Monday, 8 September 2025
ट्रम्प की समझ में आने लगे भारत से पंगा लेने के नुकसान
Saturday, 6 September 2025
पहाड़ों के बाद मैदानी इलाकों पर भी उतर रहा प्रकृति का गुस्सा
इस वर्ष मानसून की वर्षा ने पहाड़ों पर ही तबाही नहीं मचाई बल्कि मैदानी इलाकों को भी जल प्रलय का एहसास करवा दिया। पंजाब का समूचा ग्रामीण क्षेत्र डूबा हुआ है। हिमाचल प्रदेश , जम्मू - कश्मीर और उत्तराखंड में बादल फटने से आई बाढ़ और पहाड़ों के धसकने की घटनाएं जिस बड़े पैमाने पर हुईं उससे हुए नुकसान को केवल आर्थिक पैमाने पर नहीं बल्कि प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से देखना बुद्धिमत्ता होगी। अनेक स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं भी पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते शहरीकरण का दुष्परिणाम है। हालांकि इन प्राकृतिक आपदाओं के मूलभूत कारणों से लोग परिचित हैं किंतु उन्हें दूर करने के बारे में जो उदासीनता है वह अब आपराधिक लापरवाही का रूप ले चुकी है। इस साल वर्षा के कारण मैदानी इलाकों में भी जिस प्रकार का जल तांडव देखने मिल रहा है वह भविष्य में उत्पन्न होने वाले खतरे का पूर्वाभास है। देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई और सूचना तकनीक के केंद्र बेंगुलूरु में कुछ घंटों की बरसात में ही जल प्लावन का नजारा दिख जाता है। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली भी बीते कुछ दिनों से बाढ़ की विभीषिका झेल रही है। बढ़ती आबादी के कारण दिल्ली के समीप बसे गाजियाबाद, नोएडा, गुडगाँव , फरीदाबाद सहित उ.प्र, हरियाणा और राजस्थान के अनेक शहरों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन. सी. आर ) में शामिल कर लिया गया और इनका विकास भी दिल्ली की तर्ज पर महानगरीय शैली में होने लगा। जमीनें महंगी होने से कृषि भूमि शहरीकरण के शिकंजे में आ गई। खेतों में अट्टालिकाएं तान दी गईं और शॉपिंग माल बनने लगे। नतीजा वही हुआ जिसकी आशंका थी। पानी निकासी के रास्ते या तो रोक दिये गए या संकरे कर दिये गए। इसीलिए जो गलती पहाड़ों में जलप्लावन के लिए जिम्मेदार है वही मैदानी इलाकों में जल प्रलय का कारण बनती जा रही है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बीते कुछ दिनों से जो हालात बने हुए हैं उसका कारण यमुना में आई बाढ़ को बताया जा रहा है। लेकिन यमुना तो सदियों से बह रही है। सही बात ये है कि यमुना की बाढ़ का पानी जिन खाली क्षेत्रों में भरता रहा उनमें कांक्रीट के जंगल खड़े हो गए। हिमाचल प्रदेश में नदियों के किनारों पर बनाये गये होटल और रिसार्ट इस वर्ष जल प्रलय में अपना अस्तित्व गँवा बैठे। दिल्ली और उसके समीपवर्ती इलाकों को भी यही गलती दंडित कर रही है। बढ़ती आबादी को बसाने के लिए शहरी सीमाओं को बढ़ाने की सोच ऐसी समस्या बन गई जिसका इलाज किसी के पास नहीं है। समुद्र के किनारे बसे मुंबई में जल भरता है क्योंकि जब सागर की लहरें उफान मारती हैं तो उसका पानी उछाल मारकर जिन खाली क्षेत्रों में भरा करता था उन सभी में इमारतें बन गईं। दिल्ली में देश की सरकार बैठी है किंतु उसके बावजूद भी आपदा प्रबंधन के तमाम संसाधन अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। इस बारे में राजनीति से ऊपर उठकर सोचना जरूरी है। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में घूमकर दिल्ली सरकार पर राहत कार्यों में विफलता का जो आरोप लगाया वह गलत नहीं है । लेकिन अपने दस वर्षीय शासनकाल में आम आदमी पार्टी की सरकार भी मुफ्त बिजली और पानी बाँटकर ही आत्ममुग्ध होती रही। लेकिन दिल्ली में जल प्लावन की समस्या से निपटने के लिए समुचित इंतजाम करने के बजाय आग लगने पर कुआ खोदने की मानसिकता ही कार्यशैली पर हावी बनी रही। ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि शासन - प्रशासन में बैठे लोग चाहे किसी भी विचारधारा से जुड़े हों किंतु आज में जीने की प्रवृत्ति के चलते दूरदृष्टि का अभाव नजर आता है। चुनाव जीतने के लिए तात्कालिक लाभ देने वाले उपायों को ही सब कुछ मान लिया गया है। जल प्लावन पहाड़ों से उतरकर जिस प्रकार अब मैदानी क्षेत्रों में भी तांडव कर रहा है उसे भविष्य के बड़े खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए। बुद्धिमत्ता इसी में है कि इसके बचाव के प्रति अभी से कार्ययोजना बनाकर समुचित व्यवस्था की जाए। एक दूसरे को कोसने के बजाय सभी को मिलकर प्रयास करना होंगे क्योंकि प्राकृतिक विपदाएं राजनीति नहीं जानतीं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 5 September 2025
पेट्रोल - डीजल को जीएसटी में लाये बिना सुधार अधूरे
जीएसटी की दरों में बदलाव करने से आम जनता के उपभोग की अधिकांश वस्तुएँ सस्ती होने का रास्ता साफ हो गया। कुछ चीजों पर जीएसटी समाप्त करने की भी जनमानस में अनुकूल प्रतिक्रिया हुई। इस फैसले की लंबे समय से प्रतीक्षा की जा रही थी। वैसे इन सुधारों को 2021 में ही लागू किये जाने की योजना थी किंतु कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था पर जो दबाव आया उसकी वजह से इसमें विलंब हो गया। बहरहाल जब जागे तब सवेरा की तर्ज पर इस फैसले का स्वागत हो रहा है। आम जनता 22 सितंबर का बेसब्री से इंतजार कर रही है जिस दिन से नई दरें लागू होंगी। यद्यपि जीएसटी में किये गए इन सुधारों को लेकर भी आलोचनाओं का सिलसिला जारी है किंतु राजनीति से इतर हटकर देखें तो प्रधानमंत्री ने जन आकांक्षाओं की पूर्ति की दिशा में जो कदम उठाया उसकी सार्थकता और आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। लेकिन राहत भरे इस फैसले के बाद अब पेट्रोल - डीजल की कीमतों में कमी का इंतजार पूरे देश को है। इस बारे में ये स्पष्ट है कि जीएसटी काउंसिल में शामिल अधिकतर राज्य पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का विरोध करते रहे क्योंकि इस पर मनमर्जी टैक्स लगाकर वे अपना खजाना भरते हैं। चूंकि भारत को अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल का आयात करना होता है इसलिए इसके दाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही तय होते हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में कीमतों में कमी के बावजूद पेट्रोल - डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ। यूक्रेन संकट के बाद भारत ने रूस से बेहद किफ़ायती दामों पर कच्चा तेल खरीदने की बुद्धिमत्ता दिखाई किंतु उसका लाभ उपभोक्ता को नहीं मिलने से आम जनता में रोष है। ये आरोप भी लगता है कि सरकारी क्षेत्र की तेल कंपनियों ने भी सस्ते रूसी तेल को पेट्रोल - डीजल में परिवर्तित कर उसका निर्यात करते हुए मोटी कमाई की। ऐसा ही आरोप रिलायंस पर लगता है। सरकारी तेल कंपनियां मौके का लाभ उठाकर कमाई करें इसमें किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन अपने पुराने घाटे का रोना वे कब तक रोएंगी ये बड़ा सवाल है। जहाँ तक बात निजी क्षेत्र की तेल कंपनियों की है तो उनकी सोच विशुद्ध व्यवसायिक होना अपेक्षित है लेकिन सरकारी क्षेत्र की कंपनियां केवल मुनाफे के पीछे भागती फिरें ये लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के सर्वथा विरुद्ध है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम घाटे में चलें ये भी व्यवहारिक नहीं होता क्योंकि उनके घाटे की भरपाई भी अंततः जनता को ही करनी पड़ती है। लेकिन तेल कंपनियों को यदि भरपूर कमाई हो रही है तो उन्हें पिछले घाटे की भरपाई के साथ - साथ जनता के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के अंतर्गत लाकर उन पर राज्य दर राज्य लगने वाले करों में एकरूपता लाई जाए। एक देश एक कर का जो सिद्धांत जीएसटी लागू करते समय प्रचारित किया गया उसके लिए पेट्रोल - डीजल को राज्यों के क्षेत्राधिकार से बाहर निकालना जरूरी हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था जिस तरह कुलांचे भर रही है उसे देखते हुए प्रधानमंत्री को चाहिए वे इस दिशा में भी आगे बढ़ें। इस बारे में रोचक तथ्य ये है कि पेट्रोल - डीजल की सबसे बड़ी खरीददार सरकार ही है। ऐसे में यदि इन्हें जीएसटी के दायरे में भी ले आया जाए तो सरकार का खर्च भी बचेगा। परिवहन लागत कम होने से महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि जीएसटी में जो ताजा सुधार किये गए वे तब तक अधूरे रहेंगे जब तक पेट्रोल - डीजल भी उसके दायरे में नहीं लाये जाते।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 4 September 2025
जीएसटी में राहत अर्थव्यवस्था की मज़बूती का प्रमाण
15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी में सुधार करते हुए जनता को दीपावली उपहार देने का जो वायदा किया था वह पूरा हो गया। गत दिवस जीएसटी काउंसिल की बैठक में 12 और 28 फीसदी वाली दर खत्म करते हुए केवल 18 और 5 दो दरें तय हो गईं। विलासिता की वस्तुओं के साथ ही तंबाखू उत्पाद तथा महंगे दो और चार पहिया वाहनों के लिए 40 प्रतिशत की दर निर्धारित की गई। दरों के अलावा अन्य बदलाव आगामी 22 सितंबर से लागू होंगे । इसी तिथि से शारदेय नवरात्रि के साथ दीपावली सीजन शुरू होने से बाजारों में रौनक आ जाती है। दीपावली के बाद विवाहों का सिलसिला प्रारंभ होता है जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस साल अच्छे मानसून के कारण फसल भी अच्छी आने की उम्मीद बाजार लगाए बैठा है। जीएसटी दरों में किये गए परिवर्तनों का सीधा असर उपभोक्ता बाजार पर होना सुनिश्चित है। हालांकि इस बारे में काफी समय से विमर्श चल रहा था। जीएसटी में हर माह हो रही वृद्धि से सरकार का हौसला भी मजबूत था। लेकिन अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाकर भारतीय उद्योग - व्यापार जगत को जो झटका दिया उससे उबरने के लिए भी ये फैसला लेने में तत्परता दिखाई गई। चूंकि हमारे देश में आर्थिक नीतियों पर चुनावों का दबाव रहता है इसलिए ये कहना भी गलत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने दीपावली के बाद होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर जीएसटी सुधार रूपी अस्त्र छोड़ दिया। सोशल मीडिया पर इस तरह की टिप्पणियां भी देखने मिल रही हैं कि इस फैसले से सरकार ने खुद स्वीकार कर लिया कि जनता पर जीएसटी का भार ज्यादा था। लोगों को ये आशंका भी है कि कंपनियां घटे हुए जीएसटी का लाभ उपभोक्ता को नहीं मिलने देंगी और मूल्य बढ़ाकर अपनी तिजोरी भरेंगी। हालांकि ऐसा सोचना निराधार नहीं है किंतु सरकार ने जो राहत दी है उसका स्वागत होना ही चाहिए क्योंकि यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही परिस्थियों में जरूरी हो गई थी। रोजमर्रे की अनेक वस्तुओं को जीएसटी से मुक्त रखना और ज्यादातर को 5 फीसदी के दायरे में ले आना निश्चित तौर पर आम जनता की क्रय शक्ति को बढ़ायेगा। 28 फीसदी वाली अनेक चीजों पर 18 फीसदी जीएसटी भी उपभोक्ता और उत्पादक दोनों के लिए मददगार होगा। कैंसर सहित जीवन रक्षक अनेक दवाओं के अलावा चिकित्सा सामग्री को 5 प्रतिशत की सूची में लाने का फैसला भी उत्साहजनक है। गत वर्ष परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने स्वास्थ्य बीमा को जीएसटी मुक्त करने संबंधी पत्र लिखकर सार्वजनिक कर दिया था। उसका संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य के साथ ही जीवन बीमा पर जीएसटी पूरी तरह समाप्त करने का फैसला वाकई संवेदनशीलता की कसौटी पर खरा है। इसी साल बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख करने के अलावा 70 वर्ष की आयु पूरी कर चुके सभी वरिष्ट नागरिकों को 5 लाख तक कि आयुष्मान भारत योजना का लाभ देकर केंद्र सरकार ने जनकल्याण की दिशा में जो कदम बढ़ाये उसी का विस्तार जीएसटी में किये गए ताजा बदलाव हैं। इनके प्रभावस्वरूप आम उपभोक्ता को जो लाभ होगा वह या तो बचत के रूप में राष्ट्रीय विकास में सहायक होगा या फिर बाजार में आयेगा। अनेक राज्यों ने जीएसटी घटने से राजस्व हानि की आशंका व्यक्त करते हुए केंद्र से मुआवजे की जो मांग रखी वह औचित्यपूर्ण है। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो दाम गिरने से बढ़ने वाली मांग आने वाले कुछ महीनों बाद जीएसटी की मासिक वसूली के आंकड़े को फिर उसी स्तर पर पहुँचा देगी। यद्यपि सरकार को इस बात के लिए सजग रहना होगा कि कंपनियां कीमतों में वृद्धि कर जनता को इस राहत से वंचित न कर सकें । प्रधानमंत्री मोदी वर्तमान में मजबूत वैश्विक नेता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ रूपी दबाव के समक्ष झुकने के बजाय उसका मुस्तैदी से प्रतिकार कर उन्होंने भारत के महाशक्ति बन जाने का परिचय दिया। ट्रम्प द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बताकर जो घमंड दिखाया उसका माकूल जवाब है जीएसटी में किया गया बदलाव। वरना कमजोर आर्थिक स्थिति वाला देश जनता को राहत देने का खतरा कतई मोल नहीं लेता। इस फैसले के पीछे आर्थिक, राजनीतिक या कूटनीतिक जो भी कारण हो किंतु ये जनहित में उठाया गया बहुप्रतीक्षित कदम है जिसके जरिये दुनिया को आर्थिक क्षेत्र में भारत की मजबूती का संदेश दिया गया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 3 September 2025
परिवारवाद को रोकने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का फैसला स्वागतयोग्य
ये कहना गलत नहीं होगा कि म.प्र भाजपा के नये अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल राजनीतिक विरासत के कारण ही इस पद तक पहुँच सके। उनके स्वर्गीय पिता बैतूल से लोकसभा सदस्य रहे। हेमंत वर्तमान में विधायक हैं। पार्टी के संगठन में पर्दे के पीछे काम करते रहने की वजह से उनका नाम अन्य प्रादेशिक नेताओं की अपेक्षा कम चर्चित था। लेकिन उनका चयन जिस प्रकार सर्वसम्मति से हुआ उससे उनकी जमीनी पकड़ उजागर हो गई। पदभार संभालते ही उन्होंने जिस प्रकार प्रदेश के प्रमुख शहरों का दौरा किया उसके बाद से उनके बारे में लोग जानने लगे। अपने सादगी भरे रहन - सहन के साथ ही दिखावे से परहेज जताने वाले श्री खंडेलवाल ने जनप्रतिनिधियों को मर्यादा में रहने की नसीहत देकर अपनी कार्यशैली से परिचित करवा दिया। भिंड के भाजपा विधायक द्वारा वहाँ के जिलाधीश से किये गये दुर्व्यवहार पर भोपाल बुलवाकर उनकी खिंचाई से अन्य सांसदों - विधायकों को संकेत दे दिया गया। इसके साथ ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के नये फैसले ने पार्टी में हलचल मचा दी जिसके अनुसार किसी भी सांसद, विधायक या मंत्री के परिवार से किसी अन्य सदस्य को जिला अथवा प्रदेश कार्यकारिणी में जगह नहीं दी जायेगी। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के बेटे को मऊगंज की जिला कार्यकारिणी में पदाधिकारी बनाया गया था किंतु एक परिवार - एक पद के फॉर्मूले के ऐलान के बाद उनसे त्यागपत्र ले लिया गया। दरअसल कांग्रेस सहित अन्य क्षेत्रीय दलों पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाली भाजपा भी धीरे - धीरे उसी बुराई को अपनाने लगी है। भले ही शीर्ष पदों का उत्तराधिकार परिवार के भीतर देने की स्थिति अभी नहीं है लेकिन ये बात सौ फीसदी सच है कि चंद अपवादों को छोड़कर अब भाजपा के ज्यादातर नेता पत्नी और बेटे - बेटी को सत्ता या संगठन के पद पर बिठाने का प्रयास करते हैं ताकि वे उनके जीते जी उनकी राजनीतिक विरासत संभालने लगे। इसकी वजह से पार्टी में ईमानदारी से मेहनत करने वाले नेता और कार्यकर्ता दरी - फट्टा उठाते ही रह जाते हैं। चुनावी टिकिट के मामले में भी परिवारवाद ने भाजपा में जगह बना ली है। प्रदेश में जनसंघ के जमाने के जो दिग्गज थे उनमें सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र कुमार सखलेचा और कैलाश जोशी के राजनीतिक वारिस उन्हीं के भतीजे और बेटे बने। बाबूलाल गौर की सीट उनकी पुत्रवधु के पास है। कैलाश सारंग के पुत्र मंत्री हैं। नारायण कृष्ण शेजवलकर के बेटे महापौर - सांसद बने। ग्वालियर के सिंधिया परिवार के सभी सदस्य महिमामंडित होते रहे। संगठन में भी यही परिपाटी चल पड़ी। वैसे किसी परिवार के सदस्य यदि एक ही पार्टी में सक्रिय हों तो गलत कुछ भी नहीं किंतु राजनीति विचारधारा पर आधारित होती है। इसलिए उसमें पारिवारिक विरासत को प्राथमिकता देना दूरगामी दृष्टि से नुकसानदेह होता है। नेतागण अक्सर ये सफाई देते हैं कि डॉक्टर और वकील का बेटा जब उसी पेशे में आता है तब उस पर आपत्ति नहीं होती तो नेता के परिजनों पर सवाल क्यों उठते हैं ? लेकिन ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि डॉक्टर और वकील बनने के लिए परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी योग्यता साबित करनी होती है। जबकि राजनीति में परीक्षा के पहले ही चयन हो जाता है। उस दृष्टि से श्री खंडेलवाल ने सांसद , विधायकों और मंत्रियों के परिजनों को जिला और प्रदेश कार्यकारिणी से दूर रखने का जो दुस्साहसिक फैसला किया यदि उस पर वे कायम रह सके तो ये बड़ी सफलता होगी। साथ ही इससे पार्टी में उन कार्यकर्ताओं को आगे आने का अवसर मिलेगा जिनके पास पारिवारिक विरासत जैसा कुछ नहीं है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष को एक परिवार - एक पद के फॉर्मूले को अमल में लाने में पार्टी के स्थापित छत्रपों का विरोध झेलना पड़ सकता है। हो सकता है राष्ट्रीय नेतृत्व उनके निर्णय पर बंदिश लगा दे क्योंकि म.प्र की हवा यदि बाकी राज्यों में भी फैली तो पार्टी के बड़े नेताओं को अपनी संतानों का भविष्य खतरे में दिखने लगेगा। राजनीति में महिलाओं के लिए बढ़ते अवसरों के कारण आजकल बेटी, पत्नी और पुत्रवधू को भी आगे लाने का चलन बढ़ा है। ये भी सच है कि बिना किसी पद के नेतागिरी चमकाना कठिन होता है। बहरहाल म.प्र के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने राजनीति में जो नवाचार किया वह स्वागतयोग्य है। लालकृष्ण आडवाणी ने कभी भाजपा को पार्टी विथ डिफरेंस कहा था। लेकिन सत्ता की दौड़ में वह दावा पीछे छूट गया। श्री खंडेलवाल यदि अपने प्रयास में सफल हो गए तो वह कुछ नेताओं के लिए जरूर पीड़ादायक होगा किंतु पार्टी में उससे नये उत्साह का संचार होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 2 September 2025
जैसे ट्रम्प वैसे ही घटिया उनके सलाहकार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी हरकतों के कारण पूरी दुनिया में हंसी के पात्र बन गए हैं । रही - सही कसर उनके व्यापार सलाहकार पीटर नवारो पूरी किये दे रहे हैं। गत दिवस नवारो की वह टिप्पणी चर्चा का विषय बनी कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदे जाने से वहाँ के ब्राह्मण मुनाफा कमा रहे हैं जिसकी कीमत पूरा देश चुका रहा है। निश्चित रूप से इस तरह की टिप्पणी कोई मूर्ख ही कर सकता है। आज उनकी एक और प्रतिक्रिया सामने आई जिसमें उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि नरेंद्र मोदी पुतिन और जिनपिंग जैसे साम्यवादियों के साथ क्यों खड़े हैं जबकि लोकतांत्रिक होने के नाते उन्हें अमेरिका के साथ होना चाहिए। ऐसा लगता है ट्रम्प अब हताश होने लगे हैं, उन्होंने भारत पर दबाव बनाने के लिए जितने भी दाँव चले वे अब तक तो बेअसर ही रहे। हालांकि टैरिफ बढ़ने से भारत द्वारा अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात में कमी आने का खतरा उत्पन्न हो गया है। लेकिन उसके बाद भी प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जिससे लगता कि भारत ट्रम्प के सामने झुकने तैयार हो। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के लिए वार्ताओं का सिलसिला रुक - रुककर जारी है। लेकिन चीन में गत दिवस संपन्न एस. सी .ओ सम्मेलन में श्री मोदी की रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग से जो नजदीकी दिखाई दी उसने मानो अमेरिका के जले पर नमक छिड़कने का काम कर दिया। मोदी और पुतिन का एक ही कार में चलना और उस दौरान की गई बातचीत ने अमेरिका को विचलित कर दिया। ये बयान भी अमेरिका की खीझ का प्रमाण है कि भारत द्वारा उस पर लगाए गए टैरिफ कम करना चाहता है किंतु अब बहुत देर हो चुकी जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये सब सुनकर प्रतीत होता है कि ट्रम्प अपने सलाहकारों से स्तरहीन बातें कहलवाकर भारत को उत्तेजित करना चाहते हैं । लेकिन श्री मोदी ने ट्रम्प और उनके सलाहकारों को अब तक जुबानी जंग में हावी होने का कोई मौका ही नहीं दिया। नवारो ने रूसी तेल की खरीद से भारत के ब्राह्मणों को मुनाफे की जो बात कही वह उनकी मूर्खता का परिचायक बन गई। उन्होंने सोचा होगा कि ऐसा कहकर वे भारत में जातीय भावनाओं को भड़काकर आंतरिक आशांति पैदा करवा देंगे किंतु ज्यादातर ने इसे अनावश्यक और अप्रासंगिक बताते हुए हवा में उड़ा दिया । जहाँ तक बात श्री मोदी के पुतिन और जिनपिंग के साथ खड़े होने की है तो एस. सी. ओ सम्मेलन में ये तीनों ही तो केंद्र बिंदु थे। लिहाजा सम्मेलन पर उनकी छाप स्वाभाविक ही थी। यदि ट्रम्प वहाँ होते तब उनको भी ऐसी ही तवज्जो मिली होती। रही बात रूस और चीन के साम्यवादी होने के कारण भारत को लोकतांत्रिक अमेरिका के नजदीक होने की तो इसके लिए ट्रम्प खुद जिम्मेदार हैं। वरना भारत ने रूस और अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों में जो संतुलन बनाये रखा उसकी पूरी दुनिया कायल है। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू होने पर भी भारत का रवैया समझदारी से भरा रहा। इसीलिए उसने न तो रूस का पक्ष लिया और न ही अमेरिकी दबाव में उससे व्यापारिक रिश्ते ही खत्म किये। इसी तरह चीन को साम्यवादी कहकर भारत को उससे दूर रहने की समझाइश का सवाल है तो अमेरिका को ऐसा कहने का नैतिक अधिकार ही नहीं है क्योंकि आज चीन आर्थिक प्रगति के जिस शिखर पर विराजमान है उसकी वजह तो अमेरिका सहित उन सभी लोकतंत्रिक और पूंजीवादी देशों द्वारा सस्ते श्रमिकों के लालच में वहाँ किया गया अपार पूंजी निवेश है। यदि अमेरिका को लोकतंत्र से इतना ही लगाव होता तब बजाय चीन के भारत में पूंजी लगाता। ट्रम्प भारत पर तो 50 फीसदी टैरिफ लादकर उससे अपेक्षा कर रहे है कि वह उनके आगे - पीछे मंडराए लेकिन चीन पर टैरिफ बढ़ाने के बाद उन्होंने अपने पाँव पीछे खींच लिए। सही बात ये है कि खुद को अक्लमंद मानने की आपाधापी में ट्रम्प पूरी दुनिया को बेवकूफ समझने की मूर्खता कर बैठे। और ऊपर से नवारो जैसे घटिया सलाहकार रखकर अपनी भद्द पिटवा रहे हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 1 September 2025
मोदी, पुतिन और जिनपिंग तय करेंगे विश्व राजनीति की नई दिशा
चीन में चल रहे शंघाई सहयोग संगठन (एस. सी.ओ) के सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर सबसे ज्यादा निगाहें टिकी हुई हैं। चीन तो चूंकि मेजबान है इसलिए शी जिनपिंग तो केंद्र बिंदु हैं ही। एससीओ दस देशों का एक यूरेशियाई राजनीतिक , आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संगठन है। इसकी स्थापना 2001 में चीन, रूस , कजाकिस्तान , किर्गिस्तान , ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान द्वारा की गई थी। जून 2017 में भारत और पाकिस्तान के साथ इसका विस्तार आठ देशों तक हो गया।बाद में ईरान और बेलारूस भी शामिल हो गये। इन सबकी आबादी , जमीन और आर्थिक संसाधनों को मिलाने पर दुनिया की बड़ी शक्ति बन जाती है। मौजूदा वैश्विक हालात में इसका महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिन तीन प्रमुख देशों को अपना सबसे बड़ा शत्रु मान लिया उनके राष्ट्रप्रमुख सर्वश्री नरेंद्र मोदी, व्लाडीमीर पुतिन और शी जिनपिंग इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। यद्यपि एससीओ का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना है। लेकिन ट्रम्प के सनकीपन से जो परिस्थितियाँ पैदा हो गईं उनकी वजह से रूस, चीन और भारत के नेताओं की उपस्थिति के कारण सम्मेलन में विषय सूची से हटकर भी बहुत कुछ ऐसा होगा जो अमेरिका के लिए परेशानी का कारण बनेगा। हालांकि श्री मोदी की कल जिनपिंग से जो आपसी बातचीत हुई उसे दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के निपटारे के अलावा व्यापार एवं आवागमन को सुलभ बनाने से जुड़ा प्रचारित किया गया किंतु ट्रम्प के टैरिफ हमले के शिकार दोनों बड़े देशों के शीर्ष नेताओं की अंतरंग वार्ता में टैरिफ संकट पर विमर्श न हुआ हो ये मानना नादानी होगी। इसी तरह आज पुतिन के साथ मोदी जी की बातचीत में यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध को रोकने तक सीमित न रहकर अमेरिका द्वारा रूस के साथ ही भारत पर बनाये जा रहे दबाव पर भी विचारों का आदान - प्रदान हुआ होगा। इसे संयोग ही कहा जायेगा कि यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले अमेरिका ने भारत और चीन पर रूसी कच्चा तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाया। लेकिन दोनों ने उसे अनसुना कर दिया तब दूसरी बार जीतकर आये डोनॉल्ड ट्रम्प ने दोनों पर टैरिफ रूपी मिसाइलें दाग दीं। ट्रम्प का खुल्लमखुल्ला कहना है कि रूस को भारत और चीन को बेचे गए कच्चे तेल से जो राशि मिलती है उसी के बल पर वह लंबी लड़ाई लड़ने का साहस जुटा सका। इस प्रकार रूस से व्यापारिक रिश्ते रखने के कारण भारत और चीन पर अमेरिकी टैरिफ का भार आया। ऐसे में तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की एससीओ सम्मेलन में उपस्थिति को महज कूटनीतिक औपचरिकताओं और फोटो सेशन में बांधना उचित नहीं है। वैसे भी कूटनीति में जो दिखाया जाता है उससे अधिक छिपा लिया जाता है। और फिर मोदी, पुतिन तथा जिनपिंग तीनों बेहद अनुभवी और दिग्गज राजनेता हैं जिनकी विश्व राजनीति पर गहरी पकड़ है। हालांकि चीन और भारत के बीच अविश्वास की मौजूदगी से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन वर्तमान हालात में दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त वाला सिद्धांत दोनों को नजदीक आने मजबूर कर रहा है। पुतिन की मौजूदगी में तीनों देशों की जुगलबन्दी किसी नये वैश्विक गठजोड़ को जन्म दे सकता है। स्मरणीय है चीन आने से पूर्व श्री मोदी ने जापान का दौरा किया जो अमेरिका के बेहद करीब होने के बावजूद ट्रम्प के टैरिफ हमले से त्रस्त होकर दूरी बनाने की हिम्मत जुटा सका। जिसकी बानगी के तौर पर उसने अमेरिकी चावल खरीदने के ट्रम्प के दबाव को ठुकराने का साहस दिखा दिया । यद्यपि एससीओ सम्मेलन से भारत - चीन के बीच का सीमा विवाद सुलझ जायेगा और जिनपिंग पाकिस्तान की पीठ से हाथ उठा लेंगे ये सोचना बेमानी है किंतु सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री मोदी की पहले जिनपिंग और आज पुतिन से जो बातचीत हुई उससे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जरूर चिंतित होंगे क्योंकि जिस वैश्विक वातावरण में रूस, चीन और भारत के राष्ट्रप्रमुख एक ही जगह जमा हैं वहाँ कोई न कोई बड़ी रणनीति अमेरिका की दादागिरी खत्म करने जरूर तैयार होगी। इस बारे में गौरतलब है कि मोदी , पुतिन और जिनपिंग तीनों अपनी दृढ़ता के लिए जाने जाते हैं। इसलिए ट्रम्प के हरसंभव प्रयास के बाद भी अभी तक तीनों ने झुकने से मना कर दिया है। इसे देखते हुए एससीओ का यह सम्मेलन विश्व राजनीति को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी