Thursday, 31 October 2024

अपने साथ ही देश की समृद्धि हेतु भी कामना करें



 दुनिया जब अर्थव्यवस्था के बारे में जानती भी नहीं थी तब से भारत में दीपावली का त्यौहार मनाया जा रहा है । कालान्तर में इसके साथ  पौराणिक प्रसंग जुड़ते चले गए | न सिर्फ सनातन धर्म के अनुयायियों अपितु जैन , बौद्ध , सिख सभी इस पर्व पर हर्षोल्लास से भर उठते हैं ।  ये कहना भी गलत न होगा कि दीपावली भारत का सबसे बड़ा लोक महोत्सव है । पूरे विश्व में फैले भारतवंशी इसका आयोजन पूरे उत्साह और उमंग से करते हैं | अब तो अमेरिका और ब्रिटेन तक में सरकारी तौर पर  दीपावली का जलसा होने लगा है । इसका कारण वहां भारतीयों की बढ़ती संख्या ही नहीं बल्कि शैक्षणिक , आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में उनकी प्रभावशाली उपस्थिति है । वैसे अन्य भारतीय तीज – त्यौहारों की तरह दीपावली भी कृषि आधारित पर्व ही है | वर्षा ऋतु की विदाई के बाद नई फसल आते ही आर्थिक और धार्मिक गतिविधियाँ शुरू होने के साथ शुरू हो जाता है शीतकाल जिसमें रबी फसल की तैयारी होती है । इस प्रकार दीपावली  व्यापारिक महत्व का अवसर भी है । इसे दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक मेला भी कह सकते हैं |  भारत की अर्थव्यवस्था आज  भी कृषि आधारित है और  दीपावली भी उसी से जुडी है । अच्छी फसल से समाज के हर वर्ग को  उत्साह के साथ ही भविष्य के आर्थिक नियोजन में  मदद मिलती है । जब फसल अच्छी आती है तब शादियाँ भी खूब होती हैं जिनकी वजह से बाजार में रौनक आती है । इसीलिए दीपावली को व्यवसायी समुदाय का त्यौहार कहा जाता है । इस दिन  धन -  धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की पूजा का महात्म्य भी इसी वजह से है । बावजूद इसके इस त्यौहार से जुड़ी परंपराओं में सामाजिक ढांचे का भी ध्यान रखा गया था । तभी तमाम चमक – दमक के बावजूद मिट्टी का दिया और दीपावली एक दूसरे के पूरक हैं । आधुनिकता के साथ सजावट के अनेकानेक साधन विकसित होने पर भी धनकुबेरों से लेकर तो झोपड़ी में रहने वाला निर्धन भी दीपक के माध्यम से ही दीपावली मनाता है जिसके पीछे भी एक प्रतीकात्मक सोच रही है । दीपावली पर चूंकि अमावस्या  होती है इसलिए दीपमालिका के माध्यम से ये प्रदर्शित किया जाता है  कि निराशा के माहौल में भी आशावान होना हमारा स्वभाव है । इस प्रकार  यह अँधेरे में प्रकाश उत्पन्न करने रूपी पौरुष का प्रतीक है | लक्ष्मी की पूजा और आराधना को केवल धन – संपत्ति की प्राप्ति से जोड़ना अधकचरापन है । सही मायनों में दीपावली श्रम और नैतिकता से अर्जित सम्पन्नता की प्रेरणा देती है । अमावस की अंधियारी रात को दीपों  से आलोकित करने की परम्परा इस बात का द्योतक है कि हमारे आचरण में पारदर्शिता हो और हम ऐसा कुछ न करें जिसे छिपाने की जरूरत पड़े । इसके साथ ही ये पर्व हमारी सामाजिक व्यवस्था में निहित समतामूलक सोच का सर्वोत्तम उदाहरण है । इसीलिये भले ही यह लक्ष्मी जी को समर्पित है किन्तु सुख और समृद्धि की कामना करने का अधिकार सभी को है , ये इस त्यौहार का संदेश है । पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा के विपरीत भारतीय सामाजिक व्यवस्था वर्ग  संघर्ष जैसे दर्शन से अलग वर्ग समन्वय को पोषित करने  वाली है । इस अवसर पर रोजगारमूलक सामाजिक ढांचे का सर्वोत्तम स्वरूप उभरकर सामने आता है । 21 वीं सदी ने यद्यपि काफी कुछ बदल डाला लेकिन आज भी बचत और संयम का जो संस्कार  हमें विरासत में मिला उसने अनगिनत झंझावातों के बावजूद भारत को संगठित और सुरक्षित रखा । सदियों  की गुलामी भी हमारे सांस्कृतिक व्यवहार को नहीं बदल सकी तो उसका बड़ा कारण हमारी पर्व परम्परा है जो हमें जड़ों से जोड़े रखती है । दीपावली इस परम्परा का शिखर है । मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में हमारे देश की भूमिका की ओर पूरा विश्व निहार रहा है । आर्थिक मजबूती के साथ सुरक्षा के क्षेत्र में बढ़ती आत्मनिर्भरता के कारण ही भारत दुनिया की बड़ी ताकतों की कतार में शामिल हो सका है । नई पीढ़ी ने ज्ञान – विज्ञान की हर विधा में अपनी प्रतिभा प्रमाणित की है । स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद की भविष्यवाणी के अनुरूप भारत विश्व का नेतृत्व करने के आत्मविश्वास से भरा हुआ है । हालाँकि राह में बाधाएं भी हैं किन्तु आज का भारत समस्याओं के समाधान के सामर्थ्य से भरपूर है । दीपावली इस आत्मविश्वास को और सुदृढ़ बनाने का पुनीत अवसर है । आइये , अपनी उन्नति के साथ ही हम अपने देश की समृद्धि हेतु भी प्रार्थना करें क्योंकि उसी के साथ हमारा भविष्य भी जुड़ा हुआ है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 30 October 2024

तो भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा

हमारे यहाँ धातु में निवेश प्राचीनकाल से होता आया है। ये हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता ही थी जिसने समाज के प्रत्येक वर्ग को दीर्घकालीन निवेश का महत्व समझाया। धनतेरस से दीपावली पर्व का शुभारंभ हो जाता है। यह दिन अनेक पौराणिक  प्रसंगों से जुड़ा है किंतु इसका मुख्य आकर्षण बाजारों में नजर आने वाली रौनक है। एक समय था जब धनतेरस पर पीतल, तांबे, काँसे के बर्तनों से लेकर सोने - चाँदी के आभूषण खरीदने का रिवाज था। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के मुताबिक उक्त धातुओं में से कोई खरीद कर त्यौहार की खुशी मनाता था। धातु से बनी चीज चाहे  वह पीतल हो या कांसा एक तरह की पूंजी ही होती है जो बरसों तक उपयोग किये जाने के बाद बेचने पर भी अपने खरीद मूल्य के बराबर तो पैसा दे ही जाती है। जबकि सोने   - चांदी कितने भी पुराने क्यों न हो जाएं उन्हें बेचने पर उसके मौजूदा दाम के बराबर धन वापस मिल जाता है। समय के साथ समाज की सोच भी बदली और जरूरतें भी। जीवन स्तर में आये सुधार के अलावा बाजारवाद ने भी लोगों की मानसिकता को प्रभावित किया। मध्यम वर्ग के रूप में एक बड़ा उपभोक्ता समूह विकसित हुआ जिसने अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदलकर रख दी। धनतेरस पर बाजार में बर्तनों की जगह वाहन, इलेक्ट्रानिक उपकरण आदि ने ले ली किंतु  सोने - चांदी का आकर्षण जस का तस है। बीते कुछ समय से वैश्विक परिस्थितियों के कारण सोना - चांदी की कीमतें काफी बढ़ चुकी हैं। इसके कारण बाजार में ये आशंका थी कि इनकी बिक्री पिछले सालों की अपेक्षा कम होगी। लेकिन कल धनतेरस पर देश में 60 हजार करोड़ के कुल कारोबार में 20 हजार करोड़ रु.का सोना और 2500 करोड़ रु. की चांदी की बिक्री होना  दर्शाता है कि भारतीय समाज में इन धातुओं में निवेश के प्रति आकर्षण यथावत है। पूंजी बाजार से मिली जानकारी के अनुसार बीते एक साल में सोने - चांदी की कीमतों में हुई जबरदस्त वृद्धि की वजह से उनमें निवेश करने वालों को आशातीत लाभ हुआ। दीपावली पर सोना लगभग 80 हजार प्रति ग्राम और चांदी 1 लाख रु .प्रति किलो तक पहुँचने के बाद भी उनकी बिक्री के आंकड़े उस आशंका को भी दर्शा रहे हैं जिसके अनुसार रूस और यूक्रेन में चल रही जंग के साथ ही इजरायल और ईरान के बीच युद्ध होने वाला है। लेकिन कोरोना के बाद से दुनिया के बड़े देशों की अर्थव्यवस्था में आई गिरावट ने भी उक्त मूल्यवान धातुओं की मांग बढ़ा दी। भारत तो हजारों सालों से सोने और चांदी के प्रति दीवाना रहा है। कहा जाता है कि देश के कुछ बड़े मंदिरों में जमा सोने के भंडारों का बाजार मूल्य अरबों - खरबों में होगा और ये भी कि करोड़ों भारतीय परिवारों के पास सोने और चांदी के जो आभूषण हैं यदि उनकी कीमत आंकी जाए तो देश अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा। ये बात भी बिल्कुल सही है कि कच्चे तेल के अलावा सोना - चांदी के आयात में भी विदेशी मुद्रा बड़ी मात्रा में खर्च होती है। कई बार ये चर्चा चली कि यदि परिवारों में रखा सोना सरकार के खजाने में होता तो हमारी हैसियत विदेशी बाजारों में विकसित देशों के बराबर होती। मंदिरों आदि के बारे में भी यही सोच है किंतु भारतीय जनमानस ऐसी चर्चा को सरकार की खस्ता हालत के तौर पर देखता है। सोना - चांदी आम भारतीय के लिए केवल प्रतिष्ठा सूचक न होकर बुरे वक्त के साथी हैं क्योंकि  यही धातुएँ हैं जिन्हें कभी भी बेचकर वह अपनी आपातकालीन जरूरतें पूरी कर सकता है। गिरवी रखकर भी छोटी समस्या हल हो जाती है। यही कारण है कि  वह मौका मिलते ही इन दोनों धातुओं में निवेश करने से नहीं चूकता। यद्यपि ये बात भी चुभती है कि घरों में रखा हुआ सोना व्यक्तिगत संपत्ति तो है किंतु देश की समृद्धि में उसका योगदान नहीं है। जो स्वर्ण भंडार रिजर्व बैंक के पास है वही उसका पैमाना है। यद्यपि सरकार ने निजी सोने को अपने पास जमा करने की कई योजनाएं निकालीं किंतु उनका अपेक्षित लाभ नहीं हुआ। इससे ये भी सिद्ध होता है कि जिस सरकार को जनता चुनती है उस पर उसे भरोसा कितना कम है। बेहतर होगा सरकार ऐसा कुछ करे जिससे उसके सोने के भंडार में जनता से ज्यादा सोना हो । जिस दिन ऐसा हो जाएगा भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 29 October 2024

भारतीय छात्रों के विदेश जाने से उठ रहा सवाल


भारत और कैनेडा के रिश्तों  में कुछ  समय से बेहद खटास घुल गई है। इसका कारण वहाँ के प्रधानमंत्री ट्रूडो का भारत विरोधी खालिस्तानी तत्वों को दिया जा रहा संरक्षण है। ये कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पंजाब से बड़ा खालिस्तानी गतिविधियों का केंद्र कैनेडा बन गया है। निज्जर नामक खालिस्तानी की हत्या के मामले में ट्रूडो , भारत सरकार को जिस तरह कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उसके पीछे वहाँ होने जा रहे चुनाव हैं। अपनी खस्ता हालत देखकर उन्होंने खालिस्तानी संगठनों को खुली छूट दे रखी है ताकि सिखों के मत उन्हें मिल सकें। हालांकि वहाँ बसे सभी सिख खालिस्तान समर्थक या भारत विरोधी हैं ये सही नहीं है किंतु वे खालिस्तान समर्थकों की मुख़ालफत करने से बचते हैं। ट्रूडो इसी का लाभ उठाकर भारत पर दबाव बनाने की चाल चल रहे हैं जबकि उनकी अपनी पार्टी में इसे लेकर विरोध के स्वर उठ रहे हैं। भारत सरकार ट्रूडो द्वारा बनाये जा रहे दबाव का कड़ाई से जवाब दे रही है। लेकिन इस बीच एक जानकारी आई है कि कैनेडा में पढ़ रहे विदेशी छात्रों में 40 फीसदी संख्या भारतीय विद्यार्थियों की है।  2022 के आंकड़ों के अनुसार 4 लाख भारतीय छात्रों से  उस साल 85000 करोड़ रु. कैनेडा की अर्थव्यवस्था को मिले। भारत सरकार द्वारा संसद में दी गई  जानकारी के मुताबिक वर्ष  2023 में 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ रहे थे जबकि 2022 में ये संख्या 9 लाख थी। इससे स्पष्ट है कि महज एक साल में अध्ययन हेतु विदेश जाने वाले भारतीय विद्यार्थियों की संख्या में लगभग 30 फीसदी की वृद्धि हुई। और ये भी कि इन छात्रों द्वारा विदेशों में खर्च की जाने वाले राशि 2.5 लाख करोड़ रु. से अधिक होगी। हालांकि ये कोई नई बात नहीं है। आजादी के पहले से ही भारत के छात्र उच्च अध्ययन हेतु विदेश जाते रहे हैं। महात्मा गाँधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, डा. राममनोहर लोहिया, ज्योति बसु, डाॅ. भीमराव आंबेडकर के अलावा बड़ी संख्या में राष्ट्रीय नेताओं ने विदेशों में शिक्षा प्राप्त की। उस दौर में भारतीय विश्वविद्यालयों में शिक्षा का स्तर किसी भी तरह कम था ये मान लेना गलत होगा। हाँ, विज्ञान के क्षेत्र में शायद शोध आदि के लिए समुचित संसाधनों का अभाव होने से अनेक वैज्ञानिक विदेश चले जाते होंगे। भारत चूंकि ब्रिटेन के अधीन था इसलिए वहाँ जाकर पढ़ना सरल भी था। मेधावी छात्रों को कुछ राजा - महाराजा  छात्रवृत्ति प्रदान कर देते थे। धन संपन्न लोगों में विदेश में शिक्षा ग्रहण करना प्रतिष्ठा सूचक था। आजादी के आठ दशक पूरे होने को आ रहे हैं लेकिन अभी भी यदि भारतीय विद्यार्थियों को शिक्षा हेतु विदेश जाना पड़ रहा है तो ये विचारणीय होने के साथ ही शर्म का विषय भी है। धनकुबेरों की संतानें यदि बाहर पढ़ने जाएं तो उसे अस्वाभविक नहीं माना जाना चाहिए किंतु अब तो मध्यम वर्ग में भी कर्ज लेकर बच्चों को विदेश पढ़ने भेजने का चलन बढ़ता जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि उन राजनेताओं की संतानें तक विदेश पढ़ने  जाती हैं जो संसद और विधानसभा में गाँव, गरीब, किसानों, मजदूरों और दलित - पिछड़ों का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं। उनकी औलादों को भी अपनी  इच्छानुसार पढ़ने और भविष्य चुनने का अधिकार है किंतु इससे साबित होता है कि जिन नेताओं पर इस देश में गुणवत्तायुक्त शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की जिम्मेदारी थी उन्होंने अपना दायित्व  सही ढंग से नहीं निभाया। भारत - कैनेडा के बीच चल रही खींचतानी के बीच ही ये सुनने में आया कि यदि भारतीय छात्र वहाँ से लौट आयें तो उस देश के अनेक विश्वविद्यालयों में ताले लटक सकते हैं। कैनेडा, अमेरिका , जर्मनी या ब्रिटेन जैसे देश ही नहीं यूक्रेन तक में हजारों भारतीय छात्र अध्ययनरत थे जिन्हें युद्ध के बीच वापस  लाया गया। लेकिन शर्मिंदगी तब सबसे ज्यादा हुई जब हाल ही में बांग्ला देश में सत्ता पलट के दौरान हुए उपद्रव के कारण मुसीबत में आये भारतीय विद्यार्थियों को सुरक्षित देश बुलाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। इन बातों को केवल संकटकालीन विषय मानकर भूल जाने की बजाय एक सबक के तौर पर ग्रहण करना होगा। दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी और सबसे तेज भागती अर्थव्यवस्था वाले देश के लाखों छात्र सामान्य विषयों की  शिक्षा के लिए सात समंदर पार जाएं ये अटपटा लगता है। उल्टे होना तो ये चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को आकर्षित कर सकें। ये स्थिति कैसे निर्मित होगी ये सोचने और उसके लिए समुचित प्रयास करने का समय आ गया है । मेक इन इंडिया की तरह स्टडी इन इंडिया का नारा बुलंद करना जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 28 October 2024

ईरान और इजरायल में सीधी जंग तीसरे विश्वयुद्ध का पूर्वाभ्यास होगी


बीते सप्ताह इजरायल द्वारा ईरान पर किये गए हवाई हमले  के बाद पूरी दुनिया दहशत में है। स्मरणीय है कुछ समय पहले ईराक ने भी इजरायल पर मिसाइलें दागी थीं। तभी से ये आशंका थी कि नेतन्याहू पलटवार करेंगे। हालांकि इजरायल का जैसा स्वभाव और शैली है उसे देखते हुए जवाबी हमले में काफी समय उसने लगाया। लेकिन उसके बाद ईरान ने भी बदला लेने की बात कही तो इससे दोनों देशों के बीच बड़ी जंग का अंदेशा पैदा हो गया जिसके संभावित परिणामों ने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी। यही वजह है कि    इजरायल के हमले को उसका अधिकार बताने वाले अमेरिका ने ईरान को दोबारा हमला न करने की समझाइश भरी चेतावनी दे डाली। दुनिया की अन्य महाशक्तियाँ भी नहीं चाह रहीं कि ईरान और इजरायल में सीधी लड़ाई हो क्योंकि वैसा होने पर दुनिया की हालत दूबरे में दो असाढ़ जैसी हो जाएगी जो रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से ही परेशान है। सही बात ये है कि रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई है।  विशेष रूप से गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति रुक जाने से  आम जनता त्रस्त है। अमेरिका खुद तो ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर है वहीं  सऊदी अरब के शाही परिवार से अच्छे ताल्लुकात होने से उसे खास फर्क नहीं पड़ा किंतु उसके समर्थक देशों के अलावा बाकी दुनिया हलाकान हो उठी है। ऐसे में यदि ईरान और इजरायल के बीच जंग ने बड़ा रूप लिया तब वह विश्वयुद्ध का पूर्वाभ्यास ही होगा। रूस की तरह ईरान भी कच्चे तेल एवं गैस का बड़ा उत्पादक है। हालांकि अमेरिका ने उस पर काफी पहले से आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं जिनसे भारत भी संकट में आ गया। यदि रूस से सस्ता तेल उपलब्ध नहीं होता तो हमारे यहाँ भी हाहाकार मच जाता। इन सब कारणों से ही पूरी दुनिया ये चाह रही है कि  ईरान और इजरायल  किसी भी कीमत पर सीधी जंग में न उलझें। यद्यपि ईरान हमास और हिज़्बुल्ला जैसे इजरायल विरोधी  इस्लामिक संगठनों का संरक्षक है। ये बात भी सर्वविदित है कि जिस तरह बिना अमेरिकी  समर्थन  और सहायता के इजरायल अपना अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकता वैसे ही हमास और हिज़्बुल्ला की पीठ पर ईरान का हाथ न हो तो वे इजरायल से टकराने की सोच भी नहीं सकते। जहाँ तक बात रूस और यूक्रेन युद्ध की है तो उसका विस्तार वहीं तक सीमित है किंतु  प. एशिया में चल रही जंग में हमास और हिज़्बुल्ला के साथ ईरान ने भी इजरायल के विरुद्ध मोर्चा खोला तब इस्लामिक जगत तो उसकी आग से झुलसेगा ही , कच्चे तेल का आयात करने वाले दुनिया के तमाम देश अभूतपूर्व संकट में फंस जाएंगे। रूस और चीन चूंकि ईरान के साथ हैं इसलिए अमेरिका भी उसके विरुद्ध सीधी कारवाई से बचेगा। वैसे भी अफगानिस्तान में उसके हाथ जिस बुरी तरह झुलसे उसकी जलन अभी तक कम नहीं हुई। यही वजह है कि यूक्रेन को हर तरह की सैन्य और आर्थिक सहायता देने के बावजूद न तो अमेरिका और न ही उसके सहयोगी अन्य किसी देश ने वहाँ अपनी सेनाएं भेजीं। इजरायल और हमास के बीच  युद्ध में हिजबुल्ला के भी शामिल होने के बावजूद अमेरिका या इजरायल के समर्थक अन्य यूरोपीय देशों ने सीधे हस्तक्षेप नहीं किया। इसीलिए अमेरिका ने ईरान को इजरायल पर दोबारा हमला न करने के बारे में चेताया तो अवश्य किंतु ये नहीं कहा कि वैसा नहीं करने पर वह खुद मैदान में उतरेगा। कुल मिलाकर बात ये है कि इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार की वकालत करने वाला अमेरिका इस बात का विरोधी है कि ईरान भी इजरायली हमले का जवाब दे क्योंकि यदि दोनों के बीच हमलों का आदान  - प्रदान जारी रहा तो युद्ध का केंद्र गाज़ा से हटकर ईरान स्थानांतरित हो जायेगा और तब कच्चे तेल के कुए ही नहीं जलेंगे बल्कि पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें भी कमर तोड़कर रख देंगी। लेकिन प्रश्न ये है कि इस आशंका को टालने कौन आगे आयेगा? ये इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि दुनिया धीरे - धीरे ही सही किंतु शीतयुद्ध के पुराने दौर में लौट रही है जिसमें अमेरिका और रूस ( पूर्व सोवियत संघ) रूपी दो महारथियों ने दुनिया को वैचारिक, आर्थिक और सामरिक आधार पर बाँट रखा था। यूक्रेन के साथ रूस ने जंग छेड़कर अमेरिका के बढ़ते प्रभुत्व को ही चुनौती दी थी। भले ही वह यूक्रेन को पराजित नहीं कर पाया किंतु अमेरिकी लाॅबी द्वारा थोपे गए आर्थिक और अन्य प्रतिबंधों के बाद भी वह झुकने को तैयार नहीं है । उसकी वजह से  शीतयुद्ध के दौर जैसा ध्रुवीकरण फिर होता दिखाई दे रहा है। ऐसे में यदि ईरान और इजरायल में सीधे तौर पर लड़ाई छिड़ी तो फिर उसका दुष्प्रभाव बहुत व्यापक और भीषण होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 26 October 2024

मुफ्त योजनाएं आज नहीं तो कल बंद करना ही पड़ेंगी


चुनावी राजनीति जिस तरह से बाजारवादी संस्कृति की चपेट में आ गई है उसे लेकर अब समाज के जिम्मेदार वर्ग में चिंता दिखाई देने लगी है। सबसे रोचक बात ये है कि चुनाव हारने वाली पार्टी विजेता पर आरोप लगाती है कि उसने मतदाताओं को लालच देकर चुनाव जीता। गत वर्ष इन्हीं दिनों म.प्र के विधानसभा चुनाव में सारे सर्वेक्षण कांग्रेस और भाजपा के बीच बराबरी का मुकाबला बता रहे थे। 15 माह की कमलनाथ सरकार को छोड़ दें तो लगभग दो दशक से प्रदेश में भाजपा की सरकार रहने से सामान्य अवधारणा ये थी कि जनता उससे ऊब चुकी है और 2018 की तरह एक बार फिर सत्ता पलट देगी। लेकिन चुनाव के पहले शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना नामक योजना शुरू की और उसका इतना जबरदस्त प्रचार किया कि बाकी सारे मुद्दे  हवा में उड़ गए। हालांकि कांग्रेस भी कर्नाटक और हिमाचल में ऐसी ही गारंटियां देकर भाजपा से  सत्ता छीन चुकी थी और म.प्र में भी  ऐसे ही वायदे कर रही थी किंतु शिवराज सरकार ने चूंकि महिलाओं के खाते में हर माह पैसे जमा करवाना शुरू कर दिया था इसलिए  महिला मतदाताओं ने दिल खोलकर भाजपा को समर्थन देकर उसकी सरकार बनवा दी। लेकिन म.प्र से ज्यादा खैरात बांटने के बाद भी राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार को लोगों ने नकार दिया। सबसे चौंकाने वाला परिणाम आया छत्तीसगढ़ में जहाँ किसी को सपने में भी कांग्रेस सरकार के बाहर होने की उम्मीद नहीं थी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पाँच साल में जो योजनाएं संचालित कीं उनसे भाजपा काफी दबाव में थी । लगभग सभी चुनाव विशेषज्ञ मान रहे थे कि इस राज्य में कांग्रेस वापसी करेगी किंतु जब परिणाम आये तो सब आश्चर्यचकित रह गए। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मतदाताओं ने कांग्रेस की पाँच साल पुरानी सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं के बाद भी उसे बदल दिया जबकि म.प्र में लगभग दो  दशक से सत्ता में जमी भाजपा को एक मौका और दे दिया। यही नजारा हाल में हरियाणा में देखने मिला जहाँ पहलवान, किसान और जवान जैसे मुद्दों से भाजपा की 10 साल से चली आ रही सरकार पर खतरे के बादल मंडरा रहे थे। लेकिन जनता ने कांग्रेस की गारंटियों को ठुकराते हुए भाजपा को स्पष्ट बहुमत दे दिया। बीते लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने महिलाओं और बेरोजगारों के खाते में हर माह हजारों रुपये जमा करने का वायदा किया जिसे खटाखट बोलकर प्रचारित किया किंतु उसका उतना असर नहीं हुआ जितना  संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के प्रचार का। उ.प्र और महाराष्ट्र में भाजपा को इन मुद्दों ने जबरदस्त नुकसान पहुंचाया किंतु कांग्रेस शासित कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में भाजपा उससे आगे रही। इसके अलावा प. बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों के सामने भाजपा असरहीन साबित हुई किंतु उड़ीसा में उसने नवीन पटनायक के अभेद्य समझे जाने वाले गढ़ को ध्वस्त कर दिया। इस सबसे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश की राजनीति में कोई एक मुद्दा या फॉर्मूला  चुनाव जिताने में कारगर नहीं होता और हर राज्य में अलग - अलग समीकरण काम करते हैं। राममंदिर के शुभारंभ के बावजूद लोकसभा चुनाव में उ.प्र में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन ने सबको चौंका दिया। इसी तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के बाद भी भाजपा  लगातार सातों सीटें जीत गई। इससे यही समझा जा सकता है कि मुफ्त उपहारों के वायदे और जाति समीकरण हर जगह काम नहीं आते। जो भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर हिमाचल, दिल्ली, म.प्र , गुजरात और छत्तीसगढ़ में  लोकसभा चुनाव में विपक्ष को चारों खाने चित्त कर देती है वह प. बंगाल और तमिलनाडु में  करिश्मा नहीं दिखा पाई। राजस्थान और महाराष्ट्र में सत्ता होते हुए भी उसे नुकसान हुआ।  ऐसे में मुफ्त खैरात कितनी प्रभावशाली है इस पर विचार करने का समय आ गया है। केंद्र सरकार करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज और मकान बनाकर देने के बावजूद उ.प्र में आधी से ज्यादा सीटें हार जाती है। महाराष्ट्र विधानसभा के आगामी चुनाव में शिंदे सरकार के विरुद्ध विपक्ष की मजबूत मोर्चेबन्दी के बावजूद लाड़ली बहना जैसी योजना शुरू होने से बाजी फिर सत्ता पक्ष की तरफ झुकने की चर्चा होने लगी जबकि लोकसभा चुनाव में महा विकास अघाड़ी को भारी सफलता मिली थी। ये देखते हुए राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए कि मुफ्त योजनाओं से परहेज करते हुए ऐसे मुद्दों पर चुनाव लड़ें जिनसे खजाने में शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन  कानून व्यवस्था और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों के लिए धन बचे। वर्तमान स्थिति में सभी राज्य कर्ज के बोझ से दबते जा रहे हैं। हिमाचल और कर्नाटक में सरकार चुनावी वायदे पूरे नहीं कर पा रही और बाकी की राज्य सरकारें हर महीने कर्ज ले रही हैं। बेहतर हो इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठे क्योंकि अंततः इसका बोझ जनता पर ही पड़ेगा और आज नहीं तो कल इस मुफ्तखोरी को बंद करना ही पड़ेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 25 October 2024

सैनिक भले ही पीछे हटा ले लेकिन चीन पर भरोसा करना आत्मघाती होगा


इसे दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे वार्ताओं के दौर का फलितार्थ कहें या रूस में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच होने वाली बातचीत के पहले रिश्तों में आई कड़वाहट दूर करने की कूटनीतिक पहल, ये तय कर पाना मुश्किल है। असल में  चीनियों के चेहरे की जो  बनावट है उसके कारण उनके मनोभाव पढ़ पाना बेहद कठिन होता है। ताजा समझौते के अनुसार दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख़ के डेमचोक और देपसांग इलाके से अपने सैनिक पीछे हटाना शुरू कर दिया है। इसके अंतर्गत टेंट, शेड और सैन्य वाहन आदि हटाने की कारवाई हो रही है। 2020 में  गलवान घाटी में हुई फौजी झड़प के बाद पूरे लद्दाख़ क्षेत्र में युद्ध की स्थिति बनी हुई थी। भारत ने समूचे क्षेत्र में वायुसेना के साथ मिसाइलों की भी तैनाती कर दी। इसके अलावा बड़े पैमाने पर सड़कें और पुल वगैरह विकसित कर दिये गए। इसका प्रभाव ये हुआ कि चीन की तरफ से की जाने वाली घुसपैठ नियंत्रित हो गई। गलवान में हुई झड़प में भारत के एक कर्नल की शहादत हो गई थी। लेकिन जवाबी कारवाई में चीन के सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए जिसे वह छिपाता रहा। चूंकि उस समय कोरोना का प्रकोप था इसलिए चीन को लगा कि उस निर्जन इलाके में वह अपना कब्जा जमा लेगा। दरअसल सीमा का निर्धारण नहीं होने की वजह से लद्दाख़ के बड़े इलाके में दोनों देशों की सेनाएं गश्त करती रहती हैं। अतीत में हुए समझौते के अंतर्गत  तनाव की स्थिति में किसी भी ओर  से गोली नहीं चलाई जाएगी। गलवान घाटी में हुई झड़प में दोनों पक्षों ने एक दूसरे  के साथ हाथापाई की। बंदूकों को लाठी की तरह इस्तेमाल तो किया किंतु गोली न चलाने के करार का उल्लंघन नहीं हुआ। उसके बाद से दोनों  के बीच सैन्य स्तर की बातचीत जारी रही और अनेक क्षेत्रों से सैनिक पीछे हटा लिए गए। ताजा समझौते के बाद 2020 वाली स्थिति बहाल होगी और दोनों देश निर्जन इलाके में बारी - बारी से पेट्रोलिंग कर सकेंगे जिसके पहले दूसरे पक्ष को सूचित करना होगा। जिनपिंग और श्री मोदी के बीच रूस में हुई बातचीत का ब्यौरा तो सामने नहीं आया किंतु ऐसा लगता है वह दुआ - सलाम तक सीमित रही। ये भी कहा जा सकता है कि ब्रिक्स सम्मेलन को सफल साबित करने के लिए रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने दोनों नेताओं की बातचीत के लिए जमीन तैयार की हो क्योंकि इससे अमेरिका की चिंता बढ़ेगी। वैसे भी वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका भारत के प्रति जिस तरह का दोहरा रवैया दिखा रहा है उसमें  हमारे लिए भी कूटनीतिक स्तर पर पैंतरेबाजी करनी जरूरी है। विशेष रूप से बांग्लादेश में हुए सत्ता पलट में अमेरिका की भूमिका में भारत का विरोध साफ झलकता है। लेकिन समस्या ये है कि चीन से भी किसी सदाशयता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वह हमारा जन्मजात शत्रु है। उसके साथ चला आ रहा सीमा विवाद लाइलाज मर्ज बन गया है। भारत के पड़ोसी देशों को उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया है। नेपाल, मालदीव और श्रीलंका में वामपंथी सत्ता आने के बाद बांग्लादेश में भी भारत विरोधी सरकार बन गई। पाकिस्तान से तो हमारी जन्मजात शत्रुता है। अरुणाचल और सिक्किम के साथ ही चीन की नजर भूटान पर भी है। ये बात तो पूरी तरह सही है कि वह भारत के साथ  सीधे युद्ध से बचता रहा है।   गलवान घाटी में किये दुस्साहस का उसे जो जवाब मिला उसके बाद वह समझ गया कि भारत अब 1962 वाला  देश नहीं है। उसके पास हर वो सैन्य क्षमता है जिससे वह चीन को माकूल जवाब दे सकता है। चीन के पास बड़ी सेना जरूर है किंतु सीमाओं की  भौगोलिक स्थिति देखते हुए भारतीय सेना भारी पड़ती है। सही बात ये है कि उसकी फितरत अपने पड़ोसियों को परेशान करने की है ।  इसलिए ये मान लेना भूल होगी कि पूर्वी लद्दाख़ से सैनिक हटाने के बाद उसकी नीयत बदल जाएगी। हालांकि भारत भी इस बात को जान गया है और इसीलिए गलवान विवाद के बाद से ही उसने कड़ा रुख अपनाया। सैन्य स्तर पर हमारी तैयारियां देखकर ही वह बातचीत के लिए रजामंद हुआ और  जिस तरह की ऐंठ दिखाता था उसमें कमी आई। लेकिन विवादित क्षेत्रों से दोनों देशों के सैनिकों के पीछे हटने के  बाद भी भारत को चौकन्ना रहना होगा क्योंकि चीन और धोखेबाजी एक दूसरे के पर्याय हैं। उसके  द्वारा जो नरमी समय - समय पर दिखाई जाती है उसके पीछे भारत के साथ उसका व्यापार है। इसीलिए वह सीधी टक्कर से भले बचता हो किंतु अप्रत्यक्ष रूप से वह भारत विरोधी गतिविधियों को संरक्षण देने में तनिक भी संकोच नहीं करता। संरासंघ में पाकिस्तान का समर्थन इसका प्रमाण है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 24 October 2024

ब्रिक्स संगठन अमेरिकी प्रभुत्व के लिए बड़ी चुनौती

सरे महायुद्ध के बाद  दुनिया दो धड़ों में बंट गई थी। एक का नेतृत्व अमेरिका तो दूसरे का सोवियत संघ के पास था। इनसे अलग  गुट निरपेक्ष देशों का भी एक संगठन बना जिसमें भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया और इंडोनेशिया आदि थे। हालांकि इनका झुकाव कुछ - कुछ सोवियत संघ की तरफ दिखाई देता था। चीन लंबे समय तक विश्व बिरादरी से अलग - थलग रहा। लेकिन 1972 में सं.रा.संघ में प्रवेश  और सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने के बाद संतुलन बदलने लगा। अमेरिका और सोवियत संघ का दबदबा मुख्य रूप से परमाणु शक्ति संपन्न होने के साथ ही अंतरिक्ष के क्षेत्र में  बढ़ते कदम थे। लेकिन चीन ने जल्द ही अपनी उपस्थिति एक महाशक्ति के तौर पर महसूस करवा दी। माओ युग में बने लौह आवरण से बाहर निकलकर उसने अपने दरवाजे पूंजी निवेशकों के लिए खोल दिये।  1991 में सोवियत संघ बिखर गया और उसके मुख्य घटक रूस की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय होने का लाभ चीन को मिला। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि 21 वीं सदी के पहले दो दशक चीन के नाम लिखे जा सकते हैं। लेकिन इस  दौरान रूस ने फिर पाँव जमाये और अमेरिका को चुनौती देने के लिए कूटनीतिक पहल की। ब्रिक्स नामक संगठन उसी का परिणाम है जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। यद्यपि इस संगठन के गठन के पीछे शीतयुद्ध जैसी कोई भावना नहीं थी किंतु उसमें शामिल सभी देश वैश्विक अर्थव्यस्था में तेजी से उभर रहे थे। उदारीकरण की जो बयार 20 वीं सदी के अंतिम दौर में बही उसने साम्यवाद को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। यहाँ तक कि चीन  उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादन का गढ़ बन गया जिन्हें वह अमेरिकी पूंजीवाद का एजेंट मानकर त्याज्य समझता था। इसी के साथ बीते दो दशकों में भारत भी दुनिया की महाशक्ति के रूप में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गया । ये अवधारणा भी प्रबल होने लगी कि वह जल्द ही चीन को पीछे छोड़ सकता है। कोरोना के बाद दुनिया में आये बदलाव ने ब्रिक्स जैसे संगठन का महत्व बढ़ा  दिया। हालांकि जी -8 और जी-20 आदि भी वैश्विक परिदृश्य को प्रभावित करते हैं किंतु  उनमें शामिल ज्यादातार देश अमेरिकी प्रभाव वाले हैं। वहीं ब्रिक्स की खास बात ये है कि इसके मुख्य सदस्य रूस, चीन और भारत अमेरिका के दबाव से बाहर हैं और आर्थिक, सामरिक और तकनीकी दृष्टि से पश्चिम के संपन्न देशों से टक्कर ले रहे हैं। यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध ने एक बार फिर पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। इसके बाद इजरायल और हमास के बीच शुरू हुई जंग का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। इन दोनों युद्धों का रोचक पहलू ये है कि यूक्रेन - रूस के बीच चल रही लड़ाई में चीन और भारत ने तटस्थ रुख अपनाकर एक तरह से अमेरिका को ठेंगा दिखा दिया जिसने रूस पर प्रतिबंध लगवा दिये। वहीं इजरायल और हमास के झगड़े में रूस और चीन इजरायल विरोधी हैं किंतु भारत उसके साथ खड़ा है। बावजूद उसके ब्रिक्स में ये तीनों एकजुट हैं। रूस में संपन्न ब्रिक्स की हालिया बैठक मौजूदा हालात में बेहद महत्वपूर्ण रही। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात  हुई वह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ब्रिक्स देशों की साझा मुद्रा शुरू करना। हालांकि ये बहुत ही चुनौती भरा कदम होगा क्योंकि यूरोपीय यूनियन के देशों द्वारा संचालित यूरो नामक मुद्रा भी डॉलर के दबदबे को कम नहीं कर सकी। ये भी सही है कि मौजूदा स्थिति में रूस को ऐसी मुद्रा की ज्यादा जरूरत है किंतु चीन,भारत , दक्षिण अफ्रीका और  ब्राज़ील भी इससे जुड़ेंगे तो उसकी वजनदारी दुनिया के मुद्रा बाजार में बढ़ जाएगी। भारत की  इस संगठन में सक्रिय भूमिका निश्चित रूप से अमेरिका को रास नहीं आ रही किंतु बीते कुछ समय से वह जिस तरह से भारत को दबाने का प्रयास कर रहा है उसे देखते हुए दूसरे विकल्प खुले रखना जरूरी है। रूस में ब्रिक्स का जो सम्मेलन संपन्न हुआ उसका समय बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि एक तो दुनिया में दो बड़ी लड़ाईयां लंबे समय से चल रही हैं दूसरा अमेरिका में अगले माह राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं जिसके बाद इजरायल और ईरान के बीच सीधी जंग होने की आशंका है। ब्रिक्स बैठक में नरेंद्र मोदी और  जिनपिंग के बीच हुई वार्ता से हालांकि  कुछ बड़ा फायदा तो नहीं हुआ किंतु कूटनीति कब कौन सी करवट ले ले ये कहना मुश्किल है। फिर भी भारत के लिए ये अच्छा है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उसे सम्मानजनक स्थान प्राप्त होने लगा है। रूस और चीन के साथ ब्रिक्स में उसकी भागीदारी के बावजूद अमेरिका उसे रोकने की हिम्मत नहीं कर पा रहा जो साधारण बात नहीं है। राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कूटनीति का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करने के लिए भारत सरकार प्रशंसा की हकदार है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी