Monday, 13 January 2025

महाकुंभ : सनातन धर्म रूपी वट वृक्ष का विराट स्वरूप

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प्रयागराज में गंगा - यमुना के पवित्र संगम पर आयोजित महाकुंभ आज से प्रारंभ हो गया। पहले दिन ही 1 करोड़ श्रद्धालु पुण्य लाभ हेतु पहुँचे जिनमें अनेक देशों से आये लोग भी हैं। खगोलीय दृष्टिकोण से  ग्रहों की वर्तमान  स्थिति 144 वर्षों बाद बनी जिसकी वजह से इस बार का कुम्भ विशेष माना जा रहा है। उ.प्र सरकार द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार लगभग सवा महीने चलने वाले इस आयोजन में 60 करोड़ लोगों के प्रयागराज पहुँचने की उम्मीद है। ठहरने के इंतजाम हर आर्थिक स्थिति के श्रद्धालुओं की क्षमतानुसार किये गए हैं। साधु, संन्यासियों और धर्मगुरुओं द्वारा संचालित अन्न क्षेत्र में प्रतिदिन लाखों लोगों को निःशुल्क भोजन प्रदान किया जावेगा । अनेक धार्मिक संस्थाएं एवं दानदाता भी श्रद्धालुओं के भोजन और आवास की व्यवस्था कर रहे हैं। समूचे मेला क्षेत्र की व्यवस्था इस तरह की गई है जिससे विशेष स्नान वाले दिनों में   करोड़ों लोगों के जमा होने पर भी किसी प्रकार की समस्या न खड़ी हो। उ.प्र की पुलिस और प्रशासन के लिए महाकुंभ बड़ी चुनौती है। देश से ही नहीं अपितु पूरी दुनिया से सनातन धर्म में आस्था रखने वाले  प्रयागराज में पुण्य स्नान हेतु आयेंगे । लेकिन उनके अलावा विभिन्न देशों के लाखों लोग महाकुंभ की भव्यता, भारत की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता का प्रत्यक्ष दर्शन करने पहुंचेंगे।   दुनियाँ भर के प्रबंधन संस्थानों के शोधार्थी महाकुंभ की व्यवस्था का अध्ययन करने आ चुके हैं। पूरे विश्व के समाचार माध्यम प्रयागराज में डेरा जमाए हुए हैं। महाकुंभ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके साथ जुड़े पौराणिक प्रसंग से अलग हटकर देखें तो भी यह आयोजन भारत की एकता और सनातन धर्म के प्रति जनमानस में आस्था का जीवंत प्रमाण है।  भाषा, प्रांत और जीवन शैली की विभिन्नताएं यहाँ आकर  वैसे ही विलुप्त हो जाती हैं जैसे गंगा - यमुना में आकर मिलने वाली  सरस्वती नदी अदृश्य है। यद्यपि कुछ लोग महाकुंभ को लेकर भी अपनी नकारात्मक सोच का परिचय देने से बाज नहीं आ रहे। भीम आर्मी के संस्थापक सांसद चंद्रशेखर आजाद का कहना है जिसने पाप किये हों वे महाकुंभ में डुबकी लगाने जाएं। कुंठित प्रवृत्ति के कुछ सनातन विरोधियों ने साधु - संतों के बारे में अनर्गल बातें प्रचारित करने की मुहिम छेड़ रखी है। भारत की प्राचीनता और आध्यात्मिक विचारधारा को कपोल -  कल्पित मानने वाले पूर्वाग्रही भी अपनी कुंठा निकालने में जुटे हुए हैं। जिन लोगों को हिन्दू और हिंदुत्व शब्द से ही चिढ़ है वे महाकुंभ के चलते चैन से नहीं सो सकेंगे क्योंकि बीते कुछ वर्षों में सनातन संस्कृति के प्रति आस्था में जो वृद्धि हुई उसके परिणामस्वरूप हिंदुत्व  केंद्र में आ गया है। ये कहना भी गलत नहीं है कि राजनीति हिंदुत्व समर्थक और विरोधी नामक दो ध्रुवों में बंट गई है। हालांकि सनातन और हिंदुत्व भारत की आत्मा हैं किंतु विगत तीन दशकों में जो स्वस्फूर्त उत्साह हिंदुत्व को लेकर देखने मिला वह 21 वीं सदी में भारत के स्वर्णिम भविष्य का शंखनाद है। हिन्दू समाज को जातियों के नाम पर विभाजित कर अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने वाली ताकतों को महाकुंभ आकर देखना  चाहिए कि सनातन संस्कृति हिन्दू समाज को किस तरह एकजुट रखने में सक्षम है। इस विराट समागम में  ऊंच - नीच, अगड़ा - पिछड़ा, अमीर - गरीब जैसे संबोधन गुम होकर रह जाते हैं। देश के कोने - कोने में भारत की आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत रखने में जुटे असंख्य साधु, संत, पंडित, पुरोहित, महंत, महामंडलेश्वर और जगद्गुरु के पद पर विराजमान विभूतियों का महाकुंभ में एकत्रीकरण सनातन धर्म रूपी वट वृक्ष के विराट स्वरूप को समूचे विश्व के समक्ष प्रस्तुत करता है। धर्म संसद के जरिये सनातन धर्म के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने की कार्य योजना भी महाकुंभ में तय की जाती है। इस वर्ष का महाकुंभ अनेक विशिष्टताओं को अपने आप में समेटे हुए है। वैश्विक परिस्थितियों में आ रहे तेज बदलाव और उनमें भारत की सक्रिय भूमिका के कारण पूरे विश्व में भारत के प्रति सम्मान बढ़ा है। दुनिया के हर हिस्से में भारतीय समुदाय की प्रभावशाली उपस्थिति उत्साहित करने वाली है। महाकुंभ में अप्रवासी भारतवंशी बड़ी संख्या में आने वाले हैं। उनके साथ वे बच्चे भी इसकी भव्यता का दर्शन करेंगे जिनका जन्म और परवरिश वहीं के माहौल में हुई। भारत को सपेरों और मदारियों का देश प्रचारित किये जाने वाले दिन अतीत की गर्त में समा चुके हैं। यह महाकुंभ 21 वीं सदी के उस भारत  से साक्षात्कार करवाएगा जो आधुनिक ज्ञान - विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने के साथ ही अपनी मौलिकता से जुड़ा हुआ है और जिसको अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत पर गर्व है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 January 2025

विपक्षी एकता में दरार का ठीकरा राहुल पर फूट रहा

लोकसभा चुनाव के पूर्व जब नये  विपक्षी गठबंधन की शुरुआत हुई तब कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के सुझाव पर उसका नाम Indian National Developmental Inclusive Alliance  रखा गया जो  इंडिया नाम से प्रचलित हुआ। गठबंधन में 26 दलों के शामिल होने से  लगा कि वह नरेंद्र मोदी को तीसरी पारी खेलने से रोकने में कामयाब हो जायेगा किंतु पूरी ताकत लगाने के बाद भी वह श्री मोदी को न रोक सका। यद्यपि उनकी जीत में 2014 और 2019 वाली चमक नहीं थी।  400 पार का नारा 300 से नीचे अटक गया। भाजपा भी घटकर 240 पर आ गई। उस परिणाम ने विपक्ष के हौसले बुलंद कर दिये। उसकी आक्रामकता में जबरदस्त वृद्धि देखने मिली। मोदी सरकार के जल्द गिरने के दावे होने लगे। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने से श्री गाँधी  प्रधानमंत्री पर और तीखे हमले करने लगे। वहीं भाजपा पूरी तरह रक्षात्मक दिखने लगी। लोकसभा चुनाव के  परिणाम उसकी समझ से बाहर थे।  चंद्रा बाबू नायडू और नीतीश कुमार के समर्थन से सरकार तो बन गई किंतु  इंडिया गठबन्धन एक बड़ी ताकत के रूप में खड़ा हो गया। संसद में भाजपा के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल लगने लगा। वक्फ संशोधन और एक देश एक चुनाव जैसे विधेयक इसीलिए संयुक्त संसदीय समिति को भेजने पड़े। अदाणी और संविधान के मुद्दे पर कांग्रेस सरकार पर हावी रही।  इसी बीच जम्मू -  कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के चुनाव आ गए। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित विपक्ष दोनों में जीत के प्रति आश्वस्त था। लेकिन भाजपा ने जहाँ जम्मू - कश्मीर में अपनी संख्या  कई गुना बढ़ाई वहीं हरियाणा में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए तीसरी बार सरकार बनाने का कीर्तिमान स्थापित किया। कांग्रेस के लिए ये बहुत बड़ा झटका था क्योंकि जम्मू - कश्मीर में वह कुछ खास न कर सकी और हरियाणा में  बुरी तरह चित्त हो गई। इन नतीजों से इंडिया गठबंधन में दरार उत्पन्न होने लगी।  राहुल की क्षमता पर सवाल उठने लगे किंतु महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव सामने होने से मतभेदों पर पर्दा डालकर रखा गया। झारखंड में तो हेमंत सोरेन सरकार बचा ले गए किंतु महाराष्ट्र में भाजपा ने तो धमाकेदार प्रदर्शन किया ही उसकी सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) और एनसीपी ( अजीत) ने भी जबरदस्त कामयाबी हासिल कर विपक्षी गठबंधन की कमर तोड़कर रख दी। इस परिणाम ने एक साथ  राहुल, शरद पवार और उद्धव ठाकरे को जोरदार चोट पहुंचाई। लेकिन ठीकरा फूटने लगा श्री गाँधी के सिर पर। ममता बैनर्जी ने नेतृत्व परिवर्तन की आवाज उठा दी जिसे शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और लालू यादव का समर्थन मिलने से  गठबंधन की एकता पर खतरा मंडराने लगा। इसी बीच दिल्ली के चुनाव आ गए जिसमें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच तलवारें खिंचने से रही - सही कसर भी पूरी हो गई। ममता, अखिलेश और उद्धव ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर राहुल  के विरुद्ध खुली बगावत का संदेश दे दिया।  उधर उमर अब्दुल्ला ने इंडिया गठबंधन के निष्क्रिय होने की बात कहते हुए लोकसभा चुनाव के बाद उसकी बैठक न होने का मुद्दा छेड़ दिया। उनकी बात को उद्धव के दाहिने हाथ संजय राउत ने आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस को आगाह किया कि यही हालत रही तो गठबंधन  की इतिश्री हो जायेगी और दोबारा उसका गठन नामुमकिन होगा। चौंकाने वाली बात ये है कि जो  राहुल गाँधी गठबंधन के घटक दलों के निशाने पर हैं उनका कोई अता - पता नहीं है। 2024 खत्म होने के पहले ही वे नववर्ष मनाने विदेश चले गए। वे लौटे या नहीं इसकी कोई जानकारी किसी के पास नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपनी मर्जी से कुछ बोलने की हैसियत नहीं रखते। सोनिया गाँधी अस्वस्थता के कारण परिदृश्य से बाहर होती जा रही हैं। चूँकि श्री गाँधी ही कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं इसलिये सारे निर्णय और अपेक्षाएं उन्हीं पर केंद्रित हैं। दिल्ली चुनाव की शुरुआत में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के विरुद्ध जो तीखे तेवर दिखाये वे अचानक ठंडे पड़ने लगे। कहा जा रहा है इसके पीछे राहुल का ही हाथ है क्योंकि उनको डर है कि अरविंद केजरीवाल कहीं गाँधी परिवार के विरुद्ध मोर्चा न खोल दें। लेकिन न सिर्फ इंडिया गठबंधन में शामिल अनेक पार्टियां अपितु कांग्रेस के भीतर भी श्री गाँधी की उदासीनता को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी कहने लगे हैं कि उनसे तो सोनिया जी  बेहतर थी जिन्होंने लंबे समय तक यूपीए को एकजुट रखा। ये बात कई विपक्षी नेता कह चुके हैं कि इंडिया गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव तक ही था लेकिन न तो श्री गाँधी और न ही कांग्रेस का कोई नेता समूचे विवाद में प्रतिक्रिया दे रहा है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि गठबंधन का नामकरण करने वाले राहुल ही उसके विघटन के कारण बन रहे हैं और  विपक्षी एकता का यह प्रयोग भी विफल होने के कगार पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 10 January 2025

लॉस एंजिलिस की आग हमारे लिए चेतावनी


1974 में टावरिंग इन्फर्नो  नामक अमेरिकी  फिल्म ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। जॉन गुइलेरमिन द्वारा निर्देशित उस फिल्म के निर्माता  इरविन एलन थे। एक गगनचुंबी बहुमंजिला इमारत में आग लगने के बाद किये गए बचाव कार्यों का बड़ा ही रोमांचित करने वाला चित्रण उस फिल्म में था। तकनीक के बेहतरीन प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हालीवुड की वह फिल्म ढेर सारे ऑस्कर अवार्ड जीतकर कालजयी बन गई। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए वह फिल्म एक मार्गदर्शक कहलाई। उससे प्रेरित होकर अनेक देशों में आपदा आधारित फिल्में बनीं जिनमें भारत की बर्निंग ट्रेन भी थी। हालांकि दर्शकों को आकर्षित करने के लिए ऐसी फिल्मों में भी नाटकीयता भरी जाती है किंतु देखने में आया है कि अक्सर  पथकथा लेखक की काल्पनिकता कालांतर में वास्तविकता बन जाती है । विगत कुछ दिनों से अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य के लॉस एंजिलिस शहर और उसके इर्द - गिर्द लगी भीषण आग ने अग्निकांड आधारित कहानियों को  वास्तविकता में बदल दिया है। आग की लपटें हालीवुड के फिल्मी क्षेत्र तक जा पहुंची हैं। लॉस एंजिलिस अमेरिका के बेहद महंगे शहरों में गिना जाता है। फिल्मी सितारों के अलावा तमाम धनकुबेर इस शहर में रहते हैं। अमेरिका की वर्तमान उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का निवास भी यहीं है। आग जिस तरह फैल रही है उसकी वजह से अनेक नामी - गिरामी फिल्मी सितारों तथा अन्य हस्तियों के महलनुमा घर जलकर राख हो गए। आग बुझाने के लिए हेलीकाप्टर और अन्य अग्नि शमन साधनों का उपयोग किया जा रहा है किंतु उसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। हालात बेकाबू हो चुके हैं। जिन संस्थानों के जिम्मे आग बुझाने का दायित्व है वे संसाधनों के अभाव का रोना रो रहे हैं। 10 दिन बाद राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने जा रहे डोनाल्ड ट्रम्प ने निवर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन पर इसका ठीकरा फोड़ते हुए आपदा प्रबंधन की दयनीय स्थिति का पर्दाफाश किया। साथ ही कैलीफोर्निया राज्य के गवर्नर पर भी गुस्सा व्यक्त किया है। स्मरणीय है अमेरिका का यह राज्य निकटवर्ती जंगलों में लगने वाली आग के कारण लंबे समय से परेशानी झेल रहा है।  जंगलों में पतझड़ के बाद सूखे पत्तों में आग से उठने वाला धुंआ शहरों के आसमान में फैलकर वातावरण को प्रदूषित करता है लेकिन इस बार बात धुएं से आगे बढ़कर आग तक जा पहुंची जिसके कारण हजारों मकान भस्म हो चुके हैं। लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। आग जिस तरह फैलती जा रही है उसे देखकर अग्नि शमन के काम में लगीं एजेंसियां असहाय नजर आ रही  हैं। ये दशा उस देश की है जो विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्ति है। तकनीक के मामले में भी वह दुनिया का सिरमौर है। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के सामने उसकी लाचारी समय - समय पर उजागर होती रही है। कभी समुद्री चक्रवात उसके तटवर्ती शहरों में जल प्रलय के हालात पैदा कर देते हैं तो कभी बर्फबारी से जनजीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। ये देश दुनिया भर को तकनीक निर्यात करता है। इसे अपनी साधन संपन्नता पर बड़ा घमंड है। भारत सहित विकासशील  देशों के युवाओं का सपना अमेरिका में बसने का होता है। वहाँ की सुरक्षित और  सुविधा संपन्न  जीवन शैली आकर्षण का प्रमुख कारण है। लेकिन लॉस एंजिलिस का ताजा अग्निकांड साबित कर रहा है कि ज्ञान - विज्ञान के अनंत आकाश छू लेने के बाद भी प्रकृति के कोप से बचने की सामर्थ्य  इंसान पैदा नहीं कर सका। भारत को  अमेरिका में आई इस आपदा से सतर्क होकर अपने आपदा प्रबंधों को दुरुस्त करने  की सख्त जरूरत है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में अनेक अग्निकांड ऐसे हुए जिनका सामना करने वाली व्यवस्था अपर्याप्त भी थी और घटिया भी। कुछ अस्पतालों में लगी आग में घिरकर वहाँ भर्ती अनेक मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ा जिनमें बच्चे भी काफी थे। जाँच में पाया गया कि आग बुझाने हेतु की गई व्यवस्था समय पर धोख़ा दे गई। म.प्र की राजधानी भोपाल स्थित सचिवालय भवन में लगी आग को बमुश्किल बुझाया गया वह भी सेना की मदद से। ये देखते हुए भारत में आपदा प्रबन्धन की जो भी व्यवस्थाएं हैं उनकी समीक्षा आवश्यक है। हमारे देश के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में आग से प्रतिवर्ष करोड़ों की वन संपदा की क्षति के साथ ही वन्य प्राणियों की भी मौत होती है। ऐसी आग को रोकने में संबंधित महकमा कितना सफल होता है ये किसी से छिपा नहीं है। अमेरिका में बनी टावरिंग इन्फर्नो नामक फिल्म तो कल्पना पर आधारित थी किंतु लॉस एंजिलिस में लगी आग हकीकत है जिससे सबक लेना भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि जब अमेरिका उस आपदा के सामने असहाय है तब हम अपनी स्थिति का आकलन आसानी से कर सकते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 9 January 2025

कांग्रेस मुक्त विपक्ष की संभावना बढ़ रही


कांग्रेस की इससे ज्यादा किरकिरी और क्या होगी कि जो  इंडिया गठबंधन उसकी अगुआई में बना और लोकसभा चुनाव में जिसके कारण भाजपा अपने बलबूते  स्पष्ट बहुमत हासिल करने से वंचित रह गई उसी के घटक उसको ठेंगा दिखाने लगे हैं। महाराष्ट्र में  जबरदस्त पराजय के बाद गठबंधन के नेतृत्व परिवर्तन की मांग को  कांग्रेस ने जिस प्रकार उपेक्षित किया उसका असर गत दिवस दिखाई दिया जब  ममता बैनर्जी ,  अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में  आम आदमी पार्टी का समर्थन करने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि भाजपा को वही हरा सकती है। कांग्रेस नेता अशोक गहलोत के ये कहने पर कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी कांग्रेस की विरोधी है, प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अरविंद केजरीवाल ने अपना ये आरोप दोहराया कि कांग्रेस का भाजपा से गुप्त गठजोड़ है इसीलिए वह भाजपा की बजाय आम आदमी पार्टी को अपना विरोधी बता रही है। उधर लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के नेता तेजस्वी ने इंडिया गठबंधन के बिखरने संबंधी सवाल पर कहा कि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं क्योंकि वह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए ही बना था। वैसे भी उसमें दरार तो हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान ही आ गई थी जब कांग्रेस ने सपा और आम आदमी पार्टी का लिए एक भी सीट छोड़ने से दो टूक इंकार कर दिया।  लोकसभा चुनाव में 10 में से 5 सीटें जीतने से वह आत्मविश्वास  से भरी थी  किंतु  उसके मंसूबे धरे रह गए और भाजपा ने तीसरी बार सरकार बना ली । उस परिणाम पर अखिलेश और उद्धव की शिवसेना ने खुलकर कहा कि कांग्रेस अपने बलबूते चुनाव जीतने की क्षमता खो चुकी है। यद्यपि महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन कायम रहा किंतु परिणाम आते ही कांग्रेस पर फिर हमले शुरू हो गए। लेकिन इस बार निशाना बने राहुल गाँधी जो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद गठबंधन के स्वयंभू नेता बन बैठे थे। ममता बैनर्जी तो श्री गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर शुरू से ही सवाल उठाती आ रही थीं किंतु अखिलेश और उद्धव के बाद जब लालू ने भी उनका समर्थन कर दिया तब कांग्रेस को सतर्क हो जाना चाहिए था जबकि वह  नेतृत्व संबंधी अपने दावे के औचित्य को सिद्ध करने में ही लगी रही। यदि राहुल उक्त नेताओं से बात करते तब उनका गुस्सा ठंडा हो सकता था किंतु वे अदाणी के मुद्दे से ही चिपके रहे जिससे ज्यादातर विपक्षी दल किनारा कर चुके हैं। महाराष्ट्र चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाई जाती तब भी काफी विवाद सुलझाये जा सकते थे किंतु श्री गाँधी ने कोई पहल नहीं की। उनका ग़ैर जिम्मेदाराना रवैया जम्मू कश्मीर के चुनाव में ही दिख गया था जिसकी उनके सहयोगी उमर अब्दुल्ला ने बीच चुनाव ही आलोचना कर डाली। महाराष्ट्र चुनाव में भी वे ज्यादा सक्रिय  नहीं  रहे और  पूरा जोर वायनाड में प्रियंका वाड्रा को जितवाने में लगाया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी निश्चित रूप से बड़ी क्षेत्रीय शक्ति है। ऐसे में कांग्रेस को गठबंधन धर्म का पालन करते हुए ठीक उसी तरह उसका नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए था जिसकी अपेक्षा वह अपने प्रभाव वाले राज्यों में गठबंधन के अन्य दलों से करती है। बहरहाल दिल्ली के चुनाव में ममता, अखिलेश और उद्धव  द्वारा आम आदमी पार्टी का खुलकर समर्थन करने पर कहा जा सकता है कि  इंडिया गठबंधन के समाप्त होने के दिन आ गए। यदि उसका अस्तित्व बना  रहा तब भी  उस पर कांग्रेस का प्रभुत्व  संभव नहीं होगा। इसके लिए दोषी श्री गाँधी ही माने जायेंगे जो  राजपरिवार की मानसिकता से बाहर ही नहीं निकल पा रहे। इंडिया गठबंधन में एक - दो को छोड़कर बाकी के नेताओं की जमीन उनकी बनाई हुई है। ममता , लालू, केजरीवाल की ताकत के पीछे उनकी मेहनत है। अखिलेश भले ही पिता की  वजह से आगे आये लेकिन उनके न रहने के बावजूद अपना प्रभाव बनाये हुए हैं।  इस सबसे लगता है कांग्रेस मुक्त  विपक्ष की स्थिति बन सकती है। आम आदमी पार्टी द्वारा कांग्रेस को इंडिया गठबंधन से निकाले जाने की मांग के बाद ममता, अखिलेश और उद्धव का दिल्ली चुनाव में श्री केजरीवाल के  समर्थन का ऐलान किसी नई राजनीतिक पटकथा की भूमिका कही जा सकती है। तेजस्वी का ये कहना भी काबिले गौर है कि इंडिया गठबंधन तो केवल लोकसभा चुनाव तक था। इसका आशय ये कि  बिहार विधानसभा के चुनाव में राजद द्वारा कांग्रेस को झटका दिया जा सकता है। इससे तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म की संभावना भी बढ़ रही हैं। दिल्ली के दंगल में कांग्रेस अपने मतों में  यदि 10 फीसदी वृद्धि कर सकी तब  आम आदमी पार्टी  सत्ता से भले बाहर आ जाए किंतु सेहरा भाजपा के सिर पर होगा। और यदि ये हुआ तब कांग्रेस के भीतर ही  न सिर्फ राहुल बल्कि गाँधी परिवार के विरुद्ध भी बगावत हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 January 2025

दिल्ली का चुनाव इंडिया गठबंधन से ज्यादा कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण



दिल्ली विधानसभा  चुनाव की तिथि घोषित हो गई। हालाँकि चुनाव प्रचार काफी पहले से शुरू हो  चुका है। आम आदमी पार्टी ने तो लोकसभा चुनाव के फौरन बाद ही अकेले लड़ने की घोषणा कर दी थी। हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा एक भी सीट न दिये जाने  के बाद दोनों के बीच पूरी तरह से अलगाव हो गया। हालाँकि दिल्ली के कांग्रेस नेताओं को अरविंद केजरीवाल का साथ कभी रास नहीं आया। आम आदमी पार्टी बनने के बाद श्री केजरीवाल ने गाँधी परिवार सहित कांग्रेस के अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए वे पार्टी को सदैव कचोटते रहे।  उल्लेखनीय है कि जिस शराब घोटाले के कारण मनीष  सिसौदिया और श्री केजरीवाल को जेल जाना पड़ा उसकी शिकायत उपराज्यपाल से कांग्रेस ने ही की थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को रोकने बने इंडिया गठबंधन में जब आम आदमी पार्टी भी शामिल हो गई तब स्थानीय नेता मन मसोसकर रह गये। श्री केजरीवाल के जेल में रहने के दौरान दिल्ली में गठबंधन की जो रैली हुई उसमें उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल को सोनिया गाँधी के साथ बिठाया गया। बाद में लोकसभा चुनाव भी दोनों पार्टियों ने मिलकर लड़ा किंतु एक भी सीट नहीं मिली। उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब  रहने से इंडिया गठबंधन में राहुल गाँधी के नेतृत्व के विरोध में आवाजें उठने लगीं। इसकी मुहिम ममता बैनर्जी ने शुरू की जिसे शिवसेना ( उद्धव ) , लालू प्रसाद यादव और सपा का समर्थन मिलने से कांग्रेस के लिए शर्मनाक स्थिति बन गई। संसद के शीतकालीन सत्र में भी विपक्ष का बिखराव खुलकर सामने आया जिसका कारण  श्री गाँधी की कार्यशैली ही रही। खुद को श्री मोदी  का विकल्प मान लेने की उनकी खुशफहमी बाकी विपक्षी नेताओं को नागवार गुजरने लगी। इसीलिए अदाणी मुद्दे पर एक - दो को छोड़कर बाकी दलों ने कांग्रेस से दूरी बना ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने के निर्णय के बाद विपक्षी एकता की गुंजाइश तो पहले ही खत्म हो चुकी थी। बाकी कसर पूरी कर दी कांग्रेस द्वारा गठबंधन के साथियों से सलाह किये बिना चुनाव में उतरने से। पार्टी के वरिष्ट नेता अजय माकन द्वारा श्री केजरीवाल को  एंटी नेशनल ( देश विरोधी) कहे जाने के बाद आम आदमी पार्टी ने तो कांग्रेस को इंडिया गठबंधन से निकाल बाहर करने तक की मांग कर डाली। कांग्रेस  इस चुनाव में जिस हौसले के साथ उतरी उससे लगा था कि वह अपनी खोई जमीन वापिस लेने में कामयाब हो जायेगी। उल्लेखनीय है  विधानसभा चुनावों में लुटिया डुबोने के बावजूद भी  2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी से ज्यादा मत प्राप्त हुए थे। लेकिन 2013 में दिल्ली की सरकार गंवाने के बाद भाजपा को रोकने के लिए श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने हेतु समर्थन देकर कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की जो गलती की उससे वह आज तक उबर नहीं पाई। शीला दीक्षित के बाद कोई ऐसा चेहरा उसके पास नहीं है जो मतदाताओं को आकर्षित कर सके।  और जिन राहुल के दम पर पार्टी अपने स्वर्णिम दिनों को पुनर्जीवित करना चाह रही है उन्होंने दिल्ली का दंगल छोड़ विदेश जाकर नया साल मनाने को प्राथमिकता दी और वह भी पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के निधन के फ़ौरन बाद। जिसे लेकर उनकी चौतरफा आलोचना हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद श्री गाँधी पार्टी की उम्मीदों के केंद्र हैं। जब श्री केजरीवाल दिल्ली की गली - गली में घूमकर प्रचार में जुटे हुए हैं और प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भाजपा की तरफ से मोर्चा संभाल लिया तब कांग्रेस के शीर्ष नेता का युद्धभूमि से दूर चला जाना बेहद गैर जिम्मेदाराना कदम  माना जा रहा है। जबकि ये चुनाव इंडिया गठबंधन से ज्यादा कांग्रेस  के लिए महत्वपूर्ण है। दिल्ली में सत्ता हासिल करना तो उसके लिए नामुमकिन है लेकिन यदि वह पिछले चुनावों की तरह ही चारों खाने चित्त हुई तब नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव में लालू यादव एंड कं उन्हें कितना भाव देगी ये सोचने वाली बात है। प. बंगाल में ममता तो कांग्रेस को कुछ समझती ही नहीं हैं। ये सब देखते हुए अपेक्षा थी कि न सिर्फ राहुल बल्कि प्रियंका वाड्रा भी पार्टी की नैया डूबने से बचाने आगे आयेंगी। लेकिन अब तक जो देखने मिला उसके अनुसार कांग्रेस का प्रथम परिवार   अपने आप में मगन है। चुनाव में जय - पराजय होती रहती है किंतु योद्धा वह होता है जो पूरी हिम्मत से लड़े। आम आदमी पार्टी और भाजपा के  दिग्गज तो बिना समय गंवाए मैदान में उतर आये जबकि कांग्रेस  के प्रमुख सेनापति नये साल के जश्न की खुमारी से निकल नहीं पा रहे। ऐसे में उसका क्या हश्र होगा उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता पर तो हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे पानी फेर ही चुके हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 January 2025

सनातन के बाद तमिलनाडु में राष्ट्रगान का भी अपमान


दक्षिण के राज्यों में उत्तर भारत और हिन्दी के प्रति यदि सबसे अधिक नफरत कहीं है तो वह तमिलनाडु है। वहाँ इस बात को भी प्रचारित किया जाता रहा है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़ हैं जबकि आर्य विदेशों से आये थे। आजादी के बाद से ही वहाँ उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध में वातावरण बनाया जाने लगा। रामास्वामी पेरियार ने उच्च जातियों के विरुद्ध आंदोलन चलाकर जिस नास्तिकतावाद को द्रविड़ आंदोलन की शक्ल में आगे बढ़ाया कालांतर में इस राज्य की राजनीति उसी में उलझकर रह गई। द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) से शुरू उस राजनीतिक धारा को यद्यपि आगे चलकर  एम.जी.रामचंद्रन ने (अद्रमुक) अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बनाकर  दो हिस्सों में बांट दिया। उसमें से भी छोटी - छोटी कुछ धाराएं और निकलीं किंतु मुख्य रूप से द्रमुक और अद्रमुक ही बारी - बारी से राज करते रहे। संघीय ढांचे के कारण तमिलनाडु को भी  केंद्र से रिश्ते रखने पड़ते हैं और इसी वजह से दोनों द्रविड़ पार्टियां केंद्र  में बनी गठबंधन सरकारों से जुड़ती रहीं किंतु उनका दृष्टिकोण सदैव  राष्ट्रीय हितों से परे द्रविड़ अस्मिता से प्रेरित और प्रभावित रहा। इसके चलते उन्होंने राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं किया। ये दुर्भाग्य ही है कि मुख्यधारा से अलग चलने के बावजूद इन दोनों पार्टियों के दबाव को कांग्रेस और भाजपा दोनों सहती आ रही हैं। राजीव गाँधी की हत्या के आरोप से घिरी द्रमुक  के साथ कांग्रेस का गठबंधन है जबकि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अकारण गिरवा देने वाली अद्रमुक से बाद में भाजपा  ने गठबंधन कर लिया। केंद्र पर दबाव डालकर अपने राज्य के लिए अधिकाधिक  संसाधन या अन्य सुविधा हासिल करने में तो दक्षिण के सभी राज्यों का रवैया एक जैसा रहा है किंतु तमिलनाडु जैसी अलगाव की भावना उनमें नहीं है। श्रीलंका में चले तमिल इलम आंदोलन को द्रमुक का खुला समर्थन था। ये कहना भी गलत नहीं है कि तमिलनाडु को अलग देश बनाने का सपना स्व. करुणानिधि देखने लगे थे। हालांकि वह साकार नहीं हो सका , लेकिन अलगाववाद रूपी ज़हर के बीज समय - समय पर अंकुरित होते रहे हैं। कभी कोई नेता हिन्दी लादने पर भारत से अलग होने की धमकी देता है तो कोई सनातन को नष्ट करने का आह्वान करने की हिमाकत कर बैठता है। सरकार में बैठते समय भारत के संविधान की शपथ लेने वाले तमिलनाडु के राजनेता उसकी धज्जियां उड़ाने की धृष्टता गाहे - बगाहे करते रहते हैं। हालांकि तमिलनाडु के लाखों लोग देश के अन्य राज्यों में बस गए हैं। वहाँ उनके साथ कभी भेदभाव नहीं हुआ और न ही उन्होंने हिन्दी के प्रति कभी कोई शिकायत की। उत्तर भारत के सस्थानों से हिन्दी में उपाधि अर्जित कर सैकड़ों तमिलभाषी केंद्रीय विभागों में राजभाषा अधिकारी बन गए। ये सब देखकर लगता है कि तमिलनाडु में हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान तीनों को लेकर जो विषवमन किया जाता है उसके पीछे वह राष्ट्रविरोधी सोच ही है जो स्वतंत्र तमिल राष्ट्र की स्थापना की पक्षधर है। इसका ताजा उदाहरण है गत दिवस राज्य विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण के अवसर पर राष्ट्रगान की बजाय तमिलनाडु का राज्य गान गाया जाना। परंपरानुसार राज्यपाल के अभिभाषण के पूर्व और उपरांत राष्ट्रगान गाया जाता है।  लेकिन केवल तमिलनाडु का राज्य गान ही हुआ तब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष से राष्ट्रगान हेतु कहा किंतु उन्होंने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जिससे रुष्ट होकर वे बिना अभिभाषण पढ़े लौट आये और सोशल मीडिया पर भी राज्य सरकार के प्रति आलोचनात्मक टिप्पणी पोस्ट कर दी। जवाब में मुख्यमंत्री ने राज्यपाल पर तमिलनाडु के अपमान का आरोप लगाते हुए पद छोड़ने की मांग कर डाली। हालांकि  राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच तनातनी नई बात नहीं है। गैर भाजपा शासित अन्य  राज्यों से भी  इस तरह की खबरें आये दिन सुनाई देती हैं। लेकिन राष्ट्रगान के स्थान पर राज्य गान का वादन या  गायन संघीय व्यवस्था के प्रति अलगाव के भाव को दर्शाता है। मुख्यमंत्री स्टालिन और राज्यपाल के बीच चलने वाली खींचतान के चलते संवैधानिक परंपराओं और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों का अपमान हो तो ये अक्षम्य है। स्मरणीय है स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने , जो उनकी सरकार में मंत्री भी हैं, कुछ समय पूर्व सनातन की तुलना कोरोना और कैंसर से करते हुए उसे नष्ट करने का आह्वान किया था। आश्चर्य ये है कि इंडिया गठबंधन के किसी भी घटक ने तमिलनाडु विधानसभा में राष्ट्रगान के अपमान पर द्रमुक सरकार की आलोचना नहीं की। कांग्रेस भी तमिलनाडु में स्टालिन सरकार का हिस्सा है। एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते उससे ये अपेक्षा है कि वह राष्ट्रगान के अपमान के लिए मुख्यमंत्री स्टालिन की आलोचना करे। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि तमिल राष्ट्र के आंदोलन से उपजी घृणा ने ही राजीव गाँधी की जान ले ली थी।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

दिल्ली के चुनाव को प्रदूषित कर रहे बयान


दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला होने से सरगर्मी  कुछ ज्यादा ही है। कांग्रेस जो पिछले दो चुनावों में शून्य पर पहुँच गई थी इस बार अपना अस्तित्व बचाने हाथ पाँव मार रही है। वहीं भाजपा की कोशिश है वह लोकसभा चुनाव के धमाकेदार प्रदर्शन के अनुरूप विधानसभा चुनाव में भी सफलता हासिल कर सके जिसके लिए वह बीते 25 साल से तरस रही है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस बार अपने को घिरा हुआ मानकर बेहद सतर्क है। शराब घोटाले के अलावा मुख्यमंत्री आवास पर श्री केजरीवाल द्वारा किया गया बेतहाशा खर्च भी उसके लिए मुसीबत बना हुआ है। कांग्रेस और भाजपा दोनों रोजाना नये - नये सवाल पूछकर आम आदमी पार्टी को रक्षात्मक होने मजबूर कर रही हैं। इस बार के चुनाव में अनेक पुराने साथी श्री केजरीवाल का साथ छोड़ गए। वहीं मनीष सिसौदिया जैसे दिग्गज को तो चुनाव क्षेत्र बदलना पड़ गया। आक्रमण आम आदमी पार्टी भी कर रही है किंतु उसे इस बात का डर सताने लगा है कि यदि कांग्रेस अपने मतों में 5 फीसदी की वृद्धि भी  कर ले गई तब उसकी राह कठिन हो जाएगी। इसीलिए  श्री केजरीवाल आरोप लगा रहे हैं कि उनके विरुद्ध कांग्रेस और भाजपा में गुप्त समझौता हुआ है। हालांकि उनके विरुद्ध कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र पूर्व सांसद संदीप दीक्षित को उतार दिया जबकि भाजपा ने भी पूर्व मुख्यमंत्री साहेब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा को उम्मीदवार बनाया है जो पिछली लोकसभा के सदस्य थे किंतु उन्हें टिकिट से वंचित रखा गया। बयानों के तीर सभी पक्षों से चल रहे हैं। लेकिन ये बात सही है कि इस बार भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध उतनी आक्रामक नहीं हैं और दोनों की तोपों के मुँह आम आदमी पार्टी की तरफ ही हैं। लेकिन गत दिवस कालका सीट से भाजपा के उम्मीदवार रमेश बिधूड़ी  ने पहले कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा और उसके बाद मुख्यमंत्री आतिशी सिंह के बारे में आपत्तिजनक बयान देकर भाजपा को व्यर्थ की मुसीबत में डाल दिया। एक बयान में उन्होंने मतदाताओं को आश्वस्त किया कि भले ही लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सड़कों को हेमा  मालिनी के गालों की तरह चिकना बनवाने का वायदा पूरा नहीं किया किंतु वे दिल्ली की सड़कों को प्रियंका के गालों जैसा बनवाएंगे। उनके इस बयान की चौतरफा आलोचना हुई तो उन्होंने माफी की रस्म अदायगी कर डाली । लेकिन कुछ देर बाद ही वे बोल बैठे कि मुख्यमंत्री आतिशी ने तो अपना पिता बदल लिया जो पहले अपने नाम के साथ मार्लेना लगाती थीं किंतु अब आतिशी सिंह लिखती हैं। इसके बाद आम आदमी पार्टी भाजपा पर चढ़ बैठी और इस बयान को  दिल्ली की महिलाओं का अपमान बताते हुए मुद्दा बनाने की पहल शुरू कर दी। यद्यपि तीख़ी बयानबाजी सभी पक्षों द्वारा जारी है किंतु श्री बिधूड़ी ने प्रियंका और आतिशी के बारे में  जो कुछ कहा वह शालीनता के लिहाज से बेहद आपत्तिजनक था। लालू ने बरसों पहले जो कहा उसे आधार बनाकर नई टिप्पणी करना दिमागी दिवालियापन नहीं तो और क्या है? ये वही बिधूड़ी हैं जिहोंने लोकसभा में किसी विपक्षी सांसद पर बेहद निम्नस्तरीय कटाक्ष कर दिया। उस पर उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग भी उठी। हालांकि वह मंजूर नहीं हुई किंतु भाजपा ने उनकी लोकसभा टिकिट काट दी। जिससे ये संदेश गया कि लोकसभा में उनकी टिप्पणी को पार्टी नेतृत्व ने पसंद नहीं किया। लेकिन विधानसभा चुनाव में उनको उम्मीदवार बना दिया गया। उल्लेखनीय है श्री बिधूड़ी  दिल्ली से लोकसभा और विधानसभा सदस्य रह चुके हैं जिससे उनका जनाधार साबित होता है। ये भी हो सकता है कि उनको बगावत से रोकने मुख्यमंत्री के विरुद्ध उतारकर बलि का बकरा बना दिया गया हो। लेकिन उनके संदर्भित बयानों ने भाजपा की अच्छी भली आक्रामकता को झटका दे दिया। यद्यपि बेलगाम जुबान वाले नेता कमोबेश हर पार्टी में हैं किंतु भाजपा जैसी अनुशासन पसंद पार्टी में  श्री बिधूड़ी जैसे नेताओं को क्यों ढोया जाता है ये समझ से परे है। हालांकि राजनीतिक विमर्श में भाषा की मर्यादा जिस तरह तार - तार हो रही है वह चिंता का विषय है। चुनाव जीतने की क्षमता ही उम्मीदवारी का आधार मान लेने के कारण पार्टियां ऐसे उम्मीदवारों को अवसर देती हैं। श्री बिधूड़ी जीतेंगे या नहीं ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि उन्होंने अपनी पार्टी  को शर्मिंदगी झेलने मजबूर कर दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी