Thursday, 8 May 2025

मुनीर पाकिस्तान को युद्ध में फंसाकर सत्ता हथियाने की फिराक में


भारत द्वारा पाकिस्तान  स्थित आतंकवादियों के अड्डों पर ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत किये गए हमलों के बाद पाकिस्तान ने भी जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाके में  बमबारी करते हुए 15 नागरिकों को  मार दिया। उल्लेखनीय है ऑपरेशन सिंदूर में केवल आतंकवादियों के अड्डों को ही निशाना बनाया गया तथा सैन्य ठिकानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। लेकिन पाकिस्तान द्वारा लगातार गोलाबारी करते हुए युद्धविराम का उल्लंघन किया जा रहा है जो भारत को युद्ध में घसीटने की चाल है। स्मरणीय है भारत युद्ध की स्थिति को टालता आ रहा था क्योंकि उसके दूरगामी परिणाम नुकसानदेह होते हैं। और फिर आज के जमाने की जंग तकनीक आधारित होने से काफी खर्चीली हो गई है। उदाहरण के लिए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायु सेना के विमानों ने पाकिस्तान की सीमा में प्रविष्ट हुए बिना ही मिसाइलों और ड्रोन की मदद से आतंकवादियों के प्रशिक्षण और आश्रय स्थलों को खंडहरों में बदल डाला । इस ऑपरेशन को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बदले तक ही सीमित माना जा सकता है किंतु पाकिस्तान ने बौखलाहट में पुंछ क्षेत्र में नागरिकों को निशाना बनाकर भारत को युद्ध के लिए ललकारने का जो दुस्साहस किया वह उसे बहुत महंगा पड़ेगा ये तय है। दरअसल उसके साथ दिक्कत ये है कि वह सेना और आतंकवाद रूपी दो पाटों के बीच फंसा हुआ है। कहने को तो वह लोकतांत्रिक देश है किंतु उससे जुड़ी सोच और सिद्धांतों का पालन नहीं करने की वजह से वहाँ राजनीतिक अस्थिरता ने अपने पैर मजबूती से जमा लिए। अस्तित्व में आने के कुछ सालों बाद से ही पाकिस्तान में नेताओं की हत्या और फ़ौज द्वारा तख्ता पलट का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज भी जारी है। अपने विरोधी को जेल भेजना आम बात है। सत्ता से हटने या हटाये जाने के बाद पूर्व सत्ताधारी या तो कैदखाने में होता है या फिर देश के बाहर जाकर शरण लेने बाध्य किया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान इस समय जेल में हैं। उनके साथ जिस तरह का अमानुषिक व्यवहार हो रहा है वह किसी भी देश के लिए शर्मनाक है। पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ देश से बाहर रहते हुए दुनिया से रुखसत हो गए। इसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री शाहबाज के भाई और दो बार निर्वाचित प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ का हश्र भी किसी से छिपा नहीं है।  हालांकि मुस्लिम देशों में सत्ता पलट का ये खेल बहुत आम है किंतु पाकिस्तान के संस्थापक मो. अली जिन्ना ने देश को लोकतांत्रिक बनाने का जो सपना देखा था वह बहुत जल्दी मिट्टी में मिल गया। वहाँ के जितने भी सत्ताधीश हुए उन्होंने  मुल्क की बेहतरी के बजाय  कुर्सी बचाये रखने के लिए भारत विरोधी रुख अपनाया। सेना के जनरल भी अपनी  राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भारत विरोधी रवैया अपनाकर सरकार पर दबाव बनाते रहे। ये कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार जनता की मर्जी के बजाय सेनाध्यक्षों की दया पर निर्भर रहती है। वर्तमान प्रधानमंत्री शाहबाज भी इसी स्थिति में जी रहे हैं। उनके बड़े भाई नवाज शरीफ ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के प्रयास किये थे किंतु उनको सत्ता गंवानी पड़ी। शाहबाज राजनीतिक तौर पर वैसे भी उतने मजबूत नहीं हैं इसीलिए फौजी जनरल मुनीर खुद को प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर मानते हैं। पहलगाम में आतंकी हमले के पहले दिये उनके एक भाषण में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जिस प्रकार की जन्मजात नफ़रत की बात की गई उसकी काफी चर्चा हुई। कहा जाता है पहलगाम की घटना का वह पूर्व संकेत थी क्योंकि उसके पहले आतंकवादियों ने कभी भी धर्म पूछकर लोगों को नहीं मारा था। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिये उस हत्याकांड का बदला ही लिया किंतु जनरल मुनीर पूरी तरह से जंग छेड़ना चाहते हैं क्योंकि हर युद्ध के बाद पाकिस्तान में तख्ता पलट की परंपरा रही है। जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार वहाँ की चुनी हुई सरकार पूरी तरह सेना की मुट्ठी में आ चुकी है। जनरल मुनीर सत्ता हथियाने के लिए पाकिस्तान को युद्ध में झोंकना चाह रहे हैं। यदि पहलगाम की घटना के बाद पाकिस्तान आतंकवाद पर नकेल कसने की पहल करता तब शायद उस पर ये मुसीबत नहीं आती। लेकिन उसने भारत के अंधविरोध में आतंकवादियों के रूप में जिन नागों को दूध पिलाया वे ही उसकी बर्बादी का सबब बन रहे हैं। उसका ये कहना कि वह खुद आतंकवाद से जूझ रहा है सिवाय झूठ के और कुछ नहीं है। ऐसे में जनरल मुनीर का युद्धोन्माद पाकिस्तान के लिए एक और विभाजन का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि भारत भी इस बार उसे कड़ी सजा देने के लिए तैयार दिख रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 May 2025

भारतीय सेना ने वह कर दिखाया जिसका पूरे देश को इंतजार था

 अप्रैल को पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए नृशंस हत्याकांड के कारण पूरा देश गुस्से में उबल रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया जाएगा जिसे वह भूल नहीं सकेगा। सर्वदलीय बैठक में सभी नेताओं ने सरकार के  किसी भी कदम के समर्थन  का आश्वासन दिया जिसके बाद प्रधानमंत्री ने सेना प्रमुखों को ये अधिकार दे दिया कि वे अपना लक्ष्य, तरीका और समय तय करते हुए आतंकवादियों की कमर तोड़ें। हालांकि श्री मोदी के उक्त फैसले पर उनके विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया कि वे अपनी जिम्मेदारी सेना पर डालकर दूर हो गए। सोशल मीडिया में भी पाकिस्तान में घुसकर मारने का दबाव बनाया जाने लगा। प्रधानमंत्री सहित भाजपा नेताओं द्वारा 26/11 हमले के बाद दिये बयानों के वीडियो दिखाकर उनका मजाक उड़ाते हुए 56 इंची सीने के दावे पर भी तंज कसे जाने लगे। सिंधु नदी जल संधि और पाकिस्तानी नागरिकों को देश छोड़ने संबंधी निर्णयों को युद्ध से बचने का तरीका बताने का अभियान भी देखने मिला।  कुछ लोग ये कहने से भी  नहीं चूके कि चीन के डर से भारत सरकार पाकिस्तान पर हमला करने का साहस नहीं कर पा रही। पाकिस्तान भी परमाणु बमों का हवाला देकर धमकाने की जुर्रत कर  रहा था। हालांकि भारत की ओर से जवाबी कारवाई   का डर उसके सिर पर सवार था। सीमा पर उसने सैन्य तैयारियां भी करना शुरू कर दिया। इन सबके बीच देश में एक वर्ग निराशावाद फैलाने में जुटा था। उ.प्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भारतीय वायुसेना के सबसे आधुनिक लडाकू विमान रफाल को खिलौना बताते हुए उसका उपहास किया। कुछ विपक्षी नेताओं के बयानों को पाकिस्तान ने अपनी बेगुनाही के प्रमाण तौर पर भी पेश किया। वहाँ की संसद में भी उनका उल्लेख करते हुए कहा गया कि भारत में पूरा देश सरकार के साथ नहीं है। जैसे - जैसे दिन बीत रहे थे सरकार पर सवाल दागने वालों के हौसले बुलंद होने लगे। यहाँ तक दावा किया गया कि सरकार ने ही पहलगाम हत्याकांड करवाया। आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर पर्यटकों की हत्या किये जाने की बात को झुठलाने के भी खूब जतन हुए। लेकिन इन सबसे विचलित हुए बिना सरकार और सेना ने तैयारी जारी रखी। सबसे बड़ी बात ये हुई कि विश्व जनमत को भारत के पक्ष में मोड़ने में सफलता मिली जो बड़ी उपलब्धि थी। यहाँ तक कि प्रमुख मुस्लिम देश तक आतंकवाद से लड़ने में भारत के पक्ष में नजर आये। और जब ये सुनिश्चित हो गया कि पलटवार के समुचित इंतजाम हो चुके हैं तब गत मध्यरात्रि के बाद वायुसेना ने पाकिस्तान के भीतर स्थित आतंकवादियों के 9 बड़े अड्डों को निशाना बनाकर  ध्वस्त कर दिया। इस कारवाई में पाक के कब्जे वाला कश्मीर भी शामिल था। पाकिस्तान द्वारा भी हमले के  वीडियो प्रसारित किये गए  हैं। इसके बाद  भारत  में  पिछली सर्जिकल स्ट्राइकों का सबूत मांगने वाला तबका मुँह छिपाये घूम रहा है। सेना ने साफ कर दिया कि उसने पाकिस्तान के किसी सैन्य ठिकाने पर हमला नहीं किया और केवल आतंकवादियों के अड्डों को ही निशाना बनाया गया।  दो दिन पहले  सं.राष्ट्र.संघ सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत को घेरने के प्रयास में पाकिस्तान खुद फंस गया जब सदस्य देशों ने उसके यहाँ आतंकवादी अड्डे होने का आरोप लगाकर कठघरे में खड़ा कर दिया। ऐसा लगता है भारत सरकार इसी का इंतजार कर रही थी। दिल्ली में बीते दो - तीन दिनों में उच्च स्तरीय बैठकों का दौर जिस प्रकार चला उससे ये संकेत तो मिल ही गए थे कि कुछ न कुछ होने वाला है और आखिरकार ऑपरेशन सिंदूर नामक  अभियान के जरिये पहलगाम हत्याकांड का बदला ले लिया गया। इस हमले में पाकिस्तान को कितना नुकसान हुआ इसका विवरण आता जा रहा है। आतंकी सरगना मसूद अजहर के परिवार का सफाया होने की पुष्टि तो खुद उसी ने की है। नष्ट हुए आतंकवादियों के अड्डों की तस्वीरें साबित कर रही हैं कि भारतीय वायुसेना ने बहुत ही कुशलता से अपने लक्ष्य को भेदा। इस कार्रवाई के बाद दोनों देशों की सीमा पर भी गोलाबारी की खबरें आई हैं। ये अभियान लंबे युद्ध में तब्दील होगा , ये पाकिस्तान के जवाब पर निर्भर है। यद्यपि सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक उसके पास पर्याप्त सैन्य संसाधन नहीं हैं और  आर्थिक स्थिति भी दयनीय है।बलूचिस्तान के साथ ही अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर भी वह फंसा हुआ है। ये देखते हुए वह ऑपरेशन सिंदूर का जवाब किस तरह से देता है इस पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं । यद्यपि युद्ध से दोनों पक्षों को नुकसान होगा किंतु पाकिस्तान जैसे देश को सबक सिखाना जरूरी हो गया था। भारत बेशक पूर्ण युद्ध को टाले परंतु ज़हरीले सांप का फन कुचलना समय की मांग  है। भारतीय सेना की कारवाई से जैसा  उत्साह और संतोष का भाव जागा है वह देशवासियों  के मन में सरकार और सेना के प्रति विश्वास का प्रमाण है। साथ ही जो आत्मविश्वास सर्वत्र परिलक्षित हो रहा है वही किसी शक्तिशाली देश की पहिचान है। रास्वसंघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में कहा था कि शक्तिशाली हैं तो शक्ति का प्रदर्शन भी होना चाहिए। भारतीय सेना ने वह कर दिखाया जिसके लिए हर देशभक्त उसके प्रति श्रद्धावनत है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 May 2025

अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार भरोसे लायक नहीं


जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने  विधानसभा में पहलगाम की घटना पर भावुक होते हुए कहा कि मृतक  पर्यटकों की सुरक्षित वापसी नहीं हो पाने के लिए वे खुद को भी जिम्मेदार मानते हैं।  सिंधु नदी जल संधि निलंबित किये जाने का भी समर्थन किया। आजकल उमर और उनकी पार्टी पूर्ण राज्य के दर्जे जैसी माँग उठाने से परहेज कर रही है। पहलगाम की घटना से कोई वास्ता न होने की बात साबित करने के लिए घाटी में बंद भी रखा गया। पर्यटकों को आश्वस्त किया गया कि वे निडर होकर कश्मीर आएं उनकी सुरक्षा और सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा। पहलगाम हादसे के बाद इस तरह के समाचार भी प्रायोजित किये गए कि स्थानीय लोगों ने पर्यटकों की हरसंभव सहायता की। इस कथित सौजन्यता का कारण कश्मीर घाटी से पर्यटकों के  लौटने के साथ ही आने वाले सैलानियों द्वारा बुकिंग रद्द करने से घाटी के होटल, हाउसबोट, टैक्सी, शिकारा, घोड़े - खच्चर वाले और गाइड अपनी रोजी - रोटी के लिए चिंतित हो उठे। उल्लेखनीय है धारा 370 हटाये जाने के बाद से  पर्यटकों की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि हुई जिससे वहाँ  अर्थव्यवस्था को पंख लग गए। ऐसे में पहलगाम हत्याकांड से उनके व्यवसाय के चौपट होने का खतरा पैदा हो गया क्योंकि अपनी जान जोखिम में डालकर शायद ही कोई सैर - सपाटे पर आना चाहेगा। तुष्टीकरण करने वाले नेताओं और उनके प्रचारतंत्र ने कश्मीरियों की मेहमान नवाजी और इंसानी भावनाओं का जमकर ढिंढोरा  पीटकर साबित करना चाहा कि आतंकवाद से आम कश्मीरी का कोई संबंध नहीं है। ये इसलिए किया गया क्योंकि पहलगाम में  जिस जगह आतंकियों ने हत्याकांड किया वहाँ के कई निजी प्रतिष्ठान उस दिन बंद थे । घटना के फ़ौरन बाद खाद्य सामग्री बेचने वाले अनेक खोमचे वाले फरार हो गए। जाँच एजेंसियों का ध्यान भटकाने के लिए ये हवा उड़ाई गई कि आतंकवादी बाहर से आये और कश्मीरियों का उनसे कोई संबंध नहीं था। लेकिन हाल ही में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुल्ला ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि  इतनी बड़ी आतंकवादी आतंकवादी घटना बिना स्थानीय सहयोग के संभव नहीं थी। उन्होंने  कहा कि निश्चित रूप से आतंकवादी बाहर से आये किंतु उन्हें वहाँ तक ले जाने वाले स्थानीय लोग ही थे। इस बयान ने उन समस्त शिगूफेबाजों के मुँह बंद कर दिये जो कश्मीरियों को दूध का धुला साबित करने में दिन - रात एक किये हुए थे। फारुख के बयान पर तीखी  प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि डाॅ. अब्दुल्ला के बयान ने आम कश्मीरी को मुसीबत में डाल दिया है क्योंकि अब जांच एजेंसियां कश्मीर के नागरिकों को संदेह के नाम पर पकड़ेंगी। और उनकी बात सच भी निकली क्योंकि पहलगाम हत्याकांड के मुख्य आरोपियों को संरक्षण और सहयोग देने वाले संदेहास्पद तमाम लोगों को गिरफ्तार किया गया । महबूबा ने दोबारा फारुख के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके बयान से देश के बाकी हिस्सों में कश्मीरी मुसीबत में आ गए। उन्होंने पहलगाम की आतंकी घटना में पाकिस्तान का हाथ होने के सवाल को ये कहते हुए घुमा दिया कि जाँच के चलते किसी को दोषी मान लेना गलत है। उक्त बातों से साबित हो जाता है कि घाटी के राजनीतिक नेता देश को गुमराह करने की परंपरा का ही निर्वहन कर रहे हैं। भले ही वे चुनाव प्रक्रिया का पालन करते हों किंतु भारत के प्रति उनकी निष्ठा जितनी पहले संदिग्ध रही उतनी ही आज भी है। काफी पहले दिया फारुख का वह बयान काफी चर्चित हुआ था कि धारा 370 नहीं हट सकती चाहे नरेंद्र मोदी 10 बार प्रधानमंत्री बन जाएं। महबूबा ने यहाँ तक धमकी दी थी कि 370 हटाये जाने की स्थिति में घाटी में कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं मिलेगा। उमर ने भी मुख्यमंत्री बनते ही 370 की वापसी का मुद्दा उठाने की डींग हाँकी थी। आजादी के पहले से ही कश्मीर घाटी के नेताओं का दोगलापन सामने आता रहा किंतु उनकी हरकतों को जानते हुए भी उन्हें गले लगाने की मूर्खता की गई। धारा 370 जैसे अस्थायी प्रावधान को लगभग 70 साल तक क्यों ढोया गया जबकि उसकी वजह से देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के साथ ही राष्ट्रीय एकता के लिए भी बड़ा खतरा पैदा हो गया। यदि ये धारा न होती तब वहाँ अलगाववाद के बीज ही नहीं पनपते। अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार  सत्ता की राजनीति के चलते भारत के प्रति दिखावटी नरमी भले ही दिखाता रहा किंतु इनके मन कभी भी साफ नहीं रहे। हालांकि मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति ने इन्हें सदैव जोड़ने का प्रयास किया किंतु इनकी तासीर नहीं बदली और भारत में रहकर भी ये पाकिस्तान की हिमायत करने से बाज नहीं आये। कश्मीर घाटी को हिन्दू विहीन कर वहाँ के लोगों में कश्मीरियत के नाम पर भारत से अलग पहिचान बनाने का भाव भरने में इन परिवारों की मुख्य भूमिका रही है और वही ये अब भी निभा रहे हैं। ये तो अच्छा है केन्द्र सरकार ने इनके घमंड को काफी हद तक तोड़ दिया। बेहतर है विपक्षी पार्टियां भी अब्दुल्ला और मुफ्ती नामक परिवारों को किनारे करें क्योंकि ये कश्मीर को समस्याग्रस्त बनाये रखकर ही अपनी अहमियत बनाये रखते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 5 May 2025

झेलम - चिनाब का पानी रोकना होशियारी भरा कदम


पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा हत्याकांड के बाद पूरा देश पाकिस्तान के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने की मांग कर रहा है। विपक्षी दलों द्वारा  समर्थन  का भरोसा दिये जाने से उत्साहित होकर सरकार ने पाकिस्तान पर तरह - तरह के प्रतिबंध लगाते हुए उसके नागरिकों को भारत छोड़ने के आदेश के अलावा आपसी  व्यापार रोक दिया। यहाँ तक कि डाक आने पर भी पाबंदी लग गई। भारतीय बंदरगाहों पर पाकिस्तानी पोतों की आवाजाही भी निषिद्ध कर दी गई। तीनों सेनाध्यक्षों को प्रधानमंत्री ने  पाकिस्तान से बदला लेने के लिए  लक्ष्य, समय और तरीका तय करने के लिए स्वतंत्र कर दिया।वहीं जनता को आश्वस्त किया गया कि पहलगाम के हमले का बदला हर हाल में लिया जाएगा। सैन्य कारवाई करने का निर्णय  सेना पर छोड़ने के अलावा केन्द्र सरकार ने जो सबसे बड़ा कदम  उठाया वह है सिंधु नदी जल संधि को निलंबित करना जिसके अनुसार सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया जबकि रावी, सतलज और व्यास भारत के हिस्से में। भारत अब तक इसका पालन करता आया है जबकि इससे उसे नुकसान था। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए स्वीकार किया कि सिंधु नदी जल संधि से उनके राज्य के हित प्रभावित हुए। संधि का पालन करते हुए भारत ने सिंधु पर बहुत छोटा तथा झेलम और चिनाब नदी पर मध्यम श्रेणी के बांध बनाये । ये देखते हुए हर  बात में  सरकार का विरोध करने वाला विघ्नसंतोषी वर्ग ये ढिंढोरा पीटने लगा कि सिंधु नदी जल संधि का निलंबन जनता को बहलाने के लिए छोड़ा गया शिगूफा है क्योंकि भारत के पास सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी रोकने में सक्षम बांध ही नहीं हैं और  यदि अभी उस दिशा में काम शुरू भी किया जाए तो उसे पूरा होने में कम से कम 20 वर्ष लगेंगे। इसके साथ ही आये दिन पाकिस्तान पर हमले में देरी के लिए प्रधानमंत्री पर निशाना साधा जाता है। चूंकि पहलगाम में आतंकवादियों ने धर्म पूछकर नृशंस हत्या की लिहाजा देश का बहुसंख्यक समाज भी उम्मीद लगाए बैठा है कि पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया जाए जिससे भविष्य में वह इस तरह  के हमले के बारे में सोच भी न पाए। सरकार भी जनभावनाओं को महसूस कर रही है किंतु उसे इस बात का भी एहसास है कि बिना तैयारी के युद्ध छेड़ देना बुद्धिमत्ता नहीं होती। इसीलिए प्रधानमंत्री ने सेना प्रमुखों को उस बारे में अंतिम फैसला करने की छूट दे दी और जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार थल, वायु और नौसेना मिलकर संयुक्त रणनीति के अंतर्गत सैन्य कारवाई की तैयारी  कर रही हैं किंतु इस बीच केंद्र सरकार ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए जो कदम उठाये उनका असर दिखाई देने लगा है। पाकिस्तानी नागरिकों को देश छोड़ने का आदेश प्रसारित होते ही अवैध रूप से रह रहे हजारों पाकिस्तानियों के चेहरे सामने आ गए। पाकिस्तान के साथ व्यापार संबंध खत्म करने से भी वह परेशानी में आ गया है। लेकिन सबसे बड़ा झटका उसे लगा सिंधु नदी जल संधि निलंबित होने से। बीच में खबर आई थी कि भारत द्वारा अतिरिक्त जल छोड़े जाने से पाकिस्तान में बाढ़ आ गई । हालांकि उस खबर की पुष्टि सरकार ने नहीं की किंतु गत दिवस आधिकारिक तौर पर स्पष्ट कर दिया गया कि झेलम नदी पर बने बांध से पाकिस्तान जाने वाला पानी रोक दिया गया है और चिनाब के बाँध से भी संभवतः आज से पानी छोड़ना बंद हो जायेगा। इसके साथ ही भारतीय सीमा से सटे पाकिस्तान के सियालकोट इलाके में झेलम के जलस्तर में 6 फीट की कमी होने की जानकारी आ गई। चिनाब का जल रोके जाने से भी पाकिस्तान में भरी गर्मी जल संकट होना सुनिश्चित है। जो वर्ग अब तक सिंधु नदी जल संधि के निलंबन को शिगूफेबाजी बताते हुए 24 घंटे  प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा करने पर आमादा था उसे उक्त खबरें अच्छी नहीं लग रही होंगी किंतु आवेश में आकर सैन्य कारवाई कर देना आत्मघाती हो सकता है। और उसके पहले कूटनीतिक मोर्चे पर भी अनुकूलता बनानी जरूरी है। जो संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार दुनिया के अनेक बड़े देश भारत के प्रति समर्थन और सहानुभूति प्रदर्शित कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि तुर्किये को छोड़ अन्य किसी भी मुस्लिम देश ने पाकिस्तान की तरफदारी नहीं की जिसे भारत की बड़ी कामयाबी कहा जा सकता है। इन्हीं सबसे उत्साहित होकर ही केंद्र सरकार सावधानी पूर्वक आगे बढ़ रही है। दुश्मन की ताकत और तैयारी का सटीक आकलन करने के उपरांत ही  सैन्य कार्रवाई करना सही होगा। उसके पहले अन्य जो कदम उठाये गए उनके प्रभाव की जानकारी भी लेना जरूरी है। गत दिवस झेलम और चिनाब नदी का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने का फैसला निश्चित रूप से बड़ा कदम है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो भारत द्वारा नदियों का पानी रोके जाने के फैसले को युद्ध जैसा कार्य (Act of War) कहे जाने के साथ ही धमकी दी गई थी कि सिंधु हमारी है उसमें हमारा बहेगा या उनका ( भारत ) खून । भारत के साथ एक हजार साल तक लड़ने की डींग हाँकने वाले  बिलावल के मरहूम पिता ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने अपनी एक पुस्तक की प्रारंभिक पंक्तियों में लिखा था कि बहादुरी का सबसे बेहतर तरीका होशियारी है। बिलावल को अब तक तो समझ में आ गया होगा कि भारत होशियारी के साथ आगे बढ़ रहा है। झेलम और चिनाब का पानी रोकना उसी की बानगी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 3 May 2025

क्या वामपंथियों पर भी अडानी समर्थक होने का आरोप लगाएंगे राहुल


केरल के  विझिंजम में डीप-सी बंदरगाह के शुभारंभ पर  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच पर वामपंथी मुख्यमंत्री पी. विजयन, कांग्रेस के स्थानीय  सांसद शशि थरूर और बंदरगाह निर्माण करने वाले उद्योगपति गौतम अडानी की उपस्थिति को नये बदलाव का संकेत बताते हुए कटाक्ष किया कि संदेश जहाँ पहुंचना था , पहुँच गया। यद्यपि कांग्रेस उनकी इस टिप्पणी से भन्नाई हुई है किंतु प्रधानमंत्री ने जो  कहा उसके निहितार्थ काफी गहरे हैं। मसलन वामपंथी मुख्यमंत्री का उनके साथ होना, और केरल  सरकार की विरोधी कांग्रेस के सांसद की उपस्थिति और कांग्रेस तथा वामपंथियों की आँख की किरकिरी बने उद्योगपति गौतम अडानी का सबके साथ बैठना। श्री मोदी ने बंदरगाह की तारीफ करते हुए उसे देश की आर्थिक प्रगति में सहायक बताया जो अपेक्षित था किंतु श्री अडानी की जो तारीफ की  श्री थरूर को भी असहज कर दिया होगा। दरअसल इस बंदरगाह में केरल के साथ  केंद्र सरकार और श्री अडानी तीनों हिस्सेदार हैं। जब इसका टेंडर निकला तब अकेले अडानी समूह ने बोली लगाई। इस परियोजना के कारण  समुद्री व्यापार में केरल विश्व के नक्शे पर आ गया। गहरे समुद्र में बना यह बंदरगाह बड़े जल पोतों के लिए उपयुक्त है।  इसका निर्माण भारतीय कंपनी द्वारा होने से देश का धन  बाहर जाने से रुक गया जिसका उल्लेख श्री मोदी ने किया। इसके लिए  प्रयास 1991 से चले आ रहे थे। लेकिन सुरक्षा संबंधी चिंताएं, बोली  संबंधी कानूनी विवाद और निवेशकों की कम रुचि जैसी बाधाएं आती रहीं। अंततः केरल सरकार ने अगस्त 2015 में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत  अदाणी पोर्ट्स एंड एसईजेड लिमिटेड (एपीएसईजेड) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें अदाणी को बंदरगाह के निर्माण, संचालन और हस्तांतरण के लिए 40 साल की रियायत दी, जिसमें 20 साल के विस्तार का प्रावधान था। इसके बनने से सभी दक्षिणी राज्यों को  जबरदस्त लाभ होगा। लेकिन वामपंथी राज्य सरकार द्वारा अडानी समूह को इतने बड़े बंदरगाह के निर्माण और संचालन का अधिकार 60 वर्ष के लिए देना  प्रमाणित करता है कि इस समूह का जो विरोध कांग्रेस करती आई है वह खोखला है। वरना श्री थरूर  दिल्ली से भागे - भागे जाकर प्रधानमंत्री की अगवानी नहीं करते और न ही उस मंच दिखते जिस पर वह उद्योगपति  मौजूद हो जिस पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी आये - दिन हमले किया करते हैं। प्रधानमंत्री ने केरल के मुख्यमंत्री को इंडिया गठबंधन का बड़ा नेता बताकर असल में श्री गाँधी पर ही निशाना साधा। साथ ही स्थानीय सांसद के तौर पर ही सही श्री थरूर की उपस्थिति को भी उससे जोड़ा। उल्लेखनीय है कि श्री गाँधी हमेशा आरोप लगाते हैं कि प्रधानमंत्री  , अडानी समूह पर मेहरबान हैं और देश के हवाई अड्डे और बंदरगाह जैसे  बड़े उपक्रम उनको सौंपकर देश का नुकसान कर रहे हैं। हालांकि इंडिया गठबंधन में ममता बैनर्जी, शरद पवार, उद्धव ठाकरे सहित कुछ अन्य छत्रप उनका साथ नहीं देते किंतु राहुल लगभग रोज ही अडानी विरोध की माला जपते हैं। दूसरी ओर राजस्थान और छत्तीसगढ़ की पिछली कांग्रेस सरकारों ने अडानी समूह को बिजली और खनन क्षेत्र में बड़े - बड़े काम देकर श्री गाँधी के विरोध को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जिससे  कांग्रेस की काफी किरकिरी भी हुई। अब केरल की वामपंथी सरकार ने भी केंद्र के साथ मिलकर जब अडानी समूह को यह परियोजना सौंप दी तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या श्री गाँधी प. बंगाल में वामपंथियों के साथ चला आ रहा  गठजोड़ तोड़ेंगे और इंडिया गठबंधन से भी वामपंथियों को निकाल बाहर करेंगे ? बीते समय अमेरिका की कतिपय एजेंसियों द्वारा जब अडानी समूह के बारे में कुछ खुलासे किये तब राहुल सहित अन्य विपक्षी दलों द्वारा संसद नहीं चलने दी और संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की जिद कर डाली।केरल के बंदरगाह का काम अडानी समूह को देकर वहाँ की वामपंथी सरकार ने श्री गाँधी को भी आईना दिखा दिया जो इसी राज्य की वायनाड सीट से दो चुनाव जीते और वर्तमान में उनकी बहिन वहाँ  से सांसद हैं। अगले साल केरल  में विधानसभा चुनाव होंगे। इंडिया गठबंधन में होने के बाद भी यहाँ कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध ताल ठोंकते नजर आयेंगे। देखने वाली बात ये रहेगी कि अडानी समूह को उपकृत करने का  जो आरोप श्री गाँधी प्रधानमंत्री पर लगाया करते हैं क्या वही अब केरल की वामपंथी सरकार पर भी लगाएंगे जिसने विझिंजम में डीप-सी बंदरगाह 60 वर्षों के लिए अडानी समूह को सौंप दिया और उस जलसे में कांग्रेस सांसद श्री थरूर न सिर्फ मौजूद थे बल्कि श्री मोदी के स्वागत के लिए हवाई अड्डे पर भी नजर आये। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 2 May 2025

वैध तरीकों से हुई घुसपैठ सामने आने लगी


बात से बात किस तरह निकलती है ये पाकिस्तानी नागरिकों को भारत छोड़ने के फरमान के बाद देखा जा सकता है ।  केंद्र सरकार ने 48 घंटों के भीतर उन पाकिस्तानी नागरिकों को भारत छोड़ने कहा जो किसी कारण से यहाँ आये हुए थे। गत दिवस इस अवधि को अगली सूचना तक बढ़ा दिया गया। पहलगाम में आतंकवादी हमले के  बाद  की गई  कारवाई से चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं । ऐसी हजारों महिलाएं हैं जिनका विवाह पाकिस्तानी नागरिक से होने के बाद वे वहाँ की नागरिक बन गईं। उनके बच्चे पाकिस्तान में पैदा हुए। बाद में  तलाक़ या अन्य किसी कारण से वह बच्चों सहित लौट आई । भारतीय मूल की होने से वह तो यहाँ रहने की पात्र हो सकती है किंतु उसके बच्चे नहीं।हजारों मामले सामने आने से  साबित हो चुका है कि भारत में पाकिस्तानियों की घुसपैठ वैध तरीकों से भी होती रही। बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं भी हैं जिनके पति पाकिस्तान में ही रहते किंतु वे यहाँ डेरा जमाये बैठी हैं। जम्मू कश्मीर में कुछ ऐसे लोग भी पकड़ में आये हैं जो पाकिस्तानी नागरिक के तौर पर आये किंतु अब्दुल्ला और मुफ्ती की सरकारों के  राज में बिना नागरिकता लिए मतदाता बन गए। बांग्ला देशी घुसपैठियों के अलावा रोहिंग्या  समुदाय को देश से निकालने की जब - जब मांग उठी तब - तब  तुष्टीकरण में लगा तबका मानवता का ढोल पीटने लगता था। लेकिन अब ये तथ्य सामने आया कि वैध तरीकों से भी घुसपैठ होती रही है। पाकिस्तान में शादी करने वाले पुरुष या महिला को यहाँ आने - जाने और लंबे समय तक रहने की जो सुविधा मिली उसके कारण आंतरिक सुरक्षा को जो खतरा हुआ वह सामने आ रहा है। पाकिस्तान में ब्याही लड़कियों के पति और वहाँ से आईं बहुओं के  शत्रु देश के जासूस होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। सबसे अधिक हैरान करने वाली बात ये है कि अनेक शादियां ऐसी सामने आ रही हैं जिनमें बीवी अथवा शौहर ने अपना देश नहीं छोड़ा। ऐसे में बच्चे जहाँ पैदा हुए वहीं के नागरिक माने जाते हैं। भारत सरकार द्वारा जारी आदेश के बाद ये समस्या सामने आ रही है कि जिन भारतीय और पाकिस्तानियों ने शादी के बाद भी नागरिकता नहीं बदली उनका क्या होगा? कुल मिलाकर बात यहाँ फंसती है कि पाकिस्तान में इस तरह रह रहे भारतीय बेहद कम हैं जबकि भारत में आकर जमे पाकिस्तानी कल्पना से भी ज्यादा। ये स्थिति देश में अवैध घुसपैठ को लेकर व्यक्त की जाने वाली चिंताओं को और बढ़ाने वाली है। वोट बैंक के लालची राजनेताओं ने बांग्लादेश और म्यांमार से आये घुसपैठियों को फर्जी तरीके से मतदाता होने का अधिकार दिलवा दिया जिससे वे शासकीय सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं। इनके द्वारा अवैध कब्जे कर अपनी बस्ती बसा ली गई जिसमें बिजली, पानी और सड़क जैसी सुविधाएं वोट बैंक के सौदागरों ने उपलब्ध करवा दीं। पाकिस्तान, बांग्ला देश और म्यांमार में जो बदहाली है उसके कारण ये घुसपैठिये वापस जाने को राजी नहीं है और भारत पर बोझ बन गये हैं। यहाँ तक भी गनीमत है किंतु इनकी निष्ठा भारत के प्रति नहीं होना हमारी सुरक्षा के लिए स्थायी खतरा बन गया है। देश के किसी भी हिस्से में घटित आतंकवादी घटना के तार पाकिस्तान या बांग्ला देश से जुड़े पाए जाते हैं। जिनमें  घुसपैठियों का हाथ होने की आशंका बनी रहती है। लेकिन जिस बड़ी संख्या में वैध दस्तावेजों के साथ रह रहे  पाकिस्तानी नागरिकों की जानकारी आई वह  व्यवस्था में व्याप्त खामियों और भ्रष्टाचार का प्रमाण है। पाकिस्तानी नागरिक यहाँ आने के बाद लंबे समय तक न लौटे तब ये पुलिस और  प्रशासन का काम है कि उसकी पतासाजी करे। लेकिन ये बात भी सही है कि ऐसे लोगों को आश्रय देने के लिए मुस्लिम समुदाय पर भी स्वाभाविक रूप से उंगलियाँ उठती हैं। कश्मीर घाटी से आ रही जानकारियों से ये बात निकलकर आ रही है कि पहलगाम हत्याकांड के आतंकवादियों को स्थानीय लोगों ने सहायता की जिनमें कुछ तो घटनास्थल पर ही थे। घटना के बाद आतंकवादी भाग गए और अभी तक पकड़े नहीं गए क्योंकि उन्हें घाटी में ही किसी न किसी ने पनाह दे रखी होगी। आजकल कश्मीरियों की मानवीय भावनाओं का खूब बखान हो रहा है परंतु हत्याकांड के चश्मदीद  लोग घटना के बाद से गायब हैं। पाकिस्तानी नागरिकों को देश छोड़ने का आदेश प्रसारित होते ही उनके प्रति हमदर्दी व्यक्त करने वाले  सामने आने लगे। लेकिन ऐसे लोग तब नजर नहीं आते जब इनके जरिये देश में अशांति फैलाने का काम होता है। ये बात सुनने में तो अच्छी लगती है कि दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत होने से जनता के स्तर पर रिश्ते मधुर हो सकते हैं किंतु गीतकार जावेद अख्तर का ये कहना सही है कि इकतरफा मोहब्बत कब तक चलेगी ? पाकिस्तानी कलाकारों पर प्रतिबंध  को उचित ठहराते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में स्व. लता मंगेशकर का एक भी कार्यक्रम नहीं हुआ जबकि पाकिस्तानी कलाकार यहाँ आते रहते हैं। इस तरह के और भी मुद्दे हैं जिनको देखते हुए पाकिस्तानी नागरिकों को जितनी जल्दी हो सके निकाल बाहर करना जरूरी है। इस बारे में स्थानीय प्रशासन को भी सजग होकर उनकी तलाश कर उन्हें खदेड़ना होगा जो  आये तो वैध तरीके से थे किंतु फिर अवैध रूप से यहीं डटे हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 1 May 2025

जातिगत जनगणना : अंततः फायदे में भाजपा ही रहेगी


सेना के सर्वोच्च अधिकारियों के साथ  बैठक के बाद रा.स्व.संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने उनके आवास पर गए तो बड़ी खबर बन गई। चूंकि  संघ और सरकार के बीच संपर्क का काम भाजपा के संगठन मंत्री के जरिये होता है इसलिए  संघ प्रमुख का उनके आवास पर जाना चौंकाने वाला था। राजनीतिक जगत में इस मुलाकात को सरकार पर संघ के नियंत्रण के रूप में भी प्रचारित किया गया। हिन्दू नव वर्ष के आयोजन में  प्रधानमंत्री नागपुर गए तब कहा गया कि मातृ संगठन की नाराजगी दूर करने वे संघ मुख्यालय पहुंचे।  वहीं डॉ. भागवत की उनसे ताजा मुलाकात के  बाद  कयास लगा कि पाकिस्तान के बारे में किसी  निर्णय पर चर्चा हुई  परंतु एक दिन बाद घोषणा हुई कि अगली जनगणना के साथ ही जातिगत गणना भी होगी। इसकी शुरुआत सितंबर माह से होगी और अंतिम नतीजे आने में एक साल लगेगा।  इस निर्णय का अंदाज तो भाजपा के बड़े नेताओं तक को नहीं रहा होगा।  पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने संविधान और जातिगत जनगणना जैसे दो मुद्दों पर भाजपा को घेरा था। भाजपा की सीटें  घट जाने से श्री गाँधी का हौसला बढ़ा और  वे प्रधानमंत्री को चुनौती देते रहे कि जातीय जनगणना होकर रहेगी साथ ही आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक की जाएगी। लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम ने लोकसभा चुनाव का तिलिस्म तोड़ दिया। जिस उ.प्र में अखिलेश यादव के पीडीए  (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) नारे ने  भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाया वह  हालिया विधानसभा उपचुनावों में बुरी तरह विफल हो गया। इसी तरह हरियाणा और महाराष्ट्र ने भी कांग्रेस को जोरदार झटका देकर भाजपा की झोली भर दी। सबसे बड़ा उलटफेर हुआ दिल्ली में जहाँ भाजपा ने आम आदमी पार्टी को बुरी तरह हराकर पूरे राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल डाली। इन सबसे प्रधानमंत्री का हौसला मजबूत हुआ। चूंकि संघ ने उक्त तीनों राज्यों में व्यूहरचना की थी और आगे  भी उसकी भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है , लिहाजा जातिगत जनगणना के फैसले के पहले श्री मोदी और संघ प्रमुख की भेंट उसी संदर्भ में हुई ये मान लेना गलत नहीं है। रही बात इसके राजनीतिक परिणामों की तो भले ही श्री गाँधी और अन्य विपक्षी नेता इसे अपनी जीत बताकर खुश हों किंतु एक बार फिर वे प्रधानमंत्री के चक्रव्यूह में फंस गए। अतीत में जब - जब भी कोई बड़ा राजनीतिक अथवा सामाजिक मुद्दा उछला उससे अंततः भाजपा ही लाभान्वित हुई। 1974 में गुजरात से शुरू हुए छात्र आंदोलन के परिणिती आपातकाल के रूप में हुई। 1977 के चुनाव में जनता सरकार बनी और जल्द चलती बनी किंतु जनसंघ के नये अवतार के रूप में खड़ी हुई भाजपा कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित हो गई। 1984 में इंदिरा जी की हत्या ने भले ही राजीव गाँधी को ऐतिहासिक बहुमत दिलवा दिया किंतु महज दो लोकसभा सीटों पर सिमट गई भाजपा पांच वर्ष के भीतर ही सबसे बड़ा विपक्षी दल बन गई। उसने राममंदिर आंदोलन के जरिये जो दांव चला , राजीव गाँधी ने उसे बेअसर करने मंदिर का शिलान्यास करवाया किंतु उसका लाभ मिला भाजपा को। इसकी काट के तौर पर पुराने समाजवादी , मंडल आयोग लेकर आये लेकिन आज  लोकसभा में पिछड़ी जातियों के सर्वाधिक सांसद भाजपा के हैं।  दलितों और आदिवासियों में भी उसकी जड़ें बेहद मजबूत हो चुकी हैं। सवर्ण जातियाँ तो उसकी मुख्य ताकत हैं ही। जिस सोशल इंजीनियरिंग को कभी लालू - मुलायम की खोज माना जाता था उसमें अब भाजपा को कहीं ज्यादा महारत हासिल है। इसका कारण पार्टी का विशाल संगठन और  मुख्यधारा से जुड़े मुद्दों पर नीतिगत स्पष्टता है। 2014 में श्री मोदी के सत्ता में आने के बाद अनेक ऐसे निर्णय हुए जिनसे भाजपा की सैद्धांतिक प्रतिबद्धता साबित हो गई। जातिगत जनगणना को तुरुप का पत्ता मानकर चल रहे श्री गाँधी के पास इस बात का उत्तर नहीं है कि कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार अपने पिछले कार्यकाल में हुई जातिगत जनगणना के नतीजे सार्वजनिक क्यों नहीं कर सकी? वहीं बिहार में नीतीश कुमार सरकार ने इस बारे में बाजी मार ली। जहाँ तक  इस फैसले के समय का प्रश्न है तो इसके पीछे बिहार के आगामी चुनाव ही हैं और श्री मोदी की हाल में हुई पटना यात्रा के दौरान इसकी जमीन तैयार हो गई थी। अब राहुल चाहे जितना शोर मचाएं किंतु उनका सारा परिश्रम पार्टी संगठन सुप्तावस्था में होने से व्यर्थ चला जाता है। जातिगत जनगणना का मुद्दा भी इसी तरह उनके हाथ से निकल गया। अब सवाल ये है कि मुस्लिम समाज की पिछड़ी जातियाँ भी सामने आ गईं तब लालू और अखिलेश जैसे नेता उनके साथ आरक्षण का बंटवारा कैसे करेंगे? उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री पसमांदा (ओबीसी) मुसलमानों के लिए लंबे समय से आवाज उठाते आये हैं। ये सब देखते हुए जातिगत जनगणना  करवाने के फैसले से प्रधानमंत्री ने एक बार फिर विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस को निहत्था कर दिया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी