Tuesday, 24 December 2024

परिवहन विभाग और भ्रष्टाचार एक दूसरे के समानार्थी हैं


म.प्र में भ्रष्टाचार का बड़ा प्रकरण चर्चा में है। आधा क्विंटल सोना, करोड़ों की नगद राशि और बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज बरामद हो चुके हैं। एक डायरी भी मिली जिसमें कतिपय नेताओं और अधिकारियों से जुड़े लेन - देन का ब्यौरा बताया जा रहा है। लोकायुक्त और आयकर के बाद अब ईडी भी उस मामले से जुड़ गई है। सबसे बड़ी बात ये है कि इतने बड़े घोटाले का कर्ताधर्ता परिवहन विभाग का एक अदना सा पूर्व आरक्षक है जिसने  अनुकंपा नियुक्ति के जरिये नौकरी प्राप्त करने के बाद बहुत ही कम समय में करोड़ों  - अरबों का वह साम्राज्य खड़ा कर  दिया जो  किसी भी शासकीय कर्मचारी के लिए सपने में भी असंभव है। सौरभ शर्मा नामक उक्त आरक्षक का  मित्र चेतन गौर भी इस कांड में शामिल है जिसके नाम से वह पूरा कारोबार करता था। फ़िलहाल सौरभ दुबई में बताया जाता है जहाँ  से उसके प्रत्यर्पण के प्रयास चल रहे हैं। जिस तरह के खुलासे  हो रहे  हैं उनके आधार पर ये कहना गलत नहीं है कि ये मामला किसी छोटे से सरकारी कर्मचारी द्वारा की गई क़ाली कमाई का सबसे बड़ा प्रकरण होगा। इसके पूर्व  भी सरकार के अनेक भृत्य और पटवारी स्तर के कर्मचारियों के यहाँ छापों में जप्त की गई धनराशि और उनकी संपत्तियों का विवरण  इस बात को प्रमाणित करता है कि यहाँ की सरकारी मशीनरी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। सरकार दावा करती है कि उसके दफ्तरों में ऐसी कार्य प्रणाली लागू है जिससे आम जनता का काम बिना घूस दिये  हो। लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। सौरभ शर्मा जैसे न जाने कितने सरकारी महकमों में कुंडली जमाये बैठे हैं।  जो जानकारी आ रही है उससे तो लगता है मानों वह आरक्षक न होकर परिवहन विभाग का कोई बड़ा अधिकारी रहा हो । विपक्षी दल परिवहन मंत्री को घेर रहा है। इस मामले में सत्ता पक्ष निश्चित रूप से दबाव में है। आरोप पूर्व मुख्य सचिव पर भी लग रहे हैं जिन्होंने अपनी सफाई भी दे डाली। किंतु सौरभ के मायाजाल में अनेक अधिकारियों के फंसे होने की खबरों से पूरा प्रशासन तंत्र सहमा हुआ है। कौन किस हद तक इस कांड से जुड़ा है ये तो जांच पूरी होने के बाद भी स्पष्ट होगा किंतु इतना तो सामान्य बुद्धि वाला भी बता देगा कि बिना ऊपरी संरक्षण के एक आरक्षक स्तर का कर्मचारी इतना बड़ा खेल करने का साहस नहीं कर सकता था। अनुकंपा नियुक्ति पाकर उसने  इतनी बड़ी कमाई करने के बाद नौकरी छोड़ दी और करोड़ों का कारोबारी बन गया। एकांत स्थान पर खड़ी कार में सोने का भंडार मिलने को लेकर भी तरह - तरह की कहानियाँ सुनने मिल रही हैं। छापे से जुड़े विभागों में श्रेय लेने की होड़ मची है। आगे की कारवाई कौन करेगा इसे लेकर भी खींचतानी चल रही है। जिन नेताओं की तरफ संदेह की सुई घूम रही है वे अपनी सफाई देने में जुट गए हैं। लपेटे में आने वाले अधिकारी भी अपने संरक्षकों के चक्कर लगा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने किसी को न बख्शने की बात कहते हुए हर संभव जाँच का आश्वासन भी दिया है। लेकिन चूंकि जप्त हुई डायरी में प्रशासनिक अधिकारियों के नाम होने की चर्चा है इसलिए ये आशंका व्यक्त की जाने लगी है कि कुछ दिनों की सनसनी के बाद मामले पर पर्दा डाला जाने लगेगा, बड़े - बड़े वकील आरोपियों के बचाव में खड़े होंगे, निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक प्रकरण चलेगा। और क्या पता आरोपी  बाइज्जत  बरी हो जाएं। यदि इस मामले में केवल राजनीतिक हस्तियां फंसती होतीं तो अभी तक भूचाल आ चुका होता किंतु प्रशासनिक अधिकारियों के नाम डायरी में आने के बाद मामले के रफा - दफा किये जाने की संभावना व्यक्त की जाने लगी है। हनीट्रैप नामक कांड इसका उदाहरण है। लंबा समय नहीं बीता जब परिवहन विभाग के सर्वोच्च अधिकारी विभागीय कर्मचारियों से पैसे स्वीकार करते कैमरे में कैद हो गए। आनन -  फानन उनका तबादला पुलिस मुख्यालय कर दिया गया। लेकिन इतने बड़े खुलासे के बाद जैसी कारवाई उन साहेब बहादुर पर अपेक्षित थी वह नहीं हुई। सच बात तो ये है परिवहन विभाग और भ्रष्टाचार एक दूसरे के समानार्थी हैं। ये अवधारणा बेहद मजबूत है  कि इसमें भृत्य से लेकर तो शीर्ष अधिकारी तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। अपवाद स्वरूप ही कोई दूध का धुला होता होगा। इस भ्रष्टाचार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है क्योंकि रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए वाहनों की व्यवस्था परिवहन विभाग के सौजन्य से होने के कारण इसमें जमे अधिकारी नेताओं के कृपापात्र हो जाते हैं। आज जो विपक्ष में हैं वे भी सत्ता में रहते हुए इस मुफ्त सेवा का लाभ लेते रहे। सरकार में जिन विभागों को मलाईदार कहा जाता है उनमें से परिवहन अग्रणी है। लेकिन सौरभ शर्मा ने जॊ कारनामा किया वह अभूतपूर्व है। मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव के लिए भ्रष्टाचार के विरूद्ध जंग छेड़ने का यह अच्छा अवसर है। यदि वे इस कांड के बहाने सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने का बीड़ा उठा लें तो उन्हें अप्रत्याशित जन समर्थन हासिल होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 December 2024

राहुल और प्रियंका पर मुस्लिम सांप्रदयिकता का सहारा लेने का आरोप

 

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस हर मोर्चे पर असफल रही। मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते उससे अपेक्षा थी कि वह जनता की समस्याओं को उठायेगी और सरकार के कमजोर पक्ष पर प्रहार करेगी। उसके पास मुद्दों और अवसरों की कमी भी नहीं थी किंतु हमेशा की तरह वह उनका लाभ उठाने से चूक गई। राहुल गाँधी के साथ ही प्रियंका वाड्रा भी उन विषयों में उलझकर रह गईं जो अब उबाऊ लगने लगे हैं। कांग्रेस के पास संसद के दोनों सदनों में कुछ सांसद ऐसे हैं जो संसदीय बहस में अनुभवी हैं और सम - सामयिक विषयों पर उनका अध्ययन भी अच्छा है। लेकिन पार्टी उन्हें अवसर न देकर उनकी योग्यता का उपयोग नहीं कर पाती।  यही कारण रहा कि सत्र के दौरान भाजपा ने जब कांग्रेस और गाँधी परिवार पर चौतरफा हमले किये तब पार्टी के सांसदों द्वारा वैसा बचाव नहीं किया गया जैसा होना चाहिए था। इसी तरह अन्य विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया। परिणाम ये हुआ कि लोकसभा चुनाव के उपरांत पहले कामकाजी सत्र के  दौरान  विपक्ष में जो समन्वय देखा गया वह इस सत्र में गायब रहा। लोकसभा में नई बैठक व्यवस्था किये जाने से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कांग्रेस से खफ़ा हो गए जो इस सत्र के पूर्व तक राहुल के बगल में बैठते थे। और तो और फैज़ाबाद से जीतकर आये अवधेश प्रसाद को भी वे अपने बगल में बिठाते थे। राजनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चाओं के अनुसार उ.प्र में हुए उपचुनावों में सपा की करारी हार के बाद अखिलेश की राहुल से नाराजगी बढ़ गई है। स्मरणीय है उन उपचुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों के बीच मतभेद इतना बढ़ा कि कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से ही इंकार करते हुए सपा को अकेले छोड़ दिया। सपा का कहना है कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी कोई मदद नहीं की। इसी कारण से जब राहुल के नेतृत्व में पूरी कांग्रेस अदाणी मुद्दे पर संसद चलने नहीं दे रही थी तब सपा ने सामने आकर कहा कि उसे अदाणी मुद्दे में कोई रुचि नहीं है और वह चाहती है संसद चले। ऐसा ही रुख तृणमूल कांग्रेस ने दिखाया जो राहुल के लिए किसी झटके से कम नहीं था। दरअसल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं। संसद में गठबंधन के घटक दलों ने भी कांग्रेस को जिस तरह किनारे किया वह इस बात का संकेत है कि लोकसभा चुनाव के पहले अस्तित्व में आये इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के बीच रणनीतिक एकता भले हो गई किंतु भावनात्मक तौर पर उनके मन एक दूसरे से नहीं मिल सके। इसीलिए चुनाव खत्म होते ही जब ये स्पष्ट हो गया कि गठबंधन नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से नहीं रोक सका तब उसके सदस्यों में कांग्रेस की क्षमताओं को लेकर अविश्वास जागने लगा। ये बात भी गलत नहीं है कि मुख्य विपक्षी दल बनते ही कांग्रेस ने भी घटक दलों को हाशिये पर रखने की नीति अपनाई। राहुल चूंकि नेता प्रतिपक्ष बन गए इसलिए सदन में उन्हें महत्व मिलने लगा जिसे अन्य किसी के साथ बांटने से वे बचने लगे। और जबसे प्रियंका का लोकसभा में प्रवेश हुआ तबसे तो अन्य दलों से दूरी और बढ़ गई। संसद सत्र के दौरान उत्पन्न दरार अब और तेज होती दिख रही है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि केरल में  सरकार के सबसे बड़े घटक सीपीएम ने कांग्रेस पर अतिवादी मुस्लिम गुटों से समर्थन प्राप्त कर वायनाड लोकसभा चुनाव जीतने का आरोप लगाया जो बेहद संगीन है। पार्टी नेता विजयराघवन ने पत्रकार वार्ता में कहा कि पहले राहुल और फिर प्रियंका ने उक्त सीट से चुनाव जीतने के लिए उग्रवाद के पोषक मुस्लिम संगठनों का साथ लिया। उल्लेखनीय है चुनाव प्रचार के दौरान राहुल और प्रियंका की रैलियों में मुस्लिम लीग सहित अन्य मुस्लिम संगठनों के झंडे और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में नजर आये थे।  अब तक भाजपा ही ये आरोप लगाती आई है किंतु उसकी घोर विरोधी सीपीएम द्वारा राहुल और प्रियंका पर मुस्लिम सांप्रदायिक शक्तियों का सहारा लेकर चुनाव जीतने का आरोप इंडिया गठबंधन में टूटन बढ़ने के अलावा कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष होने के दावे पर बड़ा प्रहार है।  यद्यपि केरल में इंडिया गठबंधन कारगर नहीं हो सका। लोकसभा चुनाव में वामदलों ने राहुल से अनुरोध किया था कि वे वायनाड सीट छोड़कर  उत्तर भारत में कहीं से लड़ें  वे राहुल नहीं माने। अब प्रियंका भी वहीं से संसद पहुँच गईं। ये देखते हुए अब इंडिया गठबंधन की दरारें और चौड़ी होती दिख रही हैं। अब  तक सहयोगी दल कांग्रेस पर दूसरे आरोप लगाते थे किंतु अब सीपीएम द्वारा गाँधी भाई - बहिन पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के सहारे चुनाव जीतने का आरोप लगाकर गठबंधन के सैद्धांतिक आधार पर ही प्रहार कर दिया गया है। देखना ये है कि अपनी  मुस्लिम परस्ती के लिए बदनाम सपा इस आरोप पर क्या कहती है? अन्य दलों की प्रतिक्रिया भी मायने रखेगी क्योंकि मुस्लिम सांप्रदायिकता को लेकर भाजपा पहले से ही गठबंधन को घेरती रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 December 2024

शीतकालीन सत्र में इंडिया गठबंधन का बिखराव साफ नजर आ गया

संसद का शीतकालीन सत्र गत दिवस समाप्त हो गया। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में औसत 50 फीसदी कामकाज हो सका और उस दौरान भी होहल्ला जारी रहा। पूरे सत्र में एक भी विधेयक पारित नहीं हुआ। एक देश एक चुनाव के विधेयक को भी जेपीसी के हवाले कर दिया गया। कांग्रेस ने अदाणी मुद्दे पर भाजपा को घेरना चाहा तो जवाबी हमले में अमेरिकी धनकुबेर जॉर्ज सोरोस से गाँधी परिवार के रिश्ते को उजागर करते हुए भाजपा ने घेराबंदी  की कोशिश की। हालांकि सत्र का समापन संविधान पर चली चर्चा और सांसदों के बीच धक्का - मुक्की जैसी घटना से हुआ किंतु जो  सबसे महत्वपूर्ण बात देखने मिली वह थी विपक्षी दलों में एकजुटता का अभाव। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद  इंडिया गठबंधन में जबरदस्त निराशा दिखी। हालांकि हार तो हरियाणा में भी हुई थी किंतु वहाँ कांग्रेस ने  चूंकि एकला चलो की नीति अपनाई इसलिए  ठीकरा उसी के सिर फूटा। शिवसेना और सपा सहित इंडिया गठबंधन के अन्य सदस्यों ने भी खुलकर कहा कि कांग्रेस अकेले दम पर जीतने की क्षमता गँवा चुकी है। उन बयानों का उद्देश्य महाराष्ट्र चुनाव में सीटों  के बंटवारे में कांग्रेस के वर्चस्व को कम करना था और उसका असर भी हुआ। कांग्रेस को वहाँ शरद पवार और उद्धव ठाकरे के अलावा सपा को भी उनकी मांग के मुताबिक सीटें देनी पड़ गईं। चूंकि लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र ने इंडिया गठबंधन को भारी सफलता प्रदान की थी इसलिए उसका हौसला काफी बुलंद था। लेकिन चुनाव परिणाम उम्मीद के पूरी तरह विपरीत आये जिनमें  कांग्रेस का प्रदर्शन अब तक का सबसे खराब रहा। लेकिन उसके साथ ही उद्धव ठाकरे और शरद पवार की लुटिया भी डूब गई। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जम्मू - कश्मीर और झारखंड में विपक्ष की जीत पर हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा को मिली कामयाबी भारी पड़ गई। हरियाणा में तो भाजपा अकेले दम पर स्पष्ट बहुमत ले आई।  महाराष्ट्र में यद्यपि उसने शिवसेना ( शिंदे) और अजीत पवार के साथ सीटों का बंटवारा किया किंतु अकेले ही 132 सीटें जीत लीं जो बहुमत से मात्र 12 कम हैं। और इसी वजनदारी के बल पर एकनाथ शिंदे को हटाकर देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री पद मिला। इस नतीजे से एक तरफ जहाँ एनडीए के उत्साह में वृद्धि हुई वहीं इंडिया गठबंधन में टूटन की गति और तेज़ हो गई। यद्यपि आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के फ़ौरन बाद ही अकेले चलने की घोषणा कर दी थी किंतु हरियाणा में उसने कांग्रेस से कुछ सीटें मांगी जिसके लिए राहुल गाँधी तो राजी हो गए परंतु भूपिंदर सिंह हुड्डा  बात नहीं माने। इससे नाराज होकर अरविंद केजरीवाल ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस के लिए गड्ढा खोद दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी दोनों एक दूसरे के विरुद्ध ताल ठोक रहे हैं। महाराष्ट्र चुनाव के फ़ौरन बाद हुए संसद के सत्र में इंडिया में शामिल अन्य घटक दलों ने भी कांग्रेस से दूरी बनाने के संकेत दे दिये। शुरुआत की ममता बेनर्जी ने गठबंधन का नेतृत्व संभालने की इच्छा जताकर  जिसे उद्धव ठाकरे गुट के अलावा सपा और लालू का समर्थन मिलने से गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे।  राहुल गाँधी द्वारा अदाणी प्रकरण उठाये जाने से उत्पन्न विवाद के कारण जब रोजाना सदन स्थगित होने की स्थिति बनी और भाजपा ने भी सोरोस रूपी अस्त्र चला दिया तब विपक्ष के अन्य दल ये कहते हुए सामने आये कि उनकी रुचि न तो अदाणी मुद्दे में है और न ही सोरोस  से उन्हें कुछ लेना देना है। वे तो इतना ही चाहते हैं कि सदन चले। तृणमूल और सपा ने तो खुलकर कांग्रेस से दूरी बना ली। जैसे - तैसे सत्र तो समाप्त हो गया किंतु दिल्ली, बिहार और उसके बाद प. बंगाल, केरल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के बिखरने के आसार साफ देखे जा सकते हैं। राहुल गाँधी की चुनाव जिताऊ क्षमता  हरियाणा और महाराष्ट्र  में फुस्स साबित होने के बाद  अब सहयोगी दल कांग्रेस के साथ जुड़े रहने से हो रहे नुकसान के बारे में सोचने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि वह अपने वर्चस्व वाले राज्यों में तो किसी  अन्य को साथ रखती नहीं किंतु जहाँ उसकी जड़ें कमजोर हो चुकी हैं वहाँ राष्ट्रीय पार्टी का रुतबा झाड़कर बड़ा हिस्सा मांगती है। म.प्र और हरियाणा में सपा को  कांग्रेस की उपेक्षा का अनुभव हो चुका है। बाकी दलों को भी धीरे - धीरे कांग्रेस बोझ लगने लगी है। इन सब कारणों से नये साल में इंडिया गठबंधन में खींचातानी होने की पूरी - पूरी संभावना है।  शीतकालीन सत्र के दौरान  इंडिया गठबंधन में   साझा रणनीति का अभाव खुलकर देखने मिला। ऐसा लगता है राहुल गाँधी की आत्मकेंद्रित कार्य शैली गठबंधन की एकजुटता में सेंध लगाने का कारण बन रही है। लंबे समय से गठबंधन में शामिल पार्टियों के नेताओं की बैठक न होना भी दर्शाता है कि उनमें संवादहीनता उत्पन्न हो चुकी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 20 December 2024

राहुल की ज़िद के कारण कांग्रेस सत्र का लाभ उठाने से चूक गई


संसद में  गत दिवस जो हुआ वह शर्मनाक है। दो सांसद घायल होकर अस्पताल में भर्ती किये गये। एक महिला सांसद ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पर अन्य आरोप लगाया। भाजपा की शिकायत पर पुलिस ने  उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर लिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस के भी इसी तरह के आरोप हैं जिनमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ भाजपा सांसदों द्वारा धक्का - मुक्की की शिकायत है। जो सांसद घायल हुए उनकी चोटें स्पष्ट दिखाई देती हैं। यदि श्री गाँधी ने धक्का नहीं दिया तब उनको घायल हुए सांसद से मिलकर स्थिति स्पष्ट करना चाहिए थी किंतु प्रियंका वाड्रा सहित कांग्रेस का समूचा प्रचार तंत्र उल्टे भाजपा पर आरोप लगा रहा है। और तो और सोशल मीडिया पर कांग्रेस समर्थक घायल सांसदों का मजाक उड़ाते हुए कह रहे हैं कि जरा सी धक्का -  मुक्की में आई. सी. यू में भर्ती हो गए। और भी तरह - तरह के ताने मारे जा रहे हैं। शीतकालीन सत्र का आज अवसान हो  गया ।  उद्योगपति गौतम अदाणी की गिरफ्तारी की मांग को लेकर कांग्रेस ने सदन नहीं चलने दिया। शुरू में तो अन्य विपक्षी दल उसके साथ नजर आये किंतु धीरे - धीरे उनमें फूट पड़ने लगी क्योंकि  वे अपने मुद्दे नहीं उठा पा रहे थे। बीते कुछ दिनों से संविधान पर हुई चर्चा भी व्यर्थ के विवाद में उलझती चली गई। और अदाणी से शुरू हुआ विवाद डाॅ.आंबेडकर  तक जा पहुंचा। लेकिन सत्र समाप्ति के एक दिन पहले कुछ सांसदों का खून बहने जैसी दुखद घटना के कारण यह सत्र कलंकित होकर रह गया। राहुल ने धक्का दिया या नहीं इसका पता तो पुलिस लगायेगी किंतु सांसदों को चोट आई ये तो पूरी तरह स्पष्ट है। लेकिन बजाय सहानुभूति दिखाने के अनर्गल बातें करना ये दर्शाता है कि संसदीय प्रजातंत्र के दामन पर खून के धब्बे लगने लगे हैं। कांग्रेस का कहना है उसके सांसद प्रवेश द्वार पर प्रतिदिन प्रदर्शन करते थे। भाजपा की शिकायत है कांग्रेस वाले दरवाजे से आवाजाही अवरुद्ध कर रहे थे। इस विवाद से इतर विचारणीय प्रश्न ये है कि संसद जनता और देश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार कर उचित निर्णय करने के लिए बनाई गई है। सरकार बेशक बहुमत के बल पर बनती है परंतु आदर्श स्थिति तो वही है जब सत्ता और विपक्ष वैचारिक भिन्नता के बावजूद जनता और देश की बेहतरी से जुड़े मुद्दों पर एकजुट हों। उस दृष्टि से मौजूदा मुख्य विपक्षी दल  अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन में पूरी तरह उदासीन है। ऐसा लगता है कांग्रेस लगातार तीन लोकसभा चुनाव में सत्ता से वंचित रहने से कुंठाग्रस्त हो चली है। विशेष रूप से राहुल को ये बात समझ लेनी चाहिये कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और नेहरू - गाँधी परिवार के प्रति पहले जैसा समर्थन नहीं रहा। अपने दम पर सत्ता हासिल करने की उसकी हैसियत  चंद राज्यों तक ही सीमित है। बड़े राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों के सहारे रह गई है। लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद उसे लगने लगा था कि वह भाजपा का विकल्प बनने की क्षमता अर्जित कर चुकी है किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के  चुनाव परिणाम से उसकी उम्मीदों पर तुषारापात हो गया। यहाँ तक कि इंडिया गठबंधन के घटक दलों तक ने उसे आँखें दिखाना शुरू कर दिया। नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद श्री गाँधी से अपेक्षा थी कि वे परिपक्वता दिखाएंगे किंतु वे इस सोच से बाहर नहीं निकल पा रहे कि केवल प्रधानमंत्री पर निजी हमले करने से जनता उनको सिर आँखों पर बिठा लेगी। दो राज्यों में हुई करारी पराजय के बाद बुद्धिमत्ता इसी में थी कि कांग्रेस जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर अपनी छवि सुधारती किंतु राहुल के बचपने के कारण उसने अवसर गँवा दिया। सही बात ये है कि अदाणी मुद्दे से आम जनता को कुछ लेना - देना नहीं है। रही बात डाॅ. आंबेडकर को भुनाने तो दलित वर्ग की राजनीति करने वाले अपने प्रेरणा पुरुष को इतनी आसानी से किसी और के हाथों नहीं जाने देंगे। हालांकि शीतकालीन सत्र छोटा होता है किंतु कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के पर्याप्त मुद्दे थे जिसमें वह एक बार फिर विफल रही। राहुल गाँधी को इस मामले में शरद पवार से सीखना चाहिए जो महाराष्ट्र चुनाव में उत्पन्न कटुता के बाद भी अपने क्षेत्र के किसानों की समस्याओं पर बात करने प्रधानमंत्री के पास जा पहुंचे। उधर मुंबई में उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस से भेंट करने की बुद्धिमत्ता दिखाई। बेहतर हो श्री गाँधी अतीत में विपक्ष के नेता रहे लोगों के संसदीय जीवन का अध्ययन करें जो कम संख्या में होने के बाद भी अपनी छाप छोड़ने में सफल हो जाते थे और घोर सैद्धांतिक मतभेदों के बाद भी सत्ता पक्ष के साथ निजी तौर पर मधुर सम्बन्ध बनाकर रखते थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 December 2024

नेहरू जी की महत्वाकांक्षा के लिए डाॅ. आंबेडकर को उपेक्षित किया गया


संसद में संविधान के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष चर्चा  विवाद में उलझकर रह गई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने संविधान के साथ मनुस्मृति की पुस्तक सदन में लहराकर आरोप लगाया कि भाजपा संविधान की बजाय मनुस्मृति का सम्मान करती है। बीते काफी समय से वे जातिगत जनगणना की मांग करते आ रहे हैं और सरकार को ये धौंस भी देते हैं कि वे ऐसा करवाकर रहेंगे। लोकसभा चुनाव में दलित मतदाताओं को ये कहकर भाजपा से दूर करने में कुछ हद तक कांग्रेस सफल रही थी कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी आरक्षण समाप्त कर देंगे। लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनाव में वह प्रचार बेअसर रहा । जबरदस्त पराजय के बाद जब राहुल के विरुद्ध इंडिया गठबंधन में ही आवाजें उठने लगीं तब उन्हें चिंता हुई और इसीलिए वे संविधान के साथ मनुस्मृति को मुद्दा बनाकर भाजपा को  दलित विरोधी  सिद्ध करने में जुट गए। लेकिन  लंबे समय से सांसद रहने के बावजूद भी श्री गाँधी में अपेक्षित गंभीरता का अभाव है। भाजपा पर मनुस्मृति समर्थक होने का आरोप लगाते समय वे भूल गए कि  कुछ साल पहले ही उनकी पार्टी के वरिष्ट नेता रणदीप सुरजवाला ने पत्रकार वार्ता बुलाकर ये प्रचारित किया कि राहुल सारस्वत ब्राह्मण हैं और जनेऊ  भी धारण करते हैं। उसके बाद श्री गाँधी हिन्दू मंदिरों और मठों के चक्कर भी लगाते नजर आने लगे। कैलाश - मानसरोवर की यात्रा पर भी गए। उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा ने भी यही दिखावा किया जो  हिन्दू समुदाय में भाजपा की पैठ को कम करने करने के लिए बनाई गई रणनीति थी। विशेष रूप से जनेऊ धारी ब्राह्मण होने का दावा उच्च जातियों में भाजपा के जनाधार में सेंध लगाना था। लेकिन जब श्री गाँधी को लगा कि उनका वह दाँव भी काम नहीं आया तब  जातिगत जनगणना का बाजा बजाने लगे। लेकिन यहाँ भी वे गच्चा खा गए क्योंकि कर्नाटक में उनकी ही पार्टी की सरकार  अपने  पिछले कार्यकाल में करवाई गई जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने का साहस नहीं बटोर पा रही। ऐसे में संसद में संविधान पर चर्चा के दौरान उनके मनुस्मृति लेकर खड़े होने का औचित्य उन्हीं की पार्टी के लोग समझ नहीं पा रहे। बीते दो दिनों से आंबेडकर जी को लेकर जो आरोप - प्रत्यारोप संसद में चल रहे हैं उनको लेकर भी कांग्रेस पूरी तरह घिर गई। भले ही गृहमंत्री अमित शाह के बयान को लेकर वह आक्रामक  हो लेकिन डाॅ. आंबेडकर के जीवनकाल में  उनके प्रति कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेताओं का जो उपेक्षाभाव था वह जैसे ही उजागर हुआ पार्टी को  मुँह छिपाने में दिक्कत होने लगी। संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करने वाले बाबा साहब को पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र क्यों देना पड़ा और बाद में उनको लोकसभा चुनाव में हरवाने के लिए कांग्रेस ने क्या - क्या किया ये इतिहास में मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है। बाबा साहेब ने आरक्षण और  धारा 370 का प्रावधान अस्थायी रखा था। हिन्दू विवाह और उत्तराधिकार अधिनियम को लेकर उनके नेहरू जी से मतभेद खुलकर सामने आ चुके थे। सही बात तो ये है कि महात्मा गाँधी के नेहरू प्रेम  ने जिन सक्षम और सुयोग्य नेताओं को उपेक्षित किया उनमें आंबेडकर जी भी थे। सही मायने में वे राजनेता न होकर समाजशास्त्री थे जिनके मन में हिन्दू समाज में व्याप्त बुराई को दूर करने की इच्छा थी। अछूतोद्धार  का जो अभियान गाँधी जी ने चलाया उसे आगे ले जाने के लिए डाॅ. आंबेडकर ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति होते  किंतु कांग्रेस में उनको लेकर अदृश्य भय था जिसकी परिणिति उनको पहले सरकार और फिर संसद से बाहर करने के रूप में हुई। वरना अपने समकालीन नेताओं में वे सबसे अधिक शिक्षित और सुयोग्य थे। सही बात तो ये है कि नेहरू जी की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और डाॅ. आंबेडकर जैसी अनेक विभूतियों को दरकिनार किया गया। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी पंडित नेहरू ने अपने लिए चुनौती बन सकने वाले हर शख्स के पर कतर दिये। डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को दोबारा राष्ट्रपति बनाने मैं क्या - क्या रुकावटें आईं ये नई पीढ़ी को जानना चाहिये। जब संसद में प्रधानमंत्री श्री मोदी सहित  अन्य सांसदों ने कांग्रेस की सरकारों द्वारा बाबा साहेब के अपमान का खुलासा किया तब उसका जवाब देने के बजाय मनुस्मृति को मुद्दा बनाया जा रहा है जिसकी प्रासंगिकता समझ से परे है। आज राहुल और प्रियंका नीले कपड़ों में संसद पहुंचे ये जताने के लिए कि उनकी बाबा साहब में कितनी आस्था है। लेकिन बसपा के झंडे के रंग वाले कपड़े पहिनकर न तो भाई - बहिन दलित वर्ग को आकर्षित कर पाएंगे और न ही कांग्रेस के दामन से डाॅ. आंबेडकर के अपमान का दाग मिटेगा। कांग्रेस के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि उसकी सरकारों ने संविधान निर्माता कहे जाने वाले बाबा साहेब को भारत रत्न देने के योग्य क्यों नहीं समझा जबकि पंडित नेहरू और इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए ही खुद को इस अलंकरण से अलंकृत करवा लिया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 December 2024

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम मुसलमानों के लिए सबक हैं


उ.प्र के संभल शहर की जामा मस्ज़िद में अदालत के आदेश पर हो रहे सर्वेक्षण को रोकने  मुस्लिम समुदाय द्वारा पत्थरबाजी  के बाद पुलिस द्वारा आत्मरक्षार्थ  किये गोली चालन में कुछ मुस्लिमों की मौत को कांग्रेस और सपा ने राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। नेताओं में संभल जाकर घड़ियाली आँसू बहाने की होड़ भी लगी। संसद में भी संभल कांड को उठाते हुए केंद्र और उ.प्र सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने का दांव चला गया। लेकिन  मस्ज़िद के पास कुछ ऐसे हिन्दू मंदिर मिल गए जिनको इस तरह से छिपा दिया गया कि किसी को  वे नजर नहीं आयें। संभल के जिलाधिकारियों ने उनकी साफ - सफाई करवाकर पूजा शुरू करवाई। जो जानकारियां आ रही हैं उनके अनुसार उन मंदिरों के इलाके में कभी हिन्दू आबादी भी रहा करती थी किंतु सांप्रदायिक दंगों के बाद असुरक्षा के चलते उन्होंने अन्यत्र ठिकाने बना लिए और उन मंदिरों तक उनका आना - जाना बन्द हो गया। संभल के मुस्लिम सांसद सपा के हैं। उनके पिता भी लम्बे समय तक लोकसभा सदस्य रहे।  जिस मंदिर को प्रशासन द्वारा खोजा गया वह सांसद निवास से बेहद करीब है किंतु बात - बात में धर्मनिरपेक्षता और गंगा - जमुनी संस्कृति की दुहाई देने वाले सांसद और और उनके मरहूम अब्बा ने कभी भी उस मंदिर के बारे में किसी को मालूम नहीं होने दिया। कहते हैं मस्ज़िद में  बिजली चोरी रोकने गए दस्ते की कारवाई के दौरान मंदिर का पता चला। मुस्लिम तुष्टीकरण की दुकान चलाने वाले इस बात को प्रचारित करने में जुटे हैं कि उक्त मंदिर कई दशकों से हिंदुओं की अनदेखी के कारण उपेक्षित थे। लेकिन जैसा देखने में आया मंदिरों को चारों तरफ से अतिक्रमणों  से घेरने के साथ ही उन पर  मिट्टी डालकर पूरी तरह नजरों से दूर कर दिया गया। अपने धर्म स्थल के प्रति लापरवाह हो जाने के लिए संभल के हिन्दू भी कम दोषी नहीं हैं किंतु वहाँ के दिवंगत सांसद सहित अन्य प्रमुख मुस्लिमों का क्या ये फर्ज नहीं था कि वे हिंदुओं की आस्था के उस स्थान को घेरने के बजाय उसके मूल स्वरूप को बना रहने देते और खुद होकर उसके रखरखाव पर ध्यान देते।  उल्लेखनीय है देश में सैकड़ों ऐसी दरगाह और मजारें हैं जहाँ हिन्दू बड़ी संख्या में न सिर्फ जाते अपितु उनकी देखरेख में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। मोहर्रम में सवारी रखने वाले हिंदुओं की भी बड़ी संख्या है किंतु इस सौजन्यता के प्रत्युत्तर में मुस्लिम समाज का रवैया बेहद निराशाजनक है।  मुल्ला - मौलवी अपने समुदाय को इस हेतु प्रेरित करने के बजाय निरुत्साहित करते हैं। और यही समस्या की जड़ है। भारत धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ सभी को अपने धर्म का पालन करने की सुविधा है। मुसलमानों के अलावा भी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन उनका हिंदुओं के साथ उस तरह का विवाद नहीं होता जैसा मुस्लिमों के साथ आम है। संभल प्रकरण पर उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में पूछा कि वहाँ अब तक जितने दंगे हुए उनमें  मारे गए सैकड़ों हिंदुओं के घावों पर मरहम लगाने कितने लोग गए ? संभल के बड़े उद्योगपति हिन्दू परिवार के कई सदस्यों की दंगों में हत्या के बाद बचे हुए लोग शहर छोड़कर जाने मजबूर हो गए। ऐसी स्थितियाँ देश के अनेक हिस्सों में निर्मित हुई । इससे ये सवाल उठ खड़ा होता है कि किसी इलाके के मुस्लिम बहुल होते ही वहाँ हिंदुओं के पलायन की परिस्थितियाँ क्यों बन जाती हैं जबकि हिन्दू बहुमत वाले क्षेत्र में मुस्लिम बेखौफ रहते हैं। दरअसल मुस्लिम समाज को मुख्य धारा से अलग करने में मुल्ला - मौलवियों  का  जितना हाथ है उतना ही वोट बैंक के सौदागर राजनेताओं का भी है। मुसलमान अपने आर्थिक और शैक्षणिक पिछ्डेपन का रोना तो रोते हैं किंतु उससे बाहर निकलने का साहस भी उनमें नहीं है। वरना संभल में हिन्दू मंदिरों को इस तरह से छिपाने का और क्या उद्देश्य हो सकता था? 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद मुस्लिम समुदाय में कानून तोड़ने के प्रति जरूरत से ज्यादा उत्साह आ गया है। संभल के बाद झाँसी में एन.आई.ए के दल को घेरकर मुसलमान मुफ्ती को छुड़ाने की घटना इसका उदाहरण है। हिंदुओं के धार्मिक जुलूसों पर पथराव की वारदातें भी बढ़ी हैं। लेकिन हिंदुओं की कट्टरता पर छाती पीटने वाले मुसलमानों की धर्मांधता पर आँखें मूँदकर संभल और झाँसी जैसी स्थिति पैदा करने में सहायक बनते हैं। दुर्भाग्य से मुस्लिम युवा भी कठमुल्लेपन के शिकंजे से बाहर आने तैयार नहीं दिखते। हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव परिणाम मुस्लिम समुदाय के लिए ये सबक है कि टकराव और अलगाव उनके लिए नुकसानदेह है। मुसलमान जब तक कुछ दलों के बंधुआ बने रहेंगे तब तक उनकी तरक्की की कोई संभावना नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 17 December 2024

राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे के लौटने की संभावना बन रही


लगता है राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे का पुनर्गठन होने जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस  से दूरी बनाकर रखने वाली क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा तीसरी ताकत के रूप में सत्ता का संतुलन अपने हाथ में रखने का जो प्रयोग नब्बे के दशक में शुरू हुआ उसने भारतीय राजनीति की चाल, चरित्र और चेहरे को पूरी तरह बदलकर रख दिया था। 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गाँधी की सत्ता चली जाने के बाद भाजपा और वाम दलों के बाहरी समर्थन से बनी जनता दल की  सरकार के प्रधानमंत्री का चयन बेहद नाटकीय तरीके से हुआ जब चौधरी देवीलाल का नाम तय होने के बाद  विश्वनाथ प्रताप सिंह की ताजपोशी हो गई। राजीव सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर कांग्रेस से बाहर आये श्री सिंह जल्द ही लालू प्रसाद, मुलायम सिंह और शरद यादव के शिकंजे में फंस गए । इन तीनों ने उनसे मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करवाकर  ओबीसी  को 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करवा दिया। उसके बाद भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के जरिये  राम मंदिर आंदोलन छेड़ दिया। रथ यात्रा को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने रोका तो भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन बैठे किंतु उनकी गति भी चौधरी चरण सिंह जैसी हुई। लोकसभा के मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई किंतु उसके बीच ही राजीव गाँधी की हत्या हो गई। कांग्रेस सत्ता में तो आई किंतु उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा। पी. वी. नरसिम्हा राव  प्रधानमंत्री बने जिन्होंने मंडल और मंदिर जैसे मुद्दों की काट के तौर पर आर्थिक सुधारों को लागू कर दिया। उनकी सरकार वैसे तो पाँच साल चली किंतु 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ा दल बना और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने किंतु बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें 13 दिन में ही हटना पड़ा। लोकसभा त्रिशंकु थी और कांग्रेस को कोई समर्थन देने राजी न था। ऐसे में फिर एक प्रयोग हुआ संयुक्त मोर्चे के नाम पर जिसमें कांग्रेस और वाम दलों ने एच. डी. देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनवा दिया जो जनता दल के थे। पहली बार वामपंथी भी सरकार में शामिल हुए। लेकिन वह सरकार भी कांग्रेस ने जल्द गिरवा दी जिसके बाद उसी रचना के तहत इंदर कुमार गुजराल की ताजपोशी हुई। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष  सीताराम केसरी ने उनको भी जल्द भूतपूर्व बना दिया। 1998 में देश को फिर लोकसभा चुनाव झेलना पड़ा किंतु इस बार भाजपा ज्यादा ताकत से लौटी और अटल जी दूसरी बार सत्ता में आये किंतु 13 माह में जयललिता ने वह सरकार गिरवा दी। 1999 में लोकसभा चुनाव होने के दौरान ही कारगिल युद्ध हो गया। उसमें भारत ने जीत हासिल की जिसका लाभ लेकर भाजपा फिर सबसे अधिक सीटें जीतने में सफल रही और अटल जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। इस बार बदलाव ये हुआ कि जनता दल में टूट हुई और कुछ पुराने समाजवादियों ने एनडीए नामक मोर्चे में शामिल होकर भाजपा के साथ सत्ता में भागीदारी की। जिनमें जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव,  राम विलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे चेहरे थे। वह सरकार पूरे समय चली। बीच में गुजरात दंगों के कारण पासवान अलग हो गए। लेकिन बाकी भाजपा के साथ बने रहे। वाजपेयी जी एक सफल प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित हो चुके थे किंतु 2004 के चुनाव में कांग्रेस बड़ी पार्टी बनी और डाॅ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने । भाजपा को रोकने के लिए वामपंथियों ने भी उनकी सरकार को टेका लगा दिया। अनेक गैर कांग्रेसी नेता उस सरकार से जुड़कर सत्ता सुख लूटने लगे। संयुक्त मोर्चा , यूपीए बन गया। कुछ विपक्षी एनडीए में ही रहे। पुराने समाजवादियों के बिखराव ने तीसरे मोर्चे को अप्रासंगिक बना दिया। लालू, शरद, नीतीश, पासवान, देवगौड़ा सभी ने पार्टियां बना लीं। 2009 में मनमोहन सरकार फिर बनी और कांग्रेस के सांसद भी बढ़े। सरकार ने कार्यकाल पूरा भी किया किंतु गाँधी परिवार के हस्तक्षेप ने मनमोहन की छवि कमजोर प्रधानमंत्री की बना दी। ऊपर से भ्रष्टाचार के मामलों ने सरकार को बदनाम कर दिया। 2014 में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। यूपीए में शामिल कुछ नेता भाजपा के साथ आ गए जिनमें पासवान प्रमुख थे। लेकिन तीसरा मोर्चा की राजनीति की बजाय एनडीए और यूपीए ही छाए रहे।  2019 में मोदी ने पहले से ज्यादा  सफलता हासिल की। 2024 के चुनाव के पहले यूपीए का नया नामकरण इंडिया किया गया जो भाजपा विरोधी तमाम दलों का गठजोड़ था। उसने जोर तो बहुत लगाया किंतु भाजपा को बहुमत की देहलीज पर रोकने के बाद भी वह मोदी को नहीं रोक पाया। हालांकि कांग्रेस 99 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल हो गई और राहुल बड़े नेता के रूप में उभरे। लेकिन बीते छह माह में हुए विधानसभा चुनावों में हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा की प्रचण्ड जीत ने इंडिया गठबंधन में दरारें पैदा कर दीं। राहुल के नेतृत्व को अन्य घटक दलों से चुनौती मिलने लगी। उसके बाद अडाणी मुद्दे पर कांग्रेस अलग - थलग पड़ी और अब ईवीएम के विरोध  पर उमर अब्दुल्ला के बाद ममता बेनर्जी के भतीजे अभिषेक ने कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया। अचानक ये महसूस होने लगा कि इंडिया में शामिल अनेक पार्टियां कांग्रेस का साथ छोड़ने की फिराक में हैं। ममता, उद्धव, लालू, उमर, अखिलेश आदि जो तेवर दिखा रहे हैं उनसे लगता है वे संसद में कांग्रेस की ताकत बढ़ने से चिंतित हैं और खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। जो संकेत हैं उनके मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र के बाद इंडिया गठबंधन में विभाजन होगा तथा कुछ क्षेत्रीय पार्टियां तीसरे मोर्चे का गठन करेंगी जिसमें नवीन पटनायक , जगन मोहन रेड्डी और के. चंद्र शेखर राव भी शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस द्वारा राहुल के विरुद्ध बने माहौल पर जिस तरह का ठंडा रुख दिखाया उससे भी सहयोगी नाराज हैं। उन्हें लग रहा है कि राहुल अपनी नेतागिरी चमकाने में लगे हैं और  घटक दलों से संवाद ही नहीं होता।  ऐसे में 2025 की शुरुआत में विपक्षी राजनीति में बड़ा धमाका होने की संभावना दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी