Tuesday, 9 September 2025

नेपाल की आग से हमारे हाथ झुलसने का खतरा

पड़ोसी देश में होने वाली अशांति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे लिए भी समस्या उत्पन्न कर देती है। आजादी के बाद जब चीन ने तिब्बत पर जबरन कब्जा किया तब दलाई लामा सहित हजारों तिब्बती भारत आ गये । अब तो उनकी तीसरी - चौथी पीढ़ी भी यहीं की होकर रह गई। म्यांमार (बर्मा) से भी राजनीतिक अस्थिरता के चलते अवैध रूप से आये प्रवासी उत्तर पूर्वी राज्यों में बसते गए। रोहिंग्या मुसलमानों की बढ़ती संख्या हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। बांग्ला देश से  आये करोड़ों शरणार्थी भी प. बंगाल और असम सहित अनेक उत्तर पूर्वी राज्यों के चुनाव में निर्णायक बन गए हैं। श्रीलंका में तमिल आंदोलन के दौरान गृहयुद्ध के दौर में भी तमिल मूल के हजारों श्रीलंकाई  तमिलनाडु में आ गये । इस प्रकार भारत अवैध रूप से आये विदेशी नागरिकों की सराय बनता चला गया। जनसंख्या असंतुलन का जो मुद्दा रा.स्व.संघ एवं कुछ अन्य राष्ट्रवादी संगठन उठाया करते हैं उसके पीछे घुसपैठिये भी हैं। आम तौर पर घुसपैठिये अपने देश में असामान्य स्थितियां उत्पन्न होने पर ही आते हैं। लेकिन उनके अलावा भी लगातार अवैध रूप से पड़ोसी देशों से लोगों की आवक जारी रहती है। बिहार में  मतदाता सूचियों का सघन  पुनरीक्षण किये जाने के पीछे भी विदेशी नागरिकों द्वारा अवैध रूप से नागरिकता हासिल करना ही है। इस संदर्भ में ताजा खतरा नेपाल में सरकार विरोधी छात्र आंदोलन के कारण राजनीतिक अस्थिरता के कारण पैदा हो गया है। पड़ोसी देशों में श्री लंका के बाद बांग्ला देश में हुए जनांदोलन के कारण सत्ता परिवर्तन हुआ। सत्ता में बैठे नेताओं को देश छोड़कर भागना पड़ा। जनता ने राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास जैसे सुरक्षित स्थानों में घुसकर लूटपाट और तोडफोड़ की वह चौंकाने वाला था। गत दिवस नेपाल में भी ऐसे ही नजारे दिखाई दिये जब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे छात्र संसद भवन की दीवार तक पहुँच गए। नेपाल के अंदरूनी हालात अचानक खराब नहीं हुए। जब राजशाही को हटाकर माओवादी सत्ता में आये तब उसमें चीन का हाथ स्पष्ट था किंतु उनके बीच भी सत्ता के लिए टकराहट होने से राजनीतिक अस्थिरता ने इस पहाड़ी देश को घेर लिया । कभी यह एकमात्र हिन्दू देश था किंतु चीन ने रणनीति बनाकर राजतंत्र के विरुद्ध माओवादी आंदोलन के जरिये  अपनी पिट्ठू सरकार बनवाकर भारत और नेपाल के सदियों पुराने संबंधों में दरार उत्पन्न कर दी। हाल ही के वर्षों में सीमा विवाद  सैन्य संघर्ष के कगार तक जा पहुंचा।  भारत ने भी नाकेबंदी करते हुए नेपाल की आपूर्ति रोक दी जिससे वहाँ आर्थिक संकट हो गया। लेकिन इस दौरान भी दोनों देशों के बीच मुक्त आवजाही जारी रही। भारत के व्यापारी बड़ी संख्या में नेपाल में व्यवसाय करते हैं। बीच - बीच में उन पर हमले भी होते रहे। वहीं भारत में बसे नेपालियों की संख्या तो लाखों में हैं। देश के हर हिस्से में नेपाली मिल जाएंगे। यहाँ तक कि सेना में भी उन्हें भर्ती किया जाता है। उ.प्र  और बिहार से गए हजारों परिवार नेपाल की तराई में बसे हुए हैं जिन्हें मधेसी कहा जाता है। इन लोगों के अपने मूल राज्यों में शादी - विवाह के सम्बन्ध आज भी हैं। नेपाल के मूल नागरिक इन्हें दोयम दर्जे का समझते हैं। सत्ता में समुचित भागीदारी के लिए मधेसी समुदाय भी आंदोलन करता रहता है। वर्तमान आंदोलन के मास्टर माइंड के तौर पर काठमांडू के जिस महापौर को जिम्मेदार माना जा  रहा है वह भी मधेसी बताया जाता है। इस आंदोलन के कारण नेपाल में अराजक परिस्थितियाँ बन गई हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के घरों में तोडफोड़ के अलावा अतीत में सत्ता में रहे नेताओं के घरों पर भी हमले हो रहे हैं। जिन मंत्रियों ने त्यागपत्र दे दिया उन पर भी गुस्सा उतर रहा है। उल्लेखनीय है हाल ही में नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए भी आंदोलन हुए थे। सरकार विरोधी युवाओं के पीछे पूर्व राजघराने का हाथ होने की आशंका से इंकार नहीं किया  जा सकता। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही। लेकिन सत्ता पर बैठे लोग चूंकि वामपंथी हैं और चीन के इशारे पर भारत से लड़ने का दुस्साहस तक कर बैठते हैं इसलिए चीन की भूमिका पर भी नजर रखनी होगी। लेकिन नेपाल में गृहयुद्ध जैसी इस स्थिति में वहाँ से लोगों का पलायन हुआ हुआ तब भारत के सामने बड़ी समस्या आ खड़ी होगी  जो पहले से ही शरणार्थियों के बोझ से त्रस्त है। सरकार को चाहिए नेपाल के हालात पर पैनी नजर रखे जिससे वहाँ लगी आग में हमारे हाथ न झुलसें। भारत के वामपंथियों की भी निगरानी जरूरी है जिनके नेपाल के माओवादियों से गहरे सम्बन्ध हैं।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 September 2025

ट्रम्प की समझ में आने लगे भारत से पंगा लेने के नुकसान




अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने का अब तक किसी भी महत्वपूर्ण देश ने समर्थन नहीं। किया। ट्रम्प ने रूस से कच्चे तेल की खरीदी बंद करने का जो  दबाव बनाया उसके जवाब में उन्हें साफ शब्दों में बता दिया गया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए  रूस सहित किसी भी देश से कच्चे तेल के सौदे करता रहेगा। ट्रम्प  को इसकी उम्मीद नहीं थी। लिहाजा उन्होंने ये राग अलापना शुरू कर दिया कि भारत की तेल खरीदी के कारण ही रूस यूक्रेन युद्ध को लम्बा खींच रहा है। वे यहाँ तक बोल गए कि यह लड़ाई नरेंद्र मोदी ही लड़ रहे हैं। चीन में हुए एस.सी.ओ सम्मेलन में जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ को अनुचित बताया तो ट्रम्प को अपने विरुद्ध दुनिया के तीन बड़े देशों के साथ आने से चिंता हुई। हालांकि पहले तो उन्होंने कहा कि  श्री मोदी को पुतिन और जिनपिंग के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए किंतु अगले ही दिन वे उनको महान नेता और पुराना दोस्त बताते हुए सम्बन्धों को सुधारने की उम्मीद जताने लगे। अमेरिकी विदेश मंत्री ने भी ऐसा ही बयान जारी किया। इधर श्री मोदी ने भी ट्रम्प के बयान का उसी सौजन्यता से उत्तर दे दिया। इन बयानों से लगा कि रिश्ते सुधरने का रास्ता खुल गया है। लेकिन ट्रम्प के बयानों में कड़वाहट की जगह मिठास की वजह हृदय परिवर्तन न होकर अंतर्राष्ट्रीय दबाव है। उल्लेखनीय है चीन के पहले श्री मोदी  जापान गए थे। जिसके बाद जापान ने ट्रम्प के दबाव को ठुकराते हुए अमेरिकी चावल खरीदने से इंकार कर दिया। इससे उन्हें लगा कि भारत के कारण अमेरिका के निकट सहयोगी भी दूर जाने लगे। इसीलिये ट्रम्प ने जापान पर टैरिफ को 25 से घटाकर 15 फीसदी कर दिया। उनको लगता था कि  भारत भी उनसे ऐसा ही करने का आग्रह करेगा। सं.रा.संघ की वार्षिक आमसभा में श्री मोदी की संभावित न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान उनसे मुलाकात की उम्मीद भी  उन्होंने लगा रखी थी। लेकिन भारत ने  विदेश मंत्री जयशंकर को सं.रा.संघ  महासभा में भेजने का ऐलान कर दिया। स्मरणीय है कैनेडा में हुए जी 7 देशों के सम्मेलन के दौरान भी ट्रम्प ने फोन पर श्री मोदी को अमेरिका आने का  निमंत्रण दिया। लेकिन प्रधानमंत्री ने मना कर दिया क्योंकि उसी समय पाकिस्तान के सेना प्रमुख  मुनीर भी वाॅशिंगटन में थे। ट्रम्प दोनों को साथ बिठाकर शांतिदूत बनना चाहते थे। उनकी चाल भांपकर श्री मोदी  ने वह आमंत्रण ठुकरा दिया। इसके बाद खबर आई कि ट्रम्प ने चार बार फोन लगाया किंतु उन्होंने उठाया ही नहीं जिससे उनकी नाराजगी और बढ़ गई। फिर भी जब भारत नहीं झुका और रूस तथा चीन उसके साथ खड़े हो गए  तब ट्रम्प के कान खड़े हुए। इधर जर्मनी ने भी भारत से व्यापार बढ़ाने की घोषणा कर अमेरिका को बड़ा झटका दे दिया। ट्रम्प को बड़ा धक्का तब लगा जब उनके दोस्त  फिनलैंड के राष्ट्रपति ने भारत के साथ असहयोग से होने वाले नुकसान के प्रति अमेरिका को  आगाह किया। इस प्रकार भारत के प्रति बढ़ते वैश्विक समर्थन ने तो उनकी चिंता बढ़ाई ही उनके पूर्व सुरक्षा सलाहकार ने भी आरोप लगा दिया कि ट्रम्प ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए बीते 25 वर्षों में किये गए प्रयासों पर पानी फेर दिया। उसी के बाद चीन के हाथ भारत को खो देने जैसी टिप्पणी कर चुके ट्रम्प  श्री मोदी के साथ बेहतर तालमेल होने की कहने लगे। सही बात ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर 50 टैरिफ थोपकर अपने पाँव में ही कुल्हाड़ी मार ली। और गलती का एहसास होते ही उन्होंने श्री मोदी को महान प्रधानमंत्री बताते हुए हमेशा उनसे दोस्ती का राग अलापना शुरू कर दिया। टैरिफ विवाद में कूटनीतिक मोर्चे पर भारत ने जो दृढ़ता दिखाई उसके कारण ट्रम्प के गुब्बारे की हवा निकल चुकी है। हालांकि उनका अस्थिर दिमाग कब क्या कर बैठे ये कहना कठिन है किंतु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि वे श्री मोदी की तारीफ करने के बहाने रिश्तों में आई दरार पाटने की कोशिश करने लगे हैं।  उन्हें लगता था कि वे भारत को घुटना टेक करवा लेंगे किंतु उनका दबाव कारगर साबित नहीं हुआ ।  ट्रम्प की चिंता तब और बढ़ी जब  अनेक बड़े  देश भारत के पक्ष में खुलकर सामने आ गए। ये देखते हुए आगामी कुछ दिन काफी महत्वपूर्ण साबित होंगे क्योंकि भारत ने तो अमेरिका को किनारे करते हुए नये विकल्प तलाशने शुरू कर दिये हैं जबकि अमेरिका के पास भारत का कोई विकल्प नहीं है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 September 2025

पहाड़ों के बाद मैदानी इलाकों पर भी उतर रहा प्रकृति का गुस्सा


इस वर्ष मानसून की वर्षा ने पहाड़ों पर ही तबाही नहीं मचाई बल्कि मैदानी इलाकों को भी जल प्रलय का एहसास करवा दिया। पंजाब का समूचा ग्रामीण क्षेत्र डूबा हुआ है। हिमाचल प्रदेश , जम्मू - कश्मीर और उत्तराखंड में बादल फटने से आई बाढ़ और पहाड़ों के धसकने की घटनाएं  जिस बड़े पैमाने पर हुईं उससे हुए नुकसान को केवल आर्थिक पैमाने पर नहीं बल्कि प्रकृति और पर्यावरण  संरक्षण के लिहाज से देखना बुद्धिमत्ता होगी। अनेक स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं भी पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते शहरीकरण का दुष्परिणाम है। हालांकि इन प्राकृतिक आपदाओं के मूलभूत कारणों से लोग परिचित हैं किंतु  उन्हें दूर करने के बारे में जो उदासीनता है वह अब आपराधिक लापरवाही का रूप ले चुकी है। इस साल वर्षा के कारण मैदानी इलाकों में भी जिस प्रकार का जल तांडव देखने मिल रहा है वह भविष्य में उत्पन्न होने वाले खतरे का पूर्वाभास है। देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई और सूचना तकनीक के केंद्र बेंगुलूरु में कुछ घंटों की बरसात में ही जल प्लावन का नजारा दिख जाता है।  लेकिन देश की राजधानी दिल्ली भी बीते कुछ दिनों से बाढ़ की विभीषिका झेल रही है। बढ़ती आबादी के कारण दिल्ली के समीप बसे गाजियाबाद, नोएडा, गुडगाँव ,  फरीदाबाद सहित उ.प्र, हरियाणा और राजस्थान के अनेक शहरों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन. सी. आर ) में शामिल कर लिया गया और इनका विकास भी दिल्ली की तर्ज पर महानगरीय शैली में होने लगा। जमीनें महंगी होने से कृषि भूमि  शहरीकरण के शिकंजे में आ गई। खेतों में अट्टालिकाएं तान दी गईं और शॉपिंग माल बनने लगे। नतीजा वही हुआ जिसकी आशंका थी। पानी निकासी के रास्ते या तो रोक दिये गए या संकरे कर दिये गए। इसीलिए जो गलती पहाड़ों में जलप्लावन के लिए जिम्मेदार है वही मैदानी इलाकों में जल प्रलय का कारण बनती जा रही है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बीते कुछ दिनों से जो हालात बने हुए हैं उसका  कारण यमुना में आई बाढ़ को बताया जा रहा  है। लेकिन यमुना तो सदियों से बह रही है। सही बात ये है कि यमुना की बाढ़ का पानी जिन खाली क्षेत्रों में भरता रहा उनमें कांक्रीट के जंगल खड़े हो गए। हिमाचल प्रदेश में नदियों के किनारों पर बनाये गये होटल और रिसार्ट इस वर्ष जल प्रलय में अपना अस्तित्व गँवा बैठे। दिल्ली और उसके समीपवर्ती इलाकों को भी यही गलती दंडित कर रही है। बढ़ती आबादी को बसाने के लिए शहरी सीमाओं को बढ़ाने की सोच ऐसी समस्या बन गई जिसका  इलाज किसी के पास नहीं है। समुद्र के किनारे बसे मुंबई में जल भरता है क्योंकि जब सागर की लहरें उफान मारती हैं तो उसका पानी उछाल मारकर जिन खाली क्षेत्रों में भरा करता था उन सभी में इमारतें बन गईं। दिल्ली में देश की सरकार बैठी है किंतु उसके बावजूद भी आपदा प्रबंधन के तमाम संसाधन अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। इस बारे में राजनीति से ऊपर उठकर सोचना जरूरी है। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में घूमकर दिल्ली सरकार पर राहत कार्यों में विफलता का जो आरोप लगाया वह गलत नहीं है । लेकिन अपने दस वर्षीय शासनकाल में आम आदमी पार्टी की सरकार भी मुफ्त बिजली और पानी बाँटकर ही आत्ममुग्ध होती रही। लेकिन दिल्ली में जल प्लावन की समस्या से निपटने के लिए समुचित इंतजाम करने के बजाय आग लगने पर कुआ खोदने की मानसिकता ही कार्यशैली पर हावी बनी रही। ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि शासन - प्रशासन में बैठे लोग चाहे किसी भी विचारधारा से जुड़े हों किंतु   आज में जीने की प्रवृत्ति के चलते दूरदृष्टि का अभाव नजर आता है। चुनाव जीतने के लिए तात्कालिक लाभ देने वाले उपायों को ही सब कुछ मान लिया गया  है।  जल प्लावन पहाड़ों से उतरकर जिस प्रकार अब मैदानी क्षेत्रों में भी तांडव कर रहा है उसे भविष्य के बड़े खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए। बुद्धिमत्ता इसी में है कि इसके बचाव के प्रति अभी से कार्ययोजना बनाकर समुचित व्यवस्था की जाए। एक दूसरे को कोसने के बजाय सभी को मिलकर प्रयास करना होंगे क्योंकि प्राकृतिक विपदाएं राजनीति नहीं जानतीं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 September 2025

पेट्रोल - डीजल को जीएसटी में लाये बिना सुधार अधूरे


जीएसटी की दरों में बदलाव करने से आम जनता के उपभोग की अधिकांश वस्तुएँ सस्ती होने का रास्ता साफ हो गया। कुछ चीजों पर जीएसटी समाप्त करने की भी जनमानस में अनुकूल प्रतिक्रिया हुई। इस फैसले की लंबे समय से प्रतीक्षा की जा रही थी। वैसे इन सुधारों को 2021 में ही लागू किये जाने की योजना थी किंतु कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था पर जो दबाव आया उसकी वजह से इसमें विलंब हो गया। बहरहाल जब जागे तब सवेरा की तर्ज पर इस फैसले का स्वागत हो रहा है। आम जनता 22 सितंबर का बेसब्री से इंतजार कर रही है जिस दिन से  नई दरें लागू होंगी। यद्यपि जीएसटी में किये गए इन सुधारों को लेकर भी आलोचनाओं का सिलसिला जारी है किंतु राजनीति से  इतर हटकर देखें तो प्रधानमंत्री ने जन आकांक्षाओं की पूर्ति की दिशा में जो  कदम उठाया उसकी सार्थकता और आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। लेकिन राहत भरे इस  फैसले के बाद अब पेट्रोल - डीजल की कीमतों में कमी का इंतजार पूरे देश को है। इस बारे में ये स्पष्ट है कि  जीएसटी काउंसिल में शामिल अधिकतर राज्य  पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का विरोध करते रहे क्योंकि इस पर मनमर्जी  टैक्स लगाकर वे अपना खजाना भरते हैं। चूंकि  भारत को अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल का आयात करना होता है इसलिए इसके दाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही तय होते हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में कीमतों में कमी के बावजूद  पेट्रोल -  डीजल की कीमतों  में कोई बदलाव नहीं हुआ। यूक्रेन संकट के बाद भारत ने रूस से बेहद किफ़ायती दामों पर कच्चा तेल खरीदने की बुद्धिमत्ता दिखाई किंतु उसका लाभ उपभोक्ता को नहीं मिलने से आम जनता में रोष है। ये आरोप भी लगता है कि सरकारी क्षेत्र की तेल कंपनियों ने भी सस्ते रूसी तेल को पेट्रोल - डीजल में परिवर्तित कर उसका निर्यात करते हुए मोटी कमाई की। ऐसा ही आरोप रिलायंस पर लगता है। सरकारी तेल कंपनियां मौके का लाभ उठाकर कमाई करें इसमें किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन अपने पुराने घाटे का रोना वे कब तक रोएंगी ये बड़ा सवाल है। जहाँ तक बात निजी क्षेत्र की तेल कंपनियों की है तो उनकी सोच विशुद्ध व्यवसायिक होना अपेक्षित  है लेकिन सरकारी क्षेत्र की कंपनियां केवल मुनाफे के पीछे भागती फिरें ये लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के सर्वथा विरुद्ध है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम घाटे में चलें ये भी व्यवहारिक नहीं होता क्योंकि उनके घाटे की भरपाई भी अंततः जनता को ही करनी पड़ती है। लेकिन तेल कंपनियों को यदि भरपूर कमाई हो रही है तो उन्हें पिछले घाटे की भरपाई के साथ - साथ जनता के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के अंतर्गत लाकर उन पर राज्य दर राज्य लगने वाले करों में एकरूपता लाई जाए। एक देश एक कर का जो सिद्धांत जीएसटी लागू करते समय प्रचारित किया गया उसके लिए पेट्रोल - डीजल को राज्यों के क्षेत्राधिकार से बाहर निकालना जरूरी हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था जिस तरह कुलांचे भर रही है उसे देखते हुए प्रधानमंत्री को चाहिए वे इस दिशा में भी आगे बढ़ें। इस बारे में  रोचक तथ्य ये है कि पेट्रोल - डीजल की सबसे बड़ी खरीददार सरकार ही है। ऐसे में यदि इन्हें जीएसटी के दायरे में भी ले आया जाए तो सरकार का खर्च भी बचेगा। परिवहन लागत कम होने से महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि जीएसटी में जो ताजा सुधार किये गए वे तब तक अधूरे रहेंगे जब तक पेट्रोल - डीजल भी उसके दायरे में नहीं  लाये जाते। 



- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 September 2025

जीएसटी में राहत अर्थव्यवस्था की मज़बूती का प्रमाण


15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  जीएसटी  में सुधार करते हुए जनता को दीपावली उपहार देने का जो वायदा किया था वह  पूरा हो गया। गत दिवस जीएसटी काउंसिल की बैठक में  12 और 28 फीसदी वाली दर खत्म करते हुए केवल 18 और 5 दो दरें तय हो गईं। विलासिता की वस्तुओं के साथ ही  तंबाखू उत्पाद तथा महंगे दो और चार पहिया वाहनों के लिए 40 प्रतिशत की दर निर्धारित की गई। दरों के अलावा अन्य  बदलाव आगामी 22 सितंबर से लागू होंगे । इसी तिथि से शारदेय नवरात्रि के साथ दीपावली सीजन शुरू होने से बाजारों में रौनक आ जाती है। दीपावली के बाद विवाहों का सिलसिला प्रारंभ होता है जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस साल अच्छे मानसून के कारण फसल  भी अच्छी आने की उम्मीद बाजार लगाए बैठा है। जीएसटी दरों में किये गए परिवर्तनों का सीधा असर उपभोक्ता बाजार पर होना सुनिश्चित है। हालांकि इस बारे में  काफी समय से विमर्श चल रहा था। जीएसटी  में हर माह हो रही वृद्धि से सरकार का हौसला भी मजबूत था। लेकिन अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाकर भारतीय उद्योग - व्यापार जगत को जो झटका दिया उससे उबरने के लिए भी ये फैसला लेने में तत्परता दिखाई गई। चूंकि हमारे देश में आर्थिक नीतियों पर चुनावों का दबाव रहता है इसलिए ये कहना भी गलत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने दीपावली के बाद होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर जीएसटी सुधार रूपी अस्त्र छोड़ दिया।  सोशल मीडिया पर इस तरह की टिप्पणियां भी देखने मिल रही हैं कि इस फैसले से सरकार ने खुद स्वीकार  कर लिया कि जनता पर जीएसटी का भार ज्यादा था। लोगों को ये आशंका  भी है कि कंपनियां घटे हुए जीएसटी का लाभ उपभोक्ता को नहीं मिलने देंगी और मूल्य बढ़ाकर अपनी तिजोरी भरेंगी। हालांकि ऐसा सोचना निराधार नहीं है किंतु सरकार ने जो राहत दी है उसका स्वागत होना ही चाहिए क्योंकि यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही परिस्थियों में जरूरी हो गई थी। रोजमर्रे की अनेक वस्तुओं को जीएसटी से मुक्त रखना और ज्यादातर को 5 फीसदी के दायरे में ले आना निश्चित तौर पर आम जनता की  क्रय शक्ति को बढ़ायेगा। 28 फीसदी वाली अनेक चीजों पर 18 फीसदी जीएसटी भी उपभोक्ता और उत्पादक दोनों के लिए मददगार होगा। कैंसर सहित जीवन रक्षक अनेक दवाओं के अलावा चिकित्सा सामग्री को 5 प्रतिशत की सूची में लाने का फैसला भी उत्साहजनक है। गत वर्ष परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने स्वास्थ्य बीमा को जीएसटी मुक्त करने संबंधी पत्र लिखकर सार्वजनिक कर दिया था।  उसका संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य के साथ ही जीवन बीमा पर जीएसटी पूरी तरह समाप्त करने का फैसला वाकई संवेदनशीलता की कसौटी पर  खरा है। इसी साल बजट में  आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख करने के अलावा 70 वर्ष की आयु पूरी कर चुके सभी वरिष्ट नागरिकों को 5 लाख तक कि आयुष्मान भारत योजना का लाभ देकर केंद्र सरकार ने जनकल्याण की दिशा में जो कदम बढ़ाये उसी का विस्तार जीएसटी में किये गए ताजा बदलाव हैं। इनके प्रभावस्वरूप आम उपभोक्ता  को जो  लाभ होगा  वह या तो बचत के रूप में राष्ट्रीय विकास में सहायक होगा या फिर बाजार में आयेगा। अनेक राज्यों ने जीएसटी घटने से राजस्व हानि की आशंका व्यक्त करते हुए केंद्र से मुआवजे की जो मांग रखी वह औचित्यपूर्ण है। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो दाम गिरने  से बढ़ने वाली मांग आने वाले कुछ महीनों बाद जीएसटी की मासिक वसूली के आंकड़े को फिर उसी स्तर पर पहुँचा देगी। यद्यपि सरकार को इस बात के लिए सजग रहना होगा कि कंपनियां कीमतों में वृद्धि कर जनता को इस राहत से वंचित न कर सकें । प्रधानमंत्री मोदी वर्तमान में मजबूत वैश्विक नेता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ रूपी दबाव के समक्ष झुकने के बजाय उसका मुस्तैदी से प्रतिकार कर उन्होंने भारत के महाशक्ति बन जाने का परिचय दिया। ट्रम्प द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बताकर जो घमंड दिखाया उसका माकूल जवाब है जीएसटी में किया गया बदलाव। वरना कमजोर आर्थिक स्थिति वाला देश जनता को राहत देने का खतरा कतई मोल नहीं लेता।  इस फैसले के पीछे आर्थिक, राजनीतिक या कूटनीतिक जो भी कारण हो किंतु ये जनहित में उठाया गया बहुप्रतीक्षित कदम है जिसके जरिये दुनिया को आर्थिक क्षेत्र में भारत की मजबूती का संदेश दिया गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 September 2025

परिवारवाद को रोकने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का फैसला स्वागतयोग्य


ये कहना गलत नहीं होगा कि म.प्र भाजपा के नये अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल राजनीतिक विरासत के कारण ही इस पद तक पहुँच सके। उनके स्वर्गीय पिता बैतूल से लोकसभा सदस्य रहे। हेमंत वर्तमान में विधायक हैं। पार्टी के संगठन में पर्दे के पीछे काम करते रहने की वजह से उनका नाम अन्य प्रादेशिक नेताओं की अपेक्षा कम चर्चित था। लेकिन उनका चयन जिस प्रकार सर्वसम्मति से हुआ उससे उनकी जमीनी पकड़ उजागर हो गई। पदभार संभालते ही उन्होंने जिस प्रकार प्रदेश के प्रमुख शहरों का दौरा किया उसके बाद से उनके बारे में लोग जानने लगे। अपने सादगी भरे रहन - सहन के साथ ही दिखावे से परहेज जताने वाले श्री खंडेलवाल ने जनप्रतिनिधियों को मर्यादा में रहने की नसीहत देकर अपनी कार्यशैली से परिचित करवा  दिया। भिंड के भाजपा विधायक द्वारा वहाँ के जिलाधीश से किये गये दुर्व्यवहार पर भोपाल बुलवाकर उनकी खिंचाई से अन्य सांसदों - विधायकों को संकेत दे दिया गया। इसके साथ ही  भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के नये फैसले ने पार्टी में हलचल मचा दी जिसके अनुसार किसी भी सांसद, विधायक या मंत्री के परिवार से किसी अन्य सदस्य को जिला अथवा प्रदेश कार्यकारिणी में जगह नहीं दी जायेगी। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के बेटे को मऊगंज की जिला कार्यकारिणी में पदाधिकारी बनाया गया था किंतु एक परिवार - एक पद के फॉर्मूले के ऐलान के बाद उनसे त्यागपत्र ले लिया गया। दरअसल कांग्रेस सहित अन्य क्षेत्रीय दलों पर  परिवारवाद का आरोप लगाने वाली भाजपा भी धीरे - धीरे उसी बुराई को अपनाने लगी है। भले ही शीर्ष पदों का उत्तराधिकार परिवार के भीतर  देने की स्थिति अभी नहीं है लेकिन ये बात सौ फीसदी सच है कि चंद अपवादों को छोड़कर अब भाजपा के ज्यादातर नेता पत्नी और बेटे - बेटी  को सत्ता या संगठन के पद पर बिठाने का प्रयास करते हैं ताकि वे  उनके जीते जी उनकी  राजनीतिक विरासत संभालने लगे। इसकी वजह से पार्टी में ईमानदारी से मेहनत करने वाले नेता और कार्यकर्ता दरी - फट्टा उठाते ही रह जाते हैं। चुनावी टिकिट के मामले में भी परिवारवाद ने भाजपा में जगह बना ली है। प्रदेश में जनसंघ के जमाने के जो दिग्गज थे उनमें सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र कुमार सखलेचा और कैलाश जोशी के राजनीतिक वारिस उन्हीं के भतीजे और बेटे बने। बाबूलाल गौर की सीट उनकी पुत्रवधु के पास है। कैलाश सारंग के पुत्र मंत्री हैं। नारायण कृष्ण शेजवलकर के बेटे महापौर - सांसद बने। ग्वालियर के सिंधिया परिवार के सभी सदस्य महिमामंडित होते रहे। संगठन में भी यही परिपाटी चल पड़ी। वैसे किसी परिवार के सदस्य यदि एक ही पार्टी में सक्रिय हों तो गलत कुछ भी नहीं किंतु राजनीति विचारधारा पर आधारित होती है। इसलिए उसमें पारिवारिक विरासत को प्राथमिकता देना दूरगामी दृष्टि से नुकसानदेह होता है। नेतागण अक्सर ये सफाई देते हैं कि डॉक्टर और वकील का बेटा जब उसी पेशे में आता है तब उस पर आपत्ति नहीं होती तो नेता के परिजनों पर सवाल क्यों उठते हैं ? लेकिन ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि डॉक्टर और वकील बनने के लिए परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी योग्यता साबित करनी होती है। जबकि राजनीति में परीक्षा के पहले ही चयन हो जाता है। उस दृष्टि से श्री खंडेलवाल ने सांसद , विधायकों और मंत्रियों के परिजनों को जिला और प्रदेश कार्यकारिणी से दूर रखने का जो दुस्साहसिक फैसला किया यदि उस पर वे कायम रह सके तो ये बड़ी सफलता होगी। साथ ही इससे पार्टी में उन कार्यकर्ताओं को आगे आने का अवसर मिलेगा जिनके पास पारिवारिक विरासत जैसा कुछ नहीं है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष को एक परिवार - एक पद के फॉर्मूले को अमल में लाने में पार्टी के स्थापित छत्रपों का विरोध झेलना पड़ सकता है। हो सकता है राष्ट्रीय नेतृत्व उनके निर्णय पर बंदिश लगा दे क्योंकि म.प्र की हवा यदि बाकी राज्यों में भी फैली तो पार्टी के बड़े नेताओं को अपनी संतानों का भविष्य खतरे में दिखने लगेगा। राजनीति में महिलाओं के लिए बढ़ते अवसरों के कारण आजकल बेटी, पत्नी और पुत्रवधू को भी आगे लाने का चलन बढ़ा है। ये भी सच है कि बिना किसी पद के नेतागिरी चमकाना कठिन होता है। बहरहाल म.प्र के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने राजनीति में जो नवाचार किया वह स्वागतयोग्य है। लालकृष्ण आडवाणी ने कभी भाजपा को पार्टी विथ डिफरेंस कहा था। लेकिन सत्ता की दौड़ में वह दावा पीछे छूट गया। श्री खंडेलवाल यदि अपने प्रयास में सफल हो गए तो वह कुछ नेताओं के लिए जरूर पीड़ादायक होगा किंतु पार्टी में उससे नये  उत्साह का संचार होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 September 2025

जैसे ट्रम्प वैसे ही घटिया उनके सलाहकार


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी हरकतों के कारण पूरी दुनिया में हंसी के पात्र बन गए हैं । रही - सही कसर उनके व्यापार सलाहकार पीटर नवारो पूरी किये दे रहे हैं। गत दिवस नवारो की वह टिप्पणी चर्चा का विषय बनी कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदे जाने से वहाँ के ब्राह्मण मुनाफा  कमा रहे हैं जिसकी कीमत  पूरा देश चुका रहा है।  निश्चित रूप से इस तरह की टिप्पणी कोई मूर्ख ही कर सकता है। आज उनकी एक और प्रतिक्रिया सामने आई जिसमें उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि  नरेंद्र मोदी पुतिन और जिनपिंग जैसे साम्यवादियों के साथ क्यों खड़े हैं जबकि लोकतांत्रिक होने के नाते उन्हें अमेरिका के साथ होना चाहिए। ऐसा लगता है ट्रम्प अब हताश होने लगे हैं, उन्होंने भारत पर दबाव बनाने के लिए जितने भी दाँव चले वे अब तक तो बेअसर ही रहे। हालांकि टैरिफ बढ़ने से भारत द्वारा अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात में कमी आने का खतरा उत्पन्न हो गया है। लेकिन उसके बाद भी प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जिससे लगता कि भारत ट्रम्प  के सामने झुकने तैयार  हो। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के लिए वार्ताओं का सिलसिला रुक - रुककर जारी है। लेकिन चीन में गत दिवस संपन्न एस. सी .ओ सम्मेलन में श्री मोदी की रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग से जो नजदीकी दिखाई दी उसने मानो अमेरिका के जले पर नमक छिड़कने का काम कर दिया। मोदी और पुतिन का एक ही कार में चलना और उस दौरान की गई बातचीत ने अमेरिका को विचलित कर दिया। ये बयान भी अमेरिका की खीझ का प्रमाण है कि भारत द्वारा उस पर लगाए गए टैरिफ कम करना चाहता है किंतु अब बहुत देर हो चुकी जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये सब सुनकर प्रतीत होता है कि  ट्रम्प अपने सलाहकारों से स्तरहीन बातें कहलवाकर भारत को उत्तेजित करना चाहते हैं । लेकिन श्री मोदी ने ट्रम्प और उनके सलाहकारों  को अब तक जुबानी जंग  में हावी होने का कोई मौका ही नहीं दिया।  नवारो ने रूसी तेल की खरीद से भारत के ब्राह्मणों को मुनाफे की जो बात कही वह उनकी मूर्खता का परिचायक बन गई। उन्होंने सोचा होगा कि ऐसा कहकर वे भारत में जातीय भावनाओं को भड़काकर आंतरिक आशांति पैदा करवा देंगे किंतु ज्यादातर ने इसे अनावश्यक और अप्रासंगिक बताते हुए हवा में उड़ा दिया । जहाँ तक बात श्री मोदी के पुतिन और जिनपिंग के साथ खड़े होने की है तो एस. सी. ओ सम्मेलन में ये तीनों ही तो केंद्र बिंदु थे। लिहाजा सम्मेलन पर उनकी छाप स्वाभाविक ही थी। यदि ट्रम्प वहाँ होते तब उनको भी ऐसी ही तवज्जो मिली होती। रही बात रूस और चीन के साम्यवादी होने के कारण भारत को लोकतांत्रिक अमेरिका के नजदीक होने की तो इसके लिए ट्रम्प खुद जिम्मेदार हैं। वरना भारत ने रूस और अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों में जो संतुलन बनाये रखा उसकी पूरी दुनिया कायल है। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू होने पर भी भारत का रवैया समझदारी से भरा रहा। इसीलिए उसने न तो रूस का पक्ष लिया और न ही अमेरिकी दबाव में उससे व्यापारिक रिश्ते ही खत्म किये। इसी तरह  चीन को साम्यवादी कहकर भारत को उससे दूर रहने की समझाइश का सवाल है तो अमेरिका को ऐसा कहने का नैतिक  अधिकार ही नहीं है क्योंकि आज चीन आर्थिक प्रगति के जिस शिखर पर विराजमान है उसकी वजह तो अमेरिका सहित उन सभी लोकतंत्रिक और पूंजीवादी देशों द्वारा सस्ते श्रमिकों के लालच में वहाँ किया गया अपार पूंजी निवेश है। यदि अमेरिका को लोकतंत्र से इतना ही लगाव होता तब बजाय चीन के भारत में पूंजी लगाता। ट्रम्प भारत पर तो 50 फीसदी टैरिफ लादकर उससे अपेक्षा कर रहे है कि वह उनके आगे - पीछे मंडराए लेकिन चीन पर टैरिफ बढ़ाने के बाद उन्होंने अपने पाँव पीछे खींच लिए। सही बात ये है कि खुद को अक्लमंद मानने की आपाधापी में ट्रम्प पूरी दुनिया को बेवकूफ समझने की मूर्खता कर बैठे। और ऊपर से नवारो जैसे घटिया सलाहकार रखकर अपनी भद्द पिटवा रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी