Saturday, 16 August 2025

रूस कब्जा छोड़ने वाला नहीं




सही बात ये है कि यूक्रेन का जो हिस्सा रूस ने कब्जा लिया उसे तो वह लौटाने वाला नहीं क्योंकि उसको यूरोप के साथ व्यापार करने के लिए जो समुद्री मार्ग चाहिए उस तक पहुँच यूक्रेन से ही संभव है। इसलिये चाहे ट्रम्प जोर लगा लें या जिनपिंग, रूस जहाँ तक बढ़ चुका उससे पीछे हटने वाला नहीं है। पुतिन समझ चुके हैं कि अमेरिका इस लड़ाई से पीछा छुड़ाने के लिए बेचैन है क्योंकि इजरायल और हमास के बीच की लड़ाई ही उसके लिए बोझ बनने लगी है। वहीं यूरोप में इतनी दम नहीं कि वह लंबे समय तक जेलेंस्की की अंतहीन जरूरतें पूरी कर सके। ट्रम्प की मुश्किल ये है कि टैरिफ के नाम पर वे जो रायता फैला चुके हैं वही उनसे समेटते नहीं बन रहा। 
विश्व राजनीति में आने वाले महीने काफी उथलपुथल भरे होंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 15 August 2025

घर के भीतर बैठे शत्रुओं को बेनकाब करना जरूरी


आजादी का पर्व प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव की अनुभूति का अवसर है , चाहे वह देश में रहता हो या दुनिया के किसी अन्य हिस्से में। इसलिये इसकी रक्षा करना भी हम सभी का परम कर्तव्य है। स्वाधीनता अर्जित किये लगभग आठ दशक होने जा  रहे हैं। इस दौरान अनगिनत कठिनाइयों से गुजरकर भारत ने विश्व में अपना सम्मानजनक स्थान बनाया तो उसके पीछे प्रत्येक देशवासी का योगदान है फिर चाहे वह किसान , श्रमिक, उद्योगपति - व्यवसायी, स्वरोजगार से जुड़ा छोटा उद्यमी ही क्यों न हो। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों लोगों ने भी देश की विकास यात्रा को गतिशील बनाने में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्म सम्मान का प्रतीक है। वो दिन इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं जब हमें लोगों का पेट भरने के लिए खाद्यान्न आयातित करना पड़ता था। अपनी सुरक्षा के लिए भी हम बड़ी शक्तियों पर आश्रित थे। शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, तकनीक जैसे क्षेत्रों में भारत ने सफलता के नये आकाश छूने का करतब कर दिखाया है। धरती से अंतरिक्ष तक हमारी उपस्थिति से पूरा विश्व प्रभावित है। निश्चित रूप से ये उपलब्धियाँ संतोष का विषय हैं। हमारी अर्थव्यवस्था ने दुनिया में पांचवा स्थान अर्जित कर लिया है और तीसरे स्थान की तरफ तेजी से अग्रसर है। वैश्विक समुदाय के रूप में  भारतवंशी दुनिया के हर हिस्से में  स्थापित हैं। उन्होंने अपनी प्रतिभा और परिश्रम से  अपार सफलता अर्जित कर देश का सम्मान बढ़ाया है। हाल ही में हमें एक बड़े संघर्ष से गुजरना पड़ा। पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में  किये गए ऑपरेशन सिंदूर में हमारी सामरिक क्षमता के प्रदर्शन से पूरा विश्व चमत्कृत रह गया। आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान को भारतीय सेनाओं ने जो सबक सिखाया उससे पूरा देश गौरवान्वित हुआ। ये तभी संभव हो सका जब हम आर्थिक और  सैन्य दृष्टि से मजबूत थे। लेकिन इन सुखद स्थितियों के बावजूद देश में एक वर्ग विशेष अपनी नकारात्मक सोच के साथ निराशा फैलाने में जुटा है। किसी भी उपलब्धि पर संदेह व्यक्त करना इनकी कार्यशैली है । यहाँ तक कि सेना के पराक्रम को भी झुठलाने में इन्हें लज्जा नहीं आती। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का जश्न मनाने और पाकिस्तान को हुए जबरदस्त नुकसान पर  सेना का अभिननंदन करने के बजाय  युद्ध में हुई क्षति का ब्यौरा मांगकर जवानों का मनोबल तोड़ने का प्रयास किया गया। सारी दुनिया जब भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती का गुणगान कर रही है तब व्यक्तिगत खुन्नस और घमण्ड में डूबे अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा उसे मृत बताये जाने का समर्थन करने वाले कुछ लोग देश की प्रतिष्ठा को धूमिल कर अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। जनता द्वारा लगातार ठुकराए जाने के बाद हताशा में डूबा ये वर्ग देश को भीतर से कमजोर कर राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का षडयंत्र रच रहा है। जाहिर है भारत के उत्थान से परेशान विदेशी ताकतें इन कोशिशों को हवा दे रही हैं। चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और संसद जैसे संवैधानिक संस्थानों के प्रति अविश्वास का भाव उत्पन्न कर अराजकता में देश को धकेलने के इस सुनियोजित प्रयास के प्रति प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को सतर्क होकर उसे विफल करने आगे आना चाहिए। सीमा के पार बैठे शत्रु की पहिचान करना कठिन नहीं है किंतु घर के भीतर के दुश्मनों के चेहरों को अनावृत करना आज के दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। भारत की बढ़ती शक्ति से बेचैन वैश्विक शक्तियाँ आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाकर हमें दबाना चाहती हैं। उनके आगे न झुकने का जो साहस देश  ने दिखाया वह हमारे आत्मविश्वास का प्रतीक है। लेकिन इसे बनाये रखने के लिए सब एक आवाज में बोलें ये जरूरी है। राजनीतिक मतभिन्नता अपनी जगह है किंतु जहाँ बात देश के सम्मान और हितों की हो तब सारे मतभेद भुलाना ही राष्ट्रभक्ति है।   ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक ओर जहाँ भारत के सामर्थ्य की सराहना दुनिया भर में हुई वहीं कुछ बड़े देश ईर्ष्या से भर उठे और अनुचित दबाव डालकर हमारे मनोबल को तोड़ना चाहते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें अपने देश के ही कुछ तत्व प्रोत्साहित कर रहे हैं जिन्हें सिवाय अपने स्वार्थ के और कुछ नहीं दिखता। आज स्वाधीनता दिवस पर कुछ वक्त निकालकर देश के वर्तमान और भविष्य के बारे में भी चिंतन - मनन करें। सीमा के उस पार बैठे दुश्मन से तो  हमारी सेना हर तरह से निपटने में सक्षम है लेकिन घर के भीतर बैठकर देश को कमजोर करने वाली ताकतों के हौसले धवस्त करने का दायित्व हम सबका है। स्वाधीनता दिवस पर इसका संकल्प लीजिये क्योंकि ये देश हमारा सबका है।

स्वाधीनता दिवस की अनंत शुभकामनाएँ। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 August 2025

चुनाव आयोग के विरोध का हश्र भी किसान आंदोलन जैसा ही होगा



लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा सरकार की आलोचना स्वाभाविक है। जनहित के मुद्दों पर सत्ता पक्ष को घेरना उसका कर्तव्य भी है। जनता का विश्वास जीतने के लिए उसका संघर्षशील होना जरूरी होता है। दरअसल  आक्रामकता ही  उसके जीवंत होने का प्रमाण  है। लेकिन विरोध में प्रामाणिकता होनी चाहिए अन्यथा वह जनता का विश्वास खो बैठता है। दुर्भाग्य से भारत का मौजूदा विपक्ष भी इसी संकट से गुजर रहा है। नरेंद्र मोदी  को सत्ता में आये 11 साल हो चुके हैं। पहला चुनाव तो वे डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के विरुद्ध  सत्ता विरोधी रुझान के बल  पर जीते। लेकिन 2019 में उनकी जीत उनके अपने कार्यों के कारण हुई। पिछले चुनाव में जरूर मोदी सरकार स्पष्ट बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई और उसे बाहरी समर्थन से सरकार बनानी पड़ी किंतु ये भी सही है कि जनादेश इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन के पास भी नहीं था। रही बात कांग्रेस की तो भले ही उसकी सीटें बढ़कर दोगुनी हो गईं और लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा पाकर राहुल गाँधी नेता प्रतिपक्ष बन सके किंतु ये भी उतना ही सही है कि 1984 के बाद कांग्रेस को किसी भी चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका।  2024 में उसी के नेतृत्व में  इंडिया गठबंधन बना किंतु उसने भी राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया। लोकसभा चुनाव के बाद उनका कद जाहिर तौर पर ऊंचा हुआ किंतु उसके बाद हुए जम्मू -  कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस के लचर प्रदर्शन से विपक्षी गठबंधन के घटक दल भी श्री गाँधी से छिटकने लगे। इसका कारण उनका अपरिपक्व व्यवहार और हठधर्मी स्वभाव ही है। हालांकि इंडिया गठबंधन नाम के लिए तो जिंदा है लेकिन उसकी एकता और वजनदारी शुरुआती दौर जैसी नहीं रही। हरियाणा के बाद जब महाराष्ट्र में भी भाजपा ने जोरदार सफलता हासिल की तो गठबंधन में उनके प्रति अविश्वास और बढ़ गया ।  दिल्ली के चुनाव में तो इंडिया गठबंधन के दल ही एक दूसरे के विरुद्ध खड़े नजर आये। वहाँ भी भाजपा ने शानदार जीत हासिल करते हुए अजेय मान लिए गए अरविंद केजरीवाल की हेकड़ी निकाल दी। लेकिन खुद मैदान में उतरने के बाद भी राहुल कांग्रेस को लगातार तीसरे शून्य की शर्मनाक स्थिति से उबार नहीं पाए। जब उन्हें लगा कि उनकी चुनाव जिताऊ क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं तब उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में मतदाता सूची में गड़बड़ी का मुद्दा छेड़कर भाजपा पर चुनाव चुराने का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग पर चढाई कर दी। धीरे - धीरे वे यहाँ तक बोलने लग गए कि लोकसभा चुनाव में 20 - 25 सीटें कम होती तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। परोक्ष रूप से उनका आशय उतनी सीटों में की गई गड़बड़ी को लेकर था। आश्चर्य की बात ये आरोप उन्होंने एक साल  बाद  लगाया। ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि हरियाणा और  महाराष्ट्र में भाजपा हार जाती तब भी क्या श्री गाँधी लोकसभा चुनाव पर  इस तरह की शंका व्यक्त करते ? इसी बीच चुनाव आयोग द्वारा बिहार में मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण का काम शुरू किया जिससे कांग्रेस के साथ ही लालू प्रसाद यादव की राजद में तो खलबली मची ही प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी घबरा उठीं क्योंकि चुनाव आयोग ने बिहार के बाद उनके राज्य की मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण का ऐलान कर दिया। इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं लगीं किंतु न्यायालय ने उन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। आयोग द्वारा जिन 11 दस्तावेजों में से किसी को भी मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के लिए आवश्यक बताया उनको दी गई चुनौती भी बेअसर रही है। गत दिवस न्यायालय ने यहाँ तक कह दिया कि पुनरीक्षण मतदाताओं के हित में है और समय - समय पर होते भी  रहना चाहिए। उल्लेखनीय है आयोग पूरे देश में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की बात कह चुका है जिसका उद्देश्य फर्जी तरीके से मतदाता बन गए  विदेशी नागरिकों को सूची से बाहर करना है। राहुल  सूचियों में गड़बड़ी के जितने प्रमाण ला रहे हैं उनके सत्यापन की जिम्मेदारी लेने के बजाय उल्टे चुनाव आयोग को खलनायक साबित करने की चाल चल रहे हैं जो उन्हीं के गले का फंदा बनती जा रही है। रायबरेली और वायनाड के अलावा सोनिया गाँधी के भारतीय नागरिक बनने से पहले ही मतदाता बन जाने का मुद्दा भी उछल गया है। ये सब देखते हुए लगता है मतदाता सूचियों में गड़बड़ी को लेकर शुरु किया गया विपक्षी आंदोलन भी कृषि कानूनों के विरुद्ध चले लम्बे किसान आंदोलन जैसा ही बेनतीजा  समाप्त हो जाएगा। चुनाव आयोग द्वारा श्री गाँधी के प्रत्येक आरोप का समुचित जवाब दिये जाने के बाद उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा। बिहार में मतदाता सूचियों का  प्रारूप प्रकाशित कर लोगों से आपत्तियाँ आमंत्रित की गईं किंतु 65 लाख नाम काटे जाने के बावजूद 65 हजार आपतियाँ तक नहीं आईं।  ऐसे में  बड़ी बात  नहीं किसान आंदोलन के बाद जो स्थिति राकेश टिकैत की हुई वैसी ही राहुल गाँधी की भी हो जाए।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 13 August 2025

पुतिन कोई जेलेंस्की नहीं जिन्हें ट्रम्प दबा सकें



सारी दुनिया की निगाहें दो दिन बाद अमेरिका और रूस के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प और व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली शिखर वार्ता पर लगी हुई हैं जिसका मकसद रूस और यूक्रेन के बीच 2022 से  चल रहे युद्ध को बंद करवाना है। हालांकि इस युद्ध की शुरुआत तो 2014 से मानी जाती है जब रूस ने यूक्रेन के महत्वपूर्ण बंदरगाह क्रीमिया पर जबरन कब्जा कर लिया जो व्यापारिक और रणनीतिक दृष्टि से  उसके लिए उपयोगी है किंतु 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर पूरी तरह से हमला करते हुए उसके बड़े इलाके कब्जा लिए। आज की स्थिति में उसके 20 प्रतिशत भूभाग पर वह काबिज है। यूरोप को गैस आपूर्ति हेतु डाली गई पाइप लाइन का  किराया और  बंदरगाहों के उपयोग सहित अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर पुतिन चाहते हैं कि यूक्रेन रूस की मर्जी से चले। लेकिन जब जेलेंस्की सत्ता में आये तब उन्होंने  अमेरिका के संरक्षण वाले नाटो से जुड़ने का निर्णय लिया। जो उनकी मुसीबत का कारण बन गया। पुतिन को ये कतई मंजूर नहीं है कि अमेरिका और उसके समर्थक देशों की सेनाओं की उपस्थिति उसकी सीमाओं के नजदीक हो। इसलिये नाटो की सदस्यता मिलने के पहले ही रूस द्वारा हमला शुरू कर दिये जाने से अन्य देशों की सेनाएं  मदद हेतु तो नहीं आ सकीं किंतु अमेरिका और लगभग सभी प्रमुख यूरोपीय देशों ने धन और युद्ध सामग्री द्वारा  यूक्रेन को जमकर सहायता देने के साथ ही रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। यद्यपि पुतिन लगातार आक्रमण करते आ रहे हैं लेकिन  बाहर से मिल रहे  साजो - सामान और आर्थिक मदद के बल पर बर्बादी के कगार पर पहुंचकर भी यूक्रेन लड़ाई में बना  हुआ  है । जंग  लम्बे समय तक जारी रहने पर ये आशंका व्यक्त की जाने लगी कि  रूस भी यूक्रेन में वैसे ही उलझकर रह गया  जैसे साठ के दशक में अमेरिका वियतनाम में फंस गया था। लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों के जरिये रूस को अलग - थलग करने की अमेरिकी रणनीति शुरुआत में तो असर दिखाती दिखी किंतु जल्द ही उसका विपरीत प्रभाव होने से  पूरे यूरोप में गैस और अनाज का संकट छा गया। दूसरी तरफ रूस ने चीन और भारत  के रूप में दो बड़े ग्राहकों की मदद से अपना व्यापार बचाए रखा और लड़ाई को लंबा खींचते हुए अमेरिका को ही ऐसे जाल में फंसा दिया जिससे निकलने के लिए ट्रम्प छटपटा रहे हैं। जनवरी में पदभार संभालने के बाद वे पुतिन से दोस्ती का गाना गाते रहे और जेलेंस्की को वाशिंगटन बुलाकर युद्ध रोकने का दबाव बनाया। लेकिन नहीं मानने पर उन्हें बुरी तरह अपमानित करते हुए बाहर निकल जाने कहा। उसके बाद से अमेरिका इस लड़ाई से खुद को दूर करने में जुट गया जिससे यूरोपीय देश भी नाराज हो उठे क्योंकि इकतरफा युद्धविराम पुतिन की विस्तारवादी सोच को बढ़ावा देगा जो पड़ोसी देशों की जमीन हथियाने का इरादा जता चुके हैं। इस बीच अपने व्यापार घाटे की पूर्ति के लिए ट्रम्प ने अनेक देशों पर अनाप - शनाप टैरिफ थोपना शुरू कर दिया जिनमें चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका भी हैं जो रूस के साथ ब्रिक्स नामक संगठन के सदस्य हैं। इन सभी ने मिलकर अमेरिका के विरुद्ध जो मोर्चेबंदी की उससे ट्रम्प भी भीतर तक हिल गए। अमेरिका के अंदरूनी हालात दिन ब दिन खराब हो रहे हैं। ट्रम्प का विरोध बढ़ता जा रहा है। उनकी टैरिफ नीति को अर्थशास्त्रियों द्वारा विनाशकारी बताया जाने लगा है। यूरोप भी उसकी छाया से निकलने छटपटा रहा है। ये सब देखते हुए ट्रम्प ने पुतिन से मिलकर शांतिदूत बनने का दाँव चला। वैसे भी उन पर शांति का नोबल पुरस्कार हासिल करने का भूत सवार है परंतु पुतिन उनकी तुलना में ज्यादा गंभीर और ठोस इरादे वाले हैं। उनकी शर्त है यूक्रेन के जिन प्रांतों पर रूस का कब्जा है वे उसे मिल जाएं । उल्लेखनीय है इन क्षेत्रों में अपार खनिज संपदा है जिस पर अमेरिका की लार भी टपक रही है । दूसरी शर्त यूक्रेन को नाटो में शामिल होने का इरादा त्यागने की है। इनके अतिरिक्त भी अन्य बातें हैं लेकिन रूस यूरोप तक अपने व्यापार की पहुँच आसान बनाने हेतु यूक्रेन से हर तरह की छूट चाहेगा। उधर जेलेंस्की का कहना है कि यूक्रेन के भविष्य का फैसला करने वाली बैठक में उनको नहीं बुलाना आपत्तिजनक है।  ऐसे में यदि ट्रम्प वाहवाही लूटने के लिए पुतिन की शर्तों पर युद्ध रुकवाने तैयार होते हैं तब यूक्रेन ही नहीं बल्कि यूरोप भी इसे स्वीकार करेगा इसमें संदेह है। कुल मिलाकर दुनिया भर में निंदा और उपहास का पात्र बन चुके ट्रम्प अपनी स्थिति सुधारने के लिए पुतिन से मिलने जा रहे हैं किंतु इस मुलाकात से ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए क्योंकि पुतिन कोई जेलेंस्की नहीं जिन्हें वे  दबा सकें। उनके साथ ब्रिक्स देश मुस्तैदी से खड़े हैं जबकि ट्रम्प का साथ  अमेरिका के परंपरागत साथी देश तक छोड़ते जा रहे हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 August 2025

आवारा पशु केवल दिल्ली नहीं पूरे देश की समस्या हैं


सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर आवारा कुत्तों को पकड़कर उनके लिए बनाये आश्रय स्थल पर रखने की व्यवस्था करे। इसमें  व्यवधान डालने वालों पर कड़ी कारवाई की जाएगी। अदालत की नाराजगी इस बात को लेकर है कि सार्वजनिक स्थलों पर आवारा कुत्तों की मौजूदगी लोगों की असुविधा के साथ ही सुरक्षा के लिए खतरा बनती है। उनके काटने से अनेक लोगों की मृत्यु भी हो चुकी है जिन्हें वापस नहीं लाया जा सकता। न्यायालय ने राजधानी के सभी स्थानीय निकायों को समन्वय बनाकर आवारा कुत्तों को पकड़ने  कहा है। उल्लेखनीय है दिल्ली में  6 लाख आवारा कुत्ते हैं। जिन्हें रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। यदि उनकी नसबन्दी करें तो भी एक वर्ष में 75 फीसदी कुत्तों का ही बंध्याकरण संभव होगा। न्यायालय के फैसले को पूर्व केन्द्रीय मंत्री मेनका गाँधी ने अव्यावहारिक, महंगा और पर्यावरण के लिए हानिकारक बताते हुए कहा कि सरकर के पास न तो पर्याप्त आश्रय स्थल हैं और न ही नसबंदी के समुचित प्रबंध। पशुओं के संरक्षण हेतु सक्रिय मेनका के अनुसार  आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाये जाने के बाद बंदरों का आतंक शहरी इलाकों में बढ़ जाएगा।  मोटे अनुमान के अनुसार सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर कर आश्रय स्थल में रखे जाने के लिए दिल्ली सरकार पर सालाना 10 हजार करोड़ रु. का आर्थिक बोझ आएगा जिसकी व्यवस्था मुश्किल  है। और फिर ये समस्या चूंकि पूरे देश की है इसलिये सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले के परिप्रेक्ष्य में राज्यों के उच्च न्यायालय भी ऐसा ही आदेश पारित कर दें तब आवारा कुत्तों की व्यवस्था के लिए कितना खर्च आयेगा इसका अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन ये भी देखना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय को आखिर इतना कड़ा फैसला लेना क्यों पड़ा? आवारा कुत्तों की समस्या केवल दिल्ली में नहीं बल्कि   देश के हर शहर, कस्बे और गाँव में है। अनेक राज्य जहाँ गोवंश के वध पर कानूनी रोक लगा दी गई वहाँ सड़कों पर मंडराती गायें यातायात को बाधित करने के साथ ही गंदगी फैलाती हैं। बीते कुछ वर्षों में राजमार्गों का जाल बिछ गया है। इन पर तेजगति से वाहन दौड़ते हैं। लेकिन गायों के झुंड  जगह - जगह बैठे होने से वाहन चालकों को भारी परेशानी होती है जिससे दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। गायों के अलावा इनमें मनुष्य भी मौत के शिकार होते हैं। इस समस्या का भी इलाज नहीं हो पा रहा। जहाँ तक बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली में आवारा कुत्तों को पकड़ने संबंधी आदेश की है तो  मेनका गाँधी ने उसके लागू होने में जो अड़चनें बताईं वे अपनी जगह वाजिब हैं किंतु स्वतः संज्ञान लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत ने जो आदेश दिया उसकी अंतर्निहित भावना को भी समझा जाना चाहिए क्योंकि केवल आवारा कुत्ते और गायें ही नहीं बल्कि बन्दर भी शहरी क्षेत्रों में लोगों की परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। इन्हें पकड़ने की सारी सरकारी व्यवस्थाएं विफल साबित हो चुकी हैं। बढ़ते नगरीय क्षेत्रों के कारण जंगल सिमटने से भी भोजन की तलाश में शहरों में बन्दरों की धमाचौकड़ी बढ़ती जा रही है। गाय - भैंस पालने वाले पहले अपने पशुओं को चरने शहर के बाहर के घास युक्त मैदानों में भेजते थे किंतु  वहाँ कांक्रीट के ढांचे खड़े होते जा रहे हैं। ऐसे में पर्यावरण और प्रदूषण की जिस समस्या से मनुष्यों को जूझना पड़ रहा है वह पशुओं के लिए भी उतनी ही तकलीफदेह है। कुल मिलाकर इस समस्या का हल कानून की सख्ती और प्रशासन की चुस्ती से तब तक नहीं हो सकता जब तक समाज इस बारे में स्वेच्छा से आगे न आये। गोवंश के वध पर रोक लगाए जाने के बाद राज्य सरकारें  गोशाला संचालकों को जो अनुदान देती है उतने में उनका भरण - पोषण संभव नहीं है। इसीलिए वहाँ उनकी दशा बेहद खराब हो जाती है और मरने की शिकायतें भी आम हैं। आवारा कुत्तों के अलावा पालतू कुत्तों के मालिक भी सुबह शाम उन्होंने घर के बाहर ले जाते हैं जहाँ वे मल - मूत्र त्यागकर गंदगी फैलाते हैं जबकि विकसित देशों में कुत्ते के मालिक को वह गंदगी साफ करनी होती है। ऐसे में जरूरी है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो आदेश दिल्ली के संदर्भ में दिया गया उस पर सभी राज्य सरकारों को विचार करना चाहिए क्योंकि आवारा पशुओं की समस्या राष्ट्रव्यापी हो चुकी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 11 August 2025

पवार ने राहुल के लिए मुसीबत खड़ी कर दी



    शरद पवार देश के सबसे वरिष्ट राजनेता हैं। कांग्रेस से अपना सफर प्रारंभ करने के बाद अपने गुरु वसंत दादा पाटिल की सरकार गिराकर वे महाराष्ट्र के  मुख्यमंत्री बने। सत्ता के लिए उन्होंने कब किसका साथ पकड़ा और किसका छोड़ा इस पर किताबें लिखी जा सकती है। कांग्रेस में दोबारा लौटने के बाद श्री पवार ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा करते हुए  राकांपा (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) बना डाली। लेकिन कुछ वर्षों बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन कर उसी गाँधी परिवार के सलाहकार बन बैठे जिसकी गाड़ी को पटरी से उतारने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी।  वर्तमान में वे विपक्षी गठबंधन इंडिया के दिग्गजों में  हैं। शिवसेना को कांग्रेस की गोद में बिठाने जैसा असंभव कार्य उन्हीं के कारण संभव हो सका। हालांकि इसमें उनकी पार्टी भी टूटी और शिवसेना भी दोफाड़ हो गई जिसके कारण महाविकास अघाड़ी  सरकार गिर गई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिलने से भाजपा और शिवसेना ( शिंदे)  सरकार  पर खतरा मंडराने लगा और विधानसभा चुनाव में अघाढ़ी की वापसी की अटकलें लगने लगीं। लोकसभा चुनाव के  बाद  वैसे भी विपक्ष का हौसला काफी मजबूत था। लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो भाजपा ने अपनी सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) और राकांपा ( अजीत) के साथ मिलकर विपक्ष को चारों खाने चित्त कर दिया। हालांकि हरियाणा में भी भाजपा तीसरी बार सरकार बनाकर लोकसभा चुनाव के झटके से उबर चुकी थी किंतु महाराष्ट्र की हार राहुल गाँधी हजम नहीं कर सके जिसके कारण इंडिया गठबंधन की अन्य पार्टियों में कांग्रेस से दूरी बनाने की भावना जाग उठी। इसका प्रमाण दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखने मिला जब सपा और तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए आम आदमी पार्टी के पक्ष में प्रचार किया। हालांकि विपक्षी एकता का गुब्बारा हरियाणा चुनाव में ही फुट चुका था किंतु दिल्ली में बिखराव खुलकर सामने आ गया। यहाँ भी हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे दोहराए गए। इसी के बाद से श्री गाँधी ने चुनाव आयोग को निशाना बनाना शुरू किया।  लेकिन विगत दिवस शरद पवार ने भी ये कहते हुए धमाका किया कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के पूर्व दो व्यक्तियों ने उन्हें 160 सीटें जिताने की गारंटी दी जिन्हें वे राहुल के पास ले गए जिन्होंने ऐसे लोगों से बचने की सलाह दी इसलिये उनके नाम और संपर्क सूत्र उनके पास नहीं है। एक साल बाद इतनी महत्वपूर्ण बात को उजागर करने के पीछे उनका मकसद चुनावों में धांधली के आरोप का समर्थन करना ही है। लेकिन कहावत है होशियार कौआ भी कभी - कभी गलत जगह बैठ जाता है।और श्री पवार भी वही कर बैठे।  उन जैसे अनुभवी  नेता द्वारा उन दोनों व्यक्तियों को श्री गाँधी से  मिलवाने से ये तो साबित हो ही गया कि वे लालच में आ गए थे, वरना  दोनों को पुलिस के हवाले कर देते।  उनके नाम और संपर्क सूत्र पता न होने की बात श्री पवार को संदेह के घेरे में खड़ा करती है। उससे भी बड़ा आश्चर्य  है कि श्री गाँधी ने भी इतनी बड़ी बात को छिपाये रखा। श्री पवार  कोई ऐरे - गैरे व्यक्ति नहीं हैं। उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिये कि वे उन अनजान व्यक्तियों को श्री गाँधी के पास क्या सोचकर ले गए थे? इसी तरह की जवाबदेही श्री गाँधी की भी बनती है क्योंकि भले ही   उन्होंने उन व्यक्तियों के प्रस्ताव में रुचि नहीं ली हो किंतु उनको सीधे - सीधे चले जाने देना भी कई आशंकाओं को जन्म देता है। पवार साहब ने इतनी गम्भीर बात तब क्यों नहीं उजागर की और एक साल बाद उन्हें ऐसा करने की जरूरत क्यों महसूस हुई ये पड़ताल का विषय है। चुनाव धांधली पर आसमान सिर पर उठाये घूमने वाले राहुल के लिए भी  नई मुसीबत खड़ी हो गई। यदि वे उस मुलाकात का खंडन करते हैं तो श्री पवार झूठे कहलाएंगे और स्वीकार करने पर  चुनावी धांधली करने वालों की पहिचान छिपाने  के कसूरवार होंगे। इस प्रकार  श्री पवार के खुलासे ने श्री गाँधी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जिसमें न उगलते बनेगा और न निगलते।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 August 2025

भारत की अगुआई में ब्रिक्स देशों की मोर्चेबंदी से डॉलर का दबदबा खतरे में


डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी इतिहास के सबसे असफल राष्ट्रपति साबित होने जा रहे हैं। दूसरी बार  चुनाव जीतने पर उन्हें ये गुमान हो गया मानों वे दुनिया के भाग्यविधाता बन गए हों। उन्होंने जिस तरह के तेवर दिखाना शुरू किये उनसे अन्य देश ही नहीं बल्कि पड़ोस के वे राष्ट्र भी चौंक गए जिनसे अमेरिका के रिश्ते बेहद करीबी रहे। यूरोप के तमाम देशों को भी उन्होंने दुत्कारना शुरू कर दिया जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही अमेरिकी कैम्प में रहे। सोवियत संघ के विघटन के बाद लगभग सभी यूरोपीय देश अमेरिका के प्रभावक्षेत्र में आ गए। अरब जगत में भी  कुछ कट्टरपंथी देशों के अलावा बाकी ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमेरिका के साथ दोस्ताना कायम कर लिया। यही हाल अफ्रीका और दक्षिण एशिया का भी कहा जा सकता है। ट्रम्प ने दूसरी बार सत्ता ग्रहण करने के बाद अपने मित्रों के साथ भी शत्रुओं जैसा व्यवहार शुरू कर दिया और इसके लिए व्यापार को हथियार बना लिया। मसलन जिन देशों से अमेरिका के व्यापारिक रिश्ते हैं उनसे आयात होने वाले सामान पर टैरिफ में कई गुना वृद्धि कर देना। कुछ देश टैरिफ रूपी आतंकवाद से डरकर उनके सामने नतमस्तक हो गए जिनको अमेरिका ने कुछ रियायतें देकर उपकृत किया। लेकिन चीन, भारत, ब्राज़ील, द. अफ्रीका सहित दर्जन भर देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए झुकने से इंकार कर दिया। तब ट्रम्प ने  अनाप - शनाप आयात शुल्क थोपकर उन्हें  दबाना चाहा। चीन ने जब अमेरिका की कमजोर नस पर हाथ रखा तो उस पर लादे गए टैरिफ कुछ घटा दिये गए ।  लेकिन उनकी सबसे ज्यादा नाराजगी भारत और ब्राजील पर  बरस रही है जिन्होंने  ट्रम्प को ये एहसास  करवा दिया कि आपसी व्यापार की जरूरत  अमेरिका को  भी उतनी ही है। इसलिये टैरिफ में  इकतरफा अनाप - शनाप वृद्धि अनुचित है। ट्रम्प को इस प्रतिक्रिया ने आगबबूला कर दिया और उन्होंने दोनों पर पहले 25 और फिर 50 फीसदी आयात शुल्क  लाद दिया। ब्राज़ील ने तो पहले दिन से ही ट्रम्प के विरुद्ध मुहिम छेड़ रखी थी किंतु अब भारत ने चार कदम आगे बढ़कर ट्रम्प की मनमानी को चुनौती दी डाली। किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों के विरुद्ध कोई समझौता नहीं करने का ऐलान करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन में शंघाई सहयोग परिषद की बैठक में शामिल होने की घोषणा कर अमेरिका को चौंकाया और इसी बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को मॉस्को भेजकर  रूस के राष्ट्रपति पुतिन को भारत आने राजी कर लिया। उल्लेखनीय है ट्रम्प की भारत से नाराजगी का कारण रूस से कच्चा तेल और रक्षा उपकरण खरीदना है। उन्होंने रूस से व्यापारिक और सामरिक सौदे रोकने का दबाव बनाया किंतु भारत के इंकार से नाराज होकर टैरिफ की दरें 50 प्रतिशत तक  बढ़ा दीं। उन्हें  उम्मीद  थी कि भारत उनकी शर्तों को स्वीकार कर लेगा। लेकिन उसने रूस से खरीदी रोकने की बजाय अमेरिका से होने वाले रक्षा सौदों को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया जो ट्रम्प के लिए यह किसी  तमाचे  से कम नहीं है। एयर इंडिया के स्वामित्व वाले टाटा समूह द्वारा अमेरिका से बोइंग यात्री विमानों का जो सौदा हुआ वह भी रद्द करने के संकेत दे दिये गए हैं। दूसरी तरफ रूस से रक्षा उपकरणों की खरीद और बढ़ाई जा रही है। इससे स्पष्ट हो गया कि श्री डोभाल की रूस यात्रा केवल ट्रम्प को चिढ़ाने के लिए न होकर कूटनीति और व्यापार का बेहतरीन मिश्रण थी।  पुतिन द्वारा जल्द ही भारत आने की सहमति भी ट्रम्प को ये एहसास करवाने की कोशिश है कि अमेरिकी चौधराहट के दिन लद गए हैं। श्री मोदी के चीन जाने के फैसले से अमेरिका की चिंता और बढ़ गई।  ट्रम्प की नींद ये सुनकर भी उड़ रही है कि ब्रिक्स देश डॉलर के मुकाबले  नई साझा मुद्रा प्रारंभ करने जा रहे हैं। इस संगठन से जुड़े ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और द. अफ्रीका विश्व की 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था संचालित करते हैं इसलिए यदि उन्होंने यूरो जैसी  मुद्रा प्रारम्भ की तो डॉलर का रौब - रुतबा खत्म होने को आ जायेगा। ट्रम्प के टैरिफ हमले से हलाकान गैर ब्रिक्स देश भी मौका मिलते ही डॉलर के चंगुल से निकलकर उस नई मुद्रा में लेनदेन करने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। इस प्रकार श्री मोदी ने राहुल गाँधी के उकसावे में आकर ट्रम्प के विरुद्घ एक शब्द कहे बिना उनकी हेकड़ी निकालने की जो रणनीति बनाई उसके कारण अब अनेक छोटे - छोटे देश तक ट्रम्प की धौंस का जवाब उन्हीं की शैली में देने का दुस्साहस कर रहे हैं। इस लिहाज से आने वाले कुछ महीनों के दौरान विश्व राजनीति में बड़ा उलट - पलट देखने मिलेगा। ब्रिक्स देशों की मोर्चेबन्दी में भारत की व्यूह रचना सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और नरेंद्र मोदी एक बार फिर विश्वस्तर पर सबसे कुशल राजनेता साबित होने जा रहे हैं। ट्रम्प द्वारा डाले जा रहे दबाव के जवाब में डॉलर की चमक और धमक कम कर देने का दाँव सोवियत संघ के बिखराव के बाद विश्व राजनीति की सबसे बड़ी घटना होगी जिसका सेहरा भी श्री मोदी के सिर बंधेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी