Friday, 16 May 2025

बदजुबान मंत्री को हटाने से बाकी नेताओं को नसीहत मिलेगी


म.प्र सरकार के मंत्री विजय शाह द्वारा सेना की महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में की गई टिप्पणी के बाद माफी मांग ली गई किंतु उच्च न्यायालय के सख्त आदेश के कारण उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ी। उनकी  स्तरहीन टिप्पणी से  अनुशासन और संस्कारों पर जोर  देने वाली भाजपा  में भोपाल से  दिल्ली तक ख़लबली है। विवादास्पद टिप्पणियों के लिए कुख्यात शाह को समझाया जा रहा है कि  त्यागपत्र दे दें किंतु वे धमकी दे रहे हैं कि  वे आदिवासियों का अलग संगठन बना लेंगे। उनके समर्थन में राज्य और केंद्र के एक -  एक मंत्री का कूदना ये संकेत है कि लड़ाई को आदिवासी अस्मिता से जोड़ने का प्रयास हो रहा है।  हरसूद विधानसभा सीट से लगातार आठ बार जीतने वाले शाह को आदिवासी समुदाय से होने के कारण  मंत्री बनाया जाता है । उनके बयान सरकार पार्टी के लिए सिरदर्द पैदा करते रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी के बारे में की गई  टिप्पणी पर भी उन्हें मंत्री पद गंवाना पड़ा था। पार्टी नेतृत्व उनके बारे में  फैसला लेने के पहले  राजनीतिक नफे - नुकसान का आकलन कर रहा है। विपक्षी दल कांग्रेस ने भी अपना मोर्चा खोल दिया है । दरअसल भाजपा की चिंता ये है कि वह एक तरफ तो ऑपरेशन सिंदूर की सफलता  प्रचारित करने के लिए तिरंगा यात्रा निकाल रही है वहीं दूसरी तरफ  राज्य सरकार के एक मंत्री ऑपरेशन की प्रतीक बनीं महिला सैन्य अधिकारी के बारे में  अभद्र टिप्पणी कर बैठे जिसमें उसके धर्म का जिक्र था। उनका आशय जो भी रहा किंतु  लहजा और शब्दावली में शालीनता का अभाव था। भाजपा के भीतरी सूत्रों के मुताबिक या तो उनको बर्खास्त कर राजनीतिक विरोध ठंडा करने का प्रयास किया जाएगा या फिर उन पर  प्राथमिकी पर  कानूनी कार्रवाई का इंतजार करते हुए फिलहाल किसी बड़े कदम से बचने का विकल्प चुना जाएगा। दरअसल पार्टी नेतृत्व  मंत्री पद से हटाए जाने के बाद शाह के संभावित राजनीतिक कदम का पूर्वानुमान लगा रही है।  वैसे भी पार्टी के पास प्रभावशाली आदिवासी नेताओं का अभाव है जिसका लाभ शाह को मिलता रहा है । वैसे पार्टी उनकी माफी के बाद मामला समाप्त कर देती किंतु कई पेच एक साथ फँस गये । एक तो बयान सैन्य अधिकारी को लेकर था , उस पर भी वह महिला है और मुस्लिम । केंद्र सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर की जानकारी देने विदेश सचिव के साथ दो महिला सैन्य अधिकारियों को दायित्व सौंपकर पहलगाम के आतंकी हमले में मारे गए पुरुषों की विधवाओं की भावनाओं को सम्मान किया वहीं दूसरी तरफ धार्मिक आधार पर किसी भी प्रकार के मतभेद की आशंका को भी दरकिनार कर दिया। इस निर्णय की सर्वत्र प्रशंसा हुई तथा सोफिया कुरैशी के साथ नजर आईं विंग कमांडर व्योमिका सिंह रातों - रात  भारतीय महिलाओं विशेषकर युवतियों के बीच  महानायिका के तौर पर स्थापित हो गईं। ऐसे में म.प्र के कैबिनेट मंत्री  की टिप्पणी ने कड़वाहट घोल दी। ये विवाद ठंडा हो पाता उसके पहले ही  वरिष्ट सपा सांसद डॉ. रामगोपाल यादव ने व्योमिका सिंह की जाति को लेकर जो टिप्पणी की वह भी अप्रासंगिक , अनावश्यक और घोर आपत्तिजनक है। अब उन पर क्या कार्रवाई होती है ये देखने वाली बात होगी किंतु देश की रक्षा से जुड़े मसलों और व्यक्तियों के बारे में  जिम्मेदार पदों पर आसीन लोग यदि स्तरहीन टिप्पणियां करें तो इससे उनकी घिनौनी मानसिकता ही उजागर होती है। विडंबना ये है कि ऐसे लोगों को निकाल बाहर करने में राजनीतिक दल डरते हैं क्योंकि वे दो - चार सीटों के नुकसान की वजह बन सकते हैं।  दलित समुदाय से जुड़े कांग्रेस नेता उदित राज को तो ऑपरेशन सिंदूर शब्द ही नागवार गुजरा क्योंकि उसका संबंध हिन्दू महिलाओं से है । इस तरह की बातें करने वाले न तो अपनी जाति या समुदाय के हितचिंतक होते हैं और न ही धर्म के । उनका उद्देश्य दरअसल केवल  अपने राजनीतिक प्रभुत्व को बनाए रखना होता है। ऐसे नेताओं को ढोने में  क्षेत्रीय पार्टियों की मजबूरी तो समझ में आने लायक है किन्तु भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां जब ऐसे बदजुबान नेताओं को सिर पर बिठाती हैं तब आश्चर्य के साथ दुःख भी होता है । वहीं इन नेताओं को मिलने वाली अहमियत दूसरों को भी  प्रोत्साहित करती है। ये देखते हुए भाजपा को चाहिए वह अदालत का इंतजार किए बिना  शाह को मंत्री पद से हटाने का साहसिक फैसला ले।  उनके द्वारा नया संगठन बनाए जाने जैसी धमकी का भी कोई महत्व नहीं है क्योंकि म.प्र में मुख्यधारा से अलग होने के बाद स्व. वीरेंद्र कुमार सखलेचा , स्व. अर्जुन सिंह और उमाश्री भारती भी कुछ नहीं कर पाये। विजय शाह उनसे बड़े नेता नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 14 May 2025

जाते - जाते न्यायाधीशों को नसीहत दे गए न्यायमूर्ति संजीव खन्ना

प्रधान न्यायाधीश पद से सेवानिवृत हुए न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने गत वर्ष 11 नवम्बर  को पदभार ग्रहण किया था और छह माह से कम में ही वे  भूतपूर्व हो गए। लेकिन जाते - जाते उन्होंने एक ऐसी घोषणा कर दी जो भविष्य में नैतिकता का मापदंड बन सकती है। श्री खन्ना ने विदाई भाषण में कहा कि वे इसके बाद कोई आधिकारिक पद ग्रहण नहीं करेंगे और तीसरी पारी खेलते हुए कानून से संबंधित कुछ कार्य करेंगे। यद्यपि उन्होंने इसे स्पष्ट नहीं किया। लेकिन इसका सीधा - सीधा अर्थ यही लगाया जा सकता है कि वे सरकार द्वारा प्रदत्त कोई पद नहीं लेंगे। उल्लेखनीय है अधिकतर सेवा निवृत्त न्यायाधीश मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का काम करते  हैं जबकि कुछ आयोग या ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष पद को सुशोभित करते हैं वहीं कुछ को अन्य तरीकों से सरकार उपकृत करती है। एक - दो  ने चुनावी राजनीति में भी हाथ आजमाए वहीं प्रधान न्यायाधीश रहे  रंगनाथ मिश्र राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पहले अध्यक्ष बने जबकि  रंजन गोगोई राज्यसभा में नामांकित हुए। अनेक राज्यों में लोकायुक्त पद पर पूर्व  न्यायाधीश  नियुक्त होते हैं। पूर्व न्यायाधीशों को दिये जाने वाले पदों को लेकर राजनीतिक और विधि क्षेत्रों में बहस चलती रहती है। चूंकि न्यायाधीशों का चयन  कालेजियम प्रणाली से होता है इसलिए  पारदर्शिता पर संदेह बना रहता  है। परिवारवाद और राजनीतिक प्रतिबद्धता भी  नियुक्ति को प्रभावित करती है ये कहना गलत नहीं है। कल सेवा निवृत्त श्री खन्ना के चाचा श्री एच. आर. खन्ना भी न्यायाधीश रहे जबकि उनके पूर्ववर्ती श्री चंद्रचूड़ के पिता सबसे लंबे समय तक प्रधान न्यायाधीश रहे।  श्री खन्ना के उत्ताधिकारी  प्रधान न्यायाधीश श्री भूषण रामकृष्ण गवई भी एक राजनीतिक परिवार से  हैं। उनके भाई कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं जबकि पिता रामकृष्ण गवई रिपब्लिकन पार्टी  के संस्थापक थे जो कांग्रेस के सहयोग से राज्यसभा और लोकसभा के सदस्य रहने के अलावा  राज्यपाल भी रहे। इसी वजह से वे राहुल गाँधी से संबंधित मामले की सुनवाई से दूर हो गए। श्री गवई का कार्यकाल भी मात्र  सात माह का है। लेकिन उन्होंने कार्यकाल शुरू करते ही अपने पूर्ववर्ती से प्रेरित होकर  सेवा निवृत्ति के उपरांत कोई पद नहीं लेने की घोषणा कर दी। उनके ऐसा करने से एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत हो सकती है। लेकिन सवाल ये है कि इस घोषणा  का दायरा कितना होगा क्योंकि केंद्र और राज्यों में अनेक ऐसे पद हैं जिन पर सेवा निवृत्त न्यायाधीशों की ही नियुक्ति होती है। लोकपाल और लोकायुक्त सहित अनेक नियामक आयोग इसके उदाहरण हैं। इसी तरह विभिन्न जाँच आयोगों में पूर्व न्यायाधीशों को सुविधाएं एवं मानदेय मिलता है। लेकिन श्री खन्ना और श्री गवई ने जो घोषणा की उसके बाद कम से कम इस बात का दबाव तो बनेगा कि सेवा निवृत्ति के बाद न्यायाधीश राजनीतिक दृष्टि से उपकृत किये जाने वाला पद स्वीकार न करें। उल्लेखनीय है श्री गोगोई को राज्यसभा में नामांकित होने पर काफी उलाहने सुनने पड़े थे। हालांकि श्री गोगोई तो राष्ट्रपति द्वारा नामांकित हैं किंतु कांग्रेस  अतीत में न्यायामूर्ति रहे हिदायतुल्ला, बहरुल इस्लाम और रंगनाथ मिश्र को पार्टी टिकिट पर राज्यसभा  सदस्य बना चुकी थी। श्री मिश्र 1984 में दिल्ली के  सिख विरोधी दंगों की जांच हेतु गठित आयोग के अध्यक्ष थे जिसने कांग्रेस को पूरी तरह बेकसूर बताया । कहते हैं उसी के  आभार स्वरूप उन्हें कांग्रेस ने उच्च सदन भेजा। जबकि बाद में अदालत द्वारा  सज्जन कुमार सहित कुछ कांग्रेस नेताओं को अपराध माना गया।  ऐसे ही राम जन्मभूमि का ऐतिहासिक फैसला देने वाली सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यों की पीठ के श्री गोगोई सहित अन्य चार  किसी न किसी पद पर हैं जिनमें कुलाधिपति, आयोग के अध्यक्ष और राज्यपाल जैसे ओहदे हैं। पांचवे श्री चंद्रचूड़ प्रधान न्यायाधीश पद से निवृत्त हुए। ये देखते हुए श्री खन्ना और श्री गवई ने जो ऐलान किया उसका स्वरूप क्या होगा ये कहना तो मुश्किल है किंतु किसी बड़ी यात्रा की शुरुआत छोटे से कदम से होती है। यदि थोड़े से ही न्यायाधीश इस दिशा में आगे बढ़ते हैं तब न्यायपालिका और नैतिकता में बढ़ती दूरी कुछ तो कम की ही जा सकेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 May 2025

बेहद संतुलित और उत्साहवर्धक संदेश


भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ  बड़े से बड़े पद पर आसीन व्यक्ति की भी आलोचना की जा सकती है। यहाँ तक कि संवैधानिक प्रमुख  राष्ट्रपति भी इससे बच नहीं सकते। सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की भी  समीक्षात्मक आलोचना स्वीकार्य है। रही बात प्रधानमंत्री या सरकार में बैठे अन्य नेताओं की तो राजनीतिक शख्सियत होने के कारण वे आये दिन कठघरे में खड़े किये जाते हैं। गत रात्रि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश के नाम दिये गए संदेश के साथ भी यही हुआ जो किसी भी कोण से अस्वाभविक नहीं था। पहलगाम में पाकिस्तान की शह प्राप्त आतंकवादियों द्वारा किये गए नरसंहार के बाद ही  परंपरागत मोदी विरोधी लॉबी सक्रिय हो उठी थी। जब तक भारत ने पाकिस्तान पर कार्रवाई नहीं की  तब तक प्रधानमंत्री को उसके लिए उकसाया गया। लेकिन जब ऑपरेशन सिंदूर प्रारंभ हुआ तथा पूरा देश सेना और सरकार के साथ एकजुट खड़ा हो गया तब युद्ध के औचित्य और निरपराध लोगों के मारे जाने को लेकर रुदाली गैंग सक्रिय हो गई। भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान पर किये गए हमले से वहाँ जो तबाही हुई उसे नजरंदाज  करते हुए भारत में हुई क्षति को लेकर सरकार को घेरने का सुनियोजित अभियान चल पड़ा। यही जमात युद्धविराम के बारे में मनगढंत किस्से प्रसारित करते हुए प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाने लगी। कल रात श्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश  देते हुए पहलगाम की घटना से युद्धविराम तक की सभी बातों पर देश की नीति स्पष्ट कर दी। सबसे बड़ी बात उन्होंने कही कि भारतीय हमले के कारण पूरी तरह भयाक्रांत होकर पाकिस्तान ने खुद होकर लड़ाई रोकने संपर्क किया था। प्रधानमंत्री ने भारतीय सेनाओं के पराक्रम और मारक क्षमता का उल्लेख करते हुए पूरे विश्व को बता दिया कि भारत में निर्मित रक्षा उपकरणों की तकनीकी श्रेष्ठता इस लड़ाई में प्रमाणित हो गई जबकि पाकिस्तान का आक्रमण हमारी सुरक्षा व्यवस्था के सामने बेअसर साबित हुआ। युद्धविराम को लेकर निराशा फैलाने वालों का नाम लिए बिना श्री मोदी ने साफ कर दिया कि ऑपरेशन सिंदूर स्थगित हुआ है , समाप्त नहीं। और आतंकवादियों के विरुद्ध भारत की आक्रामकता जारी रहेगी। पानी और खून एक साथ नहीं  बह सकते जैसी उनकी टिप्पणी सिंधु नदी जल संधि का स्थगन जारी रहने का ऐलान था। पाकिस्तान से बातचीत पर प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा कि टेरर (आतंकवाद) और टाक ( बातचीत) एक साथ नहीं चल सकते। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की पेशकश को तो भारत सरकार ने पहले ही खारिज कर दिया था। लेकिन अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने भारतीय नीति को दोहराते हुए कह दिया कि पाकिस्तान से बात होगी तो आतंकवाद और पाक अधिकृत कश्मीर पर होगी।  उन्होंने आतंक के साथ व्यापार होने को भी अव्यावहरिक बताया। श्री मोदी ने न सिर्फ पाकिस्तान अपितु विश्व बिरादरी को भी संदेश दे दिया कि युद्धविराम का आशय भारत के रुख में नरमी नहीं है। चूंकि हमारा लक्ष्य आतंकवादियों के अड्डे थे इसलिए प्रारंभिक सैन्य कारवाई वहीं तक सीमित रही किंतु जब पाकिस्तान ने भारत के नागरिक एवं सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया तब हमारी सेना ने दुश्मन के सैन्य केंद्रों तथा हवाई अड्डों के साथ ही आयुध भंडारों पर जबरदस्त हमले कर उस iके हौसले पस्त कर दिये। पाकिस्तान द्वारा बार - बार परमाणु अस्त्रों की धौंस दिखाने के बारे में श्री मोदी ने खुलकर कहा कि इस ब्लेकमेलिंग से भारत को डराना संभव नहीं है। ज़ाहिर है भाषण का यह अंश डोनाल्ड ट्रम्प सहित उन राष्ट्रप्रमुखों को इशारा था जो इस लड़ाई को परमाणु युद्ध में बदल जाने के नाम पर रुकवाने का श्रेय लूटने लालायित हैं। यद्यपि आलोचकों को प्रधानमंत्री के भाषण में कमियां नजर आ रही हैं किंतु पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एवं अन्य नेताओं द्वारा किये गए झूठे दावों और डींगों के विपरीत प्रधानमंत्री का भाषण बेहद सधा हुआ था जिसमें  भारत की नीति, नीयत और दृढ़ता स्पष्ट तौर पर नजर आई। उनके विरोधियों को ऐतराज है कि उन्होंने ट्रम्प का नाम नहीं लिया जो आये दिन बड़बोलापन दिखा रहे हैं किंतु श्री मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के विपरीत बजाय किसी विदेशी नेता का महिमामंडन करने के स्पष्ट कर दिया कि युद्धविराम पाकिस्तान के निवेदन पर किया गया। हालांकि उन्होंने ये जरूर कहा कि भारतीय सैन्य कार्रवाई से घबराकर वह  दुनिया भर में युद्ध रुकवाने गिड़गिड़ाया। प्रधानमंत्री ने देश और दुनिया को बड़े ही सरल और साफ लहजे में बता दिया कि ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद के विरुद्ध जंग होने से आगे भी जारी रहेगी और भारत अपनी रक्षा करते हुए शत्रु की कमर तोड़ने में सक्षम है। वर्तमान वैश्विक परिथितियों के मद्देनजर श्री मोदी द्वारा गत रात्रि प्रसारित संदेश बहुत ही संतुलित एवं उत्साहवर्धक था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 May 2025

ऐसा ही वातावरण बनाए रखें क्योंकि सीमा कभी भी अशांत हो सकती है

भारत और पाकिस्तान के सैन्य अभियानों के महानिदेशकों की बैठक से हासिल  कुछ भी होने वाला नहीं है क्योंकि सेना के अधिकारी केवल सीमित मुद्दों पर ही बात कर सकते हैं। लेकिन जो नीतिगत मुद्दे हैं उन पर फैसला पाकिस्तान में भले ही सेना के मुखिया लेते हों किंतु भारत में ये सरकार के पास है और सेना ने इसे स्वीकारने में कभी  हिचकिचाहट नहीं दिखाई। बीते सप्ताह चली संक्षिप्त लड़ाई में भी सेना और सरकार का समन्वय   सामने आया जब लड़ाई के पहले प्रधानमंत्री ने  सेनाओं के सर्वोच्च अधिकारियों  को सैन्य कार्रवाई का समय, तरीका और लक्ष्य तय करने का अधिकार सौंप दिया। उसके बाद  सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत  पाकिस्तान में आतंकवादियों के अड्डों पर हमले किये। लेकिन जिस बात ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया वह थी पत्रकारों को ऑपरेशन सिंदूर की जानकारी देने हेतु  का दायित्व विदेश सचिव के साथ थलसेना और वायुसेना की एक - एक महिला अधिकारी को सौंपना जिसने  पूरे विश्व को  संदेश दे दिया कि भारत में सेना और  सरकार के बीच बेहतर समन्वय है ।  राजनीतिक नेतृत्व ने भी पर्दे के पीछे रहकर संकेत दिया कि जो जिसका काम है वही उसे करे। विदेश मंत्री ने पूरी दुनिया से कूटनीतिक संपर्क बनाये रखा जबकि रक्षा मंत्री सेनाध्यक्षों के जरिये  जायजा लेते रहे। वहीं  सुरक्षा सलाहकार प्रधानमंत्री के संपर्क में रहते हुए रणनीतिक तैयारियों में जुटे थे।युद्धविराम  की जानकारी भी विदेश सचिव और दोनों महिला सैन्य अधिकारियों ने ही दी। उसके एक दिन बाद तीनों सेनाओं के वरिष्ट अधिकारियों द्वारा समूची सैन्य कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा पत्रकारों को देते हुए उन भ्रांतियों का निराकरण किया जो सोशल मीडिया पर फैलाई जाती रहीं। पूर्वाग्रहों से ग्रसित कुछ यू ट्यूबर्स का तो धंधा ही हर चीज में मीन - मेख निकालना रह गया है। पहलगाम हमले से  युद्धविराम के बाद तक इस वर्ग ने सिवाय नकारात्मकता फैलाने के कुछ नहीं किया। आतंकवादियों द्वारा धर्म  पूछकर  मारे जाने की बात को ये लोग झुठलाने में लगे रहे जबकि मृतकों की पत्नी और संबंधी चीख - चीखकर उसकी पुष्टि करते रहे। उसके बाद सरकार को पाकिस्तान पर हमले के लिए उकसाया जाता रहा। लेकिन  ऑपरेशन सिंदूर शुरू होते  ही मानवीयता का रोना रोया जाने लगा। भारतीय सेना ने दुश्मन को कितना नुकसान पहुंचाया इसकी तारीफ  के बजाय पहलगाम के  कसूरवार मारे गए या नहीं ये पूछा  जाने लगा।  कुख्यात आतंकवादियों के परिवार का सफाया होने पर  हमले में मारे गए भारतीय नागरिकों का मुद्दा छेड़कर सेना की सफलता का अवमूल्यन करने का प्रयास किया गया। शुक्रवार की रात भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर जोरदार प्रहार करते हुए उसकी कमर तोड़ दी। अगले दिन जब अचानक युद्धविराम का ऐलान हुआ तब पूरा देश चौंक गया। सरकार  समर्थकों को भी उसका औचित्य समझ में नहीं आया। विरोध करने वालों को इंदिरा जी याद आने लगीं। प्रधानमंत्री के अमेरिका के दबाव में आने के अलावा कश्मीर विवाद के अंतर्राष्ट्रीयकरण का आरोप भी उछलने लगा। लड़ाकू विमान राफेल के मार गिराए जाने की खबरें  आने लगीं। लेकिन सेना के वरिष्ट अधिकारियों द्वारा समूचे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण देने के बाद  स्पष्ट है कि  पाकिस्तान को जबरदस्त क्षति हुई। 100 से अधिक आतंकवादी और सेना से जुड़े 40 लोगों की मौत हुई। तमाम सैन्य प्रतिष्ठान और आतंक के अड्डे तबाह हो गए। पाकिस्तान के परमाणु अस्त्र जिस स्थान पर रखे हैं उसके निकट तक भारतीय मिसाइलों ने धमाके किये। इसकी तुलना में हमारी मानवीय क्षति 25 के भीतर रही। नागरिक और सैन्य ठिकानों को भी मामूली नुकसान पहुंचा। पाकिस्तान के भीतर सैकड़ों कि.मी तक भारत ने हमले किये जबकि पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइलें हवा में नष्ट करते हुए अपनी रक्षा प्रणाली की श्रेष्ठता प्रमाणित की। कश्मीर पर मध्यस्थता को सरकार ने खुले तौर पर अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि पाकिस्तान से बात होगी भी तो मुद्दा उसके कब्जे वाले कश्मीर के हिस्सा होगा न कि जम्मू - कश्मीर। वायुसेना ने भी स्पष्ट कर दिया कि जिस कारण से ऑपरेशन सिंदूर किया गया उनके दोबारा उत्पन्न होने पर दोबारा ऐसी ही कारवाई होगी। सिंधु नदी जल संधि के अलावा पाकिस्तानी नागरिकों को वीजा संबंधी फैसले भी जारी रहेंगे । सबसे बड़ी बात ये कि आतंकवादी हमले को युद्ध माना जायेगा। जहाँ तक सवाल युद्धविराम पर जल्दी राजी हो जाने का है तो उसकी वजह भी सामने आये बिना नहीं रहेगी। हो सकता है चीन द्वारा इस लड़ाई को रूस - यूक्रेन और इसराइल - हमास युद्ध की तरह लंबा खींचने में पाकिस्तान की मदद की आशंका के कारण भारत ने ये कदम उठाया जो अस्थायी भी हो सकता है। इस लड़ाई में भारत सैनिक, आर्थिक, कूटनीतिक और राजनीतिक तौर पर एक मजबूत, जिम्मेदार और परिपक्व देश के तौर पर उभरा है। सरकार और विपक्ष में भी बेहतर तालमेल रहा बावजूद इसके कि कुछ लोग दूध में नींबू निचोड़ने के काम में जुटे रहे। बेहतर यही होगा कि ऐसा वातावरण बनाये रखा जाए क्योंकि पाकिस्तान के अंदरूनी हालातों को देखते हुए वह सीमाओं को फिर अशांत कर सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Sunday, 11 May 2025

कल की बैठक पर टिका है युद्धविराम का भविष्य


    हालांकि सोमवार को होने वाली DGMO की बैठक के बाद ही तय हो सकेगा कि भारत और पाकिस्तान के बीच अचानक हुए युद्धविराम का हश्र क्या होगा क्योंकि भारत का दावा है कि पाकिस्तान के अनुरोध पर उसने लड़ाई रोककर बातचीत करने पर सहमति प्रदान की किंतु उसने कुछ घंटों बाद ही सीमा पर गोलाबारी शुरू कर दी और उससे भी बड़ी बात प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश के नाम दी गई तकरीर में न सिर्फ भारत पर युद्धविराम तोड़ने का ठीकरा फोड़ दिया बल्कि  अंतिम फैसले तक लड़ते रहने की डींग भी हाँकी। उन्होंने ये कहने में भी संकोच नहीं किया कि पाकिस्तान ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को तहस - नहस करते हुए उसे झुकने मजबूर कर दिया। उनका भाषण और चीन द्वारा पाकिस्तान के साथ खड़े होने का आश्वासन लगभग आगे पीछे आये। ये भी कहा जा रहा है कि युद्धविराम को तोड़ने के लिए  चीन ने उकसाया और भारत विरोधी बयान देने के लिए भी। आज पाकिस्तान के सभी प्रमुख अखबारों ने युद्धविराम को विजय पर्व की तरह पेश करते हुए लिखा कि युद्ध और शांति दोनों में सफल। वहाँ की जनता भी भारत द्वारा युद्धविराम के लिए रजामंदी देने को पाकिस्तान की जीत मानकर जश्न मना रही है।

      हालांकि भारत में भी हर कोई इस बात से तो गौरवान्वित है कि हमारे सैन्य बलों ने बेमिसाल प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। ये दावा भी किया जा रहा है कि शुक्रवार की रात भारतीय आक्रमण ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया जिसके बाद वह अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाया जिसने दोनों पक्षों से संपर्क कर फिलहाल तो जंग रुकवा दी।

    हालांकि भारत के विदेश सचिव और सेना की दो महिला अधिकारियों ने अपनी पत्रकार वार्ता में बहुत ही गरिमामय तरीके से भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान को पहुंचाई गई क्षति के बारे में विस्तार से बताते हुए उसके दुष्प्रचार को गलत बताया और युद्धविराम के लिए उसकी तरफ से आये प्रस्ताव को स्वीकार करने की जानकारी दी। साथ ही ये भी बताया कि  सिंधु नदी जल संधि जो निर्णय लिए गए थे वे जारी रहेंगे तथा किसी भी आतंकवादी वारदात को युद्ध के तौर पर देखा जाएगा। लेकिन जब कुछ घंटों के बाद पाकिस्तान ने सीमा पर गोलाबारी शुरू कर दी तब आम जनता को लगा कि शायद भारत युद्धविराम को तोड़कर  शुक्रवार की रात वाले हमले को दोहराएगा।

     लेकिन कुछ घंटों बाद ही सब शांत हो गया जिसका कारण शायद पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव होगा किंतु युद्ध के हर चरण में भारी पड़ने के बाद भी भारत द्वारा मैदान ए जंग से हटकर बातचीत की मेज पर आने के लिए तैयार होने का औचित्य देश के आम और खास जनमानस को समझ में नहीं आ रहा। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उच्चस्तरीय बैठक की जिसमें संभवतः कल होने वाली DGMO  स्तर की बातचीत की रणनीति तय की गई होगी। किंतु पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कल रात अपने देशवासियों को जिस बड़बोले  अंदाज में संबोधित किया वह कोई नई बात नहीं है । वहाँ के नेता इसी तरह की बातें करने के लिए प्रसिद्ध हैं किंतु भारत सरकार की ओर से किसी भी नेता मसलन रक्षा या विदेश मंत्री द्वारा  सामने आकर जानकारी नहीं देने से लोग हैरान हैं। गृह मंत्री अमित शाह भी मौन पर हैं। प्रधानमंत्री का न बोलना चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि कल होने वाली वार्ता के पहले वह गैरजरूरी होगा।

   बावजूद इसके भारत सरकार को ये साफ करना चाहिए कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा कल रात दिये गये बयान के बाद भी उसके साथ किस मुद्दे पर बातचीत की जाएगी क्योंकि उसने आतंकवादियों को पनाह देने और पहलगाम हादसे में हाथ होने के आरोप को हमेशा की तरह ठुकरा दिया है।

     यद्यपि रक्षा और कूटनीतिक मामलों में पहले से सब कुछ बताना सरकार के लिए संभव नहीं होता किंतु देशवासियों की अपेक्षा है कि कल की बैठक में भारत को विजेता की तरह पेश आना चाहिए तथा शांति के लिए मिलकर काम करने, रेल बस सुविधा बहाल करने, नागरिकों की आवाजाही शुरू करने के साथ ही सांस्कृतिक आदान - प्रदान जैसी घिसी- पिटी बातों से किनारा करते हुए आतंकवादियों के विरुद्ध कारवाई पर जोर देना चाहिए।

  पाकिस्तान ने युद्धविराम  की गंभीरता को तो कुछ घंटों में ही खत्म कर अपने इरादे जता दिये अब हमारी बारी है उसे ये समझाने की हम भी युद्ध विराम तोड़ने में सक्षम हैं। उसे ये संदेश देना भी जरूरी है कि हमने इसरायल से हथियार और युद्ध की तकनीक ही नहीं अपितु शत्रु की कमर तो़ड़ने की मानसिकता भी हासिल कर ली है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 10 May 2025

जो जहाँ पर है वतन के काम पर है


पाकिस्तान के साथ जंग का आज चौथा दिन है। दोनों तरफ से आक्रमण और प्रत्याक्रमण का सिलसिला अनवरत जारी है। कल दिन में लगा था कि  कुछ ढिलाई आई किंतु रात  फिर धमाकों में गुजरी। यद्यपि अनेक  संवाददाता जान जोखिम में डालकर सीमा के नजदीकी इलाकों से खबरें भेज रहे हैं लेकिन अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि सही स्थिति क्या है ? जो संकेत भारतीय सेना और सरकार के जिम्मेदार लोगों से मिल रहे हैं उनसे इतना जरूर कहा जा सकता है कि हमारा मनोबल काफी ऊंचा है तथा  पाकिस्तान हमारी रणनीति में ही फंसा नजर आ रहा है। उसके हमले जिस तरह से बेअसर हो रहे हैं उससे वहाँ फौज और सरकार दोनों में बौखलाहट है। भारत द्वारा समाचार माध्यमों को जानकारी देने का दायित्व विदेश सचिव के साथ ही थल और वायुसेना की दो युवा महिला अधिकारियों को सौंपा जाना दर्शाता है कि उसका आत्मविश्वास कितना प्रबल है। दूसरी तरफ पाकिस्तान में मंत्री  बेसिर - पैर के बयान देकर हँसी के पात्र बन रहे हैं।  भारत में विपक्ष ने सरकार की नीति - रीति से मतभेदों के बावजूद आलोचना से परहेज करते हुए एकता का प्रदर्शन किया जबकि  पाकिस्तान की संसद में विपक्ष प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के विरुद्ध खुलकर बोल रहा है। एक सांसद ने तो उनको गीदड़ तक कह डाला। वहीं एक ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को जेल से बाहर निकालने की मांग करते हुए कह दिया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला वही कर सकते हैं। पाकिस्तानी फौज के कुछ अधिकारी अभी भी धमकी वाली भाषा बोल रहे हैं जबकि भारत ने शुरुआती संयम के बावजूद जब  दुश्मन ने रिहायशी और सैन्य ठिकानों पर गोले दागे तब जाकर  पाकिस्तान के सैन्य केंद्रों सहित अन्य लक्ष्यों पर हमले किये जिनसे शत्रु को काफी क्षति पहुँची है। सेना से जुड़े मामलों के विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान की प्रतिरक्षा प्रणाली तहस - नहस हो जाने से भारतीय मिसाइलें अपने कार्य को पूरी सफलता के साथ कर पा रही हैं। ये बात सही है  कि अभी तक दोनों देशों की थलसेनाएं अपनी सीमाओं में ही है। यद्यपि घुसपैठियों को भेजने की हरकत अभी भी उस तरफ से की जा रही है किंतु वे या तो सुरक्षा बलों के हत्थे चढ़ रहे हैं या फिर मारे जा रहे हैं। अभी तक भारत की तरफ से हवा - हवाई दावे नहीं किये गए क्योंकि विधिवत युद्ध घोषित नहीं हुआ। लेकिन पाकिस्तान जिस तरह के आसमानी दावे कर रहा है उन पर उसी के नागरिक विश्वास नहीं कर रहे। ये वहाँ के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के प्रति विश्वास के अभाव का प्रमाण है। वैसे हमारे देश में अभी भी कुछ लोगों ने अपना रवैया नहीं बदला जो  सोशल मीडिया के जरिये सरकार और सेना पर अविश्वास करते हुए युद्ध के विरोध में माहौल बनाने में जुटे हुए हैं। ये वही तबका है जो पहलगाम की घटना के बाद प्रधानमंत्री को युद्ध प्रारंभ करने के लिए ललकार  रहा था किंतु  जंग शुरू होते ही  इस बात का मातम मनाने बैठ गया कि दोनों तरफ से मरने वाले  इंसान हैं। पाकिस्तान के साथ बातचीत कर रिश्ते सुधारने की वकालत करने वाले इन्हीं लोगों ने पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले में पाकिस्तान का हाथ होने के मामले में भी सवाल उठाकर अपनी ही सरकार के विरुद्ध अविश्वास उत्पन्न करने जैसा घिनौना काम किया। इनके बयानों को आधार बनाकर पाकिस्तान की संसद तक में भारत को झूठा साबित करने का प्रयास हुआ। बेहतर हो सोशल मीडिया सहित अन्य मंचों पर इन तत्वों का बहिष्कार हो। जिन लोगों के मन में सेना और सरकार की प्रतिबद्धता और निर्णय क्षमता में विश्वास है उनको भी चाहिए कि वे अति उत्साह से बचते हुए अनधिकृत जानकारी को प्रसारित करने से बचें। टीवी चैनलों में खबरें परोस देने के मामले में जो आपाधापी है उससे प्रभावित हुए बिना केवल सेना और सरकार द्वारा प्रदत्त जानकारी को ही प्रामाणिक मानकर न खुद उत्तेजित और भ्रमित हों और न ही दूसरों को करें। केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा आवश्यक सेवाओं से जुड़े विभागों में छुट्टियां रद्द करने का जो निर्णय लिया उससे जाहिर है देश निर्णायक लड़ाई लड़ते हुए अपने दूरगामी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कमर कस चुका है। ऐसा करने का एक कारण सेना सहित युद्ध से किसी भी रूप में जुड़े वर्ग को यह एहसास कराना भी है कि संकट की इस घड़ी में पूरा देश कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़ा है। द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन का सफल नेतृत्व करने वाले प्रधानमंत्री स्व. विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि किसी भी देश का चरित्र  युद्ध के दौरान उसके नागरिकों के आचरण से उजागर होता है। वर्तमान स्थिति हमारे लिए अपने चरित्र को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का बेहतरीन अवसर है।
स्व. राजेंद्र अनुरागी की ये पंक्तियाँ आज फिर प्रासंगिक हो उठी हैं:-
आज पूरा देश मेरा लाम पर है,
जो जहाँ पर है वतन के काम पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 9 May 2025

सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर भारत भारी पड़ रहा


भले ही भारत ने अभी तक विधिवत युद्ध  की घोषणा नहीं की लेकिन  हालात युद्ध के ही हैं। भारत द्वारा आतंकवादियों के अड्डों पर हमला किये जाने के बाद पाकिस्तान ने हमारे नागरिक इलाकों के साथ ही सैन्य ठिकानों पर गोलाबारी के अलावा ड्रोन से हमला  किया  जिसे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली ने हवा में ही मार गराया। जवाब में भारतीय सेना ने लाहौर, इस्लामाबाद, बहावलपुर और रावलपिंडी पर मिसाइलें दागकर दुश्मन के घर में दहशत फैला दी। साथ ही करांची बंदरगाह को नौसेना ने जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। हालांकि पाकिस्तान , जम्मू से गुजरात तक  भारत के सीमावर्ती इलाकों में हमलों की लगातार कोशिशें कर रहा है किंतु उसकी कोशिशें बदहवासी का संकेत देती हैं। दूसरी ओर भारत ने पहलगाम हमले के बाद  दो सप्ताह तक सैन्य मोर्चे पर पूरी तैयारी करने के बाद ही पाकिस्तान में आतंकवादी अड्डों को तबाह किया। पाकिस्तान को  ये लगता था कि ज्यादा से ज्यादा भारत छोटी - मोटी सर्जिकल स्ट्राइक करने के बाद ठंडा पड़ जाएगा। लेकिन उसके अनुमान गलत साबित हुए।  पहलगाम हादसे के तत्काल बाद भारत चाहता तो पाकिस्तान पर चढ़ाई कर देता किंतु उसने केवल सैन्य तैयारियां ही नहीं कीं अपितु कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रियता दिखाते हुए विश्व जनमत को अपने पक्ष में करने में सफलता हासिल की। भारत ने इस लड़ाई को आतंकवाद के विरुद्ध केंद्रित रखने की जो प्रतिबद्धता वैश्विक मंचों पर व्यक्त की उसके कारण इक्का - दुक्का को छोड़कर दुनिया के तमाम बड़े देश या तो भारत की तरफदारी कर रहे हैं या चुप बैठे हैं। सबसे बड़ी बात अमेरिका, रूस, फ्रांस , ब्रिटेन जैसी सामरिक और आर्थिक शक्तियों द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का समर्थन करते हुए भारतीय नीति का औचित्य साबित कर दिया। सं.रा.संघ ने भी पाकिस्तान की शिकायत को विचार योग्य नहीं समझा जो भारत की बड़ी कूटनीतिक  जीत कही जा सकती है। इस युद्ध का अंतिम परिणाम क्या होगा इस बारे में कोई भी भविष्यवाणी अथवा दावा करना तो विवेक सम्मत नहीं होगा किंतु इतना अवश्य है कि भारत ने बीते तीन दिनों में सैन्य और कूटनीतिक मोर्चे पर अपनी जो कुशलता साबित की वह दुश्मन  का मनोबल तोड़ने के लिए पर्याप्त है। उसकी ओर से की जा रही कार्रवाई पूरी तरह से अनियोजित लग रही है। पहलगाम की घटना के बाद भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के कारण पाकिस्तान ने खैबर पख्तून  सीमा और बलूचिस्तान में मौजूद  अपने सैन्यबलों को भारत से सटी सीमा पर तैनात तो किया किंतु लंबा युद्ध लड़ने में उसकी अक्षमता उजागर होने से उसका मनोबल गिरा हुआ है। खस्ता आर्थिक स्थिति और वैश्विक मंचों पर खराब छवि  की वजह से  परंपरागत सहयोगी भी उसका साथ देने के बजाय लीपापोती कर रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात है मुस्लिम देशों का तटस्थ बने रहना। तुर्किये के अलावा कोई भी बड़ा मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान के साथ खड़ा होने की पहल नहीं कर रहा। सऊदी अरब जैसा इस्लाम का संरक्षक समझे जाना वाला देश जिसने पाकिस्तान को करोड़ों डॉलर का कर्ज देकर  सहारा दिया , इस विवाद से निर्लिप्त बना हुआ है। लंबे समय तक पाकिस्तान भारत के साथ अपने झगड़े को इस्लाम और हिन्दू धर्म से जोड़कर इस्लामिक देशों का भावनात्मक दोहन करता रहा। लेकिन बीते कुछ सालों के भीतर भारत अपनी कुशल कूटनीति से प्रमुख मुस्लिम देशों के मन में  ये बात स्थापित करने में काफी हद तक सफल हो गया कि पाकिस्तान मानवता का दुश्मन है और उसके द्वारा आतंकवादियों को प्रश्रय, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिये जाने से दुनिया भर में मुसलमान और  आतंकवाद समानार्थी बन गए। चीन जैसा उसका अंध समर्थक भी अभी तक तेल की धार देख रहा है क्योंकि वह खुद इस्लामिक अतिवाद को कुचलने में लगा है। पाकिस्तान में उसके जो प्रकल्प चल रहे हैं उनके विरोध में स्थानीय जनता का विरोधी रवैया उसके लिए सिरदर्द बना हुआ है  जिनमें चीन के करोड़ों डॉलर फंसे हुए हैं। कुल मिलाकर भारत ने बड़ी ही कुशलता से पाकिस्तान को हर मोर्चे पर घेर रखा है। गौरतलब है आज की दुनिया में जंग केवल हथियारों से जीतना संभव नहीं होता। यदि ऐसा होता तो रूस अभी तक यूक्रेन को घुटनाटेक करवा देता और चीन ने ताईवान पर कब्जा कर लिया होता। आशय ये है कि जब तक विश्व जनमत किसी देश के साथ नहीं होता तब तक ऐसे मुकाबले में पूर्ण विजय हासिल करना कठिन होता है। पाकिस्तान ने अब तक जो कुछ भी किया उससे उसकी कमजोरी जाहिर हो चुकी है। वहीं भारत अत्यंत धैर्य के साथ सामरिक और कूटनीतिक मोर्चे पर प्रभावशाली प्रदर्शन कर रहा है। ऐसे समय देशवाशियों का दायित्व है कि वे संयम और अनुशासन का परिचय देते हुए न अफवाहों पर भरोसा करें और न ही उन्हें फैलाने का माध्यम बनें। सोशल मीडिया पर भी अनावश्यक सामग्री परोसने से बचना चाहिए। युद्ध में उत्साह बुनियादी जरूरत है किंतु बतौर नागरिक जिम्मेदारी भरा आचरण भी उतना ही आवश्यक है। सेना और सरकार अपना काम पूरी तन्मयता से कर रही हैं। हमें उनमें अपना विश्वास व्यक्त करते हुए दुनिया को ये बताना चाहिए कि संकट के इस समय पूरा देश एकजुट है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी