Monday, 16 December 2024

ईवीएम पर कांग्रेस की बखिया उधेड़ दी उमर ने


विगत सप्ताह संविधान पर हुई चर्चा के दौरान लोकसभा में  कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने वैसे तो काफी बातें कहीं किंतु उन्होंने ईवीएम का विरोध करते हुए चुनौती भरे लहजे में कहा कि मतपत्रों से चुनाव करवा लें तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। अन्य विपक्षी दल भी ईवीएम का उपयोग बन्द करने की मांग करते रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त आपत्तियों को निराधार मानते हुए ईवीएम में गड़बड़ी की किसी भी संभावना से इंकार कर दिया। असल में विपक्ष द्वारा ईवीएम पर किया जाने वाला दोषारोपण पूरी तरह विरोधाभासी है। उदाहरण के लिए जम्मू - कश्मीर और झारखंड में  विपक्ष की जीत उसकी नीतियों में जनता के विश्वास की अभिव्यक्ति है किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र में हार होने पर उसका ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है। महाराष्ट्र में चारों खाने चित्त हुई शिवसेना ( उद्धव ) विधायक  दल के नेता  आदित्य ठाकरे ने अपने विधायकों को शपथ लेने से रोक लिया क्योंकि उन्हें चुनाव परिणाम अविश्वसनीय लग रहे थे लेकिन अगले दिन ही उनकी अकड़ निकल गई और उन्होंने सभी विधायकों सहित शपथ ले ली। राज्य के वरिष्ट नेता शरद पवार को भी इस चुनाव में अकल्पनीय पराजय का सामना करना पड़ा। लेकिन बजाय ईवीएम पर दोष मढ़ने के उन्होंने शिंदे सरकार द्वारा शुरू की गई लाड़की बहन योजना  के साथ - साथ भाजपा के  बटेंगे तो कटेंगे वाले नारे को सत्ता पक्ष की जीत में सहायक बताया। महाराष्ट्र के साथ ही झारखंड में भी चुनाव हुए जहाँ सत्तारूढ़ झामुमो की वापसी हुई जिसका श्रेय मुख्य रूप से महिलाओं को प्रतिमाह दी जाने लाड़ली बहना जैसी योजना को मिला। उसी दौरान हुए उपचुनावों में प्रियंका वायनाड सीट से जीतकर लोकसभा में आईं। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदियों को बड़े अंतर से हराया परंतु  हारे हुए किसी भी प्रत्याशी ने ईवीएम पर संदेह नहीं जताया। इसी तरह जम्मू - कश्मीर और  झारखंड में सरकार बनाने वालों को ईवीएम में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई। हरियाणा और महाराष्ट्र की हार के बाद कांग्रेस  प्रवक्ता ने परिणाम को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया था किंतु  जम्मू - कश्मीर और झारखंड के नतीजों में  उसे भाजपा और नरेंद्र मोदी के प्रभाव में गिरावट नजर आई। कांग्रेस के इसी दोहरे रवैये की जम्मू - कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तीखी आलोचना करते हुए कहा कि जब इसी ईवीएम के इस्तेमाल से संसद में आपके सौ  सदस्य पहुंच जाते हैं और आप  अपनी पार्टी के लिए जीत का जश्न मनाते हैं, तो कुछ महीने बाद पलटकर यह नहीं कह सकते कि हमें ये ईवीएम पसंद नहीं हैं क्योंकि अब चुनाव के परिणाम उस तरह नहीं आ रहे हैं जैसा हम चाहते हैं। उमर ने ये भी कहा कि अगर पार्टियों को मतदान तंत्र पर भरोसा नहीं है तो उन्हें चुनाव नहीं लड़ना चाहिए और  ईवीएम से दिक्कत है, तो उसे लेकर आपका रुख एक समान रहना चाहिए । उल्लेखनीय है उमर की पार्टी का कांग्रेस से चुनावी गठबंधन था। यद्यपि कांग्रेस उनके मंत्रीमंडल में शामिल नहीं हुई लेकिन सरकार को उसका समर्थन जारी है। ऐसे में उनके द्वारा कांग्रेस के ईवीएम विरोध की खुली आलोचना करना साधारण बात नहीं है। इससे ये बात साबित होने लगी है कि कांग्रेस जनता की निगाह में तो गिर ही चुकी है लेकिन अब तो उसके सहयोगी दल भी उसकी रीति - नीति से त्रस्त होकर उससे कन्नी काटने लगे हैं। ममता बेनर्जी द्वारा इंडिया गठबंधन के नेतृत्व में परिवर्तन और खुद उसकी बागडोर संभालने की पेशकश को जिस प्रकार समर्थन मिला उससे राहुल गाँधी की जबरदस्त किरकिरी हुई। अडानी के मुद्दे पर तो वे अलग - थलग पड़े ही किंतु लोकसभा में प्रियंका द्वारा ईवीएम का विरोध किये जाने के बाद बाकी विपक्षी दल तो चुप रहे किंतु उमर अब्दुल्ला ने जिस तरह से कांग्रेस को आईना दिखाया उससे यही लगता है कि सहयोगी दल अब कांग्रेस से पिंड छुड़ाने की तैयारी कर रहे हैं। अब्दुल्ला और गाँधी परिवार के नजदीकी रिश्ते पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। उमर और राहुल में दोस्ती भी है किंतु  उन्होंने ईवीएम को लेकर जिस प्रकार से कांग्रेस की बखिया उधेड़ी उससे लगता है जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव में राहुल के रवैये से उपजी नाराजगी कम होने के बजाय और बढ़ गई है। उमर के बयान में वैसे तो ईवीएम का विरोध करने वाले सभी दलों को लपेटा गया है किंतु मुख्य निशाना कांग्रेस ही है। देखना है कांग्रेस उनकी आलोचना पर क्या प्रतिक्रिया देती है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 December 2024

संविधान का सबसे ज्यादा अपमान तो संसद में होता है


संविधान पर संसद में चल रही बहस के दौरान पक्ष विपक्ष से जो भाषण गत दिवस हुए उनमें ज्यादातर  आरोप - प्रत्यारोप ही सुनने मिले। सत्ता में बैठे लोग कांग्रेस पर संविधान की धज्जियां उड़ाने की तोहमत लगाते रहे वहीं विपक्ष ने मौजूदा सरकार की संविधान में आस्था पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि वह उसकी मूल भावना को नष्ट करने पर आमादा है। लोकसभा चुनाव में संविधान को मुद्दा बनाते हुए विपक्ष ने जो आरोप लगाए थे कमोबेश उनको ही दोहराया गया। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष ने भी ये कहते हुए बचाव किया कि आपातकाल  लगाने और संविधान में मनमाफिक संशोधन करने वाली कांग्रेस के पास उसकी रक्षा करने की बात कहने का नैतिक अधिकार नहीं है। जातिगत जनगणना और मतपत्रों से चुनाव करवाने जैसे मुद्दे भी विपक्ष ने उठाये।  आज  प्रधानमंत्री बहस का उत्तर देंगे और उसके बाद संविधान पर चर्चा रूपी कर्मकांड की इतिश्री हो जाएगी। हमेशा की तरह ये बहस भी संसद की कार्यवाही में दर्ज होकर ऐसा इतिहास बन जाएगी जिसे राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी तो क्या खुद सांसद भी पढ़ने में रुचि नहीं लेंगे। संविधान लोकतंत्र की आत्मा होती है जो शासक और नागरिकों को उनके अधिकारों की जानकारी के अलावा कर्तव्यों का भी बोध करवाता है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि हमारे देश में अधिकारों के प्रति तो जरूरत से ज्यादा ही जागरूकता है किंतु जहाँ जिम्मेदार होने की आवश्यकता होती है वहाँ वे लोग भी बेपरवाह नजर आते हैं जो संविधान की शपथ लेकर लोकतंत्र की रक्षा करने का वचन देते हैं। जो सांसद संविधान को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं वे ही जब सदन को चलने नहीं देते तब वह संविधान का सबसे बड़ा अपमान होता है । जिस संसद ने संविधान बनाया और जिसके पास उसमें परिवर्तन या संशोधन का अधिकार है जब उसी के भीतर संविधान प्रदत्त संसदीय प्रक्रिया बाधित की जाती है तब वह संविधान का सबसे बड़ा अनादर है।  संसदीय लोकतंत्र में परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। आजादी के बाद के  20 - 25 वर्षों तक तो संसद में अच्छी परंपराएं बनीं  और उनका पालन भी ईमानदारी से हुआ। लेकिन धीरे - धीरे संसद की गरिमा के साथ जो खिलवाड़ शुरू हुआ वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। संसद के इस सत्र में जो सांसद संविधान की शान में कसीदे पढ़ते देखे गये वे ही सदन को नहीं चलने देने में आगे - आगे रहे। सोचने वाली बात ये है कि संसद की बैठकें आखिर होती किसलिए हैं ?   सत्र की शुरुआत में ही लोकसभाध्यक्ष सर्वदलीय बैठक आमंत्रित कर सत्ता और विपक्ष दोनों के विचार जान लेते हैं जिससे सदन सुचारु रूप से संचालित हो किंतु  सत्र शुरू होते ही हंगामा देखने मिलता है। विपक्ष के एक - दो नेता मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाली कहावत चरितार्थ करते हुए समूची प्रक्रिया पर हावी हो जाते हैं। मुट्ठी भर सांसद  गर्भगृह में आकर जनता के धन से चलने वाली कार्यवाही को रोके रहते हैं और  पूरा का पूरा दिन होहल्ले की बलि चढ़ जाता है। सदन में कुछ देर आने मात्र से सांसद हजारों रुपये के भत्ते के  हकदार बन जाते हैं। आज तक एक भी सांसद ऐसा नहीं हुआ जिसने सदन नहीं चलने पर अपना दैनिक बैठक भत्ता लेने से इंकार किया हो। ये कहने में कुछ भी अनुचित नहीं है कि बिना काम किये भरपूर पारिश्रमिक लेने की जो परिपाटी हमारे सांसदों द्वारा  स्थापित कर दी गई  अब वही जनता में भी देखने मिलती है। संविधान सभा में शामिल विभूतियों ने जो संविधान हमें सौंपा उसके प्रति आज के सांसदों में ही जब आदर भाव नहीं है तब आम जनता से उनके द्वारा उसकी अपेक्षा करने  का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यही कारण है कि देश भर में कानून की धज्जियां उड़ाने का दुस्साहस तेजी से होने लगा है। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करने में लोग नहीं हिचकिचाते। आज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी भी संविधान पर चल रही चर्चा में भाग ले रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का क्या जवाब है कि इस सत्र का अधिकांश समय अडाणी मुद्दे पर बहस की बेतुकी मांग को लेकर नष्ट करने के बाद वे किस मुँह से संविधान की रक्षा पर बोलेंगे?  सवाल सत्ता पक्ष से भी कम नहीं हैं लेकिन विपक्ष के  लिए तो संसद सबसे सशक्त माध्यम होता है अपनी बात रखने का। ऐसे में सदन को बाधित कर वह अपने संवैधानिक दायित्व से ही मुँह चुराता है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें निःसंदेह बहुत गहरी हैं किंतु संसद और सांसदों  के प्रति जनता के मन में सम्मान क्यों घटता जा रहा है इस पर भी सांसदों को विचार करना चाहिए । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 December 2024

संभल पर छाती पीटने वाले झाँसी की घटना पर मुंह में दही जमाए बैठे हैं

उ.प्र के झांसी शहर में दो दिन पूर्व एक मदरसा शिक्षक के यहाँ एन .आई .ए ( राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) का दल  ए. टी. एस (आतंकवाद निरोधी दस्ते)  के साथ  पहुंचा। मुफ्ती खालिद नदवी नामक उक्त शिक्षक विदेशी छात्रों को ऑन लाइन मदरसा शिक्षा देता है। उसे मिलने वाली विदेशी फंडिंग की जाँच की जानी थी। जाँच दल लंबी पूछताछ के बाद जब उनको हिरासत में  लेकर मदरसे से बाहर निकला तो वहाँ मौजूद मुसलमानों की भीड़ ने उनको घेर लिया और गिरफ्तारी का विरोध करते हुए मुफ्ती को छुड़ाकर नजदीकी मस्जिद में ले गए। इसी दौरान मस्जिद के लाउड स्पीकर से लोगों को वहाँ आने के लिए कहा गया और देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में बुर्का पहनी हुई महिलाएं जाँच दल के सामने आकर जमा हो गईं। उधर कुछ युवक एन. आई. ए के लोगों से बहस कर मुफ्ती के विरुद्ध सबूत मांगते रहे। स्थिति बेकाबू होते देख स्थानीय पुलिस भी मौके पर आ गई। काफी देर तक चली बहस के बाद अंततः मुफ्ती को आगे पूछताछ हेतु झांसी पुलिस लाइन ले जाया गया। एन. आई. ए को शक है कि मुफ्ती ऑन लाइन शिक्षा के माध्यम से जो विदेशी धन प्राप्त करता है वह आतँकवादी संगठनों से आता है। इस तरह की छापेमारी देश के अनेक हिस्सों में की जा चुकी है। लेकिन झांसी की घटना ने जाँच एजेंसियों की सुरक्षा के साथ ही मुस्लिम समाज में कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने के दुस्साहस  का पर्दाफाश किया है। उल्लेखनीय है कुछ दिनों पूर्व उ.प्र के ही संभल नगर में न्यायालय के निर्देश पर स्थानीय जामा मस्जिद में की जा रही खुदाई के विरोध में मुस्लिम समुदाय की भीड़ ने उपद्रव कर दिया। पुलिस बल पर पथराव भी हुआ और जब गोली चलने पर कुछ लोग मारे गए तब विपक्षी पार्टियों के नेता संभल जाकर घड़ियाली  आँसू बहाने का नाटक करने में जुट गए। संसद तक में संभल प्रकरण के जरिये ये प्रचारित करने का प्रयास हुआ कि राज्य की योगी सरकार मुसलमानों के प्रति अनुदार है। लेकिन जब मुसलमानों की भीड़ द्वारा की गई पत्थरबाजी की बात की गई तो  जवाब में कहा गया कि पत्थर ही तो मारे थे। गौरतलब है कश्मीर घाटी में आतंकवादियों को घेरने गए सुरक्षा बलों पर भी वहाँ के युवक और यहाँ तक कि महिलाएं भी पत्थरबाजी किया करती थीं। धीरे - धीरे ये तरीका पूरे देश के मुसलमानों ने अपना लिया। धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नेता हिंदुओं से तो सहिष्णुता की अपेक्षा करते हैं किंतु मुस्लिम समाज द्वारा कानून व्यवस्था के विरुद्ध किये जाने वाले हर कृत्य को अनदेखा किया जाता है। यदि पुलिस और प्रशासन  कुछ कारवाई करता भी है तो उसे कटघरे में खड़ा करने का अभियान शुरू हो जाता है। लोकसभा चुनाव में संविधान खतरे में है, का दुष्प्रचार कर जो भ्रम फैलाया गया उसकी वजह से विपक्षी दलों को कुछ सीटें ज्यादा मिल गईं। उसके बाद से मुस्लिम समुदाय की उद्दंडता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। देश के अनेक हिस्सों से इस आशय की खबरें आने लगीं जिनमें मुस्लिम लोग  पुलिस और प्रशासन के विरुद्ध  खड़े होकर कानून को चुनौती देते दिखे। संभल में जो हुआ उसमें विपक्ष के एकपक्षीय रवैये ने मुस्लिम समुदाय को कानून तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जिसकी परिणिती झांसी की घटना के रूप में सामने आई। जिस मुफ्ती पर एन. आई. ए ने  दबिश दी वह शहर काजी का भतीजा है। इससे यह स्पष्ट है कि जो भीड़ एकत्र हुई उसमें उनकी भूमिका भी रही होगी। जिस मामले में मुफ्ती की जाँच करने  एन. आई. ए का दल पहुंचा था उसके तार अनेक आतंकवादी संगठनों से जुड़े होने का संदेह है। चूंकि मुफ्ती द्वारा ऑन लाइन  शिक्षा विदेशी छात्रों को दी जाती है , इसलिये विदेशी धन का लेन - देन भी जाँच का विषय है। यदि वे पूरी तरह निर्दोष हैं तब उनको गिरफ्तारी से रोकने मस्जिदों से लाउड स्पीकर पर लोगों को बुलाकर जाँच एजेंसी के लोगों को आतंकित करने का क्या औचित्य था? विशेष रूप से बुर्का धारी महिलाओं का मुफ्ती के बचाव में दीवार बनकर खड़े हो जाना मामले को और भी रहस्यमय बना देता है। कुल मिलाकर ये एक गंभीर घटना है। संभल के बाद झांसी में मुस्लिम समुदाय का कानून के पालन में बाधा उत्पन्न करना राष्ट्रविरोधी ताकतों द्वारा किसी नये प्रयोग का हिस्सा लगता है। इसके पहले कि ये दुस्साहस आम हो जाए इसे सख्ती से कुचलना होगा। झाँसी की घटना के बाद विपक्ष के किसी भी नेता ने उन्मादी मुस्लिमों की निंदा करने का साहस नहीं दिखाया। अखिलेश यादव और राहुल गाँधी जैसे नेता संभल कांड पर तो खूब हल्ला मचाते रहे किंतु झाँसी में एन. आई. ए के दल को भीड़ द्वारा घेर लिए जाने के बारे में उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकलना इस बात का प्रमाण है कि उनका संविधान प्रेम महज ढकोसला है। और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वे मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटे हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 December 2024

घुसपैठियों के विरुद्ध दिल्ली जैसी मुहिम पूरे देश में चलाई जाए


देश की राजधानी दिल्ली में एक मुस्लिम संस्था के प्रतिनिधिमंडल ने उपराज्यपाल से मिलकर अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध कारवाई करने की मांग की। उसका संज्ञान लेते हुए उपराज्यपाल ने प्रशासन और पुलिस को जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया। उसके बाद से राजधानी के विभिन्न इलाकों में घुसपैठियों की पतासाजी शुरू हुई। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार ये घुसपैठिये फर्जी दस्तावेज बनवाकर देश के विभिन्न स्थानों में फ़ैल गए हैं। ज्यादातर ये मुस्लिम बस्तियों में रहना पसंद करते हैं क्योंकि वहाँ इन्हें संरक्षण और सहायता मिल जाती है। छोटे शहरों में तो इनकी पहिचान उजागर हो भी जाती है किंतु बड़े शहरों विशेष रूप से महानगरों में ये आसानी से डेरा जमा लेते हैं। फुटपाथों के अलावा खाली पड़ी जगहों पर अवैध कब्जा कर रहने वाले इन घुसपैठियों में से अनेक किराये का मकान भी ले लेते हैं। आजकल मध्यमवर्गीय  परिवारों में भी घरेलू कार्यों हेतु नौकर / नौकरानी रखने का चलन बढ़ता जा रहा है। बांग्लादेशी महिलाओं और पुरुषों के लिए ये रोजगार का बड़ा जरिया है। उनके बच्चे भी घरों में काम पा जाते हैं। इसके अलावा निर्माण कार्यों में भी बांग्ला देशी श्रमिकों का उपयोग होता है।  आपराधिक गतिविधियों में भी इनकी संलग्नता साबित होती रही है। विशेष रूप से रोहिंग्या घुसपैठिये तो अपनी आपराधिक  प्रवृत्ति के लिए कुख्यात हैं और इसी वजह से उनको म्यांमार से खदेड़ा गया। ये समस्या इतनी गंभीर इसलिए हुई क्योंकि हमारे देश की राजनीति में चुनावी जीत के लिए देशहित को उपेक्षित करने में संकोच नहीं किया जाता। ये चिंता का विषय है कि देश के अनेक सीमावर्ती इलाकों में बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की बस्तियाँ हैं। इनके आधार और राशन कार्ड बनवाने में कतिपय राजनीतिक पार्टियों के साथ ही भ्रष्ट प्रशासनिक अमले की भी भूमिका रहती है। देश के अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में ये घुसपैठिये जीत - हार का फैसला करने में सक्षम हो गए हैं। इसका परिणाम ये है कि वहाँ से कोई गैर मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीत ही नहीं सकता। 1971 में बांग्ला देश से आये शरणार्थियों को वापस भेजने का समझौता तत्कालीन शेख मुजीब सरकार के साथ हुआ था किंतु उस पर अमल नहीं हो सका। इसका कारण वोट बैंक की राजनीति और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ही रहा। सीमा पर तैनात सुरक्षा बल के लोगों पर भी घुसपैठ करवाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि इन घुसपैठियों की पहिचान कर इनको वापस भेजे जाने की कार्य योजना कई बार बनी किंतु परिणाम शून्य ही रहा। बांग्ला देश में  बीते कुछ महीनों से हिंदुओं के साथ जो अमानुषिक  व्यवहार हो रहा है उससे भारत में काफी नाराजगी है    और लोग घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।  असम और त्रिपुरा की राज्य सरकारों ने तो बांग्लादेशियों पर तमाम प्रतिबंध लगा दिये हैं। देश की राजधानी में भी ऐसी ही पहल हुई किंतु हमेशा की तरह इसमें भी राजनीति शुरू हो गई। दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के बाद दूसरे सबसे बड़े नेता मनीष सिसौदिया ने उपराज्यपाल के निर्देश पर अवैध बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की जांच तथा धरपकड़  का विरोध शुरू कर दिया। लेकिन इस कार्रवाई से ये बात उजागर हो गई कि दिल्ली पुलिस के पास इस बात की कोई पुख्ता जानकारी नहीं है कि देश की राजधानी में कितने घुसपैठिये अवैध रूप से रह रहे हैं। अतीत में एक - दो बार ऐसी ही मुहिम चलाकर तकरीबन 50 हजार बांग्ला देशी उनके देश भेजे गए थे। लेकिन वह अभियान क्यों रुक गया इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। बहरहाल  नये सिरे से शुरुआत हो ही गई है तब केंद्र सरकार को चाहिए वह सभी राज्यों को दिल्ली जैसी कार्रवाई करने का निर्देश दे। यदि युद्धस्तर पर इसकी मुहिम छेड़ी जाए तो जनता भी इसमें खुलकर सहयोग देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। बांग्ला देश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहे हैं उन्हें वहाँ की अंतरिम सरकार अपना आंतरिक मसला बताकर भारत की आपत्तियों को नजरंदाज कर देती है। ये देखते हुए हमें भी बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की पहचान करते हुए उन्हें निकाल बाहर करने के लिए हरसंभव कदम उठाने चाहिए। इस बारे में ये अच्छा संकेत है कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी जो बांग्ला देशी घुसपैठियों को वापस भेजने का विरोध करती आई हैं, वे भी इन दिनों केंद्र सरकार के निर्णयों के साथ खड़े रहने जैसे बयान दे रही हैं। ऐसे में  यदि सभी राज्य दिल्ली जैसी मुहिम छेड़ दें तो उसका असर बांग्ला देश पर पड़े बिना नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 December 2024

संसद नहीं चलने से विपक्ष नुकसान में रहता है


संसद का शीतकालीन सत्र 20 दिसंबर तक चलेगा। अब तक इसमें किसी भी दिन पूरे समय  एक भी सदन में कामकाज नहीं हुआ। सत्र के पहले लोकसभाध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए सहयोग मांगते हैं। जिसमें सभी दलों के नेता आश्वासन देते हैं कि वे जो भी कार्यसूची संसदीय कार्य मंत्रालय तैयार करता है उस पर बहस करेंगे। सरकार कुछ विधेयक भी हर सत्र मे पेश करती है। इन सबके अलावा देश और दुनिया में हो रही घटनाओं पर भी  चर्चा की जाती है। इस सत्र के पूर्व भी  सर्वदलीय बैठक में  सत्र के विधिवत संचालन  हेतु विभिन्न दलों  ने सहमति व्यक्त की थी। लेकिन  पहले दिन ही हमेशा की तरह हंगामा शुरू हो गया । पहला सप्ताह बेकार चले जाने के बाद लोकसभाध्यक्ष के साथ दोबारा हुई बैठक में सभी दलों के प्रतिनिधियों ने एक बार फिर सदन को बिना रुकावट के चलाने का वायदा किया किंतु कार्यवाही शुरू होते ही होहल्ले की वजह से सदन स्थगित किया जाता रहा।  विपक्ष कुछ मुद्दों को लेकर आक्रामक है। शुरुआत में  सत्ता पक्ष रक्षात्मक प्रतीत हुआ किंतु बाद में उसकी ओर से भी जवाबी हमला होने लगा। राहुल गाँधी के पास अदाणी नामक एकमात्र मुद्दा है जिससे विपक्ष की अनेक पार्टियां दूरी बनाये हुए हैं। इसी बीच महाराष्ट्र में हुई करारी हार को लेकर इंडिया गठबंधन में खींचातानी शुरू हो गई जब ममता बेनर्जी ने गठबंधन का नेतृत्व ग्रहण करने की पेशकश करते हुए राहुल गाँधी को निशाना बनाया। आश्चर्य तब हुआ जब उनके बयान को गठबंधन के अनेक बड़े नेताओं का समर्थन मिलने लगा। अदाणी का विरोध करने से भी अनेक विपक्षी पार्टियों ने इंकार कर दिया जिससे राहुल अकेले नजर आने लगे। इस सबसे भाजपा को हमलावर होने का अवसर मिल गया और उसकी तरफ से राहुल और उनकी माँ सोनिया गाँधी पर भारत विरोधी विदेशी संगठनों के साथ संगामित्ति का आरोप लगाया गया जिसके कारण सदन का वातावरण और तनावपूर्ण हो गया। उधर राज्यसभा में सभापति जगदीप धनखड़ के विरुद्ध अविश्वास पेश के जरिये विपक्ष सरकार पर दबाव बनाने का दाँव चल रहा है। स्मरणीय है उपराष्ट्रपति ही उच्च सदन के सभापति होते हैं। यद्यपि उस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना न के बराबर है किंतु ऐसा करके विपक्ष अपने भीतर आने लगे बिखराव को रोकने का प्रयास करेगा। कुल मिलाकर जो लग रहा है उसके अनुसार ये  सत्र भी  हंगामे के बीच खत्म हो जाएगा। पिछले सत्र में सरकार ने जो वक्फ संशोधन विधेयक  जेपीसी के पास भेजा था उसकी रिपोर्ट इस सत्र में प्रतीक्षित थी किंतु सरकार ने उसे आगामी सत्र के लिए टाल दिया। अब वह एक देश एक चुनाव संबंधी विधेयक लाने जा रही है और उसे भी जेपीसी  गठित कर उसके जिम्मे कर दिया जाएगा। इन दोनों विषयों पर सत्ता पक्ष पूरे देश में विमर्श के जरिये जनता का समर्थन हासिल करने में लगा हुआ है। वक्फ द्वारा नई संपत्तियों पर दावा करने सम्बन्धी विवादों की खबरों के कारण उस विधेयक के पक्ष में जन समर्थन जुटाने में सरकार सफल लग रही है। ऐसी ही रणनीति एक देश एक चुनाव के बारे में भी  है। दुर्भाग्य से विपक्ष इसे  समझ नहीं पा रहा । फिलहाल संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की अच्छी खासी संख्या है। ऐसे में उसे सदन के संचालन में ज्यादा रुचि लेना चाहिए। लेकिन राहुल गाँधी अपनी जिद पूरे विपक्ष पर लादकर खुद को आकर्षण का केंद्र बनाना चाहते हैं। वहीं  लोकसभा में  नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद  पूरे विपक्ष का विश्वास अर्जित करने में उनकी विफलता का लाभ उठाकर सत्ता पक्ष भी सदन को चलाने के प्रति अपेक्षित रुचि नहीं दिखाता। हालांकि हंगामे के बीच सरकार जरूरी विधायी कार्य पूरे करवा लेती है। ये भी देखने आया है कि सदन यदि  कुछ समय चलता भी है तो दोनों पक्षों के बीच आरोपों और प्रत्यारोपों में ही पूरा समय नष्ट हो जाता है। लोकतंत्र में  आस्था रखने वाले जिम्मेदार किस्म के लोग तो संसद की ये दशा देखकर दुखी होते हैं किंतु संसदीय प्रजातंत्र की रक्षा का दायित्व जिन सांसदों पर है उन्हें लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा की लेश मात्र भी फिक्र नहीं है। संसद का बहुमूल्य समय नष्ट करने के लिए सत्ता और विपक्ष दोनों एक दूसरे पर आरोप मढ़ते हैं किंतु कमोबेश दोनों ही इसके दोषी हैं। लेकिन विपक्ष के लिए संसद ही वह मंच है जिसके जरिये वह पूरे देश तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इसलिए बजाय सरकार और सभापति पर आरोप लगाते रहने के विपक्ष को सदन सुचारु रूप से चलाने की पहल करना चाहिए क्योंकि इसी में उसका फायदा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 December 2024

एक ही मुद्दे से चिपके रहना राहुल के लिए नुकसानदेह


राजनीति में कब कौन किसके साथ हो जाए और कौन साथ छोड़ दे कहना मुश्किल है। लोकसभा चुनाव मिलकर लड़े इंडिया गठबंधन में नजर आ रही  दरारें इसकी पुष्टि करती हैं। संसद का शीत कालीन सत्र शुरू होने के पहले महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद विपक्षी गठजोड़ में जो  टूटन शुरू हुई वह बढ़ती ही जा रही है। गठबंधन के अनेक नेता खुलकर कांग्रेस पर हमले कर रहे हैं। नेतृत्व बदलने की मांग को मिल रहे समर्थन से ये बात साबित हो रही है। इसके पीछे एक तरफ तो हरियाणा और महाराष्ट्र में हुई हार है किंतु दूसरी तरफ अदाणी समूह को लेकर राहुल गाँधी का बचकाना रवैया भी है। अमेरिका से हुए कुछ खुलासों के आधार पर वे अदाणी पर चौतरफा हमला कर रहे हैं किंतु अभी तक उनके हाथ ऐसा कुछ भी नहीं लग सका जिसके बल पर वे उक्त समूह को अपराधी साबित कर सकें। और उसी की खीझ में वे अब जो तरीके अपना रहे हैं वे सतही सोच का प्रतीक हैं । प्रधानमंत्री के साथ अदाणी की भागीदारी का आरोप लगाते हुए चोर शब्द का इस्तेमाल कर श्री गाँधी ने दिखा दिया कि उनमें गलतियों से सीखने की बुद्धिमत्ता का अभाव है। स्मरणीय है 2019 के लोकसभा चुनाव में  उन्होंने चौकीदार चोर के नारे अपनी सभाओं में लगवाए थे किंतु जनता ने नरेंद्र मोदी को और भी ज्यादा सीटें देकर दोबारा सत्ता में बिठा दिया। पिछले कुछ सालों से वे अदाणी समूह की आड़ लेकर  प्रधानमंत्री की घेराबंदी करने में  जुटे हैं किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ये मुद्दा बेअसर रहा। हालांकि श्री मोदी स्पष्ट बहुमत से चूक गए लेकिन उसका कारण अदाणी मुद्दा न होकर अन्य बातें रहीं। उनके इस अड़ियलपन से इंडिया गठजोड़ के अन्य दलों में भी नाराजगी है। कुछ तो खुलकर उसे जाहिर भी कर चुके हैं। संसद में गत सप्ताह कांग्रेस द्वारा अदाणी के विरोध में हुए प्रदर्शन से सपा, तृणमूल और एनसीपी ( शरद) द्वारा दूरी बनाया जाना इसका प्रमाण है। गठबंधन के अनेक साथी दलों द्वारा कांग्रेस से दूर रहने का जो संकेत दिया जा रहा है उसके पीछे अदाणी मुद्दे पर श्री गाँधी की हठधर्मिता के अलावा गाँधी परिवार का संबंध उन विदेशी संस्थानों के साथ जुड़ने का आरोप  है जो भारत में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने में जुटे  हैं। जिस दिन से राहुल की अगुआई में प्रधानमंत्री को चोर कहा गया उसी के बाद से भाजपा  सांसदों ने संसद में सोनिया गाँधी और उनके परिवार pr भारत विरोधी विदेशी संस्थानों से निकटता का आरोप लगाना शुरू कर दिया। जिसका कांग्रेस तो ये कहकर खंडन कर रही है कि सत्ता पक्ष अदाणी विवाद से लोगों का ध्यान हटाने ये आरोप लगा रहा है। लेकिन गाँधी परिवार ने उक्त आरोपों पर मुँह नहीं खोला। इंडिया गठबंधन के साथी भी इस बात से भयभीत हैं कि कहीं  वे  गाँधी परिवार पर भाजपा द्वारा किये जा रहे हमले की लपेट में न आ जाएं। यही कारण है कि अदाणी मुद्दे पर जहाँ राहुल अकेले नजर आ रहे हैं वहीं भाजपा द्वारा लगाए गए आरोपों से बचाव में भी गठबंधन के सहयोगी पूरी तरह उदासीन हैं।  विपक्ष में होने के नाते श्री गाँधी सरकार को घेरने के लिए आगे आएं ये स्वाभाविक है किंतु एक ही मुद्दे में उलझे रहने से ऐसा लगता है जैसे वे पूर्वाग्रह से ग्रसित हों। और ये भी कि जब देश और दुनिया के सामने बड़ी - बड़ी समस्याएं सिर उठा रही हों तब बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गाँधी का कर्तव्य है कि वे संसद और उसके बाहर उन विषयों पर अपना और कांग्रेस का रुख स्पष्ट करें। लेकिन वे अदाणी से चिपककर खुद को कुए का मेढ़क साबित कर रहे हैं।   इस बारे में रोचक बात ये है कि भाजपा विरोधी कुछ यू ट्यूबर पत्रकार ये शिगूफा छोड़ने लगे हैं कि इंडिया  गठबंधन के कुछ दलों ने हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम के बहाने कांग्रेस पर जो हमला बोला है उसके पीछे गौतम अदाणी ही हैं। सही बात तो ये है कि अदाणी कभी भी गठबंधन का साझा मुद्दा रहा ही नहीं। शरद पवार और ममता बेनर्जी तो हिँडनबर्ग खुलासे के समय ही राहुल द्वारा जेपीसी जांच की मांग के विरोध में खड़े हो गए थे। श्री पवार  ने तो गौतम अदाणी से निजी बातचीत के बाद उनके पाक - साफ होने का दावा भी कर दिया। लेकिन श्री गाँधी  लगातार अदाणी और श्री मोदी की निकटता के नाम पर राजनीति करते आ रहे हैं। लेकिन जब ये आरोप लगता है कि अशोक गहलोत और भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री रहते हुए क्रमशः राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अदाणी समूह की कंपनियों को बड़े - बड़े ठेके दिये तब श्री गाँधी जवाब देने से बचते हैं। गत दिवस उनके बहनोई रॉबर्ट वाड्रा के साथ भी गौतम अदाणी का चित्र भाजपा ने जारी कर राहुल से उन दोनों के रिश्तों पर स्पष्टीकरण मांगा है। कुल मिलाकर ये लगता है कि अदाणी मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरने का दांव उल्टे श्री गाँधी के लिए मुसीबत बन गया है। चूंकि अभी तक इस बारे में वे कुछ भी ठोस तथ्य सामने नहीं रख सके इसलिए उनकी विश्वसनीयता भी दिनों -  दिन कम हो रही है। और जब उनके सहयोगी दल ही उनसे सहमत नहीं हैं तब जनता उनकी बात को सच मानेगी इसमें संदेह ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 9 December 2024

इंडिया गठबंधन में राहुल को नेता स्वीकार करने में हिचक

रियाणा की हार के बाद ही इंडिया गठबंधन के अनेक सदस्यों ने कांग्रेस पर हमला शुरू कर दिया था। शिवसेना (उद्धव ) के मुखपत्र सामना में राहुल गाँधी के नेतृत्व पर सवाल उठाये गए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को अकेले चुनाव जीतने में अक्षम बता डाला। दरअसल हरियाणा में उनको कांग्रेस ने एक भी सीट नहीं दी थी। उसी खुन्नस में उ.प्र के 9 विधानसभा उपचुनावों में सपा ने सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को इतना परेशान किया कि उसने खीझकर चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया। उधर महाराष्ट्र में सपा, दबाव बनाती रही लेकिन उसे इच्छानुसार सीटें नहीं मिलीं। चुनाव में शरद पवार, उद्धव ठाकरे और नाना पटोले की तिकड़ी चारों खाने चित्त हो गई। कांग्रेस ने तो इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया । चूंकि इंडिया गठबंधन के तीनों बड़े घटक बुरी तरह हारे इसलिए बलि के बकरे की तलाश शुरू हुई। इस उलझन को दूर कर दिया प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने ये कहते हुए कि इंडिया गठबंधन का नेतृत्व उसे ठीक से नहीं चला रहा। ये गठबंधन उन्होंने बनाया है और मौका मिले तो वे उसका नेतृत्व करने तैयार हैं।  उनके बयान का उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत ने समर्थन करते हुए कोलकाता जाकर उनसे चर्चा करने की बात भी कह डाली। उधर सपा नेता उदयवीर सिंह ने भी इसी आशय का बयान देकर सनसनी मचा दी। इसी बीच राजद की ओर से बयान आया कि इंडिया का गठन तो लालू प्रसाद यादव ने किया था। विपक्षी दलों में खटास लोकसभा  के भीतर भी देखने मिली जब अखिलेश यादव की सीट राहुल गाँधी से दूर कर दी गई जिस पर तंज कसते हुए उन्होंने धन्यवाद कांग्रेस कहा। महाराष्ट्र में शरद पवार तो ज्यादा नहीं बोल रहे किंतु उद्धव ठाकरे के खेमे से कांग्रेस पर हमला जारी है। उधर सपा नेता अबू आजमी ने शिवसेना ( उद्धव ) के नेता मिलिंद नार्वेकर  द्वारा 6 दिसंबर को बाबरी ढांचा गिराए जाने की वर्षगांठ पर सोशल मीडिया में की गई पोस्ट से नाराज होकर महा विकास अगाड़ी से नाता तोड़ने की घोषणा की तो जवाब में आदित्य ठाकरे  ने सपा को भाजपा की बी टीम बताकर आग में घी डाल दिया। तमिलनाडु में सत्तासीन द्रमुक  ने  जरूर कांग्रेस के बचाव में उतरते हुए ममता के बयान पर कहा कि वे एक महज क्षेत्रीय पार्टी की नेता हैं । लेकिन शरद पवार की बेटी सांसद सुप्रिया सुले ने  ये कहकर कांग्रेस को झटका दिया कि ममता यदि बड़ी जिम्मेदारी लेती हैं तो उन्हें खुशी होगी। बंगाल की मुख्यमंत्री ने  जो हमला किया उसमें किसी का नाम तो नहीं था किंतु राजनीति की  समझ रखने वाले जानते हैं कि उनका निशाना राहुल गाँधी पर ही है , जो गठबंधन के अघोषित नेता बने हुए थे। लोकसभा  चुनाव में 99 सीटें जीतकर कांग्रेस निश्चित रूप से विपक्ष की मुखिया नजर आने लगी। और फिर राहुल के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने से उसकी चौधराहट ज़ाहिर तौर पर बढ़ी  जो अन्य घटक दलों को नागवार गुजर रही है। सही बात बात ये है कि इंडिया गठजोड़ में कांग्रेस के पीछे चलने पर किसी को आपत्ति नहीं है किंतु राहुल को नेता मानने  की मनःस्थिति नहीं होना विवाद की वजह है। उल्लेखनीय है ममता तो गठबंधन के अस्तित्व में  आने के पहले से ही राहुल को कमजोर नेता बताते हुए खुद को नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में सक्षम बताती आई हैं। इंडिया गठजोड़ में शामिल होने के बाद भी उन्होंने प. बंगाल में कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल नहींं किया और राहुल की भारत जोड़ो न्याय यात्रा से भी दूर रहीं।  कुल मिलाकर हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम ने राहुल गाँधी की वजनदारी  कम कर दी। अदाणी मुद्दे पर भी ममता, शरद पवार और अखिलेश ने उनका साथ नहीं दिया। असल में आने वाले ज्यादातर राज्य विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों का बोलबाला है जो कांग्रेस को किसी भी तरह से ताकतवर होते नहीं देखना चाहेंगे। वैसे भी इंडिया गठबन्धन  लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की वापसी रोकने बना था। सैद्धांतिक आधार न होने से इसका विधिवत ढांचा खड़ा नहीं हो पाया। हालांकि जून के बाद हुए चार राज्यों के चुनावों में भाजपा को  जम्मू - कश्मीर और झारखंड में  हार का मुँह देखना पड़ा किंतु जीत का श्रेय कांग्रेस की बजाय क्रमशः नेशनल काँफ्रेंस और झारखंड मुक्ति मोर्चा लूट ले गए। इसीलिए  राहुल को उपेक्षित करने की मुहिम शुरू हो गई। यद्यपि इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि विपक्षी एकता पूरी तरह कृत्रिम थी जिसमें परस्पर विश्वास का अभाव था। होना तो ये चाहिए था कि लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद कांग्रेस द्वारा गठबंधन के सभी दलों को बुलाकर विपक्षी एकता को सुदृढ़ किया जाता। लेकिन नेता प्रतिपक्ष बनकर राहुल आत्ममुग्ध हो गए और उनकी प्राथमिकता पार्टी की बजाय प्रियंका वाड्रा को लोकसभा में लाना  हो गई। जम्मू - कश्मीर के चुनाव में उमर अब्दुल्ला तो राहुल द्वारा सही तरीके से प्रचार न किये जाने पर सार्वजनिक रूप से गुस्सा जता ही चुके थे। महाराष्ट्र में भी ये चर्चा होती रही कि वे प्रियंका के क्षेत्र वायनाड में ज्यादा घूमे। इन सब बातों से लगता है विपक्षी एकता का ये प्रयोग भी निष्फल होने जा रहा है जिसका ठीकरा राहुल के सिर फूटेगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी