Saturday, 15 November 2025

कांग्रेस के साथ ही तेजस्वी को भी ले डूबे राहुल

बिहार विधानसभा  चुनावों के नतीजों से पूरा देश चौंक गया। हालाँकि महागठबंधन की जीत के लिए खुलकर मैदान में उतरे तमाम वामपंथी पत्रकार भी अंतिम चरण आते तक ये कहने लगे थे कि नीतीश कुमार के 20 वर्ष  सत्ता में रहने के बाद न तो सत्ता विरोधी लहर है और न ही मुख्यमंत्री के प्रति नाराजगी या ऊब । उन्होंने ये भी स्वीकारा कि महिलाओं में नीतीश और नरेंद्र मोदी की योजनाओं का जबरदस्त प्रभाव है। एनडीए के सुव्यवस्थित  प्रचार अभियान , घटक दलों में बेहतर तालमेल और जातीय समीकरणों को साधने की सटीक रणनीति से  वे  प्रभावित थे। महागठबंधन के प्रति झुकाव रखने वाले विश्लेषक भी टीवी चर्चाओं में चुनाव आयोग पर छींटाकशी करने के बावजूद मान बैठे कि वोट चोरी   कोई मुद्दा नहीं बन सका। राहुल गाँधी का वोट अधिकार यात्रा के बाद  विदेश चले जाना भी महागठबंधन  समर्थक पत्रकारों को रास नहीं आया। उन्होंने निःसंकोच कहा  कि श्री गाँधी  बुनियादी मुद्दों को छोड़ यहाँ - वहाँ की जो बातें कहते रहे उनकी वजह से महागठबंधन के प्रति आकर्षण पैदा नहीं हो सका। दूसरी ओर एनडीए भले ही नीतीश कुमार को सामने रखकर लड़ा किंतु उसकी पूरी कमान  भाजपा के पास थी जिसने अपनी संगठन शक्ति का उपयोग करते हुए बिहार की जमीनी सच्चाई को समझकर व्यूह रचना की जिसका परिणाम एनडीए की ऐतिहासिक विजय के रूप में सामने आया जिसका अंदाज  चुनाव विश्लेषक और सर्वेक्षण  एजेंसियां तक नहीं लगा सकीं। औरों को तो छोड़ भी दें लेकिन  धूमकेतु की तरह उभरी जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर तक हवा का रुख भांपने में विफल रहे जबकि 2015 में प्रचंड  मोदी लहर के बावजूद  नीतीश कुमार को सत्ता में लाने में उनकी रणनीति कारगर साबित हुई थी।  ये सब देखते हुए कांग्रेस को चाहिए वह पराजय के सही कारणों को समझकर प्रतिक्रिया दे किंतु राहुल से लेकर निचले स्तर तक के प्रवक्ता और पार्टी का सोशल मीडिया चलाने वाले जिस तरह की सतही टिप्पणियां कर रहे हैं उनसे लगता है कांग्रेस ने गलतियों से सबक लेने के बजाय उन्हें दोहराते रहने की कसम खा रखी है। श्री गाँधी ने अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने के बजाय चुनाव आयोग की वजह से जीत पाने में कठिनाई का बहाना बनाकर अपना बचाव किया जबकि इस शर्मनाक पराजय के लिए वे सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। उन्होंने  सही समय पर निर्णय नहीं होने दिये वहीं तेजस्वी पर अनावश्यक दबाव बनाकर सीटें तो ज्यादा झटक लीं परंतु जीतने के लिए आवश्यक प्रयास करने के बजाय चुनाव को बेहद हल्के में लिया। तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने में की गई देरी के बाद उनके साथ श्री गाँधी का तालमेल नहीं बन सका। हालाँकि नीतीश को लेकर ये गलती भाजपा ने भी की किंतु एक बार घोषणा होने के बाद प्रधानमंत्री के अलावा अमित शाह, राजनाथ सिंह , जगत प्रकाश नड्डा सहित केंद्रीय मंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, दर्जनों सांसद और सहयोगी  संगठन न केवल भाजपा के अपितु एनडीए के अन्य घटकों की जीत के लिए भी जुट गए। दरअसल  लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद भाजपा ने विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव को गंभीरता से लड़ा जिसके कारण उसे सफलता मिली। इसके विपरीत राहुल गाँधी 99 सीटें जीतने के बाद खुशफहमी में डूब गए। उन्हें ये लगा कि वे प्रधानमंत्री के विरुद्ध तीखी शब्दावली का उपयोग कर जनता के मन में अपनी छवि बना लेंगे किंतु लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में जहाँ भाजपा ने शानदार सफलताएं अर्जित कीं वहीं कांग्रेस के हाथ खाली रहे। सच्चाई यही है कि बिहार में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के लिए सीधे श्री गाँधी ही जिम्मेदार हैं। यदि वे तेजस्वी को खुला हाथ देते तो हो सकता है महागठबंधन की इतनी दुर्गति न होती। प्रधानमंत्री ने कल शाम कांग्रेस के एक और विभाजन की जो भविष्यवाणी की वह सही हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे भी जिस राहुल ब्रिगेड के बारे में कहा जाता था कि वह कांग्रेस के सुनहरे दिन वापस लायेगी उसके अनेक  सदस्य श्री गाँधी से नाराज होकर  पार्टी छोड़ चुके हैं। आज कांग्रेस में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व नजर नहीं आता। संगठन इसीलिए कमजोर है। सोनिया गाँधी के निष्क्रिय होने के बाद ले - देकर राहुल और प्रियंका ही  हैं किंतु दोनों राजनीति को मनोरंजन का साधन मानकर चलते हैं। बिहार की दुर्दशा के बाद भी यदि श्री गाँधी  अपना रवैया नहीं बदलते तब इंडिया गठबंधन के घटक दल भी उन्हें बोझ समझने लगेंगे। प.बंगाल में  ममता बैनर्जी और केरल में वामपंथी तो पहले से ही उनको महत्व नहीं देते। बिहार में राजद के अलावा वीआईपी और वाम दलों की भी जो लुटिया डूबी उसके बाद बाकी दल भी कांग्रेस से दूरी बनाने लगें तो आश्चर्य नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 14 November 2025

जाति और परिवारवाद की लालटेन बुझी और विकास का कमल खिला


हालांकि अंतिम क्षणों में उलटफेर होते हैं किंतु दोपहर 2 बजे तक के  रुझानों को  देखते हुए तमाम चुनाव पूर्व सर्वे और यू ट्यूब पर  इकतरफा मोदी विरोधी विश्लेषण धरे रह गए। प्रतिष्ठित एजेंसियों ने भी एग्जिट पोल के निष्कर्षों को डरते - डरते पेश किया। दावा होता रहा  कि तेजस्वी यादव लोकप्रियता  में नीतीश कुमार से बहुत आगे हैं।  नीतीश को बीमार और थका हुआ प्रचारित किया गया। वहीं तेजस्वी की छवि युवा हृदय सम्राट जैसी बनाने का अभियान चला। हर घर में एक सरकारी नौकरी जैसे  वायदे को तुरुप का पत्ता बताने की होड़ भी मची। भाजपा द्वारा नीतीश को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने में देर लगाए जाने को आत्मघाती निर्णय बताकर एनडीए की हार की भविष्यवाणी की जाने लगी। नीतीश सरकार द्वारा  महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करवाने के फैसले की काट के तौर पर बेरोजगार युवा मतदाताओं का महागठबंधन के पक्ष में गोलबंद होने का शिगूफा छोड़ा गया।  एम- वाय नामक मुस्लिम - यादव समीकरण को तेजस्वी की ताजपोशी की गारंटी बताकर नीतीश सरकार की विदाई तय मानी जाने लगी। एनडीए द्वारा लालू, प्रसाद यादव के शासन को जंगलराज बताकर उसकी वापसी की जो आशंका व्यक्त की गई उससे डरकर महागठबंधन ने लालू को मैदान में उतारना तो दूर प्रचार सामग्री में उनका चित्र प्रसारित करने तक से परहेज किया । जातीय समीकरण साधने के लिए मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा भी हुई। लेकिन चुनाव परिणाम ने बिहार की राजनीति में एक नये चारित्रिक बदलाव का संकेत पूरे देश को दे दिया जिसमें विकास, सुशासन और राष्ट्रवाद के प्रति खुले समर्थन का ऐलान है।  महागठबंधन के सारे छत्रप धराशायी होते दिख रहे हैं।  तेजस्वी के भी आगे - पीछे होने से ये अंदाज लगाया जा सकता है कि बाकी सबका क्या होगा? मुस्लिम - यादव गठजोड़ के दम पर बिहार को  खानदानी जागीर समझने की मानसिकता को मतदाताओं ने बुरी तरह कुचल दिया। यादव बहुल अनेक सीटों में राजद का पिछड़ना इसका प्रमाण है ।  वहीं सीमांचल की मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भी एनडीए का शानदार प्रदर्शन राष्ट्रवादी राजनीति के बढ़ते प्रभाव को प्रतिबिंबित कर रहा है। चुनाव के आखिरी दौर में अपनी खस्ता हालत देख लालू एंड कंपनी ने ये प्रचार भी शुरू कर दिया कि 2020 के चुनाव में भाजपा द्वारा चिराग पासवान को एनडीए से  बाहर रखकर जदयू को जो नुकसान पहुंचाया था उसे नीतीश भूले नहीं हैं और इसलिए इस बार वे चिराग की लोजपा को हरवाकर बदला लेंगे। दूसरा शिगूफा ये भी छोड़ा गया कि नीतीश चुनाव बाद एक बार फिर तेजस्वी से हाथ मिलाकर भाजपा को झटका देंगे। कुछ वामपंथी पत्रकार तो नीतीश और चंद्रबाबू नायडू द्वारा मोदी सरकार को गिराए जाने की योजना  का भी ढोल पीटने लगे। जनसुराज के प्रशांत किशोर की ताकत को बढ़ा - चढ़ाकर पेश करने की चाल चली गई जिससे वे भाजपा समर्थक सवर्ण और युवाओं में सेंध लगा सकें। सबसे बड़ा अभियान चलाया कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जिन्होंने वोट चोरी का हल्ला मचाकर पूरे बिहार में वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। प्रशांत किशोर को भी ये गुमान हो चला था कि जब वे नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बैनर्जी, जगन मोहन रेड्डी आदि को चुनाव जितवा सकते हैं तब अपनी पार्टी को क्यों नहीं किंतु वे भूल गए कि अच्छा प्रशिक्षक अच्छा खिलाड़ी हो ये जरूरी नहीं। और इसीलिए किंग मेकर बनने की उनकी उम्मीद शून्य पर अटक गई और जिस जदयू को वे 25 से ज्यादा सीटें मिलने पर राजनीति छोड़ने की डींग हाँक रहे थे वह 80 के करीब है। ये भी कहा जा रहा था कि बिहार में केवल जाति चलती है और  लोग वोट और बेटी जाति में ही देते हैं किंतु नतीजों ने इस मिथक को भी ध्वस्त कर दिया। मुस्लिम - यादव समीकरण के पास 31 प्रतिशत मतों की जिस ताकत को महागठबंधन अपनी जीत का आधार मान बैठा था वह भी छिन्न - भिन्न होता दिख रहा है। सभी जातियों और वर्गों को जोड़कर विकास और सुशासन के जरिये बिहार को प्रगति पथ पर ले जाने वाले नेता के तौर पर नीतीश  ने इतिहास रच डाला वहीं नरेंद्र मोदी की वैश्विक प्रतिष्ठा और अमित शाह की कुशल रणनीति ने महागठबंधन को जमीन दिखा दी। तेजस्वी को तो खैर उनके पिता लालू प्रसाद यादव की काली करतूतें खा गईं जो  नेता प्रतिपक्ष बनने लायक भी नहीं रहे। ऐसा ही हुआ राहुल गाँधी के साथ जिन्होंने  दबाव बनाकर 60 से ज्यादा सीटें तो ले लीं किंतु आधा दर्जन पर भी कांग्रेस का जीतना मुश्किल लग रहा है। लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर खुद को नरेंद्र मोदी के बराबर समझने वाले श्री गाँधी अभी तक जमीनी हकीकत समझ नहीं सके। संविधान, जाति  जनगणना, अंबानी - अडानी जैसे मुद्दों पर अटके रहकर वे अपनी और कांग्रेस दोनों की फजीहत करवाने पर आमादा हैं। बिहार में भाजपा 90 सीटों की बढ़त के साथ महाराष्ट्र जैसी स्थिति में आ गई है। जदयू ने भी 80 सीटों पर पकड़ बना रखी है। चिराग का प्रदर्शन उनके उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। राष्ट्रीय राजनीति पर इस चुनाव का गहरा असर होगा क्योंकि कांग्रेस और वाम दलों को बिहार ने जिस तरह नकारा उसके बाद इंडिया गठबंधन या तो टूटेगा या  कांग्रेस के चंगुल से निकल आयेगा। राहुल के लिए भी ये बड़ा झटका है क्योंकि कांग्रेस में ही उनके प्रभुत्व को चुनौती मिलना तय है। 2 बजे तक एनडीए 199 के आंकड़े पर है जो बड़ी उपलब्धि है। 25 साल बाद भी नीतीश की साख कायम रहने के पीछे मोदी की धाक का बड़ा योगदान है। यह एक सकारात्मक जनादेश है । चुनाव आयोग पर लगाए गये आरोपों को जनता ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इतना व्यवस्थित चुनाव इस राज्य में पहले कभी नहीं हुआ। लालू ब्रांड घटिया राजनीति के साथ ही परिवारवाद पर भी इस परिणाम ने  जबरदस्त प्रहार किया है जिसके प्रतीक राहुल और तेजस्वी दोनों हैं। बिहार में लालू की लालटेन का बुझना अत्यंत शुभ संकेत है जिसका असर प.  बंगाल के आगामी चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 November 2025

बिहार के नतीजों का दूरगामी असर होगा : सर्वे एजेंसियों की साख भी दाँव पर


बिहार में दूसरे चरण का मतदान समाप्त होते ही एग्जिट पोल की दूकानें सज गईं। हालाँकि इनकी विश्वसनीयता पहले जैसी नहीं रही। इसका कारण नौसिखियों का इस क्षेत्र में कूदना ही है। हालांकि चुनाव पूर्व सर्वे और एग्जिट पोल जिस सैंपलिंग विधि पर आधारित हैं उसको  इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि वे गलत भी निकले क्योंकि अनेक सर्वे और एग्जिट पोल सत्य या उसके बेहद करीब भी रहे। शुरुआत में कुछ पेशेवर एजेंसियां ही इस कार्य से जुड़ी हुईं थीं किंतु जबसे राजनीतिक दल और कुछ प्रत्याशी भी चुनाव सर्वेक्षण का सहारा लेने लगे तबसे ये एक संगठित व्यवसाय बन गया। आजकल राजनीतिक दल प्रत्याशी चयन करने के लिए भी सर्वे एजेंसियों की सेवाएं लेते हैं जिनको इस काम के लिए अच्छे पैसे मिलते हैं। चुनाव बाद होने वाले एग्जिट पोल को टीवी समाचार चैनलों द्वारा भी प्रायोजित किया जाने लगा। ज्यों - ज्यों  चैनलों की संख्या बढ़ती गई एग्जिट पोल  का भी फैलाव होने लगा। इसीलिए 11 तारीख की शाम  से तमाम टीवी चैनल एग्जिट पोल दिखाने लगे। साथ ही विभिन्न दलों के प्रवक्ताओं, राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ट पत्रकारों को बिठाकर उन पर बहस आयोजित की गई। जाहिर है इसका उद्देश्य  दर्शक संख्या बढ़ाकर विज्ञापन बटोरना होता है जो कि व्यवसायिक रणनीति  है। पिछले लोकसभा चुनाव में एक सुप्रसिद्ध सर्वे एजेंसी का एग्जिट पोल गलत निकलने पर उसके मुखिया को विपक्षी दलों ने टीवी चैनलों पर इतना जलील किया कि वे रोने लगे। हालाँकि उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी विश्वसनीयता बनाये रखी। और मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल जारी करने की बजाय एक दिन बाद अपने निष्कर्ष प्रसारित करने लगे ।  वैसे लगभग डेढ़  दर्जन एग्जिट पोल में एकाध अपवाद छोड़  सभी नीतीश कुमार की वापसी का संकेत दे रहे हैं। कुछ का कहना है कि कड़े मुकाबले के बाद भी एनडीए सत्ता में लौटेगा वहीं कुछ ने उसकी छप्परफ़ाड़ जीत का अनुमान लगाया है। लेकिन गत रात्रि जो एग्जिट पोल जारी  हुआ उसमें विभिन्न  जातियों , आयु वर्ग  और महिला - पुरुष के रुझान के आधार पर एनडीए की मामूली बढ़त का संकेत तो है किंतु  कुछ सर्वे महागठबंधन की विजय की भविष्यवाणी करने में भी जुटे हैं। इनके अतिरिक्त सट्टा बाजार भी चुनाव परिणामों के बारे में अपने अनुमान लगाता है। सट्टा बाजार में सबसे अग्रणी राजस्थान के फलोदी ने एनडीए की 150 से अधिक सीटें मिलने की भविष्यवाणी कर सबको चौंका दिया। हालांकि सट्टा गैर कानूनी है किंतु चुनावों के दौरान सभी की नजर उसके अनुमानों पर रहती है जो कि ज्यादातर सही निकलते रहे हैं।  कुल मिलाकर यदि सभी एग्जिट पोल का औसत निकालें तो 14 नवंबर को बिहार की सत्ता फिर नीतीश कुमार के हाथ आ  जाएगी। हालांकि लोकसभा चुनाव में हुए उलटफेर को लोग भूले नहीं हैं। इसीलिए महागठबंधन की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज करने के प्रति भी हिचकिचाहट है। अनिश्चितता की एक वजह प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी है जिसके प्रदर्शन को यद्यपि अधिकतर एग्जिट पोल में निराशाजनक बताया गया है किंतु  एनडीटीवी के पूर्व मालिक प्रणय रॉय के मुताबिक बिहार में एनडीए आगे रहकर भी बहुमत से पीछे रहेगा और  जनसुराज को मिलने वाली 24 सीटें संतुलन बनाने - बिगाड़ने का काम करेंगी। हालांकि ऐसा कहने वाले वे अकेले व्यक्ति हैं । बिहार के चुनावी नतीजे केवल इस राज्य ही नहीं अपितु राष्ट्रीय  राजनीति पर भी दूरगामी प्रभाव डालेंगे। साधारण तौर से देखें तो लालू प्रसाद यादव का युग समाप्ति की ओर है। वहीं इसका असर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर भी पड़ सकता है जो नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के समर्थन से कायम है। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की चुनाव जिताऊ क्षमता भी बिहार में दाँव पर है। महागठबंधन की हार से उनकी साख और गिरने के अलावा पार्टी भी भविष्य में कमजोर होगी । बड़ी बात नहीं कर्नाटक की सरकार उसके हाथ से निकल जाए। वहीं इंडिया गठबंधन की एकजुटता भी  खतरे में पड़ सकती है । जबकि एनडीए के जीतने पर प. बंगाल के चुनाव में भाजपा दोगुने उत्साह से उतरेगी। राजनीतिक दलों के अलावा चुनाव पूर्व सर्वे और एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों की विश्वसनीयता का फैसला भी कल दोपहर तक हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

उच्च शिक्षित मुस्लिमों का आतंकवाद से जुड़ाव नए खतरे का संकेत


दिल्ली में परसों हुए विस्फोट के बाद जो जानकारियां आ रही हैं उनके मुताबिक जितने भी लोग पकड़े गए उनका संबंध एक तो कश्मीर घाटी से है दूसरे वे हमेशा की तरह मुस्लिम समुदाय के हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि अब तक जो भी लोग पकड़े गए हैं उनमें से अधिकांश डॉक्टर हैं। फरीदाबाद में जिस डॉक्टर के यहाँ विस्फोटकों का जखीरा पकड़ा गया वह जिस शिक्षण संस्थान से जुड़ा था उसकी आड़ में आतंकवादी गतिविधियों की रूपरेखा बनाई जा रही थी। वह तो गनीमत रही कि खुफिया एजेंसियों ने समय रहते पर्दाफ़ाश कर दिया वरना न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर धमाके होते। जांच एजेंसियों से मिले संकेतों के अनुसार लखनऊ स्थित रा.स्व.संघ के कार्यालय को उड़ाने की योजना भी थी। लखनऊ में भी एक महिला मुस्लिम चिकित्सक को भी पकड़ा गया है। जिस प्रकार की पर्तें खुल रही हैं उससे स्पष्ट हो रहा है कि जितने भी मुस्लिम चिकित्सक पकड़े गए उनका संबंध पाकिस्तान के आतँकवादी संगठनों से है। ये बात भी विचारणीय है कि कश्मीर घाटी से निकले तमाम डाॅक्टर इस षडयंत्र में शामिल निकले। और यही सबसे चिंताजनक बात है कि इस्लाम के नाम पर आतंक का कारोबार अब बेरोजगार नौजवानों से आगे निकलकर सुशिक्षित वर्ग में भी फैल गया है। जिस स्तर के चिकित्सक इस कांड से जुड़े पाए गए उनके आतंकवाद में इतनी गहराई तक लिप्त होने से  मुस्लिम समुदाय की छवि पर नया संकट उत्पन्न हो गया है। अभी तक आम अवधारणा थी कि अशिक्षा के कारण जो धर्मांधता मुस्लिम समुदाय में है उसका लाभ उठाकर आतंकवादी संगठन अपना उद्देश्य पूरा करने में सफल होते रहे हैं। कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी की जो घटनाएं होती थीं उनमें भी बेरोजगार नौजवान ही आगे - आगे दिखाई देते थे। समरणीय है  हुर्रियत काँफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह जिलानी ने मुस्लिम समुदाय को पत्थरबाजी रूपी हथियार थमाया था। उसकी देखासीखी पूरे देश में इस समुदाय की छवि पत्थरबाज की बन गई। ये बात आम हो गई है कि जब भी कहीं सांप्रदायिक तनाव होता है तब मस्जिदों से पत्थर फेंकने के दृश्य दिखाई देते हैं। दिल्ली दंगों के दौरान भी मुस्लिम समाज के अनेक लोगों के घरों की छतों से पत्थर और ईंटों के अलावा अन्य घातक सामग्री जप्त हुई। जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के बाद से घाटी के भीतर आतंकवादी गतिविधियों में कमी आने से पाकिस्तान भी परेशान हो उठा है। पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से जब आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट करने की कारवाई की गई उसके बाद से ही वे भारत के विरुद्ध नए सिरे से व्यूह रचना बना रहे थे। लेकिन जिस तरह से मुस्लिम डाक्टरों का समूह आतंकवाद से जुड़ा मिला उससे लगता है कि इन लोगों का संबंध अरब देशों में सक्रिय इस्लामिक उग्रवादी संगठनों से भी हो सकता है। इस बारे में विचारणीय  ये है कि पश्चिम एशिया से भागकर मुस्लिम  शरणार्थी जबसे यूरोपीय देशों सहित अमेरिका और कैनेडा आदि में बसे तभी से वहाँ इस्लामिक उग्रवाद ने सिर उठा लिया। हाल ही में न्यूयॉर्क में हुए महापौर के चुनाव में ममदानी नामक मुस्लिम के जीतने के बाद अमेरिका में जिस तरह मुस्लिम उग्रवाद  सिर उठा रहा है उससे प्रोत्साहित होकर  अन्य  यूरोपीय देशों में भी मुस्लिम समुदाय बेहद आक्रामक हो उठा है। भारत में भी एक तबका है जो ममदानी  की जीत पर महज इसलिए जश्न मना रहा था क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का घोर विरोधी है। बड़ी बात नहीं ये तबका दिल्ली विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किये गए डॉक्टरों के बचाव में आगे आ जाए और देश के नामी वकील उनका बचाव करने सर्वोच्च न्यायालय में खड़े नजर आयें। इस कांड से एक बात साफ हो गई  कि इस्लामिक उग्रवाद में मुस्लिम समाज का वह वर्ग भी लिप्त हो चला है जिसे सुशिक्षित होने से समझदार और जिम्मेदार नागरिक माना जाता रहा है।  लालकिले के निकट हुए विस्फोट और थोक के भाव आतंकवादियों से जुड़े मुस्लिम डॉक्टरों के गिरफ्तार होने के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं और उनके संगठनों का शांत रहना भी सवाल खड़े करता है। केंद्र सरकार को चाहिए वह इस मामले की गहराई में जाकर देश को गृहयुद्ध में धकेलने के इस्लामिक षडयंत्र का पर्दाफ़ाश करे जिससे आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने वालों के मंसूबे पूरे न हो सकें।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 November 2025

दिल्ली में हुआ विस्फोट किसी बड़ी साजिश का हिस्सा


फरीदाबाद के एक डॉक्टर के यहाँ बड़ी मात्रा में विस्फोटक चीजों के अलावा घातक अस्त्र -शस्त्र बरामद होने के बाद से ही किसी बड़ी आतंकी वारदात की आशंका बढ़ गई थी जो कल शाम दिल्ली के लालकिले इलाके में एक वाहन में हुए विस्फोट से सही साबित हो गई।  जिस वाहन में विस्फोट हुआ उसमें बैठे शख्स के अलावा 9 लोगों की मौत और 20 के घायल होने की जानकारी मिली है। अभी उक्त विस्फोट के कारण और पृष्ठभूमि के बारे में स्पष्ट रूप से अधिकृत तौर कुछ भी नहीं कहा गया किंतु जिस तरह के तार जुड़ रहे हैं उनसे यह आतंकी हमला ही लगता है । जिस वाहन में विस्फोट हुआ उसमें बैठे उमर नामक व्यक्ति की तलाश की जा रही थी। ये संभावना है कि उसने विस्फोट में खुद को भी खत्म कर लिया। हालांकि इसकी पुष्टि भी जरूरी जाँच पड़ताल के बाद ही संभव है। इस बारे में ये सोचना गलत नहीं है कि फरीदाबाद में पकड़ा गया जखीरा किसी बड़ी घटना को अंजाम देने के लिए जमा हुआ था। उससे जुड़े लोगों का संबंध कश्मीर से निकलने से संदेह और गहरा हो जाता है। आश्चर्य की बात ये है कि इनमें डॉक्टर जैसे पेशेवर लोग भी हैं।  कुछ दिन पहले म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री वरिष्ट कांग्रेस नेता  दिग्विजय सिंह ने दिल्ली दंगों के सिलसिले में  बंद उमर खालिद को इस आधार पर रिहा करने की मांग की थी कि वे डॉक्टरेट कर रहे थे। लेकिन ताजा घटनाओं में डॉक्टरों का जुड़ाव होने के बाद ये कहना पड़ेगा कि किसी भी पेशे से जुड़ा इंसान  आतंकवादियों के साथ मिलकर खूनी खेल रच सकता है। ऐसा लगता है ऑपरेशन सिंदूर में अपने परिवार को गँवा चुका  कुख्यात आतँकवादी हाफिज सईद भारत में दहशत फैलाने के लिए नए सिरे से तैयारी कर रहा है। कल ही ये खबर भी आई थी कि वह बांग्लादेश में अपना अड्डा बनाने जा रहा है जहाँ से  आतंकी हमले संचालित किये जाएंगे। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई के प्रमुख ने भी  हाल ही में ढाका की यात्रा की थी। शेख हसीना का तख्ता पलटे जाने के बाद इस देश में भारत विरोधी भावनाओं को अंतरिम सरकार का संरक्षण मिलने से हिंदुओं और उनके धर्मस्थलों पर हमले बढ़े हैं। सरकार के मुखिया बने बैठे मो. युनुस का भारत विरोधी रवैया भी जगजाहिर है।  बीते कुछ महीनों में पाकिस्तान की सरकार ने हाफिज सईद को बड़ी मात्रा में धन देकर उसके संगठन को दोबारा खड़ा करने में सहायता दी। ऐसे में दिल्ली में हुए  विस्फोट में पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। फरीदाबाद के डॉक्टर के यहाँ पकड़ा गया सामान आतंकवादी गतिविधियों में ही उपयोग होने वाला था इससे कोई इंकार नहीं कर सकेगा। चूंकि इसमें पकड़े जा रहे लोगों की जड़ें कश्मीर घाटी से हैं लिहाजा ये सोचना गलत नहीं होगा कि घाटी से बाहर देश के भीतरी हिस्सों में मुंबई जैसे सीरियल बम धमाके करते हुए आंतरिक आंतरिक सुरक्षा तहस - नहस करने की साजिश रची जा रही है। बीते कुछ दिनों में ही गुजरात और म.प्र सहित अनेक राज्यों में आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद फरीदाबाद में पकड़ा गया सामान इस बात की पुष्टि करने के लिए काफी है।  हालांकि खुफिया तंत्र ने किसी बड़े हादसे को टालने में तो सफलता हासिल कर ली किंतु इसी बीच लालकिले के पास धमाका हो गया जो उक्त योजना का छोटा हिस्सा कहा जा सकता है। हालांकि उसमें मारे गए लोगों के शव पर वैसे निशान नहींं मिलने की जानकारी आई है जैसे बम विस्फोट में होते हैं किंतु विस्फोट की भयावहता देखते हुए ये संदेह होना स्वाभाविक है कि वह किसी आतंकवादी योजना का ही हिस्सा है। इस बारे में ये बात भी गौरतलब है कि अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के महापौर चुनाव में ममदानी नामक मुस्लिम की जीत के बाद वहाँ अचानक इस्लामिक भावनाओं का ज्वार उठने लगा जिसमें अरबी भाषा बोलने की छूट के अलावा अमेरिका का राष्ट्रध्वज उतार फेंकने जैसी जुर्रत  की जा रही है। और उसकी देखा - सीखी ब्रिटेन और इटली सहित अनेक यूरोपीय देशों में बसे मुस्लिम सड़कों पर सामूहिक नमाज पढ़ने जैसी गतिविधियों से कानून व्यवस्था को ध्वस्त करने पर आमादा हैं। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के रूप में पाकिस्तान को सबक सिखाया था किंतु अमेरिका ने उसकी पीठ पर हाथ रख दिया जिसके बाद से उसकी शरारतें फिर शुरू होती दिख रही हैं। दिल्ली में हुए विस्फोट की  घटना से एक बात स्पष्ट है कि सीमा पार बैठे दुश्मन के बराबर ही आस्तीन के सांप भी खतरनाक हैं जिनका फन सख्ती से कुचला जाना चाहिए। देश में बैठे घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें निकाल बाहर करने की मुहिम को और तेज करना देश हित में जरूरी हो गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 10 November 2025

प. बंगाल में एस.आई.आर के डर से मुस्लिम मतदाता घर छोड़ भाग रहे

.आई.आर (मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण)  को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने अपनी पिछली पत्रकार वार्ता में जो खुलासे किये उन्हें हाइड्रोजन बम   का नाम दिया। हालांकि ये बम फोड़ने में उन्होंने  लंबा समय लगाया जिसके कारण उन पर तंज कसे जाने लगे थे। उनसे बचने के लिए ही वे बिहार में मतदान के पहले चरण के एक दिन पूर्व पत्रकारों से मुखातिब हुए और हरियाणा  विधानसभा चुनाव में मतदाता सूचियों में गड़बड़ी का आरोप लगाया जैसा वे महाराष्ट्र और कर्नाटक के बारे में भी वे कर चुके थे। हालांकि चुनाव आयोग उनके आरोपों को निराधार बता चुका है। हरियाणा के अनेक समाचार माध्यमों ने भी श्री गाँधी के आरोपों की मौके पर जाँच कर स्पष्ट किया कि वे  तथ्यात्मक तौर पर सही नहीं हैं। लेकिन उसी पत्रकार वार्ता में उनका ये कहना चर्चा का विषय बन गया कि  बिहार में भी एस.आई.आर के जरिये वोट चोरी से चुनाव जीतने की कोशिश की जा रही है। जबकि पूरे चुनाव में राज्य से मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की शिकायतें न्यूनतम आईं।  बिहार में कल अंतिम चरण का मतदान होने के बाद 14 नवंबर को नतीजे आ जायेंगे। यदि एनडीए जीता तब राहुल और तेजस्वी यादव एस.आई.आर पर ठीकरा फोड़ेंगे किंतु  विजय महागठबंधन के हिस्से आई तब भी क्या विपक्ष मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया का विरोध करेगा जो कि पूरे देश में प्रारंभ हो चुकी है। उल्लेखनीय है बिहार विधानसभा चुनाव में श्री गाँधी ने मतदाता सूचियों की जाँच को बड़ा मुद्दा बनाया और तेजस्वी के साथ वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाने के बाद भी उसको रोकने में उन्हें सफलता नहीं मिली। उलटे चुनाव आयोग ने पूरे देश में एस.आई.आर प्रारंभ कर दी। बिहार में लाखों मतदाताओं के नाम कट जाने के बाद प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने राज्य में मतदाता सूचियों की सघन जाँच का विरोध शुरू कर दिया। चूंकि राज्य के  सरकारी कर्मचारी ही इस काम को करते हैं लिहाजा उसमें रुकावट पैदा करने की कोशिश भी की गई किंतु चुनाव आयोग की सख्ती के  आगे उनकी दाल नहीं गली ।  तब ये शिगूफा छोड़ा जाने लगा कि एस. आई. आर के डर से लोग आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि उनके मन में ये डर समा गया है कि  आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में कहीं उनकी नागरिकता संदेह के घेरे में न आ जाए। दरअसल, ममता बैनर्जी द्वारा एस.आई.आर का विरोध करने का मुख्य कारण मतदाता सूचियों से उन बांग्लादेशियों के नाम कटने की आशंका है जो तृणमूल कांग्रेस की मदद से अवैध रूप से मतदाता बन बैठे और चुनाव में उसकी जीत का आधार बनते हैं। राज्य में 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं जिनका 75 प्रतिशत ममता समर्थक है और इसीलिए  वे घुसपैठियों को वापस भेजने का खुलकर विरोध करती हैं। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि बांग्ला देश से सटे सीमावर्ती जिलों में बीते कुछ वर्षों में मतदाताओं की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि से वहाँ का जनसंख्या संतुलन पूरी तरह इकतरफा हो चुका है  जिसकी वजह से गैर मुस्लिम उम्मीदवार का जीत पाना असंभव है। हालांकि ऐसी स्थिति बिहार की कुछ सीटों पर भी है किंतु प. बंगाल में ममता बैनर्जी की राजनीतिक जड़ों को मजबूत करने में मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण  भूमिका है जिनमें बांग्लादेश से आये घुसपैठियों की भी बड़ी संख्या है।एस.आई.आर के कारण इन घुसपैठियों के साथ ही तृणमूल कांग्रेस भी परेशान है क्योंकि आगामी वर्ष गर्मियों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ममता की तमाम कोशिशों के बाद भी मतदाता सूचियों की बारीकी से की जाने वाली जांच चूंकि रुक नहीं पाई इसलिए अवैध रूप से मतदाता बन बैठे घुसपैठियों में घबराहट फैल गई है। बीते कुछ दिनों में सैकड़ों लोग बांग्लादेश भागने की कोशिश में पकड़े जा चुके हैं। समाचार पत्रों से मिल रही जानकारियों के मुताबिक  अनेक शहरी बस्तियों के मुस्लिम रहवासी अचानक गायब हो गए हैं। बीते कुछ सालों में बनी बहुमंजिला इमारतों में रह रहे मुस्लिम परिवारों ने भी अपना आवास छोड़ दिया। इसका कारण एस.आई.आर से बचना है क्योंकि मतदाता सूची में बने रहने के लिए यदि वे आवशयक कागजात नहीं दिखा सके तब उनकी अवैध नागरिकता का खुलासा हो जाएगा। जाहिर है इन कारणों से प. बंगाल की मतदाता सूचियों से भी बिहार की तरह ही लाखों नाम कट जाएंगे जिसका सीधा - सीधा नुकसान तृणमूल कांग्रेस को होने की आशंका से ममता की चिंता बढ़ती जा रही है। देखना ये है कि प. बंगाल में उनके विरुद्ध लड़ने वाली कांग्रेस एस.आई.आर का विरोध करती है या नहीं? याद रहे लोकसभा चुनाव में ममता ने कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को क्रिकेटर युसुफ पठान के हाथों हरवा दिया क्योंकि उस सीट पर मुस्लिम मतदाता पठान के पक्ष में गोलबंद हो गए जबकि अधीर रंजन काफी समय से वहाँ जीतते आ रहे थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 9 November 2025

पाठकों के भरोसे को बनाये रखना हमारी प्रतिबद्धता



       9 नवम्बर 1989 को मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का पहला अंक सम्माननीय पाठकों के हाथ आया था । वह  अभूतपूर्व राजनीतिक गतिविधियों का  दौर था। नये  सियासी समीकरण आकार ले रहे थे । बेमेल गठबंधन और अवसरवाद समूचे राजनीतिक विमर्श पर हावी होने से जनमानस भ्रमित था । स्थापित प्रतिमाएं ध्वस्त हो रही थीं । अविश्वास और अनिश्चितता  के कारण सर्वत्र भ्रम के साथ भय का माहौल बन गया । उस दौर में महाकोशल की  चेतनास्थली  जबलपुर में  नए सांध्य दैनिक के लिए पाँव जमाना आसान नहीं था । लेकिन देखते - देखते मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों की पसंद बन गया । अपनी निर्भीकता और सटीकता के कारण  पाठकों  का पुरजोर  समर्थन मिलने से हमारा उत्साह  बढ़ा। जिससे  हम साहस के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में समर्थ हो सके । तीन दशक से ज्यादा बीत चुके हैं । देश के साथ दुनिया भी पूरी तरह से बदल चुकी  है । राजनीति के अलावा अर्थव्यवस्था , साहित्य, कला और संस्कृति के साथ ही समाचार जगत के स्वरूप में भी आमूल परिवर्तन हुआ है । राजनीति ने अपनी  दिशा पूरी तरह बदल ली  है | 1989 में तेजी से उभरी हिंदुत्व की  लहर राष्ट्रीय मुख्यधारा का रूप ले चुकी है ।  वहीं देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अपनी प्रतिष्ठा बचाने संघर्षरत है ।  आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भारत दुनिया के बड़े देशों के साथ बराबरी करने की स्थिति में है । कोरोना  महामारी का मुकाबला कुशलता के साथ करने के कारण  आम देशवासी  का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ है । भारतीय समुदाय पेशेवर दक्षता और पौरुष के बलबूते विश्व भर में सम्मानित  और समृद्ध  हो रहा है ।  36  साल की इस यात्रा में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस जागरूकता और जिम्मेदारी का प्रतीक बनकर पाठकों के साथ बना रहा । स्वस्थ पत्रकारिता की प्रतिबद्धता से हम सदैव जुड़े रहे। और इसी वजह से विश्वास के संकट के बाद भी इस  समाचार पत्र ने अपनी साख  बरकरार  रखी । हालांकि इसके लिए  हमें असंख्य कठिनाइयों  , अवरोधों और मुखालफत का सामना करना पड़ा । तेजी से हो रहे तकनीकी उन्नयन के कारण छोटे  और मझोले  समाचार पत्रों के सामने पूंजी का जबरदस्त संकट उत्पन्न होता जा रहा है । डिजिटल माध्यम के उद्भव से समाचार पत्रों के समक्ष एक सबल प्रतिद्वंदी खड़ा हो गया है। लेकिन इस सबसे अविचलित रहते हुए मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है । सम्माननीय पाठकों का  विश्वास ही हमारी ऊर्जा का अक्षत स्रोत है । इसी तरह निःस्वार्थ भाव से सदैव सहयोग देने वाले उदार विज्ञापनदाता हमारा संबल हैं । इसी  कारण पत्रकारिता के आदर्शों के अनुरूप  संघर्षपथ पर निर्बाध चलते रहने के लिए हम कटिबद्ध हैं । प्रारंभ से ही जिसे पढ़े बिना शाम अधूरी है का जो विशेषण हमारे साथ जुड़ा , उसे कायम  रखने हम पूरी ईमानदारी से समर्पित रहेंगे । भविष्य में और भी बड़ी  चुनौतियां आने वाली हैं । राजनीतिक घटनाचक्र भी अपनी गति से घूम रहा है। हर समय चुनावों में उलझे देश में  समाचार माध्यमों के लिए अपनी विश्वसनीयता बनाये रखना कठिन होता जा रहा है। उनकी छवि पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। यद्यपि इस स्थिति के लिए वे स्वयं भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं | लेकिन मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस अपने पाठकों को आश्वस्त करता है कि वह उनके भरोसे को बनाये रखने  प्रतिबद्ध रहेगा। दबावों के सामने झुकने का स्वभाव न होने से ही हम पाठकों का विश्वास अर्जित कर सके। और आने वाले समय में भी उसी अंदाज में ये सफर चलता रहेगा क्योंकि जब पाठकों का  साथ हो तब फिर हमें किसी से भयभीत होने की  जरूरत ही नहीं है। 
विनम्र आभार एवं अनंत शुभकामनाओं सहित।

- रवीन्द्र वाजपेयी