Sunday, 26 January 2025

गणतंत्र विरोधी षडयंत्र का पर्दाफाश जरूरी


      आजकल कुछ लोग यह कहते फिरते हैं कि भारत में लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा। लोकसभा चुनाव के पहले ये दुष्प्रचार भी किया गया कि नरेंद्र मोदी सत्ता में लौटे तो आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा। वहीं मुसलमानों को ये कहकर भयभीत किया गया कि  भारत  हिन्दू राष्ट्र बन जावेगा। राम मंदिर में हुई प्राण - प्रतिष्ठा से भी समाज के उस वर्ग का रक्तचाप बढ़ा हुआ था जिसने कभी देश का हित नहीं चाहा।  नेताजी सुभाष चंद्र बोस को हिटलर का दलाल प्रचारित करने वाला यह वर्ग आजादी के बाद से ही आयातित  विचारधारा को जनमानस पर थोपने में जुटा रहा लेकिन  जब जनसमर्थन नहीं मिला तब मुख्य धारा की राजनीति से जुड़कर उसने अपनी कार्ययोजना लागू करने की चाल चली। सर्वविदित है भारत का अस्तित्व उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर आधारित है जिसे कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास किया गया । विदेशी ताकतों के इशारे पर  कतिपय बुद्धिजीवी देश का मनोबल तोड़ने में जुट गए और वह भी सरकारी संरक्षण में। धर्म , संस्कृति ,कला - साहित्य जैसे क्षेत्रों में भारतीयता के भाव को कमजोर करने का प्रयास पूरी ताकत से चलता रहा। लेकिन जैसे हर रात के बाद सुबह होती है , ठीक वैसे ही 2014 में जनता ने राष्ट्रवादी विचार के नेतृत्व को  सत्ता सौंप दी।  जिसके सुपरिणाम स्वरूप देश नए उत्साह के साथ आगे बढ़ने लगा।  राजनीतिक नेतृत्व से प्राप्त प्रोत्साहन से  पश्चिमी चकाचौंध से मुक्त युवा पीढी़ भारत को  विकसित देशों की कतार में खड़ा करने में जुट गई।  और देखते - देखते  भारत एक  संभावनाओं से भरे देश के तौर पर उभरने लगा। विश्व की सबसे सक्षम युवा शक्ति हमारी ताकत  है। बीते एक दशक में  भारतीयता के प्रति हर वर्ग में आकर्षण बढ़ा है। विश्व शक्ति कहे जाने वाले देशों के पिछलग्गू होने वाला जमाना इतिहास बन गया। जिसका श्रेय राष्ट्रवादी नेतृत्व को ही है । और यही बात उन शक्तियों  को नागवार गुजर रही है जिनका ध्येय  भारतीयता के भाव को नष्ट करना था । 2014 के बाद से केंद्र सरकार ने  जो साहसिक निर्णय लिए उनके कारण उक्त ताकतें हाशिए पर खिसकती जा रही हैं। इसीलिए वे समय - समय पर जनता को भड़काकर अपनी कुंठा निकालती हैं किंतु अब जनता इनके दुष्प्रचार में नहीं फंसती। राम मंदिर में हुई प्राण - प्रतिष्ठा के अवसर पर भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रमाण पूरे विश्व को मिल गया। उसके कुछ  महीनों बाद हुए आम चुनाव पर  पूरे विश्व की नजरें टिकी थीं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को कमजोर करने में जुटी  ताकतों ने उस  दौरान राष्ट्रवादी विचारधारा वाली मोदी सरकार को अपदस्थ करने का हरसंभव प्रयास किया किंतु  उनका दुष्प्रचार कारगर नहीं हो सका। दरअसल लोगों को ये भरोसा हो चुका था कि  देश और लोकतंत्र  भारतीयता के प्रति समर्पित नेतृत्व के हाथों में ही सुरक्षित रह सकता है। विगत एक दशक में  देश ने अनेक ऊंची छलांगें लगाई हैं किंतु अभी बहुत कुछ करना बाकी है। सबसे बड़ी जरूरत उन तत्वों से सावधान रहने की है जो  भारत को भीतर से कमजोर करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। यहाँ तक कि प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ की जहाँ पूरे विश्व में प्रशंसा हो रही है वहीं कुंठित लोगों की जमात उसमें खामियां निकालकर लोगों को भ्रमित करने में लगी है जिससे वे उसमें शामिल न हों। देश में निराशावादी माहौल बनाकर व्यवस्था के विरुद्ध भावनाएं भड़काने का जो षडयंत्र एक वर्ग रच रहा है उसका पर्दाफाश भारत के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए नितांत जरूरी है।

      गणतंत्र हमारी संवैधानिक व्यवस्था के प्रति विश्वास का पर्व है।  इस अवसर पर देश पर मंडरा रहे भीतरी और बाहरी संकटों के बारे में भी सोचा जाना चाहिए ताकि उन गलतियों को दोहराने से बचा जा सके जिनके कारण हमें सदियों तक गुलाम रहना पड़ा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 January 2025

मुस्लिम तुष्टीकरण के हर प्रयास से हिंदुओं का ध्रुवीकरण बढ़ेगा


वक्फ संशोधन विधेयक पर  गठित जेपीसी ( संयुक्त संसदीय समिति) की बैठक में गत दिवस हुए हंगामे के बाद 10 विपक्षी सदस्यों को  निलंबित कर दिया गया। अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने आरोप लगाया कि विपक्षी सदस्यों ने उन्हें गालियाँ दीं। उल्लेखनीय है  पिछली बैठक में भी तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बेनर्जी ने गुस्से में काँच की बोतल  तोड़ डाली थी जिस पर उन्हें निलम्बित किया गया।असदुद्दीन ओवैसी भी हर बैठक में गर्मी दिखाते हैं। समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को शीतकालीन सत्र में ही सौंपने वाली थी किंतु  समय सीमा बजट सत्र तक बढ़ा दी गई । लगता है विपक्षी सदस्यों का उद्देश्य रिपोर्ट को संसद में पेश होने से रोकना है। समिति द्वारा मांगे जाने पर  देश भर से लाखों लोगों ने  वक़्फ़ विधेयक पर  अपनी राय भेजी जिन पर  समिति की रिपोर्ट मिलने पर संसद अपना निर्णय करेगी। ये  सही है कि जेपीसी में बहुमत सत्ता पक्ष का ही रहता है क्योंकि उसका गठन  सदन में पार्टियों की सदस्य संख्या के आधार पर होता है। यही कारण था कि जब राहुल गाँधी हिंडनबर्ग द्वारा किये गए खुलासे के बाद अदाणी समूह की जाँच हेतु जेपीसी  की जिद पकड़कर बैठ गए तब विपक्षी दलों की बैठक में अविभाजित एनसीपी के नेता शरद पवार ने भी ये कहकर जेपीसी  की मांग को अर्थहीन बताया  कि सत्ता पक्ष के बहुमत की वजह से विपक्ष को कुछ हासिल नहीं होगा। बावजूद उसके श्री गाँधी ने पिछले संसद सत्र में गौतम अदाणी के विरुद्ध अमेरिका में दर्ज आपराधिक प्रकरण की जांच हेतु जेपीसी की मांग दोहराई । लेकिन अन्य  विपक्षी इस मांग से कन्नी काट गए । शरद पवार और ममता बेनर्जी तो शुरू से ही  अदाणी की जांच के लिए जेपीसी  का विरोध कर रहे थे किंतु पिछले सत्र में सपा और शिवसेना ने भी उससे दूरी बना ली। दूसरी तरफ सरकार ने पहले वक्फ संशोधन और फिर एक देश एक चुनाव सम्बन्धी विधेयक विपक्ष की मांग के बिना ही जेपीसी के हवाले कर दिये। यदि दोनों विधेयकों पर संसद में बहस होती तब भी उनका  पारित होना तय था किंतु वक़्फ़ विधेयक  मुस्लिम समुदाय से जुड़े होने से  जेपीसी के जरिये जनता की राय लेने का रास्ता चुना गया । इसका लाभ ये हुआ कि वक़्फ़ बोर्ड को मिले असीमित अधिकार और उसकी संपत्तियों में हो रही हेराफेरी की जानकारी आम जनता के संज्ञान में आने लगी। बोर्ड  द्वारा अवैध रूप से कब्जाई अनेक संपत्तियों का ब्यौरा भी सार्वजनिक हुआ। जेपीसी में शामिल श्री ओवैसी ने तो उ.प्र की एक आमसभा में स्वीकारा भी कि राज्य में वक़्फ़ की अधिकांश संपत्तियों के स्वामित्व संबंधी वैध दस्तावेज ही नहीं हैं। ऐसा ही शपथ पत्र उ.प्र सरकार द्वारा उच्च न्यायालय में भी पेश किया गया । वक़्फ़ संशोधन विधेयक पेश होते ही देश भर से वक़्फ़  की दादागिरी के विरुद्ध  शिकायतें आने लगीं। उधर वक़्फ़ बोर्ड  वाले भी देश की अनेक ऐतिहासिक और सरकारी इमारतों के उनकी जमीन पर होने का दावा करने लगे। हद तो तब हो गई जब प्रयागराज में महाकुंभ के स्थल को भी वक़्फ़ संपत्ति बताने का दुस्साहस किया गया।  प्रतिक्रिया स्वरूप लोग खुलकर वक़्फ़ बोर्ड के अवैध कब्जों के विरुद्ध  सामने आने लगे जिससे  मुस्लिम मतों के ठेकेदार राजनीतिक दलों में घबराहट व्याप्त हो गई। दरअसल  लोकसभा चुनाव के बाद आम मुसलमान के मन में ये धारणा बिठाई गई कि उसी ने भाजपा को 240 सीटों पर रोक दिया। इसकी प्रतिक्रिया हिंदुओं के बीच भी हुई और  देश भर के साधु - महात्मा हिन्दू हितों को लेकर मुखर हो उठे। महाकुंभ से आ रहे समाचार इसकी पुष्टि कर रहे हैं। इन सब बातों से उपजी घबराहट ही वक़्फ़ पर बनी जेपीसी में विपक्षी सदस्यों के हंगामे का कारण है किंतु वे भूल रहे हैं कि आखिरकार  अध्यक्ष श्री पाल अपनी रिपोर्ट संसद को प्रेषित कर ही देंगे जहाँ उसका पारित होना भी सुनिश्चित है। विपक्ष को ये भी समझ लेना चाहिए कि  मुस्लिम तुष्टीकरण के हर प्रयास से हिंदुओं का ध्रुवीकरण बढ़ेगा।  ऐसे में उसके लिए यही हितकर होगा कि वह वक़्फ़ बोर्ड  के  असीमित अधिकारों में कटौती के लिए लाये  विधेयक का समर्थन  कर बुद्धिमत्ता दिखाये।अल्पसंख्यकों की संपत्ति की सुरक्षा होनी चाहिए किंतु वक़्फ़ बोर्ड जहाँ चाहे कब्जा कर ले इसकी छूट धर्मनिर्पेक्षता नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 January 2025

आयकर छूट बढ़ी तो दिल्ली में भी हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे नतीजे होंगे


दिल्ली विधानसभा चुनाव दिन ब दिन जटिल होता जा रहा है। भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच तो सांप और नेवले जैसा रिश्ता शुरू से रहा है किंतु इस बार कांग्रेस जिस तरह  केजरीवाल एंड कं. पर चढ़ बैठ रही है  , वह अभूतपूर्व है क्योंकि ज्यादा वक्त नहीं बीता जब  कांग्रेस की शिकायत पर उजागर हुए शराब घोटाले में गिरफ्तार  मनीष सिसौदिया और अरविंद केजरीवाल के बचाव में कांग्रेस से जुड़े वरिष्ट अधिवक्ता अदालत में पैरवी करते देखे जा सकते थे। इसी तरह जो अरविंद  केजरीवाल कभी सोनिया गाँधी और राहुल को जेल पहुंचाने का दंभ भरते थे , वे नेशनल हेराल्ड प्रकरण में उनको पूछताछ हेतु बुलाये जाने पर केंद्र सरकार को घेरने में लगे रहे। जब श्री केजरीवाल जेल में बंद हुए तब राजधानी में आयोजित विपक्ष की साझा रैली में सोनिया जी के साथ मंच पर उनकी पत्नी सुनीता बैठी नजर आईं। इसीलिए  इस चुनाव में कांग्रेस द्वारा आम आदमी पार्टी पर आरोपों की जो बौछार हो रही है उससे भाजपा के खेमे में जबरदस्त राहत का माहौल है। आम आदमी पार्टी के तीन बड़े नेता श्री केजरीवाल, श्री सिसौदिया और मुख्यमंत्री आतिशी अपने - अपने निर्वाचन क्षेत्र में फंसे होने से अन्य सीटों पर ज्यादा प्रचार नहीं कर पा रहे। दलित और मुस्लिम मतों में  जहाँ कांग्रेस सेंध लगाने में जुटी है वहीं भाजपा अपने परंपरागत मध्यमवर्गीय समर्थकों को अपने साथ खींचने के लिए रणनीति बना रही है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि केजरीवाल सरकार की योजनाओं से उपकृत लाभार्थी  वर्ग भी इस बार उनसे दूर खिसकता दिखाई दे रहा है। वहीं भाजपा  हिंदुत्व की भावना समाज के निचले तबके में फैलाने में कामयाब होती लग रही है।  मुल्ला - मौलवियों को प्रति माह वित्तीय सहायता दिये जाने से हिन्दू  मंदिरों के पुजारी केजरीवाल सरकार से नाराज थे। उनको खुश करने के लिए आम आदमी पार्टी ने 18 हजार रु.हर माह देने का वायदा कर दिया। गुरुद्वारों के ग्रंथी भी इस योजना में शामिल होंगे। लेकिन  दिल्ली के हजारों पुजारी  उनके संपर्क में आने वाले श्रद्धालुओं को सनातन का वास्ता देकर भाजपा का समर्थन करने हेतु प्रेरित कर रहे हैं। इस सबसे आम आदमी पार्टी परेशान है। ईमानदारी का उसका दावा असर खो चुका है। यमुना की गंदगी और खराब सड़कें  बड़ा मुद्दा बन गया है। हाल ही में श्री केजरीवाल ने करों के बोझ (टैक्स टैररिज्म ) पर भाजपा को घेरने का दाँव चला । राजधानी में रहने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए आयकर बड़ी समस्या है। श्री केजरीवाल की नई दिल्ली सीट में बड़ी संख्या मतदाता केंद्रीय कर्मचारियों की होने से यह निश्चित रूप से बड़ा मुद्दा है। खबर है भाजपा ने इससे निपटने की पूरी तैयारी कर ली है। आगामी 1 फरवरी को केंद्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 10 लाख रु. किये जाने की अटकलें उच्च स्तरीय राजनीतिक क्षेत्रों में तेजी से लगाई जा रही हैं। यदि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वाकई ऐसा कर दिया तब उसका असर 5 फरवरी को होने वाले मतदान पर पड़ना अवश्यंभावी है।  आम आदमी पार्टी इस खबर से भयभीत है क्योंकि आयकर छूट की सीमा में वृद्धि से नौकरपेशा के साथ मध्यम वर्गीय व्यवसायी भी फायदे में होंगे और चुनाव भाजपा के पक्ष में काफी हद तक घूम जायेगा। काँग्रेस के लिए तो और बड़ी समस्या  खड़ी हो जाएगी। यद्यपि पुख्ता भविष्यवाणी करना तो किसी के लिए संभव नहीं रहा किंतु इतना जरूर कहा जा सकता है कि अगर ताजा स्थिति  कायम रही तब तो आम आदमी पार्टी के हाथ से सत्ता खिसकने पर आश्चर्य नहीं होगा। कांग्रेस का लक्ष्य तो हरियाणा के चुनाव में आम आदमी पार्टी द्वारा अपने प्रत्याशी उतारे जाने से हुए नुकसान का बदला लेना है किंतु भाजपा इस चुनाव में सत्ता हासिल करने के लिए राजनीति के सभी अस्त्र - शस्त्र उपयोग कर रही है। यदि केंद्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा 10 लाख रु. सालाना हो गई तब  दिल्ली में भी हरियाणा और महाराष्ट्र सरीखे  नतीजे आ जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 January 2025

एक साथ सारे मोर्चे खोलना ट्रम्प के लिए नुकसानदेह


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पदभार ग्रहण करते ही ताबड़तोड़ फैसले लेना शुरू कर दिया। चूंकि वे पूर्व में भी राष्ट्रपति रह चुके हैं अतः उन्हें अपने देश और दुनिया के मामलों की पर्याप्त जानकारी है। यही कारण है कि उन्होंने चुनाव जीतने के तत्काल बाद अपने इरादे स्पष्ट कर दिये थे। ट्रम्प की चिंताओं में अवैध रूप से आकर बस गए विदेशी नागरिक प्रमुख है। उनकी जो संतानें अमेरिका में पैदा हुईं उन्हें नागरिकता देने पर रोक लगाने की उनकी घोषणा से वहाँ हड़कंप मचा है। गर्भवती महिलाएं 20 फरवरी के पहले ही  समय पूर्व प्रसव के लिए अस्पतालों में जुटी हैं। ट्रम्प इस बात से भी परेशान हैं कि कैनेडा और  मेक्सिको आदि से बड़ी मात्रा में ड्रग्स तस्करी के जरिये लाये जाते हैं। उल्लेखनीय है दक्षिण अमेरिका के अनेक देश ड्रग्स के कारोबार के लिए कुख्यात हैं।  अमेरिका आकर काम करने वाले प्रतिभाशाली व्यक्तियों को H1b वीजा देने के संबंध में उनके द्वारा पूर्व में दिये गए संकेतों से भारत सहित तमाम उन देशों में चिंता थी जिनके लाखों लोग अमेरिका में कार्यरत हैं  वहीं बड़ी संख्या में नये लोग भी  वीजा प्राप्त करने प्रयासरत हैं। लेकिन कल उन्होंने स्पष्ट किया कि  अमेरिका की प्रगति के लिए प्रतिभाओं के आने की मौजूदा व्यवस्था यथावत रहेगी। कुछ और मामलों में भी उन्होंने कड़े कदम उठाने में जल्दबाजी से परहेज किया है किंतु जलवायु संरक्षण हेतु किये गए पेरिस समझौते से अलग होने का उनका निर्णय बेहद गैर जिम्मेदारना है। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि दुनिया भर में पर्यावरण को क्षति पहुंचाने में सबसे बड़ा हाथ विकसित देशों का ही है किंतु ये विकासशील देशों पर तो कार्बन उत्सर्जन घटाने हेतु दबाव डालते हैं किंतु खुद उस पर अमल करने से बचते हैं। उस दृष्टि से ट्रम्प का उक्त निर्णय विश्व जनमत की अवहेलना करने जैसा है और इस मुद्दे पर अमेरिका पूरी दुनिया के निशाने पर आ जाएगा। इसी तरह पनामा नहर का नियंत्रण वापस लेने के उनके इरादे ने भी तनाव की आशंका बढ़ा दी है। 1999 में अमेरिका ने इस समुद्री मार्ग का नियंत्रण पनामा नामक देश को ही सौंप दिया था किंतु ट्रम्प का कहना है कि इसकी वजह से अमेरिकी हित प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि इसके पीछे असली कारण इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियां हैं। लेकिन यदि ट्रम्प ने पनामा नहर पर कब्जे की जिद नहीं छोड़ी तो यह यूक्रेन और रूस जैसी जंग का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। स्मरणीय है नहर का संचालन मिलने के बाद से पनामा और अमेरिका के रिश्ते बड़े ही मधुर हो चले थे। लेकिन चीन जिस तरह से इस अंचल में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है उससे अमेरिका सशंकित है। पनामा नहर सामरिक और आर्थिक दृष्टि से स्वेज नहर जैसी ही महत्वपूर्ण है। वैसे भी ज्यादातर दक्षिण अमेरिकी देशों के साथ उसके रिश्ते अच्छे नहीं हैं। ऐसे में ट्रम्प का सख्त रवैया विश्व शान्ति के लिए खतरा बन सकता है। इसी तरह उनका ब्रिक्स देशों के सामान पर ड्यूटी बढ़ाने का फैसला अमेरिका के लिए भी उतनी ही समस्या बनेगा क्योंकि उसके उत्पाद भी इन देशों में निर्यात होते हैं। ध्यान देने वाली बात है कि जिस तरह अमेरिका द्वारा  चीन और रूस के प्रभाव के विरुद्ध मोर्चेबंदी की जाती है वैसी ही ये दोनों भी करते हैं। रूस के साथ तो ट्रम्प भले ही अच्छे रिश्ते बना लें किंतु चीन को दबाना उतना आसान नहीं होगा। l अमेरिका अपने हितों के बारे में सोचे ये उसका अधिकार है किंतु आज के विश्व में आत्मकेंद्रित होकर रहना किसी के लिए संभव नहीं रहा। चीन ने भी जब माओ युग के लौह आवरण को हटाकर दुनिया से रिश्ते बनाये तभी उसे विश्व शक्ति के रूप में मान्यता मिली। और ये भी कि अब यूरोप के देशों में भी अमेरिकी प्रभुत्व से मुक्ति की भावना तेजी से बढ़ रही है। ट्रम्प की आक्रामक नीतियों ने नव अमेरिकी राष्ट्रवाद को बढ़ावा तो दे दिया किंतु चुनाव के दौरान पैदा किया गया उन्माद सत्ता में आने के बाद ठंडा पड़ना स्वाभाविक है। ट्रम्प ने नागरिकता संबंधी जो बंदिश लगाई उसका अमेरिका के 20 राज्यों में ही विरोध शुरू हो गया। असल में अब उनके सामने अगला चुनाव हारने का भय नहीं है क्योंकि अमेरिका में दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं बना जा सकता। लेकिन वे ज्यादा उड़ेंगे तो जल्द ही उनकी पार्टी में ही विरोध के स्वर उठे बिना नहीं रहेंगे। ट्रम्प को पड़ोसी कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के अंजाम से सबक लेना चाहिए जो अपने अड़ियलपन की वजह से अपनी ही पार्टी द्वारा तिरस्कृत कर दिये गए। ट्रम्प को ये नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका में पूरी दुनिया के लोग आकर नागरिक बन चुके हैं जिनका राजनीति और अर्थव्यवस्था पर जबरदस्त नियंत्रण है। इसीलिए उनकी प्रारंभिक अकड़ ज्यादा दिनों तक जारी रहेगी इसमें संदेह है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 22 January 2025

राममंदिर जनमानस में नव विश्वास की प्राण - प्रतिष्ठा का प्रतीक बना


गत वर्ष आज ही के दिन जब अयोध्या स्थित राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई तब समूचे विश्व में फैले सनातनियों  के मन में विजयोल्लास हिलोरें मार रहा था। सदियों तक चले संघर्ष के बाद बन सका यह मंदिर केवल ईंट - गारे से बना भवन  ही नहीं बल्कि  सैकड़ों वर्षों की मानसिक गुलामी से हासिल मुक्ति का प्रतीक है। हालांकि 15 अगस्त 1947 को   विदेशी सत्ता से भारत  को आजादी मिल गई थी किंतु देश के विभाजन से उत्पन्न पीड़ा के कारण आत्मगौरव का वह भाव उत्पन्न नहीं किया जा सका जो भारत के अस्तित्व का आधार रहा है। सच्चाई  तो ये है कि राम मंदिर के जरिये  पूरे विश्व को ये संदेश दिया गया  कि भारत ने मानसिक स्वाधीनता के लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग अब जाकर खोजा है। इसीलिए उसको मात्र सनातन  धर्म से जोड़ना उचित नहीं है क्योंकि जिस तरह से दिल्ली के राजघाट में बापू की समाधि पर लिखा  हे राम , पूरे  देश के मनोभावों  का प्रतिनिधित्व करता है उसी तरह अयोध्या में निर्मित राम मंदिर  भारत की  सनातन संस्कृति का उद्घोष है । समूचे विश्व में बसे भारतीय  समुदाय द्वारा उक्त अवसर पर व्यक्त हर्षोल्लास के पीछे  इस देश की मिट्टी के प्रति उनकी अखंड  आस्था है जो मातृभूमि से हजारों मील की दूरी के बाद भी जीवंत है तो उसका आधार श्री राम ही हैं , जो आदर्शमय जीवन के ऐसे मापदंड हैं जिसका कोई विकल्प आज तक न उत्पन्न हुआ  और न ही होगा।  राम जन्मभूमि पर आततायी विधर्मी शासकों  के आधिपत्य के विरुद्ध सैकड़ों वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। यद्यपि जयचंद की मानसिकता से ग्रसित लोग यह भ्रम फैलाने से बाज नहीं आये कि राम  एक कल्पना मात्र हैं जिनके अस्तित्व की प्रामाणिकता नहीं है । दरअसल इसी तरह के कुतर्कों ने उस विकृत मानसिकता को जन्म दिया जिसके कारण हमें सदियों  तक सनातन विरोधियों की गुलामी झेलनी पड़ी । उस दौरान हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने के षडयंत्र लगातार चले परंतु श्री राम में अटूट विश्वास ने  भारतवासियों का मनोबल ऊंचा रखा। 15 अगस्त 1947 के  बाद  उम्मीद थी कि महात्मा गांधी की इच्छानुसार रामराज आयेगा किंतु अंग्रेजी संस्कृति से प्रभावित राजनीतिक नेतृत्व ने बापू की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए उस बुनियादी भाव को उपेक्षित और अपमानित करने का कुचक्र रचा जो हमारी एकता का आधार है । लेकिन समय ने करवट ली और भारत का लुप्त होता स्वाभिमान लौटने लगा जिसकी झलक पिछली शताब्दि के अंतिम दशक में ही दिखाई देने लगी थी।  यद्यपि राम जन्मभूमि की मुक्ति का  संघर्ष तो कई  पीढ़ियों से चला आ रहा था किंतु सफलता तभी मिली जब वह जनांदोलन बना । ये एक तरह से आसुरी शक्तियों को परास्त करने के लिए वानर सेना का गठन किये जाने जैसा था। राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा संघर्ष जब चरमोत्कर्ष पर पहुंचा तो फिर विधर्मी दासता के प्रतीक को धूल - धूसरित होते देर न लगी। जो इस बात का प्रमाण था कि अभेद्य राक्षसी दुर्ग को  राम भक्ति की साधारण  शक्ति भी तहस - नहस  करने में सक्षम है। उस दृष्टि से  6 दिसंबर 1992 की तारीख एक नए अध्याय की शुरुआत थी । राम मंदिर के निर्माण से अयोध्या को उसकी प्राचीन भव्यता मिलने के साथ ही देश को अपनी दिव्यता का जो अनुभव हुआ वह सही मायने में सनातन परंपरा से जुड़े करोड़ों भारतीयों के मन में नव विश्वास की प्राण - प्रतिष्ठा है। इसके माध्यम से भारत ने पूरे विश्व को ये आभास करवा दिया  कि उसने अपने आधारभूत आदर्शों को पुनर्स्थापित करने का संकल्प ले लिया है। राम मंदिर में गत वर्ष संपन्न  प्राण प्रतिष्ठा से महर्षि अरविंद और  स्वामी विवेकानंद के उस विश्वास की पुष्टि हुई है कि 21 वीं सदी भारत के नाम होगी। बीते एक वर्ष में अयोध्या  आये लाखों श्रद्धालुओं ने इस मंदिर निर्माण के औचित्य को साबित कर दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 21 January 2025

चुनावी रेवड़ियां अकर्मण्यता को बढ़ावा दे रहीं


दिल्ली विधानसभा चुनाव में बाकी मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए और पूरा चुनाव  मुफ्त रेवड़ियों पर केंद्रित हो गया। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता हासिल ही मुफ्त बिजली और पानी का लालच देकर की थी। यद्यपि सरकारी शालाओं का स्तर सुधारने और मोहल्ला क्लीनिक जैसे उसकी सरकार के कार्यों को हर किसी ने सराहा किंतु अरविंद केजरीवाल को 2015 और 2020 के चुनाव में जो ऐतिहासिक बहुमत मिला उसका मुख्य श्रेय मुफ्त बिजली और पानी को ही दिया जाता है। इन दोनों का लाभ समाज के उस वर्ग ने भी उठाया जो शासकीय शालाओं और मोहल्ला क्लीनिक की सेवाएं नहीं लेता। बाद में अन्य राज्यों के चुनावों में भी ऐसे ही वायदों की शुरुआत हुई। किसी राजनीतिक दल ने इसे गारंटी का नाम दिया तो किसी ने कुछ और। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस ने मुफ्त सुविधाओं की जो गारंटियाँ  घोषणापत्र के जरिये दीं उनके कारण ही उसे वहाँ सफलता मिली। बाद में म.प्र में शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना योजना प्रारंभ कर अंतिम छह माह में भाजपा के पक्ष में जबरदस्त लहर पैदा कर दी। लेकिन शोध का विषय है कि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की राज्य सरकार द्वारा अंधाधुंध रेवड़ियां बांटे जाने के बाद भी भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को  मुफ्त राशन, रसोई गैस कनेक्शन और प्रधानमंत्री आवास योजना का भरपूर लाभ मिला वरना वह सत्ता से सत्ता से बाहर हो सकती थी। उसके बाद चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। उनमें झारखंड में हेमंत सोरेन और महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति सरकार की वापसी के लिए महिलाओं के लिए चुनाव के कुछ महीने पहले शुरू की गई लाड़ली बहना जैसी योजना को श्रेय मिला। उससे प्रभावित होकर श्री केजरीवाल ने दिल्ली में महिलाओं को 2100  रु प्रतिमाह देने का वायदा करने के साथ ही वृद्धों को भी हर माह निश्चित राशि देने और 25 लाख तक का मुफ्त इलाज निजी अस्पताल में करवाने जैसी रेवड़ियों की घोषणा कर दी। इसके अलावा मंदिरों के पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों के लिए भी 18 हजार प्रतिमाह सम्मान निधि का वायदा कर दिया गया। जवाब में भाजपा और कांग्रेस ने भी महिलाओं को  2500 रु. हर माह देने के अलावा और भी बढ़ - चढ़कर वायदे कर डाले। हालांकि चुनाव में आम आदमी पार्टी सरकार  की शराब नीति, शीश महल   और  अधूरे वायदे भी मुद्दे हैं , जिनको लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों श्री केजरीवाल को घेर रही हैं । वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी इस बात का रोना रोते नहीं थक रही कि केंद्र सरकार ने उसे काम नहीं करने दिया। और भी बातें हो रही हैं किंतु चुनाव विश्लेषक ये मान रहे हैं कि फैसला रेवड़ियों से ही प्रभावित होगा। मसलन मुफ्त बिजली और पानी जैसी सुविधाओं का गरीब वर्ग में असर है। हालांकि नये वायदों को लेकर आम आदमी पार्टी पर ये आरोप भी लग रहे हैं कि पंजाब में उसने जिन रेवड़ियों का वायदा किया था वह पूरा नहीं किया। इसलिये उस पर भरोसा न किया जाए। इसी के साथ मतदाताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो मुफ्त खोरी को बढ़ावा देने वाली इन नीतियों को नापसंद करता है किंतु अब जबकि आम आदमी पार्टी के अलावा भाजपा और कांग्रेस भी उसी रास्ते पर चल रही हैं तब किसे दोष दिया जाए ये समझ से परे है। सबसे बड़ी बात ये है कि अपनी नीतियों और कार्यक्रमों से मतदाताओं को आकर्षित करने की जगह मुफ्त उपहार बाँटकर चुनाव जीतने के इन तरीकों पर न तो चुनाव आयोग रोक लगा रहा है और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लेने की तकलीफ की। ऐसे में अब पूरा चुनाव इस बात पर आकर टिक गया है कि कौन सी पार्टी कितनी ज्यादा खैरात देगी। केजरीवाल सरकार ने यदि 10 सालों में बहुत अच्छा काम किया तब उस नई रेवड़ियां बांटने की जरूरत नहीं पड़ती। इसी तरह अपनी विफलताओं के लिए केंद्र सरकार को कसूरवार ठहराना भी बेमानी है क्योंकि  श्री केजरीवाल फिर सत्ता में आये तब भी उनका इसी  केंद्र सरकार से पाला पड़ेगा। ऐसा लगता है राजनीतिक दलों का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा चुका है। चूंकि वे पुराने वायदे पूरे नहीं कर पाते इसलिये वे रेवड़ियों के जरिये मतदाताओं को लुभाने के लिये नगद राशि का प्रलोभन देते हैं जो अनुचित भी है और अनैतिक भी।  चूंकि सभी राजनीतिक दलों का उद्देश्य किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना है इसलिये वे इसके विरोध में बोलने का साहस नहीं दिखा पाते। लेकिन इनके कारण सरकार का खजाना जिस तरह  खाली होता जा रहा है वह बड़े खतरे का कारण बन रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि रेवड़ियों का चलन समाज में वर्ग भेद उत्पन्न करने का कारण बन रहा है। जरूरतमंद लोगों की सहायता और संरक्षण सरकारों का दायित्व है किंतु इसकी आड़ में लोगों, विशेष रूप से युवाओं को अकर्मण्य बनाना किसी अपराध से कम नहीं। 



- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 January 2025

ट्रम्प की दूसरी पारी में भारतीय हित सुरक्षित रहने की उम्मीद

आज रात  डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। यह उनका दूसरा कार्यकाल होगा।  गत वर्ष  उनके राष्ट्रपति चुने जाते ही पूरे विश्व में  जबरदस्त उत्सुकता देखने मिली क्योंकि  निवर्तमान राष्ट्रपति  बाइडेन का कार्यकाल अमेरिका सहित शेष विश्व के लिए भी निराशाजनक रहा। उन्होंने समस्याएं तो खूब पैदा कीं किंतु  समाधान नहीं निकाल पाए जिससे पूरी दुनिया हलाकान हुई। 2021 में जब वे राष्ट्रपति बने तब कोरोना की पहली लहर के दर्दनाक अनुभवों से विश्व के तमाम देश उबर ही रहे थे। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और आवागमन चौपट हो जाने से अनेक धन संपन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं चौपट हो चुकी थीं। ऐसे राष्ट्र  जिनकी अत्याधुनिक  चिकित्सा सुविधाओं के आकर्षण में विदेशी  इलाज करवाने आते थे, वे अपने नागरिकों की कोरोना से रक्षा करने में ही अक्षम साबित हुए। अमेरिका भी अपवाद नहीं रहा। 2021 में आई कोरोना की दूसरी लहर तो पहले से भी अधिक खतरनाक साबित हुई। लेकिन बतौर राष्ट्रपति बाइडेन कोरोना से बचाव का ऐसा कोई मॉडल दुनिया के समक्ष नहीं रख सके जो अपेक्षित था। कोरोना के कारण चीन के प्रति अविश्वास उत्पन्न होने से अमेरिका का महत्व बढ़ा। लेकिन बाइडेन ने बजाय बड़े भाई के तौर पर पेश आने के दुनिया भर में तनाव पैदा करने का कुचक्र रचा। यदि अमेरिका नहीं चाहता तो यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध इतना लंबा नहीं चलता। हमास और इजराइल के बीच भड़की लड़ाई में भी उसकी भूमिका भड़काऊ रही। यहाँ तक कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के भीतर  राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का हरसंभव प्रयास किया गया। जॉर्ज सोरोस नामक षडयंत्रकारी को संरक्षण देकर बाइडेन ने पूरी दुनिया में चुनी हुई सरकारों को गिराने या कमजोर करने का चक्रव्यूह रचा। यही वजह है कि जिन ट्रम्प को अमेरिका की जनता ने चार साल पहले राष्ट्रपति पद से हटा दिया इस बार उन्हीं को बागडोर सौंप दी। दरअसल ट्रम्प को मिले ऐतिहासिक बहुमत के पीछे बाइडेन के प्रति उपजा गुस्सा ही था जिसका खामियाजा कमला हैरिस ने भुगता। बाइडेन  न सिर्फ एक कमजोर राष्ट्रपति साबित हुए बल्कि उन्होंने अमेरिका को भी अंदर से बेहद कमजोर कर दिया। यूक्रेन संकट में उनकी अदूरदर्शितापूर्ण नीति ने अमेरिका समर्थक यूरोपियन देशों तक को खून के आँसू रुला दिये। भारत विरोधी खालिस्तानियों को प्रश्रय देकर बाइडेन ने आतंकवाद  को संरक्षण देने की हिमाकत तो की ही , उनके कार्यकाल में अमेरिकी संस्था हिँडनबर्ग ने भारत के प्रमुख उद्योगपति गौतम अदाणी के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बारे में भ्रामक रिपोर्ट सार्वजनिक कर  भारत में पूंजी लगाने वाले विदेशी निवेशकों को बिदकाने का दांव भी चला। पिछले लोकसभा चुनाव में भी बाइडेन पालित जॉर्ज सोरोस ने मोदी सरकार की वापसी रोकने के लिए विदेशी माध्यमों से दुष्प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके कार्यकाल में अमेरिकी एजेंसियों द्वारा अनेक देशों में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का खेल रचा गया। लेकिन जिस चीन से अमेरिका को सबसे अधिक खतरा है, उसका वे कुछ न बिगाड़ सके। यूक्रेन को बेवजह रूस से भिड़वाकर उन्होंने इस देश को तो बरबादी की गहरी खाई में धकेला ही लेकिन उसका दुष्परिणाम भोगा यूरोप के देशों ने जो गैस के अभाव में मुसीबत में फंस गए। रूस पर लगाए गए प्रतिबंध भी पुतिन को रोकने में असमर्थ साबित हुए। कुल मिलाकर बाइडेन का जिक्र अमेरिका के बेहद कमजोर राष्ट्रपति के तौर पर होगा। लाॅस एंजिलिस में लगी आग को नियंत्रित करने में मिली विफलता ने उनकी विदाई को और भी फीका कर दिया। जहाँ तक बात ट्रम्प की है तो उनके प्रारंभिक तेवर देखकर ये आशंका जताई जा रही है कि भारतीय  वस्तुओं पर अधिक कर लगाने और वीज़ा नियमों को कड़ा करने की उनकी घोषणा का विपरीत असर  भारत पर पड़ेगा। लेकिन उनकी जीत में निर्णायक भूमिका निभाने वाले भारतीय समुदाय के दबाव के चलते भारत के प्रति नर्म रुख रखना उनकी मजबूरी होगी। चुनाव के दौरान भारत और हिंदुत्व के बारे में उनकी टिप्पणियां काफी कुछ कह गईं। हालांकि ट्रम्प थोड़े सनकी भी हैं लेकिन भारत के साथ उनके रिश्ते पहले भी प्रगाढ़ रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ व्यक्तिगत तालमेल भी बेहतर है।  सबसे बड़ी बात ये है कि भारत के बड़े बाजार की उपेक्षा करना अमेरिका सहित किसी भी आर्थिक शक्ति के लिए संभव नहीं है। ट्रम्प  तो निजी तौर पर भारत में व्यवसाय भी करते रहे हैं। इस आधार पर ये उम्मीद  गलत नहीं है कि अमेरिका में  सत्ता परिवर्तन भारतीय हितों के अनुकूल माहौल बनाने में सहायक होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी