड़ने की शुरुआत हो गई है। इसका पहला कारण तो उनके उत्तराधिकारी क्रमशः  सुप्रिया सुले और आदित्य ठाकरे में नेतृत्व क्षमता का अभाव  है और दूसरा उन दोनों का स्वास्थ्य इस लायक नहीं है कि अब वे मैदान में उतरकर संघर्ष करते हुए पार्टी को दोबारा खड़ा कर सकें। ऐसे में बड़ी बात नहीं उनके जो विधायक और सांसद हैं , वे भी भविष्य में श्री शिंदे और अजीत के साथ जुड़ जाएं। सबसे बड़ी बात ये होगी कि भाजपा पहली बार महाराष्ट्र की राजनीति को अपनी योजना के अनुसार संचालित करने में सक्षम हुई है। श्री फड़नवीस युवा होने के बावजूद काफी अनुभवी हैं। महापौर और विधायक के बाद मुख्यमंत्री पद का उनको पर्याप्त अनुभव है। भाजपा संगठन पर अच्छी पकड़ के साथ ही रास्वसंघ का समर्थन भी उनको हासिल है। लेकिन सबसे बड़ी बात वे  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की पसंद हैं। हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्धता होने से उन्हें भाजपा के भावी राष्ट्रीय नेतृत्व में स्थान मिलने की पूरी - पूरी संभावना है। गोवा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, म.प्र , गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में  सरकारें होने से देश का पश्चिमी हिस्सा भाजपामय हो गया है। राष्ट्रवादी राजनीति के लिए ये बहुत ही शुभ संकेत है। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र में महायुति की सरकार का भारी -  भरकम बहुमत के साथ सत्ता में आना खतरे का संकेत है। शरद पवार ने राँकापा बनाकर उसकी जड़ें पहले ही कमजोर कर दी थीं। रही - सही  कसर उद्धव ठाकरे के साथ गठजोड़ ने पूरी कर दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 December 2024

आयकर छूट की सीमा 10 लाख रु. की जाए


वित्तीय वर्ष 2025 - 26 के लिए केन्द्रीय बजट की तैयारियां सरकारी स्तर पर तेजी से चल रही हैं। मोदी सरकार ने बजट फरवरी में बजट पेश करने और 31 मार्च के पहले उसे पारित करवाने की जो परंपरा शुरू की उसके कारण अब बजट प्रावधानों के अनुसार आवंटन वित्तीय वर्ष शुरू से ही होने से बजट राशि का उपयोग समय रहते होने लगता है। परिणामस्वरूप विकास कार्यों की गति बढ़ी है। अन्यथा पुरानी व्यवस्था में विभिन्न विभागों को बजट राशि का आवंटन होते - होते जून आ जाता था। प्रत्यक्ष करों का भुगतान करने वाले संस्थान या व्यक्तियों को भी बजट जल्द प्रस्तुत होने से कर संबंधी योजना बनाने में आसानी हो गई है। ये भी सही है कि आयकर विभाग की कार्यप्रणाली में उल्लेखनीय सुधार होने से करदाताओं के मन में उसके प्रति व्याप्त खौफ कम हुआ है। रिटर्न भरने और अग्रिम कर जमा करने वालों के रिफण्ड की प्रक्रिया बेहद सरल और नौकरशाही के हस्तक्षेप से मुक्त होने का ही परिणाम है कि आयकर दाताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि प्रति वर्ष देखने मिल रही है। परिणामस्वरूप आयकर की कुल वसूली भी सरकार की उम्मीद से अधिक हुई। इसके लिए सरकार द्वारा किये गये सुधारों को श्रेय देने के साथ ही करदाताओं की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने एक जिम्मेदार नागरिक का फर्ज निभाते हुए अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में अपनी सहभागिता दी। जहाँ तक बात उद्योग - व्यवसाय की है तो उन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से अनेक प्रकार की रियायतें दी जाती हैं ।  लेकिन मध्यमवर्गीय करदाताओं की श्रेणी जिसमें कारोबारी और नौकरपेशा दोनों आते हैं, उन्हें आयकर की जो छूट  वर्तमान में मिल रही है उसे और बढ़ाया जाना चाहिए। ये बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि आज बाजार में जो रौनक है उसमें मध्यममवर्गीय उपभोक्ताओं का सबसे बड़ा योगदान है। बैंकों से आवास, वाहन, शिक्षा , घरेलू चीजों आदि के लिए कर्ज लेने वालों में भी इसी वर्ग की बहुतायत है। कहने का आशय ये है कि मध्यमवर्ग के बिना अर्थव्यवस्था की  कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसे में अब केंद्र सरकार को सोचना चाहिए कि आगामी बजट में इस तबके के लिए राहत का पिटारा खोले। अभी जो छूट की सीमा है वह समयानुकूल कम प्रतीत होती है। बतौर उपभोक्ता ये वर्ग सरकारी खजाने में जीएसटी के रूप में लगभग रोजाना अपना योगदान देता है। भारत का विशाल मध्यम वर्ग पूरी दुनिया के लिए आकर्षण बना हुआ है क्योंकि इसी के कारण भारत दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में स्थापित हुआ है। भारत में आकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी उत्पादन इकाइयां भी इसी वजह से लगा रही हैं। ऑटोमोबाइल उद्योग को जो अकल्पनीय उड़ान मिली उसमें भी मध्यमवर्ग को  ही  श्रेय जाता है। भारतीय शेयर बाजार में जो चमक आई है उसके पीछे भी इसी की भूमिका है। बीच में जब दुनिया भर के शेयर बाजार लड़खड़ाने लगे और विदेशी निवेशकों ने अपनी पूंजी निकालना शुरू कर दिया तब भी  मध्यमवर्गीय निवेशक हिम्मत के साथ डटा रहा ।  जिससे वैश्विक स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की धाक और साख दोनों बढी। इसलिए इस वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ाना बुद्धिमत्ता होगी। घरेलू पर्यटन उद्योग में जो रौनक नजर आती है उसका असली कारण भी मध्यमवर्ग ही है। यदि आयकर छूट की सीमा 10 लाख कर दी जाए तो भारत के उपभोक्ता और शेयर बाजार में जबरदस्त उछाल आना तय है और उससे सरकार दूसरे रास्ते से आयकर से ज्यादा कर अर्जित कर सकेगी। कोरोना के दौरान सभी आर्थिक विशेषज्ञ जनता के हाथ में पैसा देने की वकालत कर रहे थे जिससे उद्योग - व्यापार चलते रहें। उक्त सभी बिंदुओं के मद्देनजर आयकर छूट की सीमा 10 लाख रु. करना करदाता और सरकार दोनों के हित में रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 3 December 2024

विपक्षी गठबंधन की गाँठें ढीली पड़ने लगीं


संसद में चल रहे गतिरोध को खत्म करने संबंधी जो सहमति गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा आमंत्रित सर्वदलीय बैठक में बनी उससे एक बार फिर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की किरकिरी हुई जो अमेरिका में उद्योगपति गौतम अडाणी पर दर्ज प्रकरण को मुद्दा बनाकर संसद में बहस के लिए अड़े हुए थे। चूंकि कांग्रेस में उनकी बात टालना किसी के लिए भी संभव नहीं है इसलिए दोनों सदनों में उसके सांसदों ने करवाई ठप्प कर रखी थी। सरकार ने  कांग्रेस की मांग पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया जिसके कारण बीते सप्ताह लोकसभा और राज्यसभा में कुल मिलाकर घंटे भर भी काम नहीं हो सका।  उ.प्र के संभल में मस्जिद के सर्वे  को लेकर हुए फसाद का मुद्दा संसद में  उठाने के लिए सपा उतावली थी । वहीं बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर तृणमूल कांग्रेस चर्चा चाह  रही है।कुछ अन्य दलों के सांसद मणिपुर सहित अन्य विषयों को उठाने की तैयारी किये बैठे थे किंतु शीतकालीन सत्र का प्रारंभिक सप्ताह हंगामे की भेंट चढ़ गया। गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष की पहल पर सदन चलाने विपक्ष सहमत हो गया और आज कारवाई शुरू भी हुई किंतु कांग्रेस सांसदों ने इंडिया गठबंधन के कुछ सहयोगी दलों के साथ प्रदर्शन और नारेबाजी की। इसका नेतृत्व राहुल के साथ नवनिर्वाचित प्रियंका वाड्रा ने किया। लेकिन गठबंधन में कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा सांसदों वाली सपा और तृणमूल ने इस प्रदर्शन का बहिष्कार कर दिया। तृणमूल के एक सांसद ने यहाँ तक कह दिया कि अदाणी मुद्दा कांग्रेस का अपना  एजेंडा है। इस बारे में केन्द्रीय मंत्री किरण रिजजू का ये कहना काफी अर्थपूर्ण है कि सुविधाजनक बहुमत होने से सरकार सभी विधेयक बिना चर्चा के पारित करवा सकती है किंतु ऐसा करना उचित नहीं लगता। लेकिन इसे सत्ता पक्ष की सांकेतिक चेतावनी समझा जा सकता है। बहरहाल अदाणी मुद्दे पर एक बार फिर राहुल इंडिया गठबंधन में हाशिये पर जाने मजबूर हो गए हैं। चूंकि उन्होंने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया इसलिए पीछे हटना उनके लिए मुश्किल हो गया है। गठबंधन के कुछ छोटे घटक दल जरूर उनके साथ नजर आ रहे हैं परंतु सपा और तृणमूल का दूर खड़ा रहना  दर्शाता है कि वे राहुल की अपरिपक्व कार्यप्रणाली से ऊबने लगे हैं। दरअसल इसके पीछे अखिलेश यादव और ममता बेनर्जी के अपने - अपने राज्यों के राजनीतिक समीकरण हैं। प. बंगाल में ममता ने एकला चलो की नीति अपना रखी है जिसकी वजह से वहाँ कांग्रेस और वामपंथी दलों की  स्थिति दयनीय हो गई है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस  नेता अधीर रंजन चौधरी को ममता ने गुजरात से बुलाये क्रिकेटर युसुफ पठान से हरवा दिया। 2026 में राज्य विधानसभा के चुनाव हैं इसलिए सुश्री बेनर्जी अभी से कांग्रेस को ठेंगा दिखाने में जुटी हुई हैं। यही सोच सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की है। राहुल के साथ गठबंधन के खट्टे - मीठे अनुभवों के बाद वे इस बात को भांप गए हैं कि उ.प्र में कांग्रेस भविष्य में उनके लिए बोझ बन जायेगी। हाल ही में संपन्न 9 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर खटास पैदा हो गई थी। कांग्रेस को जब मनमाफिक सीटें नहीं मिलीं तो उसने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। मजबूरन सपा को सभी 9 सीटों पर उम्मीदवार उतारने पड़े किंतु कांग्रेस ने चूंकि सपा उम्मीदवारों का सहयोग नहीं किया इसलिए 7 सीटों पर उसे हार  झेलनी पड़ी और लोकसभा चुनाव के बाद अखिलेश का ग्राफ जिस तेजी से उठा वह नीचे आ गया। महाराष्ट्र में भी सपा की इच्छानुसार सीटें कांग्रेस ने नहीं दीं। सही बात ये है कि हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव के बाद ममता और अखिलेश ही नहीं उद्धव ठाकरे को भी कांग्रेस की संगत अखरने लगी है। विशेष रूप रूप से राहुल की गैर जिम्मेदार कार्यशैली से इंडिया गठबंधन के अनेक दल नाराज हैं। उद्धव के करीबी संजय राउत ने तो कहा भी कि यदि उनकी पार्टी अलग होकर लड़ती तब बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी। इन्हीं सब बातों का असर संसद में राहुल की जिद से पैदा हुए गतिरोध से तृणमूल और सपा का पल्ला झाड़ लेने के तौर पर दिखाई दे रहा है। हालांकि इसे इंडिया गठबंधन के विघटन की शुरुआत कहना तो जल्दबाजी होगी लेकिन एक बात साफ है कि श्री गाँधी ये भूल जाते हैं कि गठबंधन चलाने के लिए समन्वय बनाकर चलना जरूरी होता है। उनके इकतरफा  निर्णय को बाकी सहयोगी दल भी आँख मूंदकर स्वीकार कर लें ये हमेशा संभव नहीं क्योंकि सब अपने प्रभाव क्षेत्र को सुरक्षित रखना चाहते हैं। भारत जोड़ो यात्रा से राहुल की जो छवि बनी उससे प्रभावित होकर विपक्षी दलों को उनमें नरेंद्र मोदी का विकल्प महसूस होने लगा था। लेकिन तीसरी बार उनके प्रधानमंत्री बन जाने से वह भरोसा कम हो गया। बाकी कसर पूरी कर दी हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजों ने। ये देखते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि गठबंधन की गाँठें ढीली पड़नी शुरू हो गई हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 December 2024

जीएसटी की बढ़ती वसूली के बाद भी जनता को राहत नहीं


बीते नवम्बर माह में जीएसटी वसूली 1.82 लाख करोड़ पहुँच जाना अर्थव्यवस्था के नजरिये से बेहद उत्साहजनक है। ये आंकड़ा गत वर्ष इसी माह हुए संग्रह से 8.5 प्रतिशत ज्यादा है। इससे स्पष्ट होता है कि उपभोक्ता बाजार , वार्षिक विकास दर की अपेक्षा ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। यद्यपि दीपावली अक्टूबर माह में पड़ने के कारण बाजारों में जमकर खरीदी होने से भी इस माह का आंकड़ा अधिक रहा।  इस वर्ष  अब तक 19.74 लाख करोड़ रु. का जीएसटी वसूल होना उत्पादन और खफत दोनों के लिहाज से सुखद संकेत है। विश्व की  प्रामाणिक वित्तीय एजेंसियों द्वारा 2024 - 25 में  भारत की वार्षिक विकास दर का जो अनुमान लगाया जा रहा है उसके अनुसार वह 7 फीसदी से अधिक भी रह सकती है। और यदि ऐसा हो सका तब यह दुनिया भर में सबसे ज्यादा होगी। जीएसटी के अलावा प्रत्यक्ष करों की वसूली में भी जबरदस्त वृद्धि होने का अर्थ है कि लोगों का विश्वास सरकार में बढ़ा है । आयकर विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार  से भी लोगों में विवरणी भरने के प्रति उत्साह जाग्रत हुआ है। आयकर रिफंड विवरणी भरने के  बाद बहुत ही कम समय में आयकर दाता तक पहुँचने लगे हैं । उस वजह से लोगों की अग्रिम कर जमा करने के प्रति नाराजगी कम हुई है।  इसी तरह राजमार्गों पर प्रतिदिन वसूल होने वाले टोल टैक्स के आंकड़े भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अर्थव्यवस्था के पहिये तेज रफ्तार से दौड़ रहे हैं।   लेकिन इतनी आशाजनक स्थिति के बावजूद भी आम जनता को राहत देने के बारे में जीएसटी काउंसिल बेहद कंजूस  है। छोटा सा उदाहरण स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों पर लगने वाले जीएसटी का है। बढ़ते चिकित्सा खर्च के कारण लोगों में स्वास्थ्य बीमा कराने का चलन बढ़ा है किंतु उस पर 18 फीसदी की दर से जीएसटी लगाना अमानवीय है। केन्द्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने  पत्र लिखकर इसे घटाने कहा। जिस पर  काउंसिल ने सैद्धांतिक सहमति तो दे दी जिसका कारण केंद्र सरकार के एक वरिष्ट मंत्री द्वारा लिखा पत्र था किंतु उसे भी टाला जाता रहा। खबर है दिसंबर की बैठक में 5 लाख तक के स्वास्थ्य और जीवन बीमा पर जीएसटी की दर कम करने का निर्णय काउंसिल करेगी किँतु इससे अधिक राशि के बीमा पर वह 18 फीसदी ही रहेगी जो कि पूर्णतः अनुचित है। 5 लाख से कम की बीमा पाॅलिसी पर यदि जीएसटी पूरी तरह खत्म कर दिया जाए तब भी ये लगेगा कि काउंसिल में बैठे वित्त मंत्रियों में जनता के प्रति कुछ संवेदनशीलता  है। आश्चर्य इस बात का है कि जो विपक्षी दल जीएसटी को लेकर केंद्र सरकार पर आक्रामक बने रहते हैं उनके शासित राज्यों के वित्त मंत्री भी जब काउंसिल की बैठक में आते हैं तब जनता को लूटने में वे भी अन्य पार्टियों के नुमाइंदों की तरह पेश आते हैं। बीमा के अलावा भी अनेक सेवाएं और वस्तुएँ हैं जिन पर जीएसटी की दरें घटनी चाहिए। काउंसिल को ये बात  समझनी होगी कि जीएसटी की अधिक दरें कर चोरी को प्रोत्साहित करती हैं।  जब जीएसटी लागू हुआ तब ये आश्वासन दिया गया था कि भविष्य में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस भी इसके दायरे में लाये जाएंगे किंतु आज तक वह हवा में टँगा हुआ है।   इसी तरह जीएसटी की  एक या अधिकतम दो दरें रखने पर भी सहमति के स्वर सुनाई देते थे। लेकिन उसकी चर्चा तक अब सुनाई नहीं देती। मुद्दे और भी हैं किंतु जिस पैमाने पर जीएसटी की वसूली हर माह बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए करों की दरें कम होने के साथ ही पेट्रोल - डीजल को भी उसके अन्तर्गत लाना अपेक्षित है जो अभी सरकारी मुनाफाखोरी का शिकार हैं। काउंसिल के सदस्यों को ये बात मालूम होना चाहिए कि करों की दरों को कम रखने के अलावा उसके ढांचे में जटिलता न होने से उद्योग - व्यवसाय और उपभोक्ता सभी कर देने प्रोत्साहित होते हैं। इसीलिए विकसित देशों में जीएसटी की एक या दो दरें ही हैं। जिस दिन हमारे हुक्मरान इस सच्चाई को स्वीकार कर लेंगे , कर वसूली का आंकड़ा उनकी कल्पना से भी ज्यादा हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी