Tuesday, 10 June 2025

ट्रम्प कहीं अमेरिका के गोर्बाचेव न बन जाएं


ऐसा लगता है अमेरिका की सीमाएं बढ़ाने के फेर में  डोनाल्ड ट्रम्प  देश को गृहयुद्ध में धकेल रहे हैं। न्यूयॉर्क के बाद  दूसरे सबसे बड़े शहर लॉस एंजेलिस में अवैध प्रवासियों की धरपकड़ के विरोध  में जबरदस्त उपद्रव, आगजनी और दंगे का माहौल है। ट्रम्प ने कैलिफोर्निया राज्य के गवर्नर को दरकिनार करते हुए केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात कर दिये। इसी राज्य में सिलीकान वैली भी है जिसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। यहाँ लाखों की संख्या में विदेशी काम करते हैं। चौंकाने वाली बात ये  है कि लॉस एंजेलिस  की जनसंख्या  38 लाख है जिसमें 13 लाख अवैध प्रवासी हैं जिनमें बड़ी संख्या लैटिन अमरीकी देशों से आये शरणार्थियों की है। ट्रम्प ने दूसरी बार सत्ता में आते ही अवैध प्रवासियों के विरुद्ध कारवाई प्रारंभ कर दी थी। सैकड़ों प्रवासियों को हवाई जहाजों से वे उनके देश भिजवा चुके हैं जिनमें भारत से गए लोग भी थे। लेकिन लॉस एंजेलिस में जिस तरह का उपद्रव हुआ वह इस बात का संकेत है कि अमेरिका में आकर बस गए अवैध प्रवासियों को निकाल बाहर करना उतना आसान नहीं है जितना ट्रम्प ने समझ रखा है। लॉस एंजेलिस में जो हो रहा है उसके पीछे वामपंथी तत्व बताये जाते हैं जो बीते कुछ सालों में काफी संगठित और शक्तिशाली हो चले हैं। पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन के सलाहकार रहे जॉर्ज सोरोस ने अमेरिका में वामपंथी विचारधारा को काफी संरक्षण दिया। अवैध प्रवासी चूंकि अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं इस कारण वे वामपंथियों से जुड़ते गए। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि अधिकतर लैटिन अमेरिकी देश  अमेरिका से नफरत करते हैं।  ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि लैटिन देशों में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उथल - पुथल के पीछे अमेरिका का हाथ रहा है। कुछ देशों में उसने तख्ता पलट तक करवाया। क्यूबा से तो अमेरिका के रिश्ते सांप- नेवले जैसे रहे हैं। लंबे समय तक उसके शासक रहे फिडेल कास्त्रो की हत्या के अनेक असफल  प्रयासों के पीछे भी अमेरिका का हाथ होने की बात सामने आती रही। यही कारण है कि लैटिन अमेरिकी देशों से आये अवैध प्रवासी भी अमेरिका की धरती पर वामपंथी विचारधारा के बीज लेकर आये जो अंकुरित होने के बाद अब पौधे का रूप ले चुके हैं।  अमेरिका में चीनी आबादी भी तेजी से बढ़ी है जिसके खून में वामपंथ है। पश्चिम एशिया में लंबे समय से चली आ रही अशांति के चलते जिन मुस्लिम शरणार्थियों को अमेरिका ने मानवीय आधार पर बसने की सुविधा दी वे भी आस्तीन के सांप बन बैठे हैं। इस सबका असर ही लॉस एंजेलिस के मौजूदा संकट के रूप में सामने आया है। अमेरिका अकेला नहीं है जिसे इस समस्या से जूझना पड़ रहा है। उसका पड़ोसी कैनेडा सिख प्रवासियों को गोद में बिठाने के बाद खालिस्तानी आतंक का गढ़ बना हुआ है। यूरोपीय देशों में ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क स्पेन, पुर्तगाल सभी मुस्लिम शरणार्थियों को पनाह देकर खून के आँसू रो रहे हैं। एशियाई देशों में भारत अवैध शरणार्थियों का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका है जिनकी संख्या करोड़ों में है। बांग्ला देश, म्यांमार, श्रीलंका और पाकिस्तान से चोरी छिपे आये ये प्रवासी आंतरिक  सुरक्षा के लिए खतरा तो हैं ही इनके जरिये अलगाववाद भी जड़ें जमा रहा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनाव भले ही धमाकेदार अंदाज में जीत लिया और कुछ हजार अवैध प्रवासियों को देश निकाला देने में सफल भी हुए लेकिन लॉस एंजेलिस में जो हालात उत्पन्न हो गए वे भारत की राजधानी दिल्ली में हुए शाहीन बाग धरने का ही विस्तारित रूप है। ये सबक है भारत जैसे उन तमाम देशों के लिए जो मानवीय संवेदनाओं के वशीभूत शरणार्थियों को अपने घर में घुसने की अनुमति देने की गलती कर बैठे। बड़ी बात नहीं लॉस एंजेलिस की आग पूरे अमेरिका में फैल जाए क्योंकि इससे अन्य शहरों में फैले अवैध प्रवासी प्रोत्साहित होकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं और वह स्थिति अमेरिका की आंतरिक शांति को नुकसान पहुंचाए बिना नहीं रहेगी। लॉस एंजेलिस अमेरिका के वैभव का बड़ा केंद्र है।  उसमें अवैध प्रवासियों की इतनी बड़ी संख्या और उनके आक्रामक रवैये से ये बात स्पष्ट है कि उनको निकालना उतना आसान नहीं जितना ट्रम्प समझ रहे थे। उनके और राज्यों के बीच बढ़ती टकराहट भी  संघीय ढांचे के लिए खतरा बन रही है। दूसरे कार्यकाल के कुछ महीनों में ही अमेरिका के अंदरूनी हालात जिस तरह बिगड़े उन्हें देखकर ये आशंका उत्पन्न होने लगी है कि कहीं ट्रम्प अमेरिका को उसी तरह  विखंडन की ओर न ले जाएं जैसा गोर्बाचोव ने सोवियत संघ में किया था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 June 2025

कोई कुछ भी कहे किंतु मोदी देश की जरूरत हैं


1989 के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता का एक लंबा दौर चला।  जल्दी - जल्दी सरकारों के बदलने से प्रधानमंत्री पद पर भी नvaajpeyiये चेहरे देखने मिले जिनमें विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, पी. वी नरसिम्हा राव, एच. डी. देवगौड़ा, इंदर कुमार गुजराल और  अटल बिहारी वाजपेयी  थे। अटल जी के पहले दो कार्यकाल क्रमशः 13 दिन और 13 महीने के रहे लेकिन  तीसरे कार्यकाल में वे  कार्यकाल लगभग पूरा कर सके। उनके पहले श्री राव ने भी 5 साल सरकार चलाई ।   डाॅ.मनमोहन सिंह भी 10 साल प्रधानमंत्री रहे । लेकिन उक्त सभी को  स्पष्ट बहुमत नहीं होने से  सहयोगी दलों का दबाव झेलना पड़ा। डाॅ. सिंह  गाँधी परिवार के शिकंजे के कारण  अपनी प्रतिभा का उपयोग नहीं कर सके। यही कारण रहा कि  वे  अपना असर नहीं छोड़ सके और इसीलिए जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को 2014 में प्रधानमंत्री का चेहरा बनाया तो 1984 के बाद पहली बार किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला। भाजपा ने 283 और उसके गठबंधन एनडीए को 336 सीटें मिलीं। इसी वजह से भाजपा अपना एजेंडा लागू करने का साहस बटोर सकी । पहला कार्यकाल पूरा करने के बाद 2019 के चुनाव में मोदी सरकार और भी बड़े बहुमत से लौटी और भाजपा अकेले 300 का आंकड़ा पार गई।और श्री मोदी न सिर्फ राष्ट्रीय अपितु वैश्विक स्तर पर भी एक मजबूत राजनेता के तौर पर स्थापित हुए।नीतीश कुमार ने जरूर दो बार एनडीए छोड़कर  प्रधानमंत्री से टकराने का दुस्साहस किया और 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले विपक्षी गठबंधन को अस्तित्व में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई किंतु अचानक वे वापस एनडीए में लौट आये। हालांकि  तीन तलाक, धारा 370 और राम मंदिर जैसे बड़े काम करने के बाद भी 2024 में भाजपा 240 पर रुक गई किंतु चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार ने बिना देर लगाए श्री मोदी के तीसरे शपथ ग्रहण का रास्ता साफ कर दिया। सवाल ये उठा कि जबरदस्त छवि , प्रभावशाली कार्यशैली और जनहित की योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करने के बाद भी श्री मोदी बहुमत से वंचित कैसे रह गए जबकि  10 वर्ष  में भारत हर दृष्टि से आगे बढ़ा। अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है। कोरोना जैसी महामारी का जिस तरह मुकाबला किया गया उसकी पूरी दुनिया में प्रशंसा हुई। 140 करोड़ लोगों का टीकाकरण , 80 करोड़ जनता को मुफ्त खाद्यान्न और गरीबों को 5 लाख रु. तक मुफ्त इलाज जैसी सौग़ातें कम नहीं थीं किंतु नागरिकता संशोधन जैसे फैसलों को लेकर विपक्षी दलों के दुष्प्रचार से  मुस्लिम ध्रुवीकरण को गति मिली। ऐसा ही हुआ दलित मतदाताओं के साथ जिन्हें आरक्षण खत्म होने का भय दिखाकर भाजपा के विरुद्ध लामबंद किया गया। दूसरी तरफ भाजपा के  प्रतिबद्ध समर्थक अबकी बार 400 पार  की खुशफहमी का शिकार हो गए। निश्चित रूप से वह परिणाम राष्ट्रवादी राजनीति के लिए बड़ा झटका था ।  हालांकि  श्री मोदी सरकार बनाने में सफल रहे।किंतु तीसरे कार्यकाल के बारे में ये कयास लगने लगा कि वे दबाव में आकर भाजपा के एजेंडे पर अमल नहीं कर पाएंगे किंतु वक्फ संशोधन को संसद से पारित करवाकर उन्होंने दिखा दिया कि वे विषम परिस्थितियों में भी कार्य करने में सक्षम हैं। लोकसभा चुनाव  के बाद ये कहा जाने लगा कि मोदी का जादू खत्म हो चला  है किंतु हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जिस धमाकेदार अंदाज में जीत दर्ज की उसने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और जिस विपक्षी एकता के बल पर राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने लगे थे वह ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी। शरद पवार, उद्धव ठाकरे और अरविंद केजरीवाल का नूर उतर गया। इस सबके पीछे श्री मोदी का जबरदस्त आत्मविश्वास और अथक परिश्रम है। पहलगाम हादसे के बाद ऑपरेशन सिंदूर के जरिये उन्होंने अपनी दृढ़ता से पूरे विश्व को अवगत करवा दिया। भले ही विपक्ष कुछ भी कहे किंतु श्री मोदी आज देश की जरूरत हैं। आधारभूत संरचना में भारत को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने में उनकी सरकार का ऐतिहासिक योगदान है। दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनने की हैसियत हासिल करना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। देश को रक्षा क्षेत्र में शक्तिशाली बनाने में इस सरकार की भूमिका सराहनीय रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि  श्री मोदी ने भारत और भारतीयों की प्रतिष्ठा को अकल्पनीय ऊंचाई प्रदान की।  11 वर्ष का कार्यकाल पूरा करना निःसंदेह बड़ी उपलब्धि है। हालांकि अभी अनेक चुनौतियाँ हैं। पाकिस्तान के अलावा बांग्लादेश भी नई समस्या के रूप में सामने आया है। मणिपुर की आग बुझने का नाम नहीं ले रही। वक़्फ़ संशोधन को लेकर एक बार फिर मुस्लिम ध्रुवीकरण का प्रयास हो रहा है। विपक्ष को श्री मोदी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं हो रहे लेकिन देश की जनता आज भी उनमें अपना भविष्य देखती है। आलोचनाओं से विचलित हुए बिना वे जिस तन्मयता से अपने काम में  जुटे रहते हैं वह अन्य किसी में नजर नहीं आता। देश के हर हिस्से में बिना भेदभाव के विकास की रोशनी पहुंचना मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 6 June 2025

तेज चलने के फेर में ट्रम्प की गाड़ी संतुलन खो रही



अमेरिका का राष्ट्रपति दुनिया का सबसे शक्तिशाली शासक माना जाता है। अमेरिका के विरोधी भी उसकी उपेक्षा नहीं कर पाते। ये देश चूंकि विज्ञान और तकनीक के मामले में दुनिया का सिरमौर है लिहाजा निर्विवाद रूप से आर्थिक और सामरिक महाशक्ति है। रूस, चीन, जर्मनी , फ्रांस और जापान भी हालांकि काफी विकसित और समृद्ध हैं किंतु अमेरिका की श्रेष्ठता और सर्वोच्चता निर्विवाद है। उसका सफल लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खुलापन पूरी दुनिया को आकृष्ट करता रहा है। साहित्य, संगीत, कला, खेल, फिल्में , शिक्षा जैसे  हर क्षेत्र में अमेरिका ने नये - नये कीर्तिमान रचे हैं। अध्यक्षीय प्रणाली की शासन व्यवस्था वाले इस देश में संसद के दो सदन होने के बाद भी राष्ट्रपति काफी शक्तिशाली होता है। और इसीलिए उसे वैश्विक राजनीति में विशेष महत्व प्राप्त  है। इस पद पर आये अनेक व्यक्तियों को उनके निजी गुणों और कार्यप्रणाली के लिए महानता की श्रेणी में भी रखा गया किंतु यहाँ के लोकतंत्र की ये खूबसूरती है कि राष्ट्रपति कितना भी लोकप्रिय और सक्षम क्यों न हो किंतु उसे अधिकतम दो कार्यकाल ही मिलते हैं। दूसरे महायुद्ध के कारण उत्पन्न असामान्य परिस्थितियों में जरूर थियोडोर रूजवेल्ट को चार बार राष्ट्रपति बनाया गया किंतु वह अपवाद ही है। वर्तमान राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प के साथ संयोग ये है कि वे 2020 तक राष्ट्रपति रहने के बाद दूसरा चुनाव हार गए। तब लगा था कि उनका राजनीतिक भविष्य चौपट हो गया किंतु 2024 में उन्होंने तमाम संभावनाओं को नकारते हुए चुनाव जीतकर शानदार वापसी की। उनकी जीत में अमेरिका के धनकुबेर इलान मस्क ने सक्रिय भूमिका निभाई जिसमें असामान्य कुछ भी नहीं था क्योंकि अमेरिकी लोकतंत्र में पूंजीवादी व्यवस्था को संरक्षण प्राप्त है। ख़ुद ट्रम्प भी एक बड़े व्यवसायी हैं। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में भी जार्ज सोरोस नामक धनकुबेर उनके दाहिने हाथ के तौर पर बने रहे। ट्रम्प ने भी राष्ट्रपति बनते ही मस्क, को अपने उपराष्ट्रपति से ज्यादा महत्व और शक्तियाँ दे डालीं जिससे पूरी दुनिया को ये एहसास हो चला कि व्हाइट हाउस में मस्क की समानांतर सत्ता चलेगी । सुनीता विलियम को अंतरिक्ष से सुरक्षित वापस लाने में नासा जैसी प्रसिद्ध एजेंसी की बजाय मस्क की अंतरिक्ष कंपनी स्पेस एक्स की सेवाएं लिए जाने के बाद नासा के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे। मस्क ने सरकारी खर्च घटाने के लिए बड़े पैमाने पर छंटनी करवा दी। उधर टैरिफ बढ़ाने की ट्रम्प की  सनक ने देश में महंगाई बढ़ा दी। जिससे आम जनता में नाराजगी व्याप्त है। उनके फैसलों और  गैर जिम्मेदार बयानों ने अमेरिका की विश्वसनीयता  भी संदिग्ध बना दी। युक्रेन और यूरोप संबंधी  निर्णयों ने अमेरिका की साख को भी नुकसान पहुंचाया।  परिणाम ये हुआ कि ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता में लौटे ट्रम्प बजाय दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्राध्यक्ष बनने के पहले तो विवादास्पद हुए और उनकी छवि एक गैर गंभीर नेता या मसखरे जैसी स्थापित होती गई। कार्यभार संभालने के कुछ महीने के भीतर ही उनकी ऊल- जलूल हरकतों से अमेरिका की साख और धाक दोनों को नुकसान हुआ। अपने बयानों और फैसलों को वे जिस तेजी से बदलते हैं उसकी वजह से पूरी दुनिया उन पर हंस रही है। हॉलीवुड की फिल्मों  में काऊ बॉय की छवि रखने वाले रोनाल्ड रीगन जब राष्ट्रपति बने थे तब पूरे विश्व में उनकी सफलता को लेकर शंका व्यक्त की गई किंतु उनके कार्यकाल में  सोवियत संघ का ऐतिहासिक विखंडन हुआ । उसके बाद के तीन दशकों में अमेरिका दुनिया का अघोषित चौधरी बना रहा। विश्व व्यापार संगठन के जरिये पूरी दुनिया को मुक्त अर्थव्यवस्था और बाजार में बदलना भी तभी संभव हो सका। यहाँ तक कि चीन भी माओ युग के लौह आवरण से निकलकर पूंजी के प्रवाह में बहने लगा। ट्रम्प का पहला कार्यकाल कुछ खास नहीं  रहा। लेकिन इस बार उन्होंने जिस दबंगी से चुनाव लड़ा और अमेरिकी मतदाताओं को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाये उससे लगा था कि वे इस बार कुछ बेहतर करेंगे किंतु ज्यादा तेज चलाने के फेर में उनकी गाड़ी संतुलन खोती दिख रही है। इसका प्रमाण उनके दाहिने हाथ बने मस्क ने  साथ  छोड़कर उन पर महाभियोग चलाकर उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस को राष्ट्रपति बनाने जैसी मांग कर दी। उधर जो ट्रम्प कुछ दिन पहले तक  मस्क की तारीफ के पुल बांधते थे वे उन्हें धोखेबाज कहते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं। मस्क का ये कहना कि ट्रम्प उनके बिना चुनाव नहीं जीत सकते थे काफी महत्वपूर्ण है। ऐसा लगता है उन दोनों के बीच कोई सौदेबाजी हुई थी जिसके पूरे न  होने पर रिश्तों में आई खटास अब कड़वाहट में बदल गई। हालांकि ये अमेरिका का आंतरिक मामला है लेकिन मस्क जैसे नजदीकी का साथ छोड़कर विरोध में खड़े हो जाने से ट्रम्प कमजोर हुए हैं। उधर उनके फैसलों का न्यायालयों  में भी विरोध हो रहा है। ये सब देखते हुए ट्रम्प अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे इसमें संदेह है और इसका असर दुनिया भर में होगा। अमेरिका के इतिहास में  सबसे कमजोर और गैर जिम्मेदार राष्ट्रपति के रूप में उनका नाम दर्ज हो तो आश्चर्य नहीं होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 June 2025

निजी कंपनी की टीम का विधानसभा में स्वागत समझ से परे



इंग्लैंड के काउंटी क्रिकेट की तर्ज पर भारत के  कंट्रोल बोर्ड (बी.सी.सी.आई) द्वारा वर्ष 2008 में आई. पी. एल नामक लीग क्रिकेट प्रतियोगिता प्रारम्भ की गई। इसमें प्रायोजकों द्वारा खिलाड़ियों को ऊंची बोली लगाकर अपनी टीम में शामिल किया जाता है। पाकिस्तान के अलावा क्रिकेट खेलने वाले अन्य देशों के खिलाड़ी इस आयोजन का हिस्सा होते हैं। हालांकि आई.पी.एल शुरुआत में काफी विवादित हुई और आर्थिक अनियमितताओं के आरोप में घिरे उसके अध्यक्ष ललित मोदी देश छोड़कर भाग गए। बी.सी.सी.आई  में चूंकि राजनेताओं की दखल शुरू से रही इसलिए ललित  के अलावा  कुछ बड़ी हस्तियों के नाम भी आरोपित हुए किंतु आई. पी. एल को मिली आर्थिक सफलता ने उन सबको दबा दिया। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि इस प्रतियोगिता ने इंग्लैंड के काउंटी और आस्ट्रेलिया के क्लब क्रिकेट की चमक फीकी कर दी। सबसे बड़ी बात ये है कि आई.पी.एल का समूचा आयोजन जिस भव्य और पेशेवर तरीके से किया जाता है उसने इस तरह के विश्वस्तरीय आयोजन करने में भारत के प्रबंध कौशल से पूरे विश्व को परिचित करवा दिया।  इसके जरिये दर्जनों ऐसे नवोदित खिलाड़ियों की प्रतिभा उजागर हो गई जो अन्यथा उपेक्षित पड़े रहते। लेकिन आर्थिक लाभ और खिलाड़ियों पर होने वाली धनवर्षा से अलग हटकर देखें तो इस प्रतियोगिता की छवि सट्टेबाजी से जुड़ गई है और ये गलत भी नहीं है। जिस तरह से इसके मैचों का प्रचार होता है उससे अमेरिका में होने वाली हैवीवेट मुक्केबाजी प्रतियोगिताओं को लेकर किया जाने वाला प्रोपेगंडा याद आ जाता है। यही वजह है कि आई.पी.एल एक खेल प्रतियोगिता की बजाय विशुद्ध व्यवसायिक आयोजन बन गया जिसका उद्देश्य नये - नये तरीकों से धन बटोरना हो गया है। जनता के लिए यह मनोरंजन का साधन तो है ही किंतु चूंकि टीमों को किसी राज्य या शहर का नाम दे दिया जाता है इसलिए भले ही उनमें देश - विदेश के बाहरी खिलाड़ी शामिल हों,  जीत - हार के साथ स्थानीय भावनाएं भी जुड़ जाती हैं। गत दिवस इस वर्ष की विजेता रॉयल चेलेन्जर्स बेंगलुरु के स्वागत में बेंगलुरू में जमा भीड़  अनियंत्रित हो गई जिसके कारण दर्जन भर लोग कुचलकर जान गँवा बैठे जबकि दर्जनों घायल हैं। विधानसभा के बाहर  विजेता टीम के स्वागत के लिए  एक लाख लोग जमा थे  वहीं मुख्य स्टेडियम में तीन लाख जनता जमा होने से सभी व्यवस्थाएँ चरमरा गईं। इस दर्दनाक घटना के बाद आरोप - प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। भाजपा कर्नाटक सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है तो कांग्रेस प्रयागराज महाकुम्भ में हुई मौतों को लेकर भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। लेकिन ऐसे हादसों में राजनीति से अलग हटकर ऐसे कदम उठाना चाहिए। जिससे उनकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके। धर्मस्थलों पर होने वाले आयोजनों में भीड़ के आधिक्य से प्रतिवर्ष  सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती है। हर बार प्रशासन और शासन पर लापरवाही का आरोप लगता है और व्यवस्थाएं सुधारने का आश्वासन दिया जाता है। लेकिन होता कुछ भी नहीं है और अगली घटना का इंतजार किया जाता है। बेंगलुरू में गत दिवस जो कुछ हुआ उसके लिए किसको दोष दिया जाए ये बड़ा सवाल है क्योंकि एक निजी कंपनी के स्वामित्व वाली टीम का स्वागत विधानसभा में करने का औचित्य समझ से परे है। यदि कर्नाटक की क्रिकेट टीम रंजी ट्राफी जीत लेती तब तो विधानसभा में उसका अभिनंदन उचित भी होता किंतु सिर्फ बेंगलुरू नाम होने से भावनाओं का ज्वार उठना समझदारी नहीं है। हो सकता है टीम के मालिक ने अपने भावी व्यवसायिक हितों के लिए इतनी भीड़ जमा की हो। लेकिन जनता को भी ऐसे आयोजनों में जाने के पहले अपनी सुरक्षा  की चिंता करनी चाहिए। इस घटना के लिए एक - दूसरे पर  जिम्मेदारी थोपने का खेल भी दुखद है। आई. पी. एल के आयोजकों  और रॉयल चेलेन्जेर्स का ये दायित्व है कि वे मृतकों के परिजनों को क्षतिपूर्ति एवं घायलों का इलाज करवाएं। घटना के लिए बेंगुलुरु का प्रशासन तो जिम्मेदार है ही किंतु इस  बात का पता लगाना जरूरी है कि ये जमावड़ा किसके दिमाग की उपज थी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 June 2025

लेकिन लंगड़े घोड़ों को निकालेगा कौन

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने गत दिवस पार्टी के चुनिंदा  नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस में तीन तरह के घोड़े हैं। लेकिन उनका उपयोग सही तरीके से नहीं होता। मसलन बारात के घोड़े को रेस में खड़ा कर देते हैं जबकि रेस के घोड़े को बरात में भेज देते हैं। एक तीसरी किस्म लंगड़े घोड़े की भी है ।  उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि बारात वाले घोड़ों को बारात में भेजकर रेस वाले घोड़ों को काम में लगाना है। साथ ही  पार्टीजनों को  रेस का घोड़ा बनने की सलाह दी। लेकिन उनका ये कहना काफी रोचक रहा कि जो लंगड़े घोड़े हैं उन्हें ये कहते हुए  रिटायर करना है कि भैया थोड़ी सी  घास खाओ, पानी पियो, रिलेक्स करो और दूसरों को तंग मत करो। वरना कारवाई की जाएगी। उनका आशय ये था कि गुटबाजी में लिप्त नेता बाहर होंगे , टिकिट जनाधार वालों को ही मिलेगी  और उनका प्रदर्शन ही उसका आधार होगा। श्री गाँधी ने बड़े नेताओं को  गुटबाजी से दूर रहने की नसीहत  के साथ  वही बातें दोहराईं जो वे तब से कहते आ रहे हैं जब उन्हें पार्टी का महामंत्री बनाया गया था। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लाने के वायदे के साथ उन्होंने युवाओं को बागडोर सौंपने का भरोसा भी दिलाया। 2017 में  वे कांग्रेस के अध्यक्ष भी बनाये गए लेकिन  2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पराजित हुई तब उसकी जिम्मेदारी लेते हुए त्यागपत्र दे दिया। फ़िलहाल पार्टी के अध्यक्ष हालांकि मल्लिकार्जुन खरगे हैं किंतु असली बागडोर राहुल के हाथ में ही है । लेकिन भोपाल में उन्होंने घोड़ों का जो उदाहरण दिया वह कुछ दिन चर्चा का विषय रहने के बाद हवा-  हवाई होकर रह जाएगा। श्री गाँधी ने जो यूथ ब्रिगेड बनाई थी उसके ज्यादातर सदस्य  अपनी उपेक्षा के कारण पार्टी  छोड़ गए  । और सचिन पायलट जैसे जो इक्का - दुक्का बचे भी हैं तो वे अभी तक अपनी जगह नहीं बना सके। ऐसे में  बारात, रेस और लंगड़े घोड़ों का वर्गीकरण कौन करेगा ये यक्ष प्रश्न है।  लंगड़े घोड़ों को निकाल बाहर करने की जो बात कही गई वह भी आसान नहीं है क्योंकि आज पार्टी में जो भी नेता हैं वे सभी खुद को रेस का घोड़ा मानकर चलते हैं। जनाधार और प्रदर्शन को टिकिट का आधार मानने की जो बात  भी अविश्वसनीय  लगती है क्योंकि श्री गाँधी के हाथ  कमान आने के बाद भी  टिकिट वितरण में पुरानी  संस्कृति ही लागू रही और नेताओं के कृपापात्रों को ही उपकृत किया जाता रहा। युवाओं को  अगली पंक्ति में शामिल करने का जो संकल्प उन्होंने शुरुआत में लिया था वह भी अमल में नहीं आ सका। वरना सचिन पायलट राजस्थान और ज्योतिरादित्य सिंधिया म.प्र के मुख्यमंत्री बनाये जाते। सही बात तो ये है कि चाहे पार्टी का नेतृत्व सोनिया गाँधी के हाथ रही या राहुल के उनके इर्द - गिर्द  ज्यादातर लंगड़े घोड़े ही नजर आते हैं। कुछ कांग्रेसियों को बिना बुलाये बारात में घुसने की आदत है। लेकिन जो सही अर्थों में रेस के घोड़े हैं उनको घास खाने, पानी पीने और रिलेक्स करने के साथ ही दूसरों को परेशान न करने की हिदायत के साथ रेसकोर्स से बाहर रहने कह दिया जाता है। ज्यादा दूर क्यों जाएं म.प्र में ही दो दशक से भी अधिक से जिन प्रादेशिक छत्रपों के कारण कांग्रेस सत्ता से वंचित है आज भी वे उसके सिर पर सवार  हैं। जिन युवाओं के हाथ में संगठन की बागडोर दी गई उनकी कितनी पकड़ पार्टी पर  है ये सभी जानते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ भले ही जनता द्वारा ठुकराए जा चुके हैं किंतु वे अपने बेटों को स्थापित करने के लिए जबरन लदे हुए हैं। यही हाल लगभग हर प्रदेश में कांग्रेस संगठन का है। ये सब देखते हुए यदि श्री गाँधी की मंशानुसार  कांग्रेस में  बारात, रेस और लंगड़े घोड़ों को उनकी सही जगह दिखाई जाए तो फिर उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उनकी बातें सैद्धांतिक तौर पर भले सही हों किंतु वे व्यवहारिक तौर पर कारगर नहीं होतीं । ये बात भी सही है कि वे अपनी कही बातों को खुद भी भूल जाते हैं। इसीलिए जिस इंडिया गठबंधन की ओर से वे  प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार बने वह लोकसभा चुनाव के बाद से ही बिखरने लगा। दरअसल कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या वह खुद है क्योंकि वह अपना रास्ता भूल चुकी है । राहुल जितनी ताकत भाजपा और रा.स्व.संघ को गरियाने में  खर्च करते हैं उससे आधी भी वे पार्टी को मजबूत करने में लगाते तो आज उसकी ये दशा नहीं होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 June 2025

यूक्रेन और रूस का युद्ध खतरनाक स्थिति में



दो दिन पहले यूक्रेन द्वारा रूस पर किये गए ड्रोन हमले दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गए। रूस के भीतर घुसकर उसके लड़ाकू विमानों को नष्ट करने के लिए जो तरीका उसने अपनाया वह युद्ध तकनीक में एक नये अध्याय का प्रारंभ कहा जा सकता है। सुनने में आया है कि जिन ट्रकों में ड्रोन छुपाकर ले जाए गए उनको चलाने वालों ने खुद को भी उड़ा दिया। इस तरह के आत्मघाती हमलों के अनेक उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। लेकिन आज, की दुनिया में आतंकवादियों द्वारा ही ऐसा किया जाता है। अमेरिका में हुए 9/11 हमले में भी ओसामा बिन लादेन के इशारों पर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की जिन दो इमारतों को विमान टकराकर जमींदोज किया गया उन्हें चलाने वाले भी मारे गए। लेकिन यूक्रेन ने जो किया वह उसका नतीजा वह जानता है।  उल्लेखनीय है कि जब कुछ महीनों पहले व्हाइट हाउस में यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मिलने गए तब उन्होंने इकतरफा युद्धविराम का जो दबाव डाला उसे जब यूक्रेनी  राष्ट्रपति ने मंजूर नहीं किया तब ट्रम्प ने उन्हें बेहद अपमानजनक तरीके से बाहर निकाल दिया। उस समय ऐसा लगा था कि वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन की तरफदारी कर रहे थे। ये बात भी सामने आई कि उनकी नजर  यूक्रेन के बहुमूल्य खनिजों पर थी। जेलेंस्की के बारे में काफी ऊलजलूल बातें भी ट्रम्प सार्वजनिक तौर पर कहते रहे। लेकिन हाल ही में उन्होंने पुतिन की भी तीखी आलोचना कर डाली जिस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए रूसी राष्ट्रपति ने उन्हें चेतावनी दी कि वे आग से न खेलें। इस  बयान से ये लगा कि ट्रम्प और पुतिन के बीच तालमेल की संभावनाएं खत्म हो चली हैं। इसी बीच जब बीते सप्ताह यूक्रेन ने अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन हमला कर रूस की सैन्य क्षमता को ललकारा तब दुनिया चौंक गई क्योंकि इतनी तबाही झेलने के बाद  उसमें इतना भीषण हमला करने का साहस कहाँ से आया ये बड़ा सवाल है। लेकिन जल्द ही यूक्रेन ने ये खुलासा किया कि उसने इस हमले के पहले अमेरिका को उसकी जानकारी दे दी थी। इसके बाद ये संदेह पैदा हुआ कि  इसके पीछे अमेरिका का हाथ था। उसके बाद रूस की प्रतिक्रिया बड़ी ही शांत रही क्योंकि उसने अभी भी जो नुकसान हुआ उसकी पुष्टि तो नहीं की किंतु इतना संकेत अवश्य दे दिया कि इसका जवाब बहुत भयानक होगा। जाहिर है लगातार युद्ध की विभीषिका झेल रहा यूक्रेन अपने से कई गुना ताकतवर रूस पर इतना बड़ा हमला किसी बड़ी शक्ति की मदद के बिना नहीं कर सकता था। एक संभावना ये भी है कि यूरोप के कुछ देश इसके प्रायोजक हों क्योंकि पुतिन अनेक देशों की जमीन पर कब्जा करने की धमकी दे चुके हैं। दरअसल अमेरिका द्वारा यूक्रेन का साथ छोड़ दिये जाने के बाद यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के प्रति चिंतित हो उठे थे। हालांकि अभी तक यूक्रेन के इस कदम का उद्देश्य समझ नहीं आ रहा क्योंकि इससे रूस को कितना भी बड़ा नुकसान हो जाए किंतु यूक्रेन  जीत हासिल करने में कामयाब हो जायेगा ये उम्मीद करना सपने देखने जैसा है। ऐसा लगता है कुछ अदृश्य ताकतें इस लड़ाई को खतरनाक मोड पर ले जाना चाह रही हैं और यूक्रेन उनके लिये मोहरा बन गया है। वैसे भी  यूक्रेन रूस से टकराने की जुर्रत कभी नहीं करता यदि अमेरिका और उसके समर्थक यूरोपीय देश उसकी मदद न करते। इतनी लंबी लड़ाई के बाद भी यदि रूस उसे  पूरी तरह परास्त नहीं कर सका तो यह उसके हौसले को तो दर्शाता है किंतु उसकी अपनी क्षमता इतनी नहीं थी कि वह इतना लंबा युद्ध लड़ पाता। इसीलिए उसने रूस पर जो ताजा वार किया वह चौंकाने वाला है। कुछ दिनों बाद पुतिन, ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच फोन पर बातचीत होने वाली है।  इस दौरान यूक्रेन द्वारा किये गए ताजा ड्रोन हमले पर भी चर्चा हो सकती है। हालांकि सही स्थिति तो पता नहीं चल सकेगी क्योंकि ऐसे मामलों पर सदैव परदा पड़ा रहता है किंतु रूस इसका जवाब जरूर देगा। राष्ट्रपति पुतिन के स्वभाव को देखते हुए पूरी दुनिया इस बात के प्रति भयभीत है कि वे यूक्रेन की कमर तोड़ने जैसा कदम उठा सकते हैं। अमेरिका उनको रोक पाने की स्थिति में नहीं है और चीन रूस के साथ खड़ा है। ये देखते हुए रूस - यूक्रेन के बीच की जंग खतरनाक स्थिति में आ गई  है। चूंकि पुतिन  किसी भी स्थिति में  शांत नहीं बैठेंगे इसलिए दुनिया को किसी बड़ी घटना के लिए तैयार रहना होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 June 2025

आयकर जैसी राहत जीएसटी में भी दी जाए


बीते वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में अर्थव्यवस्था से जुड़े जो आंकड़े आये वे उत्साहित करने वाले हैं। विदेशी निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है। एक अच्छी खबर ये भी है कि कोरोना काल के बाद से आम जनता की जो घरेलू बजट लगभग खत्म हो गई थी वह फिर पुरानी रफ्तार पर लौट रही है। बैंकों और बड़े औद्योगिक समूह नगदी की कमी से उबरने लगे हैं। शेयर बाजार में मध्यमवर्गीय नये निवेशक तेजी से बढ़ रहे हैं। सरकारी बैंकों का लाभ निजी बैंकों से ज्यादा होना अपने आप में बहुत कुछ कहता है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वार्षिक विकास दर 6.5 प्रतिशत रहना अर्थव्यवस्था के सही दिशा में बढ़ने का प्रमाण है। निर्यात के मोर्चे पर भी उल्लेखनीय वृद्धि होने से व्यापार असंतुलन में निरंतर कमी हो रही है। ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय रक्षा उपकरणों की धाक पूरी दुनिया में जमा दी जिसका परिणाम बड़ी संख्या में विदेशी ऑर्डर मिलना है। इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए निजी क्षेत्र को भी रक्षा उपकरण बनाने की अनुमति दी गई जो दूरदर्शी कदम है। हाल ही में रिजर्व बैंक ने बीते वित्तीय वर्ष के लाभांश के रूप में केन्द्र सरकार को रिकार्ड 2.69 लाख करोड़ बतौर  लाभांश दिया जो गत वर्ष से 27 फीसदी अधिक है। इस राशि से केन्द्र सरकार को अपना बजट घाटा घटाने में मदद तो मिली ही ऑपरेशन सिंदूर के कारण आये आर्थिक बोझ से निपटने में भी सुविधा हुई। जीएसटी का संग्रह हर माह पिछले वर्ष का कीर्तिमान ध्वस्त करता जा रहा है। ऑटोमोबाइल और रियल सेक्टर जैसे क्षेत्र निरंतर अच्छे परिणाम दे रहे हैं। उत्पादन के आंकड़े भी संतोषजनक स्तर पर आ गए हैं। सबसे बड़ी बात उपभोक्ताओं में नजर आ रहा उत्साह है जिससे मांग बनी हुई है। पर्यटन और सेवा जैसे व्यवसाय  उम्मीद के मुताबिक तेज गति से बढ़ रहे हैं। इन सबका परिणाम ही है कि भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में सक्षम हो सका। यद्यपि अभी भी पड़ोसी चीन हमसे काफी आगे है किंतु अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस प्रकार भारत पर टैरिफ थोपने और एप्पल जैसी कंपनी को अपने मोबाइल फोन का उत्पादन भारत में न करने के लिए धमका  रहे हैं उससे लग जाता है कि विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति तक हमारे बढ़ते कदमों से परेशान हो उठी है। हाल ही में भारत ने पाकिस्तान पर जो सफल सैन्य कार्रवाई की वह आतंकवाद के विरुद्ध हमारी मारक क्षमता का बड़ा उदाहरण है। वैश्विक मंचों पर भारत के प्रति सम्मान और आकर्षण दोनों बढ़ा है। दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपनी उत्पादन इकाइयां लगाने आतुर हैं। उससे भी आगे बढ़कर हमारे उद्योगपति दुनिया के अनेक देशों में अपने कारखाने स्थापित कर भारतीय उद्यमशीलता का गौरवगान कर रहे हैं। प्रत्यक्ष करों से हो रही आय उम्मीद से बढ़कर होना ये जताता है कि करदाताओं  में व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ा है। कारपोरेट के अलावा निजी करदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि से ये आकलन करना आसान हुआ है कि लोगों की आय बढ़ रही है और वे देश के विकास में अपना योगदान देने तत्पर हैं। ये सभी संकेत भारत के उज्ज्वल भविष्य का परिचायक हैं। लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जो आम जनता के लिहाज से अखरने वाली हैं। मसलन यदि अर्थव्यवस्था सुखद स्थिति में है तब उसका लाभ उसी  अनुपात में जनता को भी मिलना चाहिए। यद्यपि मोदी  सरकार ने बीते 11 वर्ष के कार्यकाल में अधो संरचना और सामाजिक कल्याण जैसी योजनाओं पर काफी खर्च किया। उच्चस्तरीय राजमार्ग, फ्लाईओवर, हवाई अड्डे, आदि के साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला, शौचालय के अलावा आयुष्मान भारत जैसे प्रकल्पों ने देश में विकास और जनकल्याण के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर दिया। आज की स्थिति में ये कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी विकास का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगा है। राजमार्गों से गुजरते हुए भारत में आये बदलाव का सुखद अनुभव हो जाता है। इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि जीएसटी की दरों में कमी की जाए। जाहिर है प्रारंभिक दौर में सरकार को मिलने वाले राजस्व में गिरावट आयेगी किंतु लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से वह घाटा तो पूरा होगा ही, कर की चोरी भी रुकेगी। इसके साथ ही जीएसटी के विभिन्न स्तरों को घटाकर दो रखे जाएं तो व्यापार करना आसान होगा। जिस तरह इस वर्ष आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख रु.  किये जाने से देश के विशाल मध्यम वर्ग को जबरदस्त राहत मिली तो उसका असर बाजार में उठाव के तौर पर देखने मिला ठीक वैसे ही यदि जीएसटी में भी ऐसा ही क्रांतिकारी बदलाव किया जावे तो वह आम जनता के साथ ही उद्योग - व्यापार जगत के लिए भी उत्साहवर्धक रहेगा । आर्थिक सुधारों के लिहाज से ये बड़ा कदम होगा क्योंकि इससे भारत में आने वाली विदेशी कंपनियां भी आकर्षित होंगी। अपेक्षा की जा सकती है कि आगामी वित्तीय वर्ष के बजट में आयकर जैसी राहत  जीएसटी में भी दी जाएगी। जीएसटी को जिस तरह लोगों ने अपनाया और सरकार का खजाना भरा उसके बाद अब सरकार को भी चाहिए वह उदारता दिखाये। 


- रवीन्द्र वाजपेयी