Wednesday, 8 January 2025

दिल्ली का चुनाव इंडिया गठबंधन से ज्यादा कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण



दिल्ली विधानसभा  चुनाव की तिथि घोषित हो गई। हालाँकि चुनाव प्रचार काफी पहले से शुरू हो  चुका है। आम आदमी पार्टी ने तो लोकसभा चुनाव के फौरन बाद ही अकेले लड़ने की घोषणा कर दी थी। हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा एक भी सीट न दिये जाने  के बाद दोनों के बीच पूरी तरह से अलगाव हो गया। हालाँकि दिल्ली के कांग्रेस नेताओं को अरविंद केजरीवाल का साथ कभी रास नहीं आया। आम आदमी पार्टी बनने के बाद श्री केजरीवाल ने गाँधी परिवार सहित कांग्रेस के अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए वे पार्टी को सदैव कचोटते रहे।  उल्लेखनीय है कि जिस शराब घोटाले के कारण मनीष  सिसौदिया और श्री केजरीवाल को जेल जाना पड़ा उसकी शिकायत उपराज्यपाल से कांग्रेस ने ही की थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को रोकने बने इंडिया गठबंधन में जब आम आदमी पार्टी भी शामिल हो गई तब स्थानीय नेता मन मसोसकर रह गये। श्री केजरीवाल के जेल में रहने के दौरान दिल्ली में गठबंधन की जो रैली हुई उसमें उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल को सोनिया गाँधी के साथ बिठाया गया। बाद में लोकसभा चुनाव भी दोनों पार्टियों ने मिलकर लड़ा किंतु एक भी सीट नहीं मिली। उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब  रहने से इंडिया गठबंधन में राहुल गाँधी के नेतृत्व के विरोध में आवाजें उठने लगीं। इसकी मुहिम ममता बैनर्जी ने शुरू की जिसे शिवसेना ( उद्धव ) , लालू प्रसाद यादव और सपा का समर्थन मिलने से कांग्रेस के लिए शर्मनाक स्थिति बन गई। संसद के शीतकालीन सत्र में भी विपक्ष का बिखराव खुलकर सामने आया जिसका कारण  श्री गाँधी की कार्यशैली ही रही। खुद को श्री मोदी  का विकल्प मान लेने की उनकी खुशफहमी बाकी विपक्षी नेताओं को नागवार गुजरने लगी। इसीलिए अदाणी मुद्दे पर एक - दो को छोड़कर बाकी दलों ने कांग्रेस से दूरी बना ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने के निर्णय के बाद विपक्षी एकता की गुंजाइश तो पहले ही खत्म हो चुकी थी। बाकी कसर पूरी कर दी कांग्रेस द्वारा गठबंधन के साथियों से सलाह किये बिना चुनाव में उतरने से। पार्टी के वरिष्ट नेता अजय माकन द्वारा श्री केजरीवाल को  एंटी नेशनल ( देश विरोधी) कहे जाने के बाद आम आदमी पार्टी ने तो कांग्रेस को इंडिया गठबंधन से निकाल बाहर करने तक की मांग कर डाली। कांग्रेस  इस चुनाव में जिस हौसले के साथ उतरी उससे लगा था कि वह अपनी खोई जमीन वापिस लेने में कामयाब हो जायेगी। उल्लेखनीय है  विधानसभा चुनावों में लुटिया डुबोने के बावजूद भी  2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी से ज्यादा मत प्राप्त हुए थे। लेकिन 2013 में दिल्ली की सरकार गंवाने के बाद भाजपा को रोकने के लिए श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने हेतु समर्थन देकर कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की जो गलती की उससे वह आज तक उबर नहीं पाई। शीला दीक्षित के बाद कोई ऐसा चेहरा उसके पास नहीं है जो मतदाताओं को आकर्षित कर सके।  और जिन राहुल के दम पर पार्टी अपने स्वर्णिम दिनों को पुनर्जीवित करना चाह रही है उन्होंने दिल्ली का दंगल छोड़ विदेश जाकर नया साल मनाने को प्राथमिकता दी और वह भी पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के निधन के फ़ौरन बाद। जिसे लेकर उनकी चौतरफा आलोचना हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद श्री गाँधी पार्टी की उम्मीदों के केंद्र हैं। जब श्री केजरीवाल दिल्ली की गली - गली में घूमकर प्रचार में जुटे हुए हैं और प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भाजपा की तरफ से मोर्चा संभाल लिया तब कांग्रेस के शीर्ष नेता का युद्धभूमि से दूर चला जाना बेहद गैर जिम्मेदाराना कदम  माना जा रहा है। जबकि ये चुनाव इंडिया गठबंधन से ज्यादा कांग्रेस  के लिए महत्वपूर्ण है। दिल्ली में सत्ता हासिल करना तो उसके लिए नामुमकिन है लेकिन यदि वह पिछले चुनावों की तरह ही चारों खाने चित्त हुई तब नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव में लालू यादव एंड कं उन्हें कितना भाव देगी ये सोचने वाली बात है। प. बंगाल में ममता तो कांग्रेस को कुछ समझती ही नहीं हैं। ये सब देखते हुए अपेक्षा थी कि न सिर्फ राहुल बल्कि प्रियंका वाड्रा भी पार्टी की नैया डूबने से बचाने आगे आयेंगी। लेकिन अब तक जो देखने मिला उसके अनुसार कांग्रेस का प्रथम परिवार   अपने आप में मगन है। चुनाव में जय - पराजय होती रहती है किंतु योद्धा वह होता है जो पूरी हिम्मत से लड़े। आम आदमी पार्टी और भाजपा के  दिग्गज तो बिना समय गंवाए मैदान में उतर आये जबकि कांग्रेस  के प्रमुख सेनापति नये साल के जश्न की खुमारी से निकल नहीं पा रहे। ऐसे में उसका क्या हश्र होगा उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता पर तो हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे पानी फेर ही चुके हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 January 2025

सनातन के बाद तमिलनाडु में राष्ट्रगान का भी अपमान


दक्षिण के राज्यों में उत्तर भारत और हिन्दी के प्रति यदि सबसे अधिक नफरत कहीं है तो वह तमिलनाडु है। वहाँ इस बात को भी प्रचारित किया जाता रहा है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़ हैं जबकि आर्य विदेशों से आये थे। आजादी के बाद से ही वहाँ उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध में वातावरण बनाया जाने लगा। रामास्वामी पेरियार ने उच्च जातियों के विरुद्ध आंदोलन चलाकर जिस नास्तिकतावाद को द्रविड़ आंदोलन की शक्ल में आगे बढ़ाया कालांतर में इस राज्य की राजनीति उसी में उलझकर रह गई। द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) से शुरू उस राजनीतिक धारा को यद्यपि आगे चलकर  एम.जी.रामचंद्रन ने (अद्रमुक) अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बनाकर  दो हिस्सों में बांट दिया। उसमें से भी छोटी - छोटी कुछ धाराएं और निकलीं किंतु मुख्य रूप से द्रमुक और अद्रमुक ही बारी - बारी से राज करते रहे। संघीय ढांचे के कारण तमिलनाडु को भी  केंद्र से रिश्ते रखने पड़ते हैं और इसी वजह से दोनों द्रविड़ पार्टियां केंद्र  में बनी गठबंधन सरकारों से जुड़ती रहीं किंतु उनका दृष्टिकोण सदैव  राष्ट्रीय हितों से परे द्रविड़ अस्मिता से प्रेरित और प्रभावित रहा। इसके चलते उन्होंने राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं किया। ये दुर्भाग्य ही है कि मुख्यधारा से अलग चलने के बावजूद इन दोनों पार्टियों के दबाव को कांग्रेस और भाजपा दोनों सहती आ रही हैं। राजीव गाँधी की हत्या के आरोप से घिरी द्रमुक  के साथ कांग्रेस का गठबंधन है जबकि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अकारण गिरवा देने वाली अद्रमुक से बाद में भाजपा  ने गठबंधन कर लिया। केंद्र पर दबाव डालकर अपने राज्य के लिए अधिकाधिक  संसाधन या अन्य सुविधा हासिल करने में तो दक्षिण के सभी राज्यों का रवैया एक जैसा रहा है किंतु तमिलनाडु जैसी अलगाव की भावना उनमें नहीं है। श्रीलंका में चले तमिल इलम आंदोलन को द्रमुक का खुला समर्थन था। ये कहना भी गलत नहीं है कि तमिलनाडु को अलग देश बनाने का सपना स्व. करुणानिधि देखने लगे थे। हालांकि वह साकार नहीं हो सका , लेकिन अलगाववाद रूपी ज़हर के बीज समय - समय पर अंकुरित होते रहे हैं। कभी कोई नेता हिन्दी लादने पर भारत से अलग होने की धमकी देता है तो कोई सनातन को नष्ट करने का आह्वान करने की हिमाकत कर बैठता है। सरकार में बैठते समय भारत के संविधान की शपथ लेने वाले तमिलनाडु के राजनेता उसकी धज्जियां उड़ाने की धृष्टता गाहे - बगाहे करते रहते हैं। हालांकि तमिलनाडु के लाखों लोग देश के अन्य राज्यों में बस गए हैं। वहाँ उनके साथ कभी भेदभाव नहीं हुआ और न ही उन्होंने हिन्दी के प्रति कभी कोई शिकायत की। उत्तर भारत के सस्थानों से हिन्दी में उपाधि अर्जित कर सैकड़ों तमिलभाषी केंद्रीय विभागों में राजभाषा अधिकारी बन गए। ये सब देखकर लगता है कि तमिलनाडु में हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान तीनों को लेकर जो विषवमन किया जाता है उसके पीछे वह राष्ट्रविरोधी सोच ही है जो स्वतंत्र तमिल राष्ट्र की स्थापना की पक्षधर है। इसका ताजा उदाहरण है गत दिवस राज्य विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण के अवसर पर राष्ट्रगान की बजाय तमिलनाडु का राज्य गान गाया जाना। परंपरानुसार राज्यपाल के अभिभाषण के पूर्व और उपरांत राष्ट्रगान गाया जाता है।  लेकिन केवल तमिलनाडु का राज्य गान ही हुआ तब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष से राष्ट्रगान हेतु कहा किंतु उन्होंने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जिससे रुष्ट होकर वे बिना अभिभाषण पढ़े लौट आये और सोशल मीडिया पर भी राज्य सरकार के प्रति आलोचनात्मक टिप्पणी पोस्ट कर दी। जवाब में मुख्यमंत्री ने राज्यपाल पर तमिलनाडु के अपमान का आरोप लगाते हुए पद छोड़ने की मांग कर डाली। हालांकि  राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच तनातनी नई बात नहीं है। गैर भाजपा शासित अन्य  राज्यों से भी  इस तरह की खबरें आये दिन सुनाई देती हैं। लेकिन राष्ट्रगान के स्थान पर राज्य गान का वादन या  गायन संघीय व्यवस्था के प्रति अलगाव के भाव को दर्शाता है। मुख्यमंत्री स्टालिन और राज्यपाल के बीच चलने वाली खींचतान के चलते संवैधानिक परंपराओं और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों का अपमान हो तो ये अक्षम्य है। स्मरणीय है स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने , जो उनकी सरकार में मंत्री भी हैं, कुछ समय पूर्व सनातन की तुलना कोरोना और कैंसर से करते हुए उसे नष्ट करने का आह्वान किया था। आश्चर्य ये है कि इंडिया गठबंधन के किसी भी घटक ने तमिलनाडु विधानसभा में राष्ट्रगान के अपमान पर द्रमुक सरकार की आलोचना नहीं की। कांग्रेस भी तमिलनाडु में स्टालिन सरकार का हिस्सा है। एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते उससे ये अपेक्षा है कि वह राष्ट्रगान के अपमान के लिए मुख्यमंत्री स्टालिन की आलोचना करे। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि तमिल राष्ट्र के आंदोलन से उपजी घृणा ने ही राजीव गाँधी की जान ले ली थी।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

दिल्ली के चुनाव को प्रदूषित कर रहे बयान


दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला होने से सरगर्मी  कुछ ज्यादा ही है। कांग्रेस जो पिछले दो चुनावों में शून्य पर पहुँच गई थी इस बार अपना अस्तित्व बचाने हाथ पाँव मार रही है। वहीं भाजपा की कोशिश है वह लोकसभा चुनाव के धमाकेदार प्रदर्शन के अनुरूप विधानसभा चुनाव में भी सफलता हासिल कर सके जिसके लिए वह बीते 25 साल से तरस रही है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस बार अपने को घिरा हुआ मानकर बेहद सतर्क है। शराब घोटाले के अलावा मुख्यमंत्री आवास पर श्री केजरीवाल द्वारा किया गया बेतहाशा खर्च भी उसके लिए मुसीबत बना हुआ है। कांग्रेस और भाजपा दोनों रोजाना नये - नये सवाल पूछकर आम आदमी पार्टी को रक्षात्मक होने मजबूर कर रही हैं। इस बार के चुनाव में अनेक पुराने साथी श्री केजरीवाल का साथ छोड़ गए। वहीं मनीष सिसौदिया जैसे दिग्गज को तो चुनाव क्षेत्र बदलना पड़ गया। आक्रमण आम आदमी पार्टी भी कर रही है किंतु उसे इस बात का डर सताने लगा है कि यदि कांग्रेस अपने मतों में 5 फीसदी की वृद्धि भी  कर ले गई तब उसकी राह कठिन हो जाएगी। इसीलिए  श्री केजरीवाल आरोप लगा रहे हैं कि उनके विरुद्ध कांग्रेस और भाजपा में गुप्त समझौता हुआ है। हालांकि उनके विरुद्ध कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र पूर्व सांसद संदीप दीक्षित को उतार दिया जबकि भाजपा ने भी पूर्व मुख्यमंत्री साहेब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा को उम्मीदवार बनाया है जो पिछली लोकसभा के सदस्य थे किंतु उन्हें टिकिट से वंचित रखा गया। बयानों के तीर सभी पक्षों से चल रहे हैं। लेकिन ये बात सही है कि इस बार भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध उतनी आक्रामक नहीं हैं और दोनों की तोपों के मुँह आम आदमी पार्टी की तरफ ही हैं। लेकिन गत दिवस कालका सीट से भाजपा के उम्मीदवार रमेश बिधूड़ी  ने पहले कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा और उसके बाद मुख्यमंत्री आतिशी सिंह के बारे में आपत्तिजनक बयान देकर भाजपा को व्यर्थ की मुसीबत में डाल दिया। एक बयान में उन्होंने मतदाताओं को आश्वस्त किया कि भले ही लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सड़कों को हेमा  मालिनी के गालों की तरह चिकना बनवाने का वायदा पूरा नहीं किया किंतु वे दिल्ली की सड़कों को प्रियंका के गालों जैसा बनवाएंगे। उनके इस बयान की चौतरफा आलोचना हुई तो उन्होंने माफी की रस्म अदायगी कर डाली । लेकिन कुछ देर बाद ही वे बोल बैठे कि मुख्यमंत्री आतिशी ने तो अपना पिता बदल लिया जो पहले अपने नाम के साथ मार्लेना लगाती थीं किंतु अब आतिशी सिंह लिखती हैं। इसके बाद आम आदमी पार्टी भाजपा पर चढ़ बैठी और इस बयान को  दिल्ली की महिलाओं का अपमान बताते हुए मुद्दा बनाने की पहल शुरू कर दी। यद्यपि तीख़ी बयानबाजी सभी पक्षों द्वारा जारी है किंतु श्री बिधूड़ी ने प्रियंका और आतिशी के बारे में  जो कुछ कहा वह शालीनता के लिहाज से बेहद आपत्तिजनक था। लालू ने बरसों पहले जो कहा उसे आधार बनाकर नई टिप्पणी करना दिमागी दिवालियापन नहीं तो और क्या है? ये वही बिधूड़ी हैं जिहोंने लोकसभा में किसी विपक्षी सांसद पर बेहद निम्नस्तरीय कटाक्ष कर दिया। उस पर उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग भी उठी। हालांकि वह मंजूर नहीं हुई किंतु भाजपा ने उनकी लोकसभा टिकिट काट दी। जिससे ये संदेश गया कि लोकसभा में उनकी टिप्पणी को पार्टी नेतृत्व ने पसंद नहीं किया। लेकिन विधानसभा चुनाव में उनको उम्मीदवार बना दिया गया। उल्लेखनीय है श्री बिधूड़ी  दिल्ली से लोकसभा और विधानसभा सदस्य रह चुके हैं जिससे उनका जनाधार साबित होता है। ये भी हो सकता है कि उनको बगावत से रोकने मुख्यमंत्री के विरुद्ध उतारकर बलि का बकरा बना दिया गया हो। लेकिन उनके संदर्भित बयानों ने भाजपा की अच्छी भली आक्रामकता को झटका दे दिया। यद्यपि बेलगाम जुबान वाले नेता कमोबेश हर पार्टी में हैं किंतु भाजपा जैसी अनुशासन पसंद पार्टी में  श्री बिधूड़ी जैसे नेताओं को क्यों ढोया जाता है ये समझ से परे है। हालांकि राजनीतिक विमर्श में भाषा की मर्यादा जिस तरह तार - तार हो रही है वह चिंता का विषय है। चुनाव जीतने की क्षमता ही उम्मीदवारी का आधार मान लेने के कारण पार्टियां ऐसे उम्मीदवारों को अवसर देती हैं। श्री बिधूड़ी जीतेंगे या नहीं ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि उन्होंने अपनी पार्टी  को शर्मिंदगी झेलने मजबूर कर दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 January 2025

शहरी चश्मे से देखने पर गाँवों का विकास असंभव है


आज ग्रामीण भारत महोत्सव 2025 के शुभारंभ के पूर्व  सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है कि  हमारे गाँव जितने समृद्ध होंगे, विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में उनकी भूमिका उतनी ही बड़ी होगी। 9  जनवरी तक चलने वाला यह महोत्सव विकसित भारत 2047 के लिए एक लचीले ग्रामीण भारत का निर्माण विषय पर केंद्रित ही। इस महोत्सव के दौरान ग्रामीण भारत की उद्यमशीलता की भावना और सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाया जाएगा। ये बात तो हर कोई जानता और मानता है कि भारत कृषि प्रधान देश है और अंधाधुंध शहरीकरण के बावजूद आज भी  लगभग तीन चौथाई जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है। हालांकि शहरी क्षेत्रों का विस्तार होते जाने के साथ ही सड़क और बिजली पहुँचने के कारण ग्रामीण भारत में भी जबरदस्त बदलाव हुआ है।  जनता के रहन - सहन के तौर - तरीकों में आया परिवर्तन  आश्चर्यचकित करने वाला वाला है। सड़क और बिजली के बाद ग्रामीण जीवन को  जिस चीज ने सबसे अधिक प्रभावित किया वह है संचार माध्यम। टीवी, और मोबाइल के साथ इंटरनेट सुविधा की उपलब्धता ने भारत के गाँवों में बीते 20 वर्षों में जितना बदलाव किया उतना आजादी के बाद के 50 सालों में देखने नहीं मिला। और इसीलिए तमाम उपभोक्ता कंपनियों ने शहरों के समानांतर ग्रामीण उपभोक्ता पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। परिणाम  वहाँ से पूर्वापेक्षा ज्यादा मांग आ रही है। टीवी, फ्रिज के बाद अब गाँवों में एयर कंडीशनर भी देखने मिल जाते हैं। वो जमाने लद गए जब वहाँ केवल मोटर साइकिल, जीप और ट्रैक्टर की मांग थी। उससे आगे बढ़कर अब ग्रामीण भारत में स्कूटी और  महंगी लग्जरी कारें भी जमकर बिक रही हैं। निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को भी गाँवों में कमाई का स्रोत नजर आया तो उन्होंने भी शहरों के बाहर अपने संस्थान खोलकर ग्रामीण जनता को आकर्षित करने का दांव चला। उसके चलते  वहाँ एंबुलेंस और स्कूल बसों की आवाजाही नजर आने लगी है। हालांकि ये स्थिति उन गाँवों की ही है जो शहरों के निकट हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित कम  आबादी वाले  हजारों गाँवों के लिए विकास एक सपने जैसा है। आजादी के बाद से ही गाँवों, के विकास के लिए अनगिनत योजनाएं बनीं। ग्रामीण विकास के लिए हर सरकार भारी -  भरकम बजट का प्रावधान करती है। लेकिन भ्रष्टाचार के कारण उसका सही लाभ गाँवों को नहीं  मिल सका। शहरों की तरफ भागने की प्रवृत्ति के पीछे विकास की कमी ही बड़ा कारण है। ग्रामीण भारत महोत्सव उस दिशा में एक अच्छा  प्रयास कहा जायेगा बशर्ते वह सरकारी कर्मकांड से परे ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को गहराई से समझकर उन्हें पूरा करने पर ध्यान दे। इस दिशा में  सबसे बड़ा विचारणीय मुद्दा है खेती के प्रति ग्रामीण युवाओं की घटती रुचि। केवल  बाजार के विकास और ग्रामीण जनता को उपभोक्तावाद के शिकंजे में जकड़ लेना विकास का सही पैमाना नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की कल्पना बिना कृषि के असंभव है। तमाम विसंगतियों के बाद भी खेती रोजगार के आधारभूत स्रोतों में है। इसीलिए मशीनीकरण के बाद भी बुवाई और कटाई के मौसम में शहरी इलाकों में कार्यरत श्रमिक गाँवों में चले जाते हैं। लेकिन बाकी समय खेतिहर मजदूरों की कमी के चलते कृषि करने वाले परेशान होते हैं। ग्रामीण भारत का नौजवान शहरी आकर्षण के वशीभूत जिस प्रकार गाँव छोड़ देता है उसकी वजह से पीढ़ियों से खेती करते आ रहे लोग अपनी जमीनें बेचने मजबूर  हैं। विकास कार्यों के लिए भूमि का अधिगृहण भी खेती के रकबे में कमी का कारण है। खेती को लाभ का व्यवसाय तभी बनाया जा सकेगा जब किसान का पूरा परिवार उसमें संलग्न हो। इसके लिए जरूरी है ग्रामीण और शहरी इलाकों  के विकास में  विषमता दूर की जाए। शिक्षा के प्रसार के कारण ग्राम छोड़ने की परिस्थिति उत्पन्न होना अलग बात है किंतु रोजगार की तलाश में  गांवों से पलायन होना देश के कृषि प्रधान होने के दावे पर संदेह उत्पन्न करता है। किसानों की आत्महत्या, न्यूनतम समर्थन मूल्य, गाँवों से पलायन जैसे अनेक मुद्दे  लंबे समय से राष्ट्रीय विमर्श  में हैं किंतु कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाने के कारण  व्यर्थ का तनाव बना हुआ है। हालांकि इसके पीछे सक्रिय ताकतों का  उद्देश्य गाँवों और किसानों का हित न होकर अपनी राजनीति चमकाने के अलावा अराजकता को प्रश्रय देना है। लेकिन गाँवों के विकास को शहरी चश्मे से देखने की बजाय वहाँ की जमीनी जरूरत के मुताबिक किये जाने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोके बिना उनके विकास की बात सोचना बेमानी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 January 2025

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव भारत के लिए लाभदायक


जब अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी फ़ौजें काबिज थीं तब पाकिस्तान की नीति दोगलेपन की थी। एक तरफ तो उसने तालिबानी लड़ाकों पर हवाई हमले के लिए अपने हवाई अड्डे अमेरिकी  को उपलब्ध करवाए वहीं दूसरी  तरफ अमेरिकी फौजों से लड़ने के लिए तालिबानियों को अपनी सीमा के भीतर अड्डे बनाने की अनुमति दी।  जब अमेरिकी सेना ने अपना डेरा समेट कर तालिबानियों को सत्ता सौंप दी तब पाकिस्तान  ने जमकर जश्न मनाया जिसमें उसका आका  चीन भी शामिल हुआ। भारत में भी वामपंथी तबके सहित अन्य विपक्षी दल बल्लियों उछल रहे थे। चूंकि मुल्ला - मौलवी अमेरिका को अपना दुश्मन मानते हैं इसलिए उनको खुश करने के लिए धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार विजयोल्लास में डूबे थे। भारत सरकार के चूंकि अमेरिका से रिश्ते सुधार पर थे इसलिए तालिबानियों की जीत पर भारत की विदेश नीति पर भी सवाल उठाये जाने लगे। वहाँ रह रहे हिन्दू और सिखों की सुरक्षा की चिंता भी होने लगी। जो भारतीय कंपनियां वहाँ ठेका लिए हुई थीं उनके कारोबार पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे। तालिबानी हुकूमत को भारत ने  मान्यता भी नहीं दी। इसलिए जो माहौल बना उसमें ये चिंता तैर  रही थी कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान की जुगलबंदी भारत के लिए बड़ी समस्या बनेगी।  इस पहाड़ी देश की सीमा ईरान के अलावा मध्य एशिया के उन देशों से भी मिलती है जो सोवियत संघ के हिस्से हुआ करते थे। इसलिए चीन इस समूचे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की फ़िराक में था। लेकिन चार साल बाद उन तमाम कयासों पर विराम लग गया। जो पाकिस्तान तालिबानियों की जीत पर ढोल पीट रहा था वही आज अफ़ग़ानिस्तान के हमलों का सामना करने मजबूर है। पश्चिमी सीमांत के जिस  इलाके में उसने  तालिबानी  अड्डे बनाने की छूट दी थी उन्होंने उन्हें खाली करने से न सिर्फ  इंकार कर दिया बल्कि वे पाकिस्तानी सीमा में और भी भीतर घुसकर अपनी चौकियाँ बना रहे हैं। दोनों देशों के बीच सीमा का जो निर्धारण अंग्रेजों द्वारा किया गया था उसे तालिबानियों ने मानने से साफ मना कर दिया। उनके हमलों से त्रस्त होने के बाद पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा हवाई हमले कर लगभग 50 अफगानी मार दिये गए तो तालिबानियों ने दोगुनी ताकत दिखाकर पाकिस्तान की अनेक सैनिक चौकियाँ छीन लीं। काबुल में बैठे शासक जिस तरह से पाकिस्तान के प्रति आक्रामक हो उठे वह चौंकाने वाला है। उससे भी बड़ी बात ये है कि कूटनीतिक रिश्ते न होने के बाद भी तालिबानी सत्ता का रुख भारत के प्रसि नर्म हुआ है। भारतीय कंपनियों को वहाँ किये जा रहे विकास कार्यों में भाग लेने का विधिवत प्रस्ताव मिलने के साथ भारत से खाद्यान्न एवं अन्य जरूरी चीजें वहाँ भेजे जाने से सम्बन्ध काफी सुधरे हैं। हालांकि कश्मीर में आतंकी घटनाओं में अफगानिस्तान का हाथ भी रहा है किंतु इस बार का तालिबानी शासन भारत से दोस्ती का पक्षधर होने के साथ ही पाकिस्तान से दुश्मनी पाल बैठा है जो इस क्षेत्र के शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव कहा जाएगा। भारत के लिए ये स्थिति बेहद सुखद है। क्योंकि बांग्ला देश में शेख हसीना की सत्ता के पतन के बाद जो अंतरिम सरकार काबिज हुई उसने पाकिस्तान से जिस तरह का दोस्ताना बढ़ाया वह भारत के लिए बड़े खतरे की शुरुआत मानी जा रही थी। ये भी कहा जाने लगा था कि पाकिस्तान एक बार फिर  युद्ध की परिस्थिति पैदा कर सकता है जिससे भारत दोहरे संकट में फंसे। लेकिन बलूचिस्तान में पहले से चल रहे विद्रोह को दबाने में तो उसे पसीने छूट ही रहे थे ऊपर से तालिबानी लड़ाकों के हमलों से मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। कश्मीर के जिस हिस्से को उसने कब्जा रखा है वहाँ भी  बगावत का माहौल है। चीन की जो परियोजनाएं चल रही हैं उनका भी विरोध स्थानीय निवासी कर रहे हैं जिससे चीन नाराज है। राजनीतिक तौर भी अंदरूनी हालात इतने दयनीय कभी नहीं नहीं रहे। भारत के विरुद्ध जनता के मन में नफरत पैदा करने का दाँव भी काम नहीं कर रहा। इसका प्रमाण वहाँ से आने वाले वीडियो हैं जिनमें आम नागरिक विशेष तौर पर युवा अपने देश की दुर्दशा के लिए हुकूमत को कोसने के साथ भारत की प्रगति की प्रशंसा करते देखे जा सकते हैं। टीवी चैनलों में होने वाली बहस में भी भारत के पक्ष में बोलने वाले बढ़ रहे हैं जो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका और उसके पिछलग्गू देश तो पाकिस्तान से दूरी बना ही रहे हैं किंतु अब तो चीन भी उसके भिखमंगेपन से त्रस्त होकर उसे खाली हाथ लौटाने लगा है। यद्यपि ये कहना तो जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान टूट जायेगा क्योंकि बलूचिस्तान की आजादी बिना विदेशी मदद के संभव  नहीं किंतु अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान के भीतर घुसकर सीमांत क्षेत्र में जिस तरह से कब्जा करना शुरू किया वह उसके लिए लाईलाज मर्ज बन सकता है क्योंकि तालिबानियों से पार पाना उसके बस के बाहर है। सियासी अनिश्चितता के कारण सेना भी असमंजस में फंसी है। इमरान खान की गिरफ्तारी  सरकार के लिए गले की फांस साबित हो रही है। ये हालात भारत के लिए पूरी तरह अनुकूल हैं क्योंकि कहाँ तो तालिबानी हुकूमत के साथ मिलकर पाकिस्तान कश्मीर में गड़बड़ी पैदा करने का मंसूबा पाल रहा था  और कहाँ तालिबान उसी के लिए मुसीबत बन बैठे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 2 January 2025

आर्थिक विकास में धर्म स्थल भी निभा सकते हैं महत्वपूर्ण भूमिका


जो लोग मंदिर बनाने अथवा तीर्थस्थलों के विकास की आलोचना करते हुए उस पैसे का उपयोग विद्यालय, शौचालय और ऐसे ही अन्य कार्यों पर खर्च करने की वकालत करते हैं उनको गत दिवस देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं  की संख्या देखकर अपनी सोच की समीक्षा करनी चाहिए। जो समाचार आये हैं उनके अनुसार देश के जितने भी बड़े मंदिर और गुरुद्वारे हैं उनमें वर्ष 2025   के प्रथम दिवस अभूतपूर्व जनसैलाब नजर आया  । बावजूद इसके कि 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला नव वर्ष मूलतः ईसाई काल गणना से जुड़ा हुआ है और अंतर्राष्ट्रीय कैलेंडर भी इसी पर आधारित है। गत दिवस न सिर्फ हिन्दू मंदिरों अपितु अमृतसर के सुप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में भी अयोध्या के राम मंदिर के बराबर दर्शनार्थी पहुंचे। वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और उज्जैन के महाकाल परिसर में भी यही नजारा दिखा। इसके अलावा नदियों के तट पर भी उत्सव का माहौल देखने मिला। यद्यपि नये साल का स्वागत शराब - कबाब से करने वाले भी कम नहीं थे किंतु उनकी दुनिया अलग है। आशय ये है कि धार्मिक पर्यटन भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। अयोध्या में गत वर्ष राम मंदिर के निर्माण के बाद से ही वहाँ दर्शनार्थियों की दैनिक संख्या औसतन 50 हजार है जो किसी भी विशिष्ट अवसर पर लाखों का आंकड़ा पार कर जाती है। 2025  शुरू होने के पूर्व ही अयोध्या के सारे होटल , धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस भर चुके थे। लगभग यही स्थिति वाराणसी, उज्जैन, शिरडी, तिरुपति आदि की रही। अयोध्या के पहले काशी विश्वनाथ और महाकाल परिसर को विकसित स्वरूप प्रदान करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जाने के साथ ही पुराने निर्माण हटाये गए जिससे आवागमन सुलभ हो। उसका विरोध भी हुआ , राजनीति की दुकानें भी सजीं। लेकिन जब विकास पूरा हुआ तब विरोधियों  के मुँह ये देखकर बंद हो गए कि उक्त मंदिरों में आने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई, जिनमें ज्यादातर लोग बाहरी थे। अर्थात इन मंदिरों के कारण वाराणसी और उज्जैन में होटल और टैक्सी जैसे व्यवसाय में तो बढ़ोत्तरी हुई ही किंतु  पूजा सामग्री विक्रेताओं का भी कारोबार जमकर चलने लगा। यहाँ तक कि साइकिल और ऑटो रिक्शा चालकों की कमाई भी बढ़ी। वाराणसी में साड़ियों के अलावा गलीचों के कारोबारी भी विश्वनाथ परिसर के विकास के बाद अपने व्यवसाय में वृद्धि से प्रसन्न हैं। उज्जैन में महाकाल परिसर इलाके में जिनके मकान हैं उनमें से बहुतों ने होम स्टे की व्यवस्था कर अतिरिक्त  आय का स्रोत पैदा कर लिया। एक मोटे अनुमान के अनुसार उज्जैन में फूल -  माला बेचने वालों की संख्या में 25 हजार की वृद्धि हुई है। म.प्र में ही महाकाल के साथ ओंकारेश्वर को भी नया स्वरूप दिये जाने के बाद वहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। यही सब देखकर केंद्र सरकार ने देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का विकास करने की योजना बनाई है जिनमें गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर भी है। वृंदावन में बिहारी जी का मंदिर बेहद संकरे स्थान में होने से श्रद्धालुओं को बहुत तकलीफ होती है। एक - दो  बड़े हादसों के बाद उ.प्र सरकार ने उसके भी समुचित विकास का निर्णय किया है। भारत में धार्मिक आस्था की जड़ें काफी गहरी हैं। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद नई पीढ़ी  में धर्म के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है। लेकिन धर्मस्थलों पर बाबा आदम के जमाने की लचर व्यवस्थाओं की वजह से  युवा वहाँ जाने से कतराते थे। लेकिन जिन धार्मिक स्थलों को नया स्वरूप दिया गया उनमें आने वालों में युवा दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि  विकास  पर किये गए खर्च का औचित्य सिद्ध कर रही है। हालांकि इसका एक पक्ष ये भी है कि धार्मिक यात्रा को पर्यटन का स्वरूप दिये जाने से धर्मस्थलों की पवित्रता और काफी हद तक मर्यादा नष्ट होती है। उत्तराखंड के चार धामों की सड़कें विकसित होने के बाद वहाँ तीर्थयात्रियों की संख्या साल दर साल बढती जाने से पर्यावरण की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। लेकिन इन यात्राओं का पेशेवर तरीके से प्रबंध किया जाए तो उसका हल हो सकता है। जमीनी सच्चाई ये है कि सदियों पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को समय के साथ यदि दुरुस्त किया जाए तो धार्मिक स्थलों के जरिये रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास संभव है। भारत सरकार को चाहिए सभी राज्यों से प्रमुख धर्मस्थलों की सूची लेकर उनको विकसित करने की कार्य योजना इस प्रकार बनाई जाए जिससे  मूल स्वरूप को छेड़े बिना वहाँ आने वालों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। हालिया अनुभव बताते हैं जिन भी धार्मिक स्थलों को विकसित किया गया वहाँ दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि होने से अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सहारा मिला। घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में भी ये कदम सहायक साबित होगा इसमें दो मत नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 1 January 2025

हर हाल में साथ रहे मध्यम वर्ग की उपेक्षा उचित नहीं


21 वीं सदी का 25 वां साल आज से शुरू हो रहा है। बीते 24 वर्षों का सफर बेहद उतार -  चढ़ाव भरा रहा। देश नये - नये अनुभवों से गुजरा। जिनमें सुखद और दुखद दोनों रहे। कोरोना जैसी महामारी के सामने समूची  मानवता असहाय खड़ी नजर आई।  बड़ी आर्थिक महाशक्तियाँ भी उस संकट का सामना करने में विफल नजर आईं। जिन देशों की स्वास्थ्य सेवाएं वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठतम मानी जाती थीं उनमें लाशों के ढेर लग गए। लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। ऐसे में भारत ने  एक अभूतपूर्व ऊर्जा के साथ उस संकट का मुकाबला सफलतापूर्वक किया। 140 करोड़ लोगों का निःशुल्क टीकाकरण  साधारण कार्य नहीं था । यही नहीं तो  दुनिया भर ने हमारे यहाँ बने टीके हासिल किये। अनेक गरीब देशों को करोड़ों टीके मुफ़्त देकर भारत ने उनकी सद्भावना अर्जित की। घरेलू मोर्चे पर 80 करोड़ लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न देकर अराजकता की स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी। जरूरतमंदों के खाते में नकद राशि पहुँचाई गई। जब सब कुछ बंद था तब भारत के किसानों ने रिकार्ड उत्पादन कर देश को  मुसीबत में फंसने से बचाया। औद्योगिक उत्पादन भी  होता रहा जिससे जरूरी चीजों की आपूर्ति नहीं रुकी। हालांकि सब कुछ अच्छा हुआ, ऐसा नहीं है। कुछ विफलताएं भी देखने मिलीं किंतु कोरोना संकट  में एक नये भारत का उदय हुआ जो आत्मविश्वास से भरा है और जिसमें आत्मनिर्भर होने की लगन हिलोरें मार रही है। विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का गौरव  हमारे साथ जुड़ा है। संकट के समय भी जनता ने अनुशासन का परिचय देते हुए दायित्वबोध  प्रदर्शित किया। चुनाव प्रक्रिया के जरिये प्रजातंत्र में  अखंड विश्वास व्यक्त  करते हुए भारत की जनता ने विश्व के समक्ष उदाहरण पेश किया। इन्हीं सबसे हमारी प्रतिष्ठा विश्व मंचों पर बढ़ी है। कोरोना के बाद रूस -  यूक्रेन और इजरायल - फिलीस्तीन संघर्ष में भारत की भूमिका ने कूटनीतिक जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। देश के भीतर राजनीतिक स्थिरता होने से आर्थिक मोर्चे पर भी बड़े फैसले हो रहे हैं। भारत दुनिया भर के निवेशकों  को आकर्षित करने में सफल हो रहा है। लोगों का जीवन स्तर निरंतर उठ रहा है। आयुष्मान योजना का विस्तार होने से सभी वर्गों के बुजुर्गों को निःशुल्क चिकित्सा का लाभ मिलना एक क्रांतिकारी कदम है। राजमार्गों सहित अधो - संरचना के अन्य प्रकल्पों पर तेजी से हो रहे काम विकास के जीवंत प्रतीक हैं। बड़े उद्योगों के अलावा लाखों स्टार्ट अप देश में उद्यमशीलता और स्व - रोजगार की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रमाण हैं। देश रक्षा सामग्री का आयात करने के साथ ही निर्यात भी कर रहा है। उच्च शिक्षा के नये केंद्र खुल रहे हैं। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम वैश्विक  प्रतिस्पर्धा में मुस्तैदी से खड़ा है। लेकिन अभी  बड़े - बड़े लक्ष्य हमें प्राप्त करना है। अनेक क्षेत्रों में अभी विकास की जरूरत है। भ्रष्टाचार लाइलाज  होता जा रहा है। चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाने को लुटाने की जो होड़ राजनीतिक दलों में मची है वह आर्थिक नियोजन पर भारी पड़े बिना नहीं रहेगी। इस पर चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को ही बंदिश लगानी होगी क्योंकि राजनीतिक दलों से कोई अपेक्षा  फिजूल है। लेकिन एक बात और जिस पर आगामी बजट के पहले विमर्श होना चाहिए  वह है देश के विशाल मध्यम वर्ग के हितों का संरक्षण। ये वह तबका है जो समूची अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखता है। यदि दुनिया भर के लिए भारत  एक बड़े बाजार के तौर पर उभरा है तो उसका श्रेय इसी वर्ग को है। विदेशों में बसे ज्यादातर  भारतीय मध्यम वर्ग के ही हैं जिनका  भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इस वर्ग को बजट में  कोई खास रियायत नहीं दी जाती। आयकर की व्यवस्था में बेशक उल्लेखनीय सुधार हुआ है किंतु उसके बोझ में जितनी कमी होनी चाहिए थी उतनी नहीं होने से मध्यम वर्ग में असंतोष है। उसके मन में ये भावना  घर बना चुकी है कि उद्योगपतियों के लिए तो केंद्र और राज्य सरकारें लाल कालीन बिछाती हैं वहीं गरीबों पर सौगातों की बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही। लेकिन मध्यमवर्ग कर चुकाते - चुकाते परेशान है। ये देखते हुए केंद्र सरकार से अपेक्षा है आगामी बजट में आयकर छूट की सीमा में वृद्धि के साथ ही जीएसटी की दरें घटाई जाएं। इस बारे में ये बात समझने वाली है कि करों की कम दरें लोगों की क्रय शक्ति में जो वृद्धि करती हैं उसका लाभ अंततः सरकारी खजाने को ही होता है। मौजूदा केंद्र सरकार जिस भाजपा के नेतृत्व में चल रही है उसका जनाधार आज भले सभी वर्गों में फैल गया हो किंतु शुरुआत में  मध्यम वर्ग  ही उसका समर्थक रहा है। ऐसे में जब भाजपा के अच्छे दिन आये तब उसे चाहिए उस मध्यम वर्ग को उपेक्षित न करे  जिसने हर हाल में उसका साथ दिया।


-रवीन्द्र वाजपेयी