Friday, 27 December 2024

21 वीं सदी की दिशा तय करने के लिए देश उनका आभारी रहेगा


यह दुखद संयोग  है कि 25 दिसंबर को देश ने भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 100 वीं जयंती मनाई और उसकी अगली तारीख को ही पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह को खो दिया। 92 वर्षीय डाॅ. सिंह प्रख्यात अर्थशास्त्री होने के साथ ही कुशल नौकरशाह भी थे। केंब्रिज और आक्सफोर्ड जैसे विश्वप्रसिद्ध संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने  के बाद केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गवर्नर के दायित्व का निर्वहन उन्होंने सफलतापूर्वक  किया। जब स्व. पी. वी नरसिम्हा राव ने उन्हें वित्तमंत्री बनाया तब लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि वे राजनीति से दूर थे। उस दौर में देश गम्भीर आर्थिक संकट में था। यहाँ तक कि रिजर्व बैंक को सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा का प्रबन्ध करना पड़ा अन्यथा  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी छवि को जबरदस्त झटका लगता। डाॅ. सिंह ने उस कठिन समय में आर्थिक सुधारों को लागू करने  का साहस दिखाया जिसको कांग्रेस में भी पूरा समर्थन नहीं था।  राव सरकार अल्पमत में होने से अनेक दलों का दबाव झेल रही थी किंतु वे रुके नहीं।  धीरे - धीरे  आर्थिक सुधारों को सर्वदलीय स्वीकृति प्राप्त हुई। इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये था कि 2004 में जब डाॅ. सिंह प्रधानमंत्री बने तब उनकी अल्पमत सरकार को वामपंथी दलों ने भी समर्थन दिया। सभी पार्टियों की राज्य सरकारों ने आर्थिक सुधारों को अपनाते हुए उद्योगपतियों के सामने लाल कालीन बिछाने की जो संस्कृति अपनाई उसके प्रणेता डाॅ. सिंह ही थे। लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि वे प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार नहीं थे। 2004 में आश्चर्यजनक चुनाव परिणाम आए। कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सत्ता की हकदार बनी और सोनिया गाँधी को संसदीय दल का नेता चुना गया। लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर  डाॅ. सिंह की ताजपोशी करवा दी। वह सब क्यों और कैसे हुआ ये आज भी रहस्य है। डाॅ. सिंह जिन राव साहब की पसंद थे उनसे गाँधी परिवार की चिढ़ किसी से छिपी नहीं थी। लेकिन राव साहब के  करीबी रहे मनमोहन जी को श्रीमती गाँधी ने इसलिए चुना क्योंकि वे प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री नहीं देखना चाहती थीं जो हर दृष्टि से योग्य थे। ये बात भी कुछ किताबों के जरिये प्रकाश में आई कि भाजपा द्वारा विदेशी महिला को प्रधानमंत्री बनाये जाने के विरोध  के चलते गाँधी परिवार के भीतर भी ये चर्चा चली कि सोनिया जी पीछे हट जाएं और किसी ऐसे व्यक्ति को गद्दी सौंपी जाए जो समय आने पर राहुल गाँधी के लिए सिंहासन छोड़ दे।  लिहाजा डाॅ. सिंह को चुना गया। ये भी कुछ लेखकों ने लिखा कि परिवार राजीव गाँधी की मौत के सदमे से उबर नहीं पाया था। राहुल ने माँ को ये डर दिखाकर रोका कि सत्ता में बैठना उनके लिए जानलेवा हो सकता था। बहरहाल मनमोहन जी की प्रतिभा और अनुभव को देखते हुए उनके चयन को सर्वत्र सराहा गया। लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि गाँधी परिवार ने सत्ता का नियंत्रण अपने पास ही रखा ।  पहला कार्यकाल पूरा होने के पहले अमेरिका के साथ परमाणु संधि के मुद्दे पर वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। लेकिन 2009 के चुनाव में भाजपा द्वारा समुचित  चुनौती पेश न किये जाने के कारण कांग्रेस ज्यादा सीटें लेकर आई और मनमोहन  जी दोबारा प्रधानमंत्री बनाये गए। उनकी विद्वता, सौम्यता और  ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं था। उन्होंने जनहित में अनेक बड़े फैसले भी लिए किंतु दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों से उनकी सरकार घिरती  चली गई। घपलों - घोटालों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा था। यद्यपि वे निजी तौर पर बेदाग थे किंतु बतौर प्रधानमंत्री बदनामी के छींटे उनके दामन पर पड़ते गए। सही बात तो ये है कि उनको स्वतंत्र होकर काम करने का अवसर ही नहीं दिया गया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण  था उनकी सरकार द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु  भेजे गए अध्यादेश के प्रारूप को भरी पत्रकार वार्ता में राहुल द्वारा फाड़ दिया जाना। उस समय डाॅ. सिंह विदेश में थे। ऐसा लगा कि संभवतः वे लौटकर त्यागपत्र दे देंगे किंतु उस अपमान को भी वे चुपचाप सहन कर गए । 2014 आते - आते वे एक लाचार प्रधानमंत्री के रूप में रह गए थे। न सत्ता पर उनका नियंत्रण था और न ही संगठन पर। जननेता न वे पहले थे न बाद में बन सके। एक बार लोकसभा चुनाव लड़कर हारे और फिर जीवन भर राज्यसभा में रहे। प्रधानमंत्री के रूप में उनको सम्मान तो हासिल था किंतु शक्तियाँ नहीं। उनकी सरलता, सज्जनता और गैर राजनीतिक स्वभाव उनके राजनीतिक प्रभुत्व के आड़े आता गया। पूर्ववर्ती दोनों प्रधानमंत्री क्रमशः राव साहब और अटल जी भी अपनी सौम्यता, अनुभव और समावेशी स्वभाव के कारण सबसे प्रशंसा प्राप्त करते रहे किंतु उनमें जो निर्णय लेने की क्षमता और दृढ़ता थी उसके कारण वे दबावों का सामना करने में सफल रहे। डाॅ. सिंह इस मोर्चे पर कमजोर साबित हुए और उनकी यही कमी उनकी योग्यता , दक्षता और अनुभव पर भारी पड़ गई। यद्यपि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं रहा। उनके हिस्से में आई बदनामी दूसरों के काले कारनामों का परिणाम थी। दरअसल अपनी  प्रतिभा और ज्ञान के चलते वे एक विश्व धरोहर थे। आज देश की जो आर्थिक स्थिति है उसकी नींव उनके द्वारा ही रखी गई थी। 21 वीं सदी के भारत की दिशा तय करने के लिए उन्होंने जो कुछ किया उसके लिए देश उनका आभारी रहेगा।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 December 2024

बांग्लादेश की आर्थिक नाकेबंदी करना जरूरी


बांग्लादेश में मुस्लिम धर्मांधता अपने चरम पर है। शेख हसीना का तख्ता पलट किए जाने के बाद  बनी अंतरिम सरकार ने ग़ैर मुस्लिमों पर अत्याचार की छूट दे रखी है।  सबसे ज्यादा दमन हिंदुओं का किया जा रहा है। उनके अलावा जैन और ईसाई समुदाय को भी  प्रताड़ित किये जाने की खबरें लगातार आ रही हैं। ताजा घटना क्रिसमस पर ईसाइयों के घर जलाने की है। बांग्लादेश की काम चलाऊ सरकार  अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आश्वासन तो देती रहती है किंतु मुस्लिम समुदाय की गुंडागर्दी को  पूरी तरह संरक्षण दिया जा रहा है। हिंदुओं पर जिस तरह का अमानुषिक अत्याचार नई सत्ता आने के बाद शुरू हुए उसके अनेक वीडियो पूरी दुनिया में प्रसारित हो चुके हैं। लूटपाट, आगजनी आम हो गई है। लेकिन महिलाओं के साथ जिस तरह का राक्षसी व्यवहार देखने में आया वह इस्लामिक कट्टरता का सबसे घृणित चेहरा है। दुख की बात ये है कि भारत के मुस्लिम मुल्ला - मौलवी इस हैवानियत के विरुद्ध जुबान खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। मुस्लिम देशों के जो संगठन कश्मीर घाटी में अल्पसंख्यकों पर कथित जुल्मों पर गला फाड़ते हैं वे भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे अत्याचार पर मौन धारण किये हुए हैं। इस बारे में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि बांग्लादेश की नई सरकार उस पाकिस्तान से गलबहियां करने में जुटी है जिसके जुल्मों से त्रस्त होकर इस देश का निर्माण हुआ जिसमें भारत का बड़ा योगदान  है। बांग्लादेश की सत्ता में बैठे लोगों के साथ ही जनता भी इस सच्चाई को झुठला नहीं सकती कि पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण भारतीय सेना के युद्ध कौशल का नतीजा था वरना  ये इलाका आज भी पश्चिमी पाकिस्तान का गुलाम बना रहकर अत्याचार का ज़हर पीने को मजबूर रहता। 1971 में अस्तित्व में आने के कुछ सालों तक तो इस नये देश का व्यवहार  भारत के प्रति काफी सौजन्यता पूर्ण रहा किंतु देश के संस्थापक शेख मुजीब की हत्या के बाद उत्पन्न स्थितियों में रिश्ते खराब होते गए। शेख हसीना के कार्यकाल को उस दृष्टि से काफी अच्छा कहा जायेगा जब राजनयिक के साथ ही व्यावसायिक संबंध भी काफी अच्छे रहे। लेकिन बीते कुछ महीने कई सालों पर भारी पड़ गए। दरअसल बांग्लादेश के नये सत्ताधीश भारत से  केवल इस बात पर नाराज नहीं हैं कि उसने शेख़ हसीना को पनाह दे रखी है, बल्कि इसकी असली वजह उसका मुस्लिम कट्टरपंथी होना है। ये बात पूरी तरह सही है कि इस देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ भेदभाव  शुरू से ही होता आया है। लेकिन सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग हिंदुओं का है और पाकिस्तान का निर्माण भी हिंदुओं से नफरत के आधार पर हुआ था। इसलिए उससे अलग होने के बाद भी बांग्लादेश में हिन्दू विरोध की भावना को पुनः जोर पकड़ने में ज्यादा समय नहीं लगा।  इस तथ्य को भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान के निर्माण की मुहिम बंगाल से ही हुई थी। आजादी मिलने के समय  बंगाल में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं का जो कत्ले आम हुआ वह भी सर्वविदित है। वर्तमान में बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर लगता है विभाजन के समय से उत्पन्न नफरत आज भी बांग्लादेश के मुसलमानों में विद्यमान है। लेकिन क्रिसमस के दिन ईसाई समुदाय पर गुस्सा उतारकर वहाँ के मुस्लिम गुंडों ने दिखा दिया कि इस देश में मानवता पूरी तरह खत्म हो चुकी है। भारत के लिए ये चिंता का विषय है क्योंकि वहाँ हिंदुओं पर किये जा रहे जुल्मों के पीछे भारत के प्रति दुर्भावना ही है। अब तक भारत ने जो धैर्य दिखाया वह कूटनीतिक तौर पर सही है क्योंकि किसी देश के अंदरूनी मामले में सीधे हस्तक्षेप करना सही नहीं होता। शेख हसीना को लेकर भी हमारे सामने व्यवहारिक और कूटनीतिक मुश्किलें हैं । भारत ने उन्हें अब तक औपचारिक रूप से शरण भी नहीं दी । उधर बांग्लादेश उन्हें वापस करने की मांग कर चुका है। वहाँ रह रहे हिंदुओं की सुरक्षा भी नाजुक मुद्दा है। यद्यपि भारत ने अघोषित तौर पर बांग्लादेश को दी जाने बहुत सी चीजों की आपूर्ति कम करते हुए दबाव बनाया है किंतु अब समय आ गया है जब इस देश पर दबाव और बढ़ाया जाए। इसका सबसे अच्छा तरीका है आर्थिक नाकेबन्दी की जाए। कुछ वर्षों पहले नेपाल ने भी जब सीमा विवाद पैदा कर भारत विरोधी रुख दिखाया तब इसी कदम से उसकी ऐंठ कम हुई थी। उसके बाद मालदीव में आई चीन समर्थक सरकार ने भी भारत को आँखें दिखाना शुरू किया तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सांकेतिक कदम ने ही उसके पर्यटन उद्योग की कमर तोड़ दी जिससे घबराकर वहाँ के नये शासक दौड़े - दौड़े दिल्ली आये और रिश्ते सुधारने की दुहाई देने लगे। बांग्लादेश का मसला हालांकि ज्यादा पेचीदा है किंतु उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि भारत के जरा से प्रतिरोध के सामने टिक नहीं सकेगा। अगले महीने की 20 तारीख को अमेरिका में बांग्लादेश की नई सरकार को संरक्षण देने वाले राष्ट्रपति अलग हो जाएंगे और भारत समर्थक डोनाल्ड ट्रम्प व्हाइट हाउस में पहुंचेंगे। संभवतः भारत उसी की प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन उसके पहले किसी बड़े कदम की तैयारी कर लेनी चाहिए । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 December 2024

केन - बेतवा लिंक परियोजना की शुरुआत अटल जी को सार्थक श्रद्धांजलि है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा म.प्र के खजुराहो में केन - बेतवा लिंक परियोजना का शिलान्यास किया जाना एक ऐतिहासिक अवसर है। 44 हजार करोड़ रु. की इस परियोजना का 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। उ.प्र और मध्यप्रदेश की दो नदियों को जोड़ने वाली इस परियोजना के पूरे होने पर 11 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित हो सकेगी वहीं 113 मेगावाट पन बिजली और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा जिसका लाभ अकेले म.प्र के खाते में आयेगा। सबसे बड़ी बात बुंदेलखंड के बड़े इलाके में जल की किल्लत दूर होने से वहाँ आर्थिक विकास के दरवाजे खुल सकेंगे और लोगों के पलायन को भी रोका जा सकेगा। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में म.प्र और राजस्थान के  मुख्यमंत्रियों ने पार्वती - क़ाली सिंध और चम्बल लिंक परियोजना सम्बन्धी समझौता हस्ताक्षरित किया। नदियों को जोड़ने की कल्पना सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा संजोई गई थी। देश में विश्वस्तरीय राजमार्गों के अलावा प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना भी अटल जी की दूरदर्शिता का ही सुपरिणाम है। शुरू - शुरू में सड़कों के विकास को धन की बरबादी और ऑटोमोबाइल उद्योग को लाभ पहुंचाने वाला बताया गया। इसी तरह नदियों को आपस में जोड़ने की परिकल्पना का भी मखौल बनाया गया। दुर्भाग्य से 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार चली गई और उसके बाद आई डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार ने नदियों को जोड़ने में तो कोई रुचि ही नहीं ली वहीं राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों के विकास की गति भी बेहद धीमी कर दी। वह सरकार पूरे 10 साल चली। यदि उस दौरान उक्त दोनों प्रकल्पों पर प्राथमिकता के आधार पर काम किया गया होता तो आज देश की स्थिति कहीं बेहतर होती। ये संतोष का विषय है कि केन - बेतवा लिंक परियोजना की शुरुआत  प्रधानमंत्री श्री मोदी आज स्व. अटल जी की 100 वीं जयंती के दिन कर रहे हैं। निश्चित रूप से ये उनके प्रति  सार्थक श्रद्धांजलि है। इस संदर्भ में ये बात भी विचारणीय है कि इस तरह के महत्वपूर्ण प्रकल्पों को अमल में लाने के मामले में भी राजनीति होती है। मसलन 2004 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद आई केंद्र सरकार यदि नदियों को जोड़ने जैसी परियोजनाओं पर ध्यान देती तो निश्चित रूप से देश के बड़े हिस्से को सूखे और बाढ़ जैसी विपदाओं से बचाया जा सकता था। ये विडंबना ही है कि आज तक विभिन्न राज्यों के बीच नदियों के जल का बंटवारा विवाद का विषय बना हुआ है। इसके लिए हुए आंदोलनों में जन और धन दोनों की हानि हुई। दक्षिण में कावेरी और उत्तर में यमुना नदी के जल को लेकर पड़ोसी राज्यों के बीच चली आ रही खींचातानी ये दर्शाती है कि समस्याओं के समाधान  के प्रति हमारे यहाँ कितनी लापरवाही बरती जाती है। केन - बेतवा लिंक परियोजना उस दृष्टि से बहुत बड़ी सौगात है जो उ.प्र और म.प्र के अत्यंत पिछड़े इलाकों को विकास के पथ पर आगे ले जाने में सहायक होगी। केंद्र सरकार ने 44 हजार करोड़ के इस प्रकल्प में 90 प्रतिशत योगदान स्वीकृत कर निश्चित रूप से सराहनीय कदम उठाया है। दोनों राज्यों में फैला बुंदेलखंड अंचल अपने गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ प्राकृतिक संपदा भी बेशुमार है। लेकिन आजादी के बाद इस इलाके की समुचित देखभाल नहीं होने से ये प्रगति की दौड़ में पीछे रह गया किंतु बीते कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय के कारण बुंदेलखंड में भी विकास की उम्मीद नजर आने लगी है। प्रधानमंत्री चूंकि स्वयं ही देश में अधो संरचना के विकास में रुचि लेते हैं इसीलिए उनके 10 वर्षीय शासनकाल में   राज मार्गों, फ्लाई ओवर, नदियों पर पुल, सीमांत क्षेत्रों में सड़क और रेल सेवा , हवाई अड्डे, बंदरगाह आदि का निर्माण रिकार्ड संख्या में हुआ। पहले की सरकारें धन की कमी का रोना रोती रहीं जबकि मोदी सरकार ने आर्थिक संसाधन जुटाकर देश को विकसित करने का जो  बीड़ा उठाया उसका ही सुपरिणाम केन - बेतवा लिंक परियोजना के शिलान्यास के रूप में देखने मिल रहा है। इस महत्वपूर्ण प्रकल्प को मूर्त रूप देने के लिए प्रधानमंत्री श्री मोदी के साथ ही प्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव भी बधाई के हकदार हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इस तरह की अन्य लंबित परियोजनाएं भी जल्द ही शुरू की जाएंगी जिससे जल संसाधनों का समुचित उपयोग हो सके। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 December 2024

परिवहन विभाग और भ्रष्टाचार एक दूसरे के समानार्थी हैं


म.प्र में भ्रष्टाचार का बड़ा प्रकरण चर्चा में है। आधा क्विंटल सोना, करोड़ों की नगद राशि और बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज बरामद हो चुके हैं। एक डायरी भी मिली जिसमें कतिपय नेताओं और अधिकारियों से जुड़े लेन - देन का ब्यौरा बताया जा रहा है। लोकायुक्त और आयकर के बाद अब ईडी भी उस मामले से जुड़ गई है। सबसे बड़ी बात ये है कि इतने बड़े घोटाले का कर्ताधर्ता परिवहन विभाग का एक अदना सा पूर्व आरक्षक है जिसने  अनुकंपा नियुक्ति के जरिये नौकरी प्राप्त करने के बाद बहुत ही कम समय में करोड़ों  - अरबों का वह साम्राज्य खड़ा कर  दिया जो  किसी भी शासकीय कर्मचारी के लिए सपने में भी असंभव है। सौरभ शर्मा नामक उक्त आरक्षक का  मित्र चेतन गौर भी इस कांड में शामिल है जिसके नाम से वह पूरा कारोबार करता था। फ़िलहाल सौरभ दुबई में बताया जाता है जहाँ  से उसके प्रत्यर्पण के प्रयास चल रहे हैं। जिस तरह के खुलासे  हो रहे  हैं उनके आधार पर ये कहना गलत नहीं है कि ये मामला किसी छोटे से सरकारी कर्मचारी द्वारा की गई क़ाली कमाई का सबसे बड़ा प्रकरण होगा। इसके पूर्व  भी सरकार के अनेक भृत्य और पटवारी स्तर के कर्मचारियों के यहाँ छापों में जप्त की गई धनराशि और उनकी संपत्तियों का विवरण  इस बात को प्रमाणित करता है कि यहाँ की सरकारी मशीनरी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। सरकार दावा करती है कि उसके दफ्तरों में ऐसी कार्य प्रणाली लागू है जिससे आम जनता का काम बिना घूस दिये  हो। लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। सौरभ शर्मा जैसे न जाने कितने सरकारी महकमों में कुंडली जमाये बैठे हैं।  जो जानकारी आ रही है उससे तो लगता है मानों वह आरक्षक न होकर परिवहन विभाग का कोई बड़ा अधिकारी रहा हो । विपक्षी दल परिवहन मंत्री को घेर रहा है। इस मामले में सत्ता पक्ष निश्चित रूप से दबाव में है। आरोप पूर्व मुख्य सचिव पर भी लग रहे हैं जिन्होंने अपनी सफाई भी दे डाली। किंतु सौरभ के मायाजाल में अनेक अधिकारियों के फंसे होने की खबरों से पूरा प्रशासन तंत्र सहमा हुआ है। कौन किस हद तक इस कांड से जुड़ा है ये तो जांच पूरी होने के बाद भी स्पष्ट होगा किंतु इतना तो सामान्य बुद्धि वाला भी बता देगा कि बिना ऊपरी संरक्षण के एक आरक्षक स्तर का कर्मचारी इतना बड़ा खेल करने का साहस नहीं कर सकता था। अनुकंपा नियुक्ति पाकर उसने  इतनी बड़ी कमाई करने के बाद नौकरी छोड़ दी और करोड़ों का कारोबारी बन गया। एकांत स्थान पर खड़ी कार में सोने का भंडार मिलने को लेकर भी तरह - तरह की कहानियाँ सुनने मिल रही हैं। छापे से जुड़े विभागों में श्रेय लेने की होड़ मची है। आगे की कारवाई कौन करेगा इसे लेकर भी खींचतानी चल रही है। जिन नेताओं की तरफ संदेह की सुई घूम रही है वे अपनी सफाई देने में जुट गए हैं। लपेटे में आने वाले अधिकारी भी अपने संरक्षकों के चक्कर लगा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने किसी को न बख्शने की बात कहते हुए हर संभव जाँच का आश्वासन भी दिया है। लेकिन चूंकि जप्त हुई डायरी में प्रशासनिक अधिकारियों के नाम होने की चर्चा है इसलिए ये आशंका व्यक्त की जाने लगी है कि कुछ दिनों की सनसनी के बाद मामले पर पर्दा डाला जाने लगेगा, बड़े - बड़े वकील आरोपियों के बचाव में खड़े होंगे, निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक प्रकरण चलेगा। और क्या पता आरोपी  बाइज्जत  बरी हो जाएं। यदि इस मामले में केवल राजनीतिक हस्तियां फंसती होतीं तो अभी तक भूचाल आ चुका होता किंतु प्रशासनिक अधिकारियों के नाम डायरी में आने के बाद मामले के रफा - दफा किये जाने की संभावना व्यक्त की जाने लगी है। हनीट्रैप नामक कांड इसका उदाहरण है। लंबा समय नहीं बीता जब परिवहन विभाग के सर्वोच्च अधिकारी विभागीय कर्मचारियों से पैसे स्वीकार करते कैमरे में कैद हो गए। आनन -  फानन उनका तबादला पुलिस मुख्यालय कर दिया गया। लेकिन इतने बड़े खुलासे के बाद जैसी कारवाई उन साहेब बहादुर पर अपेक्षित थी वह नहीं हुई। सच बात तो ये है परिवहन विभाग और भ्रष्टाचार एक दूसरे के समानार्थी हैं। ये अवधारणा बेहद मजबूत है  कि इसमें भृत्य से लेकर तो शीर्ष अधिकारी तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। अपवाद स्वरूप ही कोई दूध का धुला होता होगा। इस भ्रष्टाचार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है क्योंकि रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए वाहनों की व्यवस्था परिवहन विभाग के सौजन्य से होने के कारण इसमें जमे अधिकारी नेताओं के कृपापात्र हो जाते हैं। आज जो विपक्ष में हैं वे भी सत्ता में रहते हुए इस मुफ्त सेवा का लाभ लेते रहे। सरकार में जिन विभागों को मलाईदार कहा जाता है उनमें से परिवहन अग्रणी है। लेकिन सौरभ शर्मा ने जॊ कारनामा किया वह अभूतपूर्व है। मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव के लिए भ्रष्टाचार के विरूद्ध जंग छेड़ने का यह अच्छा अवसर है। यदि वे इस कांड के बहाने सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने का बीड़ा उठा लें तो उन्हें अप्रत्याशित जन समर्थन हासिल होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 December 2024

राहुल और प्रियंका पर मुस्लिम सांप्रदयिकता का सहारा लेने का आरोप

 

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस हर मोर्चे पर असफल रही। मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते उससे अपेक्षा थी कि वह जनता की समस्याओं को उठायेगी और सरकार के कमजोर पक्ष पर प्रहार करेगी। उसके पास मुद्दों और अवसरों की कमी भी नहीं थी किंतु हमेशा की तरह वह उनका लाभ उठाने से चूक गई। राहुल गाँधी के साथ ही प्रियंका वाड्रा भी उन विषयों में उलझकर रह गईं जो अब उबाऊ लगने लगे हैं। कांग्रेस के पास संसद के दोनों सदनों में कुछ सांसद ऐसे हैं जो संसदीय बहस में अनुभवी हैं और सम - सामयिक विषयों पर उनका अध्ययन भी अच्छा है। लेकिन पार्टी उन्हें अवसर न देकर उनकी योग्यता का उपयोग नहीं कर पाती।  यही कारण रहा कि सत्र के दौरान भाजपा ने जब कांग्रेस और गाँधी परिवार पर चौतरफा हमले किये तब पार्टी के सांसदों द्वारा वैसा बचाव नहीं किया गया जैसा होना चाहिए था। इसी तरह अन्य विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया। परिणाम ये हुआ कि लोकसभा चुनाव के उपरांत पहले कामकाजी सत्र के  दौरान  विपक्ष में जो समन्वय देखा गया वह इस सत्र में गायब रहा। लोकसभा में नई बैठक व्यवस्था किये जाने से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कांग्रेस से खफ़ा हो गए जो इस सत्र के पूर्व तक राहुल के बगल में बैठते थे। और तो और फैज़ाबाद से जीतकर आये अवधेश प्रसाद को भी वे अपने बगल में बिठाते थे। राजनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चाओं के अनुसार उ.प्र में हुए उपचुनावों में सपा की करारी हार के बाद अखिलेश की राहुल से नाराजगी बढ़ गई है। स्मरणीय है उन उपचुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों के बीच मतभेद इतना बढ़ा कि कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से ही इंकार करते हुए सपा को अकेले छोड़ दिया। सपा का कहना है कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी कोई मदद नहीं की। इसी कारण से जब राहुल के नेतृत्व में पूरी कांग्रेस अदाणी मुद्दे पर संसद चलने नहीं दे रही थी तब सपा ने सामने आकर कहा कि उसे अदाणी मुद्दे में कोई रुचि नहीं है और वह चाहती है संसद चले। ऐसा ही रुख तृणमूल कांग्रेस ने दिखाया जो राहुल के लिए किसी झटके से कम नहीं था। दरअसल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं। संसद में गठबंधन के घटक दलों ने भी कांग्रेस को जिस तरह किनारे किया वह इस बात का संकेत है कि लोकसभा चुनाव के पहले अस्तित्व में आये इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के बीच रणनीतिक एकता भले हो गई किंतु भावनात्मक तौर पर उनके मन एक दूसरे से नहीं मिल सके। इसीलिए चुनाव खत्म होते ही जब ये स्पष्ट हो गया कि गठबंधन नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से नहीं रोक सका तब उसके सदस्यों में कांग्रेस की क्षमताओं को लेकर अविश्वास जागने लगा। ये बात भी गलत नहीं है कि मुख्य विपक्षी दल बनते ही कांग्रेस ने भी घटक दलों को हाशिये पर रखने की नीति अपनाई। राहुल चूंकि नेता प्रतिपक्ष बन गए इसलिए सदन में उन्हें महत्व मिलने लगा जिसे अन्य किसी के साथ बांटने से वे बचने लगे। और जबसे प्रियंका का लोकसभा में प्रवेश हुआ तबसे तो अन्य दलों से दूरी और बढ़ गई। संसद सत्र के दौरान उत्पन्न दरार अब और तेज होती दिख रही है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि केरल में  सरकार के सबसे बड़े घटक सीपीएम ने कांग्रेस पर अतिवादी मुस्लिम गुटों से समर्थन प्राप्त कर वायनाड लोकसभा चुनाव जीतने का आरोप लगाया जो बेहद संगीन है। पार्टी नेता विजयराघवन ने पत्रकार वार्ता में कहा कि पहले राहुल और फिर प्रियंका ने उक्त सीट से चुनाव जीतने के लिए उग्रवाद के पोषक मुस्लिम संगठनों का साथ लिया। उल्लेखनीय है चुनाव प्रचार के दौरान राहुल और प्रियंका की रैलियों में मुस्लिम लीग सहित अन्य मुस्लिम संगठनों के झंडे और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में नजर आये थे।  अब तक भाजपा ही ये आरोप लगाती आई है किंतु उसकी घोर विरोधी सीपीएम द्वारा राहुल और प्रियंका पर मुस्लिम सांप्रदायिक शक्तियों का सहारा लेकर चुनाव जीतने का आरोप इंडिया गठबंधन में टूटन बढ़ने के अलावा कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष होने के दावे पर बड़ा प्रहार है।  यद्यपि केरल में इंडिया गठबंधन कारगर नहीं हो सका। लोकसभा चुनाव में वामदलों ने राहुल से अनुरोध किया था कि वे वायनाड सीट छोड़कर  उत्तर भारत में कहीं से लड़ें  वे राहुल नहीं माने। अब प्रियंका भी वहीं से संसद पहुँच गईं। ये देखते हुए अब इंडिया गठबंधन की दरारें और चौड़ी होती दिख रही हैं। अब  तक सहयोगी दल कांग्रेस पर दूसरे आरोप लगाते थे किंतु अब सीपीएम द्वारा गाँधी भाई - बहिन पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के सहारे चुनाव जीतने का आरोप लगाकर गठबंधन के सैद्धांतिक आधार पर ही प्रहार कर दिया गया है। देखना ये है कि अपनी  मुस्लिम परस्ती के लिए बदनाम सपा इस आरोप पर क्या कहती है? अन्य दलों की प्रतिक्रिया भी मायने रखेगी क्योंकि मुस्लिम सांप्रदायिकता को लेकर भाजपा पहले से ही गठबंधन को घेरती रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 December 2024

शीतकालीन सत्र में इंडिया गठबंधन का बिखराव साफ नजर आ गया

संसद का शीतकालीन सत्र गत दिवस समाप्त हो गया। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में औसत 50 फीसदी कामकाज हो सका और उस दौरान भी होहल्ला जारी रहा। पूरे सत्र में एक भी विधेयक पारित नहीं हुआ। एक देश एक चुनाव के विधेयक को भी जेपीसी के हवाले कर दिया गया। कांग्रेस ने अदाणी मुद्दे पर भाजपा को घेरना चाहा तो जवाबी हमले में अमेरिकी धनकुबेर जॉर्ज सोरोस से गाँधी परिवार के रिश्ते को उजागर करते हुए भाजपा ने घेराबंदी  की कोशिश की। हालांकि सत्र का समापन संविधान पर चली चर्चा और सांसदों के बीच धक्का - मुक्की जैसी घटना से हुआ किंतु जो  सबसे महत्वपूर्ण बात देखने मिली वह थी विपक्षी दलों में एकजुटता का अभाव। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद  इंडिया गठबंधन में जबरदस्त निराशा दिखी। हालांकि हार तो हरियाणा में भी हुई थी किंतु वहाँ कांग्रेस ने  चूंकि एकला चलो की नीति अपनाई इसलिए  ठीकरा उसी के सिर फूटा। शिवसेना और सपा सहित इंडिया गठबंधन के अन्य सदस्यों ने भी खुलकर कहा कि कांग्रेस अकेले दम पर जीतने की क्षमता गँवा चुकी है। उन बयानों का उद्देश्य महाराष्ट्र चुनाव में सीटों  के बंटवारे में कांग्रेस के वर्चस्व को कम करना था और उसका असर भी हुआ। कांग्रेस को वहाँ शरद पवार और उद्धव ठाकरे के अलावा सपा को भी उनकी मांग के मुताबिक सीटें देनी पड़ गईं। चूंकि लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र ने इंडिया गठबंधन को भारी सफलता प्रदान की थी इसलिए उसका हौसला काफी बुलंद था। लेकिन चुनाव परिणाम उम्मीद के पूरी तरह विपरीत आये जिनमें  कांग्रेस का प्रदर्शन अब तक का सबसे खराब रहा। लेकिन उसके साथ ही उद्धव ठाकरे और शरद पवार की लुटिया भी डूब गई। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जम्मू - कश्मीर और झारखंड में विपक्ष की जीत पर हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा को मिली कामयाबी भारी पड़ गई। हरियाणा में तो भाजपा अकेले दम पर स्पष्ट बहुमत ले आई।  महाराष्ट्र में यद्यपि उसने शिवसेना ( शिंदे) और अजीत पवार के साथ सीटों का बंटवारा किया किंतु अकेले ही 132 सीटें जीत लीं जो बहुमत से मात्र 12 कम हैं। और इसी वजनदारी के बल पर एकनाथ शिंदे को हटाकर देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री पद मिला। इस नतीजे से एक तरफ जहाँ एनडीए के उत्साह में वृद्धि हुई वहीं इंडिया गठबंधन में टूटन की गति और तेज़ हो गई। यद्यपि आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के फ़ौरन बाद ही अकेले चलने की घोषणा कर दी थी किंतु हरियाणा में उसने कांग्रेस से कुछ सीटें मांगी जिसके लिए राहुल गाँधी तो राजी हो गए परंतु भूपिंदर सिंह हुड्डा  बात नहीं माने। इससे नाराज होकर अरविंद केजरीवाल ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस के लिए गड्ढा खोद दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी दोनों एक दूसरे के विरुद्ध ताल ठोक रहे हैं। महाराष्ट्र चुनाव के फ़ौरन बाद हुए संसद के सत्र में इंडिया में शामिल अन्य घटक दलों ने भी कांग्रेस से दूरी बनाने के संकेत दे दिये। शुरुआत की ममता बेनर्जी ने गठबंधन का नेतृत्व संभालने की इच्छा जताकर  जिसे उद्धव ठाकरे गुट के अलावा सपा और लालू का समर्थन मिलने से गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे।  राहुल गाँधी द्वारा अदाणी प्रकरण उठाये जाने से उत्पन्न विवाद के कारण जब रोजाना सदन स्थगित होने की स्थिति बनी और भाजपा ने भी सोरोस रूपी अस्त्र चला दिया तब विपक्ष के अन्य दल ये कहते हुए सामने आये कि उनकी रुचि न तो अदाणी मुद्दे में है और न ही सोरोस  से उन्हें कुछ लेना देना है। वे तो इतना ही चाहते हैं कि सदन चले। तृणमूल और सपा ने तो खुलकर कांग्रेस से दूरी बना ली। जैसे - तैसे सत्र तो समाप्त हो गया किंतु दिल्ली, बिहार और उसके बाद प. बंगाल, केरल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के बिखरने के आसार साफ देखे जा सकते हैं। राहुल गाँधी की चुनाव जिताऊ क्षमता  हरियाणा और महाराष्ट्र  में फुस्स साबित होने के बाद  अब सहयोगी दल कांग्रेस के साथ जुड़े रहने से हो रहे नुकसान के बारे में सोचने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि वह अपने वर्चस्व वाले राज्यों में तो किसी  अन्य को साथ रखती नहीं किंतु जहाँ उसकी जड़ें कमजोर हो चुकी हैं वहाँ राष्ट्रीय पार्टी का रुतबा झाड़कर बड़ा हिस्सा मांगती है। म.प्र और हरियाणा में सपा को  कांग्रेस की उपेक्षा का अनुभव हो चुका है। बाकी दलों को भी धीरे - धीरे कांग्रेस बोझ लगने लगी है। इन सब कारणों से नये साल में इंडिया गठबंधन में खींचातानी होने की पूरी - पूरी संभावना है।  शीतकालीन सत्र के दौरान  इंडिया गठबंधन में   साझा रणनीति का अभाव खुलकर देखने मिला। ऐसा लगता है राहुल गाँधी की आत्मकेंद्रित कार्य शैली गठबंधन की एकजुटता में सेंध लगाने का कारण बन रही है। लंबे समय से गठबंधन में शामिल पार्टियों के नेताओं की बैठक न होना भी दर्शाता है कि उनमें संवादहीनता उत्पन्न हो चुकी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 20 December 2024

राहुल की ज़िद के कारण कांग्रेस सत्र का लाभ उठाने से चूक गई


संसद में  गत दिवस जो हुआ वह शर्मनाक है। दो सांसद घायल होकर अस्पताल में भर्ती किये गये। एक महिला सांसद ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पर अन्य आरोप लगाया। भाजपा की शिकायत पर पुलिस ने  उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर लिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस के भी इसी तरह के आरोप हैं जिनमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ भाजपा सांसदों द्वारा धक्का - मुक्की की शिकायत है। जो सांसद घायल हुए उनकी चोटें स्पष्ट दिखाई देती हैं। यदि श्री गाँधी ने धक्का नहीं दिया तब उनको घायल हुए सांसद से मिलकर स्थिति स्पष्ट करना चाहिए थी किंतु प्रियंका वाड्रा सहित कांग्रेस का समूचा प्रचार तंत्र उल्टे भाजपा पर आरोप लगा रहा है। और तो और सोशल मीडिया पर कांग्रेस समर्थक घायल सांसदों का मजाक उड़ाते हुए कह रहे हैं कि जरा सी धक्का -  मुक्की में आई. सी. यू में भर्ती हो गए। और भी तरह - तरह के ताने मारे जा रहे हैं। शीतकालीन सत्र का आज अवसान हो  गया ।  उद्योगपति गौतम अदाणी की गिरफ्तारी की मांग को लेकर कांग्रेस ने सदन नहीं चलने दिया। शुरू में तो अन्य विपक्षी दल उसके साथ नजर आये किंतु धीरे - धीरे उनमें फूट पड़ने लगी क्योंकि  वे अपने मुद्दे नहीं उठा पा रहे थे। बीते कुछ दिनों से संविधान पर हुई चर्चा भी व्यर्थ के विवाद में उलझती चली गई। और अदाणी से शुरू हुआ विवाद डाॅ.आंबेडकर  तक जा पहुंचा। लेकिन सत्र समाप्ति के एक दिन पहले कुछ सांसदों का खून बहने जैसी दुखद घटना के कारण यह सत्र कलंकित होकर रह गया। राहुल ने धक्का दिया या नहीं इसका पता तो पुलिस लगायेगी किंतु सांसदों को चोट आई ये तो पूरी तरह स्पष्ट है। लेकिन बजाय सहानुभूति दिखाने के अनर्गल बातें करना ये दर्शाता है कि संसदीय प्रजातंत्र के दामन पर खून के धब्बे लगने लगे हैं। कांग्रेस का कहना है उसके सांसद प्रवेश द्वार पर प्रतिदिन प्रदर्शन करते थे। भाजपा की शिकायत है कांग्रेस वाले दरवाजे से आवाजाही अवरुद्ध कर रहे थे। इस विवाद से इतर विचारणीय प्रश्न ये है कि संसद जनता और देश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार कर उचित निर्णय करने के लिए बनाई गई है। सरकार बेशक बहुमत के बल पर बनती है परंतु आदर्श स्थिति तो वही है जब सत्ता और विपक्ष वैचारिक भिन्नता के बावजूद जनता और देश की बेहतरी से जुड़े मुद्दों पर एकजुट हों। उस दृष्टि से मौजूदा मुख्य विपक्षी दल  अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन में पूरी तरह उदासीन है। ऐसा लगता है कांग्रेस लगातार तीन लोकसभा चुनाव में सत्ता से वंचित रहने से कुंठाग्रस्त हो चली है। विशेष रूप से राहुल को ये बात समझ लेनी चाहिये कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और नेहरू - गाँधी परिवार के प्रति पहले जैसा समर्थन नहीं रहा। अपने दम पर सत्ता हासिल करने की उसकी हैसियत  चंद राज्यों तक ही सीमित है। बड़े राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों के सहारे रह गई है। लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद उसे लगने लगा था कि वह भाजपा का विकल्प बनने की क्षमता अर्जित कर चुकी है किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के  चुनाव परिणाम से उसकी उम्मीदों पर तुषारापात हो गया। यहाँ तक कि इंडिया गठबंधन के घटक दलों तक ने उसे आँखें दिखाना शुरू कर दिया। नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद श्री गाँधी से अपेक्षा थी कि वे परिपक्वता दिखाएंगे किंतु वे इस सोच से बाहर नहीं निकल पा रहे कि केवल प्रधानमंत्री पर निजी हमले करने से जनता उनको सिर आँखों पर बिठा लेगी। दो राज्यों में हुई करारी पराजय के बाद बुद्धिमत्ता इसी में थी कि कांग्रेस जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर अपनी छवि सुधारती किंतु राहुल के बचपने के कारण उसने अवसर गँवा दिया। सही बात ये है कि अदाणी मुद्दे से आम जनता को कुछ लेना - देना नहीं है। रही बात डाॅ. आंबेडकर को भुनाने तो दलित वर्ग की राजनीति करने वाले अपने प्रेरणा पुरुष को इतनी आसानी से किसी और के हाथों नहीं जाने देंगे। हालांकि शीतकालीन सत्र छोटा होता है किंतु कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के पर्याप्त मुद्दे थे जिसमें वह एक बार फिर विफल रही। राहुल गाँधी को इस मामले में शरद पवार से सीखना चाहिए जो महाराष्ट्र चुनाव में उत्पन्न कटुता के बाद भी अपने क्षेत्र के किसानों की समस्याओं पर बात करने प्रधानमंत्री के पास जा पहुंचे। उधर मुंबई में उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस से भेंट करने की बुद्धिमत्ता दिखाई। बेहतर हो श्री गाँधी अतीत में विपक्ष के नेता रहे लोगों के संसदीय जीवन का अध्ययन करें जो कम संख्या में होने के बाद भी अपनी छाप छोड़ने में सफल हो जाते थे और घोर सैद्धांतिक मतभेदों के बाद भी सत्ता पक्ष के साथ निजी तौर पर मधुर सम्बन्ध बनाकर रखते थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी