Thursday, 19 December 2024

नेहरू जी की महत्वाकांक्षा के लिए डाॅ. आंबेडकर को उपेक्षित किया गया


संसद में संविधान के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष चर्चा  विवाद में उलझकर रह गई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने संविधान के साथ मनुस्मृति की पुस्तक सदन में लहराकर आरोप लगाया कि भाजपा संविधान की बजाय मनुस्मृति का सम्मान करती है। बीते काफी समय से वे जातिगत जनगणना की मांग करते आ रहे हैं और सरकार को ये धौंस भी देते हैं कि वे ऐसा करवाकर रहेंगे। लोकसभा चुनाव में दलित मतदाताओं को ये कहकर भाजपा से दूर करने में कुछ हद तक कांग्रेस सफल रही थी कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी आरक्षण समाप्त कर देंगे। लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनाव में वह प्रचार बेअसर रहा । जबरदस्त पराजय के बाद जब राहुल के विरुद्ध इंडिया गठबंधन में ही आवाजें उठने लगीं तब उन्हें चिंता हुई और इसीलिए वे संविधान के साथ मनुस्मृति को मुद्दा बनाकर भाजपा को  दलित विरोधी  सिद्ध करने में जुट गए। लेकिन  लंबे समय से सांसद रहने के बावजूद भी श्री गाँधी में अपेक्षित गंभीरता का अभाव है। भाजपा पर मनुस्मृति समर्थक होने का आरोप लगाते समय वे भूल गए कि  कुछ साल पहले ही उनकी पार्टी के वरिष्ट नेता रणदीप सुरजवाला ने पत्रकार वार्ता बुलाकर ये प्रचारित किया कि राहुल सारस्वत ब्राह्मण हैं और जनेऊ  भी धारण करते हैं। उसके बाद श्री गाँधी हिन्दू मंदिरों और मठों के चक्कर भी लगाते नजर आने लगे। कैलाश - मानसरोवर की यात्रा पर भी गए। उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा ने भी यही दिखावा किया जो  हिन्दू समुदाय में भाजपा की पैठ को कम करने करने के लिए बनाई गई रणनीति थी। विशेष रूप से जनेऊ धारी ब्राह्मण होने का दावा उच्च जातियों में भाजपा के जनाधार में सेंध लगाना था। लेकिन जब श्री गाँधी को लगा कि उनका वह दाँव भी काम नहीं आया तब  जातिगत जनगणना का बाजा बजाने लगे। लेकिन यहाँ भी वे गच्चा खा गए क्योंकि कर्नाटक में उनकी ही पार्टी की सरकार  अपने  पिछले कार्यकाल में करवाई गई जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने का साहस नहीं बटोर पा रही। ऐसे में संसद में संविधान पर चर्चा के दौरान उनके मनुस्मृति लेकर खड़े होने का औचित्य उन्हीं की पार्टी के लोग समझ नहीं पा रहे। बीते दो दिनों से आंबेडकर जी को लेकर जो आरोप - प्रत्यारोप संसद में चल रहे हैं उनको लेकर भी कांग्रेस पूरी तरह घिर गई। भले ही गृहमंत्री अमित शाह के बयान को लेकर वह आक्रामक  हो लेकिन डाॅ. आंबेडकर के जीवनकाल में  उनके प्रति कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेताओं का जो उपेक्षाभाव था वह जैसे ही उजागर हुआ पार्टी को  मुँह छिपाने में दिक्कत होने लगी। संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करने वाले बाबा साहब को पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र क्यों देना पड़ा और बाद में उनको लोकसभा चुनाव में हरवाने के लिए कांग्रेस ने क्या - क्या किया ये इतिहास में मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है। बाबा साहेब ने आरक्षण और  धारा 370 का प्रावधान अस्थायी रखा था। हिन्दू विवाह और उत्तराधिकार अधिनियम को लेकर उनके नेहरू जी से मतभेद खुलकर सामने आ चुके थे। सही बात तो ये है कि महात्मा गाँधी के नेहरू प्रेम  ने जिन सक्षम और सुयोग्य नेताओं को उपेक्षित किया उनमें आंबेडकर जी भी थे। सही मायने में वे राजनेता न होकर समाजशास्त्री थे जिनके मन में हिन्दू समाज में व्याप्त बुराई को दूर करने की इच्छा थी। अछूतोद्धार  का जो अभियान गाँधी जी ने चलाया उसे आगे ले जाने के लिए डाॅ. आंबेडकर ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति होते  किंतु कांग्रेस में उनको लेकर अदृश्य भय था जिसकी परिणिति उनको पहले सरकार और फिर संसद से बाहर करने के रूप में हुई। वरना अपने समकालीन नेताओं में वे सबसे अधिक शिक्षित और सुयोग्य थे। सही बात तो ये है कि नेहरू जी की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और डाॅ. आंबेडकर जैसी अनेक विभूतियों को दरकिनार किया गया। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी पंडित नेहरू ने अपने लिए चुनौती बन सकने वाले हर शख्स के पर कतर दिये। डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को दोबारा राष्ट्रपति बनाने मैं क्या - क्या रुकावटें आईं ये नई पीढ़ी को जानना चाहिये। जब संसद में प्रधानमंत्री श्री मोदी सहित  अन्य सांसदों ने कांग्रेस की सरकारों द्वारा बाबा साहेब के अपमान का खुलासा किया तब उसका जवाब देने के बजाय मनुस्मृति को मुद्दा बनाया जा रहा है जिसकी प्रासंगिकता समझ से परे है। आज राहुल और प्रियंका नीले कपड़ों में संसद पहुंचे ये जताने के लिए कि उनकी बाबा साहब में कितनी आस्था है। लेकिन बसपा के झंडे के रंग वाले कपड़े पहिनकर न तो भाई - बहिन दलित वर्ग को आकर्षित कर पाएंगे और न ही कांग्रेस के दामन से डाॅ. आंबेडकर के अपमान का दाग मिटेगा। कांग्रेस के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि उसकी सरकारों ने संविधान निर्माता कहे जाने वाले बाबा साहेब को भारत रत्न देने के योग्य क्यों नहीं समझा जबकि पंडित नेहरू और इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए ही खुद को इस अलंकरण से अलंकृत करवा लिया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 December 2024

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम मुसलमानों के लिए सबक हैं


उ.प्र के संभल शहर की जामा मस्ज़िद में अदालत के आदेश पर हो रहे सर्वेक्षण को रोकने  मुस्लिम समुदाय द्वारा पत्थरबाजी  के बाद पुलिस द्वारा आत्मरक्षार्थ  किये गोली चालन में कुछ मुस्लिमों की मौत को कांग्रेस और सपा ने राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। नेताओं में संभल जाकर घड़ियाली आँसू बहाने की होड़ भी लगी। संसद में भी संभल कांड को उठाते हुए केंद्र और उ.प्र सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने का दांव चला गया। लेकिन  मस्ज़िद के पास कुछ ऐसे हिन्दू मंदिर मिल गए जिनको इस तरह से छिपा दिया गया कि किसी को  वे नजर नहीं आयें। संभल के जिलाधिकारियों ने उनकी साफ - सफाई करवाकर पूजा शुरू करवाई। जो जानकारियां आ रही हैं उनके अनुसार उन मंदिरों के इलाके में कभी हिन्दू आबादी भी रहा करती थी किंतु सांप्रदायिक दंगों के बाद असुरक्षा के चलते उन्होंने अन्यत्र ठिकाने बना लिए और उन मंदिरों तक उनका आना - जाना बन्द हो गया। संभल के मुस्लिम सांसद सपा के हैं। उनके पिता भी लम्बे समय तक लोकसभा सदस्य रहे।  जिस मंदिर को प्रशासन द्वारा खोजा गया वह सांसद निवास से बेहद करीब है किंतु बात - बात में धर्मनिरपेक्षता और गंगा - जमुनी संस्कृति की दुहाई देने वाले सांसद और और उनके मरहूम अब्बा ने कभी भी उस मंदिर के बारे में किसी को मालूम नहीं होने दिया। कहते हैं मस्ज़िद में  बिजली चोरी रोकने गए दस्ते की कारवाई के दौरान मंदिर का पता चला। मुस्लिम तुष्टीकरण की दुकान चलाने वाले इस बात को प्रचारित करने में जुटे हैं कि उक्त मंदिर कई दशकों से हिंदुओं की अनदेखी के कारण उपेक्षित थे। लेकिन जैसा देखने में आया मंदिरों को चारों तरफ से अतिक्रमणों  से घेरने के साथ ही उन पर  मिट्टी डालकर पूरी तरह नजरों से दूर कर दिया गया। अपने धर्म स्थल के प्रति लापरवाह हो जाने के लिए संभल के हिन्दू भी कम दोषी नहीं हैं किंतु वहाँ के दिवंगत सांसद सहित अन्य प्रमुख मुस्लिमों का क्या ये फर्ज नहीं था कि वे हिंदुओं की आस्था के उस स्थान को घेरने के बजाय उसके मूल स्वरूप को बना रहने देते और खुद होकर उसके रखरखाव पर ध्यान देते।  उल्लेखनीय है देश में सैकड़ों ऐसी दरगाह और मजारें हैं जहाँ हिन्दू बड़ी संख्या में न सिर्फ जाते अपितु उनकी देखरेख में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। मोहर्रम में सवारी रखने वाले हिंदुओं की भी बड़ी संख्या है किंतु इस सौजन्यता के प्रत्युत्तर में मुस्लिम समाज का रवैया बेहद निराशाजनक है।  मुल्ला - मौलवी अपने समुदाय को इस हेतु प्रेरित करने के बजाय निरुत्साहित करते हैं। और यही समस्या की जड़ है। भारत धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ सभी को अपने धर्म का पालन करने की सुविधा है। मुसलमानों के अलावा भी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन उनका हिंदुओं के साथ उस तरह का विवाद नहीं होता जैसा मुस्लिमों के साथ आम है। संभल प्रकरण पर उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में पूछा कि वहाँ अब तक जितने दंगे हुए उनमें  मारे गए सैकड़ों हिंदुओं के घावों पर मरहम लगाने कितने लोग गए ? संभल के बड़े उद्योगपति हिन्दू परिवार के कई सदस्यों की दंगों में हत्या के बाद बचे हुए लोग शहर छोड़कर जाने मजबूर हो गए। ऐसी स्थितियाँ देश के अनेक हिस्सों में निर्मित हुई । इससे ये सवाल उठ खड़ा होता है कि किसी इलाके के मुस्लिम बहुल होते ही वहाँ हिंदुओं के पलायन की परिस्थितियाँ क्यों बन जाती हैं जबकि हिन्दू बहुमत वाले क्षेत्र में मुस्लिम बेखौफ रहते हैं। दरअसल मुस्लिम समाज को मुख्य धारा से अलग करने में मुल्ला - मौलवियों  का  जितना हाथ है उतना ही वोट बैंक के सौदागर राजनेताओं का भी है। मुसलमान अपने आर्थिक और शैक्षणिक पिछ्डेपन का रोना तो रोते हैं किंतु उससे बाहर निकलने का साहस भी उनमें नहीं है। वरना संभल में हिन्दू मंदिरों को इस तरह से छिपाने का और क्या उद्देश्य हो सकता था? 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद मुस्लिम समुदाय में कानून तोड़ने के प्रति जरूरत से ज्यादा उत्साह आ गया है। संभल के बाद झाँसी में एन.आई.ए के दल को घेरकर मुसलमान मुफ्ती को छुड़ाने की घटना इसका उदाहरण है। हिंदुओं के धार्मिक जुलूसों पर पथराव की वारदातें भी बढ़ी हैं। लेकिन हिंदुओं की कट्टरता पर छाती पीटने वाले मुसलमानों की धर्मांधता पर आँखें मूँदकर संभल और झाँसी जैसी स्थिति पैदा करने में सहायक बनते हैं। दुर्भाग्य से मुस्लिम युवा भी कठमुल्लेपन के शिकंजे से बाहर आने तैयार नहीं दिखते। हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव परिणाम मुस्लिम समुदाय के लिए ये सबक है कि टकराव और अलगाव उनके लिए नुकसानदेह है। मुसलमान जब तक कुछ दलों के बंधुआ बने रहेंगे तब तक उनकी तरक्की की कोई संभावना नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 17 December 2024

राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे के लौटने की संभावना बन रही


लगता है राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे का पुनर्गठन होने जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस  से दूरी बनाकर रखने वाली क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा तीसरी ताकत के रूप में सत्ता का संतुलन अपने हाथ में रखने का जो प्रयोग नब्बे के दशक में शुरू हुआ उसने भारतीय राजनीति की चाल, चरित्र और चेहरे को पूरी तरह बदलकर रख दिया था। 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गाँधी की सत्ता चली जाने के बाद भाजपा और वाम दलों के बाहरी समर्थन से बनी जनता दल की  सरकार के प्रधानमंत्री का चयन बेहद नाटकीय तरीके से हुआ जब चौधरी देवीलाल का नाम तय होने के बाद  विश्वनाथ प्रताप सिंह की ताजपोशी हो गई। राजीव सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर कांग्रेस से बाहर आये श्री सिंह जल्द ही लालू प्रसाद, मुलायम सिंह और शरद यादव के शिकंजे में फंस गए । इन तीनों ने उनसे मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करवाकर  ओबीसी  को 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करवा दिया। उसके बाद भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के जरिये  राम मंदिर आंदोलन छेड़ दिया। रथ यात्रा को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने रोका तो भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन बैठे किंतु उनकी गति भी चौधरी चरण सिंह जैसी हुई। लोकसभा के मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई किंतु उसके बीच ही राजीव गाँधी की हत्या हो गई। कांग्रेस सत्ता में तो आई किंतु उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा। पी. वी. नरसिम्हा राव  प्रधानमंत्री बने जिन्होंने मंडल और मंदिर जैसे मुद्दों की काट के तौर पर आर्थिक सुधारों को लागू कर दिया। उनकी सरकार वैसे तो पाँच साल चली किंतु 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ा दल बना और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने किंतु बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें 13 दिन में ही हटना पड़ा। लोकसभा त्रिशंकु थी और कांग्रेस को कोई समर्थन देने राजी न था। ऐसे में फिर एक प्रयोग हुआ संयुक्त मोर्चे के नाम पर जिसमें कांग्रेस और वाम दलों ने एच. डी. देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनवा दिया जो जनता दल के थे। पहली बार वामपंथी भी सरकार में शामिल हुए। लेकिन वह सरकार भी कांग्रेस ने जल्द गिरवा दी जिसके बाद उसी रचना के तहत इंदर कुमार गुजराल की ताजपोशी हुई। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष  सीताराम केसरी ने उनको भी जल्द भूतपूर्व बना दिया। 1998 में देश को फिर लोकसभा चुनाव झेलना पड़ा किंतु इस बार भाजपा ज्यादा ताकत से लौटी और अटल जी दूसरी बार सत्ता में आये किंतु 13 माह में जयललिता ने वह सरकार गिरवा दी। 1999 में लोकसभा चुनाव होने के दौरान ही कारगिल युद्ध हो गया। उसमें भारत ने जीत हासिल की जिसका लाभ लेकर भाजपा फिर सबसे अधिक सीटें जीतने में सफल रही और अटल जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। इस बार बदलाव ये हुआ कि जनता दल में टूट हुई और कुछ पुराने समाजवादियों ने एनडीए नामक मोर्चे में शामिल होकर भाजपा के साथ सत्ता में भागीदारी की। जिनमें जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव,  राम विलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे चेहरे थे। वह सरकार पूरे समय चली। बीच में गुजरात दंगों के कारण पासवान अलग हो गए। लेकिन बाकी भाजपा के साथ बने रहे। वाजपेयी जी एक सफल प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित हो चुके थे किंतु 2004 के चुनाव में कांग्रेस बड़ी पार्टी बनी और डाॅ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने । भाजपा को रोकने के लिए वामपंथियों ने भी उनकी सरकार को टेका लगा दिया। अनेक गैर कांग्रेसी नेता उस सरकार से जुड़कर सत्ता सुख लूटने लगे। संयुक्त मोर्चा , यूपीए बन गया। कुछ विपक्षी एनडीए में ही रहे। पुराने समाजवादियों के बिखराव ने तीसरे मोर्चे को अप्रासंगिक बना दिया। लालू, शरद, नीतीश, पासवान, देवगौड़ा सभी ने पार्टियां बना लीं। 2009 में मनमोहन सरकार फिर बनी और कांग्रेस के सांसद भी बढ़े। सरकार ने कार्यकाल पूरा भी किया किंतु गाँधी परिवार के हस्तक्षेप ने मनमोहन की छवि कमजोर प्रधानमंत्री की बना दी। ऊपर से भ्रष्टाचार के मामलों ने सरकार को बदनाम कर दिया। 2014 में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। यूपीए में शामिल कुछ नेता भाजपा के साथ आ गए जिनमें पासवान प्रमुख थे। लेकिन तीसरा मोर्चा की राजनीति की बजाय एनडीए और यूपीए ही छाए रहे।  2019 में मोदी ने पहले से ज्यादा  सफलता हासिल की। 2024 के चुनाव के पहले यूपीए का नया नामकरण इंडिया किया गया जो भाजपा विरोधी तमाम दलों का गठजोड़ था। उसने जोर तो बहुत लगाया किंतु भाजपा को बहुमत की देहलीज पर रोकने के बाद भी वह मोदी को नहीं रोक पाया। हालांकि कांग्रेस 99 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल हो गई और राहुल बड़े नेता के रूप में उभरे। लेकिन बीते छह माह में हुए विधानसभा चुनावों में हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा की प्रचण्ड जीत ने इंडिया गठबंधन में दरारें पैदा कर दीं। राहुल के नेतृत्व को अन्य घटक दलों से चुनौती मिलने लगी। उसके बाद अडाणी मुद्दे पर कांग्रेस अलग - थलग पड़ी और अब ईवीएम के विरोध  पर उमर अब्दुल्ला के बाद ममता बेनर्जी के भतीजे अभिषेक ने कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया। अचानक ये महसूस होने लगा कि इंडिया में शामिल अनेक पार्टियां कांग्रेस का साथ छोड़ने की फिराक में हैं। ममता, उद्धव, लालू, उमर, अखिलेश आदि जो तेवर दिखा रहे हैं उनसे लगता है वे संसद में कांग्रेस की ताकत बढ़ने से चिंतित हैं और खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। जो संकेत हैं उनके मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र के बाद इंडिया गठबंधन में विभाजन होगा तथा कुछ क्षेत्रीय पार्टियां तीसरे मोर्चे का गठन करेंगी जिसमें नवीन पटनायक , जगन मोहन रेड्डी और के. चंद्र शेखर राव भी शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस द्वारा राहुल के विरुद्ध बने माहौल पर जिस तरह का ठंडा रुख दिखाया उससे भी सहयोगी नाराज हैं। उन्हें लग रहा है कि राहुल अपनी नेतागिरी चमकाने में लगे हैं और  घटक दलों से संवाद ही नहीं होता।  ऐसे में 2025 की शुरुआत में विपक्षी राजनीति में बड़ा धमाका होने की संभावना दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 December 2024

ईवीएम पर कांग्रेस की बखिया उधेड़ दी उमर ने


विगत सप्ताह संविधान पर हुई चर्चा के दौरान लोकसभा में  कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने वैसे तो काफी बातें कहीं किंतु उन्होंने ईवीएम का विरोध करते हुए चुनौती भरे लहजे में कहा कि मतपत्रों से चुनाव करवा लें तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। अन्य विपक्षी दल भी ईवीएम का उपयोग बन्द करने की मांग करते रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त आपत्तियों को निराधार मानते हुए ईवीएम में गड़बड़ी की किसी भी संभावना से इंकार कर दिया। असल में विपक्ष द्वारा ईवीएम पर किया जाने वाला दोषारोपण पूरी तरह विरोधाभासी है। उदाहरण के लिए जम्मू - कश्मीर और झारखंड में  विपक्ष की जीत उसकी नीतियों में जनता के विश्वास की अभिव्यक्ति है किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र में हार होने पर उसका ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है। महाराष्ट्र में चारों खाने चित्त हुई शिवसेना ( उद्धव ) विधायक  दल के नेता  आदित्य ठाकरे ने अपने विधायकों को शपथ लेने से रोक लिया क्योंकि उन्हें चुनाव परिणाम अविश्वसनीय लग रहे थे लेकिन अगले दिन ही उनकी अकड़ निकल गई और उन्होंने सभी विधायकों सहित शपथ ले ली। राज्य के वरिष्ट नेता शरद पवार को भी इस चुनाव में अकल्पनीय पराजय का सामना करना पड़ा। लेकिन बजाय ईवीएम पर दोष मढ़ने के उन्होंने शिंदे सरकार द्वारा शुरू की गई लाड़की बहन योजना  के साथ - साथ भाजपा के  बटेंगे तो कटेंगे वाले नारे को सत्ता पक्ष की जीत में सहायक बताया। महाराष्ट्र के साथ ही झारखंड में भी चुनाव हुए जहाँ सत्तारूढ़ झामुमो की वापसी हुई जिसका श्रेय मुख्य रूप से महिलाओं को प्रतिमाह दी जाने लाड़ली बहना जैसी योजना को मिला। उसी दौरान हुए उपचुनावों में प्रियंका वायनाड सीट से जीतकर लोकसभा में आईं। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदियों को बड़े अंतर से हराया परंतु  हारे हुए किसी भी प्रत्याशी ने ईवीएम पर संदेह नहीं जताया। इसी तरह जम्मू - कश्मीर और  झारखंड में सरकार बनाने वालों को ईवीएम में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई। हरियाणा और महाराष्ट्र की हार के बाद कांग्रेस  प्रवक्ता ने परिणाम को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया था किंतु  जम्मू - कश्मीर और झारखंड के नतीजों में  उसे भाजपा और नरेंद्र मोदी के प्रभाव में गिरावट नजर आई। कांग्रेस के इसी दोहरे रवैये की जम्मू - कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तीखी आलोचना करते हुए कहा कि जब इसी ईवीएम के इस्तेमाल से संसद में आपके सौ  सदस्य पहुंच जाते हैं और आप  अपनी पार्टी के लिए जीत का जश्न मनाते हैं, तो कुछ महीने बाद पलटकर यह नहीं कह सकते कि हमें ये ईवीएम पसंद नहीं हैं क्योंकि अब चुनाव के परिणाम उस तरह नहीं आ रहे हैं जैसा हम चाहते हैं। उमर ने ये भी कहा कि अगर पार्टियों को मतदान तंत्र पर भरोसा नहीं है तो उन्हें चुनाव नहीं लड़ना चाहिए और  ईवीएम से दिक्कत है, तो उसे लेकर आपका रुख एक समान रहना चाहिए । उल्लेखनीय है उमर की पार्टी का कांग्रेस से चुनावी गठबंधन था। यद्यपि कांग्रेस उनके मंत्रीमंडल में शामिल नहीं हुई लेकिन सरकार को उसका समर्थन जारी है। ऐसे में उनके द्वारा कांग्रेस के ईवीएम विरोध की खुली आलोचना करना साधारण बात नहीं है। इससे ये बात साबित होने लगी है कि कांग्रेस जनता की निगाह में तो गिर ही चुकी है लेकिन अब तो उसके सहयोगी दल भी उसकी रीति - नीति से त्रस्त होकर उससे कन्नी काटने लगे हैं। ममता बेनर्जी द्वारा इंडिया गठबंधन के नेतृत्व में परिवर्तन और खुद उसकी बागडोर संभालने की पेशकश को जिस प्रकार समर्थन मिला उससे राहुल गाँधी की जबरदस्त किरकिरी हुई। अडानी के मुद्दे पर तो वे अलग - थलग पड़े ही किंतु लोकसभा में प्रियंका द्वारा ईवीएम का विरोध किये जाने के बाद बाकी विपक्षी दल तो चुप रहे किंतु उमर अब्दुल्ला ने जिस तरह से कांग्रेस को आईना दिखाया उससे यही लगता है कि सहयोगी दल अब कांग्रेस से पिंड छुड़ाने की तैयारी कर रहे हैं। अब्दुल्ला और गाँधी परिवार के नजदीकी रिश्ते पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। उमर और राहुल में दोस्ती भी है किंतु  उन्होंने ईवीएम को लेकर जिस प्रकार से कांग्रेस की बखिया उधेड़ी उससे लगता है जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव में राहुल के रवैये से उपजी नाराजगी कम होने के बजाय और बढ़ गई है। उमर के बयान में वैसे तो ईवीएम का विरोध करने वाले सभी दलों को लपेटा गया है किंतु मुख्य निशाना कांग्रेस ही है। देखना है कांग्रेस उनकी आलोचना पर क्या प्रतिक्रिया देती है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 December 2024

संविधान का सबसे ज्यादा अपमान तो संसद में होता है


संविधान पर संसद में चल रही बहस के दौरान पक्ष विपक्ष से जो भाषण गत दिवस हुए उनमें ज्यादातर  आरोप - प्रत्यारोप ही सुनने मिले। सत्ता में बैठे लोग कांग्रेस पर संविधान की धज्जियां उड़ाने की तोहमत लगाते रहे वहीं विपक्ष ने मौजूदा सरकार की संविधान में आस्था पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि वह उसकी मूल भावना को नष्ट करने पर आमादा है। लोकसभा चुनाव में संविधान को मुद्दा बनाते हुए विपक्ष ने जो आरोप लगाए थे कमोबेश उनको ही दोहराया गया। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष ने भी ये कहते हुए बचाव किया कि आपातकाल  लगाने और संविधान में मनमाफिक संशोधन करने वाली कांग्रेस के पास उसकी रक्षा करने की बात कहने का नैतिक अधिकार नहीं है। जातिगत जनगणना और मतपत्रों से चुनाव करवाने जैसे मुद्दे भी विपक्ष ने उठाये।  आज  प्रधानमंत्री बहस का उत्तर देंगे और उसके बाद संविधान पर चर्चा रूपी कर्मकांड की इतिश्री हो जाएगी। हमेशा की तरह ये बहस भी संसद की कार्यवाही में दर्ज होकर ऐसा इतिहास बन जाएगी जिसे राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी तो क्या खुद सांसद भी पढ़ने में रुचि नहीं लेंगे। संविधान लोकतंत्र की आत्मा होती है जो शासक और नागरिकों को उनके अधिकारों की जानकारी के अलावा कर्तव्यों का भी बोध करवाता है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि हमारे देश में अधिकारों के प्रति तो जरूरत से ज्यादा ही जागरूकता है किंतु जहाँ जिम्मेदार होने की आवश्यकता होती है वहाँ वे लोग भी बेपरवाह नजर आते हैं जो संविधान की शपथ लेकर लोकतंत्र की रक्षा करने का वचन देते हैं। जो सांसद संविधान को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं वे ही जब सदन को चलने नहीं देते तब वह संविधान का सबसे बड़ा अपमान होता है । जिस संसद ने संविधान बनाया और जिसके पास उसमें परिवर्तन या संशोधन का अधिकार है जब उसी के भीतर संविधान प्रदत्त संसदीय प्रक्रिया बाधित की जाती है तब वह संविधान का सबसे बड़ा अनादर है।  संसदीय लोकतंत्र में परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। आजादी के बाद के  20 - 25 वर्षों तक तो संसद में अच्छी परंपराएं बनीं  और उनका पालन भी ईमानदारी से हुआ। लेकिन धीरे - धीरे संसद की गरिमा के साथ जो खिलवाड़ शुरू हुआ वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। संसद के इस सत्र में जो सांसद संविधान की शान में कसीदे पढ़ते देखे गये वे ही सदन को नहीं चलने देने में आगे - आगे रहे। सोचने वाली बात ये है कि संसद की बैठकें आखिर होती किसलिए हैं ?   सत्र की शुरुआत में ही लोकसभाध्यक्ष सर्वदलीय बैठक आमंत्रित कर सत्ता और विपक्ष दोनों के विचार जान लेते हैं जिससे सदन सुचारु रूप से संचालित हो किंतु  सत्र शुरू होते ही हंगामा देखने मिलता है। विपक्ष के एक - दो नेता मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाली कहावत चरितार्थ करते हुए समूची प्रक्रिया पर हावी हो जाते हैं। मुट्ठी भर सांसद  गर्भगृह में आकर जनता के धन से चलने वाली कार्यवाही को रोके रहते हैं और  पूरा का पूरा दिन होहल्ले की बलि चढ़ जाता है। सदन में कुछ देर आने मात्र से सांसद हजारों रुपये के भत्ते के  हकदार बन जाते हैं। आज तक एक भी सांसद ऐसा नहीं हुआ जिसने सदन नहीं चलने पर अपना दैनिक बैठक भत्ता लेने से इंकार किया हो। ये कहने में कुछ भी अनुचित नहीं है कि बिना काम किये भरपूर पारिश्रमिक लेने की जो परिपाटी हमारे सांसदों द्वारा  स्थापित कर दी गई  अब वही जनता में भी देखने मिलती है। संविधान सभा में शामिल विभूतियों ने जो संविधान हमें सौंपा उसके प्रति आज के सांसदों में ही जब आदर भाव नहीं है तब आम जनता से उनके द्वारा उसकी अपेक्षा करने  का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यही कारण है कि देश भर में कानून की धज्जियां उड़ाने का दुस्साहस तेजी से होने लगा है। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करने में लोग नहीं हिचकिचाते। आज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी भी संविधान पर चल रही चर्चा में भाग ले रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का क्या जवाब है कि इस सत्र का अधिकांश समय अडाणी मुद्दे पर बहस की बेतुकी मांग को लेकर नष्ट करने के बाद वे किस मुँह से संविधान की रक्षा पर बोलेंगे?  सवाल सत्ता पक्ष से भी कम नहीं हैं लेकिन विपक्ष के  लिए तो संसद सबसे सशक्त माध्यम होता है अपनी बात रखने का। ऐसे में सदन को बाधित कर वह अपने संवैधानिक दायित्व से ही मुँह चुराता है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें निःसंदेह बहुत गहरी हैं किंतु संसद और सांसदों  के प्रति जनता के मन में सम्मान क्यों घटता जा रहा है इस पर भी सांसदों को विचार करना चाहिए । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 December 2024

संभल पर छाती पीटने वाले झाँसी की घटना पर मुंह में दही जमाए बैठे हैं

उ.प्र के झांसी शहर में दो दिन पूर्व एक मदरसा शिक्षक के यहाँ एन .आई .ए ( राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) का दल  ए. टी. एस (आतंकवाद निरोधी दस्ते)  के साथ  पहुंचा। मुफ्ती खालिद नदवी नामक उक्त शिक्षक विदेशी छात्रों को ऑन लाइन मदरसा शिक्षा देता है। उसे मिलने वाली विदेशी फंडिंग की जाँच की जानी थी। जाँच दल लंबी पूछताछ के बाद जब उनको हिरासत में  लेकर मदरसे से बाहर निकला तो वहाँ मौजूद मुसलमानों की भीड़ ने उनको घेर लिया और गिरफ्तारी का विरोध करते हुए मुफ्ती को छुड़ाकर नजदीकी मस्जिद में ले गए। इसी दौरान मस्जिद के लाउड स्पीकर से लोगों को वहाँ आने के लिए कहा गया और देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में बुर्का पहनी हुई महिलाएं जाँच दल के सामने आकर जमा हो गईं। उधर कुछ युवक एन. आई. ए के लोगों से बहस कर मुफ्ती के विरुद्ध सबूत मांगते रहे। स्थिति बेकाबू होते देख स्थानीय पुलिस भी मौके पर आ गई। काफी देर तक चली बहस के बाद अंततः मुफ्ती को आगे पूछताछ हेतु झांसी पुलिस लाइन ले जाया गया। एन. आई. ए को शक है कि मुफ्ती ऑन लाइन शिक्षा के माध्यम से जो विदेशी धन प्राप्त करता है वह आतँकवादी संगठनों से आता है। इस तरह की छापेमारी देश के अनेक हिस्सों में की जा चुकी है। लेकिन झांसी की घटना ने जाँच एजेंसियों की सुरक्षा के साथ ही मुस्लिम समाज में कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने के दुस्साहस  का पर्दाफाश किया है। उल्लेखनीय है कुछ दिनों पूर्व उ.प्र के ही संभल नगर में न्यायालय के निर्देश पर स्थानीय जामा मस्जिद में की जा रही खुदाई के विरोध में मुस्लिम समुदाय की भीड़ ने उपद्रव कर दिया। पुलिस बल पर पथराव भी हुआ और जब गोली चलने पर कुछ लोग मारे गए तब विपक्षी पार्टियों के नेता संभल जाकर घड़ियाली  आँसू बहाने का नाटक करने में जुट गए। संसद तक में संभल प्रकरण के जरिये ये प्रचारित करने का प्रयास हुआ कि राज्य की योगी सरकार मुसलमानों के प्रति अनुदार है। लेकिन जब मुसलमानों की भीड़ द्वारा की गई पत्थरबाजी की बात की गई तो  जवाब में कहा गया कि पत्थर ही तो मारे थे। गौरतलब है कश्मीर घाटी में आतंकवादियों को घेरने गए सुरक्षा बलों पर भी वहाँ के युवक और यहाँ तक कि महिलाएं भी पत्थरबाजी किया करती थीं। धीरे - धीरे ये तरीका पूरे देश के मुसलमानों ने अपना लिया। धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नेता हिंदुओं से तो सहिष्णुता की अपेक्षा करते हैं किंतु मुस्लिम समाज द्वारा कानून व्यवस्था के विरुद्ध किये जाने वाले हर कृत्य को अनदेखा किया जाता है। यदि पुलिस और प्रशासन  कुछ कारवाई करता भी है तो उसे कटघरे में खड़ा करने का अभियान शुरू हो जाता है। लोकसभा चुनाव में संविधान खतरे में है, का दुष्प्रचार कर जो भ्रम फैलाया गया उसकी वजह से विपक्षी दलों को कुछ सीटें ज्यादा मिल गईं। उसके बाद से मुस्लिम समुदाय की उद्दंडता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। देश के अनेक हिस्सों से इस आशय की खबरें आने लगीं जिनमें मुस्लिम लोग  पुलिस और प्रशासन के विरुद्ध  खड़े होकर कानून को चुनौती देते दिखे। संभल में जो हुआ उसमें विपक्ष के एकपक्षीय रवैये ने मुस्लिम समुदाय को कानून तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जिसकी परिणिती झांसी की घटना के रूप में सामने आई। जिस मुफ्ती पर एन. आई. ए ने  दबिश दी वह शहर काजी का भतीजा है। इससे यह स्पष्ट है कि जो भीड़ एकत्र हुई उसमें उनकी भूमिका भी रही होगी। जिस मामले में मुफ्ती की जाँच करने  एन. आई. ए का दल पहुंचा था उसके तार अनेक आतंकवादी संगठनों से जुड़े होने का संदेह है। चूंकि मुफ्ती द्वारा ऑन लाइन  शिक्षा विदेशी छात्रों को दी जाती है , इसलिये विदेशी धन का लेन - देन भी जाँच का विषय है। यदि वे पूरी तरह निर्दोष हैं तब उनको गिरफ्तारी से रोकने मस्जिदों से लाउड स्पीकर पर लोगों को बुलाकर जाँच एजेंसी के लोगों को आतंकित करने का क्या औचित्य था? विशेष रूप से बुर्का धारी महिलाओं का मुफ्ती के बचाव में दीवार बनकर खड़े हो जाना मामले को और भी रहस्यमय बना देता है। कुल मिलाकर ये एक गंभीर घटना है। संभल के बाद झांसी में मुस्लिम समुदाय का कानून के पालन में बाधा उत्पन्न करना राष्ट्रविरोधी ताकतों द्वारा किसी नये प्रयोग का हिस्सा लगता है। इसके पहले कि ये दुस्साहस आम हो जाए इसे सख्ती से कुचलना होगा। झाँसी की घटना के बाद विपक्ष के किसी भी नेता ने उन्मादी मुस्लिमों की निंदा करने का साहस नहीं दिखाया। अखिलेश यादव और राहुल गाँधी जैसे नेता संभल कांड पर तो खूब हल्ला मचाते रहे किंतु झाँसी में एन. आई. ए के दल को भीड़ द्वारा घेर लिए जाने के बारे में उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकलना इस बात का प्रमाण है कि उनका संविधान प्रेम महज ढकोसला है। और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वे मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटे हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 December 2024

घुसपैठियों के विरुद्ध दिल्ली जैसी मुहिम पूरे देश में चलाई जाए


देश की राजधानी दिल्ली में एक मुस्लिम संस्था के प्रतिनिधिमंडल ने उपराज्यपाल से मिलकर अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध कारवाई करने की मांग की। उसका संज्ञान लेते हुए उपराज्यपाल ने प्रशासन और पुलिस को जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया। उसके बाद से राजधानी के विभिन्न इलाकों में घुसपैठियों की पतासाजी शुरू हुई। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार ये घुसपैठिये फर्जी दस्तावेज बनवाकर देश के विभिन्न स्थानों में फ़ैल गए हैं। ज्यादातर ये मुस्लिम बस्तियों में रहना पसंद करते हैं क्योंकि वहाँ इन्हें संरक्षण और सहायता मिल जाती है। छोटे शहरों में तो इनकी पहिचान उजागर हो भी जाती है किंतु बड़े शहरों विशेष रूप से महानगरों में ये आसानी से डेरा जमा लेते हैं। फुटपाथों के अलावा खाली पड़ी जगहों पर अवैध कब्जा कर रहने वाले इन घुसपैठियों में से अनेक किराये का मकान भी ले लेते हैं। आजकल मध्यमवर्गीय  परिवारों में भी घरेलू कार्यों हेतु नौकर / नौकरानी रखने का चलन बढ़ता जा रहा है। बांग्लादेशी महिलाओं और पुरुषों के लिए ये रोजगार का बड़ा जरिया है। उनके बच्चे भी घरों में काम पा जाते हैं। इसके अलावा निर्माण कार्यों में भी बांग्ला देशी श्रमिकों का उपयोग होता है।  आपराधिक गतिविधियों में भी इनकी संलग्नता साबित होती रही है। विशेष रूप से रोहिंग्या घुसपैठिये तो अपनी आपराधिक  प्रवृत्ति के लिए कुख्यात हैं और इसी वजह से उनको म्यांमार से खदेड़ा गया। ये समस्या इतनी गंभीर इसलिए हुई क्योंकि हमारे देश की राजनीति में चुनावी जीत के लिए देशहित को उपेक्षित करने में संकोच नहीं किया जाता। ये चिंता का विषय है कि देश के अनेक सीमावर्ती इलाकों में बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की बस्तियाँ हैं। इनके आधार और राशन कार्ड बनवाने में कतिपय राजनीतिक पार्टियों के साथ ही भ्रष्ट प्रशासनिक अमले की भी भूमिका रहती है। देश के अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में ये घुसपैठिये जीत - हार का फैसला करने में सक्षम हो गए हैं। इसका परिणाम ये है कि वहाँ से कोई गैर मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीत ही नहीं सकता। 1971 में बांग्ला देश से आये शरणार्थियों को वापस भेजने का समझौता तत्कालीन शेख मुजीब सरकार के साथ हुआ था किंतु उस पर अमल नहीं हो सका। इसका कारण वोट बैंक की राजनीति और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ही रहा। सीमा पर तैनात सुरक्षा बल के लोगों पर भी घुसपैठ करवाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि इन घुसपैठियों की पहिचान कर इनको वापस भेजे जाने की कार्य योजना कई बार बनी किंतु परिणाम शून्य ही रहा। बांग्ला देश में  बीते कुछ महीनों से हिंदुओं के साथ जो अमानुषिक  व्यवहार हो रहा है उससे भारत में काफी नाराजगी है    और लोग घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।  असम और त्रिपुरा की राज्य सरकारों ने तो बांग्लादेशियों पर तमाम प्रतिबंध लगा दिये हैं। देश की राजधानी में भी ऐसी ही पहल हुई किंतु हमेशा की तरह इसमें भी राजनीति शुरू हो गई। दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के बाद दूसरे सबसे बड़े नेता मनीष सिसौदिया ने उपराज्यपाल के निर्देश पर अवैध बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की जांच तथा धरपकड़  का विरोध शुरू कर दिया। लेकिन इस कार्रवाई से ये बात उजागर हो गई कि दिल्ली पुलिस के पास इस बात की कोई पुख्ता जानकारी नहीं है कि देश की राजधानी में कितने घुसपैठिये अवैध रूप से रह रहे हैं। अतीत में एक - दो बार ऐसी ही मुहिम चलाकर तकरीबन 50 हजार बांग्ला देशी उनके देश भेजे गए थे। लेकिन वह अभियान क्यों रुक गया इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। बहरहाल  नये सिरे से शुरुआत हो ही गई है तब केंद्र सरकार को चाहिए वह सभी राज्यों को दिल्ली जैसी कार्रवाई करने का निर्देश दे। यदि युद्धस्तर पर इसकी मुहिम छेड़ी जाए तो जनता भी इसमें खुलकर सहयोग देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। बांग्ला देश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहे हैं उन्हें वहाँ की अंतरिम सरकार अपना आंतरिक मसला बताकर भारत की आपत्तियों को नजरंदाज कर देती है। ये देखते हुए हमें भी बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की पहचान करते हुए उन्हें निकाल बाहर करने के लिए हरसंभव कदम उठाने चाहिए। इस बारे में ये अच्छा संकेत है कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी जो बांग्ला देशी घुसपैठियों को वापस भेजने का विरोध करती आई हैं, वे भी इन दिनों केंद्र सरकार के निर्णयों के साथ खड़े रहने जैसे बयान दे रही हैं। ऐसे में  यदि सभी राज्य दिल्ली जैसी मुहिम छेड़ दें तो उसका असर बांग्ला देश पर पड़े बिना नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी