Friday, 17 January 2025

इजराइल और हमास में युद्धविराम की सफलता संदेह के घेरे में



अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा   शपथ लेने के पहले इजराइल और हमास के बीच युद्ध विराम होने की खबर पूरी दुनिया के लिए राहत लेकर आई है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजराइल पर सैकड़ों मिसाइलें छोड़े जाने के साथ ही जमीनी हमला किया गया। इसमें बड़ी संख्या में इजराइली मारे गए वहीं सैकड़ों बंधक बना लिए गए।  जवाब में इजराइल ने हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी पर ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिये। देखते - देखते  समूचा गाजा क्षेत्र मलबे  में परिवर्तित होता गया। बच्चों सहित  हजारों लोग मारे जा चुके हैं । गाजा को बिजली सहित अन्य चीजों की आपूर्ति भी चूंकि इजराइल के जरिये ही होती थी जिसके रुक जाने से लोग अभूतपूर्व संकट में फंस गए। संरासंघ के अलावा अनेक देशों ने वहाँ राहत सामग्री पहुंचाई किंतु उसका वितरण भी बड़ी समस्या बन गई। स्वास्थ्य सेवाएं भी चरमरा गईं। इजराइल की रणनीति गाजा को पूरी तरह बरबाद करने की थी जिसमें वह काफी हद तक सफल भी हुआ। हमास के ढांचे को भी उसने बुरी तरह तहस - नहस कर दिया। इसका जो दुष्परिणाम गाजा वासियों ने भोगा वह  दिल दहलाने वाला है। यद्यपि इसके लिए हमास ही जिम्मेदार है जिसने अकारण हमला किया।  उसके दस्तों ने इजराइल में घुसकर जिस  हैवानियत का प्रदर्शन किया उसका भी कोई  औचित्य नहीं  था।  चूंकि हमास द्वारा  इजराइल  की अभेद्य सुरक्षा प्रणाली में सेंध लगाए जाने से नेतन्याहू की जबरदस्त किरकिरी हुई इसीलिए वे आर - पार  की जिद पकड़कर बैठ गए। गाजा से बड़ी संख्या में पलायन शुरू हुआ किंतु  पड़ोसी देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं। उधर लेबनान में सक्रिय हिजबुल्ला नामक आतंकवादी संगठन  ने भी हमास के समर्थन में इजराइल पर हमले का दुस्साहस किया जिसके बाद  एक और मोर्चा खुल गया। आशंका ये थी कि अमेरिका का घोर विरोधी ईरान भी इजराइल से भिड़ेगा किंतु उसके इरादों को नेतन्याहू के आक्रामक अंदाज ने ठंडा कर दिया। यद्यपि सवा साल तक लड़ाई चलने के बाद भी हमास ने घुटने नहीं टेके जो इजराइल के लिए भी चिंता का कारण बनता जा रहा था। दूसरी तरफ यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के कारण परेशान दुनिया के तमाम देश पश्चिम एशिया में लगातार खराब हो रहे हालातों से पस्त हो चुके थे। सही बात ये है कि  अवकाश लेने जा रहे अमेरिका के  राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ही उक्त दोनों युद्धों की पटकथा लिखी थी। यूक्रेन और रूस की जंग रुकवाने की कुव्वत तो उनकी थी नहीं क्योंकि रूसी राष्ट्रपति पुतिन झुकने को तैयार नहीं हैं। लेकिन इजराइल पर दबाव डालने में वे सक्षम थे। और फिर डोनाल्ड ट्रम्प  जिस तरह दोनों लड़ाईयां रुकवाने की बात कर रहे हैं उसके बाद बाइडेन ने श्रेय लेने के फेर में जाते - जाते युद्ध विराम करवाने की पहल की जिसके लिए हमास तो राजी था ही किंतु नेतन्याहू  भी अमेरिका के दबाव में न चाहते हुए भी रजामंद हो गए। सही बात ये है कि ज्यादातर इस्लामिक देश इजराइल से दोस्ताना कायम करने लालायित हो रहे हैं। सं.अरब अमीरात के बाद सऊदी अरब भी उससे बड़ा समझौता करने जा ही रहा था किंतु उसी बीच ईरान के उकसावे में हमास ने हमला कर तनाव पैदा कर दिया। अब जबकि युद्धविराम होने जा रहा है तब ये सवाल उठना स्वाभाविक  है कि क्या पश्चिम एशिया में  स्थायी शांति कायम हो सकेगी क्योंकि फिलीस्तीन की समस्या का समाधान नहीं होने तक शांति की बात सोचना बेमानी है। और ये भी सही है कि अमेरिका  इजराइल के जरिये अरब जगत में उथलपुथल मचाये रखने की नीति तब तक जारी रखेगा जब तक वहाँ उसके पैर पूरी तरह से न जम जाएं । स्मरणीय है हाल ही में सीरिया में रूस समर्थक असद की सत्ता पलट को जिन इस्लामिक आतँकवादी लड़ाकों ने अंजाम दिया वे मूलतः अमेरिका विरोधी थे किंतु  उनको वाशिंगटन की पूरी मदद मिली। ये देखते हुए युद्धविराम कितना सफल होगा ये कहना कठिन है। सीरिया को टुकड़े - टुकड़े करवाने की हालत तक पहुंचाने में रूस भी बराबर का दोषी है जो असद जैसे तानाशाह को संरक्षण देता रहा। कुल मिलाकर दुनिया में जहाँ भी युद्ध या आतंकवाद जैसे हालात हैं उनके लिए अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियाँ ही जिम्मेदार हैं जॊ अपने स्वार्थों की खातिर निर्दोषों का खून बहाने में तनिक भी नहीं हिचकतीं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 January 2025

क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस से दूर रहने की तैयारी में


हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव के बाद से ही इंडिया गठबंधन में  बिखराव के संकेत आने लगे थे। नेतृत्व परिवर्तन के मुद्दे पर जिस तरह से आवाजें उठीं उनसे ये लगने लगा कि राहुल गाँधी के प्रति अन्य दलों में अस्वीकृति का भाव बढ़ता ही जा रहा है। लोकसभा चुनाव के पहले तक एक - दो को छोड़कर गठबंधन में शामिल अधिकांश  दलों में उनको नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष का चेहरा मान लेने पर मौन स्वीकृति थी। सरकार बनाने पर  शायद उन्हें प्रधानमंत्री बनाये जाने पर भी कोई ऐतराज नहीं । हालांकि भाजपा स्पष्ट बहुमत से चूक गई किंतु  एनडीए के पास सरकार बनाने लायक संख्याबल था लिहाजा तीसरी बार श्री मोदी  प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए। वहीं श्री गाँधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाये गए। शुरू - शुरू में  लगा कि अपनी बढ़ी हुई ताकत के साथ विपक्ष सरकार के सामने कदम - कदम पर अड़चनें पैदा करेगा किंतु जल्द ही गठबंधन में दरारें नजर आने लगीं। यद्यपि जम्मू - कश्मीर और झारखंड में भाजपा को सफलता नहीं मिल सकी परंतु हरियाणा में भाजपा और महाराष्ट्र में भाजपा की अगुआई वाली महायुति को भारी बहुमत मिलने से विपक्ष में जो निराशा उत्पन्न हुई उसका ठीकरा कांग्रेस पर फूटने लगा। हरियाणा में तो कांग्रेस ने  गठबंधन के सहयोगी दलों को घास तक नहीं डाली किंतु महाराष्ट्र में उनको भी सीटें दी गईं। हालांकि कांग्रेस  सबसे अधिक स्थानों पर चुनाव लड़ी। लेकिन महाविकास अगाड़ी नामक विपक्षी  मोर्चे का सफाया हो गया। कांग्रेस ने अपने इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया। इसका फौरी प्रभाव इंडिया गठबंधन की एकता पर नजर आया जब ममता बेनर्जी ने नेतृत्व परिवर्तन की मुहिम छेड़ दी जिसे ऐसे घटकों का समर्थन भी मिला जो श्री गाँधी में श्री मोदी का विकल्प देखने लगे थे। संसद के पिछले सत्र में भी विपक्ष के बीच मतभेद स्पष्ट नजर आये। ऐसी उम्मीद थी कि नया साल शुरू होने पर दरारें पाटने का प्रयास किया जाएगा किंतु कांग्रेस ने कोई पहल नहीं की। और तो और श्री गाँधी छुट्टियां मनाने विदेश निकल गए। अन्य दलों की ओर से साफ उलाहना दिया गया कि लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की एक भी बैठक नहीं हुई।  ये सफाई भी आने लगी कि उसका गठन केवल लोकसभा चुनाव के लिए हुआ था लिहाजा उसे खत्म कर देना चाहिए। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी द्वारा एक - दूसरे के विरुद्ध ताल ठोकने की स्थिति बन जाने से गठबंधन की टूटन खुलकर सामने आ गई। यहाँ तक भी ठीक था क्योंकि हरियाणा में भी दोनों अलग - अलग लड़े थे किंतु जब ममता बेनर्जी, अखिलेश  यादव और उद्धव ठाकरे ने भी आम आदमी पार्टी को खुलकर समर्थन देने की घोषणा की तब विभाजन स्पष्ट हो गया। आश्चर्य की बात ये है कि अभी तक कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उसे समर्थन देने वाले उक्त तीनों नेता इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं। लेकिन  राहुल ने विदेश से लौटते ही केजरीवाल की सरकार पर जिस प्रकार से तीखा हमला किया उसके बाद विपक्ष में बिखराव की संभावना और मजबूत हो गई। श्री केजरीवाल तो कांग्रेस पर सरे आम आरोप लगा रहे हैं कि वह भाजपा के साथ मिली हुई है। राजनीतिक विश्लेषक भी ये मान रहे हैं कि दिल्ली में कांग्रेस की बढ़त भाजपा की किस्मत खोल देगी। शुरू में ऐसा लगा कि कांग्रेस किसी भी स्थिति में भाजपा की जीत में मददगार बनने के आरोप से बचना चाह रही है। उसकी आक्रामकता में आई कमी से इसकी पुष्टि भी हुई किंतु राहुल ने मैदान में उतरते ही जिस तरह से आम आदमी पार्टी को कटघरे में खड़ा किया उससे लगने लगा कि वह श्री केजरीवाल की सत्ता में वापसी में सहायक बनने की  गलती नहीं दोहरायेगी  जिसका दुष्परिणाम  आज तक भोग रही है।  कांग्रेस को जानने वाले भी ये कहने लगे कि इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों के दबाव से पार्टी को मुक्त कराने की रणनीति के चलते ही राहुल ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोला है। उसे ये समझ में आ गया है कि उसकी मौजूदा स्थिति क्षेत्रीय दलों की वजह से ही बनी है। लेकिन इसकी भनक लगते ही इंडिया गठबंधन के सदस्यों द्वारा दिल्ली चुनाव के बाद बैठक बुलाकर कांग्रेस से छीनकर नेतृत्व किसी क्षेत्रीय दल के नेता के हाथ सौंपने के संकेत दिये जाने लगे हैं। इसके पीछे उनकी सोच ये है कि कांग्रेस खुद को मजबूत करे इसके पहले ही उसे किनारे लगा दिया जाए। जाहिर है ये स्थिति कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं होगी। कम से कम राहुल किसी भी सूरत में ममता या अखिलेश  जैसे किसी क्षेत्रीय छत्रप के नेतृत्व में काम करना पसंद नहीं करेंगे। क्या होगा ये पक्के तौर पर तो कहना फ़िलहाल संभव नहीं किंतु इंडिया गठबंधन अब कांग्रेस की छाया से निकलना चाह रहा है। उसमें शामिल क्षेत्रीय दलों को ये लगने लगा है कि उनके प्रभाव वाले राज्यों में उनके सहारे खड़े रहने वाली कांग्रेस बजाय आभार के रौब दिखाती है। ये सब देखते हुए दिल्ली चुनाव के बाद विपक्ष की एकता नये रूप में सामने आयेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 15 January 2025

दिल्ली में कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अभी तक भाजपा और आम आदमी पार्टी के बड़े नेता ही मोर्चे पर नजर आ रहे थे । कांग्रेस शुरुआत में तो बेहद हमलावर दिखी किंतु अचानक उसके सुर धीमे पड़ने लगे। हालांकि अरविंद केजरीवाल लगातार ये प्रचार कर रहे हैं कि इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस का गुप्त गठबंधन है। नववर्ष मनाने जब राहुल गाँधी विदेश चले गए तब ये बात जोरदारी से प्रचारित हुई कि कांग्रेस ने इस चुनाव में उन्हीं सीटों पर जोर लगाने की नीति अपनाई है जहाँ उसके लिए  तनिक भी गुंजाइश है। इसके पीछे सोच ये बताई गई  कि कांग्रेस यदि ज्यादा जोर लगायेगी तो उससे आम आदमी पार्टी को तो नुकसान होगा लेकिन उसका लाभ अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा उठा लेगी । राहुल की अनुपस्थिति से और भी चर्चाएं होने लगीं। दिल्ली के जो कांग्रेस नेता लंबे समय से आम आदमी पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए थे वे भी उच्च नेतृत्व के उदासीन और ढुलमुल रवैये से निराश और नाराज थे। ऐसे में इस आशंका को बल मिला कि बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं द्वारा कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया जाएगा। पार्टी हाईकमान में  उक्त आशय की खबरें पहुँचने से घबराहट फैली और उसी के बाद  तय किया गया कि कांग्रेस पूरी ताकत से मैदान में उतरेगी और अपना खोया हुआ जनाधार वापस लेने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा। इसका प्रमाण श्री गाँधी द्वारा दिल्ली के मुस्लिम इलाकों में आयोजित सभाओं में आम आदमी पार्टी पर ये आरोप लगाए जाने से मिला कि उसने मतदाताओं से किये वायदे पूरे नहीं किये । उन्होंने आम आदमी पार्टी के साथ ही भाजपा पर भी ऐसे ही आरोप लगाए। दिल्ली का ये चुनाव जैसा कि श्री केजरीवाल कहते भी हैं कांग्रेस के लिए अस्तित्व का सवाल बन गया है। उसका वोट प्रतिशत लगातार घटते जाने से उसके परंपरागत समर्थक तो निराश हैं ही संगठन से जुड़े नेता भी हौसला खोते जा रहे हैं। 2013 में पहली बार भाजपा को रोकने के लिए श्री केजरीवाल को सरकार बनाने हेतु समर्थन देने की ऐतिहासिक भूल का दुष्परिणाम ही है कि पार्टी विधानसभा में शून्य पर आ गई। सही बात तो यही है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस को रौंदकर ही दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई । लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व बने इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच याराना कायम हुआ जिसके तहत दिल्ली में दोनों मिलकर लड़े। हालांकि सफलता नहीं मिली और उसके फ़ौरन बाद आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अकेले लड़ने का ऐलान करते हुए कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया। रही - सही कसर पूरी हो गई हरियाणा में जहाँ उसने  उम्मीदवार उतारकर भाजपा विरोधी मतों के बंटवारे की स्थिति पैदा कर दी जिससे कांग्रेस का सत्ता प्राप्त करने का सपना चूर हो गया। दिल्ली के कांग्रेस नेताओं का हाईकमान  से यही कहना रहा है कि जब श्री केजरीवाल ने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि उनकी पार्टी के मैदान में होने से हरियाणा में भाजपा को लाभ मिलेगा तब कांग्रेस भाजपा को रोकने के फेर में उनको मजबूत होने का अवसर क्यों दे? ये तर्क  वाजिब है क्योंकि भाजपा यदि दिल्ली में सत्ता से बाहर रही तब भी उसकी हैसियत और ताकत में अंतर नहीं आने वाला किंतु दिल्ली का दुर्ग यदि ढह गया तब श्री केजरीवाल के पैरों के नीचे से जमीन खिसकते न देर नहीं लगेगी क्योंकि दिल्ली ही उनकी शक्ति का स्रोत है। इन्हीं सब बातों पर विचार करने के बाद श्री गाँधी ने मैदान में उतरने का निर्णय लिया। हालांकि उन्होंने काफी देर कर दी किंतु जब जागे तब सवेरा की तर्ज पर यदि कांग्रेस दिल्ली  में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए पूरा जोर लगा दे तो भले ही उसका लाभ भाजपा को मिले किंतु तब पार्टी के पास दिखाने के वोट बैंक रूपी पूंजी तो होगी ।  अन्यथा वर्तमान स्थिति तो दयनीयता का चरमोत्कर्ष है। इसके अलावा श्री गाँधी के अपने आभामंडल के लिए भी दिल्ली  में कांग्रेस का पहले से बेहतर प्रदर्शन जरूरी है क्योंकि इंडिया गठबंधन के अनेक घटक दलों द्वारा बीते कुछ दिनों में जो बयानबाजी की गई उसका निशाना वही थे। हालांकि दिल्ली का दंगल ले देकर आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच ही है किंतु कांग्रेस के लिए ये अपना वजूद कायम रखने का आखिरी अवसर है। यदि उसका प्रदर्शन पिछले दो चुनावों जैसा ही रहा तब उसके साथ जो इक्का - दुक्का दल हैं वे भी पिंड छुड़ाकर चलते बनेंगे। चुनौती भाजपा के सामने भी कम नहीं है क्योंकि इस बार भी यदि वह सत्ता में नहीं आ सकी तब श्री केजरीवाल प्रधानमंत्री के विकल्प के तौर पर  उभरने में सफल हो जाएंगे और इंडिया गठबंधन भी ऱाहुल को छोड़ उनमें संभावनाएं तलाशने लगेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 January 2025

महाकुंभ : सनातन धर्म रूपी वट वृक्ष का विराट स्वरूप

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प्रयागराज में गंगा - यमुना के पवित्र संगम पर आयोजित महाकुंभ आज से प्रारंभ हो गया। पहले दिन ही 1 करोड़ श्रद्धालु पुण्य लाभ हेतु पहुँचे जिनमें अनेक देशों से आये लोग भी हैं। खगोलीय दृष्टिकोण से  ग्रहों की वर्तमान  स्थिति 144 वर्षों बाद बनी जिसकी वजह से इस बार का कुम्भ विशेष माना जा रहा है। उ.प्र सरकार द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार लगभग सवा महीने चलने वाले इस आयोजन में 60 करोड़ लोगों के प्रयागराज पहुँचने की उम्मीद है। ठहरने के इंतजाम हर आर्थिक स्थिति के श्रद्धालुओं की क्षमतानुसार किये गए हैं। साधु, संन्यासियों और धर्मगुरुओं द्वारा संचालित अन्न क्षेत्र में प्रतिदिन लाखों लोगों को निःशुल्क भोजन प्रदान किया जावेगा । अनेक धार्मिक संस्थाएं एवं दानदाता भी श्रद्धालुओं के भोजन और आवास की व्यवस्था कर रहे हैं। समूचे मेला क्षेत्र की व्यवस्था इस तरह की गई है जिससे विशेष स्नान वाले दिनों में   करोड़ों लोगों के जमा होने पर भी किसी प्रकार की समस्या न खड़ी हो। उ.प्र की पुलिस और प्रशासन के लिए महाकुंभ बड़ी चुनौती है। देश से ही नहीं अपितु पूरी दुनिया से सनातन धर्म में आस्था रखने वाले  प्रयागराज में पुण्य स्नान हेतु आयेंगे । लेकिन उनके अलावा विभिन्न देशों के लाखों लोग महाकुंभ की भव्यता, भारत की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता का प्रत्यक्ष दर्शन करने पहुंचेंगे।   दुनियाँ भर के प्रबंधन संस्थानों के शोधार्थी महाकुंभ की व्यवस्था का अध्ययन करने आ चुके हैं। पूरे विश्व के समाचार माध्यम प्रयागराज में डेरा जमाए हुए हैं। महाकुंभ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके साथ जुड़े पौराणिक प्रसंग से अलग हटकर देखें तो भी यह आयोजन भारत की एकता और सनातन धर्म के प्रति जनमानस में आस्था का जीवंत प्रमाण है।  भाषा, प्रांत और जीवन शैली की विभिन्नताएं यहाँ आकर  वैसे ही विलुप्त हो जाती हैं जैसे गंगा - यमुना में आकर मिलने वाली  सरस्वती नदी अदृश्य है। यद्यपि कुछ लोग महाकुंभ को लेकर भी अपनी नकारात्मक सोच का परिचय देने से बाज नहीं आ रहे। भीम आर्मी के संस्थापक सांसद चंद्रशेखर आजाद का कहना है जिसने पाप किये हों वे महाकुंभ में डुबकी लगाने जाएं। कुंठित प्रवृत्ति के कुछ सनातन विरोधियों ने साधु - संतों के बारे में अनर्गल बातें प्रचारित करने की मुहिम छेड़ रखी है। भारत की प्राचीनता और आध्यात्मिक विचारधारा को कपोल -  कल्पित मानने वाले पूर्वाग्रही भी अपनी कुंठा निकालने में जुटे हुए हैं। जिन लोगों को हिन्दू और हिंदुत्व शब्द से ही चिढ़ है वे महाकुंभ के चलते चैन से नहीं सो सकेंगे क्योंकि बीते कुछ वर्षों में सनातन संस्कृति के प्रति आस्था में जो वृद्धि हुई उसके परिणामस्वरूप हिंदुत्व  केंद्र में आ गया है। ये कहना भी गलत नहीं है कि राजनीति हिंदुत्व समर्थक और विरोधी नामक दो ध्रुवों में बंट गई है। हालांकि सनातन और हिंदुत्व भारत की आत्मा हैं किंतु विगत तीन दशकों में जो स्वस्फूर्त उत्साह हिंदुत्व को लेकर देखने मिला वह 21 वीं सदी में भारत के स्वर्णिम भविष्य का शंखनाद है। हिन्दू समाज को जातियों के नाम पर विभाजित कर अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने वाली ताकतों को महाकुंभ आकर देखना  चाहिए कि सनातन संस्कृति हिन्दू समाज को किस तरह एकजुट रखने में सक्षम है। इस विराट समागम में  ऊंच - नीच, अगड़ा - पिछड़ा, अमीर - गरीब जैसे संबोधन गुम होकर रह जाते हैं। देश के कोने - कोने में भारत की आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत रखने में जुटे असंख्य साधु, संत, पंडित, पुरोहित, महंत, महामंडलेश्वर और जगद्गुरु के पद पर विराजमान विभूतियों का महाकुंभ में एकत्रीकरण सनातन धर्म रूपी वट वृक्ष के विराट स्वरूप को समूचे विश्व के समक्ष प्रस्तुत करता है। धर्म संसद के जरिये सनातन धर्म के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने की कार्य योजना भी महाकुंभ में तय की जाती है। इस वर्ष का महाकुंभ अनेक विशिष्टताओं को अपने आप में समेटे हुए है। वैश्विक परिस्थितियों में आ रहे तेज बदलाव और उनमें भारत की सक्रिय भूमिका के कारण पूरे विश्व में भारत के प्रति सम्मान बढ़ा है। दुनिया के हर हिस्से में भारतीय समुदाय की प्रभावशाली उपस्थिति उत्साहित करने वाली है। महाकुंभ में अप्रवासी भारतवंशी बड़ी संख्या में आने वाले हैं। उनके साथ वे बच्चे भी इसकी भव्यता का दर्शन करेंगे जिनका जन्म और परवरिश वहीं के माहौल में हुई। भारत को सपेरों और मदारियों का देश प्रचारित किये जाने वाले दिन अतीत की गर्त में समा चुके हैं। यह महाकुंभ 21 वीं सदी के उस भारत  से साक्षात्कार करवाएगा जो आधुनिक ज्ञान - विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने के साथ ही अपनी मौलिकता से जुड़ा हुआ है और जिसको अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत पर गर्व है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 January 2025

विपक्षी एकता में दरार का ठीकरा राहुल पर फूट रहा

लोकसभा चुनाव के पूर्व जब नये  विपक्षी गठबंधन की शुरुआत हुई तब कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के सुझाव पर उसका नाम Indian National Developmental Inclusive Alliance  रखा गया जो  इंडिया नाम से प्रचलित हुआ। गठबंधन में 26 दलों के शामिल होने से  लगा कि वह नरेंद्र मोदी को तीसरी पारी खेलने से रोकने में कामयाब हो जायेगा किंतु पूरी ताकत लगाने के बाद भी वह श्री मोदी को न रोक सका। यद्यपि उनकी जीत में 2014 और 2019 वाली चमक नहीं थी।  400 पार का नारा 300 से नीचे अटक गया। भाजपा भी घटकर 240 पर आ गई। उस परिणाम ने विपक्ष के हौसले बुलंद कर दिये। उसकी आक्रामकता में जबरदस्त वृद्धि देखने मिली। मोदी सरकार के जल्द गिरने के दावे होने लगे। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने से श्री गाँधी  प्रधानमंत्री पर और तीखे हमले करने लगे। वहीं भाजपा पूरी तरह रक्षात्मक दिखने लगी। लोकसभा चुनाव के  परिणाम उसकी समझ से बाहर थे।  चंद्रा बाबू नायडू और नीतीश कुमार के समर्थन से सरकार तो बन गई किंतु  इंडिया गठबन्धन एक बड़ी ताकत के रूप में खड़ा हो गया। संसद में भाजपा के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल लगने लगा। वक्फ संशोधन और एक देश एक चुनाव जैसे विधेयक इसीलिए संयुक्त संसदीय समिति को भेजने पड़े। अदाणी और संविधान के मुद्दे पर कांग्रेस सरकार पर हावी रही।  इसी बीच जम्मू -  कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के चुनाव आ गए। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित विपक्ष दोनों में जीत के प्रति आश्वस्त था। लेकिन भाजपा ने जहाँ जम्मू - कश्मीर में अपनी संख्या  कई गुना बढ़ाई वहीं हरियाणा में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए तीसरी बार सरकार बनाने का कीर्तिमान स्थापित किया। कांग्रेस के लिए ये बहुत बड़ा झटका था क्योंकि जम्मू - कश्मीर में वह कुछ खास न कर सकी और हरियाणा में  बुरी तरह चित्त हो गई। इन नतीजों से इंडिया गठबंधन में दरार उत्पन्न होने लगी।  राहुल की क्षमता पर सवाल उठने लगे किंतु महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव सामने होने से मतभेदों पर पर्दा डालकर रखा गया। झारखंड में तो हेमंत सोरेन सरकार बचा ले गए किंतु महाराष्ट्र में भाजपा ने तो धमाकेदार प्रदर्शन किया ही उसकी सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) और एनसीपी ( अजीत) ने भी जबरदस्त कामयाबी हासिल कर विपक्षी गठबंधन की कमर तोड़कर रख दी। इस परिणाम ने एक साथ  राहुल, शरद पवार और उद्धव ठाकरे को जोरदार चोट पहुंचाई। लेकिन ठीकरा फूटने लगा श्री गाँधी के सिर पर। ममता बैनर्जी ने नेतृत्व परिवर्तन की आवाज उठा दी जिसे शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और लालू यादव का समर्थन मिलने से  गठबंधन की एकता पर खतरा मंडराने लगा। इसी बीच दिल्ली के चुनाव आ गए जिसमें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच तलवारें खिंचने से रही - सही कसर भी पूरी हो गई। ममता, अखिलेश और उद्धव ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर राहुल  के विरुद्ध खुली बगावत का संदेश दे दिया।  उधर उमर अब्दुल्ला ने इंडिया गठबंधन के निष्क्रिय होने की बात कहते हुए लोकसभा चुनाव के बाद उसकी बैठक न होने का मुद्दा छेड़ दिया। उनकी बात को उद्धव के दाहिने हाथ संजय राउत ने आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस को आगाह किया कि यही हालत रही तो गठबंधन  की इतिश्री हो जायेगी और दोबारा उसका गठन नामुमकिन होगा। चौंकाने वाली बात ये है कि जो  राहुल गाँधी गठबंधन के घटक दलों के निशाने पर हैं उनका कोई अता - पता नहीं है। 2024 खत्म होने के पहले ही वे नववर्ष मनाने विदेश चले गए। वे लौटे या नहीं इसकी कोई जानकारी किसी के पास नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपनी मर्जी से कुछ बोलने की हैसियत नहीं रखते। सोनिया गाँधी अस्वस्थता के कारण परिदृश्य से बाहर होती जा रही हैं। चूँकि श्री गाँधी ही कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं इसलिये सारे निर्णय और अपेक्षाएं उन्हीं पर केंद्रित हैं। दिल्ली चुनाव की शुरुआत में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के विरुद्ध जो तीखे तेवर दिखाये वे अचानक ठंडे पड़ने लगे। कहा जा रहा है इसके पीछे राहुल का ही हाथ है क्योंकि उनको डर है कि अरविंद केजरीवाल कहीं गाँधी परिवार के विरुद्ध मोर्चा न खोल दें। लेकिन न सिर्फ इंडिया गठबंधन में शामिल अनेक पार्टियां अपितु कांग्रेस के भीतर भी श्री गाँधी की उदासीनता को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी कहने लगे हैं कि उनसे तो सोनिया जी  बेहतर थी जिन्होंने लंबे समय तक यूपीए को एकजुट रखा। ये बात कई विपक्षी नेता कह चुके हैं कि इंडिया गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव तक ही था लेकिन न तो श्री गाँधी और न ही कांग्रेस का कोई नेता समूचे विवाद में प्रतिक्रिया दे रहा है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि गठबंधन का नामकरण करने वाले राहुल ही उसके विघटन के कारण बन रहे हैं और  विपक्षी एकता का यह प्रयोग भी विफल होने के कगार पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 10 January 2025

लॉस एंजिलिस की आग हमारे लिए चेतावनी


1974 में टावरिंग इन्फर्नो  नामक अमेरिकी  फिल्म ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। जॉन गुइलेरमिन द्वारा निर्देशित उस फिल्म के निर्माता  इरविन एलन थे। एक गगनचुंबी बहुमंजिला इमारत में आग लगने के बाद किये गए बचाव कार्यों का बड़ा ही रोमांचित करने वाला चित्रण उस फिल्म में था। तकनीक के बेहतरीन प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हालीवुड की वह फिल्म ढेर सारे ऑस्कर अवार्ड जीतकर कालजयी बन गई। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए वह फिल्म एक मार्गदर्शक कहलाई। उससे प्रेरित होकर अनेक देशों में आपदा आधारित फिल्में बनीं जिनमें भारत की बर्निंग ट्रेन भी थी। हालांकि दर्शकों को आकर्षित करने के लिए ऐसी फिल्मों में भी नाटकीयता भरी जाती है किंतु देखने में आया है कि अक्सर  पथकथा लेखक की काल्पनिकता कालांतर में वास्तविकता बन जाती है । विगत कुछ दिनों से अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य के लॉस एंजिलिस शहर और उसके इर्द - गिर्द लगी भीषण आग ने अग्निकांड आधारित कहानियों को  वास्तविकता में बदल दिया है। आग की लपटें हालीवुड के फिल्मी क्षेत्र तक जा पहुंची हैं। लॉस एंजिलिस अमेरिका के बेहद महंगे शहरों में गिना जाता है। फिल्मी सितारों के अलावा तमाम धनकुबेर इस शहर में रहते हैं। अमेरिका की वर्तमान उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का निवास भी यहीं है। आग जिस तरह फैल रही है उसकी वजह से अनेक नामी - गिरामी फिल्मी सितारों तथा अन्य हस्तियों के महलनुमा घर जलकर राख हो गए। आग बुझाने के लिए हेलीकाप्टर और अन्य अग्नि शमन साधनों का उपयोग किया जा रहा है किंतु उसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। हालात बेकाबू हो चुके हैं। जिन संस्थानों के जिम्मे आग बुझाने का दायित्व है वे संसाधनों के अभाव का रोना रो रहे हैं। 10 दिन बाद राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने जा रहे डोनाल्ड ट्रम्प ने निवर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन पर इसका ठीकरा फोड़ते हुए आपदा प्रबंधन की दयनीय स्थिति का पर्दाफाश किया। साथ ही कैलीफोर्निया राज्य के गवर्नर पर भी गुस्सा व्यक्त किया है। स्मरणीय है अमेरिका का यह राज्य निकटवर्ती जंगलों में लगने वाली आग के कारण लंबे समय से परेशानी झेल रहा है।  जंगलों में पतझड़ के बाद सूखे पत्तों में आग से उठने वाला धुंआ शहरों के आसमान में फैलकर वातावरण को प्रदूषित करता है लेकिन इस बार बात धुएं से आगे बढ़कर आग तक जा पहुंची जिसके कारण हजारों मकान भस्म हो चुके हैं। लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। आग जिस तरह फैलती जा रही है उसे देखकर अग्नि शमन के काम में लगीं एजेंसियां असहाय नजर आ रही  हैं। ये दशा उस देश की है जो विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्ति है। तकनीक के मामले में भी वह दुनिया का सिरमौर है। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के सामने उसकी लाचारी समय - समय पर उजागर होती रही है। कभी समुद्री चक्रवात उसके तटवर्ती शहरों में जल प्रलय के हालात पैदा कर देते हैं तो कभी बर्फबारी से जनजीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। ये देश दुनिया भर को तकनीक निर्यात करता है। इसे अपनी साधन संपन्नता पर बड़ा घमंड है। भारत सहित विकासशील  देशों के युवाओं का सपना अमेरिका में बसने का होता है। वहाँ की सुरक्षित और  सुविधा संपन्न  जीवन शैली आकर्षण का प्रमुख कारण है। लेकिन लॉस एंजिलिस का ताजा अग्निकांड साबित कर रहा है कि ज्ञान - विज्ञान के अनंत आकाश छू लेने के बाद भी प्रकृति के कोप से बचने की सामर्थ्य  इंसान पैदा नहीं कर सका। भारत को  अमेरिका में आई इस आपदा से सतर्क होकर अपने आपदा प्रबंधों को दुरुस्त करने  की सख्त जरूरत है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में अनेक अग्निकांड ऐसे हुए जिनका सामना करने वाली व्यवस्था अपर्याप्त भी थी और घटिया भी। कुछ अस्पतालों में लगी आग में घिरकर वहाँ भर्ती अनेक मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ा जिनमें बच्चे भी काफी थे। जाँच में पाया गया कि आग बुझाने हेतु की गई व्यवस्था समय पर धोख़ा दे गई। म.प्र की राजधानी भोपाल स्थित सचिवालय भवन में लगी आग को बमुश्किल बुझाया गया वह भी सेना की मदद से। ये देखते हुए भारत में आपदा प्रबन्धन की जो भी व्यवस्थाएं हैं उनकी समीक्षा आवश्यक है। हमारे देश के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में आग से प्रतिवर्ष करोड़ों की वन संपदा की क्षति के साथ ही वन्य प्राणियों की भी मौत होती है। ऐसी आग को रोकने में संबंधित महकमा कितना सफल होता है ये किसी से छिपा नहीं है। अमेरिका में बनी टावरिंग इन्फर्नो नामक फिल्म तो कल्पना पर आधारित थी किंतु लॉस एंजिलिस में लगी आग हकीकत है जिससे सबक लेना भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि जब अमेरिका उस आपदा के सामने असहाय है तब हम अपनी स्थिति का आकलन आसानी से कर सकते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 9 January 2025

कांग्रेस मुक्त विपक्ष की संभावना बढ़ रही


कांग्रेस की इससे ज्यादा किरकिरी और क्या होगी कि जो  इंडिया गठबंधन उसकी अगुआई में बना और लोकसभा चुनाव में जिसके कारण भाजपा अपने बलबूते  स्पष्ट बहुमत हासिल करने से वंचित रह गई उसी के घटक उसको ठेंगा दिखाने लगे हैं। महाराष्ट्र में  जबरदस्त पराजय के बाद गठबंधन के नेतृत्व परिवर्तन की मांग को  कांग्रेस ने जिस प्रकार उपेक्षित किया उसका असर गत दिवस दिखाई दिया जब  ममता बैनर्जी ,  अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में  आम आदमी पार्टी का समर्थन करने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि भाजपा को वही हरा सकती है। कांग्रेस नेता अशोक गहलोत के ये कहने पर कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी कांग्रेस की विरोधी है, प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अरविंद केजरीवाल ने अपना ये आरोप दोहराया कि कांग्रेस का भाजपा से गुप्त गठजोड़ है इसीलिए वह भाजपा की बजाय आम आदमी पार्टी को अपना विरोधी बता रही है। उधर लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के नेता तेजस्वी ने इंडिया गठबंधन के बिखरने संबंधी सवाल पर कहा कि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं क्योंकि वह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए ही बना था। वैसे भी उसमें दरार तो हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान ही आ गई थी जब कांग्रेस ने सपा और आम आदमी पार्टी का लिए एक भी सीट छोड़ने से दो टूक इंकार कर दिया।  लोकसभा चुनाव में 10 में से 5 सीटें जीतने से वह आत्मविश्वास  से भरी थी  किंतु  उसके मंसूबे धरे रह गए और भाजपा ने तीसरी बार सरकार बना ली । उस परिणाम पर अखिलेश और उद्धव की शिवसेना ने खुलकर कहा कि कांग्रेस अपने बलबूते चुनाव जीतने की क्षमता खो चुकी है। यद्यपि महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन कायम रहा किंतु परिणाम आते ही कांग्रेस पर फिर हमले शुरू हो गए। लेकिन इस बार निशाना बने राहुल गाँधी जो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद गठबंधन के स्वयंभू नेता बन बैठे थे। ममता बैनर्जी तो श्री गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर शुरू से ही सवाल उठाती आ रही थीं किंतु अखिलेश और उद्धव के बाद जब लालू ने भी उनका समर्थन कर दिया तब कांग्रेस को सतर्क हो जाना चाहिए था जबकि वह  नेतृत्व संबंधी अपने दावे के औचित्य को सिद्ध करने में ही लगी रही। यदि राहुल उक्त नेताओं से बात करते तब उनका गुस्सा ठंडा हो सकता था किंतु वे अदाणी के मुद्दे से ही चिपके रहे जिससे ज्यादातर विपक्षी दल किनारा कर चुके हैं। महाराष्ट्र चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाई जाती तब भी काफी विवाद सुलझाये जा सकते थे किंतु श्री गाँधी ने कोई पहल नहीं की। उनका ग़ैर जिम्मेदाराना रवैया जम्मू कश्मीर के चुनाव में ही दिख गया था जिसकी उनके सहयोगी उमर अब्दुल्ला ने बीच चुनाव ही आलोचना कर डाली। महाराष्ट्र चुनाव में भी वे ज्यादा सक्रिय  नहीं  रहे और  पूरा जोर वायनाड में प्रियंका वाड्रा को जितवाने में लगाया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी निश्चित रूप से बड़ी क्षेत्रीय शक्ति है। ऐसे में कांग्रेस को गठबंधन धर्म का पालन करते हुए ठीक उसी तरह उसका नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए था जिसकी अपेक्षा वह अपने प्रभाव वाले राज्यों में गठबंधन के अन्य दलों से करती है। बहरहाल दिल्ली के चुनाव में ममता, अखिलेश और उद्धव  द्वारा आम आदमी पार्टी का खुलकर समर्थन करने पर कहा जा सकता है कि  इंडिया गठबंधन के समाप्त होने के दिन आ गए। यदि उसका अस्तित्व बना  रहा तब भी  उस पर कांग्रेस का प्रभुत्व  संभव नहीं होगा। इसके लिए दोषी श्री गाँधी ही माने जायेंगे जो  राजपरिवार की मानसिकता से बाहर ही नहीं निकल पा रहे। इंडिया गठबंधन में एक - दो को छोड़कर बाकी के नेताओं की जमीन उनकी बनाई हुई है। ममता , लालू, केजरीवाल की ताकत के पीछे उनकी मेहनत है। अखिलेश भले ही पिता की  वजह से आगे आये लेकिन उनके न रहने के बावजूद अपना प्रभाव बनाये हुए हैं।  इस सबसे लगता है कांग्रेस मुक्त  विपक्ष की स्थिति बन सकती है। आम आदमी पार्टी द्वारा कांग्रेस को इंडिया गठबंधन से निकाले जाने की मांग के बाद ममता, अखिलेश और उद्धव का दिल्ली चुनाव में श्री केजरीवाल के  समर्थन का ऐलान किसी नई राजनीतिक पटकथा की भूमिका कही जा सकती है। तेजस्वी का ये कहना भी काबिले गौर है कि इंडिया गठबंधन तो केवल लोकसभा चुनाव तक था। इसका आशय ये कि  बिहार विधानसभा के चुनाव में राजद द्वारा कांग्रेस को झटका दिया जा सकता है। इससे तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म की संभावना भी बढ़ रही हैं। दिल्ली के दंगल में कांग्रेस अपने मतों में  यदि 10 फीसदी वृद्धि कर सकी तब  आम आदमी पार्टी  सत्ता से भले बाहर आ जाए किंतु सेहरा भाजपा के सिर पर होगा। और यदि ये हुआ तब कांग्रेस के भीतर ही  न सिर्फ राहुल बल्कि गाँधी परिवार के विरुद्ध भी बगावत हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा । 


- रवीन्द्र वाजपेयी