Saturday, 17 January 2026

महाराष्ट्र में भाजपा ने पवार और ठाकरे परिवार का वर्चस्व तोड़ा


महाराष्ट्र में नगर निगम चुनावों के जो परिणाम आए हैं उनका संकेत तो कुछ  दिन पूर्व नगरपालिका चुनाव से ही मिल गया था जिनमें प्रदेश  के सभी अंचलों में भाजपा का बढ़ता प्रभाव दिखाई दिया।  गत दिवस  29 नगर निगमों में से 25 जीतकर पार्टी ने  साबित कर दिया कि वह राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है। चुनाव का सबसे बड़ा आकर्षण मुम्बई महानगरपालिका रही। लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत से दूर रखने में महाराष्ट्र की भी भूमिका थी। उसी आधार पर आशंका थी कि विधानसभा चुनाव में   भाजपा और एकनाथ शिंदे की महायुति सरकार महा विकास अघाड़ी  गठबंधन से पराजित हो जाएगी। लेकिन हुआ उल्टा और भाजपा के अकेले ही बहुमत के नजदीक पहुंचने से मुख्यमंत्री पद  एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस के हिस्से में आ गया। उसके पहले पार्टी हरियाणा में  जीतकर लोकसभा चुनाव में मिली निराशा से  उबर चुकी थी। महाराष्ट्र की सफलता ने हौसला और बुलंद किया जिसका प्रमाण दिल्ली और बिहार की शानदार जीत थीं।   केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में भाजपा का महापौर बनने से उसका आत्मविश्वास और प्रबल हो गया। लेकिन महाराष्ट्र का मुकाबला आसान नहीं था। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के मिलाप के बाद माना जा रहा था कि मराठी माणुस की भावना उभारकर वे  ठाकरे परिवार  की धाक वापस जमा सकेंगे किंतु अब  कहा जा सकता है कि  मुंबई में इस परिवार की चौधराहट खत्म हो गई । भले ही उद्धव और राज की पार्टियां 71 सीटें जीतकर मजबूत विपक्ष बनकर उभरीं किंतु तीन दशक से  ठाकरे परिवार की जीवन रेखा बनी रही मुंबई महानगरपालिका का हाथ से निकल जाना   निराशा बढ़ाने वाला है। राज की पार्टी को तो ओवैसी से भी कम सीटें मिलने से उनकी भद्द पिट गई। हालांकि उद्धव  गुट इस बात की खुशी मना रहा है कि उनको एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना को मिली 29 सीटों से  ज्यादा 65 पर जीत मिली लेकिन महानगरपालिका हाथ से निकल जाने के बाद  उद्धव के सामने सिवाय पछताने के और कुछ नहीं बचा, राज की राजनीति का भी ये पूर्णविराम है। देवेंद्र फडणवीस का चेहरा सामने रखकर भाजपा ने केवल  ठाकरे परिवार के प्रभुत्व को ही समाप्त नहीं किया बल्कि शरद पवार के गढ़  भी ढहा दिए। इस चुनाव में शरद पवार और अजीत पवार ने गठजोड़ किया था किंतु चाचा - भतीजे का  पुनर्मिलन भी मतदाताओं को रास नहीं आया। इस प्रकार इन चुनावों ने  ठाकरे और पवार परिवारों की चमक फीकी कर दी। नागपुर में भी भाजपा की आंधी चली। इस चुनाव का फलितार्थ ये है कि भाजपा का जनाधार केवल मुसलमानों को छोड़कर महाराष्ट्र  में समाज के सभी वर्गों में फैल चुका है। जहां तक बात कांग्रेस की है तो उसके हाथ भी कुछ नगर निगम लगी हैं परन्तु राज्य स्तर पर वह अपनी जमीन गंवाती लग रही है। उसके पास प्रभावशाली नेतृत्व का नितान्त अभाव है। दरअसल लोकसभा चुनाव में सफलता के बाद उसके प्रादेशिक नेता ग़र्राहट में आ गए। जिसकी वजह से इंडिया गठबंधन अस्तित्वहीन होकर रह गया। भले ही अनेक निगमों में कांग्रेस विपक्ष में हो किंतु उसकी दशा और दिशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। इन चुनावों के बाद उद्धव ठाकरे और शरद पवार का बचा - खुचा कुनबा भी बिखरने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा । कांग्रेस भी आने वाले दिनों में और कमजोर होगी क्योंकि मुस्लिमों के बीच ओवैसी का बढ़ता प्रभाव उसकी लुटिया डुबो रहा है। विधानसभा  के बाद स्थानीय निकायों में शानदार सफलता के बाद मुख्यमंत्री  फडणवीस का कद काफी ऊंचा हो गया है। उन्होंने भाजपा को ठाकरे परिवार के आभामंडल से  निकालकर उसकी स्वतंत्र हैसियत बनाने का वह कारनामा कर दिखाया जो स्व. प्रमोद महाजन जैसा तेज तर्रार नेता भी नहीं कर पाया था। उद्धव के सामने अब बची हुई पार्टी को सहेजना विकट समस्या होगी क्योंकि भविष्य अंधकारमय होने  से उसमें भगदड़ अवश्यंभावी है। शरद पवार जहां इतिहास बनने के कगार पर हैं वहीं अजीत पूरी  तरह भाजपा के रहमो करम पर हैं। कांग्रेस भी अपनी स्वनिर्मित समस्याओं में ही उलझी रहेगी। इन चुनावों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव अन्य  राज्यों में होने वाले चुनावी मुकाबलों पर पड़ना तय है।  एक बात इन चुनावों से प्रमाणित हो गई कि अन्य राज्यों से आकर बसे लोगों के बीच अब भाजपा ही राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर स्वीकार्यता प्राप्त करती जा रही है। मुंबई में गुजरातियों के अलावा उत्तर भारतीय प्रदेशों के जो लोग रहते हैं उनका झुकाव तो भाजपा के प्रति दिखा ही लेकिन दक्षिण भारत के जो मतदाता मुंबईवासी हैं उन्होंने भी इस बार भाजपा की जीत में खासा योगदान दिया। कांग्रेस के लिए विचारणीय विषय ये भी है कि मतदाताओं ने वोट चोरी जैसे मुद्दों को भी एक बार फिर रद्दी की टोकरी में फेक दिया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 15 January 2026

निर्यात में वृद्धि के आंकड़ों ने ट्रम्प टैरिफ की हवा निकाल दी




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को लगता था कि टैरिफ नामक ब्रह्मास्त्र चलाकर वे पूरी दुनिया को घुटनाटेक करवा लेंगे। अनेक देशों द्वारा उनकी धौंस के समक्ष समर्पण किए जाने से उनका हौसला बढ़ गया । जिसके बाद उन्होंने भारत पर 25 और 50 प्रतिशत टैरिफ थोपकर दबाव बढ़ाया। जब उसका भी असर नहीं हुआ तब हाल ही में 500 फीसदी टैरिफ का हौआ खड़ा कर भारत को रूस से तेल आयात करने से रोकने का प्रयास भी ट्रम्प ने किया जिसके लिए अमेरिकी संसद से प्रस्ताव भी पारित किया। टैरिफ सम्बन्धी हमले के बाद भारत का निर्यात कुछ समय के लिए गड़बड़ा गया क्योंकि अमेरिका ही हमारे लिए सबसे बड़ा बाजार रहा है। ट्रम्प का यही आरोप है कि सस्ते टैरिफ का लाभ उठाकर भारत तो अमेरिका में अपनी चीजें जमकर बेचता है परंतु वहां से उसका आयात तुलनात्मक तौर पर कम होने से अमेरिका को व्यापार घाटा होता है। ट्रम्प के टैरिफ रूपी दांव के बाद भारतीय रूपये का विनिमय मूल्य अमेरिकी डॉलर की तुलना में घटते हुए अपने निम्नतम स्तर पर आ गया। परिणामस्वरूप विदेशी निवेशकों ने भारत के बाजार से अपना धन निकालना शुरू किया। इस सबसे लगा कि भारत का आर्थिक ढांचा धराशायी होने को है। बढ़े हुए अमेरिकी टैरिफ का असर निर्यात और उत्पादन में गिरावट के तौर पर महसूस होने लगा। लेकिन भारतीय निवेशकों ने शेयर बाजार में जबर्दस्त निवेश करते हुए उद्योग - व्यवसाय को पूंजी के संकट से बचा लिया। हालांकि शेयर बाज़ार वैश्विक हालातों से प्रभावित होकर पहले जैसी छलांग तो नहीं लगा रहा परन्तु गिरावट भी इतनी नहीं कि चिंता में डूबा जाए। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने बड़ी ही चतुराई से अमेरिका से अलग बाजार खोजना शुरू किया। सबसे पहले ब्रिटेन से मुक्त व्यापार संधि हुई। और अब तो दुनिया भर के अनेक छोटे और बड़े देशों के साथ व्यापार समझौते हो रहे हैं। जर्मनी , इटली , फ्रांस , ऑट्रेलिया , न्यूजीलैंड और बेल्जियम जैसे संपन्न देशों के अलावा अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ भारत ने व्यापार संधियां कर अपने निर्यात का विकेंद्रीकरण कर लिया। इसी का सुपरिणाम उन आंकड़ों में परिलक्षित हो रहा है जिनके अनुसार मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत का निर्यात 850 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है जो ऐतिहासिक होगा। यही नहीं ऊंचे टैरिफ के बावजूद अप्रैल से दिसंबर 2025 तक भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में भी लगभग 10 फीसदी की वृद्धि हुई। रोचक बात ये है कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रूपये की विनिमय दर में गिरावट का सकारात्मक परिणाम निर्यातकों को हुए लाभ के रूप में देखने मिला। इसी सबके बल पर ट्रम्प के टैरिफ रूपी गुब्बारे की हवा निकालने में भारत सक्षम हो सका। रूस से तेल सहित सैन्य सामग्री नहीं खरीदने का जो दबाव ट्रम्प ने बनाया उसे भी भारत ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जो हमारी ठोस आर्थिक स्थिति का संकेत है। टैरिफ युद्ध की शुरुआत में दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियां भारत की वार्षिक विकास दर के अनुमानों को संशोधित कर 6 फीसदी से नीचे आने की भविष्यवाणी करने लगी थीं किंतु दिसम्बर खत्म होते तक उन्हें अपनी राय बदलनी पड़ी । भारतीय रिजर्व बैंक ने तो जीडीपी में 7.5 फीसदी से अधिक वृद्धि की उम्मीद जताई किंतु वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पैनी नजर रखने वाली एजेंसियों ने भी कम से कम 6.5 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान लगाया है। उल्लेखनीय है इनमें अमेरिका की क्रेडिट एजेंसियां भी हैं जहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बता चुके हैं जिसका समर्थन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी किया था। बहरहाल अब जबकि वित्तीय वर्ष समाप्त होने में महज ढाई माह शेष है तब न तो केंद्र सरकार घबराहट में है और न ही उद्योग व्यापार जगत में चिंता नजर आ रही है। दिसंबर के दौरान निर्यात में कुछ कमी आने से व्यापार घाटा बढ़ा जरूर किंतु पूरे वर्ष के संभावित आंकड़े पिछले साल से बेहतर होने की उम्मीद से ट्रम्प टैरिफ के कारण भारत का निर्यात चौपट होने की आशंका गलत साबित हो रही है । आपदा में अवसर का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारत वैकल्पिक बाजार खोजकर अमेरिकी दबाव से उबर गया। इसीलिए व्यापार संधि के लिए चल रही वार्ता में अमेरिका के दबावों के सामने हम झुके नहीं। ट्रम्प की बौखलाहट का एक बड़ा कारण ये भी है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

ईरान भी सीरिया की तरह टुकड़ों में बंटने के कगार पर


ईरान में अयातुल्ला ख़ामेनेई को सत्ता से हटाने के लिए चल रहे जनांदोलन को दबाने के हरसंभव प्रयासों के बावजूद विरोध रुकने का नाम नहीं ले रहा। सत्तारूढ़ इस्लामिक कट्टरपंथी पूरी तरह दमन पर उतारू हैं। खुलेआम गोलियां मारी जा रही हैं। ईश निंदा के आरोप में सार्वजनिक फांसी दिए जाने की खबर भी चर्चा में है।  ध्यान देने वाली बात ये है कि अमेरिका द्वारा खामेनेई को हटाने की योजना खटाई में पड़ती लग रही है। डोनाल्ड ट्रम्प को उम्मीद थी कि वे वेनेजुएला जैसा हस्तक्षेप ईरान में भी करने में सफल हो जाएंगे। उनके आशावाद का आधार वहां की जनता का इस्लामिक कट्टरता के विरुद्ध सड़कों पर उतर आना है। शुरुआत में  लगा कि उनकी सोच सही साबित होगी। ख़ामेनेई के  रूस पलायन करने की आशंका भी व्यक्त की जाने लगी। अमेरिका द्वारा सैन्य हस्तक्षेप के संकेत भी मिले। ईरान के पड़ोसी कुछ मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे पहले से ही हैं। लेकिन ईरान द्वारा इन अड्डों पर मिसाइलें दागने की धमकी के बाद उन देशों ने अमेरिका को जल्दबाजी करने से रोका । इसी के साथ अनेक मुस्लिम देश ईरान और ट्रम्प के बीच मध्यस्थता में जुट गए। इसके कारण खामेनेई को अवसर मिल गया और सेना की मदद से वे आंदोलन को कुचलने में जुट गए। अब तक हजारों लोगों के मारे जाने की ख़बर है। सैकड़ों लाशों को एक साथ दफनाए जाने की जानकारी भी मिल रही है। इसके  बाद भी  जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। पूरा देश जल रहा है। खामेनेई के चित्रों को युवतियों द्वारा जलाए जाने के वीडियो भी पूरी दुनिया ने देखे। इसके अलावा बुर्का और हिजाब उतारकर फेंकने का साहस दिखाना भी साधारण बात नहीं है। मुल्लाओं के विरोध में नारेबाजी भी जमकर हो रही है। लेकिन  डोनाल्ड ट्रम्प की धौंसबाजी ने ईरान के सत्ताधीशों को मुस्लिम कार्ड खेलने का अवसर दे दिया जिससे वे अरब देश भी साथ  आने लगे जिनकी ईरान से पटरी नहीं बैठती। यहां तक कि इजरायल तक ने अमेरिका को समझाइश दे डाली कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई करने के पहले संभावित परिणामों का आकलन कर लिया जाए ,वरना समूचे प. एशिया में युद्ध की चिंगारियां भड़क सकती हैं।इजरायल को ये डर भी है कि अमेरिका द्वारा ईरान में सैन्य बल का प्रयोग किए जाने के बाद उसके  पलटवार का सबसे बड़ा निशाना वही होगा। स्मरणीय है अमेरिका द्वारा परमाणु संयंत्रों पर हमला किए जाने के समय ईरान ने  इजरायल पर मिसाइलें छोड़कर काफी नुकसान पहुंचाया था। प्रधानमंत्री नेतन्याहू इतनी जल्दी दोबारा अपने देश को जंग में झोंकना नहीं चाह रहे। इसका लाभ उठाकर ईरान ने मुस्लिम देशों की गोलबंदी कर ली। खबर तो ये भी है कि रूस और चीन ने भी ईरान को सैन्य सहायता भेजकर उसका हौसला बुलंद किया है। हालांकि ईरान के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यदि ट्रम्प वाकई सैन्य कार्रवाई करते हैं तब ईरान उसका जवाब कैसे देगा इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। लेकिन अमेरिका ने  पैर पीछे खींचे तो फिर ईरान की  इस्लामिक सत्ता का दमनचक्र और तेज हो जाएगा । अभी तक के संकेतों के अनुसार प. एशिया के मुस्लिम देशों में भी इस बात का डर समा गया है कि ईरान में सफल होने के बाद उनके देश में भी इस्लामिक व्यवस्था के विरुद्ध जनता खड़ी हो जाएगी। यद्यपि सऊदी अरब जैसे इस्लाम के सबसे बड़े देश के नए शासक ने भी महिलाओं को काफी छूट दी है किंतु ज्यादातर देश अभी भी इस्लामिक कानूनों से बंधे हुए हैं। इसीलिए उनमें से कोई भी खामेनेई द्वारा चलाए जा रहे दमनचक्र के विरुद्ध मुंह नहीं खोल रहा। ऐसे में यदि  कट्टरपंथी सत्ता नहीं बदली तब  ईरान में  नरसंहार  की आशंका और भी बढ़ जाएगी जिसका परिणाम गृहयुद्ध भी  हो सकता है । दरअसल आंदोलनकारी ये समझ चुके हैं कि उनके पास आगे बढ़ने के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं हैं। कुल मिलाकर ईरान दो पाटों के बीच अब फंसकर रह गया है। खामेनेई की सत्ता पलटने के  बाद भी वहां राजनीतिक स्थिरता की  गारंटी नहीं है। 1979 में सत्ता से हटे शाह  के पुत्र यदि लौटे तब भी वे कितने सफल होंगे कहना मुश्किल है। बड़ी बात नहीं सीरिया की तरह ईरान भी टुकड़ों में बंट जाए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 14 January 2026

नई पीढ़ी के नेताओं को रास नहीं आएगी दिग्विजय की वापसी


म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने हाल ही में एक पुरानी तस्वीर सोशल मीडिया पर प्रसारित कर टिप्पणी की थी कि भाजपा और संघ जमीन में बैठे अपने कार्यकर्ता को भी प्रधानमंत्री बना देता है। उस चित्र में वरिष्ट भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के  सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बैठे दिखाई दे रहे थे। उस समय श्री मोदी जहां  संगठन का कार्य देखते थे। वहीं आडवाणी जी पार्टी के शीर्ष नेता थे। उस तस्वीर को प्रसारित कर श्री सिंह सुर्खियों में तो आ गए किंतु कांग्रेस के भीतर  सुगबुगाहट होने लगी। कांग्रेस महासमिति की बैठक के ठीक पहले किए गए उस धमाके को दबाव बनाने की कोशिश कहा गया। दरअसल श्री सिंह का राज्यसभा कार्यकाल अप्रैल माह में समाप्त होने वाला है और इस उम्र में चुनाव लड़कर लोकसभा में पहुंचना उनके बूते के बाहर है। 2019  और 2024 में  वे बुरी तरह हार भी चुके हैं। ऐसे में राज्यसभा में रहकर ही वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति बनाए रख सकते हैं। लेकिन उन्होंने श्री मोदी की तस्वीर प्रसारित कर अपने लिए गड्ढा खोद लिया। कहते हैं राहुल गांधी ने भी इस पर नाराजगी जताई । यद्यपि श्री सिंह ने बिना देर लगाए भाजपा और संघ से अपना वैचारिक विरोध व्यक्त कर दिया किंतु नुकसान हो चुका था। ऐसे में  राज्यसभा की सीट खाली कर म.प्र में  कांग्रेस को पुनः मजबूत लगाने संबंधी उनके बयान पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि बिना सांसद रहे दिल्ली में जमे रखना उनके लिए मुश्किल होता। फिलहाल वे पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी भी नहीं हैं। ये बात  सही है कि प्रदेश की राजनीति से वे अच्छी तरह वाकिफ हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव के पूर्व उन्होंने सपत्नीक जो पैदल नर्मदा परिक्रमा की थी उसका लाभ कांग्रेस को भी मिला और वह सरकार बनाने में सफल हो सकी। हालांकि मात्र 15 महीने बाद ही उनके और ज्योतिरादित्य सिंधिया  की राजनीतिक दुश्मनी से वह सरकार अल्पजीवी साबित हुई किंतु दिग्विजय दिल्ली में डटे रहे। गांधी परिवार के प्रति निष्ठा व्यक्त करने में भी वे कभी पीछे नहीं रहते। राहुल गांधी की पहली भारत जोड़ो यात्रा के आयोजन में उनकी प्रमुख भूमिका भी रही। हालांकि 2024 के बाद वे कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में हाशिए पर खिसकने लगे और अब जब वे खुद ही दिल्ली छोड़ घर लौटने  की बात कह रहे हैं तब ये कहना गलत नहीं होगा कि गांधी परिवार भी अब उन्हें अनुपयोगी मान बैठा है । वरना इतने अनुभवी नेता को आसानी से नहीं छोड़ता। अब सवाल ये है कि म.प्र में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए मैदान में उतरने की उनकी योजना पार्टी द्वारा तय की गई या वे अपनी भूमिका खुद तय कर बैठे। सही  बात ये है कि प्रदेश में कांग्रेस  की बागडोर जिन युवा हाथों में राहुल गांधी ने सौंपी वे दिग्विजय सिंह और कमलनाथ को बर्दाश्त करने तैयार नहीं है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार को श्री सिंह की सक्रियता रास आएगी ये बीते दो वर्ष की स्थितियों को देखने पर तो नहीं लगता। सही बात ये है कि श्री नाथ और श्री सिंह येन केन प्रकारेण अपने बेटों को स्थापित करना चाह रहे हैं। श्री नाथ के पुत्र नकुल लोकसभा चुनाव हारकर पृष्ठभूमि में हैं। वहीं उनका आभामंडल भी फीका पड़ा है।  दिग्विजय सिंह के लिए जरूर उनके विधायक पुत्र जयवर्धन सिंह उम्मीद की किरण हैं। यद्यपि वे सरकार में मंत्री रहने के बाद भी प्रदेश स्तर पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में असफल रहे।  ऐसे में  उनके पिता प्रदेश में पूरा समय देकर राजनीति करने  के बाद भी नई पीढ़ी को प्रेरित और प्रभावित कर सकेंगे इसमें संदेह ही है।   जनसामान्य में भी श्री सिंह की वह नकारात्मक छवि बरकरार है जिसके कारण 2003 में कांग्रेस का ऐसा पराभव हुआ कि वह आज तक उठ नहीं पाई। दरअसल उनकी और श्री नाथ की जोड़ी ने पार्टी में क्षमतावान युवाओं को उठने नहीं दिया और अपने परिवार को ही बढ़ाने में लगे रहे। यदि 2023 में ये दोनों  श्री सिंधिया को मुख्यमंत्री बनवा देते  तब कांग्रेस सत्ता में बनी रहती और 2024 के लोकसभा चुनाव में  सभी सीटें न हारती। ये देखते हुए श्री सिंह द्वारा प्रदेश की राजनीति में उतरने की घोषणा से आम जनता तो छोड़ दें कांग्रेस में भी शायद ही कोई उत्साह नजर आए क्योंकि उसकी दुर्गति के लिए सबसे ज्यादा  जिम्मेदार वही हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 January 2026

ममता को केजरीवाल के हश्र से सबक लेना चाहिए


प. बंगाल में एक निजी प्रतिष्ठान आई - पैक के  कार्यालय और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के निवास पर ईडी के छापे के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया। आई - पैक तृणमूल कांग्रेस के चुनाव अभियान का प्रबंधन भी देखता है। पहले प्रख्यात चुनाव विशेषज्ञ प्रशांत किशोर इसके मुखिया थे किंतु चुनावी राजनीति में उतरने के कारण वे इससे अलग हो गए। हालांकि इसके वर्तमान प्रमुख  प्रतीक  का नाम प. बंगाल के कोयला तस्करी घोटाले से जुड़ा हुआ है किंतु राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के कुछ माह पहले ईडी के छापे को राजनीतिक प्रतिशोध का नाम दिया जा रहा है। छापे के दौरान राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का प्रतीक के निवास पर पहुंचकर उसके  फोन सहित एक फाइल उठाकर ले आने के बाद इस प्रकरण में नया मोड़ आ गया। सुश्री बैनर्जी का कहना है कि ईडी ने कोयला घोटाले के नाम पर उनकी चुनाव रणनीति से जुड़े दस्तावेज जप्त करने छापा मारा जबकि ईडी का कहना है कि उसकी  कार्रवाई संदर्भित घोटाले की जांच से ही जुड़ी हुई थी। ममता जो फाइल उठाकर लाईं उसके बारे में चर्चा है कि उसमें घोटाले का काला चिट्ठा समाया हुआ था। ऐसे  में एक मुख्यमंत्री का छापे के दौरान जाकर कोई दस्तावेज उठा लाना तमाम संदेहों को जन्म देता है। ईडी ने अदालतों में उनके इसके विरुद्ध शिकायत की है। लपेटे में प. बंगाल के डीजीपी सहित कुछ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी आ रहे हैं जिन  पर आरोप है कि वे केंद्रीय एजेंसी को उचित संरक्षण प्रदान करने के बजाय जरूरी दस्तावेज उठाकर ले गए।  छापे के समय  और औचित्य पर बेशक सवाल उठाए जा सकते हैं। ईडी के दुरुपयोग के बारे में सर्वोच्च न्यायालय भी टिप्पणी कर चुका है किंतु ममता ने इस मामले में जिस प्रकार का हस्तक्षेप किया उसके बाद उन पर उंगलियां उठना भी स्वाभाविक है। ये पहला अवसर नहीं है जब उन्होंने केंद्रीय एजेंसी के काम में रुकावट पैदा की। कुछ साल पहले सीबीआई टीम के तत्कालीन डीजीपी से पूछताछ करने कोलकाता पहुंची तब ममता भी उनके यहां जा पहुंची और सीबीआई के कार्य में व्यवधान डाला। बाद में उन्होंने राज्य में केंद्रीय जांच टीम के घुसने पर ही रोक लगा दी।  वर्तमान विवाद अदालत  जा पहुंचा है जिसमें ईडी ने मुख्यमंत्री सहित राज्य के डीजीपी और अन्य अधिकारियों पर डकैती जैसे गंभीर आरोप लगाए वहीं राज्य सरकार  भी जवाब में  हमलावर है। ऐसे में  वैधानिक पहलू पर  तो टिप्पणी उचित नहीं होगी किंतु सुश्री बैनर्जी लगातार भ्रष्टाचार के प्रकरणों में जिस प्रकार उलझती जा रही हैं उससे  निजी छवि के साथ ही तृणमूल कांग्रेस के प्रति भी आम जनता में नाराजगी बढ़ रही है। लगातार तीन चुनाव जीतने से उनका आत्मविश्वास आसमान छू रहा है । इसी के चलते वे केंद्र सरकार से दो - दो हाथ करने तत्पर रहती हैं। हालांकि ऐसा करने वाली वे अकेली गैर भाजपाई मुख्यमंत्री नहीं हैं किंतु उनके तेवर सदैव औरों से ज्यादा उग्र रहते हैं। इसके पीछे शायद उनका ये सोचना है कि उन्हें चुनाव में हरा पाना असम्भव है। लेकिन उन्हें ये याद रखना चाहिए कि आम आदमी पार्टी सुप्रीमो और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी  विशाल बहुमत के कारण मदमस्त होकर केंद्र से टकराव का मौका तलाशा करते थे। भ्रष्टाचार के विरोध में जनांदोलन करने के बाद राजनीति में उनका उदय धूमकेतु की तरह हुआ किंतु सत्ता में आने के बाद वे और उनके साथी भ्रष्टाचार के आरोपों में उलझकर अंततः जेल भी गए। लेकिन नैतिकता की कसमें खाने वाले केजरीवाल ने बजाय इस्तीफा देने के जेल से सरकार चलाने का उदाहरण पेश करते हुए सत्ता के प्रति अपनी लालसा जगजाहिर कर दी । लेकिन दिल्ली के मतदाताओं ने गत वर्ष हुए चुनाव में उनको सत्ता ही नहीं अपितु विधानसभा तक से बाहर कर दिया। अपार लोकप्रियता के कारण खुद को अपराजेय समझने की भूल अतीत में लालू प्रसाद यादव और मायावती भी कर चुकी हैं जिसकी सजा जनता ने उन्हें दे दी। इन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। ममता बैनर्जी को ये गुमान है कि 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के अलावा बंगाली अस्मिता के नाम पर वे चौथा चुनाव भी जीत जाएंगी किंतु ऐसा ही अति आत्मविश्वास बिहार में तेजस्वी यादव को था जो मुस्लिम - यादव गठजोड़ के बलबूते सत्ता हासिल करने का सपना देख रहे थे किंतु लालू परिवार पर भ्रष्टाचार की जो कालिख पुती है उसके कारण जनता ने उन्हें चारों खाने चित्त कर दिया। चुनाव के दौरान तेजस्वी भी सीधे मुंह बात नहीं करते थे। यद्यपि अभी से प.बंगाल के चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करना तो जल्दबाजी होगी किंतु ममता को लालू और केजरीवाल के पतन से सीख लेनी चाहिए जिनकी लोकप्रियता भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण मिट्टी में मिल गई।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 January 2026

अमेरिका की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दिया ट्रम्प ने




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का इरादा जताने के बाद पूरे यूरोप में दहशत का माहौल है। दूसरे  महायुद्ध की समाप्ति के बाद  भले ही हिटलर  के नाजीवाद का खतरा समाप्त हो गया लेकिन सोवियत संघ रूपी महाशक्ति के कारण यूरोप के अनेक देशों में भय व्याप्त था। उन्हें लग रहा था कि सोवियत संघ देर - सवेर साम्यवादी क्रांति का माहौल उन यूरोपीय देशों  में भी बनाए बिना नहीं रहेगा जो राजतंत्र के साथ ही प्रजातांत्रिक व्यवस्था को अपनाए हुए थे। चूंकि विश्वयुद्ध की  समाप्ति में अमेरिका की निर्णायक भूमिका थी और वह प्रजातंत्र का प्रतीक कहलाता था लिहाजा सोवियत संघ के प्रभाव से जो यूरोपीय देश मुक्त बने  रहे उन्होंने अमेरिका को अपना अघोषित नेता स्वीकार किया जिसके चलते 1949 में नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) का गठन हुआ। हालांकि 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ नामक संगठन भी अस्तित्व में आ चुका था जिसका उद्देश्य दुनिया भर के देशों को एक मंच पर एकत्र कर विश्व में स्थायी शांति स्थापति करना था। इसका मुख्यालय भी अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में स्थापित किया गया। लेकिन इसके बाद भी दुनिया को खेमों में बंटने से नहीं रोका जा सका। और 1949 में नाटो और  1954 में सीटो अमेरिका की अगुआई में बना । वहीं पूर्वी यूरोप के साम्यवादी व्यवस्था वाले कुछ देशों ने सोवियत संघ के झंडे तले वारसा संधि की जो 1991 में सोवियत संघ के बिखराव पर अस्तित्वहीन हो गई। सीटो भी 1977 में समाप्त हो गया किंतु नाटो अब तक बना हुआ है। उक्त सभी संगठन दरअसल सामूहिक सुरक्षा की गारंटी स्वरूप थे। अर्थात किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर माना जाएगा और मुकाबले के लिए सभी एक साथ खड़े होंगे। शीतयुद्ध नामक कालखंड में नाटो आदि काफी प्रासंगिक रहे किंतु कालांतर में इनका महत्व कम होता गया। कुछ साल पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला तब उसका एक कारण यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता लेने की कोशिश भी थी। हालांकि वह कामयाब नहीं हो सकी। यद्यपि अमेरिका सहित नाटो सदस्यों ने उसे भरपूर सहायता दी। लेकिन जबसे ट्रम्प दोबारा सत्ता में आए तब से न  सिर्फ नाटो बल्कि राष्ट्र संघ के प्रति भी उनका उपेक्षा भाव सामने आने  लगा। हाल ही में उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन  के अलावा 24 संगठनों से अलग होकर राष्ट्र संघ को भी ठेंगा दिखा दिया। इसी के साथ ही नाटो को लेकर भी वे बेहद गैर जिम्मेदाराना टिप्पणियां करने लगे। यूक्रेन को ट्रम्प ने जो धोखा दिया उसकी वजह से उन यूरोपीय देशों में भय व्याप्त हो गया जो अमेरिका का  संरक्षण होने के कारण अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त थे। रूस द्वारा यूक्रेन के साथ ही कुछ और यूरोपीय देशों के इलाकों पर भी अपना दावा भी ठोककर उनकी चिंता बढ़ा दी। ऊपर  से ट्रम्प की नीतिगत अस्थिरता ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी। वेनेजुएला में ट्रम्प द्वारा की गई कार्रवाई से तो यूरोपीय देशों की क्षेत्रीय अखंडता पर कोई असर नहीं पड़ा इसलिए वे शांत रहे लेकिन ज्योंही ट्रम्प ने डेनमार्क आधिपत्य वाले ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की मंशा जताई त्यों ही समूचा यूरोप विचलित हो उठा । सबसे पहले डेनमार्क ने नाटो छोड़ने की धमकी दी। उसके बाद जर्मनी सहित अनेक देश खुलकर अमेरिका का विरोध  करने लगे। उनका मानना है कि यदि ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को कब्जाने की जिद पूरी की तो रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले को भी आधार मिल जाएगा। क्या होगा फ़िलहाल कहना कठिन है किंतु ट्रम्प अपने विरोधियों के प्रति सख्ती बरतें तो समझ में भी आता है लेकिन  अमेरिका  के मित्रों के साथ भी उनका रवैया यदि शत्रुतापूर्ण हो जाए तब फिर ये कहना गलत नहीं होगा कि वे किसी भी तरह से भरोसे के लायक नहीं हैं। बीते एक साल में अमेरिका को आर्थिक बदहाली के कगार पर ला खड़ा करने के अलावा उन्होंने उसकी साख और धाक दोनों मिट्टी में  मिला दी। यही कारण है कि महाशक्ति का रुतबा अमेरिका खोता जा रहा है। बीते एक वर्ष में ट्रम्प के निर्णय और नीतियों के अलावा उनका आचरण देखते हुए ये कहा जा सकता है कि वे अमेरिका के सबसे घटिया राष्ट्रपति साबित हो रहे हैं। बड़ी बात नहीं जिस तरह गोर्बाचोव ने सोवियत संघ को पतन के रास्ते पर धकेला वैसे ही ट्रम्प भी अमेरिका की बर्बादी का कारण बन जाएं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 



Saturday, 10 January 2026

मोदी की मौन कूटनीति से बौखलाहट में हैं ट्रम्प



अमेरिका द्वारा भारत पर 500 फीसदी टैरिफ थोपने संबंधी फैसले के बाद डोनाल्ड ट्रम्प उसे लागू करेंगे या दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश करते रहेंगे ये  सवाल  चर्चा में है। दरअसल ट्रम्प की मनोदशा उस तेज गेंदबाज जैसी है जो बाउंसर से बल्लेबाज के सिर को निशाना बनाते हुए उसे डराने की कोशिश करता है । यदि बल्लेबाज यदि तनिक भी लापरवाही करता है तब  तो गेंद उसके सिर को चोट पहुंचा देती है और यदि बल्ले पर ठीक से नहीं आई तब वह कैच कर लिया जाता है। जब हेलमेट का उपयोग नहीं होता था तब  अनेक बल्लेबाजों को बाउंसरों ने घायल किया। भारत के पूर्व कप्तान नारी कांट्रेक्टर के सिर में वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज  ग्रिफिथ के बाउंसर से गंभीर चोट लगी कि उनका खेल जीवन ही समाप्त हो गया। हेलमेट आने के बाद भी अनेक खिलाड़ी  बाउंसर  पर घायल होते रहे हैं। इसीलिए चतुर बल्लेबाज सामान्यतः  झुककर उसे सिर के ऊपर से जाने देते हैं । गेंदबाज फिर दूसरी और तीसरी बाउंसर भी फेंकता है। और बल्लेबाज उसे भी सिर झुकाकर छोड़ दे तब उसकी झल्लाहट बढ़ती है जिसकी वजह से उसकी  दशा और दिशा दोनों गड़बड़ा जाती हैं जिसका  लाभ उठाकर  बल्लेबाज गेंदों की पिटाई करता है। भारतीय क्रिकेट में सुनील गावस्कर , राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर  सफल हुए तो उसके पीछे उनका धैर्य ही था। राजनय या कूटनीति में भी बल्लेबाजी की उक्त तकनीक काम आती है जिसमें सामने वाले की तीखी बातों से उत्तेजित होकर जल्दबाजी में टिप्पणी से बचना ही बेहतर होता है।  उक्त संदर्भ भारत और अमेरिका के सम्बन्धों में  तनाव को लेकर प्रासंगिक हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प लगातार निरर्थक और निराधार टिप्पणियां करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उकसाने का दांव चल रहे हैं। अपेक्षा की जाती है कि वे उनका जवाब सार्वजनिक रूप से दें। लेकिन एक - दो को छोड़ श्री मोदी ने उनकी कटाक्ष युक्त टिप्पणियों को नजरंदाज कर दिया । सिलसिला ऑपरेशन सिंदूर से शुरू हुआ जब ट्रम्प ने युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटा। उसके बाद फिर भारत पर टैरिफ थोपने के फैसले के साथ ही वे श्री मोदी पर व्यंग्यबाण छोड़ते रहे। कैनेडा में आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन  से लौटते वक्त प्रधानमंत्री को वॉशिंगटन आने का न्यौता भी ट्रम्प ने दिया किंतु उन्होने अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। तबसे वे दर्जनों ऐसी टिप्पणियां कर चुके हैं जिन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जरूरत श्री मोदी ने नहीं समझी। जानकारी तो यहां तक आई कि उनके फोन तक प्रधानमंत्री ने नहीं उठाए। जाहिर है इससे ट्रम्प की बौखलाहट और बढ़ी जिसका प्रमाण उनके  वाणिज्य मंत्री हावर्ड  लुटनिक ने ये कहकर दिया कि भारत के साथ व्यापार संधि का मसला इसलिए नहीं सुलझ रहा क्योंकि श्री मोदी ने  ट्रम्प से फोन पर  अनुरोध नहीं किया।  ट्रम्प द्वारा समय - समय पर की जाने वाली ऊल - जलूल टिप्पणियों का जवाब श्री मोदी की बजाय या तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर देते रहे या विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता। लुटनिक की टिप्पणी पर भी  प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि बीते कुछ महीनों में ट्रम्प और श्री मोदी के बीच कई बार फोन पर  चर्चा हो चुकी है।  इजरायल और हमास के बीच युद्ध रुकने पर प्रधानमंत्री ने ट्रम्प को फोन किया था। इसके अलावा यूक्रेन संकट पर भी दोनों में बातचीत हो चुकी है। लेकिन व्यापार संधि और टैरिफ घटाने के मुद्दे पर बेशक श्री मोदी ने उनसे अनुनय - विनय नहीं किया क्योंकि वे जिन शर्तों पर टैरिफ घटाने की बात कर रहे हैं वे भारतीय हितों के लिए नुकसानदेह हैं। इस मामले में भारत ने  जो दृढ़ता दिखाई उसके ट्रम्प का बौखलाना स्वाभाविक है । कई बार वे श्री मोदी को अपना मित्र और महान नेता भी कह चुके हैं। वहीं दूसरी ओर ये कहने से भी बाज नहीं आए कि वे मेरी नाराजगी जानते हैं और इसीलिए मुझे खुश करने में लगे हैं। दरअसल ट्रम्प के बयानों में इतना विरोधाभास है कि यदि श्री मोदी उनकी सभी बातों का जवाब देते तो इससे व्यर्थ के विवाद उत्पन्न होते। इसीलिए उन्होंने उनकी उपेक्षा की नीति अपनाकर  टिप्पणी का काम सरकार के प्रवक्ता पर छोड़ दिया। यद्यपि वह भी सरकार की ही आवाज होती है किंतु डोनाल्ड ट्रम्प से सीधे बात नहीं करने की प्रधानमंत्री की नीति ने ये साबित कर दिया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा को  लेकर अमेरिका जैसी महाशक्ति के दबाव को ठुकराने में सक्षम है। 25 से 50 और अब 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अमेरिका के निर्णय पर भारत की ठंडी प्रतिक्रिया से  स्पष्ट हो गया कि हमारी विदेश नीति अब पूरी तरह दबाव मुक्त है और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम है।

- रवीन्द्र वाजपेयी