Saturday, 16 August 2025
रूस कब्जा छोड़ने वाला नहीं
Friday, 15 August 2025
घर के भीतर बैठे शत्रुओं को बेनकाब करना जरूरी
आजादी का पर्व प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव की अनुभूति का अवसर है , चाहे वह देश में रहता हो या दुनिया के किसी अन्य हिस्से में। इसलिये इसकी रक्षा करना भी हम सभी का परम कर्तव्य है। स्वाधीनता अर्जित किये लगभग आठ दशक होने जा रहे हैं। इस दौरान अनगिनत कठिनाइयों से गुजरकर भारत ने विश्व में अपना सम्मानजनक स्थान बनाया तो उसके पीछे प्रत्येक देशवासी का योगदान है फिर चाहे वह किसान , श्रमिक, उद्योगपति - व्यवसायी, स्वरोजगार से जुड़ा छोटा उद्यमी ही क्यों न हो। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों लोगों ने भी देश की विकास यात्रा को गतिशील बनाने में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्म सम्मान का प्रतीक है। वो दिन इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं जब हमें लोगों का पेट भरने के लिए खाद्यान्न आयातित करना पड़ता था। अपनी सुरक्षा के लिए भी हम बड़ी शक्तियों पर आश्रित थे। शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, तकनीक जैसे क्षेत्रों में भारत ने सफलता के नये आकाश छूने का करतब कर दिखाया है। धरती से अंतरिक्ष तक हमारी उपस्थिति से पूरा विश्व प्रभावित है। निश्चित रूप से ये उपलब्धियाँ संतोष का विषय हैं। हमारी अर्थव्यवस्था ने दुनिया में पांचवा स्थान अर्जित कर लिया है और तीसरे स्थान की तरफ तेजी से अग्रसर है। वैश्विक समुदाय के रूप में भारतवंशी दुनिया के हर हिस्से में स्थापित हैं। उन्होंने अपनी प्रतिभा और परिश्रम से अपार सफलता अर्जित कर देश का सम्मान बढ़ाया है। हाल ही में हमें एक बड़े संघर्ष से गुजरना पड़ा। पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में किये गए ऑपरेशन सिंदूर में हमारी सामरिक क्षमता के प्रदर्शन से पूरा विश्व चमत्कृत रह गया। आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान को भारतीय सेनाओं ने जो सबक सिखाया उससे पूरा देश गौरवान्वित हुआ। ये तभी संभव हो सका जब हम आर्थिक और सैन्य दृष्टि से मजबूत थे। लेकिन इन सुखद स्थितियों के बावजूद देश में एक वर्ग विशेष अपनी नकारात्मक सोच के साथ निराशा फैलाने में जुटा है। किसी भी उपलब्धि पर संदेह व्यक्त करना इनकी कार्यशैली है । यहाँ तक कि सेना के पराक्रम को भी झुठलाने में इन्हें लज्जा नहीं आती। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का जश्न मनाने और पाकिस्तान को हुए जबरदस्त नुकसान पर सेना का अभिननंदन करने के बजाय युद्ध में हुई क्षति का ब्यौरा मांगकर जवानों का मनोबल तोड़ने का प्रयास किया गया। सारी दुनिया जब भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती का गुणगान कर रही है तब व्यक्तिगत खुन्नस और घमण्ड में डूबे अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा उसे मृत बताये जाने का समर्थन करने वाले कुछ लोग देश की प्रतिष्ठा को धूमिल कर अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। जनता द्वारा लगातार ठुकराए जाने के बाद हताशा में डूबा ये वर्ग देश को भीतर से कमजोर कर राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का षडयंत्र रच रहा है। जाहिर है भारत के उत्थान से परेशान विदेशी ताकतें इन कोशिशों को हवा दे रही हैं। चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और संसद जैसे संवैधानिक संस्थानों के प्रति अविश्वास का भाव उत्पन्न कर अराजकता में देश को धकेलने के इस सुनियोजित प्रयास के प्रति प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को सतर्क होकर उसे विफल करने आगे आना चाहिए। सीमा के पार बैठे शत्रु की पहिचान करना कठिन नहीं है किंतु घर के भीतर के दुश्मनों के चेहरों को अनावृत करना आज के दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। भारत की बढ़ती शक्ति से बेचैन वैश्विक शक्तियाँ आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाकर हमें दबाना चाहती हैं। उनके आगे न झुकने का जो साहस देश ने दिखाया वह हमारे आत्मविश्वास का प्रतीक है। लेकिन इसे बनाये रखने के लिए सब एक आवाज में बोलें ये जरूरी है। राजनीतिक मतभिन्नता अपनी जगह है किंतु जहाँ बात देश के सम्मान और हितों की हो तब सारे मतभेद भुलाना ही राष्ट्रभक्ति है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक ओर जहाँ भारत के सामर्थ्य की सराहना दुनिया भर में हुई वहीं कुछ बड़े देश ईर्ष्या से भर उठे और अनुचित दबाव डालकर हमारे मनोबल को तोड़ना चाहते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें अपने देश के ही कुछ तत्व प्रोत्साहित कर रहे हैं जिन्हें सिवाय अपने स्वार्थ के और कुछ नहीं दिखता। आज स्वाधीनता दिवस पर कुछ वक्त निकालकर देश के वर्तमान और भविष्य के बारे में भी चिंतन - मनन करें। सीमा के उस पार बैठे दुश्मन से तो हमारी सेना हर तरह से निपटने में सक्षम है लेकिन घर के भीतर बैठकर देश को कमजोर करने वाली ताकतों के हौसले धवस्त करने का दायित्व हम सबका है। स्वाधीनता दिवस पर इसका संकल्प लीजिये क्योंकि ये देश हमारा सबका है।
स्वाधीनता दिवस की अनंत शुभकामनाएँ।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 14 August 2025
चुनाव आयोग के विरोध का हश्र भी किसान आंदोलन जैसा ही होगा
Wednesday, 13 August 2025
पुतिन कोई जेलेंस्की नहीं जिन्हें ट्रम्प दबा सकें
Tuesday, 12 August 2025
आवारा पशु केवल दिल्ली नहीं पूरे देश की समस्या हैं
सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर आवारा कुत्तों को पकड़कर उनके लिए बनाये आश्रय स्थल पर रखने की व्यवस्था करे। इसमें व्यवधान डालने वालों पर कड़ी कारवाई की जाएगी। अदालत की नाराजगी इस बात को लेकर है कि सार्वजनिक स्थलों पर आवारा कुत्तों की मौजूदगी लोगों की असुविधा के साथ ही सुरक्षा के लिए खतरा बनती है। उनके काटने से अनेक लोगों की मृत्यु भी हो चुकी है जिन्हें वापस नहीं लाया जा सकता। न्यायालय ने राजधानी के सभी स्थानीय निकायों को समन्वय बनाकर आवारा कुत्तों को पकड़ने कहा है। उल्लेखनीय है दिल्ली में 6 लाख आवारा कुत्ते हैं। जिन्हें रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। यदि उनकी नसबन्दी करें तो भी एक वर्ष में 75 फीसदी कुत्तों का ही बंध्याकरण संभव होगा। न्यायालय के फैसले को पूर्व केन्द्रीय मंत्री मेनका गाँधी ने अव्यावहारिक, महंगा और पर्यावरण के लिए हानिकारक बताते हुए कहा कि सरकर के पास न तो पर्याप्त आश्रय स्थल हैं और न ही नसबंदी के समुचित प्रबंध। पशुओं के संरक्षण हेतु सक्रिय मेनका के अनुसार आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाये जाने के बाद बंदरों का आतंक शहरी इलाकों में बढ़ जाएगा। मोटे अनुमान के अनुसार सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर कर आश्रय स्थल में रखे जाने के लिए दिल्ली सरकार पर सालाना 10 हजार करोड़ रु. का आर्थिक बोझ आएगा जिसकी व्यवस्था मुश्किल है। और फिर ये समस्या चूंकि पूरे देश की है इसलिये सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले के परिप्रेक्ष्य में राज्यों के उच्च न्यायालय भी ऐसा ही आदेश पारित कर दें तब आवारा कुत्तों की व्यवस्था के लिए कितना खर्च आयेगा इसका अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन ये भी देखना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय को आखिर इतना कड़ा फैसला लेना क्यों पड़ा? आवारा कुत्तों की समस्या केवल दिल्ली में नहीं बल्कि देश के हर शहर, कस्बे और गाँव में है। अनेक राज्य जहाँ गोवंश के वध पर कानूनी रोक लगा दी गई वहाँ सड़कों पर मंडराती गायें यातायात को बाधित करने के साथ ही गंदगी फैलाती हैं। बीते कुछ वर्षों में राजमार्गों का जाल बिछ गया है। इन पर तेजगति से वाहन दौड़ते हैं। लेकिन गायों के झुंड जगह - जगह बैठे होने से वाहन चालकों को भारी परेशानी होती है जिससे दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। गायों के अलावा इनमें मनुष्य भी मौत के शिकार होते हैं। इस समस्या का भी इलाज नहीं हो पा रहा। जहाँ तक बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली में आवारा कुत्तों को पकड़ने संबंधी आदेश की है तो मेनका गाँधी ने उसके लागू होने में जो अड़चनें बताईं वे अपनी जगह वाजिब हैं किंतु स्वतः संज्ञान लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत ने जो आदेश दिया उसकी अंतर्निहित भावना को भी समझा जाना चाहिए क्योंकि केवल आवारा कुत्ते और गायें ही नहीं बल्कि बन्दर भी शहरी क्षेत्रों में लोगों की परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। इन्हें पकड़ने की सारी सरकारी व्यवस्थाएं विफल साबित हो चुकी हैं। बढ़ते नगरीय क्षेत्रों के कारण जंगल सिमटने से भी भोजन की तलाश में शहरों में बन्दरों की धमाचौकड़ी बढ़ती जा रही है। गाय - भैंस पालने वाले पहले अपने पशुओं को चरने शहर के बाहर के घास युक्त मैदानों में भेजते थे किंतु वहाँ कांक्रीट के ढांचे खड़े होते जा रहे हैं। ऐसे में पर्यावरण और प्रदूषण की जिस समस्या से मनुष्यों को जूझना पड़ रहा है वह पशुओं के लिए भी उतनी ही तकलीफदेह है। कुल मिलाकर इस समस्या का हल कानून की सख्ती और प्रशासन की चुस्ती से तब तक नहीं हो सकता जब तक समाज इस बारे में स्वेच्छा से आगे न आये। गोवंश के वध पर रोक लगाए जाने के बाद राज्य सरकारें गोशाला संचालकों को जो अनुदान देती है उतने में उनका भरण - पोषण संभव नहीं है। इसीलिए वहाँ उनकी दशा बेहद खराब हो जाती है और मरने की शिकायतें भी आम हैं। आवारा कुत्तों के अलावा पालतू कुत्तों के मालिक भी सुबह शाम उन्होंने घर के बाहर ले जाते हैं जहाँ वे मल - मूत्र त्यागकर गंदगी फैलाते हैं जबकि विकसित देशों में कुत्ते के मालिक को वह गंदगी साफ करनी होती है। ऐसे में जरूरी है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो आदेश दिल्ली के संदर्भ में दिया गया उस पर सभी राज्य सरकारों को विचार करना चाहिए क्योंकि आवारा पशुओं की समस्या राष्ट्रव्यापी हो चुकी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 11 August 2025
पवार ने राहुल के लिए मुसीबत खड़ी कर दी
Friday, 8 August 2025
भारत की अगुआई में ब्रिक्स देशों की मोर्चेबंदी से डॉलर का दबदबा खतरे में
डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी इतिहास के सबसे असफल राष्ट्रपति साबित होने जा रहे हैं। दूसरी बार चुनाव जीतने पर उन्हें ये गुमान हो गया मानों वे दुनिया के भाग्यविधाता बन गए हों। उन्होंने जिस तरह के तेवर दिखाना शुरू किये उनसे अन्य देश ही नहीं बल्कि पड़ोस के वे राष्ट्र भी चौंक गए जिनसे अमेरिका के रिश्ते बेहद करीबी रहे। यूरोप के तमाम देशों को भी उन्होंने दुत्कारना शुरू कर दिया जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही अमेरिकी कैम्प में रहे। सोवियत संघ के विघटन के बाद लगभग सभी यूरोपीय देश अमेरिका के प्रभावक्षेत्र में आ गए। अरब जगत में भी कुछ कट्टरपंथी देशों के अलावा बाकी ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमेरिका के साथ दोस्ताना कायम कर लिया। यही हाल अफ्रीका और दक्षिण एशिया का भी कहा जा सकता है। ट्रम्प ने दूसरी बार सत्ता ग्रहण करने के बाद अपने मित्रों के साथ भी शत्रुओं जैसा व्यवहार शुरू कर दिया और इसके लिए व्यापार को हथियार बना लिया। मसलन जिन देशों से अमेरिका के व्यापारिक रिश्ते हैं उनसे आयात होने वाले सामान पर टैरिफ में कई गुना वृद्धि कर देना। कुछ देश टैरिफ रूपी आतंकवाद से डरकर उनके सामने नतमस्तक हो गए जिनको अमेरिका ने कुछ रियायतें देकर उपकृत किया। लेकिन चीन, भारत, ब्राज़ील, द. अफ्रीका सहित दर्जन भर देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए झुकने से इंकार कर दिया। तब ट्रम्प ने अनाप - शनाप आयात शुल्क थोपकर उन्हें दबाना चाहा। चीन ने जब अमेरिका की कमजोर नस पर हाथ रखा तो उस पर लादे गए टैरिफ कुछ घटा दिये गए । लेकिन उनकी सबसे ज्यादा नाराजगी भारत और ब्राजील पर बरस रही है जिन्होंने ट्रम्प को ये एहसास करवा दिया कि आपसी व्यापार की जरूरत अमेरिका को भी उतनी ही है। इसलिये टैरिफ में इकतरफा अनाप - शनाप वृद्धि अनुचित है। ट्रम्प को इस प्रतिक्रिया ने आगबबूला कर दिया और उन्होंने दोनों पर पहले 25 और फिर 50 फीसदी आयात शुल्क लाद दिया। ब्राज़ील ने तो पहले दिन से ही ट्रम्प के विरुद्ध मुहिम छेड़ रखी थी किंतु अब भारत ने चार कदम आगे बढ़कर ट्रम्प की मनमानी को चुनौती दी डाली। किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों के विरुद्ध कोई समझौता नहीं करने का ऐलान करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन में शंघाई सहयोग परिषद की बैठक में शामिल होने की घोषणा कर अमेरिका को चौंकाया और इसी बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को मॉस्को भेजकर रूस के राष्ट्रपति पुतिन को भारत आने राजी कर लिया। उल्लेखनीय है ट्रम्प की भारत से नाराजगी का कारण रूस से कच्चा तेल और रक्षा उपकरण खरीदना है। उन्होंने रूस से व्यापारिक और सामरिक सौदे रोकने का दबाव बनाया किंतु भारत के इंकार से नाराज होकर टैरिफ की दरें 50 प्रतिशत तक बढ़ा दीं। उन्हें उम्मीद थी कि भारत उनकी शर्तों को स्वीकार कर लेगा। लेकिन उसने रूस से खरीदी रोकने की बजाय अमेरिका से होने वाले रक्षा सौदों को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया जो ट्रम्प के लिए यह किसी तमाचे से कम नहीं है। एयर इंडिया के स्वामित्व वाले टाटा समूह द्वारा अमेरिका से बोइंग यात्री विमानों का जो सौदा हुआ वह भी रद्द करने के संकेत दे दिये गए हैं। दूसरी तरफ रूस से रक्षा उपकरणों की खरीद और बढ़ाई जा रही है। इससे स्पष्ट हो गया कि श्री डोभाल की रूस यात्रा केवल ट्रम्प को चिढ़ाने के लिए न होकर कूटनीति और व्यापार का बेहतरीन मिश्रण थी। पुतिन द्वारा जल्द ही भारत आने की सहमति भी ट्रम्प को ये एहसास करवाने की कोशिश है कि अमेरिकी चौधराहट के दिन लद गए हैं। श्री मोदी के चीन जाने के फैसले से अमेरिका की चिंता और बढ़ गई। ट्रम्प की नींद ये सुनकर भी उड़ रही है कि ब्रिक्स देश डॉलर के मुकाबले नई साझा मुद्रा प्रारंभ करने जा रहे हैं। इस संगठन से जुड़े ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और द. अफ्रीका विश्व की 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था संचालित करते हैं इसलिए यदि उन्होंने यूरो जैसी मुद्रा प्रारम्भ की तो डॉलर का रौब - रुतबा खत्म होने को आ जायेगा। ट्रम्प के टैरिफ हमले से हलाकान गैर ब्रिक्स देश भी मौका मिलते ही डॉलर के चंगुल से निकलकर उस नई मुद्रा में लेनदेन करने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। इस प्रकार श्री मोदी ने राहुल गाँधी के उकसावे में आकर ट्रम्प के विरुद्घ एक शब्द कहे बिना उनकी हेकड़ी निकालने की जो रणनीति बनाई उसके कारण अब अनेक छोटे - छोटे देश तक ट्रम्प की धौंस का जवाब उन्हीं की शैली में देने का दुस्साहस कर रहे हैं। इस लिहाज से आने वाले कुछ महीनों के दौरान विश्व राजनीति में बड़ा उलट - पलट देखने मिलेगा। ब्रिक्स देशों की मोर्चेबन्दी में भारत की व्यूह रचना सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और नरेंद्र मोदी एक बार फिर विश्वस्तर पर सबसे कुशल राजनेता साबित होने जा रहे हैं। ट्रम्प द्वारा डाले जा रहे दबाव के जवाब में डॉलर की चमक और धमक कम कर देने का दाँव सोवियत संघ के बिखराव के बाद विश्व राजनीति की सबसे बड़ी घटना होगी जिसका सेहरा भी श्री मोदी के सिर बंधेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी