Saturday, 8 November 2025

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले मात्र से आवारा पशुओं की समस्या हल नहीं होगी



इसे मजाक कहें या विडंबना कि आवारा कुत्तों के आतंक से लोगों को बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को आदेश पारित करना पड़ा।  इसमें विद्यालयों  , अस्पतालों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों के पास मंडराते कुत्तों की नसबंदी करने के बाद उनको वापस उन्हीं स्थानों पर छोड़ने की बजाय उनके लिए बनाये गए आश्रय स्थल पर रखने का निर्देश दिया  गया है। राजस्थान उच्च न्यायालय के तत्संबंधी निर्णय को बरकरार रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवारा कुत्तों को हटाये जाने के अलावा राष्ट्रीय राजमार्गों एवं एक्सप्रेस हाइवे पर बैठे रहने वाले पशुओं को हटाये जाने के पुख्ता और स्थायी इंतजाम करने का निर्देश भी दिया है। उक्त फैसले में सभी राज्यों को कहा गया है कि वे उन सभी निजी और सरकारी संस्थानों का पता करें जहाँ आवारा कुत्ते जमा होते हैं। इस अभियान के लिए आठ हफ्ते का समय भी दिया गया। कुछ समय पहले दिल्ली में इस समस्या को लेकर जब सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया तब मेनका गाँधी सहित अनेक पशु प्रेमी हस्तियों के अलावा कुछ संगठन इसे कुत्तों पर अत्याचार बताकर विरोध करने खड़े हो गए। हजारों आवारा कुत्तों की नसबंदी और उनके लिए आश्रय स्थल बनाये जाने  पर होने वाले अनुमानित खर्च और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। दिल्ली की देखादेखी अन्य राज्यों से भी आवारा पशुओं से होने वाली परेशानियों के विरुद्ध आवाजें सुनाई दीं। पहले भी इस समस्या पर देश भर में बहस होती रही है। आवारा कुत्तों द्वारा लोगों को काटे जाने की घटनाएं बढ़ने से लोगों की नाराजगी स्थानीय प्रशासन के प्रति बढ़ती जा रही है। देश भर से जो जानकारी आई उससे स्पष्ट हुआ कि  सैकड़ों छोटे बच्चे इन कुत्तों के शिकार हुए। राहगीरों और दोपहिया वाहन चालकों पर आवारा कुत्तों के झपटने से दुर्घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। कुत्ते के काटने से होने वाली रेबीज नामक बीमारी से बचाव के लिए जिस टीके की जरूरत होती है उसकी उपलब्धता सरकारी अस्पतालों में नहीं होने से भी लोगों के लिये खतरा पैदा होता है। कुत्तों के काटने से हुई मौतों की संख्या लगातार बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि समस्या के निदान हेतु या तो समुचित कदम नहीं उठाये गए या फिर वे पर्याप्त नहीं हैं। स्थानीय निकायों द्वारा आवारा कुत्तों को रेबीज रोधक इंजेक्शन लगाने के अलावा उनकी आबादी में वृद्धि को रोकने के लिए नसबंदी करने के लिए भी इन विभागों के पास न तो पर्याप्त धन है और न ही मानव संसाधन। यही वजह है कि पूरे देश में आवारा कुत्ते तेजी से बढ़ते जा रहे हैं जिससे समस्या लगातार गम्भीर होती गई। शहरों में आवारा कुत्तों के अलावा अन्य पशुओं के कारण भी आम जनता हलाकान है। इनमें गाय, भैंस साँड़ आदि हैं। इसी तरह राजमार्गों पर भी आवारा कुत्तों से ज्यादा गायों के झुण्ड वाहन चालकों  के लिए अकल्पनीय हालात  उत्पन्न करते हैं। गोवंश के वध पर रोक लग जाने से राजमार्गों पर ऐसी  गायों की संख्या बढ़ती ही जा रही है जो दूध नहीं देने के कारण उनके मालिकों द्वारा लावारिस छोड़ दी जाती हैं। इनके कारण हर साल बड़े पैमाने पर जो दुर्घटनाएं होती हैं उनमें मनुष्यों के साथ ही ये पशु भी हताहत होते हैं। कुल मिलाकर समस्या का स्वरूप दिन ब दिन बड़ा होते जाने से उसका इलाज  समय की मांग है। पशु प्रेमियों के तर्क अपनी जगह हैं। प्रकृति और पर्यावरण का  संतुलन बनाये रखने के लिए पशुओं का होना भी जरूरी है। इसीलिए हिंसक पशुओं तक के संरक्षण हेतु बने अभ्यारणों  पर करोड़ों रु. का व्यय होता है। सरकार गौशालाओं का रखरखाव करने के  लिए अनुदान भी देती है। लेकिन वह राशि इतनी कम है कि उसमें गौशाला का ठीक से संचालन संभव ही नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय कितने भी आदेश जारी कर दे किंतु आवारा कुत्तों एवं गाय आदि अन्य पशुओं की शहरों एवं राजमार्गों पर मौजूदगी रोकना ठीक उसी तरह असम्भव प्रतीत होता है जैसे उसके सख्त आदेश के बाद भी हेलमेट और  सीटबेल्ट का उपयोग शत् -  प्रतिशत नहीं हो सका। बहरहाल , आवारा पशुओं की समस्या का समुचित निदान करने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय ने जो ताजा फैसला सुनाया उसको लागू करवाने के लिए समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने आगे आना होगा। पशु प्रेमी तबके को भी ये सोचना चाहिए कि यदि कोई पशु  मानव जीवन के लिए खतरा बन जाए तब भी उसको आजादी के साथ घूमने दिया जाना संभव नहीं है। अपने शौक और आवश्यकता के लिए पशु पालना और फिर उसे घर से बाहर छोड़ देना कानूनी न सही  किन्तु सामाजिक अपराध तो है ही। गौरतलब है शेर के शिकार पर रोक होने के बाद भी  आदमखोर होने पर उसे मार दिया जाता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 November 2025

बिहार में रिकार्ड तोड़ मतदान चुनाव आयोग की बड़ी सफलता


बिहार विधानसभा के बहुप्रतीक्षित चुनाव में पहले चरण का मतदान कल जिस शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ वह स्वागत योग्य है। यद्यपि कुछ जगहों पर हिंसा हुई किंतु वह इस राज्य के इतिहास को देखते हुए नगण्य ही कही जाएगी। लेकिन जिस बात के लिए इस चरण की चर्चा देश भर में हो रही है वह है मतदान का प्रतिशत 64 प्रतिशत से भी आगे निकल जाना। 2020 के विधानसभा चुनाव में 57 और पिछले लोकसभा चुनाव में 56 फीसदी मतदाताओं द्वारा अपने मताधिकार का प्रयोग किया गया था। ऐसे में 7 - 8 फीसदी की वृद्धि निश्चित रूप से सुखद आश्चर्य है और वह भी तब, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित अन्य विपक्षी दल  मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण पर आसमान सिर पर उठाकर घूमते हुए आरोप लगाते रहे कि चुनाव आयोग ने भाजपा के दबाव में बड़ी संख्या में उन मतदाताओं के नाम सूची से अलग कर दिये जिन्हें विपक्ष का समर्थक माना जाता है। वैसे तो सभी चुनाव महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन बिहार विधानसभा के  इस चुनाव पर अनेक कारणों से पूरे देश की निगाह लगी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से विपक्ष काफी उत्साहित था। लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शानदार सफलता हासिल कर ये दिखा दिया कि अभी उनका आकर्षण बना हुआ है। उसी के बाद राहुल ने मतदाता सूचियों में गड़बड़ी का शिगूफा छेड़कर देश भर में आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया किंतु उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसे में जब चुनाव आयोग द्वारा बिहार में मतदाता सूचियों से विदेशी घुसपैठियों को अलग करने के लिए उनका  गहन पुनरीक्षण करने का फैसला किया तो श्री गाँधी और अन्य विपक्षी दलों ने उसे रुकवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक का दरवाजा खटखटाया । वहाँ भी जब निराशा हाथ लगी तब श्री गाँधी ने राजद नेता तेजस्वी यादव के साथ  मिलकर पूरे बिहार में वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। विपक्ष का यही आरोप था कि चुनाव आयोग  बड़ी संख्या में वोट काटकर भाजपा की आसान कर रहा  है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर काटे गए 65 लाख नामों का विवरण सार्वजनिक भी किया गया और लोगों को  नाम जुड़वाने का पर्याप्त अवसर भी मिला। ऐसा माना जा रहा है कि उस प्रक्रिया में ज्यादातर  उन बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के नाम अलग किये गए जो अवैध तरीकों से मतदाता बन गए थे जबकि उनके पास भारत की नागरिकता नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनाव आयोग के अधिकार  क्षेत्र में हस्तक्षेप से इंकार के बाद मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन हो गया जिसके कारण विपक्ष के पास करने के लिए कुछ नहीं बचा तो उसने वोट चोरी - वोट चोरी चिल्लाकर लोगों को भड़काने की कोशिश की । लेकिन जिस उत्साह के साथ बिहार के मतदाताओं ने मतदान का नया कीर्तिमान स्थापित किया उसने ये साबित कर दिया कि चुनाव आयोग आम मतदाता का विश्वास अर्जित करने में सफल रहा। कौन जीतेगा, कौन नहीं इसका अनुमान  लगाने वाले अपने काम में लगे हैं। एनडीए और महागठबंधन के अलावा जनसुराज के भी अपने - अपने दावे हैं। सट्टा बाजार के धन्धेबाज भी हमेशा की तरह रोज नये अनुमान लेकर आ रहे हैं। लेकिन जिस शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से प्रथम चरण का मतदान पूरा हुआ उसके लिए चुनाव आयोग प्रशंसा का पात्र है। मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और गलत तरीके से नाम काटे जाने की शिकायतें भी उंगली पर गिनने लायक ही आईं। महागठबंधन द्वारा प्रथम चरण में बढ़त हासिल करने का दावा चुनाव प्रक्रिया के निष्पक्ष और पारदर्शी होने का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र है। भले ही राहुल , दिल्ली में बिहार चुनाव को चोरी किये जाने की आशंका जताते रहे हों। कल के अनुभव के आधार पर 11 नवम्बर को होने वाले द्वितीय चरण के मतदान की प्रक्रिया भी शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित संपन्न होने की उम्मीद बढ़ गई है। बिहार में इसके पहले कभी भी इतना अधिक मतदान नहीं हुआ जिससे पता चलता है कि वोट चोरी के दुष्प्रचार का कोई असर नहीं हुआ। बेहतर होगा ममता बैनर्जी भी मतदाता सूचियों के सघन, पुनरीक्षण में सहयोग दें क्योंकि मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने के साथ ही चुनाव प्रक्रिया में लोगों का विश्वास बनाये रखने में कितना सहायक है ये बिहार में गत दिवस हुए मतदान से स्पष्ट हो गया। हर देशप्रेमी ये मानेगा कि मतदाता सूचियों में विदेशी नागरिकों का नाम होना पूरी तरह गलत  है । और जो नेता या पार्टी उनके नाम काटे जाने का विरोध करती है उसकी नीयत पर संदेह होना स्वाभाविक है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 November 2025

क्या बेटी और वोट जाति में ही देने की सोच से बाहर आ सकेगा बिहार


बिहार विधानसभा चुनाव के लिए प्रथम चरण का मतदान आज हो रहा है। 121 सीटों पर  मतदाता  भावी विधायक का चयन करेंगे। राजनीतिक दृष्टि से बेहद जागरूक कहे जाने वाले इस राज्य के चुनाव पर एक चौथाई 21 वीं सदी बीत जाने के बाद भी जातिवाद का प्रभाव स्पष्ट है। चुनाव वैसे तो भाजपा और जनता दल ( यू) के नेतृत्व वाले एनडीए और राजद तथा कांग्रेस की अगुआई वाले महागठबंधन के बीच ही माना जा रहा है किंतु चुनाव प्रबंधन विशेषज्ञ प्रशांत किशोर की नई नवेली जनसुराज पार्टी ने इसे त्रिकोणीय स्वरूप प्रदान कर दिया। हालांकि उनको लेकर जो उत्साह शुरुआत में था उसमें कमी आई है । इसका प्रमुख कारण उनका चुनाव लड़ने से इंकार करना है किंतु इतना तो माना ही जा सकता है कि जनसुराज द्वारा हासिल किये जाने वाले मत अनेक सीटों पर  दोनों गठबंधनों के उम्मीदवारों की जीत - हार तय करेंगे। हालांकि असदुद्दीन, ओवैसी और बसपा भी जोर आजमाइश कर रहे हैं किंतु जिन तीन चेहरों के इर्द - गिर्द चुनाव सिमटा दिख रहा है वे हैं नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर। अगले मुख्यमंत्री के तौर पर श्री कुमार और श्री यादव के बीच ही मुकाबला है। जो कुछ सतही तौर पर दिखाई दिया उसके अनुसार एनडीए और महागठबंधन के अपने - अपने दावे हैं किंतु शुरू - शुरू में अनुमान लगाने से बच रहे चुनाव विश्लेषकों ने बीते कुछ दिनों में जो पत्ते खोले उनके अनुसार तो एनडीए की सत्ता में वापसी की सम्भावनाएँ बढ़ी हैं जिसका मुख्य कारण महिलाओं में नीतीश कुमार के प्रति  परंपरागत झुकाव है। बीते कुछ महीनों में उनकी सरकार ने महिलाओं को नगद आर्थिक सहायता रूपी जो तोहफा दिया उसकी वजह से सत्ता विरोधी रुझान को ठंडा करने में वे सफल रहे। हालांकि उसके जवाब में तेजस्वी ने हर घर में एक शासकीय नौकरी का जो वायदा किया उसकी भी बड़ी चर्चा है। यदि सत्ता परिवर्तन हुआ तो इस वायदे की भूमिका सबसे अधिक होगी। नीतीश कुमार की व्यक्तिगत छवि निश्चित रूप से सबसे बेहतर है। वहीं तेजस्वी ने भले ही अपने पिता लालू प्रसाद यादव को चुनाव प्रचार से दूर रखा किंतु उनकी सरकार के दौर की जो भयावह यादें लोगों के मन - मस्तिष्क में बरकरार हैं वे महागठबंधन की संभावनाओं को कमजोर करती है। हालांकि इस चुनाव में तेजस्वी  एक बड़े नेता के तौर पर उभरे हैं जिनको युवाओं के महानायक का दर्जा देकर उभारा जा रहा है ।  लेकिन उनके साथ जुड़ी कांग्रेस को लेकर जनता में चूंकि कोई उत्साह नहीं है इसलिए महागठबंधन के अंतिम क्षणों में पीछे रहने की आशंका बढ़ गई है। 2020 में भी तेजस्वी के हाथ से सत्ता खिसकने का कारण कांग्रेस का दयनीय प्रदर्शन ही था। विगत पाँच वर्षों में  उसने अपने संगठन को मज़बूत बनाने के लिए कोई सार्थक प्रयास किये हों ऐसा भी नहीं लगता। वोट चोरी के विरोध में तेजस्वी के साथ निकाली यात्रा से कांग्रेस में जो उत्साह जागा वह राहुल गाँधी की लम्बी विदेश यात्रा के कारण ठंड़ा पड़ गया। ऐसे में महागठबंधन का भविष्य मुस्लिम - यादव नामक समीकरण  पर ही टिका है। मुकेश सहनी के सजातीय मल्लाह मतों को छोड़कर अन्य पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों पर एनडीए की पकड़ बरकरार लग रही है। जीतनराम मांझी , उपेंद्र कुशवाहा और  चिराग पासवान के साथ आने से एनडीए सफलता के प्रति आश्वस्त है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। हालांकि युवाओं के अलावा उच्च जातियों के मतदाताओं के बीच यदि जनसुराज ने थोड़ी सी भी सेंध लगाई तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। इसी तरह ओवैसी मुस्लिम मतों में ज्यादा घुसपैठ करने में सफल रहे तब तेजस्वी का सपना बिखर सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बेटी और वोट जाति में ही देने की सोच त्यागने का साहस इस चुनाव में बिहार के मतदाता दिखा सकेंगे? यदि ऐसा हुआ तब वह बड़ी क्रांति होगी जिसका प्रभाव भविष्य के चुनावों पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। अब तक के प्रचलित मापदंडों के आधार पर आकलन करें तो एनडीए चेहरों और मोहरों दोनों ही कसौटियों पर भारी प्रतीत हो रहा है। भले ही तेजस्वी ने कड़े मुकाबले का एहसास करवाया किंतु उनको कांग्रेस का वैसा साथ नहीं मिलता लग रहा जैसा जरूरी होता है। इसीलिए वे मुख्यमंत्री के सर्वे में नीतीश पर भारी दिखने के बाद भी आखिरी दौर में पिछड़ते लग रहे हैं। उनकी नैया तभी पार हो सकेगी जब युवा मतदाता पूरी तरह महागठबंधन के साथ खड़े हों , वहीं  मुस्लिम - यादव समीकरण भी एकजुट रहे। हालांकि कुछ सर्वे एनडीए की स्पष्ट विजय की भविष्यवाणी करने लगे हैं किंतु प्रशांत किशोर की जनसुराज यदि छुपी रुस्तम साबित हुई तब अप्रत्याशित परिणाम आ जाएं तो अचरज नहीं होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 5 November 2025

राहुल को सत्ता में रहते दलित, आदिवासी और पिछड़ों की याद नहीं आई

राहुल गाँधी लंबे समय से आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने की बात कर रहे हैं। जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसे नारे के जरिये वे ये प्रचारित करने में जुटे हैं कि दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को उनकी संख्या के अनुसार नौकरियों और उच्च शिक्षा में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। कभी वे  नौकरशाही में उक्त वर्ग की कम संख्या का बखान करते हैं तो कभी समाचार माध्यमों में भी सवर्ण जातियों के बाहुल्य की। इसी क्रम में वे सौंदर्य प्रतियोगिताओं तक में दलित और आदिवासी का चयन नहीं होने जैसी हास्यास्पद बात भी उठा चुके हैं। बजट पर भाषण देते हुए लोकसभा में वे इस बात को उठाते रहे कि उसे बनाने वाले अधिकारियों के दल में दलित और आदिवासी नहीं थे। जातिगत जनगणना के भी वे प्रबल पक्षधर हैं।  हालांकि उनकी पार्टी ने पाँच दशक तक देश पर राज करने के बाद भी उनकी संख्या के आधार पर दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को नौकरियों सहित अन्य अवसरों से क्यों वंचित रखा , पहले  इसका उत्तर उन्हें देना चाहिए। उल्लेखनीय है  दलित और आदिवासियों के आरक्षण का प्रावधान तो संविधान निर्माताओं ने ही कर दिया था किंतु पिछड़ी जातियों के बारे में पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा जी तक की सरकार ने कभी नहीं सोचा। जबकि डॉ. लोहिया शुरू से  ही पिछड़ा पावे सौ में साठ का नारा बुलंद करते रहे। पिछड़ी जातियों को आरक्षण का रास्ता भी जिस मंडल आयोग की सिफारिशों से  साफ हुआ उसका गठन भी 1979 में जनता पार्टी  सरकार ने किया था। 1980 में श्रीमती गाँधी फिर सत्ता में आईं और 1984 में राजीव गाँधी ऐतिहासिक सफलता के साथ प्रधानमंत्री बने और 1989 तक रहे। मंडल आयोग की रिपोर्ट 1980 में ही आ चुकी थी किंतु उसकी सिफारिशों के अनुसार अन्य पिछड़ी जातियों को नौकरियों और उच्च शिक्षा के लिए  27 फीसदी आरक्षण देने की कोई कोशिश न इंदिरा जी ने की और न ही राजीव ने। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने उक्त रिपोर्ट को लागू किया था। ऐसे में राहुल को ये भी स्पष्ट करना चाहिए कि 1980 में आई मंडल आयोग की रिपोर्ट को 1989 तक कांग्रेस की केंद्र सरकार क्यों दबाये बैठी रही ? ज़ाहिर है  दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के प्रति उनके मन में अचानक उमड़े प्रेम के पीछे कांग्रेस के खिसकते जनाधार को पुनः कायम करना है । कुछ वर्ष पूर्व तक वे खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण प्रचारित करते रहे। मंदिरों और मठों में जाकर पूजा - अर्चना भी की किंतु   सवर्ण जातियों पर उसका कोई असर नहीं होने पर वे दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के मसीहा  बनने का प्रयास करने लगे। इस बारे में वे जो तर्क देते हैं उनका कोई असर इन वर्गों पर पड़ता नहीं दिखता क्योंकि उन जातियों में पहले से ही अनेक स्थापित नेता हैं। लेकिन वोटों की लालच में अब वे सेना को भी इस खतरनाक खेल में घसीट रहे हैं जो देश के लिए बहुत घातक है। सेना में जातीय के अलावा मुस्लिमों के लिए आरक्षण की मांग मुलायम सिंह यादव ने भी उठाई थी किंतु उसे समर्थन नहीं मिला। 2004 से 2014 तक केंद्र में डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार रही जिसकी लगाम श्री गाँधी और उनकी माताजी सोनिया गाँधी के हाथ में रही। सरकार में न रहते हुए भी राहुल उसके द्वारा जारी अध्यादेश पत्रकारों के सामने फाड़ने की जुर्रत कर जाते और  प्रधानमंत्री उनके सामने लाचार बने रहते। आज वे दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को उनकी संख्या के आधार पर नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण दिलवाने संविधान संशोधन तक की जो डींग हाँक  रहे हैं वह उन 10 वर्षों में उन्हें याद नहीं आई। और यदि वह सरकार सत्ता में बनी रहती तब शायद अभी भी वे इस बारे में न सोचते और न ही  बोलते। आरक्षण निश्चित रूप से सामाजिक परिवर्तन और समतामूलक समाज की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण है किंतु सेना जैसे विभाग में इसकी मांग करना देश हित  की बलि चढ़ाने जैसा है। भारतीय सेना में जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव की बात नहीं सुनाई दी। सभी धर्मों के लोग सेना प्रमुख के पद तक पहुंचे हैं। निचले स्तर पर भी पूरी तरह से सद्भाव बना हुआ है। ऐसे में ये कहना कि केवल 10 प्रतिशत उसे चला रहे हैं सेना के ढांचे को कमजोर करने का प्रयास है। श्री गाँधी को ये नहीं भूलना चाहिए कि वे एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता होने के कारण नेता प्रतिपक्ष बने हैं। उनके द्वारा इस तरह की बातें करने से कांग्रेस की भी मुसीबतें बढ़ती हैं। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की सुरक्षा करने वाली संस्था में जाति के बीज बोना बेहद गैर जिम्मेदार सोच का परिचायक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 4 November 2025

थरूर के साहस की आलोचना नहीं प्रशंसा होनी चाहिए


कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर प्रभावशाली वक्ता, कुशल लेखक और वैश्विक सोच रखने वाले व्यक्ति हैं। संरासंघ की सेवा में रहने के कारण उन्हें दुनिया के बारे में अच्छी जानकारी है। उनकी वाणी और लेखन में अध्ययनशीलता का परिचय मिलता है। केरल की  तिरुवनंतपुरम सीट से जीतते आ रहे डॉ. थरूर , डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी रहे। पिछले कुछ सालों से वे कांग्रेस नेतृत्व से नाराज हैं । उनकी शिकायत है कि संसद और अन्य मंचों पर पार्टी उन्हें बोलने का अवसर नहीं देती। 2019 के लोकसभा चुनाव की हार के बाद राहुल गाँधी द्वारा पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद  बने जी - 23 नामक समूह में श्री थरूर भी शामिल थे। इसके प्रमुख सदस्य गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल पार्टी छोड़ गए जबकि अनेक घर बैठने मजबूर हो गए। हालांकि डॉ. थरूर को 2024 में भी कांग्रेस ने टिकिट दी और वे जीते  किंतु बीते डेढ़ वर्ष में  समय - समय पर उनके जो बयान आये उनसे ये अटकलें लगाई जाने लगीं कि वे भी कांग्रेस को अलविदा कहने की तैयारी में हैं। ये भी सुनने में आया  कि वे केरल विधानसभा के आगामी चुनाव में पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा बनने के इच्छुक हैं । चूंकि श्री गाँधी उन्हें भाव नहीं दे रहे इसलिए दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के अलावा उनकी निजी प्रशंसा करने वाले उनके बयानों के बाद  अनुमान लगने लगा कि वे भी भाजपा में घुसने की फिराक में है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत का पक्ष रखने  जो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों को भेजे गए उनमें जो दल अमेरिका गया उसका नेतृत्व श्री थरूर को सौंपने पर कांग्रेस ने ऐतराज जताया था क्योंकि उसने अपने जिन सांसदों की सूची सरकार को प्रतिनिधिमंडलों  के लिए सौंपी उसमें श्री थरूर के अलावा वे नाम नहीं थे जिनका चयन सरकार ने किया।  विदेशी धरती पर श्री थरूर  द्वारा मोदी सरकार की नीतियों  की प्रशंसा भी पार्टी को रास नहीं आई क्योंकि श्री गाँधी ऑपरेशन सिंदूर को लेकर श्री मोदी पर तीखे हमले करते रहते हैं। उसके बाद से श्री थरूर और श्री गाँधी के बीच की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। इसका ताजा प्रमाण उनका वह लेख है जिसमें श्री थरूर ने वंशवादी राजनीति  पर तीखे प्रहार करते हुए लिखा है कि दशकों से एक परिवार भारतीय राजनीति पर हावी रहा।भारतीय राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय शीर्षक वाले लेख में थरूर ने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार (जिसमें स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी और वर्तमान विपक्षी नेता राहुल गांधी और सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल हैं) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ा हुआ है। लेकिन इसने इस विचार को भी पुख्ता किया है कि राजनीतिक नेतृत्व जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है। थरूर ने कहा, यह विचार भारतीय राजनीति में हर पार्टी, हर क्षेत्र और स्तर पर व्याप्त है। उन्होंने कांग्रेस के प्रथम परिवार के अलावा अब्दुल्ला, बादल, मुलायम, लालू, पासवान, ठाकरे, पटनायक, परिवारों का उल्लेख करते हुए ममता बैनर्जी और मायावती पर भी निशाना साधा जिन्होंने अपने भतीजे को उत्तराधिकारी बना दिया। अपनी बात स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि समय आ गया है जब भारत वंशवाद की जगह योग्यतावाद को अपनाये।  हालांकि उन्होंने भारत के अलावा पड़ोसी देशों में भी वंशवाद  का उल्लेख करते हुए इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया किंतु उनके लेख ने कांग्रेस में हलचल मचा दी ।  प्रमोद तिवारी, राशिद अल्वी और उदित राज आदि ने गाँधी परिवार का बचाव करते हुए  श्री थरूर के लेख की तीखी आलोचना की जिससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया कि वे अपने मकसद में कामयाब हो गए और वंशवाद एक बार फिर राजनीतिक विमर्श में आ गया। सही बात तो ये है कि सन्दर्भित लेख की प्रशंसा होनी चाहिए जिसमें भारतीय राजनीति में व्याप्त  एक बड़ी बुराई की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया गया है। यदि वे केवल कांग्रेस पर नेहरू - गाँधी परिवार के आधिपत्य का मुद्दा उठाते तब पार्टी नेताओं का उन पर हमलावर होना स्वाभाविक होता किंतु  लेख में तो तमाम राजनीतिक परिवारों का जिक्र है जिन्होंने पार्टी को पुश्तैनी जागीर बना लिया। परिवार के सभी सदस्य एक ही दल में रहे इसमें कुछ भी गलत नहीं। विभिन्न पार्टियों में ऐसा है भी किंतु नेतृत्व रूपी विरासत परिवार तक सीमित रखना नव सामंतवाद का प्रतीक है जिसका समर्थन दरबारी मानसिकता के लोग ही कर सकते हैं। हो सकता है कांग्रेस श्री थरूर पर अनुशासन का चाबुक चलाये किंतु उन्होंने जो लिखा वह पूरी तरह सही है। कांग्रेस इस बुराई को फैलाने लिए सबसे अधिक कसूरवार है क्योंकि उसी का अनुसरण करते हुए ही अन्य पार्टियों ने वंशवाद को आत्मसात किया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 November 2025

महिला क्रिकेट विश्व कप की जीत भारतीय लड़कियों के लिए प्रेरणादायी


निशानेबाजी, मुक्केबाजी और बैंडमिंटन जैसे खेलों में वैश्विक स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद गत दिवस भारत की महिला क्रिकेट टीम ने विश्व कप मुकाबला जीतकर पूरे देश को आनंदित कर दिया। हालांकि इसके पूर्व भी दो बार हमारी टीम महिला क्रिकेट विश्व कप के अंतिम मुकाबले तक पहुंची किंतु  जीत से वंचित रही। लेकिन इस बार पहले सेमी फाइनल और फिर अंतिम मुकाबले में इस टीम  ने जो प्रदर्शन किया उसके बाद ये सिद्ध हो गया  कि भारत में क्रिकेट की जड़ें काफी मज़बूत हो गई हैं। पुरुषों की टीम तो पहले भी कई बार विश्व कप जीत चुकी है किंतु लड़कियों ने पहली बार देश को गौरवान्वित किया है। पुरुषों की टीम के खिलाड़ियों को तो धन भी खूब मिलता है। उनकी लोकप्रियता फिल्मी सितारों को टक्कर देती है। सचिन तेंदुलकर तो क्रिकेट से सन्यास लेने के बाद भी राष्ट्रीय नायकों की श्रेणी में हैं  जिन्हें आखिरी मैच खेलने वाले दिन ही भारत रत्न जैसा  सर्वोच्च नागरिक  सम्मान  दिया गया। जबकि भारत को कई ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलवाने वाले हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले स्व. दादा ध्यानचंद को आज तक यह सम्मान नहीं मिला। यद्यपि  लंबे समय तक क्रिकेट पर पुरुषों का एकाधिकार रहा लेकिन धीरे - धीरे अन्य खेलों की तरह लड़कियों के लिए भी इस  खेल के दरवाजे खोले गए। शायद पूर्व में ये सोच रही होगी  कि लड़कियों की शारीरिक क्षमता घंटों तक मैदान में डटे रहने लायक नहीं है किंतु ये अवधारणा भी समय के साथ गलत साबित होती गई। फिर सवाल भारत की लड़कियों के दमखम पर भी उठे किंतु   हमारी क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीतकर ये दिखा दिया कि  आधी आबादी भी अब प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के साथ बराबरी से चलने की योग्यता और क्षमता हासिल कर चुकी है। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पत्रकारों को जानकारी देने का दायित्व दो महिला सैन्य अधिकारियों को सौंपकर  भारत ने पूरे विश्व को संदेश दे दिया कि हमारी नारी शक्ति अब चौके - चूल्हे तक ही सीमित न रहकर प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका का निर्वहन करने तत्पर है। आज  महिलाएं भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे रही है। लड़ाकू और यात्री विमानों में वे पायलट की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। बड़ी - बड़ी वित्तीय संस्थाओं का नेतृत्व उनके हाथ में हैं। विदेश और वित्त  जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय में उनका प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है। राष्ट्रपति भवन में भी अनुसूचित जनजाति की महिला विराजमान है। ओलंपिक पदक विजेताओं में भी लड़कियों का नाम दर्ज हो चुका है। राजनीति, शिक्षा, प्रशासन आदि में वे  पूरे आत्मविश्वास के साथ सक्रिय हैं। इन्हीं सबसे पूरी नारी शक्ति का हौसला बुलंद है। यही वजह है कि महिला विश्व कप क्रिकेट में भारतीय टीम के फाइनल में पहुँचने के बाद पूरा देश उनके जीतने की कामना करने लगा। वहीं मैच देखने के प्रति  स्टेडियम जैसा ही उत्साह सर्वत्र दिखाई दिया। जैसे ही टीम को विजय हासिल हुई फटाके फूटने की आवाजों ने ये जता दिया कि खेल प्रेमियों के लिए लड़कियों की जीत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे सितारों से भरी टीम द्वारा अर्जित सफलता। ये हर्ष का विषय है कि खेलों में अब मध्यम और निम्नवर्गीय परिवारों के लड़के - लड़कियां भी बढ़ - चढ़कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगे हैं। कभी ओलंपिक में केवल हॉकी का पदक मिलने की ही उम्मीद होती थी किंतु बीते वर्षों में कुश्ती, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, निशानेबाजी के अलावा भी अन्य खेलों में हमारे खिलाड़ियों ने पदक जीते। सरकार ने खेलो इंडिया कार्यक्रम के जरिये नवोदित प्रतिभाओं को उभरने का अवसर देने का जो बीड़ा उठाया वह स्वागत योग्य है। इसके अलावा देश भर में निजी क्षेत्र की खेल अकादमी बड़ी संख्या में खुलना और उनमें किशोरावस्था के लड़के  - लड़कियों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति इस बात का परिचायक है कि नई पीढ़ी में खेलों में भविष्य बनाने का आकर्षण बढ़ा है। ये भी अच्छी बात है कि खेल और खिलाड़ियों को निजी क्षेत्र द्वारा प्रायोजित किये जाने का चलन लगातार बढ़ रहा है जो पहले सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के  उद्यमों तक ही सीमित था। महिलाओं का क्रिकेट विश्व कप जीतने वाली टीम की प्रत्येक सदस्य बधाई की पात्र है। उनकी इस सफलता से अन्य लड़कियों को भी खेलों के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी इसमें संदेह नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 November 2025

बिहार में महागठबंधन की कमजोर कड़ी है कांग्रेस

आखिर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष   राहुल गाँधी  बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए उतर ही गए। हालांकि वोट अधिकार यात्रा के दौरान उन्होंने तेजस्वी यादव के साथ पूरे राज्य का दौरा कर महागठबंधन की एकता का संदेश दिया था। लेकिन फिर लंबी विदेश यात्रा पर रवाना हो गए जिसको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों ने काफी टिप्पणियां भी कीं। प्रवास से लौटने के उपरांत भी वे बिहार से दूर रहे। जिससे चर्चा होने लगी कि उनके और तेजस्वी के बीच विवाद  है। असल में  कांग्रेस 2020 की तुलना में अधिक सीट चाहती थी किंतु उसका पिछला प्रदर्शन चूंकि निराशाजनक रहा इसलिए  तेजस्वी  उसे कम सीटें देना चाहते थे।  किसी तरह वह मसला सुलझा किंतु उसके बाद भी श्री गाँधी बिहार नहीं आये तो महागठबंधन के टूटने तक की आशंका व्यक्त की जाने लगी और तब कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने पटना जाकर खाई पाटने का काम किया। उसी के बाद राहुल और प्रियंका वाड्रा के बिहार दौरे का कार्यक्रम भी घोषित हो गया। दरअसल जमीन और भर्ती घोटाले में लालू प्रसाद यादव और परिजनों  पर आरोप पत्र तैयार करने का अदालती फैसला आने के बाद तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाये जाने के लिए श्री गाँधी हिचकिचा रहे थे। और इसीलिये  उनसे मिलने के अलावा बिहार आने से भी बचते रहे। श्री गाँधी की चिंता लालू परिवार की भ्रष्ट छवि से कांग्रेस को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर थी। लेकिन तेजस्वी अड़ गए कि उनको चेहरा बनाये बिना  गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी तब जाकर कांग्रेस को झुकना पड़ा। जबकि  वोट अधिकार यात्रा के दौरान श्री गाँधी समूचे परिदृश्य पर हावी बने रहे वहीं तेजस्वी उनके  ड्राइवर की भूमिका में दिखे। उस दौरान राज्य में कांग्रेस के हालात सुधरने की उम्मीदें बढ़ने लगीं परंतु उस अनुकूल वातावरण को बनाये रखने के लिए  जिस सक्रियता की जरूरत थी उसे नजरंदाज करते हुए श्री गाँधी लंबी विदेश यात्रा पर निकल गए । उनके इस रवैये ने कांग्रेस के हाथ से वह बढ़त छीन ली जो वोट अधिकार यात्रा से हासिल हुई थी। आज  महागठबंधन यदि मुकाबले में है तो इसलिए  क्योंकि तेजस्वी उसका चेहरा हैं। कांग्रेस। अभी भी उसकी कमजोर कड़ी है जो राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद  क्षेत्रीय दल  जैसा प्रभाव छोड़ पाने में भी असफल है। ऊपर से श्री गाँधी के बयान रही - सही कसर भी पूरी किये दे रहे हैं। छठ पूजा के लिए यमुना नदी के पानी को स्वच्छ किये जाने का जो काम दिल्ली की भाजपा सरकार ने किया उसकी बिहार वासियों ने दिल खोलकर तारीफ की किंतु श्री गाँधी ने बिहार आकर उसके बारे में जो बातें कहीं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जिस तरह के कटाक्ष किये उसका उल्टा असर हो रहा है। इसी तरह उन्होंने मुकेश अंबानी के बेटे के विवाह समारोह में श्री मोदी के शामिल होने का मुद्दा छेड़कर तेजस्वी के पूरे परिवार को कठघरे में खड़ा कर दिया। उल्लेखनीय है उस विवाह में लालू प्रसाद यादव अपने पूरे परिवार सहित विशेष विमान से गए जो कि अंबानी परिवार द्वारा भेजा गया था। श्री गाँधी के उक्त बयान के बाद लालू परिवार के साथ ही कांग्रेस के तमाम नेताओं के चित्र सोशल मीडिया पर नजर आने लगे जिन्होंने उस विवाह में अंबानी परिवार की मेहमाननवाजी  का लुत्फ़ उठाया था। चुनावी रैलियों में श्री गाँधी जिस प्रकार की बातें बोल रहे हैं उनके कारण महागठबंधन को फ़ायदा कम नुकसान ज्यादा होता लग रहा है। लालू प्रसाद यादव के शासनकाल को बिहार में जंगल राज के रूप में याद किया जाता है। इसीलिये तेजस्वी तक अपने पिता का चित्र अपनी पार्टी की प्रचार सामग्री में उपयोग करने से बच रहे हैं। हालांकि प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी के कारण ये चुनाव त्रिकोणीय माना जाने लगा है। इसी वजह से भविष्यवाणी करने वाले  बेहद सतर्क है किंतु ये सभी मान रहे हैं कि राहुल का मैदान में देर से उतरना और फिर अंबानी - अडानी जैसे पुराने पड़ चुके मुद्दों में ही उलझे रहने से कांग्रेस की संभावनाएं  कमजोर हो रही हैं जिसका खामियाजा  तेजस्वी को होगा। कांग्रेस के लिए गड्ढा खोदने में उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी पीछे नहीं हैं जो बिना वजह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने की मुहिम छेड़कर ऐसा मोर्चा खोल रहे हैं जिस पर कांग्रेस हमेशा से चारों खाने चित्त होती रही है। आज की स्थिति में जब पहले चरण के मतदान हेतु मात्र पाँच दिन रह गए हैं तब जो संकेत आ रहे हैं उनके मुताबिक यदि महागठबंधन जीतता है तो पूरा श्रेय तेजस्वी के खाते में दर्ज होगा और यदि हार नसीब हुई तब उसका ठीकरा कांग्रेस पर फूटेगा जिसकी कमान श्री गाँधी के हाथ में है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी