Wednesday, 15 October 2025

महिला पुलिस अधिकारी का आपराधिक दुस्साहस चिंता का विषय


पहले जमाने में बच्चे चोर - पुलिस नामक खेल खेलते थे। सांकेतिक तौर पर समझें तो पुलिस और चोर एक दूसरे के विपरीत कहे जाते थे। पुलिस का काम चोर को पकड़ना होता था। चोर से अभिप्राय अपराधी से है। अर्थात कानून के विरुद्ध काम करने वाले को पकड़कर सजा दिलवाना ही पुलिस  का आधारभूत कर्तव्य है। आम नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए भी उसी की ओर निहारता है। देशभक्ति - जनसेवा जैसे पवित्र ध्येय के लिए कार्यरत  पुलिस की वर्दी धारण किये हर व्यक्ति से अपराधी डरें , यह एक आदर्श स्थिति होती है किंतु दुर्भाग्य से उससे गैर कानूनी कार्य करने वालों की बजाय कानून पसंद नागरिक भयभीत होते हैं। अपराधी बेखौफ होकर घूमते हैं जबकि किसी शरीफ व्यक्ति को  थाने जाना पड़े तो वह अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार से आशंकित हो जाता है। इसका कारण पुलिस महकमे की छवि में लगे असंख्य दाग हैं जिनके चलते  वर्दीधारी व्यक्ति कानून के  रक्षक के बजाय अपराध और अपराधियों का संरक्षक नजर आने लगा है।  समाज में ये धारणा प्रचलित है कि पुलिस और अपराधियों के बीच अघोषित हिस्सेदारी है। अक्सर ये देखने में आता है कि पुलिस जिस मामले में रुचि रखती है उसमें तो त्वरित कार्रवाई होती है , अन्यथा लीपापोती करने में संकोच नहीं करती। इस संबंध में म.प्र के सिवनी जिले में बीते दिनों हुआ एक कांड चर्चा में है। वहाँ की पुलिस को खबर मिली कि जबलपुर से आ रही एक कार में हवाला कारोबारी करोड़ों रुपये नगद लेकर नागपुर जा रहे हैं।  लिहाजा सिवनी के पुलिस वाले मुस्तैद होकर उस वाहन की प्रतीक्षा करने लगे और जैसे ही वह आया उसे पकड़कर पूरी रकम जप्त कर ली। निश्चित तौर पर ये बड़ी सफलता थी जिसके लिए उनको पुरस्कृत किया जाता। लेकिन इतनी बड़ी रकम देखकर उनका ईमान डोल गया और बजाय  सरकारी खजाने में जमा किये जाने के उसकी बंदरबांट कर ली गई। कार में बैठे लोगों को बिना कार्रवाई के भगा दिया गया। लेकिन हवाला कारोबारी द्वारा इसकी शिकायत पुलिस के उच्च अधिकारियों से किये जाने के बाद  जब जाँच हुई तब एक महिला पुलिस अधिकारी और थाना प्रभारी  सहित दर्जन भर पुलिस कर्मी दोषी  पाए गए जिन पर डकैती जैसा गंभीर प्रकरण दर्ज किया गया है। इस बंदरबाँट में शामिल कुछ अन्य लोग भी महाराष्ट्र से पकड़े जा चुके हैं। पकड़ी गई  राशि का अधिकांश हिस्सा जप्त हो चुका है। जांच में नई - नई जानकारियाँ आ रही हैं जिनसे कुछ और खुलासे हो सकते हैं। बहरहाल प्रथम दृष्ट्या ये तो सामने आ ही गया कि सिवनी पुलिस ने हवाला रकम को जप्त कर दोषियों पर विधि सम्मत कारवाई करने के बजाय  उसको मिलकर हड़प लेने का फैसला किया। यदि हवाला कारोबारी हिम्मत नहीं दिखाता तब शायद तीन करोड़ की मोटी रकम का बंटवारा करने वाले  धूमधाम से दिवाली मनाने में जुट जाते। ये तंज भी सुनने मिल रहे हैं कि सिवनी के पुलिस वालों ने  पूरी रकम मिलकर डकारने का जो लालच दिखाया वह उनके गले का फंदा बन गया। यदि तीन करोड़ में कुछ बड़े वर्दीधारियों को शामिल कर लिया जाता तब सभी की शुभ दीपावली हो जाती। इस घटना से पुलिस की छवि खराब हुई ये कहने की कोई जरूरत ही नहीं है क्योंकि आज के युग में उसके बारे में अच्छी राय रखने वाला इंसान अपवाद स्वरूप ही मिल सकता है। आम अवधारणा यही है कि पुलिस अपराधों को रोकने के बजाय उनको संरक्षण देने में लिप्त है। लेकिन इस कांड में एक महिला अधिकारी द्वारा जप्त हुई  हवाला रकम में से आधा हिस्सा हड़प लेने से आश्चर्य हुआ क्योंकि पुलिस  में पदस्थ  महिलाएं भी इतनी दिलेरी से यदि इस तरह के आपराधिक कृत्य करेंगी तब सरकार का तो जो होना है सो होगा किंतु समाज के भविष्य को लेकर चिंता उत्पन्न होती है। हालांकि शासकीय विभागों में काम करने वाली अन्य  महिला कर्मी और अधिकारी भी घूसखोरी में पकड़ी जाती हैं किंतु संदर्भित प्रकरण की केंद्र बिंदु महिला एस. डी. ओ. पी ने जो दुस्साहस किया वह सोचने बाध्य करता है। आधी आबादी को बराबरी का दर्जा देने की मंशा हर किसी की है लेकिन वह भी यदि भ्रष्टाचार रूपी गंदे नाले में डुबकी लगाने लगी तब बच्चों को नैतिकता और ईमानदारी के संस्कार कौन देगा ये प्रश्न चिंतित करता है।  इसी के साथ आम जनता की ये टिप्पणियां भी सोचने को बाध्य कर देती हैं कि कोई नहीं फंसेगा क्योंकि सवाल वर्दी के रुतबे का भी तो है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 October 2025

विश्व बैंक के बाद मुद्रा कोष द्वारा भी भारत की प्रशंसा शुभ संकेत



विश्व बैंक द्वारा हाल ही में चालू वित्तीय वर्ष के दौरान  भारत की जीडीपी में वृद्धि के अनुमान को 6.3 से बढ़ाकर 6.5 फीसदी किये जाने से ये बात स्पष्ट हो गई कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आखिर क्यों भारत पर अनाप - शनाप टैरिफ थोप रहे हैं। उल्लेखनीय है ट्रम्प ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मरी हुई बताकर उसका मजाक उड़ाया था । लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने भी उनके दावे को सही बताकर केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों को गलत बताने में देर नहीं की। लेकिन जब विश्व बैंक ने जब भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि की रफ्तार में और वृद्धि होने का अनुमान व्यक्त किया तब न तो ट्रम्प कुछ बोल सके और न ही श्री गाँधी। विश्व बैंक के बाद अब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की  प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने भारत की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि संरचनात्मक सुधारों को लेकर उसने सबको चौंकाया है।  जॉर्जीवा ने यह भी कहा कि चीन की आर्थिक रफ्तार धीमी होने के विपरीत भारत प्रमुख विकास इंजन के रूप में उभर रहा है। वाशिंगटन में होने वाली मुद्रा कोष और विश्व बैंक की सालाना बैठकों से पहले की गई उक्त टिप्पणी को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का ताजा प्रमाणपत्र माना जा सकता है। मुद्रा कोष प्रमुख  ने कहा कि वे भारत को उसके साहसिक सुधारों के कारण बहुत महत्व देती हैं क्योंकि उसने उन सभी को गलत साबित कर दिया जो कहते थे कि बड़े पैमाने पर डिजिटल आईडी लागू करना उसके लिए संभव नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक को राजनीतिक व्यक्ति नहीं माना जा सकता जो किसी देश की अनावश्यक प्रशंसा करें। इसी तरह  विश्व बैंक भी ऐसी संस्था  नहीं है जो भारत की अर्थव्यवस्था पर अतिरंजित या तथ्यहीन टिप्पणी करें। इस प्रकार  जब विश्व के दो बड़े आर्थिक संस्थान भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हों तब उसकी प्रामाणिकता पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। सबसे बड़ी बात मुद्रा कोष  प्रमुख द्वारा ये स्वीकार किया जाना है कि कोविड नामक महामारी के बाद वैश्विक विकास दर में गिरावट के बावजूद भारत और चीन उसे सहारा दिये हुए हैं। हालांकि चीन की विकास दर में भी कमी आई है किंतु भारत अपने बेहतर आर्थिक प्रबंधन के कारण दुनिया में आर्थिक विकास का अगुआ बन गया है। भारत की जीडीपी इस वर्ष भले ही 6.8 फीसदी न बढ़े जैसी कि भारतीय रिजर्व बैंक के अध्यक्ष ने हाल ही में उम्मीद जताई किंतु विश्व बैंक के अध्यक्ष  ने भी कुछ माह पूर्व किये आकलन में संशोधन करते हुए उसे 6.5 फीसदी कर दिया जो चीन से दो गुना है, तब मुद्रा कोष  प्रमुख द्वारा भारत की प्रशंसा में की गई टिप्पणी की सार्थकता स्वयंसिद्ध है। हाल ही में किये गए जीएसटी सुधारों ने  उद्योग - व्यापार जगत में जिस उत्साह का संचार किया वह विश्व बैंक और मुद्रा कोष के आशावाद का आधार है। खुदरा महंगाई  में कमी और रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि नहीं किया जाना भी अच्छे संकेत हैं। बाजार के उतार - चढ़ावों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का ये आकलन मायने  रखता है कि ग्रामीण भारत में भी अब उन वस्तुओं की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है जो कुछ समय पहले तक शहरी जीवन शैली का हिस्सा मानी जाती थीं। यहाँ तक कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते उपभोक्ताओं को देखकर चकित हैं। बीते वित्तीय वर्ष में प्रत्यक्ष करों में हुई वृद्धि भी जीडीपी में वृद्धि के अनुमानों की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि देश आर्थिक तौर पर मजबूत है। सबसे बड़ी बात ये है कि कोरोना के बाद से जहाँ अनेक संपन्न देशों की अर्थव्यवस्था में गिरावट आई वहीं भारत उस संकट से उबरने के बाद तेज गति से आगे बढ़ा है। अमेरिका भी इसी से भयभीत है जिसका प्रमाण ट्रम्प द्वारा किया गया टैरिफ हमला है। उस दबाव के आगे भारत के नहीं झुकने का ही परिणाम है कि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तक हमारी प्रशंसा करने प्रेरित हुए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 October 2025

अफगानिस्तान के साथ रिश्ते सुधरना शुभ संकेत


2021 में जब अमेरिकी फ़ौजें वापस लौटीं और 20 सालों बाद तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में आये तब भारत के मुसलमानों ने इस अंदाज में जश्न मनाया मानों ये जंग उन्हीं ने जीती हो। उनके साथ ही वामपंथी तबका भी उल्लासित था क्योंकि वह अमेरिका की शिकस्त थी। चूंकि उस समय मोदी सरकार और अमेरिका के रिश्ते काफी अच्छे थे लिहाजा अप्रत्यक्ष रूप से सरकार पर निशाने साधे गए। भारत के लिए चिंता का कारण ये था कि अमेरिकी आधिपत्य के दौरान अफगानिस्तान में अनेक विकास कार्यों के ठेके भारतीय कंपनियों के पास थे। तालिबानी सत्ता  का  पाकिस्तान और चीन ने जिस तरह स्वागत किया उससे भी हमारी चिंताएं बढ़ने लगीं। पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल तालिबानी अड्डों के लिए होता रहा इसलिए उसका सोचना था कि वह काबुल में  इस्लामिक सरकार के साथ बेहतर तालमेल बनाकर भारत को पूरी तरह बाहर कर देगा। चीन की रुचि भी इस पहाड़ी देश की खनिज संपदा पर थी। उल्लेखनीय है अफगानिस्तान में मौजूद बहुमूल्य खनिजों के कारण ही रूस और अमेरिका दोनों इस देश पर काबिज होने का प्रयास करते रहे किंतु आखिरकार उन्हें छोड़कर जाना पड़ा। और इस तरह ये स्पष्ट हो गया कि अफगानिस्तान को साम्राज्यों की कब्रगाह क्यों कहा जाता है। अमेरिकी फ़ौजों के पलायन के बाद वहाँ काफी समय तक अनिश्चितता  रही क्योंकि कुछ लड़ाकू गुट थे जो तालिबान के झंडे तले आने राजी नहीं थे। इससे लगा अफ़ग़ानिस्तान के दुर्दिन दूर नहीं होंगे और  गृहयुद्ध जारी रहेगा। हालांकि धीरे - धीरे तालिबान ने सभी विरोधियों को  घुटने टेकने मजबूर कर दिया। सत्ता में आते ही उन्होंने   महिलाओं पर तरह -  तरह की पाबंदी लगाने के अलावा इस्लामिक व्यवस्था लागू कर दी। हालांकि भारत ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी। लेकिन वहाँ अपना दूतावास 2022 में दोबारा खोलकर कूटनीतिक, संवाद के साथ वहाँ रहने वाले हिंदुओं और सिखों के हितों की रक्षा का प्रबंध किया। अफगानिस्तान भी दिल्ली में दूतावास और मुंबई में वाणिज्यिक काउंसलेट संचालित करता आ रहा है। इस बीच   बड़ा बदलाव ये हुआ कि सीमा विवाद को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनातनी बढ़ने लगी।  इसका कारण  पाकिस्तान के पश्चिमी सीमांत इलाके में बने तालिबानी अड्डों को न हटाया जाना है। पाकिस्तान को लगता था कि तालिबानी सत्ता आते ही उसके यहाँ  चल रहे तालिबानी अड्डे बंद हो जाएंगे  किंतु अफगानिस्तान ने उन क्षेत्रों को अपना बताते हुए अंग्रेजों द्वारा तय की गई डूरंड रेखा नामक सीमा को अमान्य कर दिया। धीरे - धीरे दोनों के बीच तनाव  और बढ़ा और गत सप्ताह बाकायदे युद्ध जैसे हालात   बन गये। भारत ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए  अफगानिस्तान से रिश्ते सुधारने के घोषित- अघोषित कदम उठाये । उसी का परिणाम उसके विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी का भारत दौरे पर आना है। भारतीय नेताओं से मिलने के बाद उनका ये बयान काफी मायने रखता है कि उनका देश अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत पर हमले के लिए नहीं होने देगा। स्मरणीय है कश्मीर में आतंकवाद के लिए पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सक्रिय इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों के सदस्यों का भी उपयोग किया था। विदेश मंत्री के भारत आगमन से पाकिस्तान के पेट का दर्द तो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। उसे डर है तालिबानी सत्ता के साथ भारत की दोस्ती उसके लिए खतरे का कारण बनेगी जबकि भारत के लिए ऐसा होना  दूरगामी हितों के लिए बेहद फायदेमंद रहेगा। हालांकि इसके बाद भी भारत ने अभी तक अफगानिस्तान सरकार को मान्यता नहीं दी। बावजूद इसके  मुत्तकी ने राजनयिक चर्चाओं के अलावा देवबंद के मुस्लिम केंद्र जाकर बड़ा संदेश दे दिया। लेकिन अपने देश का जो तबका अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने पर बल्लियों उछल रहा था वही उसके विदेश मंत्री की भारत यात्रा की कूटनीतिक उपयोगिता को नजरंदाज करते हुए उसमें आलोचना के बिंदु तलाश रहा है। पत्रकार वार्ता में महिला पत्रकारों को अनुमति नहीं देने के अलावा मुत्तकी की देवबंद यात्रा पर योगी आदित्यनाथ द्वारा उनका स्वागत किये जाने पर तंज कसे जा रहे हैं। सरकार में बैठे लोगों के तालिबान को लेकर अतीत में दिये बयानों का भी हवाला दिया जा रहा है। ऐसा करने वाले भूल जाते हैं कि वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है , हमें अपनी विदेश नीति का भी तदनुसार निर्धारण करना जरूरी है। जिसका उदाहरण अमेरिकी दबाव का मुकाबला करने के लिए चीन के साथ निकटता बढ़ाना है। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति देखते हुए भारत के लिए वहाँ अपने लिए जगह बनाना जरूरी है। यूँ भी अफगानिस्तान के अंदरूनी राजनीति में हमारी भूमिका रही है। पिछली सत्ता के साथ अच्छे रिश्तों के अलावा रूसी कब्जे के दौरान वहाँ के शासक नजीबुल्लाह के परिवार को भारत ने शरण दी थी। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रहे हामिद करजई तो भारत में ही पढ़े थे। आज भी  हिन्दू और सिख आबादी वहाँ रहती है। ये देखते हुए दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त की तर्ज पर यदि भारत सरकार ने अफगानिस्तान के साथ  तार जोड़ने की पहल की तो परिणाम की प्रतीक्षा किये बिना जल्दबाजी में टिप्पणियां करना अनुचित है। कूटनीति में बहुत कुछ ऐसा होता है जो देखकर भी समझ नहीं आता। और ये भी कि दो देशों के बीच तनाव के बाद भी कूटनीतिक संवाद चलता रहता है। कंधार विमान अपहरण के समय भारत और अफगानिस्तान के बीच पूरी तरह अनबोला था। तब भी कूटनीतिक संवाद के जरिये ही बात बनी थी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 October 2025

तो प्रशांत और बाकी में क्या अंतर रह जाएगा


बिहार  में सर्वाधिक  चर्चा में हैं जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर।  जिस तरह  दिल्ली की राजनीति में अरविंद केजरीवाल का  उदय हुआ था उसी तरह प्रशांत भी प्रचलित तौर - तरीकों से अलग सीधे जनता के बुनियादी मुद्दों को उठा रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में वे नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान को निर्देशित कर चर्चा में आये। अबकी बार  मोदी सरकार का नारा और चाय पर चर्चा उन्हीं के दिमाग की उपज थी। लेकिन अगले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में वे नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की नैया के खेवनहार बन बैठे। बिहार में बहार है, नीतिशै कुमार जैसा नारा देकर उन्होंने मोदी लहर को रोकने का कारनामा कर दिखाया। हालांकि उसके पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी ऐसा ही कर चुकी थी। लेकिन बिहार जैसे राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण राज्य में श्री मोदी के प्रभाव को क्षीण करते हुए नीतीश - लालू के गठजोड़ को सफलता दिलवाकर प्रशांत चुनावी जीत की गारंटी बन गए।  बाद में वे नीतीश के काफी करीब आकर बिहार सरकार के सलाहकार भी बन बैठे किंतु जल्द ही उनके साथ पंगा हो गया। बावजूद उसके  बतौर चुनाव रणनीतिकार  उनकी मांग बढ़ने लगी। जगन मोहन  रेड्डी , स्टालिन और ममता बैनर्जी सहित 8 पार्टियों के चुनावी सलाहकार प्रशांत केवल एक बार विफल हुए जब उन्होंने उ.प्र में कांग्रेस का चुनाव अभियान संचालित किया। एक समय ऐसा भी आया जब उनके कांग्रेस में शामिल होने की अटकलें लगने लगीं। लेकिन राहुल गाँधी के साथ तालमेल नहीं बैठ पाने के कारण वह मुहिम आगे नहीं बढ़ पाई। राजनीति से इतर वे विभिन्न कंपनियों के व्यवसायिक सलाहकार भी हैं जिन्होंने बिहार चुनाव लड़ने के लिए जन सुराज को करोड़ों का चंदा भी दिया। जिसे श्री किशोर अपनी पेशेवर सलाह का मेहनताना बताते हैं। बीते दो - तीन साल  वे बिहार में  गाँव - गाँव घूमकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटे रहे । पार्टी बनाकर उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा स्पष्ट कर दी।  शुरुआत में लगा था  वे एनजीओ शैली में अपने गृहराज्य की सूरत और सीरत सुधारने का बीड़ा उठाएंगे। शायद जनता से प्रत्यक्ष जुड़ने के बाद उनकी समझ में आया होगा कि समूची व्यवस्था चूंकि  राजनीतिक सत्ता के शिकंजे में है इसलिए बिना उसके कुछ कर पाना असंभव  है। उनके राजनीति में प्रवेश को शुरुआत में तो सभी ने हल्के में लिया। लेकिन बुनियादी मुद्दों पर लोगों का ध्यान खींचते हुए उन्होंने अपना जनाधार बढ़ाया। वे कितनी सीटें लेंगे ये तो अभी कह पाना मुश्किल है किंतु विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत उस वर्ग को आकर्षित करने में सफल होते दिख रहे हैं जो नीतीश और तेजस्वी यादव दोनों से नाराज है। इसीलिए वे एनडीए और महागठबंधन दोनों पर बराबरी से हमलावर हैं। नीतीश उनकी नजर में अच्छे व्यक्ति होने के बाद भी बतौर मुख्यमंत्री बिहार के लिए कुछ नहीं कर सके वहीं दूसरी ओर तेजस्वी को नौ वीं फेल प्रचारित कर वे उनको अयोग्य साबित करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री पर तीर छोड़ते हुए वे कहते हैं कि बिहार के पिछड़ेपन को दूर करने में वे विफल रहे। कांग्रेस और राहुल की आलोचना का भी कोई मौका वे नहीं छोड़ते। बिहार की राजनीति को जाति के जाल से निकालकर विकास केंद्रित बनाने की उनकी बातें उम्मीदें जगा रही थीं। लेकिन जन सुराज ने 50 उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की उसे देखकर उनके प्रति आकर्षित हो रहे  लोगों को धक्का पहुंचा । यद्यपि राजनीतिक  विश्लेषकों ने श्री किशोर के राजनीतिक चातुर्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने जातीय समीकरणों का ध्यान रखते हुए उम्मीदवारों का जो चयन किया उसने एनडीए और महागठबंधन दोनों की नींद उड़ा दी। मुस्लिम बहुल सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारने का उनका निर्णय महागठबंधन को नुकसान पहुंचाने वाला माना जा रहा है। लेकिन सवाल ये है कि यदि प्रशांत किशोर भी जाति को ही चुनाव जीतने का फार्मूला मानते हैं तो अब तक उन्होंने जिस बदलाव के वादे और दावे बिहार की जनता से  किये वे सब हवा - हवाई होकर रह जाएंगे। ये दुर्भाग्य ही है कि राजनीति में ताजी हवा का जो झोका आता है वह भी उसके वातावरण में आकर प्रदूषित होने जाता है। लगता है प्रशांत दूसरों को चुनाव जीतने के जो फॉर्मूले बताया करते थे , उन्हीं को  स्वयं भी अपना रहे हैं। लेकिन  तब उनमें और बाकी में क्या अंतर रह जाएगा ? उम्मीदवारों  की पहली सूची आने के बाद जन सुराज में भी वैसा ही हंगामा हुआ जैसा अन्य दलों में देखने मिलता है। ये इस बात का संकेत है कि प्रशांत के साथ भी ऐसे तत्व जुड़ गए हैं जिनका उद्देश्य बिहार की बजाय अपनी बदहाली दूर करना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 October 2025

क्या मायावती और बसपा के सुनहरे दिन लौटेंगे


बसपा  संस्थापक कांशीराम के जीते जी ही  मायावती दलित राजनीति का चेहरा बन चुकी थीं। तीन बार भाजपा के सहयोग के अलावा एक बार वे पूर्ण बहुमत के साथ  पूरे पांच साल उ.प्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य की मुख्यमंत्री रहीं। कांशीराम के दौर में  उ.प्र की दीवारों पर तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार जैसे नारे दिखाई देते थे किंतु मायावती ने उसे हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है में बदल दिया। यही नहीं महामंत्री पद प्रख्यात अधिवक्ता सतीश चंद्र मिश्र को सौंपकर सवर्ण जातियों को लुभाने का दाँव भी चला।  2007 के विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत में उक्त नारे का खासा योगदान रहा। उनकी पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौर में शासन और प्रशासन  में यादवों के बढ़ते वर्चस्व के कारण न सिर्फ दलित अपितु  सवर्ण जातियाँ भी त्रस्त हो उठी थीं। भाजपा उस समय  पाँव जमाने की कोशिश में थी। इसलिए लोगों ने मायावती को सत्ता सौंप दी।   उन्होंने कानून व्यवस्था में तो काफी सुधार किया किंतु  जाति की राजनीति से बाहर आने का साहस नहीं दिखा सकीं जिसका खामियाजा अगले चुनाव में भुगतना पड़ा। उसके बाद अखिलेश यादव पांच साल मुख्यमंत्री बने और 2017 में भाजपा ने योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व  पहली बार स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बनाई जो आज भी सत्ता में है। सत्ता से हटने के बाद मायावती और बसपा दोनों का ग्राफ गिरता गया। आज की स्थिति में वे न सांसद हैं न विधायक। जिस उ.प्र में उनकी तूती बोलती थी वहाँ बसपा का मात्र एक विधायक है जबकि लोकसभा में  नामलेवा तक नहीं बचा। एक समय था जब मायावती के आगे  टिकिट मांगने वालों की भीड़ नजर आती थी जिनमें सवर्ण भी होते थे किंतु जैसे - जैसे भाजपा आगे बढ़ी बसपा सिमटती गई। 2019 में तो मायावती ने सपा तक से समझौता किया और उन मुलायम सिंह यादव के प्रचार हेतु मैनपुरी गईं जिनके साथ  सांप - नेवले जैसी दुश्मनी थी। लेकिन अवसरवादी राजनीति और अविश्वसनीय स्वभाव के कारण वे राजनीतिक बिरादरी में अलग - थलग पड़ गईं। बीते कुछ सालों से तो उनकी चर्चा भी कम होने लगी थी। भाजपा ने दलित वोट बैंक को अपनी तरफ खींचकर मायावती को राजनीतिक तौर पर दिवालिया बना दिया। उनके ऊपर भाजपा की बी टीम होने का आरोप भी लगने लगा। अपना उत्तराधिकारी किसी दलित को चुनने की बजाय उन्होंने अपने भतीजे आनंद को आगे बढ़ाया जिससे नाराज होकर अनेक कद्दावर दलित नेता पार्टी छोड़ गए। लेकिन अपने शक्की स्वभाव के चलते उन्होंने आंनद को भी पार्टी और परिवार से निकाल बाहर किया। अपने जन्मदिन पर बड़ी रैली आयोजित कर उपहार बटोरने वाली मायावती काफी समय से अकेलापन झेल रही थीं। इसी बीच  उ.प्र में चंद्रशेखर आजाद नामक दलित नेता की भीम आर्मी ने बसपा के कमजोर होने से उत्पन्न  दलित नेतृत्व के खालीपन को भरने के प्रयास किये। हालांकि उनका प्रभाव पश्चिमी उ.प्र तक ही सीमित है किंतु लोकसभा चुनाव जीतकर वे लोकसभा में दलित चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्होंने मायावती के साथ जुड़ने की काफी पहल की किंतु उनकी तरफ से ठण्डा रुख दिखाए जाने के कारण चंद्रशेखर अपना जनाधार बढ़ाने में लग गए। राजनीतिक विश्लेषक भी मायावती को डूबते जहाज का कप्तान मानने लगे थे। लेकिन गत दिवस कांशीराम की पुण्यतिथि पर उन्होंने लखनऊ में  विशाल रैली का आयोजन कर न सिर्फ बसपा की ताकत का प्रदर्शन किया अपितु भतीजे आनंद को एक बार फिर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर अनिश्चितता समाप्त कर दी। उक्त रैली में मायावती ने कांग्रेस और सपा पर तीखे हमले किये। उनके निशाने पर भाजपा भी रही लेकिन मुख्यमंत्री योगी की प्रशंसा कर सपा और कांग्रेस को उन्हें भाजपा की बी टीम प्रचारित करने का अवसर भी दे दिया। मायावती ने रैली की तैयारी जिस गुपचुप तरीके से की उससे साफ हो गया कि वे 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई हैं। हालांकि ये सवाल भी उठने लगा कि क्या बसपा और मायावती का सुनहरा दौर वापस लौटेगा क्योंकि अब न तो कांशीराम का नाम भुनाने लायक बचा और न ही उनकी अपनी विश्वसनीयता । भतीजे आनंद को तो खुद उन्होंने ही विवादास्पद बना दिया था जो भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हैं। सही बात ये है कि अपने गुरु के विपरीत मायावती ने बसपा को दलित समुदाय की बजाय अपनी निजी जागीर बना लिया। यही वजह है कि पार्टी के वफादार रहे नेता छोड़कर चले गए। ये देखते हुए कल की रैली के बाद बसपा उ.प्र की राजनीति में क्या दोबारा अपने पैर जमा सकेगी और मायावती फिर दलित राजनीति का  चेहरा बन सकेंगी, इस सवाल का उत्तर फिलहाल कोई नहीं दे सकता क्योंकि 2007 में  उ.प्र की मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका नाम  प्रधानमंत्री बनने वाले नेताओं के तौर पर लिया जाने लगा था। लेकिन आज वे किसी सदन की सदस्य तक नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 October 2025

इजराइल का अस्तित्व स्वीकारने में ही मुस्लिम देशों की भलाई


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने हमास और इजराइल के बीच  युद्ध रुकवाकर शांति प्रक्रिया शुरू करवा दी। इसके अंतर्गत इजरायल  गाजा पट्टी के उन इलाकों को खाली कर देगा जिन पर उसने कब्जा कर लिया। साथ ही दोनों एक दूसरे के बंधक छोड़ेंगे। हालांकि ये शर्त इजराइल को महंगी पड़ेगी क्योंकि उसके पास हमास के बड़े आतंकी हैं जिन्हें रिहा करना आदमखोर शेर को पिंजरे से निकालने जैसा होगा। लेकिन उस पर अपने बंधकों को छुड़ाने का जो घरेलू दबाव है उसकी वजह से वह हमास के आतंकियों को रिहा करने बाध्य है। ट्रम्प के अनुसार अंतर्गत इजरायल गाजा से अपने सैनिक  हटाना शुरू कर देगा।  गाजा के पुनर्निर्माण को लेकर  ट्रम्प से हमास कितना सहमत होगा ये कह पाना फिलहाल कठिन है क्योंकि अमेरिका गाजा पट्टी को दुबई जैसा विकसित करने की योजना बना रहा है। वह चाहता है   हमास गाजा का शासन छोड़कर आतंकी गतिविधियां बन्द कर दे। उल्लेखनीय है  गाजा पट्टी का प्रशासन 2007 में हमास ने हथिया लिया था । कहने को तो वह एक राजनीतिक आंदोलन था लेकिन ईरान सहित कुछ अन्य मुस्लिम देशों की मदद से उसने आतंकवादियों जैसा ढांचा खड़ा कर लिया। और इसीलिए वह इजराइल के अस्तित्व को ही मान्य नहीं करता। 7 अक्टूबर 2023 को उसने इजराइल पर सैकड़ों राकेट और ड्रोन से बड़ा हमला किया। उसके लड़ाकों ने इजराइल में घुसकर बड़े पैमाने पर हत्याएं कीं और  बड़ी संख्या में इजराइली नागरिकों को बंधक बनाकर ले गए। अपनी अभेद्य सुरक्षा प्रणाली में सेंध लगने से  प्रधानमंत्री नेतन्याहू सवालों के घेरे में आ गए। हमास ने वह दुस्साहस क्यों और कैसे किया इसका खुलासा भी जल्द हो गया। दरअसल  इजराइल और सऊदी अरब के बीच  समझौते की बातचीत अंतिम चरण में थी। उसके पहले संयुक्त अरब अमीरात  से भी इजराइल का समझौता हो चुका था। ऐसे में ईरान और तुर्किये को लगा कि मुस्लिम संपन्न देश इजराइल से  रिश्ते बना लेंगे तो  फिलीस्तीनियों का अपना देश बनाने का सपना हमेशा के लिए टूटकर रह जाएगा। इसीलिए उनने हमास को उकसाकर  हमला करवा दिया। प्रतिक्रियास्वरूप नेतन्याहू ने जो पलटवार किया उसके कारण सऊदी अरब और इजराइल के बीच की बातचीत तो रुक गई लेकिन इजराइल हमास को नेस्तनाबूत करने के लिए गाजा को तबाह  करने पर आमादा हो उठा। उसके बाद जो हुआ वह पूरी दुनिया ने देखा। गाजा तक ही सीमित न रहकर लेबनान और यमन पर भी इजराइल ने  कहर बरपाया जहाँ हिजबुल्ला और हूथी जैसे इस्लामिक आतंकी संगठन उस पर हमले कर रहे थे। गाजा को इजराइल के हमलों ने खंडहर में बदल दिया। हजारों लोग मारे गए। लाखों बेघर हो गए। भोजन - पानी, दवाओं का टोटा हो गया। बिना इलाज के हजारों बच्चे चल बसे। कुल मिलाकर गाजा पट्टी पूरी तरह से तबाह हो गई ।  लेकिन हमास को ईरान और टर्की से अस्त्र - शस्त्रों की आपूर्ति जारी रहने से वह घुटने टेकने तैयार नहीं हुआ। और तब इजराइल ने ईरान को निशाना बनाया। कहने को तो उसके परमाणु बम बनाने की क्षमता को नष्ट करना था किंतु असली उद्देश्य उसे हमास की मदद से रोकना था। अमेरिका ने भी ईरान के परमाणु संयंत्रों पर अपने सबसे शक्तिशाली बमवर्षकों से हमला किया। जिसके बाद उसके तेवर ढीले पड़े और गाजा में युद्धविराम की पटकथा तैयार होने लगी। इस बीच अनेक यूरोपीय देशों ने फिलीस्तीन को स्वतंत्र देश की  मान्यता देकर इजराइल पर दबाव बनाना चाहा किंतु नेतन्याहू विचलित नहीं हुए। फिलीस्तीन के अस्तित्व को स्वीकार करने वे किसी भी स्थिति में राजी नहीं हैं। संरासंघ महासभा में उनका हालिया भाषण इसका प्रमाण है। लेकिन नोबल शांति पुरस्कार के लिए हाथ पाँव मार रहे ट्रम्प ने इजराइल पर दबाव बनाकर युद्धविराम के लिए राजी कर लिया। नेतन्याहू इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं थे। उनकी दूरगामी योजना हमास को समूल नष्ट करने के अलावा गाजा पर पूर्ण आधिपत्य बनाये रखने की थी। लेकिन ट्रम्प के मन में गाजा को लेकर कुछ अलग ही पक रहा है और इसीलिये वे हमास को धमकाने के साथ ही इजराइल पर भी दबाव बनाने से बाज नहीं आये।  जबकि इजराइली प्रधानमंत्री सांप का फन कुचलने के लिए अड़े थे। ट्रम्प जिस तरह की कूटनीति का प्रदर्शन कर रहे हैं उसमें गंभीरता का अभाव होने के साथ ही विश्वसनीयता की भी कमी है।  अपनी सनक में वे इजराइल की सुरक्षा की अनदेखी  कर रहे हैं। हमास को अधमरा छोड़ना अमेरिका के लिए भी अच्छा नहीं क्योंकि ईरान और तुर्किये जैसे  संरक्षक उसे फिर ताकतवर बनाये बिना नहीं रहेंगे। इजराइल पर आरोप लगता है कि उसने गाजा में निरपराध नागरिकों को मारा , हजारों बच्चे अनाथ हो गए।  लेकिन इसका असली दोषी तो हमास है जिसने दो साल पहले इजराइल पर अकारण हमला कर उसे उकसाया था। बेहतर तो यही होता कि गाजा को इजराइल के हवाले कर दिया जाए जिससे भविष्य में  युद्ध की चिंगारी फिर न भड़के। मुस्लिम देशों को ये स्वीकार करना ही होगा कि इजराइल एक वास्तविकता है और उसके साथ बेहतर रिश्ते बनाना उनके लिए भी फायदेमंद है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 October 2025

कौन किसकी बी टीम कहना मुश्किल




     ममता बैनर्जी ने काँग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस बनाते समय  कहा था कि प. बंगाल में  कांग्रेस , सीपीएम की बी टीम बन गई है। दरअसल जब उसके  गुर्गे ममता पर हमले करते , तब कांग्रेस ने उनका बचाव नहीं किया।  नाराज होकर उन्होंने ऐलान किया था कि वामपंथी सरकार के रहते राइटर्स बिल्डिंग में कदम नहीं रखेंगी। और उन्होंने प्रतिज्ञा पूरी भी की। 

     वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वामपंथियों और कांग्रेस दोनों की जमीन खिसकती चली गई। 2021 के विधानसभा चुनाव में  दोनों एक सीट  भी नहीं जीते जबकि  मिलकर चुनाव लड़े थे। कांग्रेस की दुर्गति आश्चर्यजनक नहीं थी क्योंकि उसकी ताकत तो ममता ही थीं।  राष्ट्रीय राजनीति में ममता भाजपा विरोधी गठबंधन में होने पर भी बंगाल में कांग्रेस और   वामपंथियों  को बर्दाश्त करने राजी नहीं थीं जिसका लाभ उठाकर भाजपा  3 से 73 विधायकों तक पहुँच गई। 

     पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तो एक सीट जीत भी गई लेकिन वामपंथी शून्य पर ही अटके रहे। कांग्रेस  नेता अधीररंजन चौधरी तक हार गए जिन्हें  क्रिकेटर युसुफ पठान ने मात दे दी। दरअसल ममता नहीं चाहती थीं कि उनके राज्य से कोई नेता राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे। 

     इस प्रकार प. बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन जनता ने नकार दिया। साथ ही ममता ने सीपीएम  और कांग्रेस की संगामित्ती का जो आरोप लगाया था वह भी प्रमाणित हो गया। हालांकि आज की स्थिति में ये कहना कठिन है उन दोनों में कौन ए टीम है और कौन बी? 

    रोचक बात  है कि  ममता के विरुद्ध एकजुट कांग्रेस और वामपंथी केरल में एक दूसरे के खिलाफ  हैं। यहाँ तक कि वायनाड में राहुल और प्रियंका वाड्रा तक के विरुद्ध वामपंथियों ने प्रत्याशी उतारा। 

   वैसे ए और बी टीम का आरोप - प्रत्यारोप  अब सामान्य है। कांग्रेस की नजर में अरविंद केजरीवाल, असदुद्दीन ओवैसी , और अब प्रशांत किशोर भाजपा की बी टीम हैं। अखिलेश यादव के अनुसार मायावती भी उसी श्रेणी में आती हैं। हाल ही में तमिलनाडु में अभिनेता विजय की जो पार्टी खड़ी हो रही है उसे स्टालिन भाजपा द्वारा प्रायोजित बताते हैं। केरल में वामपंथियों की नजर में भाजपा , कांग्रेस की बी टीम बनकर चुनाव लड़ती है। 

    बिहार में होने जा रहे  विधानसभा चुनाव में  रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया। पहले कहा गया  वे राजद और कांग्रेस के  वोट बैंक तोड़ेंगे। इसीलिए उनको भाजपा की बी टीम प्रचारित किया गया। वे जिस तरह से तेजस्वी पर आक्रामक थे उससे उक्त आरोप को बल मिला।  इसीलिए उन्होंने भाजपा को भी घेरना शुरू कर दिया। प्रशांत किसकी नाव डुबोते हैं ये तो नतीजे बतायेंगे किंतु फिलहाल उन्होंने मुकाबला रोचक बना दिया है। 

     वैसे बी टीम का आरोप जिस पार्टी पर लगता है उसके प्रति मतदाता सशंकित हो उठता है। तेलंगाना  में ओवैसी की पार्टी जोर - शोर से उतरी। कांग्रेस को लगा कि उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं को खींचा तो बाजी हाथ आते रह जाएगी। हालांकि ओवैसी और भाजपा के बीच नजदीकियां कल्पना से परे हैं परंतु मुस्लिमों के मन में ये बात बैठने के कारण ओवैसी को बंगाल और उ.प्र में अपेक्षित सफलता नहीं मिली जबकि वहाँ मुस्लिम वोट बैंक बहुत है। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में ओवैसी ने सीमांचल की  सीटें जीतकर  राजद और कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया । उसके बाद से उत्तर भारत में उनको मुस्लिम समर्थन मिलना कम हो गया क्योंकि भाजपा की बी टीम का ठप्पा वे हटा नहीं पा रहे। 

     बात केजरीवाल की करें तो कांग्रेस उन्हें भाजपा की बी टीम कहती है क्योंकि उन्होंने हरियाणा के पिछले विधानसभा चुनाव में  लड़कर कांग्रेस को हरवा दिया जबकि लोकसभा चुनाव दोनों मिलकर लड़े थे। दिल्ली में कांग्रेस का सफाया करने में  उनका प्रमुख योगदान है । 2014 में जब विधानसभा में किसी को बहुमत नहीं मिला तब भाजपा बहुमत से  चार सीट दूर रह गई। कांग्रेस के आठ विधायक थे। ऐसे में उसने केजरीवाल को समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवाने के कुछ महीनों बाद उस सरकार को गिरवा दिया।  नये चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी की सुनामी आ गई। कांग्रेस शून्य और भाजपा तीन पर सिमट गई। भाजपा ने तो आखिर 10 साल बाद केजरीवाल  से सत्ता छीन ली लेकिन कांग्रेस शून्य पर ही अटकी है। इसके बाद केजरीवाल ने कांग्रेस को भाजपा की बी टीम कहकर भविष्य में एकला चलो का ऐलान कर दिया।  कांग्रेस को भी ये शिकायत  है कि गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में उसकी फजीहत आम आदमी पार्टी के कारण हुई। 

     कुल मिलाकर वर्तमान दौर में कौन किसके साथ और कौन विरोध में है कहना मुश्किल है। जो चंद्राबाबू नायडू 2019 में एनडीए छोड़ गए थे वे 2024 में फिर टीम मोदी का हिस्सा बन गए और मुख्यमंत्री बनने के साथ ही केंद्र सरकार को सहारा दे रहे हैं। इसी तरह इंडिया गठबंधन के संयोजक नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव के पहले फिर भाजपा में आ गए। अब तो महाराष्ट्र में शरद पवार तक पर भाजपा की  बी टीम होने के आरोप लगने लगे हैं। 

     सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि शिवसेना जैसी हिंदूवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन हो सकता है तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। इन दिनों बिहार में महागठबंधन के नेता के तौर पर तेजस्वी का बोलबाला है किंतु राहुल गाँधी  उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से कन्नी काट जाते हैं। इसी तरह इंडिया गठबंधन में होने के बाद भी ममता बैनर्जी श्री गाँधी को प्रधानमंत्री का चेहरा मानने से इंकार करती रही हैं। 
   राजनीतिक गठबंधन और उनके अंतर्विरोध पहले भी देखने मिलते रहे लेकिन सिद्धांतों की धज्जियां इस तरह उड़ाए जाने का जो खेल बीते एक - डेढ़ दशक से देखने मिल रहा है उसके कारण  राजनीति और राजनेताओं की विश्वसनीयता दो कौड़ी की होकर रह गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी