Friday, 9 January 2026

हिटलर जैसी मूर्खताएं कर रहे ट्रम्प


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ताकत के जोर पर वही गलतियां कर रहे हैं जो कभी जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने की थीं।  प्रथम विश्व युद्ध के बाद  थोपी गई संधि के कारण उसके मन में जर्मनी को विश्व का अग्रणी और शक्तिशाली देश बनाने की महत्वाकांक्षा उत्पन्न हुई। इसके लिए यदि वह सकारात्मक कदम उठाता तब शायद वह अपने देश की अधिक भलाई कर सकता था।  लेकिन उसने अपने देश का सम्मान बढ़ाने के लिए अन्य देशों का अपमान करने की नीति अपनाई। अकारण पड़ोसी मुल्कों पर हमला कर उन्हें कब्जाने की हिमाकत की जिसकी परिणिति द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में हुई । यदि वह रूस पर हमला नहीं करता और अपने देश की भौगोलिक सीमाओं का सीमित विस्तार कर रुक जाता तब वह एक प्रभावशाली विश्व नेता के तौर पर स्थापित हो सकता था। लेकिन उसने लड़ाई को चारों तरफ फैलाकर अपने दुश्मनों को एकजुट हो जाने का अवसर दे दिया।  इटली और जापान  ने भी उसके समर्थन में उतरकर अपनी  दुर्गति करवाई।  जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता के अहंकार में  दुनिया जीतने के उसके इरादे मिट्टी में मिल गए। हालांकि हिटलर की अनेक खूबियों का भी बखान होता है किंतु दूसरा विश्व युद्ध छेड़कर उनसे मानवता का जो नुकसान किया उसके कारण दुनिया उसे घृणा की नजर से देखती है। इसी संदर्भ में मौजूदा परिदृश्य पर नजर डालें तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हरकतें दुनिया को तीसरे महायुद्ध की ओर धकेल रही हैं।  लेकिन सवाल ये है कि वे हिटलर की तरह अमेरिका की आर्थिक और सैन्य शक्ति का उपयोग कर समूचे विश्व को भयभीत करने पर क्यों आमादा हैं ? और इसका सीधा जवाब है अमेरिका की वर्तमान दुरावस्था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण देश बन गया। आर्थिक और सैन्य क्षेत्र के साथ ही ज्ञान - विज्ञान का ऐसा कोई आयाम नहीं है जिसमें उसने अपनी श्रेष्ठता का लोहा न मनवाया हो। इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करने वाले इस देश ने पूरी दुनिया को प्रभावित भी किया और आकर्षित भी। लेकिन  चौधरी बनने की कोशिश में उसने अपनी शक्ति और संसाधनों का जो अपव्यय किया उसने उसकी संपन्नता रूपी घड़े के नीचे छेद कर दिया। परिणाम ये है कि दूसरों को खैरात बांटने वाला देश खुद बेतहाशा कर्ज में डूबा हुआ है। उसके अर्थतंत्र पर चीन जैसे जन्मजात शत्रु देश का शिकंजा कस चुका है। अमेरिका की श्रेष्ठता को पुनर्स्थापित करने का वायदा कर ट्रम्प दोबारा सत्ता तो पा गए लेकिन उनकी समझ में नहीं आ रहा कि देश को संकट से कैसे निकालें ? और इसी उलझन में वे बदहवासी में डूबते गए। टैरिफ लगाने की उनकी नीतियों की अमेरिका में ही आलोचना हो रही है क्योंकि आयात महंगा होने से महंगाई चरम पर है। अमेरिकी जनता में इसके कारण गुस्सा बढ़ रहा है। ज़रूरी चीजों की किल्लत हो रही है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि ट्रम्प के अस्थिर स्वभाव और नीतिगत दृढ़ता की कमी के चलते अमेरिका एक अविश्वसनीय देश बनकर रह गया है। गत वर्ष देश की बागडोर संभालने के बाद से ही उन्होंने जिस तरह के फैसले किए उनके कारण अमेरिका के परंपरागत दोस्तों तक के बीच में उनकी छवि एक अहंकारी और धोखेबाज राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर बन गई। अमेरिकी डॉलर की पूरी दुनिया में जो साख और धाक बीते 70 - 80 सालों से कायम थी उसे ट्रम्प ने बीते एक साल में बुरी तरह ध्वस्त कर दिया। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने के प्रमुख कारणों में डॉलर के वर्चस्व से मुक्त होने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा डॉलर बेचकर सोने - चांदी का भंडार बढ़ाना ही है। इस अप्रत्याशित आर्थिक उथल - पुथल के लिए ट्रम्प की मूर्खता भरी नीतियां ही जिम्मेदार हैं। अपने टैरिफ रूपी अस्त्र के बेअसर होने के बाद अब वे उसे 500 फीसदी तक बढ़ाने की महामूर्खता कर रहे हैं जिससे अमेरिका की आंतरिक स्थिति और बिगड़ेगी। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को बलात उठवाने के बाद ग्रीनलैंड हथियाने की उनकी जिद से अमेरिका के दुश्मनों की संख्या ही बढ़ रही है। रूस,चीन, भारत , ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के विरुद्ध एक साथ मोर्चा खोलकर ट्रम्प वैसा ही आत्मघाती कदम उठा रहे हैं जो दूसरे महायुद्ध में हिटलर और जर्मनी की बर्बादी का कारण बना।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 8 January 2026

क्या पुतिन और जिनपिंग रोक पाएंगे ट्रम्प को


वैश्विक परिस्थितियों में जिस तरह से बदलाव आ रहे हैं उससे लगता है कि शक्ति संतुलन एकपक्षीय होता जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आचरण से तो लगता है वे जंगल राज लागू करना चाह रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक अपहृत कर अमेरिका उठा लाने के बाद अब ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की उनकी योजना है जो डेनमार्क का हिस्सा है। उनकी धमकी के बाद यूरोपीय देशों में हड़कंप की स्थिति है । डेनमार्क ने तो नाटो के टूटने की आशंका तक जता दी है। उधर अमेरिका ने गत दिवस एक रूसी जलपोत पर कब्जा कर लिया। अमेरिका का आरोप है वह  वेनेजुएला से तेल लेने जा रहा था। उल्लेखनीय है अमेरिका ने उसके तेल बेचने पर प्रतिबंध लगा रखा है। रूस ने इस कार्रवाई को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया है।  ट्रम्प द्वारा वेनेजुएला पर शिकंजा कसने से चीन को बड़ा झटका लगा है जो उसका सबसे बड़ा खरीददार था। और बजाय डॉलर के अपनी मुद्रा युआन में ही लेनदेन कर रहा था। अब जबकि वेनेजुएला के तेल व्यापार पर अमेरिका का आधिपत्य होने जा रहा है तब चीन के सामने बड़ा ऊर्जा संकट आना तय है। और यदि ट्रम्प ने वाकई ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लिया तब यूरोप के साथ ही रूस और चीन के लिए भी ये चिंता बढ़ाने वाला होगा। लेकिन ऐसा होने के बाद ट्रम्प किस मुंह से रूस को यूक्रेन की जमीन पर कब्जा करने से रोकेंगे ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका जिस तरह से दादागिरी कर रहा है उसे रोकने की हिम्मत फिलहाल न रूस दिखा पा रहा है और न ही चीन। यूरोप में भी फ्रांस ही है जो अमेरिका के दबाव का सामना करने का हौसला दिखा सकता है । ब्रिटेन और जर्मनी सहित अन्य यूरोपीय देशों ने तो वेनेजुएला में ट्रम्प की इशारे पर हुई कार्रवाई का समर्थन कर उसके  प्रति अपना झुकाव दिखा दिया। हालांकि जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार यूरोप के अनेक छोटे देशों में युद्ध की तैयारियां देखने मिल रही हैं। उन्हें आशंका है कि अमेरिका की विस्तारवादी नीतियों से रूस का हौसला भी बुलंद हुआ है। और वह भी अपने पड़ोसी देशों में दखल देने की सोच रहा है। राष्ट्रपति पुतिन पहले ही इतिहास का हवाला देते हुए पोलैंड सहित कुछ अन्य यूरोपीय देशों को रूस का हिस्सा बताकर भय का माहौल बना चुके हैं। इन सबसे चीन का भी उत्साह हिलोरें मार सकता है जो ताइवान पर  कब्जा करने के अवसर की तलाश में रहता है। यही नहीं जापान के आधिपत्य वाले कुछ द्वीपों पर भी उसकी नजर लंबे समय से है। कुल मिलाकर ट्रम्प ने  विश्व के भूगोल में बदलाव का खतरा उत्पन्न कर दिया है। वे कितने सफल होंगे ये तो भविष्य ही बताएगा किंतु यदि उनकी सनक इसी तरह जारी रही तब दुनिया को लघु विश्व युद्ध झेलना पड़ सकता है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की बेतहाशा खरीद से ये आशंका मजबूत हो रही है। वेनेजुएला तो खैर,  अमेरिका का प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं था , परंतु बाकी देश भी ट्रम्प की दादागिरी को चुपचाप सहन कर लेंगे ये संभव नहीं लगता क्योंकि अमेरिका ने वेनेजुएला के बाद क्यूबा को भी सबक सिखाने की जो धमकी दी है उसके बाद चीन और रूस भी कुछ न कुछ कदम तो उठाएंगे ही । वैसे भी ज्यादातर लैटिन अमेरिकी देश परंपरागत रूप से अमेरिका के विरोधी रहे हैं।  उनका झुकाव एक  जमाने में सोवियत  संघ के प्रति था किंतु बीते एक दशक में चीन ने भी इस इलाके में अपना दखल बढ़ाकर अमेरिका के विरुद्ध मोर्चेबंदी की है। वेनेजुएला में ट्रम्प ने जो कुछ किया उसकी आशंका पहले  से होने के बाद भी सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा इसकी कल्पना किसी को नहीं थी।  यदि वे ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की हिमाकत करते हैं तब ये हिटलर द्वारा पोलैंड पर कब्जा करने जैसा ही है जिसे दूसरे विश्वयुद्ध की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। लेकिन तब और अब में बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है। सोवियत संघ के बिखराव के बाद दो ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था खत्म होकर अमेरिका का दबदबा बढ़ गया । लेकिन बीते दो दशक में चीन भी अमेरिका के मुकाबले एक आर्थिक महाशक्ति तो बन गया किंतु उसका सैन्य ढांचा उसके जितना मजबूत नहीं होने से वह अपने आसपास ही रुतबा दिखा सकता है। वेनेजुएला में उसके सीधे आर्थिक हित जुड़े थे । वहीं रूस भी अप्रत्यक्ष ही सही उसके साथ रिश्ते बनाए हुए था। अब पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर लगी हैं कि ट्रम्प की हिटलर नुमा चालों को रोकने के लिए पुतिन और जिनपिंग क्या करते हैं?


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 January 2026

केवल जल ही नहीं शुद्ध जल भी जरूरी


म.प्र की व्यावसायिक राजधानी इंदौर की पहचान देश के सबसे स्वच्छ शहर के तौर पर बन चुकी है। वहां के नगरीय प्रशासन के साथ ही जनता को भी इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि स्वच्छ शहर होने का गौरव बरकरार रखने के लिए उन्होंने बेहद जागरूकता दिखाई वरना स्वच्छता सर्वेक्षण में ऊंची पायदान पर रहने वाले अनेक नगर बाद में फिसड्डी हो गए। उस लिहाज से इंदौर की प्रशंसा करनी होगी जिसने शिखर पर पहुंचने के बाद उस पर बने रहने का कारनामा कर दिखाया। लेकिन बीते कुछ दिनों से इंदौर पूरे देश में आलोचना का पात्र बना हुआ है। जिसका कारण वहां की एक बस्ती में प्रदूषित जल की आपूर्ति के चलते 20 लोगों  का जान गंवाना है। जिन सैकड़ों लोगों को प्रदूषित जल ने बीमार कर दिया उनमें से कुछ को लंबे समय तक इसका दंश भोगना पड़ेगा।  इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में इस मुद्दे पर हलचल मची है। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार नाले - नालियों से गुजरती और जगह - जगह फूटी हुई पाइप लाइनों के कारण लोग ऐसे पानी का उपयोग करने बाध्य हैं जो उन्हें स्थायी तौर पर रोगी बना सकता हैं। छोटे  बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने से उनके लिए प्रदूषित जल बेहद नुकसानदेह है। मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया है जिसने पूरे प्रदेश की रिपोर्ट भी तलब की है। प्रदेश सरकार भी हरकत में आई है। इंदौर के नगरीय प्रशासन में तबादले और निलंबन के जरिए फेरबदल किए गए हैं। प्रभावित क्षेत्रों में शुद्ध जल की आपूर्ति का इंतजाम भी किया जा रहा है। जो ताजा जानकारी आई उसके अनुसार जिस क्षेत्र में दूषित जल से मौत हुई वहां का भूजल भी उपयोग करने योग्य नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रदूषण नीचे तक जा पहुंचा है। हमारे देश में ऐसी घटनाएं होने के बाद समूची व्यवस्था मुस्तैदी का प्रदर्शन करती है। इसीलिए पूरे प्रदेश में शुद्ध जल बड़ा मुद्दा बन गया है।  उच्च न्यायालय की फटकार से अतिरिक्त सक्रियता दिखाई दे रही है। फूटी हुई पाइप लाइनों का सर्वेक्षण किए जाने के अलावा नाले - नालियों से निकलने वाले बड़े पाइपों की जांच भी चल रही है। हालांकि ये सब  चिर - परिचित कर्मकांड का हिस्सा है। यदि इंदौर में मौतें न हुई होतीं तब शासन और प्रशासन की नींद नहीं टूटती और उच्च न्यायालय भी इस समस्या के बारे में उदासीन ही रहता। ऐसा नहीं है कि प्रदूषित जल की आपूर्ति के बारे में स्थानीय प्रशासन में बैठे अधिकारी - कर्मचारी अनजान हों। नलों में गंदा पानी आना भी नई बात नहीं है। पाइप लाइनों के फूटे होने की खबरें भी यदा - कदा प्रकाशित होती रही हैं। इनके जरिए आने वाला जल अशुद्ध होने से नुकसानदेह है। इसीलिए लोग अपने घरों में वाटर फिल्टर के उपकरण लगाते हैं। पानी की बोतल का कारोबार कल्पना से कहीं अधिक बढ़ता जा रहा है। हालांकि उसकी शुद्धता भी संदिग्ध मानी जाती है। लेकिन हमारे दिमाग में ये बात गहराई तक बैठ गई है कि साधारण पानी पीने योग्य नहीं है। कुछ दशक पहले तक पानी की शुद्धता को लेकर उतनी चिंता नहीं थी  किंतु अब ये बड़ा मुद्दा बन चुका है। इसीलिए इंदौर की घटना की चर्चा पूरे देश में हो रही है।  विकास की मूलभूत जरूरतों में  बिजली , सड़क और पानी को शामिल किया गया है। 2003 में इन्हीं के कारण म.प्र से दिग्विजय सिंह को जनता ने सत्ता से उखाड़ फेंका था। उसके बाद से केवल 15 माह छोड़कर शेष समय में भाजपा का निर्बाध शासन चला आ रहा है। प्रदेश के सभी बड़े शहरों की नगर निगमों में भी ज्यादातर भाजपा ही काबिज रही है। ऐसे में प्रदेश सरकार के साथ इन स्थानीय निकायों का समन्वय बेहतर रहा होगा ये मानना गलत नहीं है। इसीलिए यदि विपक्ष इंदौर की घटना को लेकर भाजपा को घेर रहा है तो उसे अनुचित नहीं कहा जाएगा भले ही उसके पीछे राजनीतिक लाभ लेने की मंशा ही क्यों न हो। अब जबकि पूरे प्रदेश में जल आपूर्ति व्यवस्था में व्याप्त खामियां सार्वजनिक विमर्श का विषय बन चुकी हैं तब शासन - प्रशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर शुद्ध जल आपूर्ति की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल जल योजना के अंतर्गत हर घर में पानी पहुंचाने का जो संकल्प लिया वह तभी सार्थक होगा जब लोगों को मिलने वाला पानी पीने योग्य हो । अन्यथा स्वस्थ भारत मिशन की कल्पना अधूरी रह जाएगी। इसीलिए सरकार के कर्ता - धर्ताओं को केवल जल ही जीवन है से आगे बढ़कर शुद्ध जल ही जीवन है के बारे में सोचना चाहिए। इंदौर की घटना चेतावनी है। यदि इसे गंभीरता से नहीं लिया तो भविष्य में किसी भी शहर में और भी बड़ा हादसा हो सकता है ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 January 2026

ईरान में कट्टर इस्लामिक सत्ता के पतन की आहट शुभ संकेत


इज़रायल और हमास की लड़ाई में गाजा ही बर्बाद नहीं हुआ बल्कि प. एशिया का शक्ति संतुलन भी पूरी तरह गड़बड़ा गया । इसका  कारण रूस का यूक्रेन के साथ  युद्ध में उलझ जाना है जिससे अरब जगत में अमेरिका को अपना वर्चस्व बढ़ाने का अवसर मिल गया। शुरूआत सीरिया में  बशर उल असद के शासन के विरुद्ध संघर्ष के सफल होने से हुई। रूस  की कृपा से असद की सत्ता कायम थी किंतु  पुतिन जब यूक्रेन में फंस गए तब उनके पास उसकी मदद करने की गुंजाइश कम होती गई। इसी का लाभ उठाकर दिसंबर 2024 में अमेरिका ने वहां न सिर्फ सत्ता बदलवा दी अपितु मुल्क को कई हिस्सों में बांटकर  कमजोर  कर दिया। असद पूरा कुनबा लेकर रूस भाग गए।  उल्लेखनीय है आज समूचा यूरोप जिन मुस्लिम शरणार्थियों के कारण खून के आंसू रो रहा है उनमें से ज्यादातर सीरिया में चले गृहयुद्ध के कारण ही वहां पहुंचे थे। सीरिया की गोलान पहाड़ी पर इज़रायल ने अपना कब्जा पक्का कर लिया । ईराक से सद्दाम हुसैन और लीबिया से कर्नल गद्दाफी को ठिकाने लगाकर अमेरिका ने अरब जगत में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली । लेकिन ईरान अभी भी उसके लिए चुनौती बना हुआ था। भले ही अमेरिका ने उसके तेल बेचने के साथ उससे  तेल खरीदने वालों पर प्रतिबंध लगा रखे हों लेकिन फिर भी ईरान ने अमेरिकी दबाव में आने से मना कर दिया। इससे बौखलाए अमेरिका ने उस पर परमाणु अस्त्र विकसित करने का आरोप लगाकर उसकी घेराबंदी तो कर दी किंतु उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया। लेकिन इसी बीच ईरान के कट्टरपंथी शासक अयातुल्ला खामेनेई ने गाजा  पर काबिज कट्टरपंथी संगठन हमास को भड़काकर इज़रायल पर  हमला करवा दिया । लेकिन उस लड़ाई में गाजा पूरी तरह तबाह हो गया।  हमास की कमर तो टूटी ही  लेबनान में सक्रिय आतंकवादी संगठन हिजबुल्लाह और यमन में बैठे हूती नामक इस्लामिक गुट पर भी बेतहाशा हमले कर इजरायल ने उनकी ताकत घटा दी। ईरान पर भी इजरायल ने मिसाइलें दागकर जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। उसके तमाम उच्च सैन्य अधिकारी मारे गए। यहां तक कि खोमेनेई भी मरते - मरते बचे। यद्यपि ईरान ने भी पलटवार किया जिससे इजरायल को कुछ नुकसान हुआ किंतु अमेरिका ने अपने अजेय लड़ाकू विमान भेजकर ईरान के परमाणु संयंत्रों  पर जबरदस्त हमला बोलकर उसे लड़ाई बंद करने मजबूर कर दिया। आज के हालात में गाजा पर हमास का वर्चस्व नाममात्र का  है। वहां अमेरिका ने  जो योजना बनाई उसके पूरा  होने पर वह उसका हिस्सा बनकर रह जाएगा। लेकिन जो सबसे बड़ी खबर प. एशिया से आ रही है वह है ईरान में खोमेनेई की सत्ता के खात्मे की शुरुआत। ताजा संकेतों के अनुसार वे भी  असद की तरह ही  कुनबे सहित रूस भागने की फिराक में हैं। ये स्थिति एकाएक उत्पन्न नहीं हुई।  1979 में शाह पहलवी की सत्ता को पलटकर देश में अयातुल्ला खोमैनी ने  इस्लामिक गणराज्य की स्थापना कर जिस कट्टरपंथी सामाजिक व्यवस्था को लागू किया उसके विरुद्ध कई सालों से युवाओं में रोष  दिखने लगा था। हिजाब के विरोध में एक युवती के विद्रोह ने पूरे ईरान में नई पीढ़ी को आंदोलित किया जिसके बाद खोमेनेई के विरुद्ध आक्रोश पनपने लगा और जिस शाह को 1979 में अपदस्थ कर खोमैनी सत्ता में आए थे उन्हीं के बेटे को वापस बुलाकर ईरान  को उसी खुलेपन की ओर ले जाने की मांग जोर पकड़ रही है जिसकी यादें आज भी देश के लोगों में हैं। ईरान की कट्टरपंथी इस्लामिक शासन व्यवस्था में सर्वोच्च सत्ता धर्मगुरु होने के नाते खोमेनेई के पास है। जिसने भी सुधार की आवाज उठाई भी उसे मौत की नींद सुला दिया गया। हिजाब के मामले में जरा सी लापरवाही की कड़ी सजा से महिलाओं विशेषतः युवतियों का गुस्सा आसमान छूने लगा था। हालांकि ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि खोमेनेई के विरुद्ध जनविद्रोह भड़काने में  अमेरिका की भूमिका होगी किंतु ये भी सच है कि अरब जगत में भी आधुनिकता के बीज प्रस्फुटित होने लगे हैं। सऊदी अरब जैसा कट्टर इस्लामिक देश तक अब महिलाओं को  आजादी देने के कदम उठा रहा है। दुबई , शारजाह और अबू धाबी में आई आर्थिक समृद्धि ने प. एशिया में बड़े  बदलाव की नींव रख दी है। यद्यपि अभी भी इस्लाम की आड़ में कट्टरता के हिमायती देश हैं लेकिन समय के साथ वे अलग ये थलग पड़ते जा रहे हैं। यदि ईरान में खोमेनेई सत्ता का पतन हुआ और उसकी जगह शाह के बेटे की ताजपोशी हुई तब यह न सिर्फ इस्लामिक जगत अपितु दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन पर बड़ा असर डालने वाला होगा। भले ही इससे ईरान में अमेरिकी और पश्चिमी हस्तक्षेप बढ़े किंतु भौगोलिक रूप से हमारे नजदीक एक कट्टर इस्लामी देश में यदि दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली सरकार आती है तो भारत के लिए वह सुखद स्थिति होगी।



- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 5 January 2026

ट्रम्प ने दुनिया को अराजकता के कुएं में धकेल दिया



 दूसरे विश्व युद्ध के बाद अनेक अवसर ऐसे आए जब अमेरिका ने किसी देश में घुसकर हस्तक्षेप किया। साठ के दशक में क्यूबा पर अमेरिकी हमले की आशंका में सोवियत संघ की जवाबी मोर्चेबंदी ने दो परमाणु शक्तियों के बीच टकराहट के आसार उत्पन्न कर दिए थे। उसके बाद वियतनाम और अफगानिस्तान में अमेरिका ने लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई किंतु उसे अपना डेरा समेटना पड़ा। लैटिन अमेरिका के देशों के साथ तो उसकी कभी नहीं पटी। क्यूबा के अलावा अन्य देशों पर भी उसकी कोप दृष्टि रही। मेक्सिको से आने वाले घुसपैठिए जहां समस्या बने हुए हैं वहीं कोलंबिया सहित लैटिन देशों से उसकी शिकायत नशीले पदार्थों के कारोबार को लेकर है। ब्राजील के ब्रिक्स नामक संगठन में शामिल होने से अमेरिका चिढ़ता है। पनामा के साथ पनामा नहर के स्वामित्व संबंधी उसका विवाद है। लेकिन जबसे डोनाल्ड ट्रम्प दोबारा सत्ता में आए तबसे पूरी दुनिया में थानेदारी दिखाने में जुटे हैं। पड़ोसी कैनेडा पर वे अमेरिका में शामिल होने का दबाव बनाते हैं वहीं ग्रीनलैंड पर कब्जे की इच्छा भी व्यक्त करते हैं। ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने उन्होंने अपने सबसे मजबूत विमान भेज दिए। वहीं मलबे का ढेर बन चुके गाजा पर उनकी नजर है। पाकिस्तान को उनका संरक्षण केवल इसलिए मिल रहा है जिससे बलूचिस्तान के बेशकीमती खनिजों पर कब्जा हो जाए। ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने सात लड़ाइयां रुकवाईं । लेकिन यूक्रेन और रूस की जंग को रुकवाने के लिए उन्होंने जो उपाय सुझाया उसमें रूस द्वारा कब्जाए इलाके छोड़ने के अलावा यूक्रेन को पूरी तरह निहत्था होने मजबूर करना है। इस सबका कारण है अमेरिका की कर्ज के बोझ से कराह रही अर्थव्यवस्था। दुनिया भर में सरकारों द्वारा सोने और चांदी की जबरदस्त खरीद का कारण डॉलर के वर्चस्व से मुक्त होने की तैयारी है। इससे भयभीत ट्रम्प ने टैरिफ रूपी हथियार का उपयोग कर दादागिरी को बनाए रखना चाहा जो चीन और भारत जैसे देशों के नहीं झुकने से अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सका। बौखलाहट में ट्रम्प ने वेनेजुएला नामक लैटिन अमेरिकी देश में घुसकर राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी को उठवाकर न्यूयॉर्क के जेल में बंद कर दिया । अमेरिका काफी समय से आरोप लगा रहा था कि वे नशीले पदार्थों को तस्करी के जरिए अमेरिका भेजने वालों को संरक्षण दे रहे हैं। ट्रम्प ने वेनेजुएला को कच्चा तेल बेचने से भी रोक रखा था जो उसकी आय का एकमात्र साधन है। मादुरो पर भी चुनाव में धांधली करने का वैसा ही आरोप मढ़ा जाता रहा जैसा बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना पर लगाकर वहां विद्रोह भड़काया गया। मादुरो पर ट्रम्प के आरोप जांच का विषय है किंतु जिस तरह से उनको बलात अमेरिका ले आया गया वह सवाल खड़े करने वाला है। सही बात ये है कि कच्चे तेल का अकूत भंडार होने के कारण संपन्नता के शिखर पर पहुंचने के बाद ये देश गलत नीतियों से कंगाली की स्थिति में जा पहुंचा। जितनी सरलता से अमेरिका मादुरो को उठा ले गया उससे ये बात सामने आ गई कि वे बिना प्रतिरोधक शक्ति के ही उस को चुनौती देने की मूर्खता कर बैठे। साम्यवादी होने के कारण उन्हें चीन से हथियार मिलते रहे किंतु उनका उपयोग करने का अवसर ही अमेरिका ने उसे नहीं दिया। इससे ये हकीकत भी उजागर हो गई कि चीन अपने अड़ोस - पड़ोस में भले ही रौब दिखाता फिरे किंतु हजारों मील दूर बैठे अपने समर्थक की मदद करना उसके बस में नहीं। रूस भी यूक्रेन में फंसे रहने से जुबानी प्रतिरोध से ज्यादा कुछ नहीं कर सका। वैसे भी यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए युद्ध छेड़ने के बाद वह भी अपराधबोध से भी ग्रसित है। वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बाद सत्ता का स्वरूप क्या होता है ये अनिश्चित है क्योंकि जिस उपराष्ट्रपति को कार्यकारी शासक बनाया गया उसने भी अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार कर दिया जिसके बाद ट्रम्प ने उन्हें भी धमकी दे डाली। इन सबसे हटकर एक बात स्पष्ट है कि अमेरिका द्वारा उठाया गया कदम वेनेजुएला के तेल भण्डार का दोहन कर अपनी खस्ता आर्थिक स्थिति सुधारना है। लेकिन अब ट्रम्प रूस द्वारा यूक्रेनी जमीन पर कब्जा करने को किस मुंह से गलत ठहराएंगे ? उनके इस फैसले ने चीन द्वारा ताइवान पर जबरन कब्जा करने का रास्ता भी साफ कर दिया है। उल्लेखनीय है पोलैंड और डेनमार्क सहित अनेक यूरोपीय देश इस आशंका में डूबे हैं कि कहीं रूस उनके साथ भी यूक्रेन जैसा सलूक न करे। कुल मिलाकर ट्रम्प ने वैश्विक व्यवस्था को अराजकता के कुएं में धकेलने का जो दुस्साहस किया वह बड़ी मछली द्वारा छोटी को निगलने के सिद्धांत को मान्यता प्रदान करेगा। ऐसे में यदि भारत पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर अपना कब्जा स्थापित कर ले तब उसे रोकने वाला कौन होगा ? ट्रम्प ने जो कुछ भी लिया उसके बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की उपयोगिता भी सवालों के घेरे में आ गई है। उन छोटे देशों का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है जिनके पास अपनी सुरक्षा के समुचित प्रबंध नहीं हैं। ऐसे में भारत द्वारा बीते एक दशक में अपने सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों की सार्थकता साबित होती जा रही है क्योंकि किसी भी देश को अपना अस्तित्व बचाने के लिए केवल आर्थिक विकास ही नहीं अपितु सामरिक शक्ति की भी ज़रूरत है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 3 January 2026

धार्मिक स्थलों का विकास अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहा




जब अयोध्या में राम मंदिर बनाने की बात चली तब एक वर्ग उसकी आलोचना करते हुए उस पैसे का उपयोग विद्यालय, शौचालय और ऐसे ही अन्य कार्यों पर खर्च करने की वकालत करने लगा। ऐसे लोगों को बीते दो - तीन दिनों में देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या देखकर अपनी सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए। बीते साल के अंतिम और वर्ष 2026 के प्रथम दिवस देश के प्रमुख धर्मस्थलों पर श्रद्धालुओं का सैलाब बदलते भारत का चित्र है । वैसे तो 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला वर्ष ईसाइयत से जुड़ा हुआ है लेकिन इस दिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर , तिरुपति बालाजी, अयोध्या के राम लला, वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर , शिरडी के साईं मंदिर और उज्जैन के महाकाल परिसर में भी दर्शनार्थियों की भीड़ ने नया कीर्तिमान बना दिया। इसके अलावा पवित्र नदियों के तट पर भी उत्सव का माहौल देखने मिला। जगन्नाथ पुरी और कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक पर भी सामान्य दिनों से अधिक पर्यटक जुटे। इससे साबित हुआ कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में धार्मिक स्थल भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं । अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन हेतु औसतन 50 हजार से 1 लाख भक्तजन आते हैं । ये संख्या पर्वों पर लाखों का आंकड़ा पार कर जाती है। 2026 शुरू होने के पहले अयोध्या के सारे होटल , धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस आरक्षित चुके थे। लगभग यही स्थिति वाराणसी, उज्जैन, शिरडी, तिरुपति आदि की रही। काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल परिसर को विकसित करने के विरोध में भी खूब राजनीति हुई। लेकिन कार्य पूर्ण हो जाने पर पूरा विरोध ये देखकर शांत हो गया कि उनमें आने वालों की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि हुई और वह भी अन्य शहरों से। उल्लिखित सभी स्थलों में होटल और टैक्सी जैसे व्यवसाय के साथ ही पूजन सामग्री विक्रेताओं का भी कारोबार जमकर चलने लगा। यहाँ तक कि ऑटो रिक्शा वालो की कमाई भी बढ़ी। वाराणसी में साड़ियों के अलावा गलीचों के कारोबारी भी विश्वनाथ परिसर के विकास के बाद अपने व्यवसाय में वृद्धि से प्रसन्न हैं। उज्जैन में महाकाल परिसर इलाके में जिनके मकान हैं उनमें से बहुतों ने गेस्ट हाउस नुमा व्यवस्था कर आय का स्रोत पैदा कर लिया। एक मोटे अनुमान के अनुसार उज्जैन में फूल - माला बेचने वालों की संख्या में हजारों की वृद्धि हुई है। म.प्र में ही महाकाल के अलावा ओंकारेश्वर को भी नया स्वरूप दिये जाने के बाद वहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। यही सब देखकर केंद्र सरकार ने देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का विकास करने की योजना बनाई है जिनमें गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर भी है। वृंदावन में बिहारी जी का मंदिर बेहद संकरे स्थान में होने से श्रद्धालुओं को बहुत तकलीफ होती है। एक - दो बड़े हादसों के बाद उ.प्र सरकार ने उसके भी समुचित विकास का निर्णय किया है। भारत में धार्मिक आस्था की जड़ें काफी गहरी हैं। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद नई पीढ़ी में धर्म के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है। लेकिन धर्मस्थलों पर पुराने जमाने की लचर व्यवस्थाओं की वजह से युवा वहाँ जाने से कतराते थे। लेकिन जिन - जिनको नया स्वरूप दिया गया उनमें युवा दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि विकास पर किये गए खर्च का औचित्य सिद्ध कर रही है। हालांकि इसका एक पक्ष ये भी है कि धार्मिक यात्रा को पर्यटन का स्वरूप दिये जाने से धर्मस्थलों की पवित्रता और काफी हद तक मर्यादा नष्ट होती है। उत्तराखंड के चार धामों की सड़कें विकसित होने के बाद वहाँ तीर्थयात्रियों की संख्या साल दर साल बढती जाने से पर्यावरण की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। लेकिन इन यात्राओं का पेशेवर तरीके से प्रबंध किया जाए तो उसका हल हो सकता है। जमीनी सच्चाई ये है कि सदियों पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को समय के साथ यदि दुरुस्त किया जाए तो धार्मिक स्थलों के जरिये रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास संभव है। भारत सरकार को चाहिए सभी राज्यों से प्रमुख धर्मस्थलों की सूची लेकर उनको विकसित करने की कार्य योजना इस प्रकार बनाई जाए जिससे मूल स्वरूप को छेड़े बिना वहाँ आने वालों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। हालिया अनुभव बताते हैं कि विकसित धार्मिक स्थलों पर दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि से अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सहारा मिला। अयोध्या से युवाओं का पलायन रुकना इसका प्रमाण है।घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में भी ये कदम सहायक साबित होगा इसमें दो मत नहीं हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 2 January 2026

कर्नाटक सरकार के सर्वे ने ईवीएम पर लगे आरोपों को नकारा


लोकसभा  में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि ईवीएम और मतदाता सूचियों में हेराफेरी के जरिए भाजपा चुनाव जीतती है।  ये बात अलग है कि चुनाव आयोग द्वारा हलफनामा देखकर आरोप लगाने की चुनौती उन्होंने  स्वीकार नहीं की। लेकिन वोट चोरी उनका प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। बिहार के चुनाव  को तो इसी पर केंद्रित करने की पूरी कोशिश उनकी तरफ से की गई किंतु मतदाताओं ने उनके सारे आरोपों को नजरअंदाज करते हुए कांग्रेस को दहाई के भीतर ही समेट दिया । वहीं तेजस्वी यादव को भी हाशिया दिखा दिया। कर्नाटक  में मतदाता सूचियों में गड़बड़ी को लेकर भी श्री गांधी ने आरोप लगाए थे। इसके अलावा कांग्रेस ईवीएम मशीनों के विरुद्ध भी जमकर हल्ला मचाती रही है। प्रियंका वाड्रा तो लगभग हर सभा में मतपत्रों से चुनाव करवाने की चुनौती भाजपा को देती हैं। पार्टी  के बाकी नेता भी इन दोनों की हां में हां मिलाते हुए वोट चोरी और ईवीएम का  विवाद खड़ा करते रहते हैं। राहुल ये बात भी दोहराते  हैं कि वोट चोरी न होती तब लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों तक भी नहीं पहुंचती।  लेकिन बिहार चुनाव के बाद अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे से कन्नी काटने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने भी खुलकर कहना शुरू कर दिया है कि बिहार में श्री गांधी ने जमीनी मुद्दों को उपेक्षित कर केवल वोट चोरी तक सिमटकर अपना और तेजस्वी दोनों का नुकसान कर लिया। मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (एस.आई.आर) का विरोध भी बेअसर साबित हुआ।  कांग्रेस ने इसके विरोध में भी देशव्यापी आंदोलन किया किंतु उसका कोई प्रभाव जनमानस पर नहीं पड़ा। लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों में  विधानसभा चुनाव हुए उनमें जम्मू - कश्मीर और झारखंड छोड़कर हरियाणा तथा दिल्ली में पूर्ण रूपेण भाजपा जबकि महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की जीत हुई। चुनाव के बाद जम्मू - कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तो खुलकर स्वीकार  किया कि निष्पक्ष  चुनाव के कारण ही उनकी सत्ता में वापसी हुई। इसी तरह झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी वोट चोरी या ईवीएम सम्बन्धी शिकायत नहीं की। यहां तक तो बात ठीक थी किंतु कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार द्वारा करवाए गए ताजा सर्वेक्षण में 80 प्रतिशत से अधिक लोगों ने जो राय व्यक्त की उसके मुताबिक लोकसभा चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हुए और ईवीएम का उपयोग पूरी तरह सही है। यहां तक कि सिद्धारमैया सरकार द्वारा स्थानीय निकायों के चुनाव मतपत्रों से कराने के फैसले की भी सर्वेक्षण में आलोचना की गई है। 102 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया उक्त सर्वे राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निर्देशन में संपन्न हुआ जिसकी रिपोर्ट राज्य सरकार ने  ही सार्वजनिक की है। सर्वेक्षण में जिस बड़ी मात्रा में लोगों ने लोकसभा चुनावों की निष्पक्षता और ईवीएम के प्रति विश्वास जताया गया वह कांग्रेस विशेष रूप से श्री गांधी और श्रीमती वाड्रा के लिए बड़ा झटका कहा जा सकता है। यही नहीं ईवीएम के विरोध में झंडा उठाने वाले अन्य विपक्षी दलों के लिए भी ये सर्वे मुंह बंद करने वाला है। स्मरणीय है इसी साल प. बंगाल, असम , तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में कर्नाटक के सरकारी सर्वे ने ईवीएम को लेकर व्यक्त की जाने वाली शंकाओं को रद्दी की टोकरी में भी फेंक दिया है। हालांकि श्री गांधी इसके बावजूद भी अपनी रट लगाए रहेंगे। लेकिन इतने झटके खाने के बाद भी सच्चाई को स्वीकार करने तैयार नहीं हैं तो यही मानकर चलना होगा कि वे जनमानस को समझने में पूरी तरह विफल हैं। लोकतंत्र में चुनावी हार - जीत चलती रहती है। भाजपा आज भले सफलता के उच्चतम शिखर पर हो किंतु कभी वह भी लोकसभा में मात्र 2 सीटों पर सिमटकर रह गई थी। दरअसल कांग्रेस की समस्या ये है कि वह पराजय के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण कर अपनी गलतियां सुधारने के  बजाय उन्हें दोहराती जा रही है।  देखना ये है कि कर्नाटक की अपनी ही सरकार के सर्वेक्षण के बाद ईवीएम को लेकर राहुल  और प्रियंका क्या रवैया अपनाते हैं?


- रवीन्द्र वाजपेयी