Wednesday, 11 December 2024

संसद नहीं चलने से विपक्ष नुकसान में रहता है


संसद का शीतकालीन सत्र 20 दिसंबर तक चलेगा। अब तक इसमें किसी भी दिन पूरे समय  एक भी सदन में कामकाज नहीं हुआ। सत्र के पहले लोकसभाध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए सहयोग मांगते हैं। जिसमें सभी दलों के नेता आश्वासन देते हैं कि वे जो भी कार्यसूची संसदीय कार्य मंत्रालय तैयार करता है उस पर बहस करेंगे। सरकार कुछ विधेयक भी हर सत्र मे पेश करती है। इन सबके अलावा देश और दुनिया में हो रही घटनाओं पर भी  चर्चा की जाती है। इस सत्र के पूर्व भी  सर्वदलीय बैठक में  सत्र के विधिवत संचालन  हेतु विभिन्न दलों  ने सहमति व्यक्त की थी। लेकिन  पहले दिन ही हमेशा की तरह हंगामा शुरू हो गया । पहला सप्ताह बेकार चले जाने के बाद लोकसभाध्यक्ष के साथ दोबारा हुई बैठक में सभी दलों के प्रतिनिधियों ने एक बार फिर सदन को बिना रुकावट के चलाने का वायदा किया किंतु कार्यवाही शुरू होते ही होहल्ले की वजह से सदन स्थगित किया जाता रहा।  विपक्ष कुछ मुद्दों को लेकर आक्रामक है। शुरुआत में  सत्ता पक्ष रक्षात्मक प्रतीत हुआ किंतु बाद में उसकी ओर से भी जवाबी हमला होने लगा। राहुल गाँधी के पास अदाणी नामक एकमात्र मुद्दा है जिससे विपक्ष की अनेक पार्टियां दूरी बनाये हुए हैं। इसी बीच महाराष्ट्र में हुई करारी हार को लेकर इंडिया गठबंधन में खींचातानी शुरू हो गई जब ममता बेनर्जी ने गठबंधन का नेतृत्व ग्रहण करने की पेशकश करते हुए राहुल गाँधी को निशाना बनाया। आश्चर्य तब हुआ जब उनके बयान को गठबंधन के अनेक बड़े नेताओं का समर्थन मिलने लगा। अदाणी का विरोध करने से भी अनेक विपक्षी पार्टियों ने इंकार कर दिया जिससे राहुल अकेले नजर आने लगे। इस सबसे भाजपा को हमलावर होने का अवसर मिल गया और उसकी तरफ से राहुल और उनकी माँ सोनिया गाँधी पर भारत विरोधी विदेशी संगठनों के साथ संगामित्ति का आरोप लगाया गया जिसके कारण सदन का वातावरण और तनावपूर्ण हो गया। उधर राज्यसभा में सभापति जगदीप धनखड़ के विरुद्ध अविश्वास पेश के जरिये विपक्ष सरकार पर दबाव बनाने का दाँव चल रहा है। स्मरणीय है उपराष्ट्रपति ही उच्च सदन के सभापति होते हैं। यद्यपि उस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना न के बराबर है किंतु ऐसा करके विपक्ष अपने भीतर आने लगे बिखराव को रोकने का प्रयास करेगा। कुल मिलाकर जो लग रहा है उसके अनुसार ये  सत्र भी  हंगामे के बीच खत्म हो जाएगा। पिछले सत्र में सरकार ने जो वक्फ संशोधन विधेयक  जेपीसी के पास भेजा था उसकी रिपोर्ट इस सत्र में प्रतीक्षित थी किंतु सरकार ने उसे आगामी सत्र के लिए टाल दिया। अब वह एक देश एक चुनाव संबंधी विधेयक लाने जा रही है और उसे भी जेपीसी  गठित कर उसके जिम्मे कर दिया जाएगा। इन दोनों विषयों पर सत्ता पक्ष पूरे देश में विमर्श के जरिये जनता का समर्थन हासिल करने में लगा हुआ है। वक्फ द्वारा नई संपत्तियों पर दावा करने सम्बन्धी विवादों की खबरों के कारण उस विधेयक के पक्ष में जन समर्थन जुटाने में सरकार सफल लग रही है। ऐसी ही रणनीति एक देश एक चुनाव के बारे में भी  है। दुर्भाग्य से विपक्ष इसे  समझ नहीं पा रहा । फिलहाल संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की अच्छी खासी संख्या है। ऐसे में उसे सदन के संचालन में ज्यादा रुचि लेना चाहिए। लेकिन राहुल गाँधी अपनी जिद पूरे विपक्ष पर लादकर खुद को आकर्षण का केंद्र बनाना चाहते हैं। वहीं  लोकसभा में  नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद  पूरे विपक्ष का विश्वास अर्जित करने में उनकी विफलता का लाभ उठाकर सत्ता पक्ष भी सदन को चलाने के प्रति अपेक्षित रुचि नहीं दिखाता। हालांकि हंगामे के बीच सरकार जरूरी विधायी कार्य पूरे करवा लेती है। ये भी देखने आया है कि सदन यदि  कुछ समय चलता भी है तो दोनों पक्षों के बीच आरोपों और प्रत्यारोपों में ही पूरा समय नष्ट हो जाता है। लोकतंत्र में  आस्था रखने वाले जिम्मेदार किस्म के लोग तो संसद की ये दशा देखकर दुखी होते हैं किंतु संसदीय प्रजातंत्र की रक्षा का दायित्व जिन सांसदों पर है उन्हें लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा की लेश मात्र भी फिक्र नहीं है। संसद का बहुमूल्य समय नष्ट करने के लिए सत्ता और विपक्ष दोनों एक दूसरे पर आरोप मढ़ते हैं किंतु कमोबेश दोनों ही इसके दोषी हैं। लेकिन विपक्ष के लिए संसद ही वह मंच है जिसके जरिये वह पूरे देश तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इसलिए बजाय सरकार और सभापति पर आरोप लगाते रहने के विपक्ष को सदन सुचारु रूप से चलाने की पहल करना चाहिए क्योंकि इसी में उसका फायदा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 December 2024

एक ही मुद्दे से चिपके रहना राहुल के लिए नुकसानदेह


राजनीति में कब कौन किसके साथ हो जाए और कौन साथ छोड़ दे कहना मुश्किल है। लोकसभा चुनाव मिलकर लड़े इंडिया गठबंधन में नजर आ रही  दरारें इसकी पुष्टि करती हैं। संसद का शीत कालीन सत्र शुरू होने के पहले महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद विपक्षी गठजोड़ में जो  टूटन शुरू हुई वह बढ़ती ही जा रही है। गठबंधन के अनेक नेता खुलकर कांग्रेस पर हमले कर रहे हैं। नेतृत्व बदलने की मांग को मिल रहे समर्थन से ये बात साबित हो रही है। इसके पीछे एक तरफ तो हरियाणा और महाराष्ट्र में हुई हार है किंतु दूसरी तरफ अदाणी समूह को लेकर राहुल गाँधी का बचकाना रवैया भी है। अमेरिका से हुए कुछ खुलासों के आधार पर वे अदाणी पर चौतरफा हमला कर रहे हैं किंतु अभी तक उनके हाथ ऐसा कुछ भी नहीं लग सका जिसके बल पर वे उक्त समूह को अपराधी साबित कर सकें। और उसी की खीझ में वे अब जो तरीके अपना रहे हैं वे सतही सोच का प्रतीक हैं । प्रधानमंत्री के साथ अदाणी की भागीदारी का आरोप लगाते हुए चोर शब्द का इस्तेमाल कर श्री गाँधी ने दिखा दिया कि उनमें गलतियों से सीखने की बुद्धिमत्ता का अभाव है। स्मरणीय है 2019 के लोकसभा चुनाव में  उन्होंने चौकीदार चोर के नारे अपनी सभाओं में लगवाए थे किंतु जनता ने नरेंद्र मोदी को और भी ज्यादा सीटें देकर दोबारा सत्ता में बिठा दिया। पिछले कुछ सालों से वे अदाणी समूह की आड़ लेकर  प्रधानमंत्री की घेराबंदी करने में  जुटे हैं किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ये मुद्दा बेअसर रहा। हालांकि श्री मोदी स्पष्ट बहुमत से चूक गए लेकिन उसका कारण अदाणी मुद्दा न होकर अन्य बातें रहीं। उनके इस अड़ियलपन से इंडिया गठजोड़ के अन्य दलों में भी नाराजगी है। कुछ तो खुलकर उसे जाहिर भी कर चुके हैं। संसद में गत सप्ताह कांग्रेस द्वारा अदाणी के विरोध में हुए प्रदर्शन से सपा, तृणमूल और एनसीपी ( शरद) द्वारा दूरी बनाया जाना इसका प्रमाण है। गठबंधन के अनेक साथी दलों द्वारा कांग्रेस से दूर रहने का जो संकेत दिया जा रहा है उसके पीछे अदाणी मुद्दे पर श्री गाँधी की हठधर्मिता के अलावा गाँधी परिवार का संबंध उन विदेशी संस्थानों के साथ जुड़ने का आरोप  है जो भारत में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने में जुटे  हैं। जिस दिन से राहुल की अगुआई में प्रधानमंत्री को चोर कहा गया उसी के बाद से भाजपा  सांसदों ने संसद में सोनिया गाँधी और उनके परिवार pr भारत विरोधी विदेशी संस्थानों से निकटता का आरोप लगाना शुरू कर दिया। जिसका कांग्रेस तो ये कहकर खंडन कर रही है कि सत्ता पक्ष अदाणी विवाद से लोगों का ध्यान हटाने ये आरोप लगा रहा है। लेकिन गाँधी परिवार ने उक्त आरोपों पर मुँह नहीं खोला। इंडिया गठबंधन के साथी भी इस बात से भयभीत हैं कि कहीं  वे  गाँधी परिवार पर भाजपा द्वारा किये जा रहे हमले की लपेट में न आ जाएं। यही कारण है कि अदाणी मुद्दे पर जहाँ राहुल अकेले नजर आ रहे हैं वहीं भाजपा द्वारा लगाए गए आरोपों से बचाव में भी गठबंधन के सहयोगी पूरी तरह उदासीन हैं।  विपक्ष में होने के नाते श्री गाँधी सरकार को घेरने के लिए आगे आएं ये स्वाभाविक है किंतु एक ही मुद्दे में उलझे रहने से ऐसा लगता है जैसे वे पूर्वाग्रह से ग्रसित हों। और ये भी कि जब देश और दुनिया के सामने बड़ी - बड़ी समस्याएं सिर उठा रही हों तब बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गाँधी का कर्तव्य है कि वे संसद और उसके बाहर उन विषयों पर अपना और कांग्रेस का रुख स्पष्ट करें। लेकिन वे अदाणी से चिपककर खुद को कुए का मेढ़क साबित कर रहे हैं।   इस बारे में रोचक बात ये है कि भाजपा विरोधी कुछ यू ट्यूबर पत्रकार ये शिगूफा छोड़ने लगे हैं कि इंडिया  गठबंधन के कुछ दलों ने हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम के बहाने कांग्रेस पर जो हमला बोला है उसके पीछे गौतम अदाणी ही हैं। सही बात तो ये है कि अदाणी कभी भी गठबंधन का साझा मुद्दा रहा ही नहीं। शरद पवार और ममता बेनर्जी तो हिँडनबर्ग खुलासे के समय ही राहुल द्वारा जेपीसी जांच की मांग के विरोध में खड़े हो गए थे। श्री पवार  ने तो गौतम अदाणी से निजी बातचीत के बाद उनके पाक - साफ होने का दावा भी कर दिया। लेकिन श्री गाँधी  लगातार अदाणी और श्री मोदी की निकटता के नाम पर राजनीति करते आ रहे हैं। लेकिन जब ये आरोप लगता है कि अशोक गहलोत और भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री रहते हुए क्रमशः राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अदाणी समूह की कंपनियों को बड़े - बड़े ठेके दिये तब श्री गाँधी जवाब देने से बचते हैं। गत दिवस उनके बहनोई रॉबर्ट वाड्रा के साथ भी गौतम अदाणी का चित्र भाजपा ने जारी कर राहुल से उन दोनों के रिश्तों पर स्पष्टीकरण मांगा है। कुल मिलाकर ये लगता है कि अदाणी मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरने का दांव उल्टे श्री गाँधी के लिए मुसीबत बन गया है। चूंकि अभी तक इस बारे में वे कुछ भी ठोस तथ्य सामने नहीं रख सके इसलिए उनकी विश्वसनीयता भी दिनों -  दिन कम हो रही है। और जब उनके सहयोगी दल ही उनसे सहमत नहीं हैं तब जनता उनकी बात को सच मानेगी इसमें संदेह ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 9 December 2024

इंडिया गठबंधन में राहुल को नेता स्वीकार करने में हिचक

रियाणा की हार के बाद ही इंडिया गठबंधन के अनेक सदस्यों ने कांग्रेस पर हमला शुरू कर दिया था। शिवसेना (उद्धव ) के मुखपत्र सामना में राहुल गाँधी के नेतृत्व पर सवाल उठाये गए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को अकेले चुनाव जीतने में अक्षम बता डाला। दरअसल हरियाणा में उनको कांग्रेस ने एक भी सीट नहीं दी थी। उसी खुन्नस में उ.प्र के 9 विधानसभा उपचुनावों में सपा ने सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को इतना परेशान किया कि उसने खीझकर चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया। उधर महाराष्ट्र में सपा, दबाव बनाती रही लेकिन उसे इच्छानुसार सीटें नहीं मिलीं। चुनाव में शरद पवार, उद्धव ठाकरे और नाना पटोले की तिकड़ी चारों खाने चित्त हो गई। कांग्रेस ने तो इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया । चूंकि इंडिया गठबंधन के तीनों बड़े घटक बुरी तरह हारे इसलिए बलि के बकरे की तलाश शुरू हुई। इस उलझन को दूर कर दिया प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने ये कहते हुए कि इंडिया गठबंधन का नेतृत्व उसे ठीक से नहीं चला रहा। ये गठबंधन उन्होंने बनाया है और मौका मिले तो वे उसका नेतृत्व करने तैयार हैं।  उनके बयान का उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत ने समर्थन करते हुए कोलकाता जाकर उनसे चर्चा करने की बात भी कह डाली। उधर सपा नेता उदयवीर सिंह ने भी इसी आशय का बयान देकर सनसनी मचा दी। इसी बीच राजद की ओर से बयान आया कि इंडिया का गठन तो लालू प्रसाद यादव ने किया था। विपक्षी दलों में खटास लोकसभा  के भीतर भी देखने मिली जब अखिलेश यादव की सीट राहुल गाँधी से दूर कर दी गई जिस पर तंज कसते हुए उन्होंने धन्यवाद कांग्रेस कहा। महाराष्ट्र में शरद पवार तो ज्यादा नहीं बोल रहे किंतु उद्धव ठाकरे के खेमे से कांग्रेस पर हमला जारी है। उधर सपा नेता अबू आजमी ने शिवसेना ( उद्धव ) के नेता मिलिंद नार्वेकर  द्वारा 6 दिसंबर को बाबरी ढांचा गिराए जाने की वर्षगांठ पर सोशल मीडिया में की गई पोस्ट से नाराज होकर महा विकास अगाड़ी से नाता तोड़ने की घोषणा की तो जवाब में आदित्य ठाकरे  ने सपा को भाजपा की बी टीम बताकर आग में घी डाल दिया। तमिलनाडु में सत्तासीन द्रमुक  ने  जरूर कांग्रेस के बचाव में उतरते हुए ममता के बयान पर कहा कि वे एक महज क्षेत्रीय पार्टी की नेता हैं । लेकिन शरद पवार की बेटी सांसद सुप्रिया सुले ने  ये कहकर कांग्रेस को झटका दिया कि ममता यदि बड़ी जिम्मेदारी लेती हैं तो उन्हें खुशी होगी। बंगाल की मुख्यमंत्री ने  जो हमला किया उसमें किसी का नाम तो नहीं था किंतु राजनीति की  समझ रखने वाले जानते हैं कि उनका निशाना राहुल गाँधी पर ही है , जो गठबंधन के अघोषित नेता बने हुए थे। लोकसभा  चुनाव में 99 सीटें जीतकर कांग्रेस निश्चित रूप से विपक्ष की मुखिया नजर आने लगी। और फिर राहुल के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने से उसकी चौधराहट ज़ाहिर तौर पर बढ़ी  जो अन्य घटक दलों को नागवार गुजर रही है। सही बात बात ये है कि इंडिया गठजोड़ में कांग्रेस के पीछे चलने पर किसी को आपत्ति नहीं है किंतु राहुल को नेता मानने  की मनःस्थिति नहीं होना विवाद की वजह है। उल्लेखनीय है ममता तो गठबंधन के अस्तित्व में  आने के पहले से ही राहुल को कमजोर नेता बताते हुए खुद को नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में सक्षम बताती आई हैं। इंडिया गठजोड़ में शामिल होने के बाद भी उन्होंने प. बंगाल में कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल नहींं किया और राहुल की भारत जोड़ो न्याय यात्रा से भी दूर रहीं।  कुल मिलाकर हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम ने राहुल गाँधी की वजनदारी  कम कर दी। अदाणी मुद्दे पर भी ममता, शरद पवार और अखिलेश ने उनका साथ नहीं दिया। असल में आने वाले ज्यादातर राज्य विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों का बोलबाला है जो कांग्रेस को किसी भी तरह से ताकतवर होते नहीं देखना चाहेंगे। वैसे भी इंडिया गठबन्धन  लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की वापसी रोकने बना था। सैद्धांतिक आधार न होने से इसका विधिवत ढांचा खड़ा नहीं हो पाया। हालांकि जून के बाद हुए चार राज्यों के चुनावों में भाजपा को  जम्मू - कश्मीर और झारखंड में  हार का मुँह देखना पड़ा किंतु जीत का श्रेय कांग्रेस की बजाय क्रमशः नेशनल काँफ्रेंस और झारखंड मुक्ति मोर्चा लूट ले गए। इसीलिए  राहुल को उपेक्षित करने की मुहिम शुरू हो गई। यद्यपि इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि विपक्षी एकता पूरी तरह कृत्रिम थी जिसमें परस्पर विश्वास का अभाव था। होना तो ये चाहिए था कि लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद कांग्रेस द्वारा गठबंधन के सभी दलों को बुलाकर विपक्षी एकता को सुदृढ़ किया जाता। लेकिन नेता प्रतिपक्ष बनकर राहुल आत्ममुग्ध हो गए और उनकी प्राथमिकता पार्टी की बजाय प्रियंका वाड्रा को लोकसभा में लाना  हो गई। जम्मू - कश्मीर के चुनाव में उमर अब्दुल्ला तो राहुल द्वारा सही तरीके से प्रचार न किये जाने पर सार्वजनिक रूप से गुस्सा जता ही चुके थे। महाराष्ट्र में भी ये चर्चा होती रही कि वे प्रियंका के क्षेत्र वायनाड में ज्यादा घूमे। इन सब बातों से लगता है विपक्षी एकता का ये प्रयोग भी निष्फल होने जा रहा है जिसका ठीकरा राहुल के सिर फूटेगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

सीरिया के कई हिस्सों में बंटने का अंदेशा : विद्रोही गुट आपस में लड़ते रहेंगे

      सीरिया में बशर असद की सत्ता का पतन होना अरब जगत में एक नये संकट का कारण बनेगा। बीते एक दशक से चल रहे गृहयुद्ध में लाखों लोगों की जान चली गई। साथ ही लाखों को भागकर दूसरे देशों में पनाह लेने लगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि सीरिया के गृहयुद्ध ने जो शरणार्थी समस्या पैदा की उसने यूरोप के अनेक देशों में इस्लामिक कट्टरता के पाँव जमा दिये। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क और ब्रिटेन इसका दंश भोग रहे हैं। ये बात पूरी तरह सही है कि राष्ट्रपति असद एक क्रूर तानाशाह बन चुके थे। उनके पिता ने भी इस देश पर लम्बे समय तक राज किया। इस प्रकार दुनिया के प्राचीनतम देशों में शुमार सीरिया आधी सदी से एक ही परिवार के शिकंजे में था।

       हालांकि असद की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह 13 साल पहले शुरू हुआ किंतु रूस और ईरान ने हर प्रकार से उसकी सहायता की। रूसी सैनिकों के साथ ही वायुसेना भी खुलकर असद की रक्षा करती रही। ऐसी ही भूमिका ईरान की भी रही। दरअसल रूस को डर था कि असद के हटते ही सीरिया के अमेरिकी प्रभाव में चले जाने से पश्चिम  एशिया का शक्ति संतुलन बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। उसका सोचना गलत भी नहीं था।

   गत दिवस राजधानी दमिश्क में विद्रोहियों के घुसते ही असद देश छोड़कर मास्को रवाना हो गए। रूस ने भी उन्हें शरण देना स्वीकार किया है। अमेरिका , फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और तुर्किये आदि ने बिना देर लगाए जिस तरह से सीरिया में सत्ता परिवर्तन का स्वागत किया । उससे स्पष्ट है कि इसके पीछे अमेरिकी लॉबी का हाथ है। इसका समय भी बहुत ही सोच समझकर तय किया गया। चूंकि रूस लंबे समय से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है इसलिए वह पहले की तरह असद के बचाव में सामने नहीं आ सका। हालांकि उसके सैनिक दस्ते अभी भी सीरिया में बने हैं जिनकी सुरक्षित वापसी हेतु उसने विद्रोही नेताओँ से आश्वासन ले लिया है। दूसरी तरफ ईरान भी इसराइल के साथ जंग की दहशत में डूबा हुआ है। लिहाजा  वह भी असद की सहायता करने का साहस न दिखा सका। यदि इनमें से कोई एक देश भी असद की पीठ पर हाथ रखे रहता तो बरसों से चला आ रहा गृहयुद्ध कुछ दिनों में ही अंजाम तक न पहुँचता।

    लेकिन विद्रोहियों के राजधानी दमिश्क  पर काबिज होने और राष्ट्रपति असद के देश छोड़कर रूस में शरण लेने मात्र से सीरिया का संकट हल हो जाएगा, ये मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि जिस गुट ने कुछ दिनों के भीतर ही असद को भागने मजबूर कर दिया उसका भी पूरे देश पर आधिपत्य नहीं है। सीरिया के बड़े हिस्से पर दूसरे गुटों का कब्जा है। वहीं आई.एस.आई.एस नामक संगठन भी कुछ जगहों में जमा बैठा है।

    जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का उद्देश्य सीरिया को असद के शासन से मुक्त करवाना था। उसके लिए उसने जिस विद्रोही गुट को सहायता दी उसका नेता अल कायदा जैसे अमेरिका विरोधी आतंकवादी संगठन से जुड़ा रहा। ऐसे में  कहा जा सकता है कि असद का तख्ता पलट होने के बाद सीरिया के कई टुकड़े हो सकते हैं और यही अमेरिका और उसके समर्थक पश्चिमी देश चाहते हैं।

    अमेरिका जानता है कि सीरिया को यदि टुकड़ों में नहीं बांटा गया तब वहाँ दोबारा उसकी विरोधी ताकतें सत्ता पर हावी हो जाएंगी। इसलिए असद के देश छोड़कर भागने के बाद अब यह देश अनेक विद्रोही गुटों की आपसी लड़ाई में फंसकर रह जाएगा। अरब जगत में युद्ध के हालात बनाये रखना अमेरिका के हित में होने से वह अपनी पसंद के विद्रोही समूह को पालता रहेगा। सीरिया से इसराइल की सीमा भी मिलती है। गोलन हाइट्स नामक इलाके में उसने अपने कदम बढ़ा दिये हैं। गत रात्रि सीरिया में अनेक इस्लामिक कट्टरपंथियों के केंद्रों पर हवाई हमले हुए। उनके पीछे इसराइल ही बताया जा रहा है।

     सच बात ये है कि इसराइल सीरिया में हुए सत्ता परिवर्तन से आशंकित है क्योंकि जिस विद्रोही गुट ने दमिश्क पर अपना परचम फहराया उसकी पृष्ठभूमि  इसराइल विरोधी रही है। अन्य अरबी देश भी ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे सीरिया में अचानक हुए तख्ता पलट पर क्या रुख अख्तियार करें , क्योंकि जिन देशों में राजशाही या लम्बे समय से परिवार की सत्ता चली आ रही है वहाँ के सत्ताधीशों को भी सीरिया के हालातों ने डरा दिया है।

     आने वाले कुछ दिन इस क्षेत्र के लिए काफी संगीन होंगे क्योंकि फिलहाल तो सीरिया आसमान से टपकने के बाद खजूर पर अटेकने वाली स्थिति में फंस गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 December 2024

बांग्ला देश के हालात पर भारत के मुस्लिम धर्मगुरु खामोश क्यों हैं


बांग्ला देश में रह रहे अल्पसंख्यक जबरदस्त तनाव में हैं। कुछ समय पूर्व सत्ता परिवर्तन के बाद से वहाँ भारत विरोधी भावनाएं उफान पर हैं जिनके चलते हिंदुओं के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है। मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट करने पर आमादा हैं। घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूट और आगजनी आम बात है। महिलाओं का अपहरण और बलात्कार बेरोकटोक जारी है। जैन और ईसाई समुदाय भी मुस्लिम गुंडागर्दी का शिकार हो रहा है। सं.रा.संघ ने भी इस पर चिंता व्यक्त की  है। यहाँ तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी बांग्ला देश सरकार को इसे रोकने कहा है । उल्लेखनीय है शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलटने के पीछे बाइडेन का ही हाथ बताया जाता है।  भारत में बांग्ला देश के हिंदुओं के साथ हो रहे अमानुषिक अत्याचारों को लेकर काफी गुस्सा है। हाल ही में हिन्दू संगठनों के आह्वान पर अनेक शहरों में जुलूस निकालकर केंद्र सरकार से प्रभावी कदम उठाने का अनुरोध किया गया। संसद में भी इस मामले में आवाजें उठीं।  लेकिन इस सबके बीच  सबसे चौंकाने वाली बात है भारत में रहने वाले मुसलमानों  की खामोशी। वक्फ संशोधन और संभल की जामा मस्ज़िद में सर्वे के दौरान हुए उपद्रव पर तो पूरे देश के मुस्लिम संगठन और मुल्ला - मौलवीआक्रोशित हैं । लेकिन गंगा - जमुनी संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले मुस्लिम नेताओं ने बांग्ला देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ मुस्लिम गुंडों द्वारा की जा रही हैवानियत पर अपने होंठ सिल रखे हैं। पूरे देश में हिन्दू संगठनों द्वारा निकाली गई रैलियों के समर्थन में शीर्ष मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा बयान देने तक की औपचारिकता का निर्वहन नहीं किया गया। मुस्लिम देशों का जो संगठन भारत में मुस्लिमों की स्थिति पर समय - समय पर चिंता जताता है उसने भी बांग्ला देश में चल रही मुस्लिम धर्मांधता पर टिप्पणी करने से परहेज किया। इन सबकी वजह से ही ये कहने के लिए बाध्य हो जाना पड़ता है भारत के मुस्लिम समुदाय को धर्मनिरपेक्षता केवल अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी लगती है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ जो कुछ होता आया है उसकी किसी मुस्लिम नेता या धर्मगुरु ने निंदा की हो , ये शायद ही किसी ने सुना होगा। ऐसे में यदि राजनीतिक तौर पर हिन्दू ध्रुवीकरण होने लगा तब धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की बात बेमानी हो जाती है। महाराष्ट्र विधानसभा के हालिया चुनाव में बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं के नारे पर तो खूब नाक  सिकोड़ी गई किंतु लोकसभा चुनाव से प्रचलित वोट जिहाद की अपील को अनुचित बताने का साहस सेकुलर जमात नहीं दिखा सकी। भारत में रहने वाले मुसलमान और उनके धर्मगुरुओं को ये नहीं भूलना चाहिये कि 1971 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के मुस्लिमों पर पश्चिमी पाकिस्तान के मुस्लिम फौजियों ने वही अत्याचार किये थे जो आज बांग्ला देश में हिंदुओं पर मुस्लिम कट्टरपंथी कर रहे हैं। उस समय भारतीय सेना ने वहाँ घुसकर पाकिस्तानी फौज को घुटनाटेक करवाया और पाकिस्तान के चंगुल से निकलकर बांग्ला देश अस्तित्व में आया। और कोई देश होता तो उस एहसान को कभी नहीं भुलाता ।  लेकिन मुस्लिम कट्टरता के चलते वहाँ भारत विरोधी बीज अंकुरित होने लगे। वर्तमान स्थिति ये है कि जिस पाकिस्तान ने बांग्ला देश पर अत्याचार की पराकाष्ठा की थी वहाँ के मुस्लिम संगठनों द्वारा उसके साथ मिलकर हिंदुओं का दमन किया जा रहा है।  1971 के संकट के दौरान बांग्ला देश के करोड़ों लोग भारत में बतौर शरणार्थी आये और यहीं के होकर रह गए। उनकी तीसरी पीढ़ी यहाँ बसी हुई है जिनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। यदि बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो  रहे अत्याचार की प्रतिक्रियास्वरूप बांग्ला देशी मुसलमानों के विरुद्ध आक्रोश भड़क जाए तब भी क्या हमारे यहाँ के मुस्लिम संगठन मौन साधे रहेंगे ? आश्चर्य इस बात का है कि शरणार्थी बनकर आये बांग्ला देशियों की औलादें भी उनके मूल देश में हिंदुओं के साथ हो रही हैवानियत पर निर्विकार बनी हुई  हैं जबकि उनके माता - पिता भी ऐसी ही प्रताड़ना के कारण अपना वतन छोड़ने मजबूर हुए थे। बांग्ला देश में चल रही भारत विरोधी मुहिम का उद्देश्य  दरअसल हिंदुओं को देश छोड़ने के लिए मजबूर करना है। ऐसे में बांग्ला देशी शरणार्थियों के नाम मतदाता सूचियों से हटाकर सरकारी योजनाओं  के लाभ से वंचित करने का फैसला सरकार करे तब मुसलमानों को उसका विरोध नहीं करना चाहिये। लोकसभा चुनाव में वोट जिहाद का नारा उछालकर  भाजपा को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर फूले नहीं समा रहे मुस्लिम  धर्मगुरुओं को समझ में आ जाना चाहिए कि बंटेंगे तो कटेंगे का भाव वोट जिहाद की ही प्रतिक्रिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 December 2024

बैंकों द्वारा शुल्कों के रूप में लूट पर लगाम लगाए रिजर्व बैंक

किंग आधुनिक अर्थव्यवस्था की जान है। इसके बिना लेन - देन की कल्पना नहीं की जा सकती। पहले बैंकों का काम केवल जमा राशि पर ब्याज देना और व्यवसायिक ऋणों पर ब्याज वसूलना होता था किंतु 1969 में श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा राष्ट्रीयकरण किये जाने के बाद से उनकी भूमिका बदल गई और वे  सामाजिक दायित्वों से भी जुड़ गए । इसमें दो मत नहीं है कि  उस कदम से बैंकों और आम जनता के बीच की दूरी कम हुई। गरीबों के लिए अनुदान प्राप्त ऋण व्यवस्था निश्चित तौर पर क्रांतिकारी सोच थी। इसके अलावा छोटे - छोटे कस्बों तक में बैंक की शाखाएं खोली गईं। यद्यपि इन योजनाओं के कारण बैंकिंग क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बीज भी अंकुरित होने लगे। लेकिन कोई भी सरकार इस बारे में कदम पीछे खींचने का साहस नहीं कर सकी और इस तरह राष्ट्रीयकृत बैंक सरकारी नीतियों को लागू करने के माध्यम बनते चले गए। इसके बाद जब पी. वी. नरसिम्हा राव की सत्ता आई और डाॅ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बनाये गए तब देश में आर्थिक सुधारों की जो बयार बही उसने बैंकिंग क्षेत्र की तस्वीर बदलकर रख दी। राष्ट्रीयकरण की अवधारणा को किनारे रखते हुए निजी क्षेत्र के बैंकों को लाइसेंस दिये जाने लगे। इसका प्रभाव ऋण वितरण में सरलता के रूप में सामने आया। बैंक और बाजार एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करने में जुट गए। निजी आवश्यकताओं के लिए ऋण की उपलब्धता ने उपभोक्तावाद को जन्म  दिया। लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि व्यवसायिक ऋणों के अलावा वाहन, गृह निर्माण, शिक्षा आदि के लिए भी ऋण सुलभता से मिलने से समाज के मध्यमवर्ग का जीवन स्तर  भी उठने लगा। 10 साल पहले नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही गरीबों के जनधन खाते खोलने की योजना शुरू हुई तब उसे व्यर्थ की उठापटक माना गया क्योंकि बिना एक भी रुपया जमा किये खाता खोलने का औचित्य समझ से परे था । लेकिन जल्द ही जनधन खातों का उद्देश्य स्पष्ट हो गया क्योंकि सरकारी योजनाओं से गरीबों को मिलने वाली आर्थिक सहायता इन खातों में जमा की जाने लगी। डायरेक्ट ट्रांसफर नामक इस प्रणाली ने भ्रष्टाचार को रोकने का चमत्कारिक काम किया। कोरोना काल में ये तरीका बेहद कारगर साबित हुआ। इसमें दो मत नहीं है कि आज भारत का बैंकिंग ढांचा वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से खड़ा हुआ है और ये भी कि अब वह शहरों और कस्बों से निकलकर ग्रामीण अंचलों तक फैल चुका है। सबसे बड़ी बात हुई तकनीक का उपयोग करते हुए बैंकिंग को आसान बनाने का। एटीएम से शुरू होकर बात नेट बैंकिंग तक आ चुकी है। लेकिन इसकी आड़ में बैंकों ने ग्राहकों पर विभिन्न सेवाओं के लिए जो शुल्क थोपना शुरू किया वह अनुचित और असहनीय है। आज ही रिजर्व बैंक ने घोषणा की कि 6.5  फीसदी ब्याज दर जारी रहेगी। इससे ऋणों का  भुगतान करने वालों को मासिक किश्त में वृद्धि नहीं होगी। उद्योग - व्यवसाय भी इससे राहत अनुभव करेंगे। जिसका तत्काल प्रभाव शेयर बाजार में आई उछाल से मिल गया। हालांकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों का अनुमान था कि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कमी करेगा किंतु उसने उसे यथावत ही रखा। लेकिन देश के केन्द्रीय बैंक को ये भी देखना चाहिए कि बैंकों का मुनाफा जिस मात्रा में बढ़ता जा रहा है उसके मद्देनजर उन्हें सेवा एवं अन्य कार्यों हेतु लिए जाने वाले शुल्कों में यथोचित कमी करनी चाहिए। निजी क्षेत्र के बैंक यदि ग्राहकों से अनाप - शनाप शुल्क वसूलते हैं तो बात इसलिए समझ में आती है क्योंकि उनका उद्देश्य किसी भी तरह से लाभ बटोरना है किंतु सरकारी बैंक मुनाफा बढ़ाने के फेर में ग्राहकों पर जबरन का भार बढ़ाएं उसका औचित्य किसी भी दृष्टि  से सिद्ध नहीं किया जा सकता। ये बात गले से नहीं उतरती कि एक तरफ तो सरकार आम आदमी की बेहतरी के लिए बैंकों को माध्यम बना रही है किंतु वे ग्राहकों के साथ निजी सूदखोरों की तरह पेश आते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि संसद और उसके बाहर जनता के हितों  का ढोल पीटने वाले राजनीतिक नेता भी बैंकों द्वारा थोपे जाने वाले जबरिया शुल्कों के बारे में कुछ नहीं बोलते। इसी तरह उपभोक्ताओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन भी  उदासीन हैं। सरकार बैंकों में जो निजी डायरेक्टर नियुक्त करती है उनका दायित्व बैंक के साथ ही ग्राहकों के हितों का संरक्षण भी है किंतु वे उन्हें मिलने वाली सुविधाओं के वजन से दबे रहते हैं। ये सब देखते हुए बैंकों द्वारा लगाए जाने वाले शुल्कों के विरुद्ध भी आंदोलन होना चाहिए। अन्यथा ग्राहकों से की जाने वाली लूट बढ़ती ही जाएगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 December 2024

देश का पश्चिमी हिस्सा भाजपा का गढ़ बना


आखिरकार महाराष्ट्र में अनिश्चितता खत्म हो गई और भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बन रहे हैं। ढाई साल पहले शिवसेना टूटने पर जब उद्धव ठाकरे सरकार का पतन हुआ तब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने  शिवसेना छोड़कर आये एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री और देवेंद्र को उपमुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया जबकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी। और मुख्यमंत्री पद को लेकर ही उसकी उद्धव ठ से खटपट इतनी बढ़ी कि वे  कांग्रेस और शरद पवार की गोद में बैठकर मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन भाजपा शांत नहीं बैठी और उसने पहले शिवसेना में विभाजन करवाकर उद्धव को सत्ता से हटवाकर सरकार बनाई और कुछ समय बाद ही अजीत पवार को भी अपने पाले में खींचकर शरद पवार की राकांपा के भी दो टुकड़े करवा दिये। यद्यपि 2019 के चुनाव के बाद भी अजीत ने सुबह - सुबह देवेंद्र के साथ उपमुख्यमंत्री की शपथ ली किंतु शाम होते तक चाचा शरद पवार ने उनको घर लौटने बाध्य कर दिया। उस कदम से श्री फड़नवीस की काफी किरकिरी भी हुई। उनको सत्ता का लालची और अपरिपक्व तक कहा गया। हालांकि शिंदे सरकार में  उनके और अजीत के उप मुख्यमंत्री होने से महायुति  ने अच्छा काम कर दिखाया। लेकिन लोकसभा  चुनाव में महाराष्ट्र की जनता ने एनडीए की बजाय इंडिया गठबंधन को ज्यादा सीटें देकर  तगड़ा झटका दिया। अजीत  गुट को सबसे  ज्यादा घाटा हुआ परंतु शिंदे की शिवसेना को पर्याप्त सफलता मिली। उस परिणाम से लगा मानो शिंदे सरकार जिस प्रकार बनी उसी तरह चली भी जायेगी। अजीत की पत्नी के बारामती में शरद पवार की बेटी से बुरी तरह पराजित होने के बाद तो ये संभावना व्यक्त की जाने लगी कि पवार परिवार फिर एकजुट हो जायेगा। विधानसभा  के समय अजीत के चाचा की शरण में चले जाने की खबरें लगातार आती रहीं। उनको डर था कि यदि ये चुनाव भी हारे तो  भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। भाजपा से जुड़ने के कारण उनका मुस्लिम वोट बैंक भी छिटक गया। टूट - फूट की आशंका तो शिंदे की पार्टी में भी थी किंतु वैसा कुछ नहीं हुआ। महायुति के तीनों बड़े घटक मिलकर लड़े और भावी मुख्यमंत्री के बारे में किसी भी विवाद को पैदा नहीं होने दिया। दूसरी तरफ महा विकास अगाड़ी में सीटों के बंटवारे के साथ ही मुख्यमंत्री के चेहरे पर खींचातानी बनी रही। चुनाव विश्लेषक लोकसभा चुनाव के परिणाम विधानसभा चुनाव में दोहराए जाने के प्रति आश्वस्त थे। मराठा आरक्षण के मुद्दे को शिंदे सरकार के लिए खतरा बताने के साथ ही विदर्भ में भाजपा के लिए गड्ढा होने के दावे हो रहे थे किंतु सभी आशंकाएँ हवा  - हवाई होकर रह गईं। महायुति को ऐतिहासिक बहुमत हासिल होने से राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई। मुख्यमंत्री शिंदे ने उद्धव ठाकरे से शिवसेना की विरासत पूरी तरह छीन ली। वहीं अजीत ने लोकसभा चुनाव के उलट शानदार प्रदर्शन करते हुए चाचा शरद पवार की राजनीतिक पारी पर पूर्ण विराम लगा दिया। ज्यादातर लोगों ने महायुति की शानदार जीत का श्रेय  लाड़की बहन नामक योजना को दिया किंतु  धीमे स्वर में ही सही लेकिन शरद पवार ने बटेंगे तो कटेंगे के नारे को बाजी पलटने वाला बताते हुए हिंदू ध्रुवीकरण को स्वीकार किया। कुछ लोगों ने एक मुस्लिम धर्मगुरु द्वारा मुस्लिम मतदाताओं से किये गए  वोट जिहाद के आह्वान को महा विकास अगाड़ी की दुर्गति के लिए कसूरवार ठहराया। हार - जीत के कारणों का विश्लेषण सभी अपने - अपने नजरिये से करेंगे किंतु डेढ़ हफ्ते की जद्दोजहद के बाद श्री फड़नवीस के मुख्यमंत्री  और श्री शिंदे और अजीत के उपमुख्यमंत्री बनने के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार और उद्धव ठाकरे का आभामंडल फीका पड़ने की शुरुआत हो गई है। इसका पहला कारण तो उनके उत्तराधिकारी क्रमशः  सुप्रिया सुले और आदित्य ठाकरे में नेतृत्व क्षमता का अभाव  है और दूसरा उन दोनों का स्वास्थ्य इस लायक नहीं है कि अब वे मैदान में उतरकर संघर्ष करते हुए पार्टी को दोबारा खड़ा कर सकें। ऐसे में बड़ी बात नहीं उनके जो विधायक और सांसद हैं , वे भी भविष्य में श्री शिंदे और अजीत के साथ जुड़ जाएं। सबसे बड़ी बात ये होगी कि भाजपा पहली बार महाराष्ट्र की राजनीति को अपनी योजना के अनुसार संचालित करने में सक्षम हुई है। श्री फड़नवीस युवा होने के बावजूद काफी अनुभवी हैं। महापौर और विधायक के बाद मुख्यमंत्री पद का उनको पर्याप्त अनुभव है। भाजपा संगठन पर अच्छी पकड़ के साथ ही रास्वसंघ का समर्थन भी उनको हासिल है। लेकिन सबसे बड़ी बात वे  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की पसंद हैं। हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्धता होने से उन्हें भाजपा के भावी राष्ट्रीय नेतृत्व में स्थान मिलने की पूरी - पूरी संभावना है। गोवा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, म.प्र , गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में  सरकारें होने से देश का पश्चिमी हिस्सा भाजपामय हो गया है। राष्ट्रवादी राजनीति के लिए ये बहुत ही शुभ संकेत है। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र में महायुति की सरकार का भारी -  भरकम बहुमत के साथ सत्ता में आना खतरे का संकेत है। शरद पवार ने राँकापा बनाकर उसकी जड़ें पहले ही कमजोर कर दी थीं। रही - सही  कसर उद्धव ठाकरे के साथ गठजोड़ ने पूरी कर दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी