Tuesday, 18 November 2025

बांग्लादेश के मामले में सावधानी से कदम उठाने की जरूरत


बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को गत दिवस फांसी की सजा सुनाई गई। ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें हत्या के लिए उकसाने और हत्या का आदेश देने के लिए दोषी मानते हुए जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हत्याओं का जिम्मेदार बताया। उनके साथ ही पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान को भी मृत्युदंड दिया। बांग्लादेश के अंतरिम शासक मो. यूनुस ने भारत से हसीना को  सौंपने करने की मांग की है। उल्लेखनीय है गत वर्ष हुए  तख्तापलट के बाद हसीना और असदुज्जमान  देश छोड़कर भारत आ गए थे। बांग्लादेश का कहना है कि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि के मुताबिक भारत को चाहिए कि वह हसीना को उसके हवाले करे। हालाँकि सं. रा. संघ के महासचिव ने उक्त फैसले को गलत बताया है। मानवाधिकार से जुड़ी अनेक हस्तियों ने भी मृत्युदण्ड दिये जाने के फैसले को प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध बताया क्योंकि  हसीना को अपना पक्ष रखने का अवसर दिये बिना उन पर लगे आरोप सही मानकर फांसी की सजा का ऐलान कर दिया गया। हालाँकि इस निर्णय से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि पाकिस्तान की तरह से ही बांग्लादेश में अपने राजनीतिक विरोधी को खत्म करने की परिपाटी रही है। बांग्लादेश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीबुर्रहमान की 1975 में उनके सरकारी आवास में घुसकर सपरिवार हत्या कर दी गई थी। उनकी पुत्री हसीना उस समय विदेश में होने से बच गईं और बाद में प्रधानमंत्री भी बनीं। उनके पहले वाली सरकार  भारत विरोधी नीति पर चलती रही। हसीना के शासनकाल में दोनों देशों के रिश्तों में काफी सुधार हुआ जिसके कारण अनेक विवादित मुद्दे हल हो गए और आपसी व्यापार भी बढ़ा। लेकिन वे भारत विरोधी ताकतों को नियंत्रित नहीं कर सकीं  जो वहाँ रह रहे हिंदुओं पर अत्याचार और उनके धर्मस्थलों को नष्ट करते रहते हैं। हसीना के विरोध में हुए छात्र आंदोलन के पीछे अमेरिका और चीन दोनों की भूमिका रही क्योंकि वे इस देश का उपयोग भारत को घेरने के लिए करना चाहते हैं। तख्ता पलट के कारण जब हसीना भारत आईं तब मोदी सरकार ने  ये सोचकर उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी कि जल्द ही वे किसी अन्य देश में राजनीतिक शरण  ले लेंगी किंतु अमेरिका के दबाव में ऐसा नहीं हो सका और लगभग 15 माह से वे यहीं रह रही हैं। बांग्लादेश ने कई बार भारत से हसीना को लौटाने की मांग कि जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया। यद्यपि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते कायम हैं किंतु भारत ने अपनी मित्र को संकट में अकेला छोड़ना उचित नहीं समझा। लेकिन अब जबकि हसीना को फांसी की सजा सुना दी गई है तब  यह मामला काफी पेचीदा हो गया है। बांग्लादेश इसे वैश्विक मंचों पर उठायेगा जहाँ उसे चीन और पाकिस्तान का समर्थन तो मिलेगा ही , बड़ी बात नहीं अमेरिका भी साथ खड़ा हो जाए जिसकी नजर उसके एक द्वीप पर है। ऐसे में भारत को बाहरी दबाव  झेलने पड़ सकते हैं। हालाँकि बांग्लादेश में भारत विरोधी सरकार है जो हिंदुओं का दमन करने पर आमादा मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुलकर संरक्षण दे रही है किंतु हसीना पर अदालत के फैसले के पहले उनके समर्थक भी सड़कों पर उतरे जिसके चलते फैसले की तारीख टालनी पड़ी। जिन छात्र संगठनों ने हसीना को सत्ता से हटाने के लिए देशव्यापी आंदोलन  किये वे भी नये  चुनाव की मांग लेकर आंदोलनरत हैं। मो. युनुस यद्यपि जल्द चुनाव करवाने का आश्वासन देते रहे किंतु इस दिशा में कोई तैयारी दिखाई नहीं देने से असंतोष बढ़ रहा है। हसीना की गैर मौजूदगी में यदि चुनाव हुए भी तो सत्ता किसके हाथ जाएगी ये कहना कठिन है। हसीना  के शासनकाल में जेल में रहीं पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी भले ही मुख्य दावेदार हो किंतु छात्र नेताओं की उम्मीदें भी आसमान छू रही हैं। ऐसे में बांग्लादेश आंतरिक अशांति में फंसा रहेगा। एक आशंका ये भी है कि मौके का लाभ उठाकर फौजी जनरल सत्ता हथिया लें जैसा शेख मुजीब की हत्या के बाद हुआ था। खालिदा के पति जनरल जिया उर रहमान भी राष्ट्रपति रहे। कुल मिलाकर बांग्लादेश एक बार फिर आंतरिक तौर पर अस्थिरता और अशांति से गुजर रहा है। मो. युनुस चूंकि अमेरिका द्वारा लादे गए हैं इसलिए उनकी जनता पर पकड़ नहीं है। और वामपंथी होने से उन्हें चीन की मिजाजपुर्सी भी करनी पड़ रही है। हसीना को नहीं लौटाने के निर्णय पर भारत यदि अडिग रहा तब दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है। ये देखते हुए भारत को बेहद सावधानी से कदम उठाना चाहिए क्योंकि बांग्लादेश को हमारे पड़ोस में बैठे शत्रु देशों का समर्थन है। हाल ही में पाकिस्तान के अनेक आतंकी सरगना भी  भारत विरोधी गतिविधियों की तैयारी करने बांग्लादेश गए थे। आने वाले दिन बांग्लादेश के लिए उथलपुथल भरे होंगे। पड़ोसी के यहाँ लगी आग से हमारा घर न झुलसे इसकी सावधानी भारत को रखनी होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 17 November 2025

बिहार में लगे झटके के बाद : इंडिया गठबंधन बिखरने के कगार पर

बिहार चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन के भविष्य पर  सवाल उठने लगे हैं। 2026 में प. बंगाल, असम, तमिलनाडु , केरल तथा पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। प. बंगाल में ममता बैनर्जी ने एकला चलो की नीति के कारण ही तृणमूल कांग्रेस नामक अलग पार्टी बनाई और चार दशकों से चले आ रहे वामपंथी राज को उखाड़ फेंका। नरेंद्र मोदी के केंद्रीय सत्ता में आने के बाद जब भाजपा ने वहाँ पाँव जमाना शुरू किया तब ममता विपक्षी गठबंधन की पेशकश करते हुए शरद पवार आदि से मिलीं भी। लेकिन बात इसलिए नहीं बनी क्योंकि उन्हें राहुल गाँधी से परहेज था। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वामपंथी एकजुट होकर उनके विरुद्ध लड़े किंतु उन्हें एक सीट तक नहीं मिली । बाद में इंडिया गठबंधन बनने पर ममता उसमें शामिल तो हो गईं परंतु  कांग्रेस और वाम दलों को लोकसभा की एक भी सीट देने से मना कर दिया। बीते सप्ताह  बिहार में कांग्रेस और वाम दलों की जो दुर्गति हुई उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में ममता उनको एक सीट भी नहीं देंगी । असम में जरूर कांग्रेस ही भाजपा के मुकाबले में है लेकिन ममता की पार्टी वहाँ भी अकेले लड़कर विपक्षी एकता में सेंध लगाने से बाज नहीं आयेगी। अगला राज्य है तमिलनाडु जहाँ इंडिया गठबंधन कायम है क्योंकि सत्तारूढ़ द्रमुक द्वारा कांग्रेस सहित वामदलों को भी सीटें दी जाती हैं किंतु राष्ट्रीय दल होने के बाद भी कांग्रेस  बराबरी का हिस्सा मांगने की स्थिति में नहीं है जैसा बिहार में भाजपा ने जदयू से हासिल किया और  ऐसा ही पुडुचेरी में भी है। लेकिन केरल में इंडिया गठबंधन पूरी तरह से छिन्न - भिन्न है जहाँ मुख्य मुकाबला वाम मोर्चा और कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन के बीच होना है। अर्थात बिहार, प. बंगाल और तमिलनाडु में साथ - साथ लड़ने वाले वाम दल और कांग्रेस केरल में एक दूसरे के विरुद्ध खड़े होंगे जबकि दोनों ही इंडिया गठबंधन के घटक हैं । वाम दलों को नाराजगी है कि 2019 में  राहुल गाँधी केरल की वायनाड सीट से लड़ने आ गए।  वे अमेठी से भी लड़े किंतु हारने के बाद वायनाड का प्रतिनिधित्व करते रहे। 2024 में उन्होंने दोबारा  वायनाड से नामांकन भरा तब वामदलों ने माँग की कि वे उत्तर भारत की किसी सीट से लड़ें  किंतु राहुल नहीं माने तब सीपीआई नेता डी. राजा की पत्नी को वाम दलों ने वहाँ से खड़ा किया। श्री गाँधी ने उ.प्र की रायबरेली सीट से भी नामांकन भरा और दोनों  जीतने के बाद वायनाड छोड़ दी। वामदलों को लगा कि अब कांग्रेस वह सीट छोड़ देगी लेकिन उसने  राहुल की बहिन प्रियंका वाड्रा को उतारकर इंडिया गठबंधन की एकता को धता बता दिया।  इसके बाद  वाम सरकार और कांग्रेस के बीच टकराहट और बढ़ गई।  पिछली बार  वाम मोर्चे ने लगातार दूसरी बार सत्ता पर कब्जा किया था। कांग्रेस को उम्मीद है आगामी चुनाव में वहाँ सत्ता बदल सकती है इसलिए वह उत्साहित है। लेकिन वाम मोर्चा भी केरल पर कब्जा  बनाये रखना चाहेगा क्योंकि प. बंगाल और त्रिपुरा के दुर्ग ढह जाने के बाद यही उसका एकमात्र ठिकाना है। ऐसे में इंडिया गठबंधन की एकता को केरल में जबरदस्त धक्का पहुंचेगा । अन्य राज्यों से भी अच्छी खबरें नहीं आ आ रहीं। बिहार के नतीजों के बाद राजद में भी चर्चा है कि अकेले लड़े होते तब शायद इतनी बुरी गति न होती। 2027 में  उ.प्र में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद अखिलेश यादव चाहते थे कि इंडिया गठबंधन में उन्हें महत्व मिले किंतु राहुल के रवैये से सपा और कांग्रेस के बीच दूरी बढ़ती गई। विशेष रूप से जब कुछ उपचुनावों में सीटों के बंटवारे से क्षुब्ध कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया जिसके कारण भाजपा ने जोरदार वापसी की। महाराष्ट्र में भी इंडिया गठबंधन में दरार के संकेत हैं। शरद पवार विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद शांत बैठे हैं। सुना है उनके और भाजपा के बीच खिचड़ी पक रही है। उधर उद्धव ठाकरे भी राहुल गाँधी से छिड़कने लगे हैं। मुंबई महानगर पालिका के चुनाव में कांग्रेस और उद्धव अलग - अलग लड़ने वाले हैं। उनकी और राज ठाकरे की संयुक्त  रैली के बाद इंडिया गठबंधन का भविष्य अधर में है। आम आदमी पार्टी पहले ही कन्नी काट चुकी है। लगता है लोकसभा चुनाव के पहले फूला इंडिया गठबंधन रूपी गुब्बारा फूटने को आ गया है। उसकी पिछली बैठक कब हुई थी ये भी किसी को याद नहीं है। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी अलग रास्ते पर हैं। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की शानदार  जीत के बाद राहुल गाँधी की क्षमता पर घटक दलों का भरोसा खत्म सा है। कांग्रेस के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है जो कभी भी सतह पर आ सकता है। प्रधानमंत्री द्वारा कांग्रेस में एक और विभाजन की संभावना जताये जाने के बाद से राजनीतिक हल्कों  में भी उत्सुकता है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन भारी उथल - पुथल के होंगे। बड़ी बात नहीं संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के पहले ही कांग्रेस में ही कोई हाइड्रोजन बम फोड़ दे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 15 November 2025

कांग्रेस के साथ ही तेजस्वी को भी ले डूबे राहुल

बिहार विधानसभा  चुनावों के नतीजों से पूरा देश चौंक गया। हालाँकि महागठबंधन की जीत के लिए खुलकर मैदान में उतरे तमाम वामपंथी पत्रकार भी अंतिम चरण आते तक ये कहने लगे थे कि नीतीश कुमार के 20 वर्ष  सत्ता में रहने के बाद न तो सत्ता विरोधी लहर है और न ही मुख्यमंत्री के प्रति नाराजगी या ऊब । उन्होंने ये भी स्वीकारा कि महिलाओं में नीतीश और नरेंद्र मोदी की योजनाओं का जबरदस्त प्रभाव है। एनडीए के सुव्यवस्थित  प्रचार अभियान , घटक दलों में बेहतर तालमेल और जातीय समीकरणों को साधने की सटीक रणनीति से  वे  प्रभावित थे। महागठबंधन के प्रति झुकाव रखने वाले विश्लेषक भी टीवी चर्चाओं में चुनाव आयोग पर छींटाकशी करने के बावजूद मान बैठे कि वोट चोरी   कोई मुद्दा नहीं बन सका। राहुल गाँधी का वोट अधिकार यात्रा के बाद  विदेश चले जाना भी महागठबंधन  समर्थक पत्रकारों को रास नहीं आया। उन्होंने निःसंकोच कहा  कि श्री गाँधी  बुनियादी मुद्दों को छोड़ यहाँ - वहाँ की जो बातें कहते रहे उनकी वजह से महागठबंधन के प्रति आकर्षण पैदा नहीं हो सका। दूसरी ओर एनडीए भले ही नीतीश कुमार को सामने रखकर लड़ा किंतु उसकी पूरी कमान  भाजपा के पास थी जिसने अपनी संगठन शक्ति का उपयोग करते हुए बिहार की जमीनी सच्चाई को समझकर व्यूह रचना की जिसका परिणाम एनडीए की ऐतिहासिक विजय के रूप में सामने आया जिसका अंदाज  चुनाव विश्लेषक और सर्वेक्षण  एजेंसियां तक नहीं लगा सकीं। औरों को तो छोड़ भी दें लेकिन  धूमकेतु की तरह उभरी जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर तक हवा का रुख भांपने में विफल रहे जबकि 2015 में प्रचंड  मोदी लहर के बावजूद  नीतीश कुमार को सत्ता में लाने में उनकी रणनीति कारगर साबित हुई थी।  ये सब देखते हुए कांग्रेस को चाहिए वह पराजय के सही कारणों को समझकर प्रतिक्रिया दे किंतु राहुल से लेकर निचले स्तर तक के प्रवक्ता और पार्टी का सोशल मीडिया चलाने वाले जिस तरह की सतही टिप्पणियां कर रहे हैं उनसे लगता है कांग्रेस ने गलतियों से सबक लेने के बजाय उन्हें दोहराते रहने की कसम खा रखी है। श्री गाँधी ने अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने के बजाय चुनाव आयोग की वजह से जीत पाने में कठिनाई का बहाना बनाकर अपना बचाव किया जबकि इस शर्मनाक पराजय के लिए वे सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। उन्होंने  सही समय पर निर्णय नहीं होने दिये वहीं तेजस्वी पर अनावश्यक दबाव बनाकर सीटें तो ज्यादा झटक लीं परंतु जीतने के लिए आवश्यक प्रयास करने के बजाय चुनाव को बेहद हल्के में लिया। तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने में की गई देरी के बाद उनके साथ श्री गाँधी का तालमेल नहीं बन सका। हालाँकि नीतीश को लेकर ये गलती भाजपा ने भी की किंतु एक बार घोषणा होने के बाद प्रधानमंत्री के अलावा अमित शाह, राजनाथ सिंह , जगत प्रकाश नड्डा सहित केंद्रीय मंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, दर्जनों सांसद और सहयोगी  संगठन न केवल भाजपा के अपितु एनडीए के अन्य घटकों की जीत के लिए भी जुट गए। दरअसल  लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद भाजपा ने विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव को गंभीरता से लड़ा जिसके कारण उसे सफलता मिली। इसके विपरीत राहुल गाँधी 99 सीटें जीतने के बाद खुशफहमी में डूब गए। उन्हें ये लगा कि वे प्रधानमंत्री के विरुद्ध तीखी शब्दावली का उपयोग कर जनता के मन में अपनी छवि बना लेंगे किंतु लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में जहाँ भाजपा ने शानदार सफलताएं अर्जित कीं वहीं कांग्रेस के हाथ खाली रहे। सच्चाई यही है कि बिहार में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के लिए सीधे श्री गाँधी ही जिम्मेदार हैं। यदि वे तेजस्वी को खुला हाथ देते तो हो सकता है महागठबंधन की इतनी दुर्गति न होती। प्रधानमंत्री ने कल शाम कांग्रेस के एक और विभाजन की जो भविष्यवाणी की वह सही हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे भी जिस राहुल ब्रिगेड के बारे में कहा जाता था कि वह कांग्रेस के सुनहरे दिन वापस लायेगी उसके अनेक  सदस्य श्री गाँधी से नाराज होकर  पार्टी छोड़ चुके हैं। आज कांग्रेस में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व नजर नहीं आता। संगठन इसीलिए कमजोर है। सोनिया गाँधी के निष्क्रिय होने के बाद ले - देकर राहुल और प्रियंका ही  हैं किंतु दोनों राजनीति को मनोरंजन का साधन मानकर चलते हैं। बिहार की दुर्दशा के बाद भी यदि श्री गाँधी  अपना रवैया नहीं बदलते तब इंडिया गठबंधन के घटक दल भी उन्हें बोझ समझने लगेंगे। प.बंगाल में  ममता बैनर्जी और केरल में वामपंथी तो पहले से ही उनको महत्व नहीं देते। बिहार में राजद के अलावा वीआईपी और वाम दलों की भी जो लुटिया डूबी उसके बाद बाकी दल भी कांग्रेस से दूरी बनाने लगें तो आश्चर्य नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 14 November 2025

जाति और परिवारवाद की लालटेन बुझी और विकास का कमल खिला


हालांकि अंतिम क्षणों में उलटफेर होते हैं किंतु दोपहर 2 बजे तक के  रुझानों को  देखते हुए तमाम चुनाव पूर्व सर्वे और यू ट्यूब पर  इकतरफा मोदी विरोधी विश्लेषण धरे रह गए। प्रतिष्ठित एजेंसियों ने भी एग्जिट पोल के निष्कर्षों को डरते - डरते पेश किया। दावा होता रहा  कि तेजस्वी यादव लोकप्रियता  में नीतीश कुमार से बहुत आगे हैं।  नीतीश को बीमार और थका हुआ प्रचारित किया गया। वहीं तेजस्वी की छवि युवा हृदय सम्राट जैसी बनाने का अभियान चला। हर घर में एक सरकारी नौकरी जैसे  वायदे को तुरुप का पत्ता बताने की होड़ भी मची। भाजपा द्वारा नीतीश को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने में देर लगाए जाने को आत्मघाती निर्णय बताकर एनडीए की हार की भविष्यवाणी की जाने लगी। नीतीश सरकार द्वारा  महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करवाने के फैसले की काट के तौर पर बेरोजगार युवा मतदाताओं का महागठबंधन के पक्ष में गोलबंद होने का शिगूफा छोड़ा गया।  एम- वाय नामक मुस्लिम - यादव समीकरण को तेजस्वी की ताजपोशी की गारंटी बताकर नीतीश सरकार की विदाई तय मानी जाने लगी। एनडीए द्वारा लालू, प्रसाद यादव के शासन को जंगलराज बताकर उसकी वापसी की जो आशंका व्यक्त की गई उससे डरकर महागठबंधन ने लालू को मैदान में उतारना तो दूर प्रचार सामग्री में उनका चित्र प्रसारित करने तक से परहेज किया । जातीय समीकरण साधने के लिए मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा भी हुई। लेकिन चुनाव परिणाम ने बिहार की राजनीति में एक नये चारित्रिक बदलाव का संकेत पूरे देश को दे दिया जिसमें विकास, सुशासन और राष्ट्रवाद के प्रति खुले समर्थन का ऐलान है।  महागठबंधन के सारे छत्रप धराशायी होते दिख रहे हैं।  तेजस्वी के भी आगे - पीछे होने से ये अंदाज लगाया जा सकता है कि बाकी सबका क्या होगा? मुस्लिम - यादव गठजोड़ के दम पर बिहार को  खानदानी जागीर समझने की मानसिकता को मतदाताओं ने बुरी तरह कुचल दिया। यादव बहुल अनेक सीटों में राजद का पिछड़ना इसका प्रमाण है ।  वहीं सीमांचल की मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भी एनडीए का शानदार प्रदर्शन राष्ट्रवादी राजनीति के बढ़ते प्रभाव को प्रतिबिंबित कर रहा है। चुनाव के आखिरी दौर में अपनी खस्ता हालत देख लालू एंड कंपनी ने ये प्रचार भी शुरू कर दिया कि 2020 के चुनाव में भाजपा द्वारा चिराग पासवान को एनडीए से  बाहर रखकर जदयू को जो नुकसान पहुंचाया था उसे नीतीश भूले नहीं हैं और इसलिए इस बार वे चिराग की लोजपा को हरवाकर बदला लेंगे। दूसरा शिगूफा ये भी छोड़ा गया कि नीतीश चुनाव बाद एक बार फिर तेजस्वी से हाथ मिलाकर भाजपा को झटका देंगे। कुछ वामपंथी पत्रकार तो नीतीश और चंद्रबाबू नायडू द्वारा मोदी सरकार को गिराए जाने की योजना  का भी ढोल पीटने लगे। जनसुराज के प्रशांत किशोर की ताकत को बढ़ा - चढ़ाकर पेश करने की चाल चली गई जिससे वे भाजपा समर्थक सवर्ण और युवाओं में सेंध लगा सकें। सबसे बड़ा अभियान चलाया कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जिन्होंने वोट चोरी का हल्ला मचाकर पूरे बिहार में वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। प्रशांत किशोर को भी ये गुमान हो चला था कि जब वे नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बैनर्जी, जगन मोहन रेड्डी आदि को चुनाव जितवा सकते हैं तब अपनी पार्टी को क्यों नहीं किंतु वे भूल गए कि अच्छा प्रशिक्षक अच्छा खिलाड़ी हो ये जरूरी नहीं। और इसीलिए किंग मेकर बनने की उनकी उम्मीद शून्य पर अटक गई और जिस जदयू को वे 25 से ज्यादा सीटें मिलने पर राजनीति छोड़ने की डींग हाँक रहे थे वह 80 के करीब है। ये भी कहा जा रहा था कि बिहार में केवल जाति चलती है और  लोग वोट और बेटी जाति में ही देते हैं किंतु नतीजों ने इस मिथक को भी ध्वस्त कर दिया। मुस्लिम - यादव समीकरण के पास 31 प्रतिशत मतों की जिस ताकत को महागठबंधन अपनी जीत का आधार मान बैठा था वह भी छिन्न - भिन्न होता दिख रहा है। सभी जातियों और वर्गों को जोड़कर विकास और सुशासन के जरिये बिहार को प्रगति पथ पर ले जाने वाले नेता के तौर पर नीतीश  ने इतिहास रच डाला वहीं नरेंद्र मोदी की वैश्विक प्रतिष्ठा और अमित शाह की कुशल रणनीति ने महागठबंधन को जमीन दिखा दी। तेजस्वी को तो खैर उनके पिता लालू प्रसाद यादव की काली करतूतें खा गईं जो  नेता प्रतिपक्ष बनने लायक भी नहीं रहे। ऐसा ही हुआ राहुल गाँधी के साथ जिन्होंने  दबाव बनाकर 60 से ज्यादा सीटें तो ले लीं किंतु आधा दर्जन पर भी कांग्रेस का जीतना मुश्किल लग रहा है। लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर खुद को नरेंद्र मोदी के बराबर समझने वाले श्री गाँधी अभी तक जमीनी हकीकत समझ नहीं सके। संविधान, जाति  जनगणना, अंबानी - अडानी जैसे मुद्दों पर अटके रहकर वे अपनी और कांग्रेस दोनों की फजीहत करवाने पर आमादा हैं। बिहार में भाजपा 90 सीटों की बढ़त के साथ महाराष्ट्र जैसी स्थिति में आ गई है। जदयू ने भी 80 सीटों पर पकड़ बना रखी है। चिराग का प्रदर्शन उनके उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। राष्ट्रीय राजनीति पर इस चुनाव का गहरा असर होगा क्योंकि कांग्रेस और वाम दलों को बिहार ने जिस तरह नकारा उसके बाद इंडिया गठबंधन या तो टूटेगा या  कांग्रेस के चंगुल से निकल आयेगा। राहुल के लिए भी ये बड़ा झटका है क्योंकि कांग्रेस में ही उनके प्रभुत्व को चुनौती मिलना तय है। 2 बजे तक एनडीए 199 के आंकड़े पर है जो बड़ी उपलब्धि है। 25 साल बाद भी नीतीश की साख कायम रहने के पीछे मोदी की धाक का बड़ा योगदान है। यह एक सकारात्मक जनादेश है । चुनाव आयोग पर लगाए गये आरोपों को जनता ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इतना व्यवस्थित चुनाव इस राज्य में पहले कभी नहीं हुआ। लालू ब्रांड घटिया राजनीति के साथ ही परिवारवाद पर भी इस परिणाम ने  जबरदस्त प्रहार किया है जिसके प्रतीक राहुल और तेजस्वी दोनों हैं। बिहार में लालू की लालटेन का बुझना अत्यंत शुभ संकेत है जिसका असर प.  बंगाल के आगामी चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 November 2025

बिहार के नतीजों का दूरगामी असर होगा : सर्वे एजेंसियों की साख भी दाँव पर


बिहार में दूसरे चरण का मतदान समाप्त होते ही एग्जिट पोल की दूकानें सज गईं। हालाँकि इनकी विश्वसनीयता पहले जैसी नहीं रही। इसका कारण नौसिखियों का इस क्षेत्र में कूदना ही है। हालांकि चुनाव पूर्व सर्वे और एग्जिट पोल जिस सैंपलिंग विधि पर आधारित हैं उसको  इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि वे गलत भी निकले क्योंकि अनेक सर्वे और एग्जिट पोल सत्य या उसके बेहद करीब भी रहे। शुरुआत में कुछ पेशेवर एजेंसियां ही इस कार्य से जुड़ी हुईं थीं किंतु जबसे राजनीतिक दल और कुछ प्रत्याशी भी चुनाव सर्वेक्षण का सहारा लेने लगे तबसे ये एक संगठित व्यवसाय बन गया। आजकल राजनीतिक दल प्रत्याशी चयन करने के लिए भी सर्वे एजेंसियों की सेवाएं लेते हैं जिनको इस काम के लिए अच्छे पैसे मिलते हैं। चुनाव बाद होने वाले एग्जिट पोल को टीवी समाचार चैनलों द्वारा भी प्रायोजित किया जाने लगा। ज्यों - ज्यों  चैनलों की संख्या बढ़ती गई एग्जिट पोल  का भी फैलाव होने लगा। इसीलिए 11 तारीख की शाम  से तमाम टीवी चैनल एग्जिट पोल दिखाने लगे। साथ ही विभिन्न दलों के प्रवक्ताओं, राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ट पत्रकारों को बिठाकर उन पर बहस आयोजित की गई। जाहिर है इसका उद्देश्य  दर्शक संख्या बढ़ाकर विज्ञापन बटोरना होता है जो कि व्यवसायिक रणनीति  है। पिछले लोकसभा चुनाव में एक सुप्रसिद्ध सर्वे एजेंसी का एग्जिट पोल गलत निकलने पर उसके मुखिया को विपक्षी दलों ने टीवी चैनलों पर इतना जलील किया कि वे रोने लगे। हालाँकि उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी विश्वसनीयता बनाये रखी। और मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल जारी करने की बजाय एक दिन बाद अपने निष्कर्ष प्रसारित करने लगे ।  वैसे लगभग डेढ़  दर्जन एग्जिट पोल में एकाध अपवाद छोड़  सभी नीतीश कुमार की वापसी का संकेत दे रहे हैं। कुछ का कहना है कि कड़े मुकाबले के बाद भी एनडीए सत्ता में लौटेगा वहीं कुछ ने उसकी छप्परफ़ाड़ जीत का अनुमान लगाया है। लेकिन गत रात्रि जो एग्जिट पोल जारी  हुआ उसमें विभिन्न  जातियों , आयु वर्ग  और महिला - पुरुष के रुझान के आधार पर एनडीए की मामूली बढ़त का संकेत तो है किंतु  कुछ सर्वे महागठबंधन की विजय की भविष्यवाणी करने में भी जुटे हैं। इनके अतिरिक्त सट्टा बाजार भी चुनाव परिणामों के बारे में अपने अनुमान लगाता है। सट्टा बाजार में सबसे अग्रणी राजस्थान के फलोदी ने एनडीए की 150 से अधिक सीटें मिलने की भविष्यवाणी कर सबको चौंका दिया। हालांकि सट्टा गैर कानूनी है किंतु चुनावों के दौरान सभी की नजर उसके अनुमानों पर रहती है जो कि ज्यादातर सही निकलते रहे हैं।  कुल मिलाकर यदि सभी एग्जिट पोल का औसत निकालें तो 14 नवंबर को बिहार की सत्ता फिर नीतीश कुमार के हाथ आ  जाएगी। हालांकि लोकसभा चुनाव में हुए उलटफेर को लोग भूले नहीं हैं। इसीलिए महागठबंधन की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज करने के प्रति भी हिचकिचाहट है। अनिश्चितता की एक वजह प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी है जिसके प्रदर्शन को यद्यपि अधिकतर एग्जिट पोल में निराशाजनक बताया गया है किंतु  एनडीटीवी के पूर्व मालिक प्रणय रॉय के मुताबिक बिहार में एनडीए आगे रहकर भी बहुमत से पीछे रहेगा और  जनसुराज को मिलने वाली 24 सीटें संतुलन बनाने - बिगाड़ने का काम करेंगी। हालांकि ऐसा कहने वाले वे अकेले व्यक्ति हैं । बिहार के चुनावी नतीजे केवल इस राज्य ही नहीं अपितु राष्ट्रीय  राजनीति पर भी दूरगामी प्रभाव डालेंगे। साधारण तौर से देखें तो लालू प्रसाद यादव का युग समाप्ति की ओर है। वहीं इसका असर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर भी पड़ सकता है जो नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के समर्थन से कायम है। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की चुनाव जिताऊ क्षमता भी बिहार में दाँव पर है। महागठबंधन की हार से उनकी साख और गिरने के अलावा पार्टी भी भविष्य में कमजोर होगी । बड़ी बात नहीं कर्नाटक की सरकार उसके हाथ से निकल जाए। वहीं इंडिया गठबंधन की एकजुटता भी  खतरे में पड़ सकती है । जबकि एनडीए के जीतने पर प. बंगाल के चुनाव में भाजपा दोगुने उत्साह से उतरेगी। राजनीतिक दलों के अलावा चुनाव पूर्व सर्वे और एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों की विश्वसनीयता का फैसला भी कल दोपहर तक हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

उच्च शिक्षित मुस्लिमों का आतंकवाद से जुड़ाव नए खतरे का संकेत


दिल्ली में परसों हुए विस्फोट के बाद जो जानकारियां आ रही हैं उनके मुताबिक जितने भी लोग पकड़े गए उनका संबंध एक तो कश्मीर घाटी से है दूसरे वे हमेशा की तरह मुस्लिम समुदाय के हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि अब तक जो भी लोग पकड़े गए हैं उनमें से अधिकांश डॉक्टर हैं। फरीदाबाद में जिस डॉक्टर के यहाँ विस्फोटकों का जखीरा पकड़ा गया वह जिस शिक्षण संस्थान से जुड़ा था उसकी आड़ में आतंकवादी गतिविधियों की रूपरेखा बनाई जा रही थी। वह तो गनीमत रही कि खुफिया एजेंसियों ने समय रहते पर्दाफ़ाश कर दिया वरना न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर धमाके होते। जांच एजेंसियों से मिले संकेतों के अनुसार लखनऊ स्थित रा.स्व.संघ के कार्यालय को उड़ाने की योजना भी थी। लखनऊ में भी एक महिला मुस्लिम चिकित्सक को भी पकड़ा गया है। जिस प्रकार की पर्तें खुल रही हैं उससे स्पष्ट हो रहा है कि जितने भी मुस्लिम चिकित्सक पकड़े गए उनका संबंध पाकिस्तान के आतँकवादी संगठनों से है। ये बात भी विचारणीय है कि कश्मीर घाटी से निकले तमाम डाॅक्टर इस षडयंत्र में शामिल निकले। और यही सबसे चिंताजनक बात है कि इस्लाम के नाम पर आतंक का कारोबार अब बेरोजगार नौजवानों से आगे निकलकर सुशिक्षित वर्ग में भी फैल गया है। जिस स्तर के चिकित्सक इस कांड से जुड़े पाए गए उनके आतंकवाद में इतनी गहराई तक लिप्त होने से  मुस्लिम समुदाय की छवि पर नया संकट उत्पन्न हो गया है। अभी तक आम अवधारणा थी कि अशिक्षा के कारण जो धर्मांधता मुस्लिम समुदाय में है उसका लाभ उठाकर आतंकवादी संगठन अपना उद्देश्य पूरा करने में सफल होते रहे हैं। कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी की जो घटनाएं होती थीं उनमें भी बेरोजगार नौजवान ही आगे - आगे दिखाई देते थे। समरणीय है  हुर्रियत काँफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह जिलानी ने मुस्लिम समुदाय को पत्थरबाजी रूपी हथियार थमाया था। उसकी देखासीखी पूरे देश में इस समुदाय की छवि पत्थरबाज की बन गई। ये बात आम हो गई है कि जब भी कहीं सांप्रदायिक तनाव होता है तब मस्जिदों से पत्थर फेंकने के दृश्य दिखाई देते हैं। दिल्ली दंगों के दौरान भी मुस्लिम समाज के अनेक लोगों के घरों की छतों से पत्थर और ईंटों के अलावा अन्य घातक सामग्री जप्त हुई। जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के बाद से घाटी के भीतर आतंकवादी गतिविधियों में कमी आने से पाकिस्तान भी परेशान हो उठा है। पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से जब आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट करने की कारवाई की गई उसके बाद से ही वे भारत के विरुद्ध नए सिरे से व्यूह रचना बना रहे थे। लेकिन जिस तरह से मुस्लिम डाक्टरों का समूह आतंकवाद से जुड़ा मिला उससे लगता है कि इन लोगों का संबंध अरब देशों में सक्रिय इस्लामिक उग्रवादी संगठनों से भी हो सकता है। इस बारे में विचारणीय  ये है कि पश्चिम एशिया से भागकर मुस्लिम  शरणार्थी जबसे यूरोपीय देशों सहित अमेरिका और कैनेडा आदि में बसे तभी से वहाँ इस्लामिक उग्रवाद ने सिर उठा लिया। हाल ही में न्यूयॉर्क में हुए महापौर के चुनाव में ममदानी नामक मुस्लिम के जीतने के बाद अमेरिका में जिस तरह मुस्लिम उग्रवाद  सिर उठा रहा है उससे प्रोत्साहित होकर  अन्य  यूरोपीय देशों में भी मुस्लिम समुदाय बेहद आक्रामक हो उठा है। भारत में भी एक तबका है जो ममदानी  की जीत पर महज इसलिए जश्न मना रहा था क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का घोर विरोधी है। बड़ी बात नहीं ये तबका दिल्ली विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किये गए डॉक्टरों के बचाव में आगे आ जाए और देश के नामी वकील उनका बचाव करने सर्वोच्च न्यायालय में खड़े नजर आयें। इस कांड से एक बात साफ हो गई  कि इस्लामिक उग्रवाद में मुस्लिम समाज का वह वर्ग भी लिप्त हो चला है जिसे सुशिक्षित होने से समझदार और जिम्मेदार नागरिक माना जाता रहा है।  लालकिले के निकट हुए विस्फोट और थोक के भाव आतंकवादियों से जुड़े मुस्लिम डॉक्टरों के गिरफ्तार होने के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं और उनके संगठनों का शांत रहना भी सवाल खड़े करता है। केंद्र सरकार को चाहिए वह इस मामले की गहराई में जाकर देश को गृहयुद्ध में धकेलने के इस्लामिक षडयंत्र का पर्दाफ़ाश करे जिससे आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने वालों के मंसूबे पूरे न हो सकें।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 November 2025

दिल्ली में हुआ विस्फोट किसी बड़ी साजिश का हिस्सा


फरीदाबाद के एक डॉक्टर के यहाँ बड़ी मात्रा में विस्फोटक चीजों के अलावा घातक अस्त्र -शस्त्र बरामद होने के बाद से ही किसी बड़ी आतंकी वारदात की आशंका बढ़ गई थी जो कल शाम दिल्ली के लालकिले इलाके में एक वाहन में हुए विस्फोट से सही साबित हो गई।  जिस वाहन में विस्फोट हुआ उसमें बैठे शख्स के अलावा 9 लोगों की मौत और 20 के घायल होने की जानकारी मिली है। अभी उक्त विस्फोट के कारण और पृष्ठभूमि के बारे में स्पष्ट रूप से अधिकृत तौर कुछ भी नहीं कहा गया किंतु जिस तरह के तार जुड़ रहे हैं उनसे यह आतंकी हमला ही लगता है । जिस वाहन में विस्फोट हुआ उसमें बैठे उमर नामक व्यक्ति की तलाश की जा रही थी। ये संभावना है कि उसने विस्फोट में खुद को भी खत्म कर लिया। हालांकि इसकी पुष्टि भी जरूरी जाँच पड़ताल के बाद ही संभव है। इस बारे में ये सोचना गलत नहीं है कि फरीदाबाद में पकड़ा गया जखीरा किसी बड़ी घटना को अंजाम देने के लिए जमा हुआ था। उससे जुड़े लोगों का संबंध कश्मीर से निकलने से संदेह और गहरा हो जाता है। आश्चर्य की बात ये है कि इनमें डॉक्टर जैसे पेशेवर लोग भी हैं।  कुछ दिन पहले म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री वरिष्ट कांग्रेस नेता  दिग्विजय सिंह ने दिल्ली दंगों के सिलसिले में  बंद उमर खालिद को इस आधार पर रिहा करने की मांग की थी कि वे डॉक्टरेट कर रहे थे। लेकिन ताजा घटनाओं में डॉक्टरों का जुड़ाव होने के बाद ये कहना पड़ेगा कि किसी भी पेशे से जुड़ा इंसान  आतंकवादियों के साथ मिलकर खूनी खेल रच सकता है। ऐसा लगता है ऑपरेशन सिंदूर में अपने परिवार को गँवा चुका  कुख्यात आतँकवादी हाफिज सईद भारत में दहशत फैलाने के लिए नए सिरे से तैयारी कर रहा है। कल ही ये खबर भी आई थी कि वह बांग्लादेश में अपना अड्डा बनाने जा रहा है जहाँ से  आतंकी हमले संचालित किये जाएंगे। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई के प्रमुख ने भी  हाल ही में ढाका की यात्रा की थी। शेख हसीना का तख्ता पलटे जाने के बाद इस देश में भारत विरोधी भावनाओं को अंतरिम सरकार का संरक्षण मिलने से हिंदुओं और उनके धर्मस्थलों पर हमले बढ़े हैं। सरकार के मुखिया बने बैठे मो. युनुस का भारत विरोधी रवैया भी जगजाहिर है।  बीते कुछ महीनों में पाकिस्तान की सरकार ने हाफिज सईद को बड़ी मात्रा में धन देकर उसके संगठन को दोबारा खड़ा करने में सहायता दी। ऐसे में दिल्ली में हुए  विस्फोट में पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। फरीदाबाद के डॉक्टर के यहाँ पकड़ा गया सामान आतंकवादी गतिविधियों में ही उपयोग होने वाला था इससे कोई इंकार नहीं कर सकेगा। चूंकि इसमें पकड़े जा रहे लोगों की जड़ें कश्मीर घाटी से हैं लिहाजा ये सोचना गलत नहीं होगा कि घाटी से बाहर देश के भीतरी हिस्सों में मुंबई जैसे सीरियल बम धमाके करते हुए आंतरिक आंतरिक सुरक्षा तहस - नहस करने की साजिश रची जा रही है। बीते कुछ दिनों में ही गुजरात और म.प्र सहित अनेक राज्यों में आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद फरीदाबाद में पकड़ा गया सामान इस बात की पुष्टि करने के लिए काफी है।  हालांकि खुफिया तंत्र ने किसी बड़े हादसे को टालने में तो सफलता हासिल कर ली किंतु इसी बीच लालकिले के पास धमाका हो गया जो उक्त योजना का छोटा हिस्सा कहा जा सकता है। हालांकि उसमें मारे गए लोगों के शव पर वैसे निशान नहींं मिलने की जानकारी आई है जैसे बम विस्फोट में होते हैं किंतु विस्फोट की भयावहता देखते हुए ये संदेह होना स्वाभाविक है कि वह किसी आतंकवादी योजना का ही हिस्सा है। इस बारे में ये बात भी गौरतलब है कि अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के महापौर चुनाव में ममदानी नामक मुस्लिम की जीत के बाद वहाँ अचानक इस्लामिक भावनाओं का ज्वार उठने लगा जिसमें अरबी भाषा बोलने की छूट के अलावा अमेरिका का राष्ट्रध्वज उतार फेंकने जैसी जुर्रत  की जा रही है। और उसकी देखा - सीखी ब्रिटेन और इटली सहित अनेक यूरोपीय देशों में बसे मुस्लिम सड़कों पर सामूहिक नमाज पढ़ने जैसी गतिविधियों से कानून व्यवस्था को ध्वस्त करने पर आमादा हैं। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के रूप में पाकिस्तान को सबक सिखाया था किंतु अमेरिका ने उसकी पीठ पर हाथ रख दिया जिसके बाद से उसकी शरारतें फिर शुरू होती दिख रही हैं। दिल्ली में हुए विस्फोट की  घटना से एक बात स्पष्ट है कि सीमा पार बैठे दुश्मन के बराबर ही आस्तीन के सांप भी खतरनाक हैं जिनका फन सख्ती से कुचला जाना चाहिए। देश में बैठे घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें निकाल बाहर करने की मुहिम को और तेज करना देश हित में जरूरी हो गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी