Tuesday, 8 July 2025

ट्रम्प पूरी दुनिया से बैर भाव बढ़ाने की मूर्खता दोहरा रहे


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस प्रकार से अन्य देशों के साथ पेश आ रहे हैं वह हास्यापद  है। अपने परंपरागत मित्र देशों पर भी  बेरहमी से आयात शुल्क (टैरिफ) थोपना मनमानी ही कही जाएगी। अमेरिकी  गुट में माने जाने वाले यूरोपीय देश भी उनके सनकीपन से त्रस्त होकर वैकल्पिक संरक्षण  की तलाश में हैं। चीन और रूस पर तो उनका रौब नहीं चल पा रहा किंतु बाकी देशों पर मनमर्जी का आयात शुल्क लगाकर वे खुद को दुनिया का भाग्यविधाता मान बैठे हैं।  गत दिवस उन्होंने ब्रिक्स नामक संगठन को भी धमकाया कि यदि वह उनके हिसाब से नहीं चला तो उसमें शामिल देशों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगा दिया जायेगा। उधर जापान पर 10 फीसदी टैरिफ का बोझ बढ़ाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने ये प्रस्ताव भी दिया कि यदि वह अपनी कारों का उत्पादन अमेरिका में करे तब उसे इस टैरिफ से मुक्ति दे दी जाएगी। ऐसा ही दबाव उन्होंने एपल फोन बनाने वाली कंपनी पर डालते हुए उसे भारत के बजाय अमेरिका में उत्पादन करने का प्रस्ताव दिया जिसे नहीं मानने पर अतिरिक्त टैरिफ लगाकर फोन महंगा करने की चेतावनी दे डाली। ब्रिक्स से ट्रम्प इसलिए खफा हैं क्योंकि उसमें शामिल देश अपनी साझा मुद्रा में आपसी व्यापार करने पर विचार कर रहे हैं। और ऐसा होने पर अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व खतरे में पड़ जाएगा। सही बात ये है कि बड़ी चीजों का उत्पादन करने में भले ही अमेरिका विश्व में अग्रणी हो किंतु दैनिक उपयोग में आने वाली सैकड़ों वस्तुओं का उसे आयात करना होता है। इस वजह से उसका व्यापार घाटा बढ़ता गया। चीन और भारत जैसे देशों में ही ऐसी तमाम अमेरिकी कंपनियां हैं जो यहाँ अपना उत्पादन करने के बाद अमेरिका में बेचती हैं। ट्रम्प इसी स्थिति को बदलना चाह रहे हैं। दूसरा दबाव उनका भारत सहित अनेक देशों पर अमेरिका में बने हथियार, लड़ाकू विमान, मिसाइलें, ड्रोन जैसी युद्ध सामग्री खरीदने का है। लेकिन  आज के विश्व में किसी एक देश का  चौधरी बना रहना मुमकिन नहीं है। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन विश्व की बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके बीच  समन्वय से अमेरिकी सर्वोच्चता को चुनौती मिल रही है। हालांकि इनमें शामिल सभी देश आर्थिक और सामरिक तौर पर भले ही बहुत ताकतवर न हों किंतु  आपसी व्यापार के जरिये वे एक दूसरे का सहारा बनते हैं। दुनिया का बड़ा बाजार भी इन देशों में होने से अमेरिका को भविष्य में अपने लिए खतरा महसूस होने लगा है। लेकिन ट्रम्प एक साथ पूरी दुनिया से टकराने की जो गलती कर रहे हैं उसकी वजह से अमेरिका की विश्वसनीयता में लगातार कमी आती जा रही है। अचानक महंगाई बढ़ने से आम अमेरिकी नागरिक नाराज हो चला है। घरेलू मोर्चे पर भी उथल - पुथल है। अप्रवासियों को थोक के भाव निकाल बाहर करने  की  मुहिम के कारण कानून व्यवस्था के लिए संकट उत्पन्न होने लगा है। राज्यों के साथ भी उनके रिश्ते तनावपूर्ण हो रहे हैं। छोटी - छोटी बातों में  हस्तक्षेप से ट्रम्प की अपनी पार्टी में ही उनका विरोध शुरू हो चुका है। इलान मस्क जैसे नजदीकी सिपहसालार का साथ छोड़ जाना उनके दबदबे पर सवालिया निशान लगाने काफी है। भारत - पाकिस्तान और ईरान- इसराइल युद्ध के दौरान ट्रम्प का व्यवहार अजीबोगरीब रहा। विशेष रूप से युद्धविराम का श्रेय लूटने की आपाधापी से उनकी  छवि एक विदूषक की बन गई। लेकिन उन पर इस सबका कोई भी असर नहीं पड़ रहा। इसलिए अब पूरी दुनिया उनसे छिटकने लगी है। अमेरिका के सभी राष्ट्रापति सुलझे और समझदार रहे हों ये कहना तो सत्य को नकारना होगा किंतु बीते अनेक दशकों में जितने भी व्यक्ति व्हाइट हाउस में बैठे उनमें डोनाल्ड ट्रम्प से हल्का और अस्थिर मस्तिष्क वाला राष्ट्रपति शायद ही दूसरा रहा होगा। अपने पिछले कार्यकाल में भी उन्होंने कुछ ऊलजलूल काम किये जिसकी वजह से उन्हें जनता ने लगातार दूसरा अवसर नहीं दिया। लेकिन उनके उत्तराधिकारी जो बाइडेन का प्रदर्शन और भी गया - गुजरा  होने से उनकी वापसी हो गई। अमेरिका के हितों की रक्षा करना बेशक उनका दायित्व है किंतु इसके लिए वे पूरी दुनिया से बैर भाव बढ़ा लें ये सिवाय मूर्खता के और कुछ भी नहीं जिसे वे आये दिन दोहराने में लगे हैं। उनकी ये सनक कहां जाकर रुकेगी ये तो वही जानते हैं किंतु इसकी वजह से अमेरिका की साख और धाक दोनों को जबरदस्त नुकसान हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 7 July 2025

दांव उल्टा पड़ते ही बचाव करने में जुटे उद्धव


मुंबई में राज ठाकरे  और उद्धव ठाकरे द्वारा प्राथमिक कक्षाओं में तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी की अनिवार्यता खत्म करने के फड़नवीस सरकार के निर्णय को अपनी विजय मानते हुए बीते सप्ताह एक मंच पर आकर जो शक्ति प्रदर्शन किया उसे एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के तौर पर देखा गया। भले ही  दोनों भाईयों ने अपने दलों के एकीकरण का कोई संकेत नहीं दिया किंतु मुंबई महानगरपालिका के आगामी चुनाव के मद्देनजर दोनों के गठबंधन का संकेत इससे अवश्य मिला। इस पुनर्मिलन पर इंडिया गठबंधन के शेष घटक तो शांत रहे किंतु  दक्षिण में बैठी द्रमुक को मुँह मांगी मुराद मिल गई जिसका प्रमाण तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के उस बयान से मिला जिसमें उन्होंने उद्धव ठाकरे को बधाई देते हुए इस बात पर हर्ष व्यक्त किया कि हिन्दी विरोधी लड़ाई अब तमिलनाडु से बाहर पहुँच गई है । इसके साथ ही स्टालिन ने हिन्दी विरोधी लड़ाई मिलकर लड़ने की पेशकश कर डाली। लेकिन इस बिन मांगे समर्थन से खुश होने के बजाय उद्धव ठाकरे गुट रक्षात्मक हो गया। पार्टी के प्रवक्ता संजय राउत ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी हिन्दी की विरोधी नहीं अपितु उसे लादे जाने के विरुद्ध है। स्टालिन द्वारा की गई पेशकश से कन्नी काटते हुए उन्होंने कहा कि द्रमुक के लोग हिन्दी बोलते ही नहीं  हैं जबकि हम लोग हिन्दी का प्रयोग बोलचाल में किये जाने के विरोधी नहीं हैं। इसके अलावा भी उन्होंने कई ऐसी बातें कीं जो विजय रैली में राज और उद्धव द्वारा कहीं गई बातों से अलग थीं। उल्लेखनीय है उस रैली में उद्धव यहाँ तक बोल गए थे कि यदि मराठी के लिए लड़ना गुंडागर्दी है तो हम गुंडे हैं। सही बात ये है कि राज और उद्धव को उस रैली के बाद जिस प्रकार के समर्थन की उम्मीद रही वह नजर नहीं आया। इंडिया गठबंधन के मुख्य घटक कांग्रेस के अलावा महाराष्ट्र के बड़े नेता शरद पवार ने भी ठाकरे बंधुओं की हिन्दी विरोधी मुहिम को पूरी तरह उपेक्षित कर दिया। अन्य राज्यों में बसे मराठीभाषियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। लेकिन स्टालिन के अप्रत्याशित समर्थन ने ठाकरे बंधुओं की चिंता बढ़ा दी क्योंकि शिवसेना का जन्म ही मुंबई में  दक्षिण भारतीयों के विरोध से हुआ था। हालांकि राज को तो इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उनका जनाधार काफी सिमट चुका है किंतु उद्धव के लिए चेन्नई से आई बधाई परेशान करने वाली रही। चूंकि विजय रैली में वे कुछ ज्यादा ही हाँक चुके थे इसलिए पीछे हटने की शर्मिंदगी से बचने अपने प्रवक्ता संजय राउत को आगे कर दिया जो मराठी अस्मिता के नाम पर दहाड़ने के बजाय मिमियाते नजर आये। असल में उद्धव को ये एहसास हो गया कि मराठी की रक्षा के लिए हुई रैली से यदि कोई लाभ होगा तो उसका बड़ा हिस्सा राज को मिलेगा क्योंकि मराठी को लेकर उनके तेवर सदैव उग्र रहे  हैं। सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा देने आये अन्य राज्यों के युवकों के साथ हिंसा भी उन्हीं के उकसावे पर होती थी। दूसरी ओर उद्धव ने गैर मराठीभाषियों को भी अपने साथ जोड़ने की नीति  बनाई जिसका लाभ भी मिलने लगा था। ऐसे में एक सीमा के बाद हिन्दी विरोध करने से गैर मराठी समर्थक छिटक सकते हैं। उससे भी बड़ी बात ये हुई कि राज व और उद्धव के मंच साझा करने से मुंबई के गैर मराठी भाषियों का ध्रुवीकरण होने की संभावना बढ़ गई। इससे मुंबई महानगरपालिका के आसन्न चुनावों में  उद्धव को अपना खेल खराब होने की आशंका सताने लगी। मराठी की आड़ में हिन्दी भाषियों के साथ किये गए अपमानजनक व्यवहार के बारे में मुंबई से ही सोशल मीडिया पर जो उग्र प्रतिक्रियाएं  प्रसारित हुईं उनसे भी वे चौकन्ने हुए। ये सब देखते हुए लगता है उद्धव द्वारा हिन्दी विरोध का जो दांव चला गया वह उल्टा पड़ गया इसीलिए उन्होंने श्री राउत को आगे करते हुए बचाव का रास्ता खोजा। लेकिन मराठी का समर्थन करने में गुंडा कहलाने तक के लिए तैयार उद्धव को जो नुकसान होना था उसकी भरपाई अब संभव नहीं है। उल्टे  हिन्दी के प्रति ज्यादा नरम होने का दिखावा करने से कट्टर मराठी समर्थक हाथ से खिसक जाने का खतरा पैदा हो गया है। ठाकरे बंधुओं को ये बात समझनी होगी कि यदि गैर मराठीभाषी मुंबई छोड़ दें तो माया नगरी अपनी रौनक खो बैठेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 5 July 2025

मराठी तो बहाना है, मुंबई महानगरपालिका निशाना है


बई में आज बरसों पहले अलग हुए दो भाई एक मंच पर नजर आये। मराठी को बहाना बनाकर उद्धव ठाकरे और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने बड़ी रैली की। रैली में  शिवसेना के पुराने तेवर दिखाने का प्रयास हुआ। किसी पार्टी या संगठन का बैनर और झंडा नहीं लगने से ये कहना कठिन है कि उद्धव की खंडित शिवसेना और राज की मनसे का एकीकरण हो जाएगा क्योंकि बीते कुछ सालों में अनेक बार उनके साथ आने की अटकलें लगीं किंतु वे ज़मीन पर नहीं उतर सकीं। पिछले विधानसभा चुनाव में तो उद्धव के बेटे आदित्य के विरुद्ध राज ने अपने पुत्र को लड़ाया जो हार गया। ऐसे में दोनों भाई अचानक एक मंच पर आकर मराठी के सम्मान की बात करने लगे ये चौंकाने वाली बात है। खास तौर पर इसलिए क्योंकि राज के बारे में ये कयास काफी समय से लग रहे थे कि वे भीतर - भीतर भाजपा के साथ जुड़ने की  तैयारी में हैं। उद्धव के कारण ही राज को शिवसेना छोड़नी पड़ी थी। वरना एक जमाना था जब अपनी ओजस्वी भाषण शैली में  हिंदुत्व का पक्ष रखने के कारण उन्हें बाला साहेब का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाने लगा था। उस दौर में उद्धव वन्य छायांकन का अपना शौक पूरा करने में व्यस्त रहते थे। राज ने नाराज होकर शिवसेना ही नहीं छोड़ी अपितु बाला साहेब की छाया से बाहर निकलने के उद्देश्य से मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) का गठन किया किंतु तमाम कोशिशों के बावजूद वे शिवसेना के समानांतर खड़े नहीं हो सके। उद्धव भाजपा के साथ रहकर अच्छी स्थिति में थे किंतु मुख्यमंत्री बनने की चाहत ने उन्हें शरद पवार और कांग्रेस की गोद में बिठा दिया। हालांकि वह प्रयोग फुस्स साबित हुआ और उद्धव हिंदुत्व छोड़कर मुस्लिम समर्थक कांग्रेस और शरद पवार के जाल में फंस गये। लेकिन अब उनको ये लगने लगा कि वे कहीं के नहीं रहे। पार्टी भी हाथ से गई और पिता से विरासत में मिली पुण्याई भी। इंडिया गठबंधन के साथ भी उनकी पटरी नहीं बैठ रही। शरद पवार का सूर्य  अस्त होने के कगार पर है। उधर कांग्रेस ने भी उद्धव को आँखें दिखाना शुरू कर दिया और मुंबई महानगरपालिका का चुनाव अकेले लड़ने का संकेत देकर उनकी नींद उड़ा दी। उल्लेखनीय है कई राज्यों  से बड़े बजट वाली मुंबई महानगरपालिका शिवसेना और ठाकरे परिवार के लिए प्राणवायु जैसी है। उसका आगामी चुनाव उद्धव के लिए जीवन - मरण का सवाल है क्योंकि उसके बिना उनके लिए अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाये रखना असम्भव हो जाएगा। एकनाथ शिंदे को साथ लाकर भाजपा ने इस चुनाव के लिए कड़ी मोर्चेबंदी कर ली है। इस सबका ही परिणाम है कि सारे शिकवे - गिले भुलाकर उन्होंने राज से हाथ मिलाने में संकोच नहीं किया । ज्यादा पुरानी बात नहीं जब दोनों एक दूसरे को फूटी आँख से भी नहीं देखना चाहते थे। वैसे इस मिलन की जितनी जरूरत उद्धव को थी उतनी ही राज को भी जिनकी राजनीतिक पूंजी  पूरी तरह खत्म हो चुकी है। आज मराठी का झंडा उठाकर उद्धव के साथ मंच साझा करते हुए राज ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस को इस बात का श्रेय दिया कि दोनों भाईयों को एक करने का जो काम बाला साहेब नहीं कर पाए वह हिन्दी की शिक्षा को अनिवार्य बनाकर उन्होंने कर दिया। राज ने एक बार फिर महाराष्ट्र को सबसे ऊपर बताकर मुंबई को न छेड़ने की चुनौती भी दी। यद्यपि रैली में जुटी भीड़ से कोई निष्कर्ष निकालना बेमानी है क्योंकि आज की मुंबई अब मराठी को लेकर आंदोलित नहीं होगी। गैर मराठी भाषियों के साथ मारपीट की घटनाओं से ठाकरे बंधुओं की मुहिम पहले ही दागदार हो चुकी है। बेहतर होगा यदि राज और उद्धव अपने मन से ये गलतफहमी निकाल दें कि वे मराठी मानुष वाले बाला साहेब के हथियार के सहारे अपनी राजनीति चमका लेंगे क्योंकि उसमें जंग लग चुकी है। ये कहना गलत नहीं होगा कि ठाकरे बंधुओं के इस मूर्खता पूर्ण कदम से अन्य प्रांतों में रह रहे मराठी भाषियों पर संकट आ सकता है। उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि मुंबई की चाल, चरित्र और चेहरा पूरी तरह बदल चुका है और वहाँ की राजनीति की लगाम गैर मराठी भाषियों के हाथ है। इसलिए  मुंबई महानगरपालिका का चुनाव मराठी के नाम पर उत्पात मचाकर नहीं जीता जा सकता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 July 2025

बिहार में महागठबंधन की जमीन खिसकाएँगे केजरीवाल



भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरी आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता गंवाने के बाद अपनी चमक और धमक खोती जा रही थी। लेकिन हाल ही में गुजरात और पंजाब में विधानसभा उपचुनाव जीतने से उसका आत्मविश्वास लौटता दिखा। यद्यपि उपचुनाव जीतने के फ़ौरन बाद गुजरात में उसके एक और विधायक ने पार्टी छोड़कर  जीत की खुशी को फीका  कर दिया।  वैसे आम आदमी पार्टी छोड़ने का सिलसिला बिना रुके जारी है। पार्टी के संस्थापकों में से कुछ तो जल्द ही खुद हट गए और कुछ धकियाकर हटा दिये गए। लेकिन जो बाद में आये उनमें से भी बहुतों का मोह केजरीवाल एंड कं से भंग होता गया। पंजाब में सरकार बनाने के बाद पार्टी नेताओं का आत्मविश्वास अहंकार का रूप लेने लगा जिसके कारण वे ये सोचकर अपनी छवि के विपरीत काम करने लगे कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन दिल्ली के शराब घोटाले और शीशमहल कांड ने उस खुशफहमी को पूरी तरह खत्म कर दिया और पिछले विधानसभा चुनाव में दिल्ली की सत्ता उसके हाथ से खिसक गई। लोकसभा चुनाव में झटका खाने के बाद भाजपा ने हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली जीतकर जहाँ शानदार वापसी की वहीं आम आदमी पार्टी  इंडिया गठबंधन से अलग हटकर भी कुछ हासिल नहीं कर सकी। दिल्ली चुनाव  में तो राहुल गाँधी ने खुद अरविंद केजरीवाल पर जमकर हमले किये। जिसके बाद दोनों में तल्खी बढ़ती गई। गुजरात उपचुनाव के बाद  श्री केजरीवाल ने ये कहते हुए कांग्रेस और लालू यादव दोनों को झटका दे दिया कि बिहार विधानसभा के आगामी चुनाव में उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन से अलग रहकर चुनाव लड़ेगी साथ ही ये स्पष्ट कर दिया कि वह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए ही था। दरअसल हरियाणा विधानसभा चुनाव में राहुल भी चाहते थे कि कांग्रेस आम आदमी पार्टी को साथ रखे किंतु भूपिन्दर सिंह हुड्डा ने उनकी बात नहीं मानी। उस  वजह से आम आदमी पार्टी ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस की राह में रोड़े अटका दिये। और फिर दिल्ली के दंगल में दोनों दलों के बीच खाई और चौड़ी हो गई। हालांकि इंडिया गठबंधन के अनेक घटक दल ये  कह चुके हैं कि विपक्षी एकता का वह प्रयोग केवल संसदीय चुनाव के लिए हुआ था और उसके बाद उसकी भूमिका खत्म हो चुकी है। बावजूद उसके महाराष्ट्र में कांग्रेस ने शरद पवार और उद्धव ठाकरे की पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। लेकिन नतीजे बेहद खराब होने के बाद इंडिया गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे। निकट भविष्य में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जिसमें मुख्य मुकाबला लालू के नेतृत्व वाले महागठबंधन और एनडीए के बीच होगा जिसमें भाजपा, नीतीश और चिराग पासवान की पार्टी शामिल हैं। लेकिन श्री केजरीवाल ने भी आम आदमी पार्टी के अकेले ही मैदान में उतरने का ऐलान कर महागठबंधन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ये आश्चर्यजनक है कि कुछ समय पहले तक वे भाजपा को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते थे किंतु अब विपक्ष की टाँग खींचने में भी शर्म नहीं कर रहे। इसका कारण संभवतः ये है कि इंडिया गठबंधन में शामिल होने से आम आदमी पार्टी का वह दावा हवा - हवाई होकर रह गया कि वह भाजपा की विकल्प है। दिल्ली की सत्ता हाथ से निकलना उसके लिए बहुत बड़ा धक्का था क्योंकि उसके कारण उसके सबसे बड़े नेता की साख और धाक दोनों को जबरदस्त नुकसान पहुंचा। बिहार में अकेले लड़कर आम आदमी पार्टी एक सीट भी जीत जाए तो आश्चर्य होगा किंतु वह महागठबंधन की जमीन जरूर खिसका देगी ये आशंका प्रबल है। हो सकता है कल को लालू और राहुल  ये आरोप लगाने लग जाएं कि आम आदमी पार्टी भी भाजपा की बी टीम है। सही बात ये है कि  दिल्ली में श्री केजरीवाल ने सरकार तो गंवाई ही आम आदमी पार्टी  की जो पहचान बनी थी उसे भी खत्म कर दिया। बाकी विपक्षी दलों से अलग लड़कर श्री केजरीवाल उसी प्रतिष्ठा को दोबारा हासिल करने के लिए प्रयासरत हैं। बिहार में  लालू युग अस्त होने को है , वहीं कांग्रेस घुटनों के बल चलने मजबूर है। ऐसे में जो खालीपन उत्पन्न होने वाला है उसे भरने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय किया गया। ये कितना सही होगा कहना कठिन है क्योंकि बीते एक साल से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी लगातार अपनी प्रारंभिक पुण्याई  खोते गए हैं। और फिर बिहार में उन्हीं जैसी छवि वाले प्रशांत किशोर भी पहले से ही ताल ठोक रहे हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 July 2025

जीएसटी की वसूली बढ़ी तो जनता को भी राहत मिलनी चाहिए

1 अप्रैल 2017 से लागू हुए जीएसटी को प्रारंभ में प्रायोगिक तौर पर लिया गया था। इसमें व्याप्त जटिलता को देखते हुए इसकी सफलता पर भी संदेह जताया गया । सरकार ने भी इसमें जिस तेजी से  बदलाव किये उससे विपक्ष के इस आरोप की पुष्टि हुई कि बिना समुचित तैयारी के इसे लागू कर दिया था। उद्योग - व्यापार जगत में भी इसे लेकर  भारी नाराजगी थी। इसका प्रत्यक्ष असर दिसंबर 2017 में हुए  गुजरात  चुनाव के परिणामों में देखने मिला जब भाजपा 2012 की तुलना में 16 सीटें गंवाकर 99 पर अटक गई और वह भी तब, जब आखिरी दौर में गृहमंत्री अमित शाह ने सूरत में डेरा जमाकर भाजपा की डूबती नैया बचाई। लेकिन धीरे - धीरे इसकी स्वीकार्यता बढ़ती गई और उद्योग - व्यापार जगत ने भी इसे अपना लिया। इसके लागू होने से राज्यों के स्तर पर करों की भिन्नता कुछ हद तक दूर हुई है। आंकड़ों में आकलन करें तो बीते 5 साल में जीएसटी वसूली दोगुनी हो चुकी है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25  में कुल GST संग्रह रु 22.08 लाख करोड़ रहा, जो 5 वर्ष पूर्व 11.37 लाख करोड़ था।  इस राशि में हर महीने वृद्धि होना एक तरफ तो देश में आर्थिक गतिविधियों के सुचारु रूप से संचालित होने का प्रतीक है वहीं दूसरी तरफ इस कर प्रणाली की सफलता का प्रमाण। इस व्यवस्था के 8 साल पूरे होने के मौके पर सरकार ने जून 2025 का जीएसटी वसूली का जो आंकड़ा जारी किया वह  1.85 लाख करोड़ रहा जो गत वर्ष से 6.2 फीसदी ज्यादा है। अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने में जीएसटी के योगदान को आर्थिक विशेषज्ञ स्वीकार करने लगे हैं। हर माह इसकी वसूली में वृद्धि इस बात का परिचायक है कि  करदाता भी अपना दायित्व ठीक से निर्वहन कर रहे हैं। हालांकि टैक्स चोरी करने वालों ने जीएसटी को भी नहीं छोड़ा किंतु  उनके काले धंधे जल्द पकड़ में आ जाते हैं। आठ साल बाद जीएसटी सरकार के राजस्व का प्रमुख स्रोत बन चुका है। इसकी वजह से विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के संचालन के बाद भी सरकार का खजाना खाली नहीं हुआ और विकास कार्य भी रोकने की नौबत नहीं आई। लेकिन इस सफलता के शोर के बावजूद कुछ वायदे और अपेक्षाएं अभी भी पूरी होनी बाकी हैं। मसलन जीएसटी लागू करते समय एक देश एक टैक्स जैसा आश्वासन मिला था जो पूरा नहीं हो सका क्योंकि राज्यों के अपने कारण हैं अलग - अलग दरें रखने के। विशेष रूप से पेट्रोल - डीजल जैसी दैनिक उपयोग की चीजों को जीएसटी के दायरे में लाने की कोई संभावना नहीं दिखती। केन्द्र जहाँ राज्यों में आम सहमति न होने का बहाना बनाते हैं वहीं राज्य केन्द्र पर आरोप मढ़ते हैं। इसी का परिणाम है कि उ.प्र  में पेट्रोल - डीजल म.प्र से 10 रु. लीटर सस्ता है। चिकित्सा बीमा प्रीमियम पर  18 फीसदी जीएसटी असंवेदनशीलता नहीं तो और क्या है?  जीएसटी की ढेर सारी दरें भी इसकी मूल भावना के विरुद्ध है। 5 और 12 फीसदी तक  तो फिर भी ठीक है किंतु उससे अधिक दरें अव्यवहारिक हैं। विलासिता से जुड़ी कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर अधिक करारोपण गलत नहीं है किंतु बाकी सभी पर अधिकतम 12 प्रतिशत जीएसटी ही लगना चाहिए। हालांकि गत दिवस आम जनता के उपयोग की तमाम चीजों को 12 से हटाकर  5 फीसदी के दायरे में लाये जाने का फैसला अगली जीएसटी काउंसिल बैठक में लिए जाने की संभावना समाचार माध्यमों से प्रचारित हुई किंतु 18 फीसदी की दर खत्म करने जैसी कोई बात सुनाई नहीं दे रही। इस दिशा में सोचने और करने का ये सही समय है। हमारे देश में आम जनता को चुनाव के पहले राहत देने का रिवाज है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले  केंद्रीय बजट में 12 लाख तक आयकर छूट दिये जाने का परिणाम भाजपा की जीत के तौर पर आया। निकट भविष्य में बिहार और  प. बंगाल, असम, त्रिपुरा, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होना है। बड़ी बात नहीं इनमें जीत हासिल करने के लिए जीएसटी में राहत की सौगात मिल जाए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 2 July 2025

भाजपा के नये प्रदेशाध्यक्ष के सामने 2028 और 29 बड़ी चुनौती


आखिरकार म.प्र में भाजपा को हेमंत खंडेलवाल के तौर पर नया अध्यक्ष प्राप्त हो गया जो निवर्तमान अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा का स्थान लेंगे। श्री शर्मा का कार्यकाल काफी ऐतिहासिक रहा। 2018 के विधानसभा चुनाव में बहुमत से महज 8 सीट पीछे रहने के बाद भाजपा में निराशा छा गई थी। कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार की वापसी ने प्रदेश की राजनीति में नये युग की शुरुआत का संकेत दिया किंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने धमाकेदार वापसी की और छिंदवाड़ा में कमलनाथ के बेटे नकुल के अलावा सभी सीटें मोदी लहर में भाजपा की झोली में आ गईं। इसके बाद से ही प्रदेश सरकार के भविष्य पर खतरा मंडराने लगा और अंततः ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत ने कांग्रेस की खुशियों पर पानी फेर दिया। 2020 के मार्च में कोरोना से बचाव के लिए लगाए गए लॉक डाउन के पहले शिवराज सिंह चौहान फिर सत्ता में लौट आये। वह सत्ता परिवर्तन चूंकि श्री शर्मा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के फौरन बाद हुआ इसलिए पार्टी में उनकी ताजपोशी को शुभ माना गया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री रहने के कारण युवाओं में उनकी अच्छी पकड़ थी। इसलिए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए पांच वर्ष में उन्होंने युवाओं को पार्टी की ओर आकर्षित किया। वे भाजपा के सबसे लंबे समय तक प्रदेश अध्यक्ष रहने का  कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। लेकिन जो सबसे बड़ा रिकार्ड उनके नाम है वह है 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा द्वारा प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर कब्जा कर लेना जो 1977 की जनता लहर में भी नहीं हो सका था। ये भी उल्लेखनीय है कि श्री शर्मा के कार्यकाल में ही 2023 में प्रदेश को डॉ. मोहन यादव के रूप में एक युवा मुख्यमंत्री मिला। ऐसे अध्यक्ष का उत्तराधिकारी तलाश करना भाजपा के लिए आसान नहीं था किंतु लंबे मंथन के बाद गत दिवस बैतूल के विधायक और पूर्व सांसद हेमंत खंडेलवाल निर्विरोध भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित हो गए। यदि सब कुछ सामान्य रहा तब उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ेगी। इसलिए उनको पद भार संभालते ही तेज गति से कार्य करना पड़ेगा। सबसे बड़ी जरूरत होगी जिलों में प्रवास कर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच पहचान बनाना क्योंकि इस पैमाने पर वे श्री शर्मा से काफ़ी पीछे हैं। यद्यपि पार्टी का प्रादेशिक और राष्ट्रीय नेतृत्व श्री खंडेलवाल से भली - भाँति परिचित है। उनके स्वर्गीय पिता भी चूंकि बैतूल से सांसद रहे थे अतः उनकी विरासत का लाभ भी उनके साथ है। उस दृष्टि से भाजपा में श्री शर्मा नये - नये थे। अभाविप के बड़े नेताओं में वे शामिल जरूर थे किंतु शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गज के सामने स्वयं को स्थापित करना आसान नहीं था किंतु खजुराहो के सांसद बनने के साथ ही प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभाई।  सौभाग्य से म.प्र में  भाजपा की जड़ें अब गाँव - गाँव तक फैल चुकी हैं। जनसंघ के जमाने से ही यहाँ हिंदुत्व की विचारधारा का प्रभाव रहा है। इसीलिए अन्य प्रांतों के नेता यहां से लोकसभा चुनाव जीते। जगन्नाथ राव जोशी, डॉ. वसंत राव पंडित और सुषमा स्वराज  इसके उदाहरण हैं। अटल  बिहारी वाजपेयी  यहाँ से लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के लिए निर्वाचित हुए। लालकृष्ण आडवाणी और भैरोसिंह शेखावत भी म.प्र के कोटे से  राज्यसभा भेजे जाते रहे। भाजपा का गढ़ बन चुके इस प्रदेश में पार्टी का अध्यक्ष बनना सतही तौर पर तो बड़ा आसान लगता है किंतु वास्तव में ऐसा है नहीं क्योंकि शिखर पर पहुंचने के बाद उस पर बने रहना कठिन होता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी  झटका खा चुकी है। नये अध्यक्ष के सामने चुनौती ये भी है कि स्व. कुशाभाऊ ठाकरे के सामने  युवा नेताओं की जो श्रृंखला तैयार हो चुकी थी वह अब 65 और 70 वर्ष के दायरे में आ गई है। इसलिए श्री खंडेलवाल को नई पीढी में से क्षमतावान नेतृत्व तैयार  करने की  दिशा में विशेष प्रयास करने होंगे। ये अच्छा  है कि मुख्यमंत्री से उनका अच्छा समन्वय है। चूंकि वे सादगी के लिए जाने जाते हैं इसलिए साधारण कार्यकर्ताओं में जल्द लोकप्रिय हो सकते हैं। गौरतलब है सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष को पार्टी संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय बनाकर काम करना होता है। श्री खंडेलवाल इस कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं वही उनकी सफलता का मापदंड होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 July 2025

भारत के बढ़ते प्रभाव से जिनपिंग बौखला उठे



चीन और चालाकी एक दूसरे के पर्याय हैं। गत दिवस उसने सीमा विवाद सुलझाने के लिए भारत के साथ  नये सिरे से वार्ता की पेशकश की ।  वहीं अब खबर है कि वह पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ मिलकर एक नया क्षेत्रीय संगठन बनाने जा रहा है जो सार्क के समानांतर कार्य करेगा।  सार्क में  8 देश  अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं। पाकिस्तान लंबे समय से चीन को इसकी सदस्यता दिलवाने हेतु प्रयासरत है किंतु उसे सफलता नहीं मिली। ये बात भी सही है कि सार्क में भारत की मौजूदगी काफी प्रभावशाली है जिसकी वजह से पाकिस्तान की हरकतों पर रोक लग जाती है। कूटनीतिक स्तर पर दक्षिण एशियाई राजनीति में भारत के एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित होने से पाकिस्तान और चीन दोनों के पेट में मरोड़ उठता रहता है। हाल ही में  चीन में हुई शंघाई सहयोग संगठन ( एस. सी. ओ.) की बैठक के बाद संयुक्त बयान पर चूंकि भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता रक्षा मंत्री राजनाथ ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था इसलिए वह जारी नहीं हो सका। असल में  चीन ने बयान का जो  प्रारूप तैयार करवाया उसमें पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए नरसंहार का उल्लेख करने की जरूरत तक नहीं समझी गई। लेकिन बलूचिस्तान में  हो रहे आंदोलन को आतंकवादी निरूपित किया गया। साथ ही आतंकवाद संबंधी भारत की चिंताओं और दृष्टिकोण को भी पूरी तरह से उपेक्षित करते हुए पाकिस्तान को खुश करने का प्रयास हुआ। लेकिन रक्षा मंत्री श्री सिंह ने उक्त बयान से असहमति जताते हुए  जो कूटनीतिक बढ़त हासिल की उससे चीन और उसका पिछलग्गू पाकिस्तान बौखला गए।  अपने ही देश में भारत के रक्षा मंत्री द्वारा की गई फजीहत से जिनपिंग बुरी तरह भन्नाए हुए  हैं। इसका प्रमाण मिला उनके द्वारा ब्राज़ील में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन में न जाने के फैसले से। उनका विरोध  इस बात पर है कि सम्मेलन के बाद ब्राजील के राष्ट्रपति द्वारा श्री मोदी के सम्मान में सरकारी भोज का आयोजन किया है। ब्रिस्क के गठन के बाद ये पहला अवसर होगा जब जिनपिंग उसके सम्मेलन में उपस्थित नहीं रहेंगे। कूटनीतिक जगत  में इस बात की चर्चा है कि उनकी नाराजगी यूँ तो 2020 की गलवान घाटी मुठभेड़ के बाद से जारी है क्योंकि भारत ने लद्दाख़ से  अरुणाचल तक अग्रिम मोर्चों तक जिस तरह की सैन्य तैयारियां कीं उनसे चीनी सेना द्वारा की जाने वाली किसी भी हरकत का उसी की भाषा में जवाब दिया जाने लगा है। इसके अलावा वे  रक्षा उपकरणों के  निर्यात में भारत के बढ़ते कदमों से सहमे हुए हैं। पहलगाम की घटना के बाद भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के नाम से जो सैन्य कारवाई की गई उसने  पाकिस्तान कि जिस रक्षा प्रणाली को छिन्न - भिन्न किया वह चूंकि चीन द्वारा दी गई थी इसलिए उसे शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। भारतीय मिसाइलें पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों  के अड्डों सहित अनेक सैन्य प्रतिष्ठानों और हवाई अड्डों तक बेरोकटोक पहुँच गईं जबकि चीन में बनीं   पाकिस्तान की मिसाइलें और ड्रोन भारत की रक्षा प्रणाली द्वारा हवा में ही नष्ट कर दिये गए। उस  ऑपरेशन के बाद भारत में बनी सैन्य सामग्री की मांग  वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ी  है। चीन से परेशान दक्षिण एशिया के तमाम छोटे - छोटे देशों द्वारा भारत के साथ रक्षा उपकरणों के सौदों से जिनपिंग बौखलाए हुए हैं। सार्क चूंकि उनके दबदबे को स्वीकार करने राजी नहीं है इसलिए जिनपिंग ने पाकिस्तान और बांग्ला देश के साथ नया क्षेत्रीय संगठन बनाने का दाँव चला। लेकिन वे भूल रहे हैं कि चीन की धौंस  से उसके पड़ोसी तो त्रस्त हैं ही पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में भी उसकी चालबाजी के प्रति लोग चौकन्ने हैं। उल्लेखनीय है  तालिबान द्वारा अमेरिका के विरुद्ध जंग  में चीन ने तालिबान की काफी मदद की किंतु सत्ता में आने के बाद वे भारत के साथ अच्छे रिश्ते बना रहे हैं ।  निकट भविष्य में चीन की नई - नई हरकतें देखने मिल सकती हैं क्योंकि अब वह भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानकर चलने लगा है। नीतिशास्त्र का ये कथन इस बारे में प्रासंगिक है कि जिसकी शक्ति बढ़ती है उसके शत्रु बढ़ते हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी